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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका | Samayiki - Hindi Webzine</title>
	
	<link>http://www.samayiki.com</link>
	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
	<lastBuildDate>Sat, 08 Sep 2012 13:52:05 +0000</lastBuildDate>
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		<title>फ़ेसबुक का इंद्रासन हिलाने आया गूगल+?</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2011/07/google-plus/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 01 Jul 2011 03:34:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
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		<description><![CDATA[ओरकुट की विफलता के बाद गूगल की फ़ेसबुक के समानांतर एक नये सोशल प्लेटफॉर्म के निर्माण के बारे में बता रहे हैं रविशंकर श्रीवास्तव।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="margin: 10px 5px;" title="Google Plus- Stream" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/07/stream.jpg" alt="Google Plus- Stream" width="610" height="339" /></p>
<p><span class="dropCap">इं</span>टरनेट पर गूगल की एक नई नवेली सोशल नेटवर्किंग सेवा <strong>गूगल+</strong> (उच्चारणः गूगल प्लस) चंद चुनिंदा आमंत्रितों के लिए प्रारंभ हो गई है। यह <a title="Google+" href="http://plus.google.com" target="_blank">http://plus.google.com</a> या <a title="Google Plus" href="http://www.google.com/+" target="_blank">http://www.google.com/+</a> पर उपलब्ध है।</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Google Plus" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/07/google-plus.jpg" alt="Google Plus" width="250" height="156" />माना जा रहा है कि गूगल+ को फ़ेसबुक को मात देने की नीयत से अच्छी खासी मेहनत कर प्रस्तुत किया जा रहा है। गूगल यूं भी इंटरनेट पर खोज और ईमेल से लेकर ऑफ़िस अनुप्रयोगों तक की तमाम तरह की सेवाएं और वेब अनुप्रयोग प्रदान कर उस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व बना बैठा है। माईक्रोसॉफ्ट बिंग के प्रवेश के बाद विगत कुछ दिनों में गूगल की बादशाहत को सबसे बड़ा खतरा फ़ेसबुक से ही रहा है, जिसका प्रयोक्ता ने एक दफा रुख किया तो फिर वहीं की हो कर रह गई, ऐसा मुकाम जो आर्कुट को मयस्सर नहीं हो सका। कई क्षेत्रों में तो इंटरनेट प्रयोग के मामले में फ़ेसबुक ने गूगल को पछाड़ कर पहले स्थान पर कब्जा भी कर लिया है। अफवाह तो ये भी है कि गूगल को उसके घर में घुसकर मात देने के लिए फ़ेसबुक ने ईमेल के पश्चात अब अपना सर्च इंजन लाने की भी योजना बना ली है। संभवतः इस समीकरण को बदलने के लिए ही गूगल ने प्लस नामक यह नया सोशल शगूफ़ा छोड़ा है। अब सवाल यही है कि क्या गूगल+ की ये कोशिश कामयाब होगी?</p>
<p>गूगल+  की कुछ सेवाएँ तो हमारे इंटरनेट जीवन और फोटो-वीडियो इत्यादि साझा को करने की गरज से रीडिजाइन की गई प्रतीत होती हैं। मगर इसका असली परीक्षण तो तब होगा जब यह आम प्रयोग के लिए जारी होगा, और तभी यह पता चलेगा कि प्रयोक्ता इसे कितना हाथों हाथ लेते हैं। वैसे भी लोगों को फ़ेसबुक के इतर किसी नये सोशल प्लेटफॉर्म से जोड़ना बड़ी टेढ़ी खीर है।</p>
<div id="boxR">
<h2>गूगल की कुछ असफल सेवाएँ</h2>
<p>गूगल ने बीते दिनों कई वेब सेवाएँ जारी की जिनके बारे में शुरूआत में काफी हो हल्ला मचा था, परंतु वे जल्द ही फुस्स साबित हो गईं। जाहिर है कि इन सेवाओं को बंद करने के पीछे व्यावसायिक व रणनीतिक कारण होते हैं, आखिरकार नुकसान का व्यापार कौन करना चाहेगा, पर मौजूदा प्रयोक्ताओं और सेवाओं को पसंद करने वाले लोग तो नाराज़ होते ही हैं।</p>
<ul>
<li><strong>गूगल वेव </strong>- इसमें ढेर सारी &#8220;भविष्य की&#8221; सेवाएँ थीं &#8211; मसलन रीयल टाइम में किसी दस्तावेज़ में अक्षर-दर-अक्षर दूरस्थ संपादन पर निगाह रखना, विकि जैसी ख़ूबी, आसान फ़ाइल साझा और वर्तनी तथा व्याकरण जाँच इत्यादि। मगर यह प्रयोगकर्ताओं के बीच कोई लहर बनाने में नाकामयाब रहा।</li>
<li><strong>गूगल नॉल</strong> &#8211; मनुष्य के ज्ञान को साझा करने के उद्देश्य से इस सेवा का प्रयोग प्रारंभ किया गया था,  मगर शुरुआती जिज्ञासा के खत्म होते और विकीपीडिया को कुछ दिन डराने के बाद इसके गंभीर प्रयोक्ताओं ने एक तरह से दूरी बना ली है।</li>
<li><strong>ओरकुट </strong>- 2004 में शुरू हुई यह सोशल साइट ब्राजील और भारत के युवाओं में एक समय  बेहद लोकप्रिय हो रही थी। मगर इसमें फ़ेसबुक और माइस्पेस में मौजूद असीमित वीडियो अपलोड जैसे फीचर्स की कमी की वजह से दौड़ में पीछे छूट गई है।</li>
<li><strong>गूगल वेब एस्सेलरेटर</strong> &#8211; इस सेवा के बारे में गूगल का दावा है कि यह इंटरनेट की गति को 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की क्षमता रखता है। परंतु शोधकर्ताओं का दावा है कि आधुनिक उच्च गति के ब्रॉडबैण्ड और ब्राउज़रों में यह कोई खास बदलाव नहीं लाता तथा इसका प्रयोग गूगल मार्केट रीसर्च टूल के रूप में करता है।</li>
<li><strong>गूगल एंसर्स</strong> &#8211; याहू! एंसर्स के बारे में तो आपने सुना होगा। गूगल एंसर्स भी कभी जीवंत था। परंतु इसके उत्तरों के लिए शुल्क की आवश्यकता ने फोकटिया वेब प्रयोक्ताओं में पैठ बनाने में यह पूरी तरह नाकामयाब रहा।</li>
<li><strong>गूगल चेकआउट</strong> &#8211; जून 2007 में इसे इंटरनेट की भरोसेमंद व बेहद लोकप्रिय भुगतान सेवा ई-बे के पेपैल के एक बेहतर विकल्प के रूप में जारी किया गया था। गूगल चेकआउट चल तो अभी भी रहा है, मगर लोकप्रिय नहीं है, और इसके प्रयोक्ताओं की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है।</li>
<li><strong>गूगल वीडियो </strong>- गूगल की वीडियो साझा करने वाली साइट गूगल वीडियो को तो गूगल द्वारा यू-ट्यूब के अधिग्रहण के बाद बंद होना ही था। परंतु यह असफल सेवा कभी भी लोकप्रिय नहीं हो पाई क्योंकि इसका प्रयोग जरा कठिन किस्म का था तथा इसमें वीडियो को भिन्न प्लेटफ़ॉर्म में साझा करने के विकल्प भी नहीं थे।</li>
</ul>
<p>गूगल की ऐसी ही अन्य कई सेवाएँ हैं &#8211; मसलन &#8211; लाइवली, डाजबाल, जाइकु, ओपन सोशल इत्यादि जो इंटरनेट पर अपना खास मुकाम बनाने में असफल रही हैं।</p>
</div>
<h2>गूगल+ की सुविधाएँ</h2>
<p>हालांकि यह सेवा अभी रूप से उपलब्ध नहीं है और संभव है कि इसके स्वरूप में पशुरुवाती प्रयोक्ताओं की प्रतिक्रिया के जवाब में कुछ बदलाव हों पर फ़ेसबुक से परे गूगल+ में सुविधाओं की भरमार नहीं है, कुल जमा पाँच हिस्से हैं गूगल+ केः</p>
<ul>
<li><strong>सर्कल </strong>- इसमें दस्तावेज़, फ़ोटो, वीडियो, कड़ियाँ जैसी तमाम सामग्री को सही व्यक्ति के साथ साझा करने की सुविधा है। आप अपने परिवार, मित्रों या ऑफ़िस सहयोगियों के अलग अलग सर्कल या समूह बना सकते हैं और इस तरह अपनी सामग्री को इंटरनेट पर बेहतर तरीके से साझा कर सकते हैं।</li>
<li><strong>स्पार्क </strong>- यह आपकी प्रकृति के मुताबिक (आपके पिछले वेब सर्फिंग व्यवहार पर बारीक नजर रखकर) वीडियो लिंक, पठन-पाठन सामग्री की लिंक स्वयमेव सहेजता रहता है ताकि जब आप फुरसत में हों तो समय बरबाद करने के नाम पर कुछ मजेदार वीडियो देख लें या पाठ सामग्री की लिंक में जाकर अपना ज्ञानवर्धन कर सकें।</li>
<li><strong>हैंगआउट्स </strong>- फ़ेसबुक फ्रेंड्स की तरह दोस्त बनाने व उनके साथ टिप्पणी, वार्तालाप करने, लिंक टिकाने या सामग्री साझा करने के लिहाज से यह सुविधा जोड़ी गई है।</li>
<li><strong>इंस्टैंट अपलोड</strong> &#8211; डिजिटल कैमरों से फोटो खींचना तो महज एक क्लिक का काम है। परंतु उन्हें अपलोड करना व परिवार व मित्रों के बीच साझा करना बड़ा सिरदर्द होता है। इंस्टैंट अपलोड के जरिए एक बार सेटिंग कर देने मात्र से कुछ विशिष्ट उपकरणों द्वारा (जैसे कि स्मार्टफ़ोनों से) आपके द्वारा खींचे गए फ़ोटो स्वयमेव ही अपलोड होते जाएंगे। साथ ही आप अपनी पिकासा अल्बम को भी प्लस से जोड़ सकते हैं।</li>
<li><strong>हडल </strong>- आज की युवा पीढ़ी एसएमएस और चैट की दीवानी है। टैक्स्टिंग उसका न सिर्फ सूचना आदान-प्रदान का बल्कि मनोरंजन का भी एक बड़ा साधन है। हडल के जरिए टैक्स्टिंग को एक पायदान और ऊपर पहुँचाया गया है जहाँ एक से अधिक दोस्त समूह बनाकर इस सेवा का लाभ ले सकेंगे।</li>
</ul>
<h2>हिंदी में भी उपलब्ध</h2>
<p>गूगल+ हिंदी समेत कोई 44 भाषाओं में उपलब्ध है। मगर कई स्थलों पर इसका हिंदी अनुवाद बेहद ही कच्चा किस्म का है। सीधा शब्द-दर-शब्द और वाक्य दर वाक्य अनुवाद है। जो कई जगह खीझ उत्पन्न करता है तो कई जगह समझने में मुश्किल पैदा करता है। उदाहरण स्वरूप एक जगह लिखा है -मजेदार के बिलकुल विपरीत कार्य। इस तरह के वाक्यांशों से मंतव्य समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है।</p>
<p>वैसे, कुल मिलाकर गूगल+ एक मजेदार, काम की सेवा लगती है जिसमें विशिष्ट किस्म की नए फ्लैवर की सेवाएँ हैं जिनमें कुछ दम तो नजर आता है। हो सकता है आपको लगे कि कुछ सेवाओं से तो आ वाकिफ हैं, मसलन गूगल चैट, या गूगल प्रोफाईल की जानकारी, तो इसे गूगल की इन सब सेवाओं के मिश्रण जुटा कर एक नयी रेसिपी बनाने की जुगत भी समझा जा सकता है।</p>
<p>गूगल+ अभी सिर्फ आमंत्रितों के लिए उपलब्ध है, पर जल्द ही यह हम सभी के आम प्रयोग के लिए, वह भी बिलकुल मुफ़्त उपलब्ध होगा। ऐसे में, इंटरनेट के सिंहासन पर दावेदारी के बड़े लोगों के झगड़ों में हम-आप जैसे आम वेब प्रयोक्ताओं के लिए तो चाँदी ही चाँदी है।
<p class="note">गूगल+ का आमंत्रण आपको भी चाहिए? अभी <a href="https://services.google.com/fb/forms/googleplusenuk">https://services.google.com/fb/forms/googleplusenuk</a> पर पंजीकरण करें या फिर प्लस पर मौजूद अपने दोस्तों से इन्वाइट की गुजारिश करें।</p>
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		<item>
		<title>हिन्दी फ़िल्मों में बस पैसों के लिये काम किया</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/samayiki/~3/ACpfx6qJ4us/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2011/04/aparna-sen-interview/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 13 Apr 2011 07:52:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[Bengali]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[फ्लोरेंस के "रिवर टू रिवर फिल्म फेस्टिवल" में डॉ सुनील दीपक को लड़कपन से पसंद अभिनेत्री से रूबरू होने का मौका मिला]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/04/aparna_sen_story.jpg" alt="Aparna Sen" width="610" height="180" /></p>
<div id="section-teaser">एक अभिनेत्री के रूप में मुझे लड़कपन से ही अपर्णा सेन बहुत अच्छी लगती थीं और विगत दिसम्बर में, फ्लोरेंस के &#8220;रिवर टू रिवर फिल्म फेस्टिवल&#8221; में मुझे इस प्रसिद्ध अभिनेत्री तथा निर्देशक से रूबरू होने का मौका मिला। समारोह में उनकी दो फ़िल्मों को सम्मान मिल रहा था। उनकी नयी बांग्ला फ़िल्म &#8220;इति मृणालिनी&#8221; से फ़िल्म फेस्टिवल का उद्घाटन हुआ और उनकी 2010 की सुन्दर कविता जैसी बिना कहे ही बहुत कुछ कहने वाली अंग्रेज़ी फ़िल्म &#8220;द जेवेनीज़ वाईफ़&#8221; से फेस्टिवल का समापन हुआ। दोनों फ़िल्मों को दर्शकों और आलोचकों से बहुत प्रशंसा मिली, हालाँकि अपर्णा जी के लिए प्रशंसा कोई नयी बात नहीं, करीब तीस साल पहले बनी उनकी निर्देशित पहली फ़िल्म, 36 चौरंगी लेन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था और फ़िल्म में जेनिफ़र कैंडल के मर्मस्पर्शी अभिनय को आज तक भूलाना कठिन है। प्रस्तुत है फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन स्थल, फ़्लोरेंस के सौ साल से भी अधिक पुराने ओडियन सिनेमा हाल, के नज़दीक स्थित एक कैफे में की गयी बातचीत के अंश।</div>
<p><strong>सुनीलः </strong>मुझे विश्वास नहीं होता कि मैं आप के सामने बैठा बात कर रहा हूँ। आप को पहली बार मेरे विचार में अंग्रेज़ी फ़िल्म &#8220;द गुरु&#8221; में 1970 में देखा था।</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> &#8220;द गुरु&#8221; 1970 की नहीं थी, बहुत बाद की थी &#8230; नहीं, शायद आप ठीक कह रहे हैं, 1970 के आसपास की ही थी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong> हाँ, मेरे विचार में 1970 की ही बात है। मुझे याद है कि दिल्ली के रिवोली सिनेमा हाल में देखने गया था। खैर यह तो पुरानी बात है। आज मैं आप से कुछ ऐसे प्रश्न करना चाहूँगा जिनके बारे में कम लिखा गया हो या जिन्हें कम लोग जानते हों। तो बात शुरु करना चाहूँगा आप के बचपन से। आप के पिता जाने माने फ़िल्म आलोचक थे, ऐसे वातावरण में बड़े होने का आप पर क्या प्रभाव पड़ा?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> फ़िल्म आलोचक होने के अतिरिक्त, मेरे माता पिता कलकत्ता फ़िल्म सोसाईटी को बनाने वाले सदस्यों में शुमार थे। इसका असर यह हुआ कि बचपन से ही मुझे दुनिया भर से बढ़िया सिनेमा देखने का मौका मिला। मेरी फ़िल्मों की दिलचस्पी और पसंद तभी बनी। रूसी फ़िल्में जैसे कि &#8220;बेटलशिप पोटेमकिन&#8221;, &#8220;ईवान द टेरिबल&#8221;, या फ्राँससी फ़िल्म &#8220;पैशन आफ़ जोन द आर्क&#8221; मैंने तभी देखीं। इस तरह की फ़िल्में देखते हुए मैं बड़ी हुई।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>अच्छा, मैंने कहीं पढ़ा था कि आप ने दस वर्ष की आयु में पहली बार फ़िल्म में अभिनय किया?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> यह गलत है, मैंने दस साल की उम्र में किसी फ़िल्म में काम नहीं किया।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>यानि 1961 की सत्यजित राय की फ़िल्म &#8220;तीन कन्या&#8221; ही आप की पहली फ़िल्म थी? तब क्या आप को समझ थी कि आप इतने महान फिल्मकार के साथ काम कर रही हैं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>बिल्कुल पूरी समझ तो नहीं थी, मुझे मालूम था कि वह बड़े निर्देशक हैं, लेकिन मेरी दृष्टि में वह फ़िल्म निर्देशक से अधिक मेरे पिता के पुराने मित्र थे। मुझे वह कहानी, रवींद्रनाथ टैगौर की &#8220;स्माप्ति&#8221; बहुत अच्छी लगी थी, मैंने उस कहानी को उन्हीं दिनो पढ़ा था, तो कहानी की मृणमयी का किरदार निभाना मुझे बहुत अच्छा लगा। उस फ़िल्म में काम करने के दिन बहुत मज़ेदार थे, लगता था कि पिकनिक हो रही हो। न स्कूल जाना पड़ता या इम्तिहान की चिंता करनी पड़ती। बहुत आनन्द आया।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>जब वह फ़िल्म आयी तो आप सोलह साल की थीं, फ़िल्म की शूटिंग के बाद वापस स्कूल जाना कैसा लगा? क्या आप उस समय प्रसिद्ध हो चुकीं थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> फ़िल्म के बाद स्कूल जाना बहुत बुरा लगा। इतने मजे के दिनों के बाद स्कूल की पढ़ाई करना कठिन था, फ़िर साथ पढ़ने वाली साथियों ने भी मेरा मज़ाक उड़ाया, ताने कसे&#8230;टिप्पणियाँ की। मेरी कुछ परीक्षायें छूट भी गईं, बस दो तीन विषय के इम्तिहान ही दे पायी। मैं उस समय अंग्रेजी, इतिहास जैसे विषयों में बहुत तेज़ थी और यह इम्तिहान भी अच्छे हुए। मेरे विचार में मैं इन विषयों में अव्वल आयी, लेकिन अन्य विषयों में इम्तिहान नहीं दिये थे तो कक्षा में बाकी साथियों से काफ़ी पीछे थी। तब हमारे स्कूल में सब विद्यार्थियों की सभा में सबके परिणाम पढ़े जाते थे, जब मेरी बारी आयी तो हमारी प्रिंसिपल ने कुछ ताना कसा कि &#8220;हमें पढ़ाई से अधिक अभिनय में दिलचस्पी है&#8221;। मुझे बहुत बुरा लगा, रो भी पड़ी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप ने अपने बचपन का कुछ हिस्सा हज़ारीबाग में बिताया, उसके बारे में कुछ बताईये।</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>मेरे दादा जी वहाँ रहते थे। वह ब्रह्मसमाजी थे, उनकी वहाँ चैरिटेबल डिस्पैंसरी थी जो मुझे बहुत दिलचस्प लगती थी। उनका घर बहुत सुन्दर था, सीधा सादा पर बहुत सुन्दर। हम लोग छुट्टियों में वहाँ जाते थे। हमारी सभी छुट्टियाँ हज़ारीबाग में ही निकलती थीं, विशेषकर सर्दियों की छुट्टियाँ। उस समय की यादें बहुत मुझे प्रिय हैं।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप ने अनेक फ़िल्मों में काम किया है। क्या कोई भूमिकायें ऐसी भी थीं, जो आप को अच्छे नहीं लगी या जिन्हें आप अपने आप से बिल्कुल भिन्न महसूस करती थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>जब अभिनय का क्षेत्र चुना हो काम के लिए तो कई बार ऐसी फ़िल्मों में भी काम करना पड़ता है जो कि आप को पसंद न हों, पर पैसा कमाना है तो करना ही पड़ेगा। मैंने बांग्ला में एक फ़िल्म की &#8220;अभिचार&#8221;, जो मैं नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने उनसे बहुत पैसा माँगा, लेकिन वह मान गये और वह फ़िल्म मुझे करनी पड़ी। लेकिन उसे करते हुए मुझे वह बिल्कुल पसंद नहीं थी, बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। उसके निर्देशक थे बिस्वजीत चौधरी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप का अर्थ है अभिनेता बिस्वजीत, आज के अभिनेता प्रसेनजीत के पिता?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> हाँ, वही थे निर्देशक उस फ़िल्म के।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> आप की माँ के परिवार में एक बहुत प्रसिद्ध कवि हैं&#8230;</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> हाँ, जीवानन्दा दास।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> क्या आप ने भी कभी कविता लिखी?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> नहीं। यानि जैसे छोटी उम्र में सभी कुछ कविता लिखते हैं, वैसे ही मैंने भी लिखीं, लेकिन उनमें कुछ महत्वपूर्ण नहीं था। जबकि जीवानन्दा दास जी, टेगौर के बाद के बांग्ला के बड़े कवियों में गिने जाते हैं, वह मेरी माँ के दूर के कज़न भाई थे। वह मेरे माता पिता के बहुत करीब भी थे।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> क्या आप की माँ भी लिखती थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>हाँ मेरी माँ सुप्रिया दासगुप्ता कहानियाँ लिखती थीं।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>क्या आप को लगता है कि आप को हिन्दी सिनेमा में अधिक सफ़लता नहीं मिली?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>(मुस्कराते हुए) मैंने हिन्दी सिनेमा में बहुत कोशिश भी नहीं की, शायद क्योंकि मेरा मन बंगाल में था। जितनी भी हिन्दी फ़िल्में मैंने की, सब गलत कारणों से। कभी टेक्स की किश्त भरनी होती थी या नयी गाड़ी खरीदनी थी, बस इस तरह के कारणों से मैंने हिन्दी फ़िल्में चुनी। ठीक वजह से कोई हिन्दी फ़िल्म नहीं की मैंने।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> इस बातचीत के धन्यवाद अपर्णा जी।</p>
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		<item>
		<title>रॉकमेल्ट ब्राउज़र : फ़ेसबुकिया वेब की पराकाष्ठा?</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/samayiki/~3/M2j950eDWkM/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2011/01/rockmelt-browser/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 18 Jan 2011 23:05:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
		<category><![CDATA[Browser]]></category>
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		<category><![CDATA[Rockmelt]]></category>
		<category><![CDATA[Social]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[सोशियल ब्राउज़र की शुरूआत मोजिल्ला आधारित फ्लॉक ब्राउज़र से हुई थी जिसमें ब्राउज़र में ही ब्लॉगिंग की तमाम सुविधाएँ मौजूद थी। सामयिकी संपादक रविशंकर श्रीवास्तव मानते हैं कि रॉकमेल्ट ब्राउज़र उससे भी एक कदम आगे है।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/01/rockmelt.jpg" alt="Rockmelt Social Browser" width="610" height="243" /></p>
<div class="dropCap">ल</div>
<p>गता है जैसे कि पूरा का पूरा इंटरनेट फ़ेसबुक-मय हो गया हो। सालेक भर पहले दुनिया गूगल-गूगल और ओरकुट-ओरकुट कहते पगलाती थी और साल बीतते न बीतते इंटरनेटिय जनसंख्या पूरी फ़ेसबुकिया गई सी लगती है। और, कोढ़ में खाज यह कि अब तो ब्राउज़र भी फेसबुक-मय हो गया है!</p>
<p>रॉकमेल्ट एक ऐसा नया, ताज़ा, बीटा स्वरूप में जारी किया गया ब्राउज़र है जिसे सोशियल ब्राउज़र श्रेणी में रखा गया है। सामाजिक ब्राउज़र की शुरूआत मोजिल्ला आधारित फ्लॉक ब्राउज़र से हुई थी जिसमें ब्राउज़र में ही ब्लॉगिंग की तमाम सुविधाएँ मौजूद थी। रॉकमेल्ट ब्राउज़र एक कदम आगे है। यह गूगल क्रोम ब्राउज़र के आधार पर बनाया गया है, और – जी, हाँ, आपने ठीक समझा – इसमें फ़ेसबुक को सम्मिलित कर दिया गया है।</p>
<p>रॉकमेल्ट अभी बीटा संस्करण में  जारी किया गया है, परंतु इसे सार्वजनिक प्रयोग के लिए जारी नहीं किया गया है। आपको याद होगा, जब गूगल ने अपना जीमेल जारी किया था तो निमंत्रण के जरिए खाता खोलने का विकल्प दिया गया था। इसी तरह से रॉकमेल्ट का प्रयोग करने के लिए भी आपको एक अदद निमंत्रण की आवश्यकता होगी – जिसके जरिए आप रॉकमेल्ट का इंस्टालर डाउनलोड कर सकेंगे और इसका प्रयोग कर सकेंगे।</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px;" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/01/rockmelt_logo.jpg" alt="Rockmelt Logo" width="180" height="190" />जब आप रॉकमेल्ट का इंस्टालर चलाते हैं, तो पहले पहल चालू होने से पहले रॉकमेल्ट आपके फेसबुक खाते से जुड़ने के लिए कहता है। यदि नहीं जुड़े हैं तो आपको एक फेसबुक खाता खोलने  के लिए कहता है। है न किसी ब्राउज़र की फेसबुकिया इंतिहा?</p>
<p>रॉकमेल्ट को इंटरनेटी इतिहास के सबसे पुराने और प्रसिद्ध ब्राउजरों में से एक नेटस्केप नेविगेटर के निर्माता मार्क एंड्रीसन का समर्थन हासिल है। और रॉकमेल्ट के डेवलपरों में से एक, टिम होव्स का कहना है कि पिछले वर्षों में 50 करोड़ प्रयोक्ताओं ने अपने ब्राउज़र बदले। तो, यदि आप बेहतर उत्पाद देंगे तो लोग अपनी आदतें – यानी ब्राउज़र बदलने में देरी नहीं करेंगे। यानी इसके डेवलपर मुतमईन हैं कि रॉकमेल्ट जारी होते ही एक बड़ा प्रयोक्ता वर्ग खींचने में कामयाब होगा – और क्यों न हो – इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या के लिहाज से फेसबुक पहले ही अमरीका में गूगल को पछाड़ कर पहले नंबर पर कब्जा जो कर चुका है।</p>
<h2>नया क्या है रॉकमेल्ट ब्राउज़र में?</h2>
<p>रॉकमेल्ट चालू करते समय आपको अनिवार्य रूप से फेसबुक और वैकल्पिक रूप से ट्विटर खाते में  लॉगइन करना पड़ता है। जैसे ही आप फ़ेसबुक में लॉगिन करते हैं, रॉकमेल्ट सामाजिक ब्राउज़र का विशिष्ट रूप से डिजाइन किया विंडो खुल जाता है जहाँ आप पारंपरिक ब्राउज़र की जगह रंगबिरंगा, फ़ेसबुकिया ब्राउज़र पाते हैं।</p>
<p>रॉकमेल्ट के दाएँ बाजू पट्टी में आपके फेसबुकिया मित्र मंडली  कब्जा जमाए मिलेंगे, और उनका स्टेटस वहाँ बदस्तूर दिखता रहेगा कि वे लॉगिन हैं या नहीं और वे फेसबुक में क्या कारस्तानियाँ करते फिर रहे हैं। उनकी कारस्तानियों की लाइव स्टेटस रिपोर्ट आपको वहाँ से मिलती रहेगी। जब भी आपका कोई फेसबुकिया मित्र कोई स्टेटस मैसेज देता है अथवा अपने या किसी दोस्त के वाल पर पोस्ट करता है अथवा कोई चित्र लोड करता है, वो तमाम चीजें पॉपअप के रूप में रॉकमेल्ट आपके सामने प्रस्तुत करता रहता है। आप चाहें तो रॉकमेल्ट को फ़ेसबुक में अपने मित्र-मंडली की खोजबीन के लिए भी बढ़िया तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। रॉकमेल्ट में सर्च को ज्यादा आकर्षक, ज्यादा रेलेवेंट और ज्यादा तेज बनाया गया है – जैसे कि आप किसी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हों। हिंदी में रचनाकार के लिए सर्च किया गया तो परिणाम बेहद सटीक तो रहे ही, फ़ालतू की चीजें भी नहीं दिखीं।</p>
<p>वैसे तो बहुतों का मानना है कि रॉकमेल्ट को फेसबुक के लिए ही विशेष रूप से डिजाइन किया गया है। मगर ऐसा भी नहीं है कि रॉकमेल्ट सिर्फ फेसबुक के भरोसे जिंदा है या रहेगा। इसमें बहुत सी दूसरी सुविधाएँ भी जोड़ी जा रही हैं जो आपके ऑनलाइन सोशल नेटवर्क को ज्यादा जीवंत बनाने की क्षमता रखती हैं। उदाहरणार्थ, रॉकमेल्ट का आरएसएस फ़ीड पाठक आपको लाइव फ़ीड पठन की सुविधा ब्राउज़र के भीतर ही देता है। आपके पसंदीदा फ़ीड के इंटरनेट पर प्रकाशित होने की सूचना प्राप्त होते ही रॉकमेल्ट आपको उसे प्रस्तुत कर देता है।</p>
<h2>भविष्य का ब्राउज़र?</h2>
<p>सवाल ये है कि क्या रॉकमेल्ट को भविष्य का ब्राउज़र कह सकते हैं? फ़ायरफ़ॉक्स में जब एक्सटेंशन और एडऑन जैसी नई विशिष्टताओं को लाया गया था तब उसे भी भविष्य का ब्राउज़र कहा गया था। पर अब सभी जानते हैं कि फ़ायरफ़ॉक्स भारी भरकम हो गया है और उसके नए संस्करणों में पुराने एक्सटेंशनों के समर्थन की समस्या और तमाम दीगर असुविधाओं के चलते प्रयोक्ता उसका दामन छोड़ क्रोम व ऑपेरा ब्राउज़र की ओर बढ़ने लगे हैं।</p>
<div id="pullQuoteL">रॉकमेल्ट में अंतर्निर्मित सोशल नेटवर्किंग सुविधाओं के नेपथ्य में गूगल क्रोम ब्राउज़र का ठोस आधार भी है।</div>
<p>रॉकमेल्ट अपने अंतर्निर्मित सोशल नेटवर्किंग सुविधाओं के साथ नया क्या दे रहा है जो इसे विशिष्ट  बनाता है जबकि अन्य दूसरे सभी ब्राउज़रों में ब्राउजर एडऑन और प्लगइन के जरिए ऐसी सुविधाएँ बखूबी प्राप्त की जा सकती हैं?</p>
<p>इस सवाल का सही जवाब तो यही होगा कि यह तो समय ही बताएगा कि प्रयोक्ता रॉकमेल्ट को हाथों हाथ लेते हैं या नहीं। मगर यह अपने बीटा स्वरूप में खास  निमंत्रण मिलने पर इंस्टाल हो सकने की सीमितता के उपरांत भी इंटरनेट पर कुछ हलचल मचाने की शक्ति दिखा रहा है तो कहा जा सकता है कि इस नए विचार युक्त ब्राउज़र में कुछ बात तो है। और, रॉकमेल्ट के नीचे ठोस गूगल क्रोम ब्राउज़र का आधार तो वैसे भी है।</p>
<p>कुल मिलाकर, फेसबुक के निवासी जिनका खाना-पीना-उठना-बैठना फेसबुक में ही होता है, रॉकमेल्ट का दिली तौर पर स्वागत करेंगे यह तो तय है। मगर रॉकमेल्ट के आधे घंटे के प्रयोग के दौरान मेरे 500 से अधिक फेसबुक-मित्रों के संदेश, स्टेटस रपट, वाल-पोस्टें, चित्र अपलोड करने की खबर और न जाने क्या-क्या हर दूसरे क्षण पॉप अप के रूप में ब्राउज़र के दाएँ निचले कोने में प्रकट होते रहे जो मुझे भारी डिस्टर्ब करते रहे। इस लिहाज से मैं तो रॉकमेल्ट के बगैर ही ठीक हूं – मुझे तो पारंपरिक, सादा ब्राउज़र ही सुहाएगा। पर यदि आप फेसबुक के गंभीर प्रयोक्ता हैं, फ़ार्मविले में आपका बहुत सा वक्त बढ़िया गुजरता है, तब तो रॉकमेल्ट आपके लिए सचमुच रॉकिंग है! आपका क्या कहना है?</p>
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		<item>
		<title>फेसबुक और एमएस आफिस बने दोस्त</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2010/11/docs-dot-com/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 24 Nov 2010 23:08:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
		<category><![CDATA[Facebook]]></category>
		<category><![CDATA[Microsoft]]></category>
		<category><![CDATA[MSOffice]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[डॉक्स.कॉम एमएस ऑफ़िस सूट 2010 के तहत उपलब्ध ऑफ़िस लाइव वेब एप्स की तरह ही है, मगर इसे बेहद लोकप्रिय सामाजिक नेटवर्क साइट फ़ेसबुक से जोड़ने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। ]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="margin: 10px;" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/docs-dot-com-story.jpg" alt="Docs.com" width="610" height="235" /></p>
<div class="dropCap">ह</div>
<p>मारी कंप्यूटिंग की दुनिया तेजी से क्लाउड की ओर अग्रसर है &#8211; मतलब ये कि वो पूरी तरह ऑनलाइन होने जा रही है। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण रूप में जब माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने ऑफ़िस सूट 2010 (जिसमें तमाम आफिस तंत्राँश जैसे कि वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट आदि शामिल होते हैं) को जारी किया तो उसमें न केवल ऑनलाइन दस्तावेज़ों के संपादन व साझा करने की सुविधा मुहैया कराई बल्कि ऐसे प्रयोक्ताओं के लिए जो ऑफ़िस सूट ख़रीद कर प्रयोग करने की कतई श्रद्धा नहीं रखते थे, डॉक्स.कॉम-बीटा नाम से ऑफ़िस सूट 2010 का ऑनलाइन संस्करण भी फ़ेसबुक के रास्ते जारी किया।</p>
<p>हालांकि माइक्रोसॉफ़्ट फ्यूज लैब्स द्वारा जारी <strong>डॉक्स.कॉम</strong> अब अभी अपने बीटा संस्करण में ही है और इसमें संपूर्ण ऑफ़िस सूट की सुविधाएँ शामिल नहीं की गई हैं, मगर इस पर त्वरित नजर डालने से इसकी संभावनाओं सुविधाओं के बारे में मालूमात किए जा सकते हैं और ये भी कयास लगाए जा सकते हैं कि भविष्य में क्लाउड कंप्यूटिंग का बिज़नेस मॉडल किस तरह आकार ग्रहण करेगा। यकीनन व्यक्तिगत या घरेलू प्रयोग करने वाला प्रयोक्ता आने वाले समय में बेहद फायदे में रहेगा क्योंकि उसे भारी भरकम राशि खर्च कर महंगे सॉफ़्टवेयर उत्पाद खरीदने नहीं पड़ेंगे। आमतौर पर सभी प्रमुख ऑनलाइन उत्पाद उसे मुफ़्त या अत्यंत किफायती कीमतों में और पूर्णतः कानूनी तरीके से हासिल होंगे। पर्सनल कंप्यूटिंग के संदर्भ में यह बहुत महत्वपूर्ण बात होगी।</p>
<div id="pullQuoteL">यदि आपने ऑफ़िस 2007 या 2010 पर काम किया हुआ है तो डॉक्स.कॉम पर काम करना बेहद आसान है। हालांकि ऑनलाइन प्रयोग के लिहाज से सिर्फ बेहद उपयोगी मेन्यू को ही रखा गया है। </div>
<p>यूं तो डॉक्स.कॉम एमएस ऑफ़िस सूट 2010 के तहत उपलब्ध ऑफ़िस लाइव वेब एप्स की तरह ही है, मगर इसे बेहद लोकप्रिय सामाजिक नेटवर्क साइट फ़ेसबुक से जोड़ने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। वस्तुतः आपको डॉक्स.कॉम का प्रयोग करने के लिए माइक्रोसॉफ़्ट लाइव आईडी खाते से नहीं बल्कि फ़ेसबुक खाते से ही लॉगइन करना होता है। प्रथम पंक्ति के व्यावसायिक सॉफ़्टवेयर निर्माताओं के ये कदम चौंकाने वाले हैं कि वे अपने उत्पादों के मुफ़्त संस्करण जारी कर रहे हैं और उसका प्रचार प्रसार करने के लिए फ़ेसबुक जैसे लोकप्रिय प्लेटफ़ॉर्मों के कंधे पर सवार हो रहे हैं। हालांकि इन आनलाइन अनुप्रयोगों में तमाम सुविधाओं का होना लगभग नामुमकिन ही होता है ओर एक तरह से यह ग्राहक को असली उत्पाद बेचने की परोक्ष विपणन नीति का ही नतीजा होते हैं।</p>
<h2>डॉक्स.कॉम में आप क्या कर सकते हैं?</h2>
<p>फ़ेसबुक खाते से लॉगिन (जी हाँ यदि आपके पास फ़ेसबुक खाता नहीं है तो आप डॉक्स.कॉम का प्रयोग नहीं कर सकते) करने के बाद डॉक्स.कॉम को ऑनलाइन माइक्रोसॉफ़्ट ऑफिस की तरह प्रयोग कर सकते हैं। आप नए दस्तावेज़ बना सकते हैं, अपने कंप्यूटर से दस्तावेज़ों (वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट, पीडीएफ़ इत्यादि) अपलोड कर सकते हैं और साथ ही अपने फ़ेसबुक मित्रों द्वारा साझा किये दस्तावेज़ देख सकते हैं,  ओर यदि अनुमति रही तो उनमें संपादन इत्यादि भी कर सकते हैं।</p>
<p>वस्तुतः डॉक्स.कॉम पर काम करना बेहद आसान है। यदि आपने ऑफ़िस 2007 या 2010 पर काम किया हुआ है तो डॉक्स.कॉम का कलेवर भी बहुत कुछ उसी तरह का रिबन इंटरफ़ेस युक्त है। हालांकि ऑनलाइन प्रयोग के लिहाज से सिर्फ बेहद उपयोगी मेन्यू को ही रखा गया है, अन्य मेन्यू विकल्पों को हटा दिया गया है। मेन्यू में क्लिक करने पर कुछ फ़ीचर्स पॉप-अप के रूप में प्रकट होते हैं जो कि बहुत से नए ब्राउज़रों में पॉप-अप ब्लॉकर द्वारा रोके गए होते हैं, ऐसे में डॉक्स.कॉम को प्रयोग करने में परेशानी हो सकती है।</p>
<p>इसी प्रकार, चूंकि डॉक्स.कॉम को ऑनलाइन प्रयोग के लिए डिजाइन किया गया है इसीलिए आपको अपने दस्तावेज़ों में पृष्ठ हाशिए, क्रमांकन इत्यादि की सेटिंग के लिए भी सुविधाएँ नहीं मिलेंगी जो कि प्रिंट माध्यम में आवश्यक होती हैं। कुछ ऐसा ही हाल पॉवर प्वाइंट का है जहाँ आप किस भी तरह की मौजूदा फाईल तो अपलोड कर देख सकते हैं पर उन्हें संपादित करते समय चित्र जोड़ना या रिसाईज़ करना मुमकिन नहीं, हालांकि स्लाईडों के क्रम बदलने जैसे साधारण काम संभव हैं।</p>
<div id="boxR">
<h2>कौन बेहतर, डॉक्स.कॉम या गूगल डॉक्स?</h2>
<p>डॉक्स.कॉम को एक परिपूर्ण ऑनलाइन ऑफ़िस सूट की तरह डिजाइन नहीं किया गया है, जैसा कि गूगल डॉक्स है। इसीलिए दोनों में तुलना करना दरअसल बेमानी होगी, क्योंकि सुविधा और संपन्नता में गूगल डॉक्स कहीं आगे है। डॉक्स.कॉम को सामाजिक नेटवर्क साइटों में सामान्य किस्म के दस्तावेज़ों के साझा करने के लिहाज से बनाया गया है। इसलिए यदि आप कोई दस्तावेज़ डॉक्स.कॉम में बनाते हैं तो वह तत्काल ही आपके मित्रों को उपलब्ध हो जाता है। आपक मित्रों की सूची तथा दस्तावेज़ में देखने/बदलने/संपादन इत्यादि को भी सेट कर सकते हैं। डॉक्स.कॉम अभी बीटा स्तर पर है इसलिए अभी इसमें बहुत सारे बग भी हैं और बहुत सी सुविधाएँ ढंग से काम ही नहीं करतीं। पर हाँ रूप रंग के मामले में डॉक्स.कॉम शायद बाज़ी मार ले जाये।</p></div>
<p>डॉक्स.कॉम पर कुछ और हल्के फुल्के जुगाड़ भी हैं जो शायद हर तरह के प्रयोक्ताओं के लिये कुछ न कुछ बनाने की नीति से रखे गये हैं। मसलन फेसबुक पर दी जानकारी के आधार पर रेज्यूमे बना सकने, या फेसबुक के चित्रों से फोटो शो या उनकी जानकारी के आधार पर फ्रेंड चार्ट (दरअसल यह दोस्तों की उम्र, लिंग, गृहनगर आदि जानकारी के आधार पर बने एक्सेल ग्राफ भर होते हैं) बना सकने के जुगाड़।</p>
<h2>डॉक्स.कॉम पर भारतीय भाषाओं का प्रयोग</h2>
<p>डॉक्स.कॉम में भारतीय भाषाओं का बढ़िया समर्थन है। हिंदी में काम करने में कोई विशिष्ट समस्या नजर नहीं आई। इसके वर्तनी जाँचक मेन्यू में चुनिंदा भारतीय भाषाओं जैसे कि हिंदी, गुजराती, मलयालम, तमिल इत्यादि में वर्तनी जाँच की सुविधा भी उपलब्ध है, हालांकि हिंदी वर्तनी जाँच में अभी दिक्कतें हैं, यह अभी काफी बगी है &#8211; यानी हिंदी वर्तनी जाँच को अभी डॉक्स.कॉम सही तरीके से अंजाम नहीं दे पाता। डॉक्स.कॉम को भारतीय भाषाओं के लिहाज से परिष्कृत करने की आवश्यकता है, क्योंकि किसी खास भाषा के लिहाज से कोई भी ऑफ़िस सूट एक बढ़िया और उन्नत किस्म के वर्तनी जाँचक के बगैर सदैव बेकार और अनुपयोगी ही बनी रहेगा।</p>
<p>कुल मिलाकर <a href="http://docs.com/">डॉक्स.कॉम</a> काम का प्रकल्प है। यदि आप पहले से ही फ़ेसबुक खाताधारी हैं, तो छोटे-मोटे दस्तावेज़ बनाने (जैसे कि कोई छोटी सी कुकिंग रेसिपि, किसी इवेंट की तैयारी व हिसाब किताब के लिये बनी एक्सेल स्प्रेडशीट या किसी सभा में आपकी प्रस्तुति के स्लाइड) व उसे मित्रों में तुरत-फुरत साझा करने के लिए डॉक्स.कॉम का प्रयोग कर सकते हैं। यदि आपके फ़ेसबुक खाताधारी नहीं हैं, या आपको व्यावसायिक स्तर की या एमएस आफिस के डेस्कटॉप अनुप्रयोग जैसी सुविधाएँ व दस्तावेज़ चाहिये, तो डॉक्स.कॉम में आपके लिए वैसे भी कुछ नहीं है। ऐसे में ऑनलाइन ऑफ़िस सूट के लिए आपके पास अन्य उत्तम विकल्प हैं &#8211; <a href="http://docs.google.com">गूगल डॉक्स</a> या <a href="http://www.zoho.com">जोहो</a>।</p>
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		<item>
		<title>हात्सूने मिकु: जापान की अनोखी रॉक स्टार</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/samayiki/~3/s_R5cwEStgU/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2010/11/hatsune-miku-vocaloid/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 20 Nov 2010 23:19:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रौद्योगिकी]]></category>
		<category><![CDATA[Anime]]></category>
		<category><![CDATA[Haksune Miku]]></category>
		<category><![CDATA[Japan]]></category>
		<category><![CDATA[Vocaloid]]></category>
		<category><![CDATA[Yamaha]]></category>

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		<description><![CDATA[सिर्फ सोलह बरस की उम्र में जापान की सबसे मशहूर रॉक गायिका बन चुकी हत्सूने मिकु अगर चाहे तो ताजिंगदी 16 बरस की बने रह सकती है। लिंडसे लोहान की तरह उसके किसी ड्रग स्कैंडल नुमा पचड़ों में पड़ने की संभावनायें भी शून्य हैं। ]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">पू</div>
<p>त के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। मोट्जार्ट ने 5 साल की उम्र में अपना पहला संगीत कार्यक्रम पेश किया था, माईकल जैक्सन भी लगभग इसी उम्र से मंच पर गाने लगे थे। <img class="alignright" style="margin: 15px; border: none 0px;" title="Hatsune Miku" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/hatsune_miku.jpg" alt="Hatsune Miku" width="250" height="375" />होनहार बच्चों के लिये तो यह वाकई बच्चों का ही खेल होता है। दीगर बात है कि मशहूर बन कर ज़िदगी जीना शायद उतना आसान नहीं होता।</p>
<p>जापानी गायिका हात्सूने मिकु भी कमउम्र है। सिर्फ सोलह बरस की उम्र में ही वह जापान की सबसे मशहूर रॉक स्टार बन चुकी है। और अगर वो चाहे तो ताजिंगदी 16 बरस की बने रह रातों रात अर्जित अपनी लोकप्रियता को कायम भी रख सकती है। तिस पर लिंडसे लोहान जैसी लोकप्रिय सितारों की तरह उसके किसी ड्रग स्कैंडल नुमा पचड़ों में पड़ने की संभावनायें भी शून्य हैं। चौंकिये मत, यह संभव है। क्योंकि मिकु कोई जीती जागती लड़की नहीं वरन एक फंतासी किरदार है,  परंतु उसकी न केवल आवाज जापानियों को लुभा रही है वरन् उसकी त्रिआयामी छवि यानि होलोग्राम <em>लाइव </em>कार्यक्रमों में शामिल हो लोगों की धड़कनें तेज करने में कामयाब हो चुकी है।</p>
<p>नीले बालों की चोटियाँ लगाये चटकीली व मासूम आँखें वाली गुड़िया जैसी यह लड़की जापानी <em>आनिमे</em> (Anime) के किसी चरित्र जैसी लगती है। मई 2010 में EXIT TUNES Presents Vocalogenesis नामक एक अल्बम, जिसमें उसके गाये गाने शुमार हैं, <em>बिलबोर्ड </em>पर अव्वल नंबर पाने वाला पहला वोकलायड अल्बम होने का गौरव प्राप्त कर चुका है। और अब तो उसके विश्व भर में जीवंत प्रदर्शन ओर अंग्रेजी गीत गाने की बातें भी चल रही हैं। मिकु का मूल जापानी नाम तीन शब्दों से बना है, &#8220;मिकु&#8221; माने भविष्य, &#8220;हात्सु&#8221; मतलब प्रथम और &#8220;ने&#8221; अर्थात आवाज़।</p>
<p>मिकु मूलतः एक गा सकने वाला सिंदसाइज़र अनुप्रयोग है, इसके पीछे मोटरसाईकल व संगीत वाद्ययंत्र आदि बनाने वाली जापानी कंपनी <strong>यामाहा </strong>की <a href="http://www.vocaloid.com" target="_blank">वोकलायड</a> तकनलाजी का हाथ है। मिकु के पात्र की रचना एक अन्य जापानी कंपनी <a href="http://www.crypton.co.jp" target="_blank">क्रिप्टॉन फ्यूचर मिडिया </a>ने 2007 में की, उसकी आवाज़ एक अभिनेत्री साकी फुजिता के <em>वॉंयस सैंपल</em> पर आधारित है इस तरह मिकु दरअसल एक <em>सॉफ्टवेयर </em>ही है जिसमें बोल ओर तर्ज़ भर देने पर गीत खुद ही तैयार हो जाता है। गीत सुनकर कहना मुश्किल हो जाता है कि यह वाकई किसी कलाकार ने रिकार्ड नहीं किया।</p>
<p><center><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="560" height="340" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/-JZO8J2moWA?fs=1&amp;hl=en_US&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="560" height="340" src="http://www.youtube.com/v/-JZO8J2moWA?fs=1&amp;hl=en_US&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></center></p>
<p>मिकु हत्सुने की हालिया लोकप्रियता का कारण इंटरनेट पर जारी उसके कुछ विडियो हैं (ऊपर देखें) जिनमें उसके एक त्रिआयामी होलोग्राम को हज़ारों दर्शकों के समक्ष मंच पर बाकायदा नाचते हुये संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत करते दिखाया गया है। लोग उसके नाच गाने पर यूं फिदा हो रहे हैं मानो वह कोई जीवंत पॉप स्टार हो। भले ही मिकु की आवाज़ उधार की हो और रूप रंग किसी कलाकार की कल्पना का नतीजा, उसका <em>वर्चुअल </em>किरदार का जादू लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है। लिहाज़ा उसका अपना <a title="Hatsune Miku's Facebook Page" href="http://www.facebook.com/pages/Hatsune-Miku/10150149727825637" target="_blank">फेसबुक पृष्ठ</a> भी है और <a title="A Hatsune Miku Fan Website" href="http://www.mikufan.com" target="_blank">फैन साईट</a> भी।</p>
<div id="boxL">
<h2>क्या होते हैं होलोग्राम?</h2>
<p>दूर क्या जाना होलोग्राम तो आपके बटुये में ही हैं साहब। अपने क्रेडिट कार्ड या वोटर परिचय पत्र पर नज़र डालें। विभिन्न उत्पादों पर भी असली नकली का भेद बताने में ये हमारी मदद करते हैं। हालांकि इनको हिलाने डुलाने से आप अलग तरह की चमकदार तस्वीर देख पाते हैं पर से सिर्फ इन चित्रों की तरह इतने सरल नहीं होते। होलोग्राम को यदि वृहद स्तर पर लेज़र या अन्य प्रकाश स्रोतो के साथ प्रस्तुत किया जाय तो ये हमें चमत्कृत कर सकते हैं। अगर होलोग्राफिक तस्वीर के टुकड़े कर दिये जायें तो हर हिस्सा मूल चित्र का पूर्ण रूप दिखा सकता है। मिकु की तरह इनसे त्रिआयामी तस्वीर भी पेश की जा सकती है जिसे देखने के लिये किसी थ्रीडी चश्मे की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। इस तकनीक को <em>डायनमिक होलोग्राफी</em> कहा जाता है।</p>
<p>होलोग्राफी का आविष्कार 1947 में हंगरी कै डेनिस गेबर ने किया था। इसके लिये उन्हें 1971 में भौतिकी के नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।</p>
</div>
<h2>आभासी चरित्र की आभासी लोकप्रियता?</h2>
<p>इंटरनेट के मौजूदा स्वरूप में जहाँ किसी चीज के वाइरल होने पर सोचना पड़ता है कि यह वाकई कोई हक़ीकी वस्तु है या विपणन का हथकंडा, वहाँ यह शक करना गैर वाजिब न होगा कि हात्सुने की कथित लोकप्रियता भी गप्प मात्र हो। क्या मिकु साधारण लोगों के बीच भी लोकप्रिय है? इस बात की पुष्टि के लिये हमने जापान निवासी हमारे नियमित पाठक और <a href="http://jaapaanii.exblog.jp/" target="_blank">पुराने चिट्ठाकार</a> मत्सु से संपर्क किया। मत्सु ने स्पष्ट किया कि मिकु की लोकप्रियता मूलतः इंटरनेट पर मंडराने वाले कंप्यूटर प्रोग्रामर, आनिमे कार्टून के प्रशंसक और युवा इंटरनेट प्रयोक्ताओं तक ही सीमित प्रतीत होती है। इक्का दुक्का <a href="http://www.asahi.com/english/TKY201007180307.html" target="_blank">आनलाइन अखबारों में ज़िक्र</a> के अलावा स्थानीय मुख्यधारा के मीडिया में इसका खास उल्लेख नहीं है, मिकु कमोबेश इंटरनेटिय उप संस्कृति का ही हिस्सा है।</p>
<p>मत्सु के अनुसार आभासी चरित्रों से जापानियों का लगाव कोई नई बात नहीं है, फर्क सिर्फ इतना है कि मिकु के मामले में चरित्र, वोकलायड आवाज़ वगैरह का सृजन किसी आनिमे अथवा कार्टून परियोजना के लिये नहीं वरन एक खास साफ्टवेयर के लिये किया गया।</p>
<p>जैसा कि आपने पहले पढ़ा हात्सूने मिकु एक वोकलायड है, मशीन द्वारा बनाई आवाज़, हालांकि इसकी लोकप्रियता के पीछे अन्य लोगों के इस साफ्टवेयर पर आधारित गीत बनाने की वजह से भी है, जापानियों के तकनीक प्रेम के कारण भी और यूट्यूब जैसी जापानी साईट <a href="http://www.nicovideo.jp/" target="_blank">निको निको दोगा</a> भी जिसने इन विडियो को विशाल श्रोतावर्ग तक पहुँचाया। फिर भी असली ओर नकली के फर्क का सवाल शुद्धतावादी तो उठायेंगे ही। जापान में ही अनेक नामचीन गायक गायिकाओं ने यामाहा को अपनी अवाज़ के सैंपल देने से इंकार कर दिया, आखिरकार खुद का <em>क्लोन </em>बनाकर अपनी आजीविका से कौन हाथ धोना चाहेगा।</p>
<p>इन बहसों के बीच मिकु और उस जैसी अन्य वोकलायड का संगीत अपना कमाल दिखाये जा रहा है। बहरहाल नकली आवाज़ों ओर व्यक्तित्वों से जापानियों का यह लगाव कब तक टिकता है ओर क्या नये आकार लेता है यह तो समय ही बतायेगा।
<p class="note">जानकारी विकीपीडिया व इंटरनेट से, मिकु का चित्र साभारः क्रिप्टॉन फ्यूचर मिडिया, अतिरिक्त जानकारी व लेख में संशोधन के सुझावों के लिये शुक्रिया <a href="http://jaapaanii.exblog.jp/" target="_blank">मत्सु</a>! </p>
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		<title>दो नाईजीरिया</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2010/11/two-nigerias/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 10 Nov 2010 11:07:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Nigeria]]></category>

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		<description><![CDATA[ईमेल स्कैम द्वारा दुनिया भर को उल्लू बनाने वाले देश में संक्षिप्त प्रवास के बाद डॉ सुनील दीपक को वहाँ के लोग तो शालीन लगे, लेकिन जेहन में भ्रष्टाचार और तानाशाही झेलते देश की खराब तस्वीर और भी पुख्ता हो गयी। ]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/nigeria_abuja_1.jpg" alt="" width="615" height="377" /></p>
<div class="dropCap">जे</div>
<p>नेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन में काम करने वाले एक मित्र ने नाईजीरिया में होने वाले एक सम्मेलन में आने का न्योता दिया तो मैंने तुरंत बहाना बना दिया कि उस दौरान मुझे एक अन्य काम है, अतः नहीं आ सकूँगा। असल में मुझे नाईजीरिया जाने से डर लग रहा था।</p>
<p>मेरे मन में नाईजीरिया की दो छवियाँ थीं, आज से नहीं बहुत सालों से। पहली छवि थी नाईजीरिया के विश्व में भ्रष्टाचार की राजधानी होने की। उसका कठोर और संगीन तानाशाही शासन शेल जैसी पेट्रोल बेचने वाली बहुदेशीय कम्पनियों के साथ मिल कर देश के गरीब वर्ग पर ज़ुल्म ढा रहा था, विभिन्न जन जातियों के मानव अधिकारों का दमन कर रहा था। जब 1996 में वहाँ की सरकार ने लेखक और विचारक श्री केन सारा वीवो को फ़ाँसी की सजा दे दी तो मेरे मन में उस तानाशाह शासन के प्रति बनी राय में और भी कड़वाहट फैल गयी।</p>
<p>पिछले दो दशकों में नाईजीरिया के उत्तरी भाग में रूढ़िवादी इस्लाम की जकड़ भी गहरी हो गयी है। शरीयत का कानून और &#8220;गैर पुरुष से सम्बंध&#8221; जैसे आरोप लगा कर औरतों को पत्थरों से मारने की कुछ घटनाओं के समाचारों से भी लगता था कि नाईजीरिया तो पिछड़ा हुआ रूढ़ीवादी देश बन गया है। तिस पर पिछले कुछ सालों से पहली से ही बिगड़ी इस छवि में एक नयी बात जुड़ी कि नाईजीरिया तो ईमेल के द्वारा दुनिया भर के लोगों को उल्लू बनाने का देश है। वहाँ के हेक्कर दुनिया भर के लोगों की ईमेल के पासवर्ड चुरा कर, उनके सब मित्रों और घर वालों को पैसा भेजने के संदेश भेज कर, यह पैसा हथिया लेते हैं और उनके विरुद्ध कोई कुछ नहीं कर पाता क्योंकि उन्हें अपनी सरकार का संरक्षण प्राप्त है।</p>
<p>केन सारो वीवा और छिम्मामँदा जैसे नाईजीरियाई लेखक मुझे बहुत अच्छे लगते थे। मुझे वहाँ के कलाकारों, संगीतकारों के बारे में कुछ जानकारी थी। नाईजीरिया की कई हज़ार वर्षों प्राचीन योरूबा संस्कृति का असर तो मैंने स्वयं ब्राज़ील, क्यूबा और कुछ अन्य दक्षिणी और मध्य अमरीकी देशों में देखा था, जहाँ नाईजीरिया से आने वाले गुलाम अपने साथ इस संस्कृति को भी ले कर आये थे। इसलिए नाईजीरिया की दूसरी छवि भी थी मन में, प्राचीन संस्कृति और सभ्यता वाले देश की।</p>
<p>खैर, मेरे मित्र ने मेरी एक न सुनी और अंततः में मुझे नाईजीरिया जाने के लिए हाँ कहना ही पड़ा।</p>
<p>***</p>
<p>हवाई जहाज जब अबूजा के हवाई अड्डे पर उतरने लगा तो आसपास की हरियाली और पहाड़ देख कर बहुत अच्छा लगा। कहते हैं कि नाईजीरिया अफ्रीका के सबसे ताकतवर और समृद्ध देशों में से है हालांकि उनका हवाई अड्डा इस दृष्टि से कुछ छोटा सा लगा, पर फ़िर भी सब कुछ नया और साफ़ सुथरा था।</p>
<p>पासपोर्ट की जाँच का समय आया तो वहाँ बैठी युवती ने बहुत प्रश्न पूछे कि क्यों आये हैं, किस सभा के सिलसिले में, सभा कहाँ होगी, क्या विषय है, इत्यादि। मुझे लगा कि पाँच दिन के लिए तो आया हूँ, वापस जाने का टिकट भी है, इतनी कठिनाई से इनके दूतावास ने वीज़ा दिया था, फ़िर भी इतने प्रश्न, क्यों? शायद इन्हें चिंता है कि यूरोप से लोग यहाँ आ कर बसना न शुरु कर दें।</p>
<p>रोम में नाईजीरिया के दूतावास से वीज़ा लेना सचमुच कठिन था। पहले तो इंटरनेट के माध्यम से एक फ़ार्म भरा। फ़िर एक दूसरा फ़ार्म भर कर तमाम कागजात, जैसे कि नाईजीरिया के सभा आयोजक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के निमंत्रण पत्र, अपने दफ्तर के प्रमाणपत्र आदि, जोड़ कर सब कुछ एक माह पहले दूतावास भेजना पड़ा था। इतना झंझट तो अमरीका जाने के लिए भी नहीं करना पड़ता। दूतावास वालों ने कहा था कि अगर आवश्यकता होगी तो वे मुझे रोम में साक्षात्कार के लिए भी बुला सकते हैं, लेकिन बाद में बिना साक्षात्कार के ही वीसा जारी कर दिया गया।</p>
<p>बहरहाल, पासपोर्ट की जाँच से निकला तो कस्टम वालों ने पकड़ लिया। सामान तो मेरा थोड़ा सा ही था, पर उन्होंने भी खूब प्रश्न पूछे कि यहाँ किस लिए आये हो, किस तरह की सभा है, कितने दिन और कहाँ रुकोगे, आदि। नाईजीरिया पहुँच कर इन शुरुवाती अनुभवों से मन में तानाशाह, भ्रष्ट पुलिस के हाथों में दबे इस देश की बनी छवि और भी दृढ़ हो गयी।</p>
<p>पर असली आश्चर्य तो हवाई अड्डे से निकलने के बाद हुआ। हाथ में नाम की तख्ती लिये आगंतुकों की प्रतीक्षा करते मित्र, परिवार वाले या सहकर्मी तो बहुत थे, लेकिन उनमें से किसी भी तख्ती पर मेरा नाम नहीं था। जिसे मुझे रिसीव करना था, वह नदारद था। कोई बात नहीं, मैंने सोचा, टेक्सी ले लूँगा। लेकिन जैसे आम हवाई अड्डों पर टेक्सी वाले आने वाले यात्रियों के आगे पीछे भागते हैं, वैसा यहाँ कुछ नहीं था। मैंने पूछा तो किसी ने बताया की टेक्सी स्टैंड तो दूसरी ओर था। वहाँ पहुँचा तो वहाँ पर कोई टेक्सी यात्रियों की प्रतीक्षा नहीं कर रही थी। कुछ देर खड़ा रहा, तब जाकर एक टेक्सी वाला आया। संभवतः अबूजा में पर्यटक या बिना जानपहचान वाले लोग बहुत कम आते हैं, इसलिए टेक्सी वाले हवाई अड्डे पर यात्रियों का इंतज़ार करने में अपना समय बरबाद नहीं करते!</p>
<p>टेक्सी चालक बड़ा ही शालीन और सभ्य था। अबूजा का हवाई अड्डा शहर के करीब चालीस किलोमीटर बाहर है। मुझसे लोगों ने कहा था कि शहर जाने का किराया करीब चार हज़ार नेइरा यानि 25 डालर के करीब पड़ेगा। होटल पहुँचने पर उसने पाँच हज़ार नेइरा माँगे, लेकिन मैंने कहा कि नहीं चार हज़ार होना चाहिये तो वह तुरंत बिना बहस किये मान गया। उसके बाद जितने दिन अबूजा में रहा, टेक्सी वालों से कभी चिकचिक नहीं करनी पड़ी, बल्कि हर बार शालीनता से बात करने वाले लोग ही मिले। सड़क पर ही कभी किसी से कुछ पूछा तो लोगों ने बड़ी सभ्यता के साथ समझाया और बताया।</p>
<p>***</p>
<p>अबूजा की पुलिस से मेरा सामना तीसरे दिन हुआ। चुंकि सुबह मीटिंग प्रारम्भ होने में विलम्ब था तो सोचा कि क्यों न करीब के कैथेड्रल और अबूजा की सुनहरे गुम्बज वाली सबसे प्रमुख मस्जिद को देख आया जाये। पहले दो दिनों में शहर में इधर उधर टेक्सी से यात्रा करते हुए कुछ तस्वीरें खीची थीं, लेकिन मन था कि सैर करते हुए कैथेड्रल और मस्जिद के आसपास की खूब सारी तस्वीरें ली जायें। अबूजा शहर नया ही बना है, करीब बीस साल पहले। इससे पहले नाईजीरिया की राजधानी लागोस थी। नया शहर होने के नाते वहाँ बहुत से फ्लाई ओवर, खुली चौड़ी सड़कें, नये मकान आदि बने हैं। ये देखने में सुंदर तो हैं पर इनमें देश की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का कोई अक्स नहीं दिखता। तस्वीरें खींचने के लिए शहर में कैथेड्रल, मस्जिद या स्टेडियम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/nigeria_abuja_2.jpg" alt="" width="615" height="409" /></p>
<p>कैमरा ले कर निकला तो कुछ इक्का दुक्का तस्वीरें खींचता कैथेड्रल तक जा पहुँचा। कहाँ से तस्वीर खींची जाये यह सोच ही रहा कि गुस्से में बड़बड़ाता हुआ एक आदमी मेरे पास आया। &#8220;आप के पास तस्वीरें खीचने की अनुमति है क्या? कैसे तस्वीर खींच रहे हैं आप? शर्म नहीं आती आप को? अगर हम लोग आप के देश में जा कर ऐसे तस्वीरें खीचने लगे तो आप को कैसा लगेगा?&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">विश्वास ही नहीं हुआ कि तस्वीर खींचना भी गैर कानूनी हो सकता है। किसी हवाई अड्डे या मिलेट्री की जगह की तस्वीर खींच रहा होता तो कुछ शंका मन में होती पर शहर के कैथेड्रल की तस्वीर नहीं खींच सकते?</div>
<p>पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि तस्वीर खींचना भी गैर कानूनी हो सकता है। किसी हवाई अड्डे या मिलेट्री की जगह की तस्वीर खींच रहा होता तो कुछ शंका मन में होती पर शहर के कैथेड्रल की तस्वीर नहीं खींच सकते, इसका मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैंने हँस कर कहा कि भाई पर्यटक हूँ, तुम्हारे शहर की संदर जगहों की तस्वीरें खींच रहा हूँ, इसमें क्या गलती है? मेरे उत्तर पर वह भड़क कर आग बबूला हो गया। &#8220;अभी पुलिस को बुलाता हूँ, कुछ दिन लाकअप में बिताओगे तो अक्ल ठिकाने आ जायेगी&#8221;, उसने मुझे धमकाया। कुछ लोग जो आसपास खड़े थे, सब खिसक लिये, बस मैं अकेला ही उसके साथ खड़ा रह गया। पहले तो कुछ देर तो वह बहुत बोलता रहा, मुझे डाँटता रहा, शायद इंतज़ार कर रहा था कि मैं क्षमा माँगने के लिए या पुलिस लाकअप से बचने के लिए कुछ घूस दूँगा, लेकिन उसने पैसे लेने देने की कोई बात स्पष्ट नहीं कही। मुझे भी चिंता होने लगी कि सचमुच जेल में न जाना पड़े।</p>
<p>&#8220;भाई मुझे क्या मालूम था कि यहाँ इस तरह का कानून है&#8221;, मैंने विनम्र हो कर कहा।</p>
<p>&#8220;देश के कानून न जानने से अपराध कम नहीं होता&#8221;, वह बोला।</p>
<p>तब मैंने जान पहचान वाला पत्ता चलाया, इशारा कर के कहा कि &#8220;वह जो अंतर्राष्ट्रीय कोनफ्रैंस सेंटर है, वहाँ तुम्हारी सरकार के निमंत्रण पर आया हूँ, थोड़ी देर में ही मुझे तुम्हारे राष्ट्रपति की पत्नी के सामने भाषण देना है। अगर इस तरह से जेल में बंद कर दोगे तो वहाँ मेरे भाषण का क्या होगा?&#8221; वह कुछ देर तक मुझे घूरता रहा, फ़िर बोला, &#8220;कितनी तस्वीरें खींची हैं? फ़िल्म निकाल कर उन्हें कैंसल कर दो?&#8221;</p>
<p>&#8220;यह फ़िल्म वाला कैमरा नहीं, डिजिटल कैमरा है और तस्वीर भी एक ही खींची है, कहो तो उसे हटा दूँगा&#8221;, मैंने नम्रता से कहा। &#8220;ठीक है, इस बार तो जाने देता हूँ, तुरंत वापस अपनी मीटिंग में चले जाओ, दोबारा इस तरफ़ नहीं आना&#8221;, उसने मुझे धमका कर कहा। मेरी जान में जान आयी, चुपचाप बिना कोई अन्य तस्वीर खींचे मैं वापस सम्मेलन में लौट आया और दोबारा उस शहर में कैमरा ले कर नहीं निकला।</p>
<p>सम्मेलन में राष्ट्रपति की पत्नी के आने की तैयारी चल रही थी, हर तरफ़ पुलिस थी। सोचा कि बजाय कोई अन्य परेशानी मोल लेने से पहले से पूछ लेना ठीक रहेगा कि राष्ट्रपति की पत्नी की तस्वीर खींच सकते हैं या नहीं। मेरे प्रश्न पर सुरक्षा पुलिसवाला हँस कर बोला, &#8220;क्यों नहीं सर, आप जितनी चाहें तस्वीरें खींच सकते हैं। क्या आप ने हमारा सुंदर शहर देखा? सारा दिन यहाँ होटल में बन्द न रहिये, बाहर जा कर हमारे हसीं शहर को भी देखिये।&#8221; मन में तो आया पूछूँ कि क्या उनके सुंदर शहर में तस्वीरें भी खींच सकते हैं, पर कुछ बोलना मुनासिब न लगा, बस मुस्कुरा कर हामी भर दी।</p>
<p>***</p>
<p>मीटिंग में स्त्री सशक्तिकरण मंत्रालय से मंत्री सुश्री इयोम जोसेफीन भी पधारी थीं। उनका सुंदर सौम्य व्यक्तित्व, और दूसरों की बात को ध्यान से सुन कर सोच समझ कर नपा तुला बोलने का अन्दाज़ बहुत अच्छा लगा।</p>
<p>उनके अतिरिक्त अन्य अनेक संसद सदस्यों और सेना के अधिकारियों की बीवीयाँ, आदि भी मौजूद थीं लेकिन घंटों इंतज़ार के बाद भी राष्ट्रपति की पत्नी नहीं आयीं। अंत में उस सभा का उदघाटन संसद के अध्यक्ष की पत्नि के किया, जिन्होंने अपने भाषण में कहा कि राष्ट्रपति की पत्नि श्रीमति पेशेंस गुडलक जोनाथन सुबह से हमारी सभा में आने के लिए तैयार बैठी थीं लेकिन उन्हें काउंसिल की तरफ़ से बाहर निकलने की अनुमति नहीं मिली। सुन कर बड़ा अचरज हुआ कि राष्ट्रपति की पत्नि को घर से बाहर किसी सभा में जाने के लिए किसी काउंसिल की अनुमति की दरकार होती है। पता नहीं कि अनुमति उन्हें काउंसिल से नहीं मिली थी या अपने पति से!</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/nigeria_abuja_3.jpg" alt="" width="615" height="358" /></p>
<p>सब औरतों को उनकी रंग बिरंगी पोशाकों में देख कर लगा रहा था मानो किसी स्त्री क्लब की किटी पार्टी में आ गये हों। लेकिन सम्मेलन में नाईजीरिया के विभिन्न भागों से आये डाक्टरों, विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों आदि से भी मिलने का मौका मिला। अफ्रीका के विकास के बारे में अपनी दृष्टि बना रहे ये लोग, जिनके अपने मौलिक विचार हैं, शोध है, बहुत दिलचस्प लगे।</p>
<p>जिस शाम वापस जाना था, उसी शाम को मंत्री के साथ विशेष भोज का आयोजन किया गया था। उन्हें जब मालूम चला कि हमें हवाई अड्डा जाना है तो उन्होंने ज़ोर दिया कि हम उनकी मंत्री वाली गाड़ी में ही जायें। आगे पीछे सायरन बजाती, चमचमाती बत्तियों वाली गाड़ी से निकले तो बहुत अज़ीब लगा। मेरे लिए इस तरह की गाड़ी में बैठने का यह पहला अनुभव था, मन में लगा कि खामख्वाह तमाशा किया जा रहा है। पर शहर से बाहर निकलते ही खुली चौड़ी सड़क पर जब कारों का जमावड़ा देखा तो मंत्री की गाड़ी में बैठे होने का फायदा समझ में आया। सड़क के दोनों ओर अनगिनत पटरीवाली दुकानें, खोमचे वाले, आदि अटे पड़े थे, और कारें इसी चक्कर में ट्रैफिक रोके खड़ी थीं। खैर सायरनों के बजने से हमें निकलने का रास्ता मिल ही गया। हवाई अड्डे पहुंचते पहुंचते रास्ते में इस तरह की बहुत रुकावटें आयीं, पर आखिरकार ठीक समय पर वहाँ पहुँच ही गये। अगर मंत्री जी की गाड़ी नहीं होती तो वहाँ समय पर पहुँचना नामुमकिन था।</p>
<p>यह एक छोटा सा अनुभव था नाईजीरिया के एक शहर का। शायद राजधानी से बाहर का जीवन, गाँवों में रहने वाले आम नाईजीरियन का जीवन, अधिक अच्छा होता हो। इस छोटी सी यात्रा में वहाँ के शालीन, सभ्य लोग अच्छे लगे, लेकिन भ्रष्टाचार और तानाशाही झेलते देश की तस्वीर जेहन में थी, वह और भी पुख्ता हो गयी। सच कहूं तो कभी नाईजीरिया लौट कर जाने का मौका मिले भी तो भी नहीं जाना चाहूँगा। मेरे विचार में उनके साहित्य और कला को दूर से जानना और सराहना ही बेहतर होगा।
<p class="note">सभी चित्रः डॉ सुनील दीपक</p>
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		<item>
		<title>कश्मीर बहुत छोटा है आज़ादी के लिए</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2010/09/kashmir-too-small-to-be-independent/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 21 Sep 2010 20:21:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Kashmir]]></category>

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		<description><![CDATA[कश्मीरी मुसलमानों के हित में यही है कि वे यथापूर्व स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करें क्योंकि टालमटोल वाली राजनीतिक नीति के रहते यह नामुमकिन है कि "आर या पार" जैसा कोई रवैया भारत सरकार अख्तियार करे।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">क</div>
<p>श्मीर की भौगोलिक स्थिति के विषय में बड़े बड़े लोग, बड़े बड़े अखबार ग़लत लिख जाते हैं। कुछ उदाहरण</p>
<blockquote><p><em><a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/08/100811_leh_update_psa.shtml" target="_new">बीबीसी साइट पर समाचार</a> :</em> भारत प्रशासित कश्मीर में अधिकारियों का कहना है कि लेह में अचानक आई बाढ़ के बाद मरने वालों की संख्या बढ़कर 185 हो गई है.</p></blockquote>
<p><em>त्रुटि :</em> लेह कश्मीर में नहीं है। कश्मीर में तो बाढ़ आई ही नहीं।</p>
<blockquote><p><em>वैष्णो-देवी से लौटे एक श्रद्धालु :</em> मैं अभी कश्मीर होकर आया हूँ। हालात ठीक हैं वहाँ।</p></blockquote>
<p><em>त्रुटि :</em> वैष्णो-देवी जम्मू में है भाई, कश्मीर में नहीं। जम्मू में थोड़े ही जिहाद छिड़ा हुआ है।</p>
<blockquote><p><em><a href="http://www.livehindustan.com/news/1/1/1-1-8471.html" target="_new">दैनिक हिन्दुस्तान की साइट पर समाचार</a> :</em> कश्मीर के द्रास में तापमान शून्य से 14 डिग्री नीचे।</p></blockquote>
<p><em>त्रुटि :</em> द्रास करगिल में है, कश्मीर से सैंकडों मील दूर।</p>
<p>कश्मीरियों की यह आम शिकायत रहती है कि शेष भारत वाले कश्मीर और कश्मीरियों को सही से समझते नहीं। किसी हद तक यह सही भी है। कश्मीर के विषय में कई मिथकों में से एक मिथक यह तोड़ने की आवश्यकता है कि कश्मीर भारत का एक उत्तरी राज्य है। जी नहीं, कश्मीर एक राज्य नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है &#8211; 6.98 प्रतिशत हिस्सा। यहाँ तक कि यह कहना भी ग़लत है कि &#8220;कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है&#8221;, क्योंकि कश्मीर तो भारत का सब से उत्तरी भाग है ही नहीं। वह श्रेय लद्दाख सूबे को जाता है। और यदि भारत का आधिकारिक मानचित्र देखा जाए तो गिलगित और अक्साइ-चिन उससे भी उत्तर में हैं। न लद्दाख, न गिलगित, न अक्साइ चिन कश्मीर का हिस्सा हैं। जिस क्षेत्र को पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है, और हम पाक-अधिकृत कश्मीर, वह क्षेत्र भी दरअसल कश्मीर नहीं है। यह लेख प्रयास है यह बतलाने कि इन अंतरों को समझना क्यों ज़रूरी है, विशेषकर जब कश्मीर घाटी में इतना हंगामा हो रहा है।</p>
<p style="text-align: center"><img class="aligncenter size-full wp-image-201" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/09/kashmir.jpg" alt="" width="509" height="322" /></p>
<p>राजनीतिक शतरंज के खिलाड़ियों ने कश्मीर की भौगौलिक स्थिति और सीमाओं को लेकर हमेशा एक भ्रामक स्थिति बनाए रखी। आम तौर पर जब लोगों से पूछा जाता है कि कश्मीर कहाँ है, तो वे कहते हैं, &#8220;यह रहा&#8221; और भारत के मानचित्र के &#8220;सिर&#8221; की ओर इशारा करते हैं, जैसा कि ऊपर दिये मानचित्र में काले बाणचिह्न से दिखाया गया है। पर वास्तव में वे सचाई से कोसों दूर हैं। इसी नक्शे में लाल बाणचिह्नों के द्वारा लेखक ने कश्मीर की सही स्थिति और सीमा दिखाई है।</p>
<p>ऊपर दिए नक्शे में भारत की सरकारी रूप से मान्य सीमाएँ दिखाई गई हैं, और कश्मीर क्षेत्र को लाल रेखाओं द्वारा रेखांकित किया गया है। यदि आप <a href="http://kaulonline.com/images/kmap4.jpg" target="_blank"><img class="alignright" style="margin: 10px 5px" src="http://kaulonline.com/images/kmap3.jpg" alt="" hspace="5" width="220" height="174" align="right" /></a> एक &#8220;बाहर वाले&#8221; के नज़रिए से देखना चाहें तो विकिपीडिया का दाएँ दिया नक्शा देखें &#8212; इसे क्लिक कर बड़े आकार में देखा जा सकता है। कश्मीर घाटी की सीमाएँ इस नक्शे में भी लाल रेखाओं द्वारा दिखाई गई हैं।</p>
<p>आप पूछेंगे कि कश्मीर और जम्मू-कश्मीर राज्य में भला क्या अन्तर है? यूँ समझें कि सारा झगड़ा कश्मीर का है जम्मू-कश्मीर का नहीं। कश्मीर सुन्नी-मुस्लिम बहुल है, राज्य के अन्य भाग नहीं। कश्मीर में &#8220;गो इंडिया गो&#8221; का नारा लग रहा है, जबकि राज्य के अन्य भाग भारतीय होने में खुश हैं। कश्मीर जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा हिस्सा है।</p>
<p>आप स्वयं ही इन क्षेत्रफलों की तुलना कीजिए :</p>
<table border="1">
<tbody>
<tr>
<td><em>कश्मीर का क्षेत्रफल :</em></td>
<td>15,520.3 वर्ग किमी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jammu_and_Kashmir" target="_new">विकिपीडिया</a>)</td>
</tr>
<tr>
<td><em>भारत के नियन्त्रण में जम्मू-कश्मीर का क्षेत्रफल :</em></td>
<td>~101,400 वर्ग किमी (<a href="http://www.fsi.nic.in/sfr2003/jk.pdf" target="_new">वन सर्वेक्षण की साइट</a>)</td>
</tr>
<tr>
<td><em>अविभाजित जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल :</em></td>
<td>222,236 वर्ग किमी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jammu_and_Kashmir" target="_new">विकिपीडिया</a>)</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>यानी कश्मीर अविभाजित जम्मू-कश्मीर राज्य का लगभग 7% है, और भारत के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर का लगभग 15%।</p>
<p>पर कश्मीर की परिभाषा क्या है? अच्छा हो कि कश्मीरियों से ही पूछा जाए। कश्मीरी भाषा में घाटी से बाहर के क्षेत्र को &#8220;न्यबर&#8221; कहा जाता है, यानी बाहर या परदेस। कश्मीर उस जम्मू-कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है, जो जम्मू, लद्दाख और कश्मीर को मिला कर बना है। राज्य के तीन सूबे हैं जिनमें कश्मीर सूबा सब से छोटा है। और इस छोटू ने ही सब की नाक में दम कर रखा है। इस क्षेत्र में केवल तीन जिले थे &#8212; अनन्तनाग, बारामुल्ला और श्रीनगर, जिन्हें अब दस छोटे जिलों में बाँट दिया गया है। इसी छोटे से क्षेत्र ने पिछले 63 वर्षों में इस इलाके की राजनीति पर अपना बोलबाला कायम किया है।</p>
<p>कश्मीर और जम्मू-कश्मीर के इस अन्तर को हमेशा छुपाया क्यों गया है, और इस अन्तर को उजागर करना क्यों आवश्यक है? दरअसल राज्य का यही छोटा हिस्सा भारत के लिए दर्दे-सर बना हुआ है, क्योंकि इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र ने पूरे राज्य को और पूरे क्षेत्र को अपहृत कर रखा है। राज्य का यह भाग जो राज्य का केवल 7% है, स्वयं को एक गैर मुस्लिम देश का भाग मानने में आनाकानी करता है। राज्य के दक्षिण में जम्मू है, जो हिन्दू-बहुल है, जहाँ के लोग पंजाब-हिमाचल जैसे हैं, और उत्तर में लद्दाख है जहाँ बौद्ध और शिया मुस्लिम रहते हैं, कुछ कुछ तिब्बत से मिलता जुलता। दोनों क्षेत्रों को भारत का भाग होने में कोई दिक्कत नहीं है। केवल कश्मीर है, जहाँ गैर-मुस्लिमों के पलायन के बाद अब 97% आबादी मुसलमानों की है। यही वह हिस्सा है जो आग का गोला बना हुआ है। वह खूबसूरत वादी, जिसे कभी जन्नत कहा जाता था, और जिसे अलगाववाद ने जहन्नुम में तब्दील कर दिया गया है। इसी क्षेत्र के अधिकांश वासी इस छोटे से क्षेत्र के लिए आज़ादी की माँग कर रहे हैं। इस राज्य की विविधता, भारत की विविधता में तो घुलमिल जाएगी, पर हरे-झंडे ले लेकर पत्थर बरसाते अलगाववादियों के कश्मीर में कैसे चलेगी?</p>
<div>पाक अधिकृत &#8220;कश्मीर&#8221; में न कश्मीरी रहते हैं, न वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाओं में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। जाहिर है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया।</div>
<p>इस खेल के हर खिलाड़ी के लिए महाराजा हरिसिंह की इस रियासत के ईंट-रोड़े को इकट्ठा रखना एक राजनैतिक मजबूरी रही है &#8212; चाहे वह कहीं की ईंट हो कहीं का रोड़ा। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में कुछ भी एक सा नहीं है, सिवाय इसके कि यह तीनों सूबे एक ही राजा के अन्तर्गत थे। हर क्षेत्र की अपनी वांशिकता है, अपना मज़हब, अपनी भौगोलिक स्थिति और प्रवृति, अपनी जलवायु, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा। देश में किसी भी राज्य में इतनी विविधता नहीं है। यहाँ तक कि 1950 के दशक में देश का भाषाई पुनर्गठन तो हुआ पर इस राज्य को नहीं छुआ गया, क्योंकि इसे विशेष स्टेटस हासिल था। भारत शायद इस राज्य को इसलिए इकट्ठा रखना चाहता है कि जम्मू और लद्दाख कश्मीर और शेष भारत के बीच गोंद का काम करें। भारत को लगता है कि राज्य का विभाजन किया तो देश का विभाजन दूर नहीं होगा। पाकिस्तान भी जम्मू-कश्मीर का नाम एक साथ लेता है ताकि वह पूरे राज्य पर अपना दावा ठोक सके और नौबत पड़ने पर शायद हिन्दू क्षेत्रों की सौदेबाजी कर सके। शायद इसी कारण वे अपने हथियाए हुए इलाके को AJK (आज़ाद जम्मू कश्मीर) कहते हैं, जो न आज़ाद है, न जम्मू है, न कश्मीर है। पाक अधिकृत &#8220;कश्मीर&#8221; में न कश्मीरी रहते हैं, न वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाएँ हैं &#8211; पहाड़ी, मीरपुरी, गुज्जरी, हिन्दको, पंजाबी और पश्तो (विकिपीडिया के अनुसार)। इन में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। इस का अर्थ यह भी है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया है।</p>
<p>पर कश्मीरी अलगाववादियों की क्या मजबूरी है कि वे जम्मू-कश्मीर राज्य की बात कर रहे हैं, जबकि उन्हें केवल कश्मीर क्षेत्र से ही सरोकार है? जब कश्मीरी मुसलमान भारत का हिस्सा होने के विरुद्ध तर्क देते हैं तो कहते हैं कि वे भारतीयों से वांशिक रूप से अलग हैं, उनका धर्म अलग है। उन में से अधिकांश स्वयं को भारतीय नहीं मानते। कश्मीर के मुसलमान डोगरा राजा हरिसिंह के खिलाफ तो 1947 से भी पहले लड़ रहे थे। तो अब वे जम्मू-कश्मीर की बात कैसे कर रहे हैं? वे महाराजा के जीते अन्य क्षेत्रों पर कैसे दावा ठोक सकते हैं, जब वह महाराजा ही उनके लिए पराया था? लद्दाख, बल्तिस्तान और गिलगित तो उस समय रियासत का हिस्सा भी नहीं थे, जब डोगरा राजाओं ने जम्मू कश्मीर को अंग्रेज़ों से खरीदा। लेखक के विचार में कश्मीरियों के इस रवैये के दो कारण हैं &#8212; पहला तो यह कि इस तरह वे कह सकेंगे कि हमें इस्लामी पाकिस्तान नहीं चाहिए बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष जम्मू-कश्मीर चाहिए, इससे उन्हें विश्व में सुनवाई मिलेगी &#8212; क्योंकि पाकिस्तान और इस्लामी आतंकवाद दुनिया भर में बदनाम हो चुके हैं। दूसरा, इससे उन्हें सौदेबाजी भी करने के लिए जगह मिल जाती है।</p>
<p>कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना एक ऐसा तथ्य है जिस के और भी कई अर्थ निकलते हैं। अब चूँकि जम्मू और लद्दाख भारत के साथ खुश हैं, उनके ऊपर तो तथाकथित &#8220;आज़ादी&#8221; नहीं थोपी जा सकती। बाकी रहा कश्मीर का 6000 वर्ग मील का क्षेत्रफल। यदि इसे एक अलग देश बनाया जाता है, तो यह विश्व के सब से छोटे &#8220;लैंड लाक्ड&#8221; (ऐसे देश जिनकी कोई सीमा समुद्र से नहीं मिलती) देशों में से होगा &#8211; वैकिटन सिटी, लक्समबर्ग और एकाध ही देश इससे छोटे होंगे। अब आप ही सोचिये कि भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच फंसे इस देश की &#8220;आज़ादी&#8221; कितने दिन चलेगी? भारत से छुटकारा पाएँगे तो पाकिस्तान निगल जाएगा। दरअसल कश्मीर के कुछ नेता और बेशक पाकिस्तान भी तो मूलतः यही चाहते हैं, पर क्या कश्मीर की आम जनता इसी अंजाम के लिए लड़ रही है? क्या पाकिस्तान उन्हें धारा 370 जैसे विशेषाधिकार देगा? क्या वहाँ भी तालिबानी हुकूमत न चलने लगेगी? इतने छोटे से भूमि क्षेत्र में क्या इतने प्राकृतिक संसाधन हैं कि यह एक देश बना रहे? जाड़े के महीनों में कश्मीर बर्फ से घिरा रहता है। समुद्र की बात छोड़ें, सड़क से भी वहाँ पहुँचना दूभर हो जाता है। जम्मू श्रीनगर राजमार्ग बन्द हो जाता है तो कश्मीर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। बीबीसी का <a href="http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/south_asia/03/kashmir_future/html/6.stm" target="_new">यह पृष्ठ देखें</a> जिस में बताया गया है कि वादिए-कश्मीर आज़ाद की गई तो केवल 1800 वर्ग मील होगी, यानी भूटान का दसवाँ हिस्सा। यह क्षेत्रफल विकिपीडिया पर दिए क्षेत्रफल से काफी कम है, पर जो भी है इस छोटे से क्षेत्र के देश बनने की कल्पना, वह भी ऐसे माहौल में, किसी का भी भला नहीं करेगा।</p>
<div>लोकतन्त्र में बहुमत की चलती है, तो राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में बसी जनसंख्या पूरे राज्य की बाबत फैसला क्यों करे? कठुआ के किसी डोगरी भाषी या लेह के किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा की चाहत नहीं है।</div>
<p>कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना इस बात को भी झुठलाता है कि लोकतन्त्र होने के नाते बहुमत की बात मानी जानी चाहिए। बिल्कुल सही है, लोकतन्त्र में बहुमत की ही चलती है, पर राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में  बसी जनसंख्या क्या पूरे राज्य की बाबत फैसला करेगी? क्या यह लोकतन्त्र के खिलाफ नहीं होगा? कठुआ में रह रहे एक डोगरी भाषी या लेह में रह रहे किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा (इस्लामी शासन) की चाहत नहीं है। कश्मीर तीन ओर से उन क्षेत्रों से घिरा है जो बेशक भारतवादी हैं, और चौथा यानी पश्चिमी सिरा पाकिस्तान ने हथिया रखा है। एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश के लिए कोई इलाका कितना बड़ा होना चाहिए जिस के आधार पर इसके निवासियों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाए? लोकतन्त्र के नाते, क्या अब इसके बाद हैदराबाद या मेरठ के किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में रायशुमारी करनी पड़ेगी? कश्मीरी हिन्दुओं की माँग है कि यदि कश्मीरी मुसलमानों उन्हें अपने साथ नहीं रहने देते तो उन्हें &#8220;पनुन कश्मीर&#8221; (अपना कश्मीर) के नाम से कश्मीर के एक हिस्से में बसाया जाए जो भारत का अभिन्न अंग हो। यदि इस बात को बल दिया जाता है तो कश्मीरी अलगाववादियों के पास &#8220;देश&#8221; के नाम पर और भी कम क्षेत्र बचता है।</p>
<p>यदि इतिहास की घड़ी को पीछे धकेला जा सकता तो शायद यह सही रहता कि महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर घाटी को अलग कर पाकिस्तान को सौंप दिया होता। पर राज्य की घुलमुल संरचना के कारण ऐसा नहीं हो सका। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न आकांक्षाएँ थीं, सो उन्होंने राज्य को भारत पाकिस्तान दोनों से अलग रखा। उसके बाद पाकिस्तानी कबाइलियों ने जो किया वह सर्वज्ञात है। पर हाँ उस समय यदि वादी पाकिस्तान के हवाले कर दी जाती तो शायद सब के लिए बेहतर होता। कश्मीरी हिन्दू तभी भारत का हिस्सा बन गये हो, पाकिस्तान से आसे अन्य हिन्दूओं की तरह। कश्मीरी मुसलमान खुश होते या नहीं, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। पर बेशक कोई &#8220;आज़ादी की लड़ाई&#8221; तो नहीं चल रही होती।</p>
<p>अलगाववादियों को धर्मनिरपेक्षता, आज़ादी और जम्मू-लद्दाख की चिन्ता का ढ़ोंग तो छोड़ देना चाहिये। कश्मीर घाटी का मर्ज़ एक कैंसर का रूप धारण कर चुका है। घातक मर्ज़ के लिए दवा भी घातक चाहिए। कोई भी चरम उपाय होगा तो पूरे शरीर को तकलीफ तो होगी ही। या तो बीमारी का उपचार किया जाय या विष ग्रसित अंग को ही शरीर से पृथक कर दिया जाय। दर्दनाक बात है पर वाकई कश्मीर का आकार इतना छोटा है कि इसके ना होने पर भारत के मानचित्र में कोई बहुत ज़्यादा अन्तर नहीं पड़ेगा।  घाटी को या तो देश में पूरी तरह समाहित करना चाहिये (दफा 370 हटाकर) या फिर पूरी तौर से दफा।</p>
<p>किसी भी देशभक्त भारतीय की तरह लेखक को भी कश्मीर में लोगों की तकलीफें, और कत्लो-गारत देख कर तकलीफ होती है। पर वहाँ लोग क्यों मारे जा रहे हैं? वहाँ जो अलगाववादी हिंसा हो रही है, उसके कारण वहाँ सेना है, या सेना होने के कारण अलगाववादी हिंसा है? 1989 से पहले तो सब ठीक था। आप ही बतायें, यदि यह जिहाद आज ही समाप्त हो जाए, तो क्या कुछ ही समय में वहाँ से सेना नहीं हटे जायेगी? कश्मीरी अलगाववादियों को इस प्रश्न का उत्तर मालूम है। उन्हें और उनके नेताओं को यह पता है कि वे जिस दिन चाहेंगे उस दिन निर्दोष लोगों की मौतों को रोक सकते हैं। पर अलगाववादियों की सोच यही है कि जब तक असहाय लोग कुरबान नहीं होंगे तब तक निज़ामे-मुस्तफा नहीं मिलेगा।</p>
<p>इतिहास कहता है कि टालमटोल राजनीतिक शक्ति के रहते यह नामुमकिन है कि &#8220;आर या पार&#8221; जैसा कोई रवैया भारत सरकार अख्तियार करे। शायद इसलिए कश्मीरी मुसलमानों के हित में यही है कि वे यथापूर्व स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करें &#8212; लड़ाई झगड़ा छोड़ें, भारत के विरुद्ध छिड़ा जेहाद समाप्त करें, स्कूलों, दफ्तरों, सिनेमाओं, खेलगाहों, यहाँ तक कि मैखानों में जाना शुरू करें। जो हिन्दू घाटी छोड़ कर जा चुके हैं, वे तो संभवतः लौटेंगे नहीं। 1989 से पहले जो था, उसे हासिल करें। पर शुरुवात पत्थर-बाज़ी बंद होने से ही हो सकती है।<br />
&#8211;<br />
<a href="http://kaulonline.com/blog/2010/09/kashmir-is-too-small-for-azadi/" target="_new">मूल अंग्रेज़ी लेख</a> से लेखक द्वारा स्वयं अनूदित।</p>
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		<title>गुमनामी में बहुत खुश हूँ: फ़ेक आईपीएल प्लेयर</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2010/01/fip-interview/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 22 Jan 2010 19:41:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Cricket]]></category>
		<category><![CDATA[FIP]]></category>
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		<category><![CDATA[Steve Jobs]]></category>

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		<description><![CDATA[FIP वापस आ रहा है, पर क्या यह दोबारा इतिहास रचेगा या फिर बीसीसीआई या दूसरों के साथ कानूनी विवादों में गुम होकर रह जायेगा? पढ़िये 'ग्रेट बाँग' अर्नब रे द्वारा लिया साक्षात्कार।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-180" title="fip" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/01/fip.jpg" alt="" width="425" height="218" /></p>
<div id="section-teaser">
<div class="dropCap">न</div>
<p>क़ली इंडियन प्रीमियर लीग खिलाड़ी &#8211; <strong>फ़ेक आईपीएल प्लेयर</strong> (FIP)  किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पिछले साल, इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान, एक ब्लॉग अचानक प्रकट हुआ जिसे यह समझा गया कि आईपीएल के सबसे लोकप्रिय फ्रेंजाइजी में से एक के गुमनाम खिलाड़ी लिख रहा था। जब FIP ने हारी हुई टीम के अंदरूनी कार्यशैली को अपनी कानी आंख से देख-परख कर सुपर खिलाड़ियों के काले कारनामों को उनके आसानी से कयास लगाए जाने वाले नामों (मसलन कान मोलू और अप्पम चू*या &#8211; जो बाद में हमारी अपनी शब्दावली में भी घुस आए) के जरिए बयान करना शुरू किया तो देखते ही देखते वे इंटरनेट पर सनसनी बन गए।</p>
<p>FIP कौन था? क्या वास्तव में वह एक खिलाड़ी था? या यह मात्र प्रचार की नौटंकी थी? इससे भी महत्वपूर्ण बात, क्या यह सारा सिलसिला सच था? या जैसा कि हम सब ने समझा, अर्ध सत्य था?</p>
<p>FIP की चर्चा हर कहीं होने लगी थी जहाँ कि क्रिकेट की बातें होती थी, और पोस्ट में असली खिलाड़ियों के नकली नामों से की गई छीछालेदर पर मजे लूटते रहे। कुछ खिलाड़ियों पर आशंका जताई गई कि इनमें से कोई FIP हो सकता है, एक समाचार पत्र ने FIP की तथाकथित पहचान को प्रकट किया पर बाद में मुकर गए। तथाकथित फ्रेंचाइजी द्वारा अपने ब्लॉग पर एक आधिकारिक बयान जारी किया गया और जब FIP के पोस्ट और भी ज्यादा सटीक होने लगे तो लोगों का भ्रम और बढ़ता गया। लोगबाग टूर्नामेंट की समाप्ति का उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे, क्योंकि यह प्रतीक्षा न सिर्फ बेहद लंबी थी, बल्कि FIP ने भी तभी अपनी पहचान को उजागर करने का वादा किया था।</p>
<p>उसने अपना वादा निभाया। पर पूरी तरह से नहीं। <a href="http://www.youtube.com/watch?v=9NgrYqcvx1I" target="_blank">एक वीडियो</a> में जिसमें उसकी छाया दिखाई जा रही थी, FIP ने स्वीकारा कि वो कोई खिलाड़ी नहीं है। तो फिर वह कौन था? बस एक भारतीय क्रिकेट प्रशंसक, लेकिन साधारण नहीं। एक ऐसा व्यक्ति जो &#8216;जीवन की अनाम यात्रा&#8217; के दौरान क्रिकेट के संपर्क में आया। बॉलीवुड के बादशाहों से लेकर क्रिकेट के दलालों तक से इनके प्रगाढ़ परिचय ने इन्हें आंतरिक जानकारी के लिहाज से &#8220;अंधेरे का सर्वव्यापी भूत&#8221; या &#8220;हर कहीं मंडराती मक्खी बना दिया था&#8221;।</p>
<p>और, अब FIP वापस आ गया है &#8211; इतिहास को दोबारा रचने। हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक &#8220;गेमचेंजर्स&#8221; के साथ। और इंडीब्लॉगीज़ पर दिये अपने जीवन के पहले साक्षात्कार में वो खुद हाजिर है अपने बारे में कुछ बताने के लिए। <a href="http://fakeiplplayer.blogspot.com/" target="_blank">फ़ेक आईपीएल प्लेयर</a> को 2008 इंडीब्लॉगीज़ का <a href="http://www.indibloggies.org/results-2008" target="_blank">सर्वश्रेष्ठ खेल ब्लॉग का पुरस्कार</a> मिला है। साक्षात्कार लिया इस बार के &#8220;<a href="http://www.indibloggies.org/results-2008" target="_blank">इंडीब्लॉग आफ द ईयर</a>&#8221; पुरस्कार के विजेता <a href="http://greatbong.net/" target="_blank">अर्नब रे</a> ने। इस बातचीत का हिन्दी अनुवाद किया <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> ने।</div>
<p><strong>प्रश्न: FIP ब्लॉग शुरू करने का खयाल कैसे आया? क्या कुछ ऐसा रहा था जो आप लंबे समय से ऐसा करना चाह रहे थे या यह किसी बढ़िया सुबह को अचानक उठी इच्छा थी? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ब्लॉग लिखने की बात मन में अचानक ही उठी। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में, मैंने बोरे भर भर कर रसीली कथाएँ इकट्ठा कर रखी थीं जो मैं कभी कभी अपने करीबी दोस्तों को सुनाया करता था। जाहिर है, दोस्तों को बड़ा मजा आता था। एक सुहानी शाम को, दक्षिण अफ्रीका रवाना होने से पहले मैं और मेरे तीन दोस्त गपशप करते बैठे थे, बीयर के दौर चल रहे थे। तब उनमें से एक ने सुझाव दिया कि मैं क्यों न इन्हें एक ब्लॉग पर छापूं तो इस तरह से वे ताज़ा तरीन कहानियों का आनंद ले सकेंगे। मैंने कहा कि ये तो बहुत अच्छा विचार है। यह बस हम चारों के बीच साझा होने वाली रहस्यमय काली किताब होनी थी। मैंने इसे कभी भी &#8216;निजी&#8217; बनाने की नहीं सोची क्योंकि मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि कभी किसी और को इसके बारे में पता चलेगा।</p>
<p>पर, मैंने यह जरूर सोचा था कि इसे मैं किस तरह से सिर्फ एक चर्चा मंच के बजाय ज्यादा दिलचस्प बनाऊं। मैंने <a title="नकली स्टीव जॉब्स का पर्दाफाश" href="http://nuktachini.debashish.com/254" target="_blank">नकली स्टीव जॉब्स</a> और &#8216;वॉर फॉर द न्यूज़&#8217; के बारे में सोचा। और, संयोग से, जोहेन्सबर्ग की एक उड़ान पर मैंने &#8216;वैग द डॉग&#8217; नाम की फ़िल्म देखी। तो, इस तरह से नकली आईपीएल खिलाड़ी &#8211; FIP का व्यक्तित्व, कुछ मायनों में, इन सभी तीनों से ही प्रभावित था।</p>
<p><strong>प्रश्न: लोग ब्लॉग लिखना शुरू करते हैं, और शोहरत पाने के लिये भयंकर संघर्ष करते हैं। आपने इतनी जल्दी इतना बड़ा पाठक वर्ग बनाने के लिए क्या जादू कर दिया? विशेष रूप से, शुरू शुरू में लोगों को ये कैसे पता लगा कि इधर FIP नाम का एक &#8220;शैतानी&#8221; ब्लॉग भी है? <img src='http://www.samayiki.com/sam/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ईमानदारी से कहूं तो मुझे खुद भी नहीं पता कि बात इतनी जल्दी कैसे फैली। शुरू के कुछ दिनों में तो इस ब्लॉग का मजा लेने के लिए हम चारों के अलावा वहां और कोई नहीं होता था। इसके बाद एक दिन मैंने देखा कि कोई 5 या 6 पाठक, जिन्हें मैं नहीं जानता था, अनुयायी बन चुके हैं। और बहुत से अन्य लोगों ने ब्लॉग पर टिप्पणियाँ भी की थीं। मैंने अपने दोस्तों से पूछा कि क्या उन्होंने इसके बारे में किसी को बताया था तो उन सभी ने कहा कि &#8216;नहीं&#8217;। मुझे लगता है कि कम से कम उनमें से एक ने किसी को बताया तो होगा। [उस समय मैंने इसके बारे में अलग तरह से महसूस किया, लेकिन अब मैं शिकायत नहीं कर रहा हूँ <img src='http://www.samayiki.com/sam/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';-)' class='wp-smiley' /> ]</p>
<p>उस दिन के अस्त होते तक, अनुयायियों की संख्या दुगुनी हो चुकी थी। मैं तब थोड़ा सा परेशान हो गया था। मैंने अपने समूह में सबसे समझदार व्यक्ति को संदेश भेजा और उससे पूछा कि क्या मुझे ये सिलसिला जारी रखना चाहिए। उसकी प्रतिक्रिया थी &#8211; &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217;। तो, मैंने लिखना जारी रखा। कुछेक दिन के बाद, क्रिकइन्फ़ो ने अपने मुख पृष्ठ पर इसे डाल दिया। मुझे याद है कि मैं केकेआर 5 बनाम किंग्स इलेवन टीम का खेल देखने के लिए जाते वक्त किंग्समीड के रास्ते पर था तब मेरे दोस्त ने मुझे बताया कि ब्लॉग क्रिकइन्फ़ो के मुख पृष्ठ पर है। जब तक मैं अपने होटल पहुँचता, अनुयायियों की गिनती 150 हो चुकी थी। आखिर में तो, यह लगभग 9000 तक पहुँच गई थी। मैं हर बार हँसता था जब मुझे इस बात की याद आती था कि जब यह संख्या 15 तक पहुँच गई थी तब मैं कितना डर गया था।</p>
<p><a href="http://www.cricinfo.com/" target="_blank">क्रिकइन्फ़ो</a> को इस ब्लॉग के बारे में बहुत जल्दी पता चल गया था। मेरा अनुमान है कि या तो उन्होंने इसे संयोग से ढूंढ निकाला या किसी ने फेसबुक या कहीं और चेंप दिया होगा और लोगों को नजर आ गया। मैं नहीं जानता। फिर भी, मुझे लगता है कि पहले पहल पता चलने वालों में उनका ही नाम होना चाहिए। उन्होंने कुछ दिनों के लिए निगरानी भी की होगी इस बात की पुष्टि करने के लिए कि जो बातें लिखी जा रही हैं वे सत्य भी हैं या नहीं। जब एक बार वे संतुष्ट हो गए, तो फिर उन्होंने इसे मुख पृ्ष्ठ पर जगह दे दी। उसके बाद तो मेरे ब्लॉग ने गति पकड़ ली।</p>
<p><strong>प्रश्न: आप जो बातें लिखते थे वे काल्पनिक होते थे या तथ्यों पर आधारित? यदि वे तथ्यों पर आधारित होते थे तो क्या टीम के भीतर या प्रेस में आपका कोई खबरी था? </strong></p>
<div id="pullQuoteR">मैं इस अस्वीकरण कि &#8220;इस ब्लॉग के सभी पात्र काल्पनिक हैं&#8221; पर अब भी कायम हूँ। मैंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि प्रबंधन के लिये पर्याप्त सुराग छोड़ूं जिससे वे जानें कि मैं कौन हो सकता हूँ, कौन नहीं।</div>
<p><strong>FIP:</strong> मैं अपने ब्लॉग में निहित इस अस्वीकरण कि &#8220;इस ब्लॉग के सभी पात्र काल्पनिक हैं&#8221; पर अब भी कायम हूँ। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति के साथ कोई समानता, विशुद्ध रूप से संयोग है।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आप कभी इस कथित &#8220;वास्तविक आईपीएल खिलाड़ी&#8221; के व्यक्तित्व को बनाए रखने के सवाल से जुड़ी नैतिकता के बारे में चिंतित हुए? क्योंकि यदि आपकी बातों को गंभीरता से लिया जाता तो टीम के भीतर मारा-मारी मचती और अंततः निर्दोष खिलाड़ियों को संदेह के घेरे में रखा जाता। या आपने यह सोचा रखा था कि अपनी बातों को &#8216;नकली आईपीएल खिलाड़ी&#8217; संबंधी अस्वीकरण के तले &#8216;नकली&#8217; शब्द के जरिए ढांप लिया जाएगा, भले ही ब्लॉग पाठकों को सारा लेखन गप्प की बजाय सचाई लगे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मैंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि मैं प्रबंधन के लिये पर्याप्त सुराग छोड़ूं जिससे वे जानें कि मैं कौन हो सकता हूँ या कौन नहीं। मैं मानता हूं कि शुरुआती दिनों में, जब ब्लॉग अमूमन निजी था तो उस समय मैं इस मोर्चे पर लापरवाह सा था। लेकिन एक बार जब यह लोकप्रिय हो गया और मैंने इसे जारी रखने का फैसला किया, तो मैंने पहले के कुछ लेखों को संपादित किया और यह ध्यान रखा कि किसी विशेष खिलाड़ी को मेरे लेखन की वजह से संदेह के दायरे में नहीं आना चाहिए। वहाँ निश्चित रूप से आपसी मारा-मारी होते रहती थी और मैं इसे बारीकी से देखता था, लेकिन मुझे यकीन था कि किसी निर्दोष खिलाड़ी को मेरे ब्लॉग की वजह से कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ेगी। मुझे टीम प्रबंधन पर भरोसा था कि वो अगर अपना चौथाई दिमाग भी इस्तेमाल करेंगे तो वे ऐसी कोई बेवकूफ़ी नहीं करेंगे।</p>
<p>जब आकाश और बांगड़ को वापस भेजा गया तब मैं चिंतित हुआ था। मैंने कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग बंद कर दी थी, जब तक कि मुझे यह विश्वास नहीं हो गया कि इसका कारण स्वयं आकाश के अलावा अन्य कोई नहीं है। </p>
<p>आपके प्रश्न को मैं थोड़ा सा सही करना चाहूंगा &#8211; मैं हमेशा से बड़ा भारी क्रिकेट प्रशंसक रहा हूं, और पिछले दस वर्षों से मुझे &#8216;खालिस प्रशंसक&#8217; से भी ज्यादा बनने के अवसर मिले, और मेरे विचार में यह बात उस वीडियो पोस्ट में में भी है। लेकिन, आपका कहना सही है, मैं यह ज़रूर मानता था कि ब्लॉग के नाम में &#8216;फ़ेक&#8217; यानि नकली शब्द रहने से मैं तो बरी हो जाता हूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: आप कभी भी अपनी पहचान उजागर करेंगे?यदि नहीं, तो क्यों? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> &#8216;कभी&#8217; के बारे में तो मुझे कुछ पता नहीं है, लेकिन इस समय मैं गुमनामी में बहुत खुश हूँ। कुछेक साल पहले, पेरिस में मेरी एक दिलचस्प आदमी से मुलाकात हुई। वह बहुत पढ़ाकू और जानकार था, पर इसके अलावा वह बहुत सामान्य, मध्यम आयु का व्यक्ति था जो एक फ्रेंच फुटबॉल क्लब में नियमित नौकरी पर था। बेहद साधारण व्यक्तित्व! उसने मुझे एक सप्ताहांत अपनी पत्नी और तीन बच्चों के मेहमान के रूप में अपने घर में आमंत्रित किया। और, जब मैं वहाँ गया तब मुझे एहसास हुआ कि उसका घर तो, घर क्या एक महल है, और खुद वह एक अरबपति है, फुटबॉल क्लब के मालिकों में से एक। मैंने उनसे पूछा कि वे इस तरह लो प्रोफ़ाइल बना कर क्यों रहते हैं। उनकी प्रतिक्रिया थी &#8216;vivre cache pour vivre heureux&#8217; , जिसका अर्थ है &#8216;छुपा जीवन ही खुशगवार जीवन होता है&#8217;।</p>
<p><strong>प्रश्न: पर आप अपनी पहचान उजागर करने से सहसा पलट क्यों गए थे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> संभव है कि मेरी पहचान जाहिर होने से कुछ खिलाड़ियों को, जिन्हें मैं जानता हूं, कुछ समस्या होती। जब मैंने इसके बारे में सोचा तो लगा कि मुझे कोई अधिकार नहीं है कि बिना किसी गलती के मैं उन्हें किसी अजीब स्थिति में डाल दूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आप अन्य ब्लॉगों को पढ़ते हैं? यदि हाँ, तो किन्हें? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरा पसंदीदा ब्लॉग <a href="http://thevigilidiot.com/" target="_blank">thevigilidiot.com</a> है। यह शख्स बेहद मजेदार है। कुरबान फ़िल्म की उसकी समीक्षा पढ़ने के बाद मैंने वास्तव में वो फ़िल्म इसलिए देखी ताकि जान सकूं कि कैसे कोई फ़िल्म दिमाग का दही कर सकने की हद तक बेहूदी हो सकती है।</p>
<p>एक अन्य ब्लॉग मुझे पसंद आता है वो है <a href="http://inclusiveplanet.wordpress.com/" target="_blank">इनक्लूजिव प्लेनेट ब्लॉग</a>। इनक्लूजिव प्लेनेट एक संगठन है जो विकलांगों को सेवाएं प्रदान करता है और उनके ब्लॉग पर दुनिया भर से शारीरिक अक्षम लोग अपने अनुभवों को साझा करते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि आप यहाँ पर शायद ही कभी कोई रोतड़ू, सहानुभूति बटोरने वाली कहानियाँ पाएँगे। यहाँ पर बुद्धिमत्तापूर्ण, विचारोत्तेजक, अच्छी और प्रेरक कथाएँ मिलती हैं। व्यक्तिगत रूप से, इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने एक समुदाय के बारे में बहुत कुछ सीखा है जिसके बारे में मैं बहुत कम जानता था। ब्लॉग पर जब्राथ और गिडी अह्रोनोविच के पोस्ट अवश्य पढ़े।</p>
<p>मुझे यात्रा ब्लॉगों को पढ़ने में भी मजा आता है। <a title="Future Perfect" href="http://janchipchase.com/" target="_blank">Janchipchase.com</a> नोकिया के डिजाइन प्रमुख का ब्लॉग है। वे दुनिया की ऐसी बारीकी से तस्वीरें खींचते हैं, जो दूसरे आमतौर पर अनदेखा कर देते हैं। फिर, यह एक <a href="http://bottomofheart.blogspot.com/" target="_blank">दिलचस्प ब्लॉग</a> है अप्पम चू*या के क्षेत्र से आए आईटी सेल्स पर्सन का जो यूरोप में रहता है और अपने अनुभवों को अपने ब्लॉग में लिखता है। मैं क्रिकइन्फ़ो पेज 2 को भी पसंद करता हूं। उनके पैनल में कुछ मजेदार लेखक हैं। जेमी ऑल्टर, आनंद रामचंद्रन, एंड्रयू ह्यूजेस, निशी नारायण, जॉर्ज बेनाय &#8211; ये सब बहुत अच्छे हैं। प्रेम पणिक्कर का ट्विटर फ़ीड मेरा पसंदीदा है, और कभी कभी मैं &#8216;क्रिकेट विथ बॉल्स&#8217; पर भी निगाह मार लेता हूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: आपका पसंदीदा नाइट राइडर खिलाड़ी कौन रहा है? आपके विचार से टीम में किसे नहीं होना चाहिए था? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरा पसंदीदा नाइट राइडर? असल में बहुत सारे हैं! मुझे लगता है कि ईशांत को वहाँ होना चाहिए था क्योंकि, सीजन 2 के दौरान, उसकी वजह से ही &#8216;नाइट राइडर&#8217; की कुछ अलग तरह से व्याख्या बनी थी। एक तरह से वही सचमुच का &#8216;नाइट राइडर&#8217; था। उसके रहने से खेल का कोरबो-लोड़बो-जीतबो जैसा अंत नहीं होता। </p>
<p>क्रिस गेल का साथ बढ़िया है। वास्तव में, मुझे लगता है, गेल और गिब्स दुनिया में सबसे ज्यादा मजाहिया क्रिकेटर हैं। हालांकि, सबसे मजेदार व्यक्ति जिसके साथ आप एक शाम बिताना पसंद करेंगे वो हैं डेविड लॉयड। ईमानदारी से तो उसे केकेआर का कोच होना चाहिए था। ऐसे में भले ही वे अपने सभी मैच हार जाते लेकिन कम से कम वे मैदान में हँसते-हँसाते तो। </p>
<p>एक और पसंदीदा नाइट राइडर तो जॉन बुकानन का लैपटॉप होना चाहिए। पूरे महीने के लिए उसके लैपटॉप ने उसे किसी कामुक नृत्य करती बार बाला की तरह सम्मोहित कर रखा था। चूंकि वे ज्यादातर समय अपने लैपटॉप की इस उग्र यौन ऊर्जा से विचलित रहते थे, खिलाड़ियों को राहत की सांस लेने का समय मिलता रहता था।</p>
<p>टीम में किसे नहीं होना चाहिए था? अमां, हम सब जानते हैं कि सड़न और बदबू की शुरूआत मछली के सिर से ही होती है।</p>
<p><strong>प्रश्न: FIP की आगे की राह क्या है? क्या वह इस आईपीएल सीजन में वापस आएगा? हमें अपनी पुस्तक के बारे में भी बताएँ। </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ब्लॉग के बारे में, ठीक है, मुझे अभी भी नहीं पता कि मैं सीजन 3 के एक्शन में मैं कहाँ और कितने करीब रहूंगा। इसलिए, इस मोर्चे पर मामला अभी थोड़ा धुंधला है। मेरी किताब &#8216;गेमचेंजर्स&#8217; फरवरी 2010 में जारी हो रही है जिसे मैं पिछले छह महीनों से लिख रहा हूँ। इसमें वह सब कुछ है जो ब्लॉग में नहीं है, या नहीं हो सकता था। इसके बारे में मैं बहुत उत्साहित हूँ।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आपको लगता है कि आपकी किताब ब्लॉग के हल्ला-गुल्ला/विवादास्पद होने के कारण बेस्टसेलर रहेगी? किताब के लोकार्पण के समय क्या आपको बीसीसीआई या दूसरों द्वारा किसी तरह की कोई कानूनी कार्रवाई (मानहानि आदि) का अंदेशा है? </strong></p>
<div id=pullQuoteR>पता नहीं कि ब्लॉग की वजह से किताब की बिक्री में इजाफ़ा होगा या नहीं, लेकिन यह सच है कि अगर ब्लॉग नहीं होता तो ये किताब भी नहीं होती।</div>
<p><strong>FIP:</strong> मुझे नहीं पता है कि ब्लॉग की वजह से किताब की बिक्री में इजाफ़ा होगा या नहीं, लेकिन यह सच है कि अगर ब्लॉग नहीं होता तो ये किताब भी नहीं होती। यह भी सच है कि यदि यह ब्लॉग नहीं होता तो हार्पर कॉलिन्स मुझे किसी घोड़े के पिछवाड़े से ज्यादा कुछ नहीं समझते।</p>
<p><strong>प्रश्न: अपने प्रशंसकों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरे ब्लॉग के अनुयायियों और उस पर टिप्पणी करने वालों को दिली शुक्रिया। आप सब ने मुझे ताक़त दी। ब्लॉगिंग के अनुभव के दौरान, मैंने यह अनुभव किया कि किसी के चरित्र में सार्वजनिक लोकप्रियता का कितना दुष्प्रभाव हो सकता है। &#8216;जबर्दस्त&#8217;, &#8216;शानदार&#8217;, &#8216;बेहतरीन&#8217; जैसे शब्द आपको भीतर से थोथा, अहंकारी बना सकते हैं। और इसका नतीजा होता है एक भद्दी पोस्ट, फिर वही लोग पिन चुभाकर आपका गुब्बारा पिचका देते हैं और आपके सही आकार में वापस ले आते हैं। मुझे लगता है कि ब्लॉग के अनुयायी फूल और पत्थर संतुलित तरीके से फेंकते हैं, और इसलिए उन्हें मेरा दिली धन्यवाद। मुझे आशा है कि वे मेरी किताब को भी पसंद करेंगे। इसके अलावा, ब्लॉग की सफलता का 50% हिस्सा तो टिप्पणियों की वजह से ही आया है। ऐसे कई लोग हैं जो ब्लॉग पर सिर्फ टिप्पणियाँ पढ़ने के लिए आते थे। उनमें से कुछ तो बहुत मज़ेदार थे।</p>
<p class="note">इस बातचीत का हिन्दी अनुवाद किया रविशंकर श्रीवास्तव ने।</p>
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		<title>नटाल: माइक्रोसॉफ़्ट  का नया गेमिंग आविष्कार</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2010/01/microsoft-project-natal/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 14 Jan 2010 19:01:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विनय जैन</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रौद्योगिकी]]></category>
		<category><![CDATA[gaming]]></category>
		<category><![CDATA[Microsoft]]></category>
		<category><![CDATA[natal]]></category>
		<category><![CDATA[Nintendo]]></category>
		<category><![CDATA[Wii]]></category>
		<category><![CDATA[xbox]]></category>

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		<description><![CDATA[अगर आपके विडियो गेम से गेम नियंत्रक या वायरलेस रिमोट कण्ट्रोल हटा दें या फिर ये गेम खेलना मैदान में खेलने जैसा ही बन जाये तो कैसा हो? पढ़ें <b>विनय जैन</b> का आलेख।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter" title="Project Natal" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/01/natal_story.jpg" alt="" width="460" height="276" /></p>
<div class=dropCap>वि</div>
<p>डियो गेम! यह सुनकर आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? और जो भी आता हो, अपने हाथ में आपको कुछ न कुछ ज़रूर दिखता होगा। जैसे कि कोई मोबाइल गेमिंग यंत्र, या फिर तारों और बटनों वाला गेम नियंत्रक, या कम से कम एक वायरलेस रिमोट कण्ट्रोल।</p>
<div id="boxR">
<h2>बच्चों का खेल नहीं ये!</h2>
<p>विडियो गेम कोई छोटा-मोटा बाज़ार नहीं है। टेलीग्राफ अखबार की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में पिछले साल लोगों ने फ़िल्मों से ज़्यादा पैसे विडियो गेमों पर खर्च किए। जाहिर है कि ये अब महज़ लड़कपन के खेल नहीं रहे बल्कि मनोरंजन के स्रोतों की मुख्याधारा का हिस्सा बन चुके हैं। इन गेमों के प्रति आम राय यह है कि ये हिंसा को बढ़ावा देते हैं, बेहद बिकने वाले &#8220;कॉल आफ ड्यूटी&#8221; जैसे गेमों की इस कारण काफी निंदा हुई है। जानकार मानते हैं कि निंतेंडो ने यह साबित कर दिखाया है कि छोटे बच्चे, औरतें और उम्रदराज़ भी इन गेमों का मज़ा उठा सकते हैं।</p></div>
<p>भले ही इंटरनेट-पीढ़ी के लिए, जो हाथ में माउस के साथ बड़ी हुई है, यह कोई अजीब या दुविधा वाली बात न हो पर दुनिया के ज्यादातर बाशिंदों के लिए खेल में हाथ का बँधा होना एक झंझट-सा ही है। कुछ सालों पहले निंतेंडो ने सेंसरयुक्त वीमोट (एक तरह का रिमोट नियंत्रक) के जरिए तारों के साथ-साथ बटनों से खिलाड़ियों को आज़ादी दी। निंतेंडो के इस गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म वी (Wii) ने क्रांतिकारी रूप से विडियो खेलों को आम ड्राइंग रूमों तक पहुँचा दिया। और खिलाड़ियों को सोफ़े-कुर्सी से उठाकर खड़ा कर दिया।</p>
<p>माइक्रोसॉफ़्ट के खेल वैज्ञानिक अब वहाँ से इसे आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं, एक नये, लगभग चमत्कारी, आविष्कार <strong>प्रोजेक्ट नटाल</strong> के साथ।</p>
<p>प्रोजेक्ट नटाल कूटनाम है माइक्रोसॉफ़्ट के एक नये गेमिंग आविष्कार का। इस पर अभी काम चल रहा है। यह माइक्रोसॉफ़्ट के XBoX 360 प्लेटफ़ॉर्म के साथ काम करेगा। एक्सबॉक्स के इस एड-ऑन के जरिये खेलने वाले बिना किसी बाहरी नियंत्रक के खेल और मनोरंजन को नियंत्रित कर सकेंगे। कैसे? अपने शरीर की स्वाभाविक नियंत्रण प्रक्रिया से &#8211; यानी बोलकर या हाथ-पैर हिलाकर।</p>
<p>यह एड-ऑन दरअसल संवेदकों (Sensors) का एक समूह होगा। एक लगभग 9-इंच चौड़ी पट्टी, जिसे आपके टीवी या कम्प्यूटर स्क्रीन के ऊपर या नीचे रखा जा सकेगा, के भीतर एक कैमरा, एक गहराई-संवेदक, और बहु-व्यूही (Multiarray) माइक्रोफ़ोन होंगे। बाक़ी काम सॉफ़्टवेयर करेगा। इसके जरिये पूरे शरीर का त्रिआयामी चित्रण, चेहरे की पहचान, आवाज़ की पहचान आदि संभव होंगे।</p>
<p>चीज़ ऐसी है कि बिना देखे यकीन आना मुश्किल है। इसकी एक झलक नीचे दिये विडियो पर देखें।</p>
<p><center><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="500" height="315" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="align" value="center" /><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/I9tmr8VDqN8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999&amp;border=1" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="500" height="315" src="http://www.youtube.com/v/I9tmr8VDqN8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999&amp;border=1" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" align="center"></embed></object></center></p>
<p>ताज़ा अनुमानों के अनुसार, प्रोजेक्ट नटाल इस साल के नवंबर तक ख़रीदने के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इसे वर्तमान एक्सबॉक्स कन्सोलों के साथ जोड़ कर इस्तेमाल किया जा सकेगा।</p>
<p>तो खिलाड़ियो! माउस छोड़िये, उस रिमोट को उधर फेंकिये और अपने हाथ-पैर खोलने को तैयार हो जाइए। और ज़रा एक शाबासी माइक्रोसॉफ़्ट के लिए भी हो जाए (अब ऐसी भी क्या नाराज़गी)। विडियो गेमों की दुनिया में अगली क्रांति का सेहरा उन्हीं के माथे है।</p>
<p class="note">अधिक जानकारी के लिये <a href="http://www.xbox.com/projectnatal" target="_blank">प्रोजेक्ट नटाल की वेबसाइट</a> भी देखें।</p>
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		<item>
		<title>ग्रामीण भारत की बदलती नारी</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/samayiki/~3/LvpLfUXvwJc/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2009/12/sarpanch-sahib-review/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 16:00:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Panchayat]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.samayiki.com/?p=177</guid>
		<description><![CDATA[बीते 20 सालों में कुछ ग्रामीण औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल, पंचायती राजनीति में कदम रख ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश की है। उन्हीं की कथायें है "सरपंच साहिब" में। पढ़िये <b>डॉ सुनील दीपक</b> की समीक्षा।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>&#8220;दीपांजलि बात करती है कि धीरे धीरे पंचायत और पंचायत समिति के पुरुष सदस्य उससे कटते जा रहे हैं, विषेशकर धनुर्जय पटेल जो कि सरकारी नौकरी में हैं, जिसकी वजह से उनके पास बहुत ताकत है। जब किसी बात पर उनके विचार नहीं मिलते तो धनुर्जय पटेल उसका कड़ा विरोध करते हैं। पटेल के अपने विचार हैं, वह कहते हैं &#8211; पुरुष सरपंच बेहतर होते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता कि किस तरह से काम किया जाये। महिला सरपंचों को कुछ अधिक नहीं आता। हमें उन्हें सिखाना पड़ता है। कभी कभी वह चालाकी दिखाती हैं और कैसे काम किया जाये इस बात के निर्देश ही भूल जाती हैं।</p>
<p>&#8230;वह लोग अफवाह फ़ैला रहे हें कि दीपांजलि का नये बीडीओ के साथ चक्कर है, क्योंकि वह उसकी बात सुनता है, औरों की नहीं। उसके पति को मालूम है कि लोग बातें कर रहे हैं। वह कहते हैं कि उसका चक्कर है&#8230;! इस नये शोषण का अर्थ दीपांजलि अच्छी तरह समझती है। उसके घावों में घुसा कर चाकू घुमाने वाली बात है। वह सरपंच है पर साथ ही पत्नी, माँ, स्त्री भी तो है &#8211; शरीर, सेक्स और लिंग।&#8221;</p></blockquote>
<div id="pullQuoteR">गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं।</div>
<div class="dropCap">भा</div>
<p>रतीय समाज में नारी के स्थान की बात हो तो अक्सर गार्गी, दुर्गा, शक्ति से ले कर विज्ञान, तकनीकी, शौध, गणिकी जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली युवतियों से हो कर, इंदिरा गाँधी, मायावती जैसी नेताओं के उदाहरण दे कर हम अपना गर्व व्यक्त करते हैं कि भारत ने इस दिशा में कितनी तरक्की की है, कैसे हर क्षेत्र में नारियाँ पुरुषों से कदम से कदम मिला कर बढ़ रही हैं। इस बदलते भारत में जहाँ एक ओर नारी विकास और प्रगति की बात होती है, वहीं दूसरी ओर दहेज के लिए पीड़ित होने वाली या जला दी जाने वाली औरतों की बात भी होती है। <em>अल्ट्रासाउंड </em>जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से होने वाली भ्रूण हत्याओं की बात भी होती है। लेकिन यह सब बातें अधिकांश छोटे बड़े शहरों में रहने वाली औरतों की होती है। भारत के गाँव कितना बदल रहे हैं और गांवों में रहने वाली औरतों की स्थिति क्या है, इस पर बात या तो कम होती है या फिर बिल्कुल नहीं होती।</p>
<p>गाँवों में रहने वाली इन्हीं औरतों की बात करती है 2009 में हार्पर कॉलिंस द्वारा प्रकाशित व मंजिमा भट्टाचार्य द्वारा संपादित पुस्तक &#8220;सरपंच साहिब ‍ चेंजिंग द फेस आफ इंडिया&#8221;। पिछले दो दशकों में कुछ औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल कर पंचायती राजनीति में कदम रखा है और चुनावों में सफलता भी पायी है, और सरपंच बन कर ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश कर रही हैं। उन्हीं औरतों की कुछ जीवन कथाएँ हैं इस किताब में।</p>
<p><img class="size-full wp-image-175 alignleft" style="margin: 8px;" title="sarpanch_sahib" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/12/sarpanch_sahib.jpg" alt="sarpanch_sahib" width="350" height="317" />1993 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय संविधान में 73वाँ सँशोधन किया जिसमें पंचायती राज के लिए चुनावों की बात थी और इन चुनावों में एक तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित की गयी थीं। इस बदलाव को &#8220;मौन क्रांति&#8221;, &#8220;हमारे समय का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग&#8221; और &#8220;जनता के स्तर पर होने वाले जनतंत्र का दुनिया का सबसे बेहतरीन नवप्रयोग&#8221; आदि कहा गया है। इस कानून की वजह से 30 लाख महिलाएँ राजनीति में आयी हैं जिसमें से करीब दस लाख से अधिक महिलाएँ चुनाव में जीत कर पंचायती राज का हिस्सा बनी हैं। दूसरी ओर, इस प्रयोग को &#8220;दिखावा&#8221; भी कहा गया है और आरोप लगाया गया है कि असली ताकत तो पतियों, पिताओं व ससुरों के हाथों में है जिनके हाथों में यह चुनी हुई महिलाएँ केवल कठपुतलियाँ भर होती हैं।</p>
<p>सन 2006-07 की पंचायती राज की स्थिति की रिपोर्ट में पाया गया था कि विभिन्न राज्यों में पंचायत सदस्यों में महिलाओं की संख्या आरक्षित सीटों को पार कर चुकी है, पंचायतो़ में 37 से 54 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ हैं। 2008 में लिखी एक अन्य जाँच में पाया गया कि इनमें से अधिकतर महिलाएँ निर्णय लेने के लिए अपने पति या अन्य पुरुषों पर निर्भर नहीं हैं, अपने निर्णय स्वयं लेती हैं। लेकिन इन रिपोर्टों के बारे में जनसामान्य में कुछ न कुछ शंका ही रहती है, न जाने सरकारी जाँच कितना सच बताती हैं और कितना झूठ।</p>
<p>मंजिमा की किताब में ऐसी ही कुछ महिला सरपंचों की कहानियाँ है जिन्हें लिखा है जानी मानी लेखक, पत्रकार या अन्य क्षेत्रों से प्रमुख महिलाओं ने, जिनमें शामिल हैं इंदिरा माया गणेश, तिशानी दोषी, मंजु कपूर, अभिलाषा ओझा, <a href="http://soniafaleiro.blogspot.com/" target="_blank">सोनिया फलेरो</a> और कल्पना शर्मा। यह जीवन कथाएँ उड़ीसा, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, असम, बिहार, कर्नाटक आदि विभिन्न राज्यों में संविधान के 73वें संशोधन के असर की जटिलता को समझने में सहायता करती हैं। साथ ही यह कहानियाँ यह भी बताती हैं कि ग्रामीण सामाजिक बदलाव इतना आसान नहीं है, लेकिन हो सकता है।</p>
<p>तमिलनाडू की चिन्नप्पा की जीवन कथा को तिशानी दोषी ने लिखा है। इस कहानी से महिला सरपंचों की कुछ कठिनाईयों को समझ सकते हैं:</p>
<blockquote><p>&#8220;नम्बर चिन्नप्पा की कमजोरी हैं। अनपढ़ होने की वजह से उसके मन में गणित विषय के लिए भय है। जब ललिता ने उससे पूछा कि पंचायत के बजट में कितने पैसे हैं तो वह बता नहीं पायी, बोली, &#8216;रजिस्टर में लिखा होगा&#8217;। नरसिंहा, पंचायत का कलर्क बताने लगा कि छः लाख रुपये थे बजट में, कितना खर्च हुआ और किस चीज़ पर, और किस बात पर कितना खर्च होगा।</p>
<p>ललिता ने डाँटा कि &#8216;तुम्हें यह सब बातें पता होनी चाहिये। और तुम शीला, तुम्हारा अधिकार है कि तुम इन सब बातों के बारे में पूछो और जानो। तुम जब चाहो इन रजिस्टरों को जाँच सकती हो, क्या तुम्हें समझ नहीं आता?&#8217;</p>
<p>जब वापस चिन्नप्पा के घर की ओर जा रहे थे तो विदा लेने से पहले ललिता हताश हो कर बोली, &#8216;यह बहुत निराशा की बात है। इनको यह जानकारी ही नहीं है। यह कैसे हो सकता है कि यह सरपंच हो कर भी पैसे के बारे में न जाने? यही परेशानी है कि आखिरकार, बड़े फैसले यह अभी भी पुरुषों के हाथ छोड़ देती हैं।&#8217;&#8221;</p></blockquote>
<p>सरपंच होने की क्या ज़म्मेदारी होती है, कैसे काम करना चाहिये, क्या इसकी जानकारी देना आवश्यक नहीं था, इन नये सरपंचों को? कल्पना शर्मा द्वारा लिखी बिहार की वीणा देवी की जीवन कथा में इस प्रश्न का उत्तर मिलता हैः</p>
<blockquote><p>&#8220;क्या राज्य सरकार ने कोई ट्रेनिंग का आयोजन नहीं किया उन महिलाओं के लिए जो ग्राम स्वराज्य की राजनीति में पहली बार चुनी गयी थीं? किया क्यों नहीं, लेकिन दस मिनट की ट्रेनिंग में क्या समझते? उन्हें एक दिन के लिए पटना बुलाया गया था, बस का किराया दिया गया और रजिस्टर में दस्तख्त कराये गये कि वे लोग ट्रेनिंग के लिए आयी थीं। लेकिन हकीकत में उन्हें कुछ सिखाया बताया नहीं गया।&#8221;</p></blockquote>
<p>वीणा को मुखिया के काम बारे में जानकारी मिली एक संवयंसेवी संस्था की सहायता से। उनका साथ दिया पुलिस सुप्रिंटेंडेंट और स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट श्रीमति विजय लक्ष्मी नेः</p>
<blockquote><p>&#8220;वह कहती थीं कि जब सब पुरुष बोल  रहे हैं तो किसी महिला को भी बोलना चाहिये। मैं मना कर देती थी, लेकिन वह ज़ोर देती थीं कि मैं कुछ बोलूँ। उन्होंने मुझे सिखाया कि धन दौलत तो कभी तुम्हारे साथ होती है कभी नहीं होती, लेकिन विचारधारा असली चीज़ है। मेरे पास पैसा नहीं है, एक भिखारन, विधवा औरत हूँ लेकिन मैं दो बार चुनाव जीती हूँ, और जिसने एक लाख का खर्चा किया वह नहीं जीत पाया। मैं बस घर घर हाथ जोड़े हुए गयी। तो कौन बड़ा है, पैसा या विचारधारा?&#8221;</p></blockquote>
<p>यह कहानियाँ बताती हैं कि गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं। कभी उनकी चेष्ठाएँ सफ़ल होती हैं, कभी असफ़ल। केवल प्रशिक्षण और जानकारी से भ्रष्टाचार और पैशेवर राजनीतिज्ञों के फन्दों को नहीं तोड़ा जा सकता। कई औरतों नें बदलते समाज की हिंसा की कीमत अपनी जान से चुकाई है। लेकिन एक बार यह बदलाव शुरु हुआ है जो किसी नदी की तरह अपना रास्ता निकाल ही लेगा, यही आशा की जा सकती है:</p>
<blockquote><p>&#8220;सिकंदरा के लोगों के पास अपने मुखिया के लिए केवल प्रशंसा के शब्द ही हैं। गाँव के चौक में खड़े हुए तो लोगों नें पक्की सड़क और नालियों की ओर इशारा किया। अब उनके घर पानी से नहीं भरते। मुखिया ने तालाब बनवाया है और नदी से पानी लाने के लिए छोटी सी नहर भी जिससे गाँव में पानी आता है। पहले पानी के लिए दूर जाना पड़ता था। और बिना बिजली के गाँव में अब सूर्य की प्रकाश शक्ति से जलने वाली चार बत्तियाँ लगायी हैं जिससे अँधेरे के बाद सड़कों पर औरतों के लिए चलना आसान हो गया है। दलित बस्ती में भी इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत नये घर बन रहे हैं। गाँव में किसी से कोई शिकायत नहीं सुनने को मिली।&#8221;</p></blockquote>
<p>मैं इस किताब को हर उस भारतीय से पढ़ने को कहुंगा जो यह समझते हैं कि वे भारत को जानते हैं और नये प्रगतिशील भारत का निर्माण कर रहे हैं। उनके मन में उन कंचमाओं और चिन्नप्पाओं के प्रति सम्मान जागेगा जो सुदूर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में, कई बार ऐसे खतरे उठाकर भी जिनसे शायद हम डर जायें, छोटे छोटे बदलाव ला रही हैं।</p>
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