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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका | Samayiki - Hindi Webzine</title>
	
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
	<lastBuildDate>Sat, 23 Jan 2010 05:58:37 +0000</lastBuildDate>
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		<title>गुमनामी में बहुत खुश हूँ: फ़ेक आईपीएल प्लेयर</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2010/01/fip-interview/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 22 Jan 2010 19:41:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
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		<description><![CDATA[FIP वापस आ रहा है, पर क्या यह दोबारा इतिहास रचेगा या फिर बीसीसीआई या दूसरों के साथ कानूनी विवादों में गुम होकर रह जायेगा? पढ़िये 'ग्रेट बाँग' अर्नब रे द्वारा लिया साक्षात्कार।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
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<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/JIZoy23WasuWro8zde-4hScYROo/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/JIZoy23WasuWro8zde-4hScYROo/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><p><img class="aligncenter size-full wp-image-180" title="fip" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/01/fip.jpg" alt="" width="425" height="218" /></p>
<div id="section-teaser">
<div class="dropCap">न</div>
<p>क़ली इंडियन प्रीमियर लीग खिलाड़ी &#8211; <strong>फ़ेक आईपीएल प्लेयर</strong> (FIP)  किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पिछले साल, इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान, एक ब्लॉग अचानक प्रकट हुआ जिसे यह समझा गया कि आईपीएल के सबसे लोकप्रिय फ्रेंजाइजी में से एक के गुमनाम खिलाड़ी लिख रहा था। जब FIP ने हारी हुई टीम के अंदरूनी कार्यशैली को अपनी कानी आंख से देख-परख कर सुपर खिलाड़ियों के काले कारनामों को उनके आसानी से कयास लगाए जाने वाले नामों (मसलन कान मोलू और अप्पम चू*या &#8211; जो बाद में हमारी अपनी शब्दावली में भी घुस आए) के जरिए बयान करना शुरू किया तो देखते ही देखते वे इंटरनेट पर सनसनी बन गए।</p>
<p>FIP कौन था? क्या वास्तव में वह एक खिलाड़ी था? या यह मात्र प्रचार की नौटंकी थी? इससे भी महत्वपूर्ण बात, क्या यह सारा सिलसिला सच था? या जैसा कि हम सब ने समझा, अर्ध सत्य था?</p>
<p>FIP की चर्चा हर कहीं होने लगी थी जहाँ कि क्रिकेट की बातें होती थी, और पोस्ट में असली खिलाड़ियों के नकली नामों से की गई छीछालेदर पर मजे लूटते रहे। कुछ खिलाड़ियों पर आशंका जताई गई कि इनमें से कोई FIP हो सकता है, एक समाचार पत्र ने FIP की तथाकथित पहचान को प्रकट किया पर बाद में मुकर गए। तथाकथित फ्रेंचाइजी द्वारा अपने ब्लॉग पर एक आधिकारिक बयान जारी किया गया और जब FIP के पोस्ट और भी ज्यादा सटीक होने लगे तो लोगों का भ्रम और बढ़ता गया। लोगबाग टूर्नामेंट की समाप्ति का उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे, क्योंकि यह प्रतीक्षा न सिर्फ बेहद लंबी थी, बल्कि FIP ने भी तभी अपनी पहचान को उजागर करने का वादा किया था।</p>
<p>उसने अपना वादा निभाया। पर पूरी तरह से नहीं। <a href="http://www.youtube.com/watch?v=9NgrYqcvx1I" target="_blank">एक वीडियो</a> में जिसमें उसकी छाया दिखाई जा रही थी, FIP ने स्वीकारा कि वो कोई खिलाड़ी नहीं है। तो फिर वह कौन था? बस एक भारतीय क्रिकेट प्रशंसक, लेकिन साधारण नहीं। एक ऐसा व्यक्ति जो &#8216;जीवन की अनाम यात्रा&#8217; के दौरान क्रिकेट के संपर्क में आया। बॉलीवुड के बादशाहों से लेकर क्रिकेट के दलालों तक से इनके प्रगाढ़ परिचय ने इन्हें आंतरिक जानकारी के लिहाज से &#8220;अंधेरे का सर्वव्यापी भूत&#8221; या &#8220;हर कहीं मंडराती मक्खी बना दिया था&#8221;।</p>
<p>और, अब FIP वापस आ गया है &#8211; इतिहास को दोबारा रचने। हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक &#8220;गेमचेंजर्स&#8221; के साथ। और इंडीब्लॉगीज़ पर दिये अपने जीवन के पहले साक्षात्कार में वो खुद हाजिर है अपने बारे में कुछ बताने के लिए। <a href="http://fakeiplplayer.blogspot.com/" target="_blank">फ़ेक आईपीएल प्लेयर</a> को 2008 इंडीब्लॉगीज़ का <a href="http://www.indibloggies.org/results-2008" target="_blank">सर्वश्रेष्ठ खेल ब्लॉग का पुरस्कार</a> मिला है। साक्षात्कार लिया इस बार के &#8220;<a href="http://www.indibloggies.org/results-2008" target="_blank">इंडीब्लॉग आफ द ईयर</a>&#8221; पुरस्कार के विजेता <a href="http://greatbong.net/" target="_blank">अर्नब रे</a> ने। इस बातचीत का हिन्दी अनुवाद किया <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> ने।</div>
<p><strong>प्रश्न: FIP ब्लॉग शुरू करने का खयाल कैसे आया? क्या कुछ ऐसा रहा था जो आप लंबे समय से ऐसा करना चाह रहे थे या यह किसी बढ़िया सुबह को अचानक उठी इच्छा थी? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ब्लॉग लिखने की बात मन में अचानक ही उठी। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में, मैंने बोरे भर भर कर रसीली कथाएँ इकट्ठा कर रखी थीं जो मैं कभी कभी अपने करीबी दोस्तों को सुनाया करता था। जाहिर है, दोस्तों को बड़ा मजा आता था। एक सुहानी शाम को, दक्षिण अफ्रीका रवाना होने से पहले मैं और मेरे तीन दोस्त गपशप करते बैठे थे, बीयर के दौर चल रहे थे। तब उनमें से एक ने सुझाव दिया कि मैं क्यों न इन्हें एक ब्लॉग पर छापूं तो इस तरह से वे ताज़ा तरीन कहानियों का आनंद ले सकेंगे। मैंने कहा कि ये तो बहुत अच्छा विचार है। यह बस हम चारों के बीच साझा होने वाली रहस्यमय काली किताब होनी थी। मैंने इसे कभी भी &#8216;निजी&#8217; बनाने की नहीं सोची क्योंकि मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि कभी किसी और को इसके बारे में पता चलेगा।</p>
<p>पर, मैंने यह जरूर सोचा था कि इसे मैं किस तरह से सिर्फ एक चर्चा मंच के बजाय ज्यादा दिलचस्प बनाऊं। मैंने <a title="नकली स्टीव जॉब्स का पर्दाफाश" href="http://nuktachini.debashish.com/254" target="_blank">नकली स्टीव जॉब्स</a> और &#8216;वॉर फॉर द न्यूज़&#8217; के बारे में सोचा। और, संयोग से, जोहेन्सबर्ग की एक उड़ान पर मैंने &#8216;वैग द डॉग&#8217; नाम की फ़िल्म देखी। तो, इस तरह से नकली आईपीएल खिलाड़ी &#8211; FIP का व्यक्तित्व, कुछ मायनों में, इन सभी तीनों से ही प्रभावित था।</p>
<p><strong>प्रश्न: लोग ब्लॉग लिखना शुरू करते हैं, और शोहरत पाने के लिये भयंकर संघर्ष करते हैं। आपने इतनी जल्दी इतना बड़ा पाठक वर्ग बनाने के लिए क्या जादू कर दिया? विशेष रूप से, शुरू शुरू में लोगों को ये कैसे पता लगा कि इधर FIP नाम का एक &#8220;शैतानी&#8221; ब्लॉग भी है? <img src='http://www.samayiki.com/sam/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ईमानदारी से कहूं तो मुझे खुद भी नहीं पता कि बात इतनी जल्दी कैसे फैली। शुरू के कुछ दिनों में तो इस ब्लॉग का मजा लेने के लिए हम चारों के अलावा वहां और कोई नहीं होता था। इसके बाद एक दिन मैंने देखा कि कोई 5 या 6 पाठक, जिन्हें मैं नहीं जानता था, अनुयायी बन चुके हैं। और बहुत से अन्य लोगों ने ब्लॉग पर टिप्पणियाँ भी की थीं। मैंने अपने दोस्तों से पूछा कि क्या उन्होंने इसके बारे में किसी को बताया था तो उन सभी ने कहा कि &#8216;नहीं&#8217;। मुझे लगता है कि कम से कम उनमें से एक ने किसी को बताया तो होगा। [उस समय मैंने इसके बारे में अलग तरह से महसूस किया, लेकिन अब मैं शिकायत नहीं कर रहा हूँ <img src='http://www.samayiki.com/sam/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';-)' class='wp-smiley' /> ]</p>
<p>उस दिन के अस्त होते तक, अनुयायियों की संख्या दुगुनी हो चुकी थी। मैं तब थोड़ा सा परेशान हो गया था। मैंने अपने समूह में सबसे समझदार व्यक्ति को संदेश भेजा और उससे पूछा कि क्या मुझे ये सिलसिला जारी रखना चाहिए। उसकी प्रतिक्रिया थी &#8211; &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217;। तो, मैंने लिखना जारी रखा। कुछेक दिन के बाद, क्रिकइन्फ़ो ने अपने मुख पृष्ठ पर इसे डाल दिया। मुझे याद है कि मैं केकेआर 5 बनाम किंग्स इलेवन टीम का खेल देखने के लिए जाते वक्त किंग्समीड के रास्ते पर था तब मेरे दोस्त ने मुझे बताया कि ब्लॉग क्रिकइन्फ़ो के मुख पृष्ठ पर है। जब तक मैं अपने होटल पहुँचता, अनुयायियों की गिनती 150 हो चुकी थी। आखिर में तो, यह लगभग 9000 तक पहुँच गई थी। मैं हर बार हँसता था जब मुझे इस बात की याद आती था कि जब यह संख्या 15 तक पहुँच गई थी तब मैं कितना डर गया था।</p>
<p><a href="http://www.cricinfo.com/" target="_blank">क्रिकइन्फ़ो</a> को इस ब्लॉग के बारे में बहुत जल्दी पता चल गया था। मेरा अनुमान है कि या तो उन्होंने इसे संयोग से ढूंढ निकाला या किसी ने फेसबुक या कहीं और चेंप दिया होगा और लोगों को नजर आ गया। मैं नहीं जानता। फिर भी, मुझे लगता है कि पहले पहल पता चलने वालों में उनका ही नाम होना चाहिए। उन्होंने कुछ दिनों के लिए निगरानी भी की होगी इस बात की पुष्टि करने के लिए कि जो बातें लिखी जा रही हैं वे सत्य भी हैं या नहीं। जब एक बार वे संतुष्ट हो गए, तो फिर उन्होंने इसे मुख पृ्ष्ठ पर जगह दे दी। उसके बाद तो मेरे ब्लॉग ने गति पकड़ ली।</p>
<p><strong>प्रश्न: आप जो बातें लिखते थे वे काल्पनिक होते थे या तथ्यों पर आधारित? यदि वे तथ्यों पर आधारित होते थे तो क्या टीम के भीतर या प्रेस में आपका कोई खबरी था? </strong></p>
<div id="pullQuoteR">मैं इस अस्वीकरण कि &#8220;इस ब्लॉग के सभी पात्र काल्पनिक हैं&#8221; पर अब भी कायम हूँ। मैंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि प्रबंधन के लिये पर्याप्त सुराग छोड़ूं जिससे वे जानें कि मैं कौन हो सकता हूँ, कौन नहीं।</div>
<p><strong>FIP:</strong> मैं अपने ब्लॉग में निहित इस अस्वीकरण कि &#8220;इस ब्लॉग के सभी पात्र काल्पनिक हैं&#8221; पर अब भी कायम हूँ। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति के साथ कोई समानता, विशुद्ध रूप से संयोग है।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आप कभी इस कथित &#8220;वास्तविक आईपीएल खिलाड़ी&#8221; के व्यक्तित्व को बनाए रखने के सवाल से जुड़ी नैतिकता के बारे में चिंतित हुए? क्योंकि यदि आपकी बातों को गंभीरता से लिया जाता तो टीम के भीतर मारा-मारी मचती और अंततः निर्दोष खिलाड़ियों को संदेह के घेरे में रखा जाता। या आपने यह सोचा रखा था कि अपनी बातों को &#8216;नकली आईपीएल खिलाड़ी&#8217; संबंधी अस्वीकरण के तले &#8216;नकली&#8217; शब्द के जरिए ढांप लिया जाएगा, भले ही ब्लॉग पाठकों को सारा लेखन गप्प की बजाय सचाई लगे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मैंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि मैं प्रबंधन के लिये पर्याप्त सुराग छोड़ूं जिससे वे जानें कि मैं कौन हो सकता हूँ या कौन नहीं। मैं मानता हूं कि शुरुआती दिनों में, जब ब्लॉग अमूमन निजी था तो उस समय मैं इस मोर्चे पर लापरवाह सा था। लेकिन एक बार जब यह लोकप्रिय हो गया और मैंने इसे जारी रखने का फैसला किया, तो मैंने पहले के कुछ लेखों को संपादित किया और यह ध्यान रखा कि किसी विशेष खिलाड़ी को मेरे लेखन की वजह से संदेह के दायरे में नहीं आना चाहिए। वहाँ निश्चित रूप से आपसी मारा-मारी होते रहती थी और मैं इसे बारीकी से देखता था, लेकिन मुझे यकीन था कि किसी निर्दोष खिलाड़ी को मेरे ब्लॉग की वजह से कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ेगी। मुझे टीम प्रबंधन पर भरोसा था कि वो अगर अपना चौथाई दिमाग भी इस्तेमाल करेंगे तो वे ऐसी कोई बेवकूफ़ी नहीं करेंगे।</p>
<p>जब आकाश और बांगड़ को वापस भेजा गया तब मैं चिंतित हुआ था। मैंने कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग बंद कर दी थी, जब तक कि मुझे यह विश्वास नहीं हो गया कि इसका कारण स्वयं आकाश के अलावा अन्य कोई नहीं है। </p>
<p>आपके प्रश्न को मैं थोड़ा सा सही करना चाहूंगा &#8211; मैं हमेशा से बड़ा भारी क्रिकेट प्रशंसक रहा हूं, और पिछले दस वर्षों से मुझे &#8216;खालिस प्रशंसक&#8217; से भी ज्यादा बनने के अवसर मिले, और मेरे विचार में यह बात उस वीडियो पोस्ट में में भी है। लेकिन, आपका कहना सही है, मैं यह ज़रूर मानता था कि ब्लॉग के नाम में &#8216;फ़ेक&#8217; यानि नकली शब्द रहने से मैं तो बरी हो जाता हूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: आप कभी भी अपनी पहचान उजागर करेंगे?यदि नहीं, तो क्यों? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> &#8216;कभी&#8217; के बारे में तो मुझे कुछ पता नहीं है, लेकिन इस समय मैं गुमनामी में बहुत खुश हूँ। कुछेक साल पहले, पेरिस में मेरी एक दिलचस्प आदमी से मुलाकात हुई। वह बहुत पढ़ाकू और जानकार था, पर इसके अलावा वह बहुत सामान्य, मध्यम आयु का व्यक्ति था जो एक फ्रेंच फुटबॉल क्लब में नियमित नौकरी पर था। बेहद साधारण व्यक्तित्व! उसने मुझे एक सप्ताहांत अपनी पत्नी और तीन बच्चों के मेहमान के रूप में अपने घर में आमंत्रित किया। और, जब मैं वहाँ गया तब मुझे एहसास हुआ कि उसका घर तो, घर क्या एक महल है, और खुद वह एक अरबपति है, फुटबॉल क्लब के मालिकों में से एक। मैंने उनसे पूछा कि वे इस तरह लो प्रोफ़ाइल बना कर क्यों रहते हैं। उनकी प्रतिक्रिया थी &#8216;vivre cache pour vivre heureux&#8217; , जिसका अर्थ है &#8216;छुपा जीवन ही खुशगवार जीवन होता है&#8217;।</p>
<p><strong>प्रश्न: पर आप अपनी पहचान उजागर करने से सहसा पलट क्यों गए थे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> संभव है कि मेरी पहचान जाहिर होने से कुछ खिलाड़ियों को, जिन्हें मैं जानता हूं, कुछ समस्या होती। जब मैंने इसके बारे में सोचा तो लगा कि मुझे कोई अधिकार नहीं है कि बिना किसी गलती के मैं उन्हें किसी अजीब स्थिति में डाल दूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आप अन्य ब्लॉगों को पढ़ते हैं? यदि हाँ, तो किन्हें? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरा पसंदीदा ब्लॉग <a href="http://thevigilidiot.com/" target="_blank">thevigilidiot.com</a> है। यह शख्स बेहद मजेदार है। कुरबान फ़िल्म की उसकी समीक्षा पढ़ने के बाद मैंने वास्तव में वो फ़िल्म इसलिए देखी ताकि जान सकूं कि कैसे कोई फ़िल्म दिमाग का दही कर सकने की हद तक बेहूदी हो सकती है।</p>
<p>एक अन्य ब्लॉग मुझे पसंद आता है वो है <a href="http://inclusiveplanet.wordpress.com/" target="_blank">इनक्लूजिव प्लेनेट ब्लॉग</a>। इनक्लूजिव प्लेनेट एक संगठन है जो विकलांगों को सेवाएं प्रदान करता है और उनके ब्लॉग पर दुनिया भर से शारीरिक अक्षम लोग अपने अनुभवों को साझा करते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि आप यहाँ पर शायद ही कभी कोई रोतड़ू, सहानुभूति बटोरने वाली कहानियाँ पाएँगे। यहाँ पर बुद्धिमत्तापूर्ण, विचारोत्तेजक, अच्छी और प्रेरक कथाएँ मिलती हैं। व्यक्तिगत रूप से, इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने एक समुदाय के बारे में बहुत कुछ सीखा है जिसके बारे में मैं बहुत कम जानता था। ब्लॉग पर जब्राथ और गिडी अह्रोनोविच के पोस्ट अवश्य पढ़े।</p>
<p>मुझे यात्रा ब्लॉगों को पढ़ने में भी मजा आता है। <a title="Future Perfect" href="http://janchipchase.com/" target="_blank">Janchipchase.com</a> नोकिया के डिजाइन प्रमुख का ब्लॉग है। वे दुनिया की ऐसी बारीकी से तस्वीरें खींचते हैं, जो दूसरे आमतौर पर अनदेखा कर देते हैं। फिर, यह एक <a href="http://bottomofheart.blogspot.com/" target="_blank">दिलचस्प ब्लॉग</a> है अप्पम चू*या के क्षेत्र से आए आईटी सेल्स पर्सन का जो यूरोप में रहता है और अपने अनुभवों को अपने ब्लॉग में लिखता है। मैं क्रिकइन्फ़ो पेज 2 को भी पसंद करता हूं। उनके पैनल में कुछ मजेदार लेखक हैं। जेमी ऑल्टर, आनंद रामचंद्रन, एंड्रयू ह्यूजेस, निशी नारायण, जॉर्ज बेनाय &#8211; ये सब बहुत अच्छे हैं। प्रेम पणिक्कर का ट्विटर फ़ीड मेरा पसंदीदा है, और कभी कभी मैं &#8216;क्रिकेट विथ बॉल्स&#8217; पर भी निगाह मार लेता हूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: आपका पसंदीदा नाइट राइडर खिलाड़ी कौन रहा है? आपके विचार से टीम में किसे नहीं होना चाहिए था? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरा पसंदीदा नाइट राइडर? असल में बहुत सारे हैं! मुझे लगता है कि ईशांत को वहाँ होना चाहिए था क्योंकि, सीजन 2 के दौरान, उसकी वजह से ही &#8216;नाइट राइडर&#8217; की कुछ अलग तरह से व्याख्या बनी थी। एक तरह से वही सचमुच का &#8216;नाइट राइडर&#8217; था। उसके रहने से खेल का कोरबो-लोड़बो-जीतबो जैसा अंत नहीं होता। </p>
<p>क्रिस गेल का साथ बढ़िया है। वास्तव में, मुझे लगता है, गेल और गिब्स दुनिया में सबसे ज्यादा मजाहिया क्रिकेटर हैं। हालांकि, सबसे मजेदार व्यक्ति जिसके साथ आप एक शाम बिताना पसंद करेंगे वो हैं डेविड लॉयड। ईमानदारी से तो उसे केकेआर का कोच होना चाहिए था। ऐसे में भले ही वे अपने सभी मैच हार जाते लेकिन कम से कम वे मैदान में हँसते-हँसाते तो। </p>
<p>एक और पसंदीदा नाइट राइडर तो जॉन बुकानन का लैपटॉप होना चाहिए। पूरे महीने के लिए उसके लैपटॉप ने उसे किसी कामुक नृत्य करती बार बाला की तरह सम्मोहित कर रखा था। चूंकि वे ज्यादातर समय अपने लैपटॉप की इस उग्र यौन ऊर्जा से विचलित रहते थे, खिलाड़ियों को राहत की सांस लेने का समय मिलता रहता था।</p>
<p>टीम में किसे नहीं होना चाहिए था? अमां, हम सब जानते हैं कि सड़न और बदबू की शुरूआत मछली के सिर से ही होती है।</p>
<p><strong>प्रश्न: FIP की आगे की राह क्या है? क्या वह इस आईपीएल सीजन में वापस आएगा? हमें अपनी पुस्तक के बारे में भी बताएँ। </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ब्लॉग के बारे में, ठीक है, मुझे अभी भी नहीं पता कि मैं सीजन 3 के एक्शन में मैं कहाँ और कितने करीब रहूंगा। इसलिए, इस मोर्चे पर मामला अभी थोड़ा धुंधला है। मेरी किताब &#8216;गेमचेंजर्स&#8217; फरवरी 2010 में जारी हो रही है जिसे मैं पिछले छह महीनों से लिख रहा हूँ। इसमें वह सब कुछ है जो ब्लॉग में नहीं है, या नहीं हो सकता था। इसके बारे में मैं बहुत उत्साहित हूँ।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आपको लगता है कि आपकी किताब ब्लॉग के हल्ला-गुल्ला/विवादास्पद होने के कारण बेस्टसेलर रहेगी? किताब के लोकार्पण के समय क्या आपको बीसीसीआई या दूसरों द्वारा किसी तरह की कोई कानूनी कार्रवाई (मानहानि आदि) का अंदेशा है? </strong></p>
<div id=pullQuoteR>पता नहीं कि ब्लॉग की वजह से किताब की बिक्री में इजाफ़ा होगा या नहीं, लेकिन यह सच है कि अगर ब्लॉग नहीं होता तो ये किताब भी नहीं होती।</div>
<p><strong>FIP:</strong> मुझे नहीं पता है कि ब्लॉग की वजह से किताब की बिक्री में इजाफ़ा होगा या नहीं, लेकिन यह सच है कि अगर ब्लॉग नहीं होता तो ये किताब भी नहीं होती। यह भी सच है कि यदि यह ब्लॉग नहीं होता तो हार्पर कॉलिन्स मुझे किसी घोड़े के पिछवाड़े से ज्यादा कुछ नहीं समझते।</p>
<p><strong>प्रश्न: अपने प्रशंसकों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरे ब्लॉग के अनुयायियों और उस पर टिप्पणी करने वालों को दिली शुक्रिया। आप सब ने मुझे ताक़त दी। ब्लॉगिंग के अनुभव के दौरान, मैंने यह अनुभव किया कि किसी के चरित्र में सार्वजनिक लोकप्रियता का कितना दुष्प्रभाव हो सकता है। &#8216;जबर्दस्त&#8217;, &#8216;शानदार&#8217;, &#8216;बेहतरीन&#8217; जैसे शब्द आपको भीतर से थोथा, अहंकारी बना सकते हैं। और इसका नतीजा होता है एक भद्दी पोस्ट, फिर वही लोग पिन चुभाकर आपका गुब्बारा पिचका देते हैं और आपके सही आकार में वापस ले आते हैं। मुझे लगता है कि ब्लॉग के अनुयायी फूल और पत्थर संतुलित तरीके से फेंकते हैं, और इसलिए उन्हें मेरा दिली धन्यवाद। मुझे आशा है कि वे मेरी किताब को भी पसंद करेंगे। इसके अलावा, ब्लॉग की सफलता का 50% हिस्सा तो टिप्पणियों की वजह से ही आया है। ऐसे कई लोग हैं जो ब्लॉग पर सिर्फ टिप्पणियाँ पढ़ने के लिए आते थे। उनमें से कुछ तो बहुत मज़ेदार थे।</p>
<p class="note">इस बातचीत का हिन्दी अनुवाद किया रविशंकर श्रीवास्तव ने।</p>
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		<title>नटाल: माइक्रोसॉफ़्ट  का नया गेमिंग आविष्कार</title>
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		<pubDate>Thu, 14 Jan 2010 19:01:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विनय जैन</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अगर आपके विडियो गेम से गेम नियंत्रक या वायरलेस रिमोट कण्ट्रोल हटा दें या फिर ये गेम खेलना मैदान में खेलने जैसा ही बन जाये तो कैसा हो? पढ़ें <b>विनय जैन</b> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
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<div class=dropCap>वि</div>
<p>डियो गेम! यह सुनकर आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? और जो भी आता हो, अपने हाथ में आपको कुछ न कुछ ज़रूर दिखता होगा। जैसे कि कोई मोबाइल गेमिंग यंत्र, या फिर तारों और बटनों वाला गेम नियंत्रक, या कम से कम एक वायरलेस रिमोट कण्ट्रोल।</p>
<div id="boxR">
<h2>बच्चों का खेल नहीं ये!</h2>
<p>विडियो गेम कोई छोटा-मोटा बाज़ार नहीं है। टेलीग्राफ अखबार की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में पिछले साल लोगों ने फ़िल्मों से ज़्यादा पैसे विडियो गेमों पर खर्च किए। जाहिर है कि ये अब महज़ लड़कपन के खेल नहीं रहे बल्कि मनोरंजन के स्रोतों की मुख्याधारा का हिस्सा बन चुके हैं। इन गेमों के प्रति आम राय यह है कि ये हिंसा को बढ़ावा देते हैं, बेहद बिकने वाले &#8220;कॉल आफ ड्यूटी&#8221; जैसे गेमों की इस कारण काफी निंदा हुई है। जानकार मानते हैं कि निंतेंडो ने यह साबित कर दिखाया है कि छोटे बच्चे, औरतें और उम्रदराज़ भी इन गेमों का मज़ा उठा सकते हैं।</p></div>
<p>भले ही इंटरनेट-पीढ़ी के लिए, जो हाथ में माउस के साथ बड़ी हुई है, यह कोई अजीब या दुविधा वाली बात न हो पर दुनिया के ज्यादातर बाशिंदों के लिए खेल में हाथ का बँधा होना एक झंझट-सा ही है। कुछ सालों पहले निंतेंडो ने सेंसरयुक्त वीमोट (एक तरह का रिमोट नियंत्रक) के जरिए तारों के साथ-साथ बटनों से खिलाड़ियों को आज़ादी दी। निंतेंडो के इस गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म वी (Wii) ने क्रांतिकारी रूप से विडियो खेलों को आम ड्राइंग रूमों तक पहुँचा दिया। और खिलाड़ियों को सोफ़े-कुर्सी से उठाकर खड़ा कर दिया।</p>
<p>माइक्रोसॉफ़्ट के खेल वैज्ञानिक अब वहाँ से इसे आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं, एक नये, लगभग चमत्कारी, आविष्कार <strong>प्रोजेक्ट नटाल</strong> के साथ।</p>
<p>प्रोजेक्ट नटाल कूटनाम है माइक्रोसॉफ़्ट के एक नये गेमिंग आविष्कार का। इस पर अभी काम चल रहा है। यह माइक्रोसॉफ़्ट के XBoX 360 प्लेटफ़ॉर्म के साथ काम करेगा। एक्सबॉक्स के इस एड-ऑन के जरिये खेलने वाले बिना किसी बाहरी नियंत्रक के खेल और मनोरंजन को नियंत्रित कर सकेंगे। कैसे? अपने शरीर की स्वाभाविक नियंत्रण प्रक्रिया से &#8211; यानी बोलकर या हाथ-पैर हिलाकर।</p>
<p>यह एड-ऑन दरअसल संवेदकों (Sensors) का एक समूह होगा। एक लगभग 9-इंच चौड़ी पट्टी, जिसे आपके टीवी या कम्प्यूटर स्क्रीन के ऊपर या नीचे रखा जा सकेगा, के भीतर एक कैमरा, एक गहराई-संवेदक, और बहु-व्यूही (Multiarray) माइक्रोफ़ोन होंगे। बाक़ी काम सॉफ़्टवेयर करेगा। इसके जरिये पूरे शरीर का त्रिआयामी चित्रण, चेहरे की पहचान, आवाज़ की पहचान आदि संभव होंगे।</p>
<p>चीज़ ऐसी है कि बिना देखे यकीन आना मुश्किल है। इसकी एक झलक नीचे दिये विडियो पर देखें।</p>
<p><center><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="500" height="315" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="align" value="center" /><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/I9tmr8VDqN8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999&amp;border=1" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="500" height="315" src="http://www.youtube.com/v/I9tmr8VDqN8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999&amp;border=1" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" align="center"></embed></object></center></p>
<p>ताज़ा अनुमानों के अनुसार, प्रोजेक्ट नटाल इस साल के नवंबर तक ख़रीदने के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इसे वर्तमान एक्सबॉक्स कन्सोलों के साथ जोड़ कर इस्तेमाल किया जा सकेगा।</p>
<p>तो खिलाड़ियो! माउस छोड़िये, उस रिमोट को उधर फेंकिये और अपने हाथ-पैर खोलने को तैयार हो जाइए। और ज़रा एक शाबासी माइक्रोसॉफ़्ट के लिए भी हो जाए (अब ऐसी भी क्या नाराज़गी)। विडियो गेमों की दुनिया में अगली क्रांति का सेहरा उन्हीं के माथे है।</p>
<p class="note">अधिक जानकारी के लिये <a href="http://www.xbox.com/projectnatal" target="_blank">प्रोजेक्ट नटाल की वेबसाइट</a> भी देखें।</p>
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		<title>ग्रामीण भारत की बदलती नारी</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/12/sarpanch-sahib-review/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 16:00:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Panchayat]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[बीते 20 सालों में कुछ ग्रामीण औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल, पंचायती राजनीति में कदम रख ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश की है। उन्हीं की कथायें है "सरपंच साहिब" में। पढ़िये <b>डॉ सुनील दीपक</b> की समीक्षा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zQClB2EhMJOTxyie15dmV0VfyFA/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zQClB2EhMJOTxyie15dmV0VfyFA/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zQClB2EhMJOTxyie15dmV0VfyFA/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zQClB2EhMJOTxyie15dmV0VfyFA/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><blockquote><p>&#8220;दीपांजलि बात करती है कि धीरे धीरे पंचायत और पंचायत समिति के पुरुष सदस्य उससे कटते जा रहे हैं, विषेशकर धनुर्जय पटेल जो कि सरकारी नौकरी में हैं, जिसकी वजह से उनके पास बहुत ताकत है। जब किसी बात पर उनके विचार नहीं मिलते तो धनुर्जय पटेल उसका कड़ा विरोध करते हैं। पटेल के अपने विचार हैं, वह कहते हैं &#8211; पुरुष सरपंच बेहतर होते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता कि किस तरह से काम किया जाये। महिला सरपंचों को कुछ अधिक नहीं आता। हमें उन्हें सिखाना पड़ता है। कभी कभी वह चालाकी दिखाती हैं और कैसे काम किया जाये इस बात के निर्देश ही भूल जाती हैं।</p>
<p>&#8230;वह लोग अफवाह फ़ैला रहे हें कि दीपांजलि का नये बीडीओ के साथ चक्कर है, क्योंकि वह उसकी बात सुनता है, औरों की नहीं। उसके पति को मालूम है कि लोग बातें कर रहे हैं। वह कहते हैं कि उसका चक्कर है&#8230;! इस नये शोषण का अर्थ दीपांजलि अच्छी तरह समझती है। उसके घावों में घुसा कर चाकू घुमाने वाली बात है। वह सरपंच है पर साथ ही पत्नी, माँ, स्त्री भी तो है &#8211; शरीर, सेक्स और लिंग।&#8221;</p></blockquote>
<div id="pullQuoteR">गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं।</div>
<div class="dropCap">भा</div>
<p>रतीय समाज में नारी के स्थान की बात हो तो अक्सर गार्गी, दुर्गा, शक्ति से ले कर विज्ञान, तकनीकी, शौध, गणिकी जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली युवतियों से हो कर, इंदिरा गाँधी, मायावती जैसी नेताओं के उदाहरण दे कर हम अपना गर्व व्यक्त करते हैं कि भारत ने इस दिशा में कितनी तरक्की की है, कैसे हर क्षेत्र में नारियाँ पुरुषों से कदम से कदम मिला कर बढ़ रही हैं। इस बदलते भारत में जहाँ एक ओर नारी विकास और प्रगति की बात होती है, वहीं दूसरी ओर दहेज के लिए पीड़ित होने वाली या जला दी जाने वाली औरतों की बात भी होती है। <em>अल्ट्रासाउंड </em>जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से होने वाली भ्रूण हत्याओं की बात भी होती है। लेकिन यह सब बातें अधिकांश छोटे बड़े शहरों में रहने वाली औरतों की होती है। भारत के गाँव कितना बदल रहे हैं और गांवों में रहने वाली औरतों की स्थिति क्या है, इस पर बात या तो कम होती है या फिर बिल्कुल नहीं होती।</p>
<p>गाँवों में रहने वाली इन्हीं औरतों की बात करती है 2009 में हार्पर कॉलिंस द्वारा प्रकाशित व मंजिमा भट्टाचार्य द्वारा संपादित पुस्तक &#8220;सरपंच साहिब ‍ चेंजिंग द फेस आफ इंडिया&#8221;। पिछले दो दशकों में कुछ औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल कर पंचायती राजनीति में कदम रखा है और चुनावों में सफलता भी पायी है, और सरपंच बन कर ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश कर रही हैं। उन्हीं औरतों की कुछ जीवन कथाएँ हैं इस किताब में।</p>
<p><img class="size-full wp-image-175 alignleft" style="margin: 8px;" title="sarpanch_sahib" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/12/sarpanch_sahib.jpg" alt="sarpanch_sahib" width="350" height="317" />1993 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय संविधान में 73वाँ सँशोधन किया जिसमें पंचायती राज के लिए चुनावों की बात थी और इन चुनावों में एक तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित की गयी थीं। इस बदलाव को &#8220;मौन क्रांति&#8221;, &#8220;हमारे समय का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग&#8221; और &#8220;जनता के स्तर पर होने वाले जनतंत्र का दुनिया का सबसे बेहतरीन नवप्रयोग&#8221; आदि कहा गया है। इस कानून की वजह से 30 लाख महिलाएँ राजनीति में आयी हैं जिसमें से करीब दस लाख से अधिक महिलाएँ चुनाव में जीत कर पंचायती राज का हिस्सा बनी हैं। दूसरी ओर, इस प्रयोग को &#8220;दिखावा&#8221; भी कहा गया है और आरोप लगाया गया है कि असली ताकत तो पतियों, पिताओं व ससुरों के हाथों में है जिनके हाथों में यह चुनी हुई महिलाएँ केवल कठपुतलियाँ भर होती हैं।</p>
<p>सन 2006-07 की पंचायती राज की स्थिति की रिपोर्ट में पाया गया था कि विभिन्न राज्यों में पंचायत सदस्यों में महिलाओं की संख्या आरक्षित सीटों को पार कर चुकी है, पंचायतो़ में 37 से 54 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ हैं। 2008 में लिखी एक अन्य जाँच में पाया गया कि इनमें से अधिकतर महिलाएँ निर्णय लेने के लिए अपने पति या अन्य पुरुषों पर निर्भर नहीं हैं, अपने निर्णय स्वयं लेती हैं। लेकिन इन रिपोर्टों के बारे में जनसामान्य में कुछ न कुछ शंका ही रहती है, न जाने सरकारी जाँच कितना सच बताती हैं और कितना झूठ।</p>
<p>मंजिमा की किताब में ऐसी ही कुछ महिला सरपंचों की कहानियाँ है जिन्हें लिखा है जानी मानी लेखक, पत्रकार या अन्य क्षेत्रों से प्रमुख महिलाओं ने, जिनमें शामिल हैं इंदिरा माया गणेश, तिशानी दोषी, मंजु कपूर, अभिलाषा ओझा, <a href="http://soniafaleiro.blogspot.com/" target="_blank">सोनिया फलेरो</a> और कल्पना शर्मा। यह जीवन कथाएँ उड़ीसा, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, असम, बिहार, कर्नाटक आदि विभिन्न राज्यों में संविधान के 73वें संशोधन के असर की जटिलता को समझने में सहायता करती हैं। साथ ही यह कहानियाँ यह भी बताती हैं कि ग्रामीण सामाजिक बदलाव इतना आसान नहीं है, लेकिन हो सकता है।</p>
<p>तमिलनाडू की चिन्नप्पा की जीवन कथा को तिशानी दोषी ने लिखा है। इस कहानी से महिला सरपंचों की कुछ कठिनाईयों को समझ सकते हैं:</p>
<blockquote><p>&#8220;नम्बर चिन्नप्पा की कमजोरी हैं। अनपढ़ होने की वजह से उसके मन में गणित विषय के लिए भय है। जब ललिता ने उससे पूछा कि पंचायत के बजट में कितने पैसे हैं तो वह बता नहीं पायी, बोली, &#8216;रजिस्टर में लिखा होगा&#8217;। नरसिंहा, पंचायत का कलर्क बताने लगा कि छः लाख रुपये थे बजट में, कितना खर्च हुआ और किस चीज़ पर, और किस बात पर कितना खर्च होगा।</p>
<p>ललिता ने डाँटा कि &#8216;तुम्हें यह सब बातें पता होनी चाहिये। और तुम शीला, तुम्हारा अधिकार है कि तुम इन सब बातों के बारे में पूछो और जानो। तुम जब चाहो इन रजिस्टरों को जाँच सकती हो, क्या तुम्हें समझ नहीं आता?&#8217;</p>
<p>जब वापस चिन्नप्पा के घर की ओर जा रहे थे तो विदा लेने से पहले ललिता हताश हो कर बोली, &#8216;यह बहुत निराशा की बात है। इनको यह जानकारी ही नहीं है। यह कैसे हो सकता है कि यह सरपंच हो कर भी पैसे के बारे में न जाने? यही परेशानी है कि आखिरकार, बड़े फैसले यह अभी भी पुरुषों के हाथ छोड़ देती हैं।&#8217;&#8221;</p></blockquote>
<p>सरपंच होने की क्या ज़म्मेदारी होती है, कैसे काम करना चाहिये, क्या इसकी जानकारी देना आवश्यक नहीं था, इन नये सरपंचों को? कल्पना शर्मा द्वारा लिखी बिहार की वीणा देवी की जीवन कथा में इस प्रश्न का उत्तर मिलता हैः</p>
<blockquote><p>&#8220;क्या राज्य सरकार ने कोई ट्रेनिंग का आयोजन नहीं किया उन महिलाओं के लिए जो ग्राम स्वराज्य की राजनीति में पहली बार चुनी गयी थीं? किया क्यों नहीं, लेकिन दस मिनट की ट्रेनिंग में क्या समझते? उन्हें एक दिन के लिए पटना बुलाया गया था, बस का किराया दिया गया और रजिस्टर में दस्तख्त कराये गये कि वे लोग ट्रेनिंग के लिए आयी थीं। लेकिन हकीकत में उन्हें कुछ सिखाया बताया नहीं गया।&#8221;</p></blockquote>
<p>वीणा को मुखिया के काम बारे में जानकारी मिली एक संवयंसेवी संस्था की सहायता से। उनका साथ दिया पुलिस सुप्रिंटेंडेंट और स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट श्रीमति विजय लक्ष्मी नेः</p>
<blockquote><p>&#8220;वह कहती थीं कि जब सब पुरुष बोल  रहे हैं तो किसी महिला को भी बोलना चाहिये। मैं मना कर देती थी, लेकिन वह ज़ोर देती थीं कि मैं कुछ बोलूँ। उन्होंने मुझे सिखाया कि धन दौलत तो कभी तुम्हारे साथ होती है कभी नहीं होती, लेकिन विचारधारा असली चीज़ है। मेरे पास पैसा नहीं है, एक भिखारन, विधवा औरत हूँ लेकिन मैं दो बार चुनाव जीती हूँ, और जिसने एक लाख का खर्चा किया वह नहीं जीत पाया। मैं बस घर घर हाथ जोड़े हुए गयी। तो कौन बड़ा है, पैसा या विचारधारा?&#8221;</p></blockquote>
<p>यह कहानियाँ बताती हैं कि गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं। कभी उनकी चेष्ठाएँ सफ़ल होती हैं, कभी असफ़ल। केवल प्रशिक्षण और जानकारी से भ्रष्टाचार और पैशेवर राजनीतिज्ञों के फन्दों को नहीं तोड़ा जा सकता। कई औरतों नें बदलते समाज की हिंसा की कीमत अपनी जान से चुकाई है। लेकिन एक बार यह बदलाव शुरु हुआ है जो किसी नदी की तरह अपना रास्ता निकाल ही लेगा, यही आशा की जा सकती है:</p>
<blockquote><p>&#8220;सिकंदरा के लोगों के पास अपने मुखिया के लिए केवल प्रशंसा के शब्द ही हैं। गाँव के चौक में खड़े हुए तो लोगों नें पक्की सड़क और नालियों की ओर इशारा किया। अब उनके घर पानी से नहीं भरते। मुखिया ने तालाब बनवाया है और नदी से पानी लाने के लिए छोटी सी नहर भी जिससे गाँव में पानी आता है। पहले पानी के लिए दूर जाना पड़ता था। और बिना बिजली के गाँव में अब सूर्य की प्रकाश शक्ति से जलने वाली चार बत्तियाँ लगायी हैं जिससे अँधेरे के बाद सड़कों पर औरतों के लिए चलना आसान हो गया है। दलित बस्ती में भी इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत नये घर बन रहे हैं। गाँव में किसी से कोई शिकायत नहीं सुनने को मिली।&#8221;</p></blockquote>
<p>मैं इस किताब को हर उस भारतीय से पढ़ने को कहुंगा जो यह समझते हैं कि वे भारत को जानते हैं और नये प्रगतिशील भारत का निर्माण कर रहे हैं। उनके मन में उन कंचमाओं और चिन्नप्पाओं के प्रति सम्मान जागेगा जो सुदूर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में, कई बार ऐसे खतरे उठाकर भी जिनसे शायद हम डर जायें, छोटे छोटे बदलाव ला रही हैं।</p>
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		<item>
		<title>गैस आंदोलन ने दी अपारंपरिक शिक्षा</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/12/bhopal-movement-as-a-school/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 03:30:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>यूरिग स्कैनद्रेत</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Bhopal]]></category>
		<category><![CDATA[Gas Tragedy]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Union Carbide]]></category>

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		<description><![CDATA[भोपाल गैस त्रासदी के 25 वर्ष पर यूरिग सैनदरेट बता रहे हैं कि किस तरह से गरीब और निरीह जनता ने नित्य प्रति जीवन में दमन के प्रति पहले लचीलापन दिखाया और इसे प्रतिरोध तथा राजनैतिक प्रतिवाद में कैसे बदला।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Tgi34bioApoXFJmrVxIJ8nmHBDA/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Tgi34bioApoXFJmrVxIJ8nmHBDA/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Tgi34bioApoXFJmrVxIJ8nmHBDA/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Tgi34bioApoXFJmrVxIJ8nmHBDA/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><div class="dropCap">पि</div>
<p>छले 25 वर्षों से भोपाल के गैस पीड़ित न्याय के लिए आंदोलनरत हैं। यह आंदोलन अपने आप में विशिष्ट है सिर्फ इस लिए नहीं कि इसमें बहुत से मुद्दों जैसे कि मुआवजा, रोजगार, राशन, पेंशन, स्वास्थ्य सेवा, जल संदूषण तथा वातावरण सुधार को शामिल किया गया है। यह इसलिए भी विशिष्ट है कि इस आंदोलन में प्रमुख तौर पर अल्पशिक्षित गरीब स्त्रियाँ शामिल हैं जो रसायन अभियांत्रिकी, वातावरण प्रदूषण, कानूनी तर्कों तथा चिकित्सा विज्ञान जैसे जटिल मुद्दे उठाए हुए हैं।</p>
<p>द भोपाल सर्वाइवर्स मूवमेंट स्टडी द्वारा इस संघर्ष का दस्तावेजीकरण इस आंदोलन के उत्तरजीवित-कार्यकर्ताओं तथा उनके समर्थकों के साक्षात्कारों के जरिए किया जा रहा है। इस शोध की एक बड़ी मंशा यह भी है कि इस बात की पड़ताल की जाए कि अति अल्प शिक्षित जनता ने इस संघर्ष में किस तरह जुड़ना सीखा।</p>
<div id="pullQuoteR">यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री शहर के उत्तरी दिशा में था। गैस त्रासदी का एक बड़ा प्रभाव गरीब, दिहाड़ी कामगारों तथा अत्यल्प शिक्षित लोगों पर पड़ा था।</div>
<p>1984 में जब गैस त्रासदी हुई, साक्षरता अत्यंत निम्न थी। 1981 की जनगणना के हिसाब से मध्यप्रदेश की साक्षरता 34% थी जिसमें महिलाओं की साक्षरता मात्र 19% थी। यहाँ तक कि स्कूल जाने वाली महिलाओं की सामाजिक रूढ़िवादिता उनके शिक्षा के स्तर पर सीमित थी। भोपाल एक अत्यंत तीव्रगति से फैलता शहर था जिसमें मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन का दर अपेक्षाकृत ऊँचा था। यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री शहर के उत्तरी दिशा में था। गैस त्रासदी का एक बड़ा प्रभाव गरीब, दिहाड़ी कामगारों तथा अत्यल्प शिक्षित लोगों पर पड़ा था।</p>
<p>त्रासदी के समय की अपनी अज्ञानता का बयान बहुत से उत्तरजीवित कार्यकर्ता करते हैं। ट्रेड यूनियन भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन की शुरूआती कार्यकर्ता रेहाना बेगम जिसने त्रासदी से पहले अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण कर ली थी, शिक्षा के भिन्न स्तरों के उत्तरजीवितों के दृष्टिकोण को कुछ इस तरह से बयान करती हैं:</p>
<blockquote><p>“हमें यूनियन, राज्य या फिर राज्य के मुख्यमंत्री इत्यादि की अवधारणा के बारे में कुछ भी नहीं पता था… आमतौर पर हम मुसलमान घरेलू महिलाएँ थीं, जिनके पास बातचीत या प्रचार या किसी भी अन्य बातों का कोई भान ही नहीं था।”</p></blockquote>
<p>बहुत सी ऐसी महिलाएं जो अल्प शिक्षित हैं या अशिक्षित हैं उनकी कहानियाँ बड़ी प्रभावशाली रही हैं जिन्होंने राज्य तथा मल्टीनेशनल कार्पोरेशन के सामने अपनी बातें रखनी सीखीं।</p>
<p>संघर्ष के समय सीखने की पहली तथा संभवत: प्रमुख बात जेम्स सी स्काट ने बताया है &#8211; “कमजोर का शस्त्र” &#8211; उत्पीड़न को दिन पर दिन लचीला रुख बनाकर सह लेना। राबिया बी बताती हैं कि कैसे उन्होंने खुद सीखा और अपने साथी कामगारों को सिखाया कि आर्थिक पुनर्वास के लिए बनाए गए स्वावलंबन ड्रेस निर्माण केंद्रों में फैले भ्रष्टाचार से कैसे फायदा उठाया जाए:</p>
<blockquote><p>“केंद्र का पूरा तंत्र भ्रष्ट था। शीर्ष क्रम के लोग हर तरफ से पैसा बना रहे थे। वे हर स्तर से कमीशन पा रहे थे। जब भी सामानों के लिए टेंडर होते थे तो अराजकता मचती थी, लोगों को बटन जैसे छोटी से छोटी चीज पर भी कमीशन हासिल होती थी। तो मैंने वहाँ काम कर रही महिलाओं के लिए अतिरिक्त कमाई के तरीके जुगाड़े। मैंने उन्हें बताया कि वे किस तरह से अतिरिक्त आय के लिए कपड़े के चिंदों की बचत कर सकती हैं। उस समय ढेरों घोटाले होते थे &#8211; केंद्र के लिए जारी कपड़े के थान रास्ते में ही चोरी हो जाते थे। जब ऊपर बैठे सभी लोग पैसा बना रहे थे तो फिर हम भी क्यों न कुछ पैसे बना लें?”</p></blockquote>
<p>परंतु रोज का यह लचीलापन शोषण के मुकाबले पूरी तरह अपर्याप्त था। लचीलापन अंतत: प्रतिरोध में परिवर्तित होता चला गया। राजनैतिक विरोध के लिए कौशल और रणनीति को सामान्य ज्ञान, ट्रायल एंड एरर, दोस्ताना सलाह, भरोसेमंद समर्थकों के मार्गदर्शन और थोड़ी सी अक्लमंदी से प्राप्त किया गया।</p>
<p>हमीदा बी, जिसकी शादी 11 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई थी, और जो 14 वर्ष की उम्र में मां बन गई थी, पारंपरिक रूप से अत्यल्प शिक्षित थी। परंतु भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन में उनकी अपनी सक्रियता के चलते उनके लिए ज्ञान के अनेक कपाट खुलते गए। वे जोर देती हैं -</p>
<blockquote><p>“हम अपनी बैठकों में स्त्रियों के अधिकारों से जुड़ी समस्याओं जैसे कि दहेज प्रथा, उत्पीड़न इत्यादि मुद्दे उठाते थे। हमने अन्य आंदोलन जैसे कि नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) का भी समर्थन किया है। शंकर गुहा नियोगी के भिलाई आंदोलन को बीजीपीएमयूएस से समर्थन मिला”</p></blockquote>
<p>कुछ समूहों के लिए आंदोलन में सीखना एक तरह से अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों के संपर्क में जुड़ना रहा है। भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी यूनियन की रशीदा बी अंतरराष्ट्रीय समूहों जैसे कि ग्रीनपीस के साथ काम कर चुकी हैं। वे कहती हैं:</p>
<blockquote><p>“यूनियन कार्बाइड की दीवार के आसपास बहुत से लोग थे जो बीमार हो गए थे। वे क्यों बीमार हो रहे थे? 1999 की रपट के बाद यह साबित हो गया कि पानी संदूषित है। जल संदूषण के बारे में सुन सुनकर इतने वर्षों में जो मैंने जाना और सीखा उससे मैंने पाया कि यह तो दुनिया को बचाने जैसा काम है। मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि जो संदूषण फैलाते हैं, कानूनन उन्हें इसका मुआवजा देना ही चाहिए।”</p></blockquote>
<p>अनौपचारिक शिक्षा संकीर्ण नहीं है। यह सिर्फ संघर्ष के लिए लागू नहीं है, और न ही इस बात के लिए कि इसके लिए क्या सर्वोत्तम है, बल्कि इस लिए भी कि अन्य मुद्दे भी उत्तरजीवितों के मन में हैं। हमारे साक्षात्कारों से कुछ दिलचस्प बहसें उजागर हुईं। हिन्दू और मुसलिम दोनों ही अपने धार्मिक कर्मकाण्डों को नए सिरे से पारिभाषित करते नजर आए जिसमें दमनकारी तत्वों को नकारने का भाव रहा था।</p>
<p>उदाहरण के लिए राबिया बी बुरका पहनने की प्रथा की आलोचना कुछ इस तरह करती हैं:</p>
<blockquote><p>“मैं संगठन में बुरका पहनकर ही पहली मर्तबा शामिल हुई क्योंकि मेरे पति एक मौलवी थे, और मैं बहुत ही रूढ़िवादी परिवार से थी। जल्द ही मैंने बुरका पहनना छोड़ दिया क्योंकि समाज में बुरकानशीं औरतों को बहुत ही निम्न नजरों से देखा जाता है। उन्हें मूर्ख, अनपढ़ और अशिष्ट माना जाता है। जब हम बुरका पहनकर शासकीय कार्यालयों में जाते थे तो अफसर हमसे बहुत ही बुरी तरह से पेश आते थे। जबकि साड़ी पहन कर जाने पर वे सम्मान पूर्वक व्यवहार करते थे। यह कोई सांप्रदायिक बात नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अनुकूलन जैसा है।”</p></blockquote>
<p>आईसीजेबी की हाजरा बी धार्मिक प्रथा के पीछे इन नवसुधार पर विचार करती हैं:</p>
<blockquote><p>“बुरका का उद्देश्य है पर्दा। किसी औरत के लिए जो बुरका ओढ़ती है, उसके लिए बुरका एक पर्दा है। बुरका का अर्थ ये है कि चेहरे पर घूँघट डाल लिया जाए जिसे अपरिचित पुरुषों के सामने नहीं उठाया जाए। इस संसार में हर किस्म की पर्दा प्रथा है और कई मुश्किल परिस्थितियों में पर्दानशीं महिलाओं को बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ता है। बहुत सी महिलाएँ कामगार हैं जो सिलाई, कढ़ाई, बुनाई का काम करती हैं या दिहाड़ी काम करती हैं या घरों में झाड़ू-बर्तन-पोंछा का काम करती हैं। वो अपने घर से बुरके में निकलती है, काम पर बुरका फेंक निकालती है, और जब वो अपना काम खत्म कर फिर वापस घर के लिए निकलती है तो बुरका ओढ़ लेती है।</p>
<p>तो मुझे लगता है कि यदि कोई महिला अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, या वो अपने परिवार का भरण पोषण करती है या वो अपने बच्चों की देखभाल करती होती है तो उसे बुरका पहनने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जब वो कमाने धमाने के लिए बाहर निकलती है तो फिर बुरके का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए। मुझे इस तरह के बुरके में कोई विश्वास नहीं है। बुरका या पर्दा वहीं ठीक है जहाँ औरत अपने पति पर निर्भर है और घर की चारदीवारी के भीतर होती है।”</p></blockquote>
<p>कार्यकर्ता जिस तरीके से राजनैतिक संघर्ष में शामिल होकर अपारंपरिक शिक्षा प्राप्त करते हैं, वह हम सब के लिए, जो कि पेशेवराना जिम्मेदारियों में पारंपरिक शिक्षित होते हैं, एक महत्वपूर्ण पाठ है। उनके संघर्ष को समर्थन देने के लिए शैक्षणिक ज्ञान व प्रशिक्षण लाने के लिए सामाजिक आंदोलनों में जुटने के लिए पारंपरिक बुद्धिजीवियों के लिए भूमिकाएँ हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">अंग्रेज़ों के समय बुद्धिजीवी महत्वपूर्ण पदों पर होने के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के खिलाफ थे। ऐसा ही फ्रांसीसी व रूसी क्रांति के समय हुआ था। बुद्धिजीवी हमेशा शासकों का साथ देते हैं।</div>
<p>हालांकि राबिया बी चेताती हैं,</p>
<blockquote><p>“मैंने जाना है कि अनपढ़ व्यक्ति किसी शिक्षित व्यक्ति के मुकाबले बड़ा खतरा है। शिक्षित सोचते हैं कि वे अपनी विद्वता का प्रयोग दूसरों को उल्लू बनाने में कर सकते हैं।”</p></blockquote>
<p>अब्दुल जब्बार के लिए, पारंपरिक रूप से शिक्षित लोगों से सीखने में बड़ा जोखिम है।</p>
<blockquote><p>“आंदोलन के प्रथम 10 वर्षों में ऐसा लगा था कि नर्मदा बचाओ आंदोलन के तर्ज पर सक्रिय बुद्धिजीवियों को जोड़ा जाना उत्तम विचार है। पर अब ऐसे लोग भोपाल गैस आंदोलन को नकार रहे हैं और वे इसे उपद्रव के रूप में देखने लगे हैं। उनमें इसके संघर्ष का माद्दा ही नहीं है। मुझे लगता है कि वे एक आम आदमी की समस्या से जुड़ नहीं पा रहे चूंकि उनका अनुभव पूरी तरह से किताबी है&#8230;अंग्रेज़ों के राज में आमतौर पर बुद्धिजीवी सिस्टम में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ थे और वे स्वतंत्रता आंदोलन की राह में प्रमुख रोड़े थे। ठीक ऐसा ही फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति के समय हुआ था। बुद्धिजीवी हमेशा शासकों का साथ देते हैं। तो मैं यह कह सकता हूं कि अशिक्षित जनता जिसके पास ‘साहित्यिक’ ज्ञान नहीं होता, वही शिक्षित जनता की अपेक्षा ज्यादा न्याय ला सकती है।</p>
<p>मैंने यह महत्वपूर्ण बात अपने गुरु शंकर गुहा नियोगी (छत्तीसगढ़ के भिलाई संगठन आंदोलन के नेता जिसकी हत्या कर दी गई थी) से सीखी थी। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि विश्व की सभी बड़ी समस्याएँ शिक्षित वर्गों द्वारा ही सृजित हैं।”</p></blockquote>
<p class="note"><a href="http://infochangeindia.org" target="_blank">इंफोचेंज इंडिया</a> से पूर्वानुमति से प्रकाशित। हिन्दी अनुवाद के लिये <a href="http://raviratlami.blogspot.com" target="_blank">रवि रतलामी जी</a> का शुक्रिया! यह आलेख प्रकाशित होने वाली पुस्तक &#8211; <em>भोपाल सर्वाइवर्स स्पीक : इमर्जेंट वाइसेस फ्रॉम ए पीपुल्स मूवमेंट</em> के अंश हैं।</p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=173&type=feed" alt="" /><img src="http://feeds.feedburner.com/~r/samayiki/~4/CQntJ7RFLRo" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
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		<title>निष्कर्षों में फटकार, सिफारिशों में पुचकार</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/11/liberhan-commission-report/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 16:00:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सिद्धार्थ वरदराजन</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[advani]]></category>
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		<category><![CDATA[Babri Masjid]]></category>
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		<category><![CDATA[Tadic judgment]]></category>

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		<description><![CDATA[बाबरी मस्जिद मामले की तफ़्तीश कर रही लिब्रहान आयोग की 17 साल बाद जारी रपट ने साजिश का पर्दाफाश तो किया पर देश को साम्प्रदायिक प्रलय की ओर ढकलने के लिए दोषी पाये गये 68 व्यक्तियों को सजा देने की बात पर चुप्पी साध ली।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/bMTkT-b8AKbaB0jgBmtL-P3u42I/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/bMTkT-b8AKbaB0jgBmtL-P3u42I/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/bMTkT-b8AKbaB0jgBmtL-P3u42I/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/bMTkT-b8AKbaB0jgBmtL-P3u42I/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><p><img class="aligncenter size-full wp-image-164" title="baabri_masjid_story" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/baabri_masjid_story.jpg" alt="baabri_masjid_story" width="565" height="300" /></p>
<div class="dropCap">हि</div>
<p>न्दुस्तानी में एक कहावत है &#8211; खोदा पहाड़ निकली चुहिया &#8211; लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षाकृत बहुत कम निकलता हो, उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है।</p>
<p>न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल अथक परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को 40 बार बढ़ाया गया, उन्होंने 1029 पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं: यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था &#8211; एक  &#8220;संयुक्त सामान्य उद्यम&#8221; &#8211; जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा रचा गया था, इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने जायज तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का &#8220;मोहरा&#8221; बताया है।</p>
<p>दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे इतनी कायराना हैं कि उनकी रपट के प्रारंभ में दिये स्पष्टवादी निष्कर्षों से कोई समानता ही नहीं है। देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए 68 व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद श्री लिब्रहान न तो विध्वंस-मामले में अब तक आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति करते हैं, ना ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं।</p>
<div id="attachment_172" class="wp-caption alignright" style="width: 260px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg"><img class="size-full wp-image-172" title="liberhan" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg" alt="न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।" width="250" height="165" /></a><p class="wp-caption-text">न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।</p></div>
<p>यह बात इसलिये भी चौंकाने वाली लगती है क्योंकि उन्होंने षड़यंत्र का विवरण देने के लिये बार बार ’संयुक्त सामान्य उद्यम’ (joint common enterprise) का जुमला दोहराया है। 1999 में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत <a title="1999 Tadic judgment of the International Criminal Tribunal for the former Yugoslavia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bosnian_Genocide" target="_blank">टैडिक फैसले</a> के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा विकसित हुई है।</p>
<p>यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में उपरोक्त विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता, पुलिस अफ़सर और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता। परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है। धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के अतिरिक्त, इस रिपोर्ट ने विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से पल्ला झाड़ लिया है।</p>
<p>शायद श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितनी हमारी पुलिस तथा न्याय प्रणाली द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है।</p>
<div id="pullQuoteL">&#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;</div>
<p>दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान अभियोज्यता की बाबत एक स्पष्ट बयान देते हैं:  &#8220;इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि  &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार, परमहंस रामचन्द्र दास, अशोक सिंघल, चम्पत राय, स्वामी चिन्म्यानंद, एस.सी. दीक्षित, बी.पी.सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे। ये मौके पर मौजूद वह स्थानीय नेता थे जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघएस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था। अन्य नेता [लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य] उनके प्रतिनिधिरूप दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं माने जा सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सौंपी भूमिका को स्वेच्छा से निभाया। अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह तथ्य अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है। मेरा यह निष्कर्ष है कि इस रपट में नामित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, विहिप, शिव सेना तथा उनके पदाधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक  &#8216;संयुक्त-समान-उद्यम&#8217; स्थापित कर लिया था। लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई के तहत उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया।“</p>
<p>मस्जिद गिराया जाना, &#8220;एक ठोस और सुनियोजित योजना का चरम बिन्दु था जिसमें धार्मिक, राजनैतिक तथा उपद्रवियों का नेतृत्व करने वाला एक पूरा प्रतिष्ठित कुनबा शामिल था&#8221;। न्यायमूर्ति लिब्रहान यह सही कहा कि, &#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;  इस प्रकार आडवाणी और जोशी, भले ही वे इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; में दूसरे स्तर पर भागीदार रहे हों और संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ढाल से लैस हों, राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते।</p>
<p>सत्रह साल बीत जाने के बाद, इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; के भागीदार रहे कई अपराधी मर चुके हैं। परन्तु इनमें से कई इस बिना पर फलते फूलते रहे कि वे कानून के ऊपर थे। भले ही यह देश ढीली ढाली सिफ़ारिशों के कारण न्यायमूर्ति लिब्रहान की निंदा करे,  इस रपट के मर्म में इतनी महत्वपूर्ण जानकारियाँ तो हैं जिनकी मदद से कोई भी दमदार जाँच एजेन्सी षड़यन्त्र का अचूक मामला बना सके। ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी,  हमारी पुलिस की अजकल की पारंगत पूछताछ, जिसमें नार्को परीक्षण शामिल होता है, के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायेंगें। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार यदि वाकई गंभीर हैं तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को <em>फास्ट-ट्रैक</em> तरीके से नियति तक पहुंचा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके।</p>
<p class="note">हिन्दी अनुवाद के लिये <a href="http://samatavadi.wordpress.com" target="_blank">अफलातून जी</a> का शुक्रिया</p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=171&type=feed" alt="" /><img src="http://feeds.feedburner.com/~r/samayiki/~4/eMWt3YIwtpo" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
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		<title>रोजगार पोर्टल पहुंचे गाँव देहात</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/11/rural-job-portals/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 13:44:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
		<category><![CDATA[Job]]></category>
		<category><![CDATA[NREGA]]></category>
		<category><![CDATA[Portal]]></category>
		<category><![CDATA[Rural]]></category>
		<category><![CDATA[SEZ]]></category>

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		<description><![CDATA[भले यह बात अकल्पनीय लगे पर खास ग्रामीण भारत के लिए रोजगार जुटाने वाले जॉब पोर्टल न केवल सफलतापूर्वक चल रहे हैं बल्कि मुनाफा भी कमा रहे हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOK6wbIZyoUrnQqfqcReFXhRINU/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOK6wbIZyoUrnQqfqcReFXhRINU/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOK6wbIZyoUrnQqfqcReFXhRINU/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOK6wbIZyoUrnQqfqcReFXhRINU/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><p><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/ruraljobportal_story.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-158" title="Rural Job Portals" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/ruraljobportal_story.jpg" alt="Rural Job Portals" width="450" height="271" /></a></p>
<div class="dropCap">कु</div>
<p>छ साल पहले तक, खास ग्रामीण भारत के लिए एक जॉब पोर्टल की बात अकल्पनीय होती। इंटरनेट की पहुंच बहुत कम थी &#8211; आज भी, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार, देश के 1.2 अरब लोगों के बीच इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या केवल 1 करोड़ 28 लाख है। यहाँ तक कि बाजार अनुसंधान फर्म IMRB इंटरनेशनल ने अपने एक अध्ययन में पाया कि सितम्बर 2008 तक हमारे यहाँ 4 करोड़ 53 लाख सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जिनमें से 4 करोड़ 20 लाख शहरी थे। 30% की वृद्धि दर के बावजूद, ग्रामीण प्रयोक्ताओं की संख्या आज की तारीख में संतोषजनक नहीं कही जा सकती।</p>
<p>इसके बावजूद हाल के वर्षों में कई ग्रामीण रोजगार पोर्टलों को शुरू किया गया है। इनमें अग्रणी थी <a href="http://ruralnaukri.com">रूरल नौकरी डॉट कॉम</a>, जिसने 2001 में ग्रामीण क्षेत्रों में कार्पोरेट और गैर सरकारी संगठनों में रोजगार के अवसरों के विज्ञापनों द्वारा शुरूवात की थी। इसके संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अजय गुप्ता ने हाल ही में शहरी क्षेत्रों में रोजगार की तलाश करते ग्रामीण युवाओं के लिए <a href="http://villagenaukri.com">विलेज नौकरी डॉट कॉम</a> का प्रारंभ किया है।</p>
<p>इन वेबसाइटों को अब उपभोक्ता वस्तुओं की दिग्गज कंपनी आईटीसी जैसी स्थापित कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। आईटीसी ने वैश्विक ऑनलाइन रोजगार फर्म <a title="Monster.com" href="http://Monster.com" target="_blank">मॉन्सटर</a> के साथ भागीदारी कर <a href="http://www.rozgarduniya.com/?lang=hi" target="_blank">रोज़गार दुनिया डॉट कॉम</a> की स्थापना की है। रोज़गार दुनिया का संचालन कर रहे आईटीसी के कृषि व्यापार विभाग के प्रमुख एस. शिवकुमार कहते हैं, &#8220;मेरा मानना है कि कुछ सालों में इस बाजार में विस्फोटक बढ़त होगी&#8221;। भारत, मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में मॉन्सटर के प्रबंध निदेशक संजय मोदी कहते हैं, &#8220;रोज़गार दुनिया एक उत्प्रेरक के रूप में काम करेगा और भारत में समग्र विकास की सरकार की योजना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा&#8221;।</p>
<p>एक और प्रतियोगी है SREI इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस की सहायक संस्था SREI सहज ई-विलेज, जिसने हाल ही में <a href="http://chaakri.in">चाकरी डॉट इन</a> शुरू की। &#8220;हमें ग्रामीण भारत की क्षमता में विश्वास है। इसका सही समय आ गया है&#8221;, इस पोर्टल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सबाहत अज़ीम कहते हैं।</p>
<h2>पहली बार, बात मुनाफे की</h2>
<p>ग्रामीण रोजगार कुछ समय से चर्चा के केंद्र में रहा है। वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) के तहत एक वृहद कार्यक्रम की शुरुवात की जिसके अंतर्गत ग्रामीण परिवारों को प्रति वर्ष कम से कम 100 दिन के रोजगार का वायदा किया गया था। इस कार्यक्रम को 200 जिलों में शुरू किया गया था और धीरे धीरे पूरे देश में लागू किया गया है। हालिया केंद्रीय बजट में NREGA के तहत खर्च में 144 प्रतिशत वृद्धि कर इसे 320 करोड़ रुपये कर दिया गया और न्यूनतम दैनिक वेतन लगभग अस्सी रुपये तय किया गया। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कार्यक्रम के तहत 3 करोड़ परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया जा चुका है।</p>
<div id="pullQuoteR">रोज़गार दुनिया और SREI सहज ई-विलेज के रूप में कॉर्पोरेट क्षेत्र पहली बार ऐसे क्षेत्र में मुनाफा कमाने के उद्देश्य से मैदान में उतरा है।</div>
<p>इसके अलावा गैर सरकारी संगठनों की भागीदारी वाले अन्य प्रयास भी हुये हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि रोज़गार दुनिया और SREI सहज ई-विलेज के रूप में कॉर्पोरेट क्षेत्र पहली बार ऐसे क्षेत्र में मुनाफा कमाने के उद्देश्य से मैदान में उतरा है। SREI सहज के अज़ीम कहते हैं, &#8220;परोपकार की भावना यहाँ काम नहीं करती है। मुफ्त में मिली चीज का लोग सही मोल नहीं समझ पाते।&#8221; &#8220;यह लाभ के लिए बना उद्यम है&#8221;, आईटीसी के शिवकुमार कहते हैं। &#8220;हमें व्यापार के ज़रिये मुनाफे का एक हिस्सा मिलता है। फिलहाल, नौकरी के विज्ञापन पोस्ट करने और हमारे डेटाबेस के इस्तेमाल के एवज में नियोक्ता ही पैसा देते हैं। मॉन्सटर का यही पारंपरिक तरीका रहा है। कालक्रम में हम नौकरी खोजने वालों को कुछ अन्य वैल्यू एडेड सेवायें देने पर विचार करेंगे जिसके लिये उनसे शुल्क वसूला जायेगा।&#8221;</p>
<p>इसके साथ ही आईटीसी और SREI बुनियादी सुविधाएं भी ला रहे हैं। आईटीसी अपनी ई चौपालों के विशाल नेटवर्क का लाभ उठायेगा। 2000 में शुरू किये गये ई चौपाल गांवों में स्थित इंटरनेट खोखे हैं जो जमीनी स्तर पर स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन के एक प्रमुख घटक बन गए हैं। शिवकुमार कहते हैं, &#8220;हमारे पास 10 राज्यों के 100 जिलों में फैले 6500 से अधिक ई चौपाल हैं। फिलहाल हमने 10 जिलों में प्रायोगिक चरण के रूप में रोज़गार दुनिया की शुरुवात की है। हमारा जल्द ही उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के 80 जिलों के 5000 ई चौपालों में इसका विस्तार करने का इरादा है।&#8221;</p>
<p>दूसरी ओर SREI के नेपथ्य में, सामान्य सेवा केंद्र (CSCs) का एक नेटवर्क है जिसकी केन्द्र और सात राज्य सरकारों के साथ सार्वजनिक निजी भागीदारी है। तकरीबन 15,000 CSCs पहले से ही कार्यरत हैं, यानि 27,000 के लक्ष्य का आधा रास्ता तक किया जा चुका है। प्रत्येक CSC एक उद्यमी द्वारा संचालित है जिसे लगभग सवा लाख रुपये की शुरूवाती लागत का 25 प्रतिशत निवेश करना होता है। SREI बुनियादी संचार ढांचा उपलब्ध कराता है। &#8220;प्रारंभ में रेलवे आरक्षण, बैंकिंग व बीमा सेवायें और प्रीपेड मोबाइल खातों के रीफिल जैसी अनेक बिज़नेस टू कंज्यूमर (B2C) सेवायें तैयार की जाएगी,&#8221; अज़ीम ने बताया। &#8220;अगले चरण में, हम जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने जैसी गवर्मेंट टू कंज़्यूमर सेवायें शुरू करेंगे।&#8221; SREI ने उद्यमियों को वित्तीय सलाह व ऋण प्रदान करने के लिये बैंकों के मदद की व्यवस्था की है।</p>
<p>जो दो बातें इन पोर्टलों को चलाये रखेंगी वे हैं मांग और यह तथ्य कि वे मुनाफा कमाने के लिये इस व्यवसाय में उतरे हैं। अज़ीम बताते हैं कि अगर लाभ कमाने पर ध्यान केंद्रित न हो तो, जैसा कि अक्सर सरकारी कार्यक्रमों के साथ होता है, लोगों का उत्साह गुल हो सकता है। &#8220;हमारी हर गतिविधि लाभदायक होनी ही चाहिये। ऑफ़लाइन मुनाफा उद्यमियों द्वारा कमाया जाता है, जबकि SREI ऑनलाइन गतिविधियों से लाभ कमाता है। कई सहज केन्द्र प्रति महीने चालीस हज़ार रुपये से अधिक कमाते हैं।&#8221; SREI की प्रारंभिक योजना के अंतर्गत 60 करोड़ डॉलर का निवेश किया जाना था, जिसका आधा शेष हिस्सा इस समय खर्च किया जा रहा है। अगले तीन वर्षों में कम से कम और 1 करोड़ डॉलर का निवेश किया जायेगा।</p>
<p>नतीजें प्रभावशाली हैं। SREI में, अब तक करीब 25000 ग्रामीण युवाओं को शहरों में नौकरियों दिलायी गयी हैं। भले ही काफी बड़ा लगे पर यह व्यवसाय अभी शुरुवाती चरण में हैं।</p>
<h2>&#8216;अविकसित क्षेत्र&#8217; का विकास</h2>
<p>&#8220;चाकरी.इन जैसी पहल से रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं,&#8221; वैश्विक मानव संसाधन कंपनी <a href="http://www.adecco.co.in/" target="_blank">एडेक्को इंडिया</a> के प्रबंध निदेशक सुधाकर बालकृष्णन बताते हैं। &#8220;इस पहल में ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के लक्ष्यों में शामिल हैं &#8211; बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, सुरक्षा गार्ड, राजमिस्त्री और नाई। ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के लक्ष्य हो सकते हैं &#8211; ग्रामीण कंप्यूटर ऑपरेटर, डाटा एंट्री ऑपरेटर, ब्यूटिशन और स्वास्थ्य कर्मी।&#8221; अज़ीम के अनुसार: &#8220;सब से पहली नौकरी एक नाई के लिए हासिल की गई, जिसे कलकत्ता के एक महिलाओं और पुरुषों हेतु त्वचा-व-केश-संवर्धन सैलून आइकैचर्स में नौकरी मिली।&#8221;</p>
<p>पोर्टल कंपनियों को बढ़ती प्रतिस्पर्धा की चिंता नहीं हैं। &#8220;आज का ग्रामीण रोजगार व्यवसाय अभी पाषाण युग में है, जबकि इसमें सूचना प्रौद्योगिकी के युग तक पहुँचने की क्षमता है,&#8221; रूरल नौकरी के गुप्ता कहते हैं। &#8220;भारतीय ग्रामीण प्रसार के विशाल आकार को देखते हुए, यह क्षेत्र अभी तक &#8216;प्रतिस्पर्धा&#8217; नाम की आर्थिक शब्दावली से अनजान है। यहां तक कि ई-चौपाल जैसी बड़ी परियोजनाएँ भी सागर में केवल एक बूंद हैं। इसलिए, रोज़गार दुनिया सरीखे प्रकल्प हर स्तर पर, चाहे वह सरकारी सहायता की बात हो या उम्मीदवारों और कॉर्पोरेट नियोक्ताओं को तैयार करने की बात हो, निष्क्रियता को कम कर संभवतः एक दूसरे की मदद ही करेंगे। इस अविकसित क्षेत्र को उपजाने के लिए खिलाड़ियों की एक बड़ी संख्या दरकार होगी।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">शहरी बाज़ारों में संतृप्ति के कारण अब ग्राम की ओर ध्यान जा रहा है। स्थानीय कर्मचारी बेहतर परिणाम ला सकते हैं क्योंकि वे कम कीमत पर और असीमित संख्या में उपलब्ध हैं।</div>
<p>गुप्ता के अनुसार, ग्रामीण रोजगार के क्षेत्र में तेज़ गतिविधि के तीन कारण हैं। &#8220;एक का संबन्ध है शहरी बाज़ारों की बहुचर्चित संतृप्ति से, जिसके कारण अब ध्यान ग्रामीण बाजारों की ओर जा रहा है। इन बाजारों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए स्थानीय कर्मचारी ही बेहतर परिणाम ला सकते हैं क्योंकि वे कम मूल्य पर और असीमित संख्या में उपलब्ध हैं। तीसरा पहलू कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से एक अभिनव व्यापार मॉडल के उद्भव से संबंधित है, जिसमें एक मॉडल दूसरे को बढ़ने में मदद करता है।&#8221;</p>
<p>हैदराबाद स्थित इंडियन स्कूल आफ बिज़नेस (ISB) में वित्त विभाग में सहायक प्रोफेसर राजेश चक्रवर्ती इस बढ़त को एक अलग नज़र से देखते हैं। &#8220;अव्वल तो पोर्टल शुरू करना एक कम निवेश का कारोबार है जिसमें जोखिम कुछ हद तक कम होता है&#8221; वे कहते हैं। &#8220;अधिकांश खर्च के पोर्टल का प्रचार करने पर ही होता है। दूसरी, ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण भारत के बारे में सोच बदल रही है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय गांवों के मध्यम वर्ग में कुछ हल्कों में खासी समृद्धि है। इसके अलावा, बुनियादी ढांचे के विकास से अर्द्ध ग्रामीण कस्बे, देहातों से पहले से बेहतर तरीके से जुड चुके हैं और अलगाव कम हो रहा है। ग्रामीण युवाओं के बीच वेब पोर्टलों के बारे में चर्चा और कनेक्टिविटी की बदौलत कई लोग अब रोज़गार और नौकरियों के बारे में जानकार हो चुके हैं। इसके साथ ही शहरी केन्द्रों में कम और मध्यम कौशल के रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और इस मांग की आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्रों से ही की जा सकती है।</p>
<p>एडेक्को के बालकृष्णन बताते हैं कि भारत में इस समय 7.8% बेरोजगारी है। &#8220;पिछली जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 75 करोड़ लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। भारत की 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है; इस कारण देश को अगले पांच वर्षों के दौरान 6 करोड़ नौकरियाँ पैदा करने की ज़रूरत है ताकि बेरोजगारी की दर काबू से बाहर न हो जाए। यह रोजगार सृजन और विकास के लिए एक बहुत बड़ा सुअवसर है।&#8221;  परंतु टीमलीज़ सर्विसेज़ के सहसंस्थापक और अध्यक्ष मनीष सभरवाल को इन पोर्टलों की सफलता पर संदेह है। वे कहते हैं, &#8220;शर्तिया तौर पर यह कह पाना मुश्किल होगा कि रोजगार खोज रहे ग्रामीण सक्रिय रूप से इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं, हो सकता है कि यह अनुमान मात्र हो। उपयुक्त शुरुवाती उपाय शायद सेलफोन या एसएमएस का माध्यम होता जिसकी पैठ गहरी होने पर इसे इंटरनेट पर रूपांतरित किया जा सकता था।&#8221;</p>
<h2>सुधार ही है दीर्घकालिक समाधान</h2>
<p>रोजगार कार्यालय तो नाकाम रहे हैं, पर क्या ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कामयाब रहा? टीमलीज़ के सभरवाल कहते हैं, &#8220;अपने मौजूदा रूप में NREGA केवल अकुशल श्रमिकों के लिए ही काम का है।&#8221; भारत की ग्रामीण बेरोजगारी की समस्या का संपूर्ण हल अब तक न तो NREGA है और न ही रोजगार पोर्टल। &#8220;हल अर्थव्यवस्था का निरंतर दीर्घकालिक विकास ही है, कुछ और नहीं&#8221;, चक्रवर्ती कहते हैं। &#8220;यदि भारत की बढ़त दर अगले दो दशकों में 9 प्रतिशत से अधिक रही, तो फायदे चहुं ओर फैलेंगे और ग्राम और शहर का फासला 10 से 15 साल में मोटे तौर पर खत्म हो जायेगा। लोगों को तब कृषि से दूर जाना ही होगा, लेकिन यह उद्योग और विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) द्वारा खेती योग्य जमीन हड़पने के बजाय स्वेच्छा से होना चाहिए।&#8221;</p>
<p>सभरवाल मानते हैं कि एकमात्र दीर्घावधि का समाधान है ग्रामीण क्षेत्रों को रोजगार सृजन के लिए बेहतर जगह बनाना। &#8220;अल्पावधि में, हमें लोगों को नौकरियों तक ले जाना है। भारत में केवल 34 शहर हैं पर इनमें दस लाख से ज्यादा लोग बसते हैं। इसके विपरीत, हमारे 6 लाख गांवों में से 2 लाख गाँव ऐसे हैं जिनकी जनसंख्या 200 से भी कम है। नये शहरों के अभाव में नौकरियाँ इन्हीं अटे पड़े शहरों तक सीमित हैं। दीर्घकालिक समाधान यही है कि शिक्षा और रोजगार साथ साथ चलें और यह तभी होगा जब बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा, कौशल विकास और श्रम कानूनों की मौजूदा व्यवस्था में भारी सुधार हो।&#8221;</p>
<p class="note"><a href="http://knowledge.wharton.upenn.edu/" target="_blank">Knowledge@Wharton</a> से अनुबंध के अंतर्गत प्रकाशित। हिन्दी अनुवादः देबाशीष व <a href="http://kaulonline.com/" target="_blank">रमण कौल</a>।</p>
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		<title>ओपनऑफ़िस एनाफ्रेसियज़ से करें तेज़, उन्नत अनुवाद</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 04:59:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रौद्योगिकी]]></category>
		<category><![CDATA[Computer Aided Translation]]></category>
		<category><![CDATA[OpenOffice.org]]></category>
		<category><![CDATA[Translation]]></category>
		<category><![CDATA[Translation memory]]></category>
		<category><![CDATA[Unicode]]></category>

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		<description><![CDATA[रवि रतलामी बता रहे हैं अनुवाद कार्यों में अनुवादकों की सहायता करने वाले ओपनऑफ़िस.ऑर्ग ऑफ़िस सूट के इस उम्दा प्लगिन का उपयोग का सरल तरीका।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/2UODaNXnOFi7U4w9SE1h0o0TCo0/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/2UODaNXnOFi7U4w9SE1h0o0TCo0/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/2UODaNXnOFi7U4w9SE1h0o0TCo0/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/2UODaNXnOFi7U4w9SE1h0o0TCo0/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><p><strong><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_logo.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-154" title="anphraseus_logo" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_logo.jpg" alt="anphraseus_logo" width="325" height="110"  style="border:none"/></a>ओपनऑफ़िस.ऑर्ग ऑफ़िस सूट</strong> के लिए बहुत से उम्दा प्लगइन उपलब्ध हैं जिनकी सहायता से विशिष्ट किस्मों के उत्पादकता संबंधी कार्यों को बख़ूबी, त्वरित तरीके से निपटाए जा सकते हैं। <a href="http://www.openoffice.org/" target="_blank">ओपनऑफ़िस.ऑर्ग</a> राइटर के लिए एक ऐसा ही उम्दा प्लगइन है <strong>एनाफ्रेसियज़</strong> जो अनुवाद कार्य में बेहद सहायक है। एनाफ्रेसियज़ प्लगइन कम्प्यूटर की सहायता से <em><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Translation_memory" target="_blank">ट्रांसलेशन मेमरी</a> डाटाबेस</em> के आधार पर अर्ध-स्वचालित अनुवाद कार्यों में अनुवादकों की सहायता करता है। आइए, इसके सरल प्रयोग के बारे में जानें।</p>
<p>डाउनलोड किए एनाफ्रेसियज़ प्लगइन फ़ाइल  को ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में संस्थापित करने हेतु <em>फ़ाइल  &gt; ओपन</em> कमांड से खोलें। इससे एनाफ्रेसियज़ प्लगइन आपके ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में संस्थापित हो जाएगा। आपको ओपनऑफ़िस.ऑर्ग के मेन्यू में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू कुछ इस तरह से दिखाई देगा -</p>
<div id="attachment_151" class="wp-caption aligncenter" style="width: 450px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_1.jpg"><img class="size-full wp-image-151" title="anphraseus_1" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_1.jpg" alt="ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू " width="440" height="464" /></a><p class="wp-caption-text">ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू </p></div>
<p>आपका ओपनऑफ़िस.ऑर्ग <em>कम्प्यूटर एडेड ट्रांसलेशन टूल</em> के रूप में आपके अनुवाद कार्य में सहायक के रूप में अब तैयार हो चुका है।</p>
<p>अब आप जिस फ़ाइल को अनुवादित करना चाहते हैं उसे ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में खोलें। उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी की कोई फ़ाइल खोलें। इसके पश्चात एनाफ्रेसियज़ मेन्यू में जाकर ट्रांसलेट (<em>आल्ट + डाउन </em>कुंजी शॉर्टकट) मेन्यू पर क्लिक करें। आप देखेंगे कि अंग्रेजी में लिखे पहले वाक्य को एक अलग रंग से चमकाया गया है, तथा उसका अनुवाद करने के लिए नीचे एक अलग लाइन बना दी गई है, जिसमें संकेतक टिमटिमा रहा है।</p>
<div id="attachment_152" class="wp-caption aligncenter" style="width: 407px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_2.jpg"><img class="size-full wp-image-152" title="anphraseus_2" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_2.jpg" alt="एनाफ्रेसियज़ का प्रयोग" width="397" height="218" /></a><p class="wp-caption-text">एनाफ्रेसियज़ का प्रयोग</p></div>
<p>अब आप अपना अनुवाद पूरा कर लें। अनुवाद पूरा कर लेने के बाद फिर से ट्रांसलेट मेन्यू पर क्लिक करें। आपका संकेतक अगले वाक्य को जिसे अनुवादित करना है, उसे चमकाएगा तथा आपको उसका अनुवाद करने के लिए एक अलग, संपादन योग्य लाइन प्रस्तुत कर देगा।</p>
<p>यहाँ पर (जैसा कि ऊपर चित्र में वर्णित है) आप देखेंगे कि यदि एनाफ्रेसियज़ की ट्रांसलेशन मेमरी में आपके द्वारा पूर्व में किया गया अनुवाद उपलब्ध है, अतः उसे एनाफ्रेसियज़ ने स्वचालित रूप से उसे वहां टाइप कर दिया है। यदि अनुवाद डाटाबेस में उपलब्ध नहीं है, तो आपके लिए कोई विकल्प नहीं दिया जाएगा और आपको अनुवाद स्वयं टाइप करना होगा। एनाफ्रेसियज़ की ख़ूबी यह है कि यह प्रयोग करते करते स्वतः ही अपना अनुवाद डाटाबेस बनाता जाता है। आपके पुराने अनुवाद के डाटाबेस इसमें सुरक्षित रहते हैं, और एक जैसे अनुवाद कार्यों में इससे अनुवाद में एकरूपता बनाए रखने और त्वरित अनुवाद करने में अच्छी खासी सहायता मिलती है।</p>
<p>फ़ाइल में अनुवाद का कार्य पूर्ण होने के बाद मेन्यू में <em>एनाफ्रेसियज़  &gt;  ट्रांसलेशन </em>मेन्यू पर क्लिक करें। अब आप  फ़ाइल को चाहें तो द्विभाषी रूप में सहेज सकते हैं या फिर इसकी अनुवादित फ़ाइल को अनुवाद की भाषा वाली फ़ाइल में सहेज सकते हैं। यदि आपको लगता है कि फ़ाइल का  अनुवाद परिपूर्ण है, और इसे अनुवाद की भाषा वाली फ़ाइल के रूप में प्रयोग हेतु सहेजा जा सकता है तो आपको एनाफ्रेसियज़ का फ़ाइल क्लीन कमांड चलाना होगा। इसके लिए <em>एनाफ्रेसियज़  &gt; क्लीनअप</em> मेन्यू क्लिक करें। आप देखेंगे कि ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में आपकी फ़ाइल की अंग्रेज़ी की तमाम प्रविष्टियाँ मिट गई हैं और फ़ाइल में अब सिर्फ हिन्दी का अनुवादित पाठ ही दिखाई दे रहा है।</p>
<div id="attachment_153" class="wp-caption alignright" style="width: 197px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_3.jpg"><img class="size-full wp-image-153" title="anphraseus_3" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_3.jpg" alt="एनाफ्रेसियज़ द्वारा अनुवादित फाईल" width="187" height="120" /></a><p class="wp-caption-text">एनाफ्रेसियज़ द्वारा अनुवादित फाईल</p></div>
<p>इस फ़ाइल को नए नाम से सहेज लें। बस, आपका अनुवाद कार्य पूरा हो गया। एनाफ्रेसियज़ के सेटअप मेन्यू में विविध पैरामीटरों को सेट किया जा सकता है &#8211; उदाहरण के लिए, यदि आपके पास पहले से ही कोई ट्रांसलेशन मेमरी है तो आप उसका प्रयोग कर सकते हैं, इत्यादि।</p>
<p>एनाफ्रेसियज़ कुछ कुछ अनुवाद औजार ट्रेडोस के टैग-एडीटर के जैसा काम करता है। हालांकि यह उतना उन्नत किस्म का नहीं है, मगर फिर भी मुफ़्त में उपलब्ध यह औजार छोटे मोटे अनुवाद परियोजनाओं पर बख़ूबी काम में लिया जा सकता है।</p>
<p><strong>एनाफ्रेसियज़ प्लगइन की फ़ाइल  anaphraseus_latest.oxt को <a href="http://nchc.dl.sourceforge.net/project/anaphraseus/Daily%20Snapshot/Snapshots/anaphraseus_latest.oxt" target="_blank">यहाँ से डाउनलोड करें</a>।</strong></p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=150&type=feed" alt="" /><img src="http://feeds.feedburner.com/~r/samayiki/~4/Dsuz-Zg4dTk" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
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		<title>बालिका वधु: नाटक द्वारा सच का सामना</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/09/balika-vadhu-showcasing-reality-through-drama-and-text/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 14:57:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय रानाडे</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Balika Vadhu]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[literacy]]></category>
		<category><![CDATA[Rajasthan]]></category>
		<category><![CDATA[Television]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ नेताओं की सोच के विपरीत संजय रानाडे मानते हैं कि यह दुर्लभ धारावाहिक बाल विवाह को "बढ़ावा" नहीं बल्कि मनोरंजन द्वारा दर्शकों को सामाजिक संघर्ष का बौद्धिक रूप से सामना करने की प्रेरणा दे रहा है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/cZ5ga4XPRTNMWZpK-TpUvFprneA/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/cZ5ga4XPRTNMWZpK-TpUvFprneA/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/cZ5ga4XPRTNMWZpK-TpUvFprneA/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/cZ5ga4XPRTNMWZpK-TpUvFprneA/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><p><img class="aligncenter size-full wp-image-146" title="बालिका वधु" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/09/balika_vadhu_01.jpg" alt="बालिका वधु" width="400" height="267"></p>
<div class="dropCap">ग्रा</div>
<p>मीण राजस्थान की पृष्ठभूमि में निर्मित धारावाहिक &#8220;बालिका वधु&#8221;, बालवधु आनंदी की कहानी बयां करती है। आठ साल की कच्ची उम्र में अपनी हमउम्र जगदीश से विवाहोपरांत आनंदी एक ऐसी नई दुनिया में प्रवेश करती है जो भ्रामक और दुत्कार भरी है। बचपन और परिवार के बेफ्रिकी भरे आनंद से वंचित आनंदी को एक अजनबी परिवार और नए रिश्तों के मुताबिक खुद को ढालना है और दोस्त, प्रेमिका, पत्नी और माँ के रूप में अपनी भूमिका को स्वीकारना है।</p>
<p>यह कार्यक्रम स्फ़ीयर ओरिजिन द्वारा निर्मित है और <em>कलर्स चैनल</em> पर सोमवार से शुक्रवार रात आठ बजे प्रसारित किया जाता है।</p>
<p>पर बालिका वधु ने मेरा ध्यान इस सीरियल द्वारा प्रयुक्त एक युक्ति के कारण आकर्षित किया। धारावाहिक के प्रत्येक एपिसोड के अंत में, यह एपिसोड में प्रस्तुत द्वन्द के बारे में कोई सवाल या बयान पेश करता है। सवाल या बयान सुनाया जाता है और पाठ रूप में स्क्रीन के नीचे भी दिखाई देता है। संघर्ष को दर्शाने के लिये पाठ के उपयोग ने मुझे आकर्षित किया क्योंकि इसने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर यह किस किस्म का संघर्ष है जिसे एक प्रासंगिक धारावाहिक के सामान्य मनोरंजन प्रारूप के माध्यम से पहुंचाया नहीं जा सकता।</p>
<p>दरअसल टेलीविजन के हर प्रसंग की कहानी का संपूर्ण उद्देश्य दर्शकों की बुद्धि की बजाए भावनाओं को छेड़ना है। दर्शकों को <em>महसूस </em>करना है, सोचना नहीं है। यह धारावाहिक एक भावुक वातायनी है जो कमोबेश एक द्विपदीय प्रारूप में संचालित होती है, जहाँ सिक्के के दो लोकसिद्ध पक्ष हैं &#8211; एक अच्छा, दूसरा खराब। सरलीकरण ही कुंजी है। हर एपिसोड के अंत में प्रस्तुत पाठ से यह एक मुद्दे पर कई दृष्टिकोण पेश कर पाता है। सवाल यह है कि क्या यह बस इस धारावाहिक को &#8216;बौद्धिक&#8217; दर्शाने की युक्ति है?</p>
<p>मैं इस धारावाहिक को दो मीडिया संबंधित घटनाओं के संदर्भ में देखता हूँ। पहला यह है कि लगभग सभी मीडिया सामग्री पर मनोरंजन मंच का भारी प्रभुत्व है, यहाँ तक कि समाचार और समसामयिक कार्यक्रम भी <em>रियेलिटी शो</em> की तरह लगने लगे हैं। दूसरी ओर, धारावाहिक और ओछे होते जा रहे हैं। ऐसे में यह एक धारावाहिक है जो नाटक और साहित्यिक पाठ द्वारा भारत की सामाजिक वास्तविकताओं को ज़ाहिर कर रहा है।</p>
<p>दूसरी खास बात यह है कि गंभीर और आधुनिक संदेश देने के लिये पारंपरिक नाट्य का प्रयोग ऐसे दर्शकवर्ग हेतु किया जा रहा है जो मुख्यतः विशुद्ध मनोरंजन के लिए टीवी देखते हैं। मराठी भाषा के दो कार्यक्रम यहाँ अपनी जगह बनाते हैं। एक है<em> टिकल ते पॉलिटिकल </em>और दूसरा<em> दार उधाड़ा न गडे</em>। दोनों पारंपरिक <em>वाग </em>और <em>तमाशा </em>प्रारूपों का गंभीर सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों का प्रस्तुतिकरण करने के लिये का प्रयोग करते हैं। बालिका वधु पारंपरिक नाटक प्रारूप का बहुत प्रभावी ढंग से उपयोग करता है, पर ज्यादा दिलचस्प बात है पाठ यानि टेक्स्ट का प्रयोग।</p>
<p>गंभीर और आधुनिक संघर्षों से जुड़े मनोरंजन कार्यक्रमों के लोक मीडिया स्वरूप में टेक्सट के प्रयोग को दर्शकों की मिली स्वीकृति से संकेत मिलता है कि दर्शक बौद्धिक सामाजिक संघर्षों के साथ नाता जोड़ना चाहते हैं, अलबत्ता सरोकार का यह मंच मनोरंजन का होना चाहिये। यह कोई नई बात नहीं है। हमें हमारे मूल्य, नैतिकता और आचार दार्शनिकों और विचारकों के मुकाबले कथावाचकों से ज़्यादा मिले हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय वास्तविकताओं के साथ सामंजस्य बिठाने के लिये मास मीडिया अब कार्यक्रम के प्रारूप में परिवर्तन ला रहे हैं।</p>
<p>इस लेख को लिखे जाते समय, परिवार के एक किशोर ने (धारावाहिक में) एक कंप्यूटर गेम खरीदने के लिये पैसे चुराये हैं। वह एक अन्य किशोर के प्रभाव में है जिसे उसके आवारापन के कारण शहर से गांव वापस भेजा गया है। बयान: &#8216;अक्सर ऐसा होता है कि एक किशोर यह तय नहीं कर पाता कि क्या सही है और क्या गलत&#8217;।</p>
<div id="pullQuoteR">दर्शक बौद्धिक सामाजिक संघर्षों की बात सुनना चाहते हैं, अलबत्ता सरोकार का यह मंच मनोरंजन का ही हो तो बेहतर। रात 8 बजे, जब पति काम से वापस आ गये हों और रोटियाँ बेलनी बाकी हों, तो टीवी पर कोई भी नैतिकता पर प्रवचन नहीं सुनना चाहेगा।</div>
<p>आप कहेंगे कि यह कोई कहने की बात है भला। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बयान से आगामी संघर्ष के कारणों का भान हो जाता है। इस तरह का बयान देने के बाद धारावाहिक के मनोरंजन मूल्यों और उसकी शिक्षाप्रद क्षमता के बीच संतुलन बनाये रखना एक चुनौती भरा काम है। एक गलत कदम कहानी को उपदेशात्मक बना सकता है और दर्शकों को खो सकता है। नैतिक अंत सुबह सुबह देखना सुखद रहता है, जब बच्चे स्कूल चले गए हों, किशोर अब तक सो रहे हों, और पति चाय की चुस्कियों के बीच अखबार बाँच रहे हों। लेकिन रात 8 बजे, जब पति काम से वापस आ गये हों, गैस पर प्रेशर कुकर चढ़ाया हो, और रोटियाँ बेलनी बाकी हों, तो कोई भी नैतिकता पर प्रवचन नहीं सुनना चाहेगा। तो क्या यह धारावाहिक केवल महिलाएं देख रही हैं? हो सकता है कि दर्शकवर्ग में अधिकांश महिलायें शामिल हों।</p>
<p>मैंने कई किशोरियों को इस धारावाहिक की चर्चा करते सुना है। किशोरियों, और किशोरों की भी, उनके माता पिता काफी फिक्र करते हैं और उनकी हरकतों को बेहद संदेह की नजर से देखते हैं। मैं जानबूझ कर &#8216;मुंबई जैसे शहर में&#8217; या &#8216;आज भी&#8217; जैसे जुमलों का प्रयोग नहीं कर रहा क्योंकि मैं इस परिकल्पना का हिमायती हूं कि लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और संघवाद जैसी परिकल्पनायें भारतीय परिवार की दहलीज के बाहर ही होती हैं। परिवार में शिक्षा या कमाई का स्तर चाहे कुछ भी हो दहलीज़ के अंदर का जीवन ग्रामीण, सामंती, पितृसत्तात्मक, जातिवाद से भरा और सांप्रदायिक ही होता है। इससे यह समझा जा सकता है कि इस धारावाहिक को देखने वालों में किशोरियाँ क्यों शामिल हैं क्योंकि जब यह धारावाहिक प्रसारित होता है तब वे घर पर होती हैं, और उनकी मातायें भी यह सीरियल देखती हैं।</p>
<p>गौरतलब है कि सीरियल के दो मुख्य किरदार उन श्रेणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका दर्शकवर्ग सबसे बड़ा है। एक है बालवधु आनंदी और दूसरी विधवा कुलमाता दादीसा। आनंदी ने शादी के बाद यौवन में प्रवेश किया। उसकी शादी के लिये उसके पिता को परिवार की भूमि गिरवी रखनी पड़ी थी। शिक्षा पाने के लिये उसका संघर्ष अब तक जारी है। आनंदी का पति जगदीश लगभग उसी का हमउम्र किशोर है।</p>
<p>आनंदी का पति अभी तक एक &#8216;पुरुष&#8217; नहीं है &#8211; यह एक ऐसा अंतर है जिसे कॉलेज जाने वाली लगभग हर किशोरी स्वाभाविक रुप से समझती है लेकिन स्पष्ट रूप से कह नहीं पाती। इस तरह का रिश्ता सेक्स और उसमें अंतर्निहित विकर्षण को तस्वीर से बाहर तो रखता है ही, इससे कथानक में लैंगिक संघर्ष को मुखर करने की खासी गुंजाईश रहती है। इस तरह जहाँ हमें यौनिक और लैंगिक संघर्ष के भावनात्मक और बौद्धिक पहलू अन्य लोगों के जीवन में दिखते रहते हैं, वहीं इस मासूम दंपती के बहाने भावनात्मक और बौद्धिक खुलाव भी मिल जाता है। दर्शक इस जोड़े की तरह मासूम बन जाता है; इससे अलग और अक्सर विरोधाभासी दुनिया में बड़े हो रहे पुरुष और महिलाओं की जटिल वास्तविकता से सामना करना आसान हो जाता है।</p>
<p>दादीसा पुराने ख्यालों की अनपढ़ औरत हैं। वह घर में सब पर पूर्ण नियंत्रण रखती है पर फिर भी हम देख सकते हैं कि परिवार के भीतर की राजनीतिक शक्ति के मामले में उसकी सत्ता को पुरुषों से चुनौती मिलती रहती है भले वो उसके प्रौढ़ बेटे क्यों न हो। इस संघर्ष को एक बुजुर्ग और उसके पुत्रों की बजाय एक कुल-माता और उसके बेटों के संदर्भ में देखना लेखक और दर्शक दोनों के लिये आसान होता है क्योंकि यहाँ हिंसा शारीरिक स्तर पर नहीं वरन &#8216;शब्दों&#8217; और &#8216;भावनाओं&#8217; के माध्यम से व्यक्त होती है। सीरियल में शारीरिक हिंसा अन्य परिवारों में होती दिखाई जाती है जिससे कथा का केंद्रीय परिवार अधिक नैतिक और प्रगतिशील लगे।</p>
<p>दादीसा पारम्परिक भारतीय परिवार की माँ, सास और कुल‍माता का प्रतिरूप है जो हमेशा अज्ञात, अपरिभाषित लोगों या समाज के दबाव में रहती है और सोचती रहती है कि वे क्या कहेंगे, उसके परिवार और उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे या कोई घटना किस प्रकार परिवार में उसकी स्थिति और उसके परिवार की समाज में स्थिति को प्रभावित करेगी।</p>
<p>यह धारावाहिक अब तक बाल विवाह, लैंगिक पक्षपात, नैतिकता, कामुकता, विधवा पुनर्विवाह, जाति, वर्ग, ग्रामीण और शहरी संघर्ष, बाल अपराध, साहूकारी, भारतीय परिवारों में नैतिकता की पदावनति, विवाह की संस्था, और शिक्षा जैसे मुद्दों को संबोधित कर चुका है। जैसा कि हमने पहले चर्चा की, धारावाहिक के निर्माताओं ने हर नाटकीय विधा का प्रयोग कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जिम्मेवारी का अनावश्यक बोझ लादे बिना दर्शकों तक ये मुद्दे सीधे पहुंचाये जा सके। टेक्सट यानि पाठ द्वारा दर्शकों को इस मुद्दे से भावनात्मक रूप से अलग कर उन्हें इस पर बौद्धिक तौर पर विचार करने को प्रेरित किया जाता है।</p>
<p>तो आखिरकार इस धारावाहिक पर कुछ नेताओं को आपत्ति क्यों है? आपत्ति का कारण शायद धारावाहिक में हुआ बाल विवाह है। धारावाहिक में दिखाया गया था कि कैसे एक जटिल सामाजिक और पारिवारिक प्रक्रिया के माध्यम से यह शादी तय की गई थी, कैसे विभिन्न समूहों ने एक दूसरे के फायदा उठाया और खुद भी दूसरों के शिकार बने। क्या इस धारावाहिक पर बाल विवाह को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जा सकता है? निश्चित रूप से, नहीं। बाल विवाह के खिलाफ कानून लागू करने का हमारा रिकॉर्ड वैसे भी संदिग्ध है। दरअसल, किसी भी मुद्दे पर है धारावाहिक की राय, विशेष रूप से प्रकरण के अंत में दिखाये जाने वाले साहित्यिक पाठ में, एक समाचार पत्र की सुर्खियों की तरह है। यह पाठ संघर्ष को सही संदर्भ में प्रस्तुत करता।</p>
<p>एक युवा विधवा गर्भवती महिला की एक युवक से शादी से संबंधित एपीसोड में भावनात्मक और नाटकीय संवाद और कड़ी के अंत में प्रस्तुत गंभीर बौद्धिक साहित्यिक पाठ के बीच संतुलन बनाये रखना बेहद मुश्किल था। इस मामले में लड़की के परिवार में घटना के प्रति नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से लड़के के परिवार में हिंसात्मक और नाटकीय दृश्य रूपी प्रतिक्रिया मिली। पूरी संभावना थी कि यहाँ धारावाहिक खून के बदले खून जैसा माहौल चित्रित कर देता जिसमें लड़के के परिवार वाले लड़की के परिवार पर धोखाधड़ी और उनके एकलौते बेटे को हथिया लेने का आरोप लगाते और बदले की यह दास्तां दोनों परिवारों के बीच चलती रहती।लेकिन धारावाहिक इस हिंसा और घृणा को दोनों परिवारों की एक गर्भवती विधवा औरत और एक युवक की उससे शादी की इच्छा की वास्तविकता को स्वीकारने में असमर्थता के संदर्भ में प्रस्तुत करने में सफल रहा। धारावाहिक ने यहाँ एक बेहद दिलचस्प युक्ति का उपयोग किया &#8211; लड़का अपने परिवार को यह नहीं बताता कि महिला गर्भवती है, बस यह कहता है वह उसे प्यार करता है। अंतर्निहित पाठ में कहा जाता है: &#8216;अक्सर एक झूठ को छिपाने के लिए बार बार झूठ बोलना पड़ता है&#8217;।</p>
<p>बालिका वधु अब तक मुद्दों को एक सूत्र में जोड़ता रहा है जिसमें शुरुवात द्वंद्व को स्पष्ट करने से होती है, किरदारों की प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा, फिर साहित्यिक पाठ द्वारा उभरते सवाल और बहस के मुद्दों पर बौद्धिक चर्चा, और अंत में, समाधान।</p>
<p>जाहिर है, बालिका वधु भारतीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है। जो कहते हैं कि भारत में समस्याएं नहीं है मुगालते में हैं। यह कहना वैसा ही होगा कि हमारे देश में औरतों के साथ अत्याचार नहीं होता जब कि हमें अब भी दहेज विरोधी और महिला से अत्याचार के खिलाफ अधिनियमों की ज़रूरत पड़ती है।
<p class="note"><a href="http://infochangeindia.org" target="_blank">इंफ़ोचेंज इंडिया</a> से साभार, पूर्वानुमति से प्रकाशित। मूल अंग्रेजी लेख से हिन्दी अनुवादः देबाशीष।</p>
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		<title>प्रिंट आन डिमांड से लेखक बनें प्रकाशक</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Mar 2009 20:06:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रिंट आन डिमाँड सेवा द्वारा सेल्फ पब्लिशिंग अब केवल व्यक्तिगत वैनिटी प्रकाशन नहीं रहा। ईबुक्स के युग में अब प्रकाशक भी इस तकनीक का महत्व समझने लगे हैं। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ACr_G8bwj81Gku1eIvRfq6Ut-6M/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ACr_G8bwj81Gku1eIvRfq6Ut-6M/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ACr_G8bwj81Gku1eIvRfq6Ut-6M/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ACr_G8bwj81Gku1eIvRfq6Ut-6M/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><div class="dropCap">ए</div>
<p>क लेखक क्यों लिखता है? जाहिर है, तमाम दुनिया तक अपनी बात पहुँचाने के लिए। वह चाहता है कि लोग उसकी बातें उसके विचार पढ़ें, गुनें। अपनी किताबों के ज़रिये वह दुनिया को अपना अर्जित ज्ञान व अनुभव बांटता है। प्राचीन काल के भोज पत्रों व ताड़ पत्रों से लेकर आधुनिक आफसेट प्रिंटरों, डिजिटल ईबुक्स तक का सहारा वह अपनी रचनाओं को चहुँओर सर्वसुलभ बनाने में लेता आ रहा है। आधुनिक युग में लेखकों की प्रकाशित रचनायें आमजन तक पहुंचाने का परंपरागत माध्यम केवल प्रकाशक रहे हैं। परंतु उन्नत छपाई तकनीक की बदौलत अब प्रकाशन जगत में एक और नए विचार का पदार्पण भी हो गया है वह है <strong>सेल्फ़ पब्लिशिंग</strong> या स्वप्रकाशन। और सेल्फ़ पब्लिशिंग को बढ़ावा देने वाला यह प्रकल्प है<strong> प्रिंट आन डिमांड</strong> या मांग पर छपाई।</p>
<h3>क्या है मांग पर छपाई?</h3>
<p>प्रिंट आन डिमांड या मांग पर छपाई की अवधारणा इंटरनेट की दुनिया के लिये नई नहीं है। 2003 में प्रारंभ <strong><a href="http://www.cafepress.com/" target="_blank">कैफेप्रेस</a></strong> जैसे जालस्थलों के माध्यम से आप कॉफी मग, पोस्टर, टी शर्ट, डेस्क कैलेंडर, जैसी विभिन्न वस्तुयें अपने मनमुताबिक डिज़ाईन में मंगा सकते हैं। ये साईटें आपको अपनी बनाई डिज़ाईन भी इस्तेमाल करने देती हैं और खरीदी की कोई न्यूनतम संख्या नहीं होती, चाहें तो केवल एक मग या टीशर्ट मंगा लें। विगत 2‍ &#8211; 3 वर्षों से मांग पर छपाई सेवा में एक नया आयाम आ जुड़ा है सेल्फ़ पब्लिशिंग या स्वप्रकाशन का जिसके अंतर्गत आप अपनी किताब के प्रकाशक स्वयं बन सकते हैं।</p>
<p>2006 के आसपास जब फ्लिकर जैसी फोटो शेयरिंग सेवाओं की लोकप्रियता आसमान छू रही थी तब <strong><a href="http://www.blurb.com" target="_blank">ब्लर्ब</a></strong> जैसे जालस्थलों ने इन चित्रों को प्रिंट रूप में सहेजने के विचार का सृजन किया। फोटो अल्बम रखने के शौकीन लोगों के लिये यह आकर्षक प्रस्ताव था। <a href="http://www.lulu.com/" target="_blank"><strong>लुलु</strong>.कॉम</a> जैसी सेवाओं ने इसे और भी विस्तार दिया और अन्य किस्म के प्रकाशन भी स्वप्रकाशन के दायरे में शामिल होने लगें। पिछले साल लुलु के जरिए 98 हजार किताबें छापी गईं हैं। ऑनलाइन किताब बेचने वाली बड़ी कंपनी अमेजन.कॉम ने भी <a href="http://www.createspace.com/" target="_blank">क्रियेट स्पेस</a> के माध्यम से स्वप्रकाशन की सेवा  पेश की है। 2007 के उत्तरार्ध से भारतीय कंपनियों ने भी इस ओर रुख किया है, फिलहाल अगस्त 2007 में प्रारंभ <strong><a href="http://cinnamonteal.dogearsetc.com/" target="_blank">सिनामोन टील</a></strong> व जुलाई 2008  में प्रारंभ <strong><a href="http://www.pothi.com/" target="_blank">पोथी डॉट कॉम</a></strong> इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। <a href="http://www.depotindia.in" target="_blank">डिपो इंडिया</a> जैसी कुछ अन्य साईटें भी हैं जो कम से कम 25 प्रतियाँ प्रकाशित करती हैं।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none;" title="Jaya-Abhay / Leonard-Quennie" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/pothi-cinnamon.jpg" alt="Jaya-Abhay / Leonard-Quennie" width="615" height="326" /></p>
<p>पोथी डॉट कॉम का संचालन कर रही <strong>जया झा</strong> ने बताया कि भारत में प्रिंट आन डिमांड का प्रयोग तो काफी दिनों से हो रहा है, मसलन भारतीय कार्पोरेट जगत सीमित संख्या में ब्रोशर वगैरह छपवाने और सामान्यजन पोस्टर या मग जैसे उपहार देने हेतु इसका प्रयोग करते रहे हैं पर प्रकाशन जगत में यह अभी प्रयोगात्मक दौर में है। वे मानती हैं कि स्वप्रकाशन की संभावनायें तो विशाल हैं परंतु प्रकाशन की नई तकनीक का भरपूर दोहन करने हेतु परंपरागत प्रकाशन जगत के सभी साझेदारों को इसके मुताबिक खुद को ढालना होगा। सिनामोन टील के <strong>लेनार्ड फर्नान्डिस</strong> भी स्वप्रकाशन के उज्जवल भविष्य के प्रति आशावान हैं। &#8220;मुख्यधारा के भारतीय प्रकाशकों द्वारा सालाना 80 हजार से अधिक किताबें प्रकाशित की जाती हैं और यह उद्योग सालाना 10 से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। अगर हम क्षेत्रिय भाषाओं में स्वप्रकाशन को मिला कर देखें तो यह बाजार बेहद बड़ा है।&#8221;, फर्नान्डिस कहते हैं।</p>
<div id="boxR" style="width: 300px; margin-bottom: 0px; padding-bottom: 0px;">
<h2>फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन</h2>
<p><a target="_blank" href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin: 0px;" title="Kindle" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/kindle.jpg" alt="Kindle" width="300" height="237" /></a><br />
दुनिया बदल रही है, हमारे पढ़ने लिखने की आदतें भी। बदलते समय के साथ लोगों को अब परंपरागत प्रकाशन व विपणन की खामियाँ भी समझ आ रही हैं। <a href="http://www.last100.com/2008/01/16/reading-between-the-lines-of-jobs-comments-on-kindle-android/" target="_blank">स्टीव जॉब्स ने एक बार कहा</a> कि लोग अब पढ़ते ही कहाँ हैं। और बात कड़वी पर सच्ची भी है। ब्रिटेन में प्रकाशित तकरीबन 50 फीसदी किताबें कभी पढ़ी ही नहीं जातीं। कमोबेश यही हाल अन्य मुल्कों का भी होगा। ये पुस्तकें वापस लुगदी बना दी जाती हैं, हालांकि बेहद कम पुस्तकें <em>रीसाईकल्ड </em>कागज पर छापी जाती हैं। इन अतिरिक्त पुस्तकों, जो कभी पढ़ीं नहीं जातीं, की छपाई में जितना <a href="http://booktwo.org/notebook/books-in-the-landfill/" target="_blank"><strong>कार्बन उत्सर्जन</strong> होता है</a> वह एक लाख कारों द्वारा होते कार्बन उत्सर्जन के बराबर होता है। अगर हम वृक्षों की परवाह न भी करें तो भी पर्यावरण को होते इतने नुकसान को रोकना गैरवाजिब नहीं है। समय आ गया है कि मार्केटिंग के उग्र तेवर त्याग प्रकाशक केवल उतना ही छापें जितना लोग वाकई खरीदते और पढ़ते हैं।</p>
<p>तो यह अच्छा ही है कि ईबुक्स आहिस्ता आहिस्ता परंपरागत पुस्तकें का स्थान ले रही हैं। डिजिटल पुस्तकें सस्ती हैं, कागज बचाती हैं और महज़ आपके कंप्यूटर या मोबाईल पर ही हज़ारों किताबें समा सकती हैं। मांग पर छपाई समेत यह सारी तकनीक फ़्यूचर रेडी हैं। अमेज़ॉन द्वारा निर्मित <strong><a target="_blank" href="http://www.amazon.com/dp/B000FI73MA">किंडल</a></strong>  तथा <strong><a target="_blank" href="http://www.sonystyle.com/webapp/wcs/stores/servlet/ContentDisplayView?cmsId=content/reader/index_reader&#038;hideHeaderFooter=false&#038;storeId=10151&#038;catalogId=10551&#038;XID=F:reader:sony">सोनी ईरीडर</a></strong> जैसे <a target="_blank" href="http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_e-book_readers">ईबुक रीडर</a> यंत्रों के कारण किताबें पढ़ने का तरीका और भी बदल गया है। इनके माध्यम से ईबुक, आनलाईन अखबार और ब्लॉग किताबों की तरह पढ़े जा सकेंगे। ज़ाहिर है लेखक पाठकों के इस एक और वर्ग तक पहुंच सकते हैं।</div>
<p>पारंपरिक छपाई, जहाँ प्रकाशित किताबों को अनुमानित मांग के अनुसार निश्चित संख्या में छाप कर भंडारित कर लिया जाता है,  के विपरीत मांग पर छपाई तकनीक में पुस्तक की डिजाइन, लेआउट, सामग्री इत्यादि डिजिटल रूप में तैयार कर कम्प्यूटर में सहेज ली जाती है और जब भी कभी मांग होती है, तो उसे निश्चित संख्या में छाप उनकी आपूर्ति कर दी जाती हैं। इस विधि द्वारा 1 किताब भी छापी जा सकती है और 1 लाख भी। अनोखी बात यह है कि न तो आपको या प्रकाशक को भारी भरकम राशि का निवेश करना होता हैं,  ना ही छपी किताबों की <em>इनवेंटरी </em>प्रबंधित करना होता है, और न <em>लॉजिस्टिक्स </em>का खरचा वहन करना होता है। साथ ही अनबिकी किताबों को ठिकाने लगाने की समस्या से भी दो-चार नहीं होना पड़ता। सेल्फ़ पब्लिशिंग के प्रति रुझान के पीछे अंधाधुंध छपाई से होती पर्यावरणीय क्षति और पारंपरिक पुस्तकों मे प्रति घटती व ईबुक्स जैसे विकल्पों की बढ़ती लोकप्रियता भी है  (<strong>देखें बॉक्सः </strong><em>फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन</em>)।</p>
<h3>लेखक भी आप और प्रकाशक भी आप</h3>
<p>यदि आप लेखक हैं, और आप अपनी किताब छपवाना चाहते हैं, तो आपको ऐसे प्रकाशक को खोजना होगा, जो आपकी किताब छापे भी और विक्रय पर रॉयल्टी भी दे। हिन्दी के लेखक आमतौर पर इतने भाग्यशाली नहीं होते। नतीजतन अधिसंख्य हिन्दी लेखक अपनी किताबें स्वयं छपवाते हैं जिनके लिए उन्हें स्वयं खर्च करना होता है और यह राशि न्यूनतम 15 हजार रुपयों से असीमित हो सकती है। यूं प्रकाशित किताबों के विपणन के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता, क्योंकि अमूमन 500-700 प्रतियों में छपी किताबें साभार भेंट स्वरूप सिर्फ चंद चुनिंदा मित्रों-परिचितों व समीक्षकों के हाथों तक ही पहुँच पाती हैं। पर स्वप्रकाशन तकनीक से यह काम बहुत ही कम लागत में किया जा सकता है। यदि लेखक स्वयं कम्प्यूटर का प्रयोग जानता है, या पाठ डिजिटल सामग्री में उपलब्ध करवाता है तो उसे टाइपिंग-कम्पोजिंग का खर्च भी यहाँ वहन नहीं करना होता है। साथ ही न्यूयार्क हो या बस्तर कहीं से भी कोई इस पुस्तक को मंगवा सकता है, किताबों का आउट आफ स्टॉक हो जाने का कोई भय नहीं। स्वप्रकाशन जालस्थलों के माध्यम से आप बिकी किताबों की संख्या और अपनी रॉयल्टी पर नजर रखी जा सकती है।</p>
<p>पर क्या स्वप्रकाशन अन्ततः शान दिखाने वाली <strong>वैनिटी पब्लिशिंग</strong> ही नहीं है, छपास पीड़ितों के लिये अपने पैसे से अपने रचना कौशल का दावा करने का प्रयास? लेनार्ड फर्नान्डिस इस बात से सहमत नहीं हैं। &#8220;हम अपने ग्राहकों से कभी भी 500 किताबें आर्डर कर उनकी मार्कटिंग करने के लिये नहीं कहते। अलबत्ता हम यह ज़रूर सुझाव देते हैं कि 5 या कम प्रतियाँ छपवाकर समीक्षकों को भेजें और फिर बाजार के निर्णय की प्रतीक्षा करें। हालांकि हम कुछ वितरकों से संपर्क कर रहे हैं पर मुख्यतः हम इंडियाप्लाज़ा और अपने <a href="http://books.dogearsetc.com/" target="_blank">आनलाईन स्टोर</a> से किताबें बेचते हैं।&#8221;  पर जया झा स्पष्ट कहती हैं कि स्वप्रकाशन आम प्रकाशनों के लिये नहीं है, &#8220;यह बाकी बाजारों जैसा ही है, जो मार्केटिंग कर सकें वह बेचने में भी सफल रहते हैं। पर यह समझना ज़रूरी है कि स्वप्रकाशन मास मार्केट के लिये नहीं है, यह niche यानि आला प्रकाशनों के लिये सही माध्यम है।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">बड़े प्रकाशक अब पुरानी किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।</div>
<p>प्रिंट आन डिमांड के वैनिटी पब्लिशिंग की धारा से निकलकर मुख्यधारा के प्रकाशन में पदार्पण के अन्य सबूत भी मिल रहे हैं। <strong>कैंब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस</strong> ने हाल ही में 10,000 पुस्तकें<strong> लाइटनिंग सोर्स</strong> द्वारा बेची हैं। बड़े प्रकाशक अब पुरानी, आउट आफ प्रिंट किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन, वेयरहाउसिंग और लौटाई गईं किताबों की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।</p>
<h3>किनके लिये सही है स्वप्रकाशन</h3>
<p>अगर स्वप्रकाशन वैनिटी पब्लिशिंग नहीं है तो फिर यह किन लेखकों व प्रकाशकों के लिये उपयुक्त होगा? जया बताती हैं कि स्वप्रकाशन का उपयोग थोक प्रकाशन के पहले बाज़ार का जायज़ा लेने के लिये बखूबी किया जा सकता है। और कई प्रकाशक ऐसा कर भी रहे हैं।</p>
<div id="boxL" style="width: 300px;">
<h2>प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग</h2>
<p><strong><a href="http://www.publicdomainreprints.org" target="_blank">पब्लिकडोमेन रीप्रिंट्स</a></strong> के माध्यम से आप ऐसी किताबों को खास अपने लिये छपवा सकते हैं जो कहीं और नहीं मिलतीं। इस जालस्थल पर इंटरनेट आर्काईव और गूगल बुक्स में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Public_domain" target="_blank">सार्वजनिक रूप से मुफ्त  उपलब्ध</a> 20 लाख से ज्यादा किताबें मुहैया हैं। आर्डर करने पर यह उन्हें सही प्रारुप में बदल कर प्रकाशित कर देता है।</p>
<p><strong><a href="http://www.faber.co.uk/faberfinds/" target="_blank">फ़ाबर फाईंड्स</a></strong> पर भी आप आउट आफ प्रिंट पुरानी किताबें मंगा सकते हैं।</p>
<p><img class="alignnone" style="border: 0pt none;" title="Book Mobile" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/bookmobile.jpg" alt="Book Mobile" width="300" height="211" /></p>
<p><strong><a href="http://www.archive.org/texts/bookmobile.php" target="_blank">बुकमोबाईल सेवा</a></strong> के अंतर्गत एक वैन में सैटैलाईट संपर्क, लैपटॉप, लेज़र प्रिंटर और बुक बाईंडिंग मशीन के द्वारा <a href="http://www.archive.org" target="_blank">इंटरनेट आर्काईव</a> पर मुफ्त उपलब्ध हज़ारों उपलब्ध प्रकाशनों को सिर्फ एक डॉलर प्रति पुस्तक की दर से उपलब्ध कराया जाता है। यह गाड़ी अमरीका के स्कूलों में घुमती रहती है और इसे हाल ही में युगांडा भी भेजा गया। इस प्रकल्प को भारत में भी आजमाया गया है। भारत सरकार द्वारा प्रायोजित व सीडैक द्वारा क्रियांवित यह परियोजना अंग्रेजी व हिन्दी की किताबों को इंटरनेट से पुस्तक आकार में उपलब्ध कराती है। सितंबर 2003 की <a href="http://www.powis.com/solutions/case_studies/use_indiabookmobile.php" target="_blank">इस खबर</a> के अनुसार इस परियोजना को वृहद होना था पर इसकी वर्तमान स्थिति के बारे में सामयिकी अनभिज्ञ है। <a href="http://mobilelibrary.cdacnoida.com/" target="_blank">परियोजना का जालस्थल</a> भी बंद पड़ा है।</div>
<p>&#8220;मूलतः यह उन लोगों के लिये है जो प्रकाशन के बारे में कुछ भी नहीं जानते। पर हमारी साईट पर इस बाबत काफी सामग्री है जो उन्हें जानकारी देती है। जो पहले इस सेवा का उपयोग कर चुके हैं और जो उसके लाभ समझते हैं वो हमारे नियमित ग्राहक होते हैं। इसके अलावा उपहार के तौर पर या अपने माता पिता, किसी संबंधी या मित्र की याद में स्मरणीय प्रकाशन के रूप में इसका उपयोग करते हैं। रचना संकलन की पुस्तकें भी काफी लोकप्रिय हैं&#8221;, जया ने बताया।</p>
<p>स्वप्रकाशन के अनेक और अनूठे प्रयोग भी संभव हैं (<strong>देखें बॉक्स:</strong> <em>प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग</em>)। लेनार्ड बताते हैं कि पुणे के एक कॉलेज ने कम छात्र संख्या और बदलते पाठ्यक्रम से निबटने के लिये पाठ्यपुस्तकें स्वप्रकाशन द्वारा छपवाईं। इसी तरह बंगलौर के एक सज्जन ने अपने दादा की कविताओं का संकलन प्रकाशित कर अपने परिवार में ही वितरण किया। जब पाठकवर्ग सीमित हो तो स्वप्रकाशन उपयुक्त माध्यम होता है।</p>
<h3>स्वप्रकाशन और विपणन</h3>
<p>जब प्रकाशक भी आप हों तो स्पष्टतः अपने प्रकाशन की मार्केटिंग की ज़िम्मेवारी भी आप के ही कंधों पर रहती है। लेनार्ड बताते हैं, &#8220;किताब का विपणन पाठकवर्ग के मुताबिक ही किया जा सकता है। जैसे कि हमने एक शिक्षण संस्थान के पूर्व छात्रों की स्मारिका का प्रकाशन किया। ज़ाहिर तौर पर यह समारिका उन पूर्व छात्रों के अलावा किसी और को बेच पाना असंभव होगा।&#8221;  जया का मानना है कि प्रिंट आन डिमांड पुस्तकों को बेचने का स्वाभाविक स्थान आनलाइन है। &#8220;पुस्तक का विपणन उसके लेखक की आनलाईन उपस्थिति का ही विस्तार होता है। वह अपने ब्लॉग, सोशियल नेटवर्क जैसे माध्यमों का प्रयोग कर पुस्तक के बारे में उत्सुकता बढ़ा सकता है। विपणन का एक मूल सिद्घांत हैः सही पाठक या श्रोता वर्ग तक पहुंचना। यह न हो कि लो एक और किताब बाजार में आ गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह स्पष्ट किया जाय कि इस नई किताब में ऐसा क्या है जो पूर्व प्रकाशनों में नहीं था।&#8221;</p>
<p>हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा &#8211; मांग पर छपाई की सुविधा के संबंध में यह कहावत सटीक बैठती है। यह तकनीक आकर्षित करती है, और अंग्रेजी भाषी लेखकों में यह खासी लोकप्रिय भी होने लगी है। और लगता है कि इस विचार को हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों के बीच प्रचलन में आने में अधिक समय नहीं लगेगा। तो फिर देर किस बात की? छाप डालिए अब तक की अपनी सारी की सारी अप्रकाशित पुस्तकें, या फिर लिख डालिए दर्जनों किताबें सांय सांय जिन्हें आप प्रकाशक के इंतजार में अपने मन में तैयार किए बैठे हैं।</p>
<p class="note"><strong>अतिरिक्त सामग्री व साक्षात्कार:</strong> देबाशीष चक्रवर्ती। रवि रतलामी की कुछ पुस्तकें पोथी डॉट कॉम पर क्रय हेतु उपलब्ध हैं। विवरण हेतु <a target="_blank" href="http://raviratlami.blogspot.com/2008/08/blog-post_05.html">यहाँ देखें</a>। सामयिकी का <a target="_blank" href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition">जनवरी 2009 का प्रिंट अंक</a> भी पोथी डॉट कॉम पर उपलब्ध है।</p>
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		<title>सलमान के कारण मेरा नाम याद रखते हैं</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Mar 2009 17:19:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[mathematics]]></category>
		<category><![CDATA[salman khan]]></category>
		<category><![CDATA[teaching]]></category>
		<category><![CDATA[youtube]]></category>

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		<description><![CDATA[कैलीफोर्निया निवासी बैंकर सलमान खान अपनी संस्था खान अकेडमी से इंटरनेट द्वारा मुफ्त शिक्षण उपलब्ध कराते हैं। सामयिकी के लिये डॉ सुनील दीपक ने उनसे बातचीत की।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[
<p><a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-TPkWGlxnhI6hTqEzSpSKSwzSvk/0/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-TPkWGlxnhI6hTqEzSpSKSwzSvk/0/di" border="0" ismap="true"></img></a><br/>
<a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-TPkWGlxnhI6hTqEzSpSKSwzSvk/1/da"><img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-TPkWGlxnhI6hTqEzSpSKSwzSvk/1/di" border="0" ismap="true"></img></a></p><div id="section-teaser">
<div class="dropCap">ग</div>
<p>ये दिन खाना खाने के बाद सुस्ता रहा था तो बात पढ़ाई की निकली। &#8220;गणित में तो अपना बुरा हाल था, कितनी बार ही फेल होते होते बचा&#8221;, मैंने कहा, तो सुपुत्र बोले, &#8220;तब तो <strong>सलमान खान</strong> की तरह कोई शिक्षक आप को भी मिल जाता तो ज़रूर समझ जाते।&#8221;</p>
<p><img style="margin:3px;" title="Salman Khan" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/salman_khan.jpg" alt="Salman Khan" width="300" height="201" align="right" />मुझे थोड़ी हैरानी हुई, सलमान खान और गणित के शिक्षक? आपकी ही तरह मैं भी सोच रहा था हिंदी फिल्म जगत के स्टार सलमान के बारे में, जबकि बेटा बात कर रहा था अमरीका में रहने वाले गणित, एलजेब्रा, केलकुलस आदि विषय आसानी से समझाने वाले एक अन्य सलमान खान के बारे में।</p>
<p>इस दूसरे सलमान के माता पिता बंगलादेश के प्रवासी थे। सलमान 1976 में अमरीका के न्यू ओरलिअंस शहर में पैदा हुए। उन्होंने इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्री प्राप्त की है और कैलीफोर्निया के मेनलो पार्क में एक बैंक में काम करते हैं। अपने खाली समय में वह इंटरनेट के माध्यम से कठिन विषयों को आसान बना कर पढ़ाते हैं। उनकी वेबसाईट <a href="http://www.khanacademy.org"><strong>खान अकेडमी डॉट ओर्ग</strong></a> पर विभिन्न विषयों पर करीब 800 पाठ हैं जिन्हें हर रोज़ करीब 15,000 लोग पढ़ते हैं।</p>
<p>प्रस्तुत है सलमान खान से एक ईमेल साक्षात्कार।</p></div>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> सलमान, &#8220;खान अकेडमी&#8221; के बारे में बताओ। कैसे यह विचार तुम्हारे मन में आया कि इस तरह सरल वीडियो बना कर उनसे कठिन विषयों को समझाया और पढ़ाया जाये?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> खान अकेडमी का ध्येय है लोगों को पूर्ण और मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराना। इस पर वह सब विषय हैं जिन्हें उच्चतर विद्यालय के अंतिम वर्षों और विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया जाता है। इसकी शुरुआत 2006 में हुई जब मैंने अपनी ममेरी बहन को समझाने के लिए गणित का पाठ रिकार्ड करके उसे यूट्यूब पर रखा, जिसे अन्य लोगों ने देखा और मुझे लिखा कि वह पाठ उन्हें अच्छा लगा था और कहा कि अन्य पाठ बनाऊँ। बस वहीं से मेरा यह शौक शुरु हुआ कि सरल, छोटे वीडियो पाठ बनाओ और उन्हें <a href="http://www.youtube.com/khanacademy" target="_blank">यूट्यूब पर</a> डाल दो। खान अकेडमी की वेबसाईट अप्रैल 2008 में बनायी गई।</p>
<div id="boxR" style="width: 342px;">
<h2>नये युग की पाठशालाः यूट्यूब</h2>
<p>आधुनिक युग में यूट्यूब जैसी विडियो शेयरिंग वेबसाईट से शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। शायद इसी काबलियत पर ऩज़र रख गूगल ने दो साल पहले यूट्यूब को 17.6 लाख डॉलर में खरीदा था। कहते हैं कि एक चित्र हज़ारों शब्दों से बेहतर होता है, पर शायद एक विडियो और भी बेहतर होता है। विडियो का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इन्हें अपनी सुविधानुसार देखा जा सकता है और जितनी बार चाहें उतनी बार देखा जा सकता है। और सबसे अहम बात, यह मुफ्त में उपलब्ध हैं।</p>
<div class="wp-caption aligncenter" style="width: 340px"><img title="Khan Academy" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/salman_khan_story.jpg" alt="Khan Academy" width="330" height="235" align="middle" /><p class="wp-caption-text">सलमान माईक्रोसॉफ्ट पेंट पर पाठ समझाते हैं, उनके कंप्यूटर के स्क्रीन की छवि पार्श्व में उनकी आवाज़ के साथ कैमरे द्वारा रिकार्ड कर ली जाती है। फिर आठ मिनट के यह विडियो यूट्यूब पर अपलोड कर दिया जाते है और कड़ियाँ खान अकेडमी के जालस्थल पर डाल दी जाती हैं।</p></div>
<p>खान अकेडमी के विडियो उटपटांग हरकतें करते लोगों के घरेलू विडियो जितने लोकप्रिय भले न हो पर वे छात्रों के बड़े काम आते हैं। इसका सबूत हैं, &#8220;मैं तो फिज़िक्स का कोर्स छोड़ने ही वाला था। आपने बचा लिया&#8221; और यह &#8220;आप तो गणित के भगवान हो!!!&#8221; जैसी टिप्पणियाँ। और यह सब तब, जब सलमान के विडियो बेहद कमतर तकनलाजी से बने होते हैं और जिनमें सलमान खुद दिखते भी नहीं। मियामी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक वॉल्टर सेकाडा जैसे <a href="http://www.msnbc.msn.com/id/28200197" target="_blank">विशेषज्ञों ने माना है</a> कि ये विडियो त्रुटिहीन हैं। उनकी शिकायत बस यह है कि परिभाषा समझाने के बजाय खान उदाहरण से शब्दों को समझाते हैं। पर आठ मिनट के विडियो में इससे ज्यादा और किया भी क्या जा सकता है।</p>
<p>खान का कदम विकाशशील राष्ट्रों के लिये नये द्वार खोलता है। शिक्षाविदों के लिये इस उदाहरण को दोहराना आसान भी है। <a href="http://sites.google.com/" target="_blank">गूगल साईट्स</a> जैसे जालसथल पर मुफ्त साईट बना सकते हैं, <a href="http://zaidlearn.blogspot.com/2008/10/8-free-screencasting-tools-for-tony.html" target="_blank">सेंकड़ों मुफ़्त के स्क्रीन रिकार्डिंग सॉफ्टवेयर</a> उपलबध हैं और सामग्री <a href="http://www.youtube.com/" target="_blank">यूट्यूब</a> या <a href="http://www.slideshare.net/" target="_blank">स्लाईडशेयर</a> पर डाली जा सकती है।</p>
<h3>खान अकेडेमी के बारे में जानकारी देता विडियो</h3>
<p><object width="340" height="285"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/dP6Op2jCcJc&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;border=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/dP6Op2jCcJc&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;border=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="340" height="285"></embed></object>
</div>
<p>मेरे पास अच्छी नौकरी है, मुझे पैसा नहीं चाहिये। मुझे गणित और विज्ञान के विषय बहुत अच्छे लगते हैं, और मुझे पढ़ाने का भी शौक है। इस तरह से वह बच्चे जो पढ़ना चाहते हैं पर जिनके सामने पैसे की या अन्य रुकावटें हैं, वह पढ़ सकते हैं। जब लोग मुझे ईमेल लिखते हैं कि इन पाठों से वे भारत, इथिओपिया या यूगाँडा जैसे देशों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। इंटरनेट फ़ैलेगा तो एक दिन दूर गाँवों में बैठे बच्चे शिक्षक न होने पर भी पढ़ पायेंगे।</p>
<div id="pullQuoteL" style="margin-bottom:10px">इन पाठों से लोग भारत, इथिओपिया या यूगाँडा जैसे देशों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इंटरनेट फ़ैलेगा तो एक दिन दूर गाँवों में बैठे बच्चे शिक्षक न होने पर भी पढ़ पायेंगे।</div>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> तुम्हारे पाठ केवल दस मिनट के ही क्यों होते हैं, और उनमें तुम क्यों नहीं दिखते, केवल तुम्हारी आवाज़ ही सुनायी देती है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> यह सब यूट्यूब की वजह से है, वहाँ पर दस मिनट से अधिक लम्बे वीडियो नहीं चढ़ा सकते थे तो मैंने अपने सारे पाठ दस दस मिनट की अवधि के ही बनाये। बाद में लोग कहने लगे कि पाठ छोटा हो तो उससे समझ अच्छी आती है, तो वही दस मिनट का नियम अब भी चल रहा है। शुरु में मेरे पास वीडियो कैमरा नहीं था, पेंट के प्रोग्राम से लिख कर पाठ बनाता और माईक से साथ में समझाता तो आवाज रिकार्ड हो जाती, इसलिए वीडियो में मेरा चेहरा नहीं दिखता। पर इस बात को भी पढ़ने वाले पसंद करते हैं, कहते हैं कि लगता है कि उनके साथ बैठा कोई साथी ही समझा रहा है।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> तुम्हारा परिवार बांग्लादेश से है पर तुम अमरीका में पैदा हुए, यहीं पले और बड़े हुए। तो तुम्हारी संस्कृति की यह दो जड़े, बंगाली और न्यू ओरलिअंस की अमरीकी जड़ें, इनका आपस में किस तरह से समन्वय होता है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> जब मैं छोटा था तो न्यू ओरलिअंस में गिने चुने बंगाली परिवार थे (अब तो बहुत हैं) लेकिन तब भी वह परिवार सामाजिक दृष्टि से बहुत सक्रिय थे जिससे मेरी अपनी बंगाली पहचान बनी। यह मेरी पहचान धार्मिक और राजनीतिक भेदों से ऊपर थी। मैं दस या ग्यारह साल का हुआ था जब मुझे समझ आया कि मैं हिंदू नहीं और तभी मुझे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश का अंतर भी समझ में आया। तो इस तरह जब छोटी उम्र में आप दूसरे धर्म के साथ इतना गहरा सम्बंध रखते हैं तो एक धर्म के दायरे में स्वयं को बँधा महसूस करना कठिन लगता है।</p>
<p>मैं घर में मज़ाक करता हूँ कि हम लोग इस लिए न्यू ओरलियोनस में बसे क्योंकि यह बंगाल से मिलता जुलता है &#8211; खाने के लिए भरपूर मछली और सीफूड, तेज़ उमस वाला वातावरण, बड़े बड़े तिलचट्टे, बहुत सारे अजीब अजीब लोग, सब कुछ बंगाल से मिलता जुलता। दरअसल यहाँ बसने का कारण था कि मेरे पिता जो डाक्टर थे, उन्हें अस्पताल में रेज़िडेंसी की जगह यहीं मिली थी। मुझे यह भी अच्छा लगता है कि न्यू ओरलिअंस की अपनी गहरी संस्कृति और सभ्यता है। मेरे माँ के परिवार से उनके पाँच भाई और एक फुफेरा भाई भी यहीं आ कर बसे, और उन सब लोगों ने यहाँ की न्यू ओरलिअंस की सभ्यता को खुले मन से स्वीकार और आत्मसात किया है। अपने बचपन होने के दिनों में मुझे व मेरी बहन को लगता था कि हम दुनिया की सबसे अच्छी जगह पर रहते हैं।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> क्या तुम बांग्ला बोल और लिख पढ़ सकते हो?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> मैं बांग्ला बोल समझ तो सकता हूँ पर मेरे बोलने के तरीके पर बंगाली लोग थोड़ा हँसते हैं। लेकिन मुझे बांग्ला लिखना या पढ़ना नहीं आता। मुझे कुछ कुछ हिंदी और उर्दू भी समझ आती हैं पर बोलने में थोड़ी कठिनाई है, हाँ अगर कोई एमरजेंसी हो तो काम चला लेता हूँ।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> काम के अलावा तुम्हारे क्या शौक हैं? क्या कोई भारतीय या बंगाली लेखक तुम्हें पसंद है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> मुझे चित्रकारी और गिटार का शौक है। भारतीय लेखकों में से मैं केवल सलमान रश्दी को जानता हूँ, जिनकी किताब &#8220;मिडनाईटस चिल्डर्न&#8221; मेरी पसंदीदा किताबों में से है। मुझे बॉलीवुड की फ़िल्मों का भी बहुत शौक है। बहुत से लोग सोचते हैं कि यह मेरी पत्नी उमाइमा का प्रभाव है क्योंकि वह बचपन में कराची में रहती थी, लेकिन यह बात सच नहीं, हिदी फ़िल्में मुझे पसंद हैं और मैं उस पर ज़ोर डालता हूँ कि चलो हिंदी फ़िल्म देखें।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> किस तरह की हिंदी फ़िल्में तुम्हें पसंद हैं? और तुम्हारा सबसे प्रिय अभिनेता या अभिनेत्री? क्या सलमान खान की फ़िल्में पसंद हैं? &#8220;द नेमसेक&#8221; और &#8220;स्लमडॉग मिलियनेयर&#8221; देखी?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> &#8220;खोसला का घोसला&#8221; मुझे बहुत अच्छी लगी थी, बोमन ईरानी मुझे बहुत पंसद है। मुझे मसाला फ़िल्में भी अच्छी लगती हैं, जैसे कि &#8220;ओम शाँति ओम&#8221; मुझे बहुत अच्छी लगी थी। सलमान खान की फ़िल्में ठीक ठाक लगती हैं, कुछ खास नहीं। लेकिन उनकी वजह से लोग मेरा नाम ज़रूर याद रखते हैं। &#8220;द नेमसेक&#8221; के गोगोल में मुझे अपनी छवि दिखी थी, वैसा ही परिवारिक वातावरण, वैसे ही बाल, वैसे ही अपनी पहचान न समझ पाने का दिल पर बोझ। मैं भी लड़कपन में न्यू ओरलिअंस के एक हैवी मैटल बैंड का प्रमुख गायक था। जैसे ही मेरी बहन ने &#8220;द नेमसेक&#8221; देखी, उसने मुझे टेलीफ़ोन किया यही बताने के लिए कि फ़िल्म का गोगोल बिल्कुल मेरे जैसा था।</p>
<p>&#8220;स्लमडॉग&#8221; भी मुझे अच्छी लगी, मैंने इसे शुरु शुरु में एक फेस्टीवल में देखा जब यह फ़िल्म इतनी मशहूर नहीं हुई थी।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> इस बातचीत के लिए धन्यवाद सलमान। उम्मीद है कि तुमसे प्रेरणा लेकर कोई इस तरह के पाठ हिंदी व बांग्ला जैसी भाषाओं में भी बनाये तो यह भारत और बांग्लादेश के गाँवों के बच्चों तक भी पहुँच सकते हैं।</em></p>
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