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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151</atom:id><lastBuildDate>Wed, 28 Oct 2009 21:13:30 +0000</lastBuildDate><title>संजय उवाच</title><description>संजय का कार्य सब कुछ देखना और उन्‍हें सुनाना है जो नहीं देख पाए. संजय ने तब भी यही किया था, अब भी यही कर रहा है.</description><link>http://sanjay-uvach.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Sanjay)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>12</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/sanjay-uvach" type="application/rss+xml" /><feedburner:emailServiceId>sanjay-uvach</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-5859247607075056218</guid><pubDate>Tue, 19 Aug 2008 12:31:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-19T05:35:04.810-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">संजय उवाच</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">sanjay uvach</category><title>चिट्ठे का नया प्रकाशन स्‍थल</title><description>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;संजय उवाच को मैने अपने जालस्‍थल पर स्‍थानांतरित कर दिया है. &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;नया पता यह है....&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.sanjayuvach.dailyhindinews.com/"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#3333ff;"&gt;www.sanjayuvach.dailyhindinews.com&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-5859247607075056218?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/nCeF-_J37yY" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/nCeF-_J37yY/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/08/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-1085876527702431696</guid><pubDate>Tue, 26 Feb 2008 21:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-19T05:36:43.368-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ब्रह्मात्‍मज</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">इंटरनैट</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">हिंदी</category><title>ब्रह्मात्‍मज के बहाने, इंटरनैट पर हिंदी</title><description>&lt;a href="http://groups.google.com/group/Chithakar"&gt;चिट्ठाकार&lt;/a&gt; पर &lt;a href="http://nuktachini.debashish.com/"&gt;देबाशीष&lt;/a&gt; जी ने एक &lt;a href="http://groups.google.com/group/Chithakar/browse_thread/thread/170cfe82d80a13e4"&gt;कड़ी&lt;/a&gt; देकर इस &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/Review/Does_Hindi_have_a_future/articleshow/2808638.cms"&gt;समाचार&lt;/a&gt; की ओर ध्‍यान आकर्षित कराया है. समाचार इस बात पर केंद्रित है कि हिंदी की स्थिति क्‍या है? संदर्भ हैं हिंदी फिल्‍मों के जाने-माने समीक्षक अजय ब्रह्मात्‍मज द्वारा अपना &lt;a href="http://passionforcinema.com/author/ajay/"&gt;ब्‍लॉग रोमन भाषा &lt;/a&gt;में लिखा जाना. मैं यहां ब्रह्मात्‍मज पर टिप्‍पणी नहीं कर रहा हूं बल्कि हिंदी के बारे में कुछ कहना चाहता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेख में उन्‍हें यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि अपनी बात ज्‍यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए वे रोमन का इस्‍तेमाल कर रहे हैं. यह बात सुनने में उन्‍हें बुरी लग सकती है जो इंटरनैट पर हिंदी को फलते फूलते देखना चाहते हैं. लेकिन दूसरे नजरिए से देखें तो यह इस कड़वी सच्‍चाई का एक उदाहरण ही है कि इंटरनैट पर आज भी हिंदी के जरिए अपनी बात ज्‍यादा लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्‍होंने यह भ्रष्‍ट तरीका इसीलिए चुना कि उनके लेख वे लोग भी पढ़ सकें जो हिंदी तो समझते हैं लेकिन देवनागरी नहीं पढ़ सकते. यह वैसा है कि हम किसी औजार की मदद से अपने चिट्ठे को दूसरी लिपि में दिखाने के लिंक पाठकों को देते हैं. इसमें कुछ बुरा भी नहीं. तकनीक यदि आपकी अभिव्‍यक्ति को विस्‍तार देती है तो उसका इस्‍तेमाल किया ही जाना चाहिए. हां आप चाहें तो यह तर्क दे सकते हें कि ऐसा ही था तो वे हिंदी में ही लिख कर उसे रोमन में दिखाने का विकल्‍प चुन सकते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल उनका अपना विचार है. पर इस बहाने हमें इस बात पर गौर करने का मौका मिलता है कि क्‍या हिंदी की स्थिति सचमुच इतनी दयनीय है. ईमानदारी से देखें तो हमें यह सच मानना ही होगा कि इंटरनेट पर अभी भी हिंदी को अपना स्‍थान बनाने के लिए बहुत लंबी लड़ाई लड़ना शेष है. जर्मन, फ्रेंच या अन्‍य योरपियन भाषाएं बोलने वाले हिंदीभाषियों से कम होने के बावजूद ये भाषाएं इंटरनेट पर उतनी अनजानी नहीं हैं जितना हमारी भाषा. शायद इसकी वजह यही है कि हमने इस दिशा में उतने बड़े प्रयास अभी नहीं किए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले यह समाचार आया था कि इंटरनैट पर इस्‍तेमाल होने वाली दस सबसे लोकप्रिय भाषाओं में हिंदी कहीं नहीं है. इस समाचार को अंग्रेजी में &lt;a href="http://sify.com/news/fullstory.php?id=14603582"&gt;यहां&lt;/a&gt; पढ़ें. हिंदी में पढ़ने के लिए &lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4169917.html"&gt;यहां&lt;/a&gt; जा सकते हैं. तो इस स्थिति की मुख्‍य वजह क्‍या है? क्‍यों हिंदी में अपनी बात कहने के लिए रोमन का स‍हारा लेना पड़ता है? क्‍या देवनागरी इतनी कमजोर है कि इंटरनैट पर इसके माध्‍यम से कही गई बात लोगों तक नहीं पहुंच सकती? यदि कोई ऐसा सोचता है तो वह गलत है. अलबत्‍ता यह बात कुछ हद तक मानी जा सकती है कि देवनागरी में लिखी गई बात इंटरनैट पर कम लोगों तक पहुंचती है. शायद इसीलिए ब्रह्मात्‍मज जैसे लोगों को रोमन का सहारा लेना पड़ता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका एक पहलू तकनीकी जटिलताओं से जुड़ता है और इसकी वजह भी साफ है. यूनिकोड हिंदी के बारे में आम लोगों की जानकारी अभी भी कम है. अंग्रेजी की तुलना में इंटरनैट पर हिंदी में लिखना आज भी काफी श्रमसाध्‍य और जटिलता लिए है. जो इसके जानकार हैं उन्‍हें यह बात हास्‍यास्‍पद लग सकती है और वे इस बात से सहमत भी नहीं होंगे लेकिन सामान्‍य प्रयोक्‍ता के नजरिए से सोचा जाए (जो तकनीक के जानकार नहीं हैं) तो यह बात सही लगेगी. एक आम कंप्‍यूटर प्रयोक्‍ता से विंडोज में हिंदी लिखने के लिए किए जाने वाले समायोजन की उम्‍मीद करना कुछ ज्‍यादा ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तथ्‍य इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि इसी जटिलता के चलते हिंदी से संबंधित सामग्री इंटरनैट पर तुलनात्‍मक रूप से कम नजर आती है. हिंदी लेखन से संबंधित तकनीकी जटिलताओं को खत्‍म करने का काम अभी शुरू ही हुआ है और इसे एक निश्चित व सरल आकार लेने में कुछ और समय लगेगा. तभी इंटरनैट पर हिंदी की उपस्थिति बढ़ेगी और उपलब्‍ध सामग्री की विश्‍वसनीयता भी. लेकिन इसके बावजूद कि हिंदी के साथ कुछ जटिलताएं हैं, रोमन में लिखने का विचार एकदम गलत है. इससे स्थिति को बदलने में कोई सहायता नहीं मिलेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंटरनैट पर आज भी हिंदी का विश्‍वसनीय संदर्भ भंडार नहीं है. &lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0"&gt;हिंदी वि‍की &lt;/a&gt;जैसी अवधारणा का जन्‍म हो चुका है और विस्‍तार जारी है लेकिन निराश कर देने वाली बात यह है कि इसे समृद्ध करने वाले लोगों का टोटा है. हिंदी के चिट्ठों की संख्‍‍या अभी मुट्ठी भर है और इसे किसी विश्‍वसनीय संदर्भ स्रोत का रूप लेने में शायद कई बरस लगेंगे. &lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0"&gt;हिंदी विकी &lt;/a&gt;पर काम करने वाले स्‍वयंसेवकों की अपनी प्राथमिकताएं हैं और ज्‍यादातर जानकारी बहुत सीमित संदर्भों में ही संग्रहित की जा रही है. यहां अभी करीब 31 हजार पेज की सामग्री है. विस्‍तृत जानकारी के लिए &lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:Statistics"&gt;यहां देखें&lt;/a&gt;. जाहिर है कि इंटरनैट पर हिंदी की उपस्थिति अंग्रेजी की तुलना में अभी नगण्‍य है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-1085876527702431696?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/pFePtYpfVlM" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/pFePtYpfVlM/1.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/02/1.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-1291211784533533386</guid><pubDate>Thu, 14 Feb 2008 23:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-02-14T17:45:57.287-08:00</atom:updated><title>ब्‍लॉ‍ग जगत में अब बहस के नाम पर ऐसी गुंडागर्दी होगी</title><description>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R7ToF_nSxLI/AAAAAAAAAG0/AbjK3InaNdI/s1600-h/screenshot.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5167009862174033074" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R7ToF_nSxLI/AAAAAAAAAG0/AbjK3InaNdI/s200/screenshot.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वाह दिलीप मंडल. मान गए आपको. मान गए कि आप एक अच्छे संपादक हैं. इसीलिए मेरी &lt;a href="http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/02/blog-post.html"&gt;पूरी पोस्‍ट&lt;/a&gt; में से अपनी सुविधानुसार अंश छांट कर &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html"&gt;चिपका &lt;/a&gt;लिए. उससे भी बढि़या कारीगरी यह दिखाई क‍ि अजित वडनेरकर जी की टिप्‍पणी में करेक्‍शन भी लगा दिया. शायद आपने सोचा होगा कि उन्‍होंने गलती से बारोज़गार लिख दिया है.... सो उसे मिटाकर बेरोजगार कर देते हैं. बहुत खूब.  बात को अपने पक्ष में बदलने का प्रयास कर रहे थे, या गालियां देने का कोई नया बहाना तलाश रहे थे....&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मुझे हैरानी है कि असहमति का एक स्‍वर उठते ही आप इतने निचले स्‍तर पर उतर आए. पिछले कई दिनों से बहस के नाम पर हमें गालियां दी जा रही हैं और असभ्‍य भाषा का प्रयोग किया जा रहा है. इसके बावजूद कि हमने सिर्फ वैचारिक असहमति ही व्‍यक्‍त की. लेकिन यह क्‍या है? मेरे चिट्ठे से मेरी सहमत‍ि के बिना पोस्‍ट के अंश और टिप्‍पणियों को कॉपी कर अपने चिट्ठे में मनचाहे ढंग से चिपका दिया और गालियां देना शुरू कर दीं.&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्‍या मैं जान सकता हूं कि आपने किस अधिकार से ऐसा किया? अजित भाई की टिप्‍पणी को जहां से उठाया गया, वह मेरा अपने मित्रों से संवाद का माध्‍यम है न कि चिट्ठे पर की गई टिप्‍पणी. चलिए इतना भी ठीक था, लेकिन उनकी टिप्‍पणी में करेक्‍शन लगा कर बात का अर्थ बदलने जैसी टुच्‍ची हरकत का क्‍या मतलब है? क्‍या साबित करना चाह रहे हैं आप? इतनी बेकरारी क्‍यों है... गालियां देने की? और मैने तो व्‍यक्तिगत तौर पर कोई असम्‍मानजनक बात नहीं कही.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्‍या यही है आपका बहस करने का तरीका? यदि कोई बहस में शामिल होना नहीं चाहता, तो उसे गालियां देंगे. सब आपके सुर में सुर मिलाएं तो ठीक वरना आप और आपका गिरोह मिल कर उस पर कीचड़ उछालेगा, व्‍यक्तिगत तौर पर आक्षेप करेगा. मैं इसकी भर्त्‍सना करता हूं. रही आपकी बहस... सो खूब चलाएं. हमे कोई एतराज नहीं और न ही ऐसी स्‍तरहीनता पर उतर कर बहस करने के इच्‍छुक हैं. &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आपका मुद्दा है मीडिया में दलितों की तलाश सो वही करें.... लेकिन आप अजित वडनेरकर या संजय की असहमति को मुद्दा क्‍यों बना रहे हैं? यह क्‍यों जरूरी है कि सभी आपसे सहमत हों?  क्‍या यह गाली गलौज इसलिए है कि हमने आपसे असह‍मति जताई? या इसलिए कि पूरा जोर लगाने के बावजूद कोई आपकी बहस पर कान धरने को तैयार नहीं? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्‍या अपने विचारों को व्‍यक्‍त करने के लिए अब हमें आपसे या आपके बद्तमीज गिरोह से अनुमति लेना होगी? आप दलितों के मसीहा बनें या बहस चलाने का प्रयास करें, पर कृपया यह बौद्धिक गुंडागर्दी चलाने का प्रयास नहीं करें. गालियां देना हम भी जानते हैं और यकीन करें यदि गाली देने के लिए हमने मुंह खोला तो आपके कान फट जाएंगे. लेकिन हमारा स्‍तर इतना गिरा हुआ नहीं है. &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आप खूब प्रेम से बांसुरी बजाएं... और जरा जोर से बजाइएगा..... शायद कुछ चूहे और जमा हो ही जाएंगे.&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;चित्र में पहला स्‍क्रीनशॉट मेरे चिट्ठे का है और दूसरा मोहल्‍ला की उस पोस्‍ट का जिसमें टिप्‍पणी को करेक्ट करने के बाद  चिपकाया गया.  मेरे मित्र (ध्‍यान दें मैने यह अपने मित्रों से कहा है) स्‍वयं यह फैसला करें कि इस टुच्‍चेपन का क्‍या अर्थ है.&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-1291211784533533386?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/vqMbuhR_HUk" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/vqMbuhR_HUk/blog-post_14.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R7ToF_nSxLI/AAAAAAAAAG0/AbjK3InaNdI/s72-c/screenshot.gif" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-2080933047133657695</guid><pubDate>Thu, 14 Feb 2008 00:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-02-13T18:13:35.852-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">वडनेरकर</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस्‍तक</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">हिंदी ब्‍लॉग</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दैनिक भास्‍कर</category><title>दैनिक भास्‍कर में आज हिंदी ब्‍लॉग्‍स पर पूरा पेज</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R7OeovnSxGI/AAAAAAAAAGI/Ib6ssysHc2s/s1600-h/dastak_bpl_db.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5166647620337321058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R7OeovnSxGI/AAAAAAAAAGI/Ib6ssysHc2s/s320/dastak_bpl_db.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इंटरनैट पर हिंदी को भले ही आज प्रथम दस भाषाओं में शुमार नहीं किया जा रहा हो लेकिन सच यह है कि इंटरनैट पर हिंदी के चिट्ठों की दुनिया का दिन दूनी रात चौगुनी गति से विस्‍तार हो रहा है. इसलिए हिंदी चिट्ठों की बात हर ओर होने लगी है. भारत के प्रमुख हिंदी दैनिक समाचारपत्र &lt;a href="http://www.bhaskar.com/"&gt;दैनिक भास्‍कर&lt;/a&gt; में आज 14 फरवरी के अंक में एक पूरा पेज हिंदी ब्‍लॉग्‍स पर केंद्रित सामग्री के साथ प्रकाशित हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;खास बात यह है कि दस्‍तक नामक इस पेज की पूरी सामग्री हिंदी चिट्ठाकारिता से जुड़े कुछ चिरपरिचित चिट्ठाकारों ने लिखी है. लेकिन सबसे उल्‍लेखनीय तथ्‍य यह है कि दस्‍तक के अतिथि संपादक का दायित्‍व हिंदी चिट्ठा‍कारी के सबसे लोकप्रिय और वरिष्‍ठ चिट्ठाकार &lt;a href="http://raviratlami.blogspot.com/"&gt;श्री रविशंकर रतलामी &lt;/a&gt;ने निभाया है. इनके अलावा &lt;a href="http://anamdasblog.blogspot.com/"&gt;अनामदास&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://wahmedia.blogspot.com/"&gt;बालेंदू शर्मा दधीच&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://nuktachini.debashish.com/"&gt;देबाशीष चक्रवर्ती&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://naisadak.blogspot.com/"&gt;रवीश कुमार&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://www.blogvani.com/"&gt;मैथिली गुप्‍त&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://dairyofanindian.blogspot.com/"&gt;अनिल रघुराज&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://nimal-anand.blogspot.com/"&gt;अभय तिवारी&lt;/a&gt; और &lt;a href="http://udantashtari.blogspot.com/"&gt;उड़न तश्‍तरी &lt;/a&gt;के नाम से विख्‍यात समीर लाल ने हिंदी चिट्ठाकारी और ब्‍लॉग्‍स के बारे में अपने विचार व्‍यक्‍त किए हैं. इसके अलावा हिंदी चिट्ठों के बारे में कुछ ऐसी जानकारियां भी दी गई हैं, जो खास तौर से उन लोगों के लिए काफी उपयोगी साबित होंगीं जिन्‍हें हिंदी चिट्ठाकारी के संबंध में कोई जानकारी नहीं है.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अपने आप में बेहद अनूठे इस पेज का आकल्‍पन और प्रस्‍तुति दैनिक भास्‍कर के भोपाल संस्‍करण में कार्यरत समाचार संपादक &lt;a href="http://shabdavali.blogspot.com/"&gt;श्री अजित वडनेरकर &lt;/a&gt;की है. श्री वडनेरकर का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. वे हिंदी चिट्ठों के चंद सबसे उपयोगी और लोकप्रिय चिट्ठों में से एक &lt;a href="http://shabdavali.blogspot.com/"&gt;शब्‍दावली&lt;/a&gt; के रचयिता हैं. &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दैनिक भास्‍कर के पाठकों को तो यह पेज सहज उपलब्‍ध है लेकिन आप इसे यहां देख भी सकते हैं. पूरे पेज की छवि आपके अनलोकनार्थ प्रस्‍तुत है. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-2080933047133657695?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/WvQ0NDvkBt0" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/WvQ0NDvkBt0/blog-post_13.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R7OeovnSxGI/AAAAAAAAAGI/Ib6ssysHc2s/s72-c/dastak_bpl_db.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/02/blog-post_13.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-6913883693347183917</guid><pubDate>Sat, 09 Feb 2008 01:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-02-09T18:16:21.291-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दलित</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मीडिया</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">पत्रकार</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">बहस</category><title>कौन हैं वास्‍तव में दलित पत्रकार .....</title><description>अचानक संवेदनशीलता का ज्‍वार उमड़ पड़ा, मीडिया में दलितों की खोज हो रही है. इस बात पर बहस छेड़ने की कोशिश हो रही है कि मीडिया में दलित उपेक्षित क्‍यों हैं..... अचानक इसकी जरूरत क्‍यों आ पड़ी? किस छिपे हुए एजेंडे को लेकर यह षड्यंत्रपूर्ण बहस छेड़ी गई है? शायद बहस के लिए कोई और विषय नहीं बचा तो सोचा कि चलो यही पता करते हैं कि न्‍यूज़रूम में कितना जातिवाद है? गोया समाज में पहले से फैला जातिवाद कम है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्रह साल के अपने पत्रकारिता के कॅरियर में कभी मुझे इस बारे में सोचने की जरूरत नहीं पड़ी कि मेरे साथी कौन हैं, या कि क्‍या वे दलित हैं. इस दौरान शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा, जब मेरे सहकर्मियों में कोई दलित नहीं था. मुझे तो सारे नाम याद करना भी कठिन लग रहा है क्‍योंकि उनकी तादाद बहुत है, शायद क्‍योंकि मैं कभी राजधानी में नहीं रहा. लेकिन सच्‍चाई तो यह है कि पंद्रह साल (क्‍योंकि पहले दो साल स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में गुजारे) पहले मुझे अखबार के दफ्तर में जबरदस्‍ती पहली नौकरी दिलवाने वाला मेरा दोस्‍त एक दलित ही था. और वे सवाल कर रहे हैं कि मीडिया में दलितों को नौकरी क्‍यों नहीं मिलती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रही बात मीडिया में दलितों की तो सबसे कड़वा सच यह है कि मीडिया में वे सारे पत्रकार दलित हैं, जिन्‍हें उनकी मेहनत का उचित मुआवजा तक नहीं मिलता. वे दलित हैं जो आज भी महज ढाई-तीन हजार रुपए माहवार के एवज गधों की तरह काम करते हैं, न उन्‍हें भत्‍ते मिलते हैं, न फंड जमा होता है, न कोई अन्‍य सुविधा मिलती है. वे दलित हैं जिन्‍हें बिना किसी नोटिस के नौकरी से निकाल दिया जाता है. और दलित वे हैं जो सारे जहान के शोषण के खिलाफ लिखते हैं लेकिन उनके शोषण की बात कोई नहीं करता. वे खुद भी नहीं करते क्‍योंकि ढाई हजार रुपए की नौकरी गंवाने का माद्दा भी उनमें नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कहिए कि वे कमजोर हैं, अपने शोषण के खिलाफ भी आवाज नहीं उठा सकते.... जी हां यही सच है. वे नहीं कर सकते. लेकिन उनके लिए कौन से सर्वे कराए गए आज तक? किसने पता लगाया कि देश के बहुसंख्‍यक मीडिया संस्‍थानों में पत्रकारों को वेतन आयोग की अनुशंसाओं के मुताबिक वेतन नहीं मिलता है? किसने उठाई ये आवाज कि उनके काम के घंटे तक तय नहीं हैं? किसी ने नहीं... !! और मीडिया के इन दलितों की जाति के बारे में मत पूछिए... वे हर जाति के हैं. ब्राह्मण और अन्‍य सवर्ण जातियों के पत्रकार भी इनमें शामिल हैं. वे पैदायशी दलित नहीं थे, उन्‍हें मीडिया ने दलित बना दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनके पास लिखने को कोई मुद्दा नहीं बचा, वो ऐसे छद्म मुद्दों पर बहस करें. लिस्‍ट बनाएं कि कितने दलित पत्रकार हैं और किस मीडिया हाउस में किस पोस्‍ट पर बैठे हैं? यह गिरोहबंदी किस कलुषित एजेंडे को लागू कराने के लिए है, नहीं जानता? लेकिन कृपया पत्रकारों को जातिवाद के नाम पर बांटने के लिए इस सड़ाध मारती राजनीति का हिस्‍सा बनने पर विवश मत करें. न्‍यूजरूम में अब तक जातिवाद की गंदगी नहीं आई है. कृपया उसे साफ-सुथरा ही रहने दें. बड़े भाई अजित वडनेरकर जी ने इस कथित बहस की सच्‍चाई को सही भांपा और उससे अलग होने का सही फैसला किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ब्राह्मण नहीं हूं, न दलित हूं. अब तक इस सवाल पर कभी विचार करने की जरूरत नहीं पड़ी इसलिए कभी सोचा भी नहीं और न आगे सोचूंगा कि मेरे साथी की जाति क्‍या है, मेरी जाति क्‍या है? आपको जरूरत है तो आप सोचें. फिर भी मुझसे मेरी जाति और नाम पूछेंगे तो आपके लिए मैं कल्‍लू चमार हूं. पेशे से पत्रकार हूं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-6913883693347183917?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/QAJuMIeVuv0" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/QAJuMIeVuv0/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/02/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-2782135562409173434</guid><pubDate>Mon, 14 Jan 2008 21:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-01-14T14:45:01.071-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">आत्‍मदाह</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">स्‍कूल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">समाज</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">प्रशासन</category><title>उसने सरेआम खुद को आग लगाई.....सब देखते रहे</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R4vhedgPwFI/AAAAAAAAAFo/bA9gg1gdUUI/s1600-h/shivkumar.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5155462111887867986" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R4vhedgPwFI/AAAAAAAAAFo/bA9gg1gdUUI/s320/shivkumar.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#3333ff;"&gt;यह तस्‍वीर आत्‍मदाह करने से पांच मिनट पहले ली गई. केसरिया कुरता पहने शिवकुमार चौधरी एक हाथ में जलता हुआ त्रिशूल और दूसरे हाथ में कैरॉसिन से भरी बोतल लिए है. उसके कपड़े कैरॉसिन से भीगे हैं. &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे शहर में बदअमनी फैली हुई है क्‍योंकि एक शख्‍स नाहक मौत का शिकार बन गया. सरेआम खुद पर कैरॉसिन डालकर खुद को आग लगा ली. सैकड़ों लोगों की भीड़ ने देखा पर जल जाने दिया. जहां घटना हुई वह कलेक्‍टर और एसपी के दफ्तरों के बीच कचहरी परिसर का केंद्र स्‍थल है और उस समय वहां क्षेत्र के सांसद अपना साप्‍ताहिक जनता दरबार लगाए बैठे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब चालीस साल का वह इंसान दलित वर्ग से था. और उसने जान क्‍यों दे दी? मृतक एक प्राइमरी स्‍कूल के पालक शिक्षक संघ (पीटीए) का अध्‍यक्ष था. पिछले कई सालों से स्‍कूल की बिल्डिंग नहीं होने के कारण उसे एक मंदिर के परिसर में अस्‍थाई इंतजाम करके चलाया जा रहा है. पीटीए अध्‍यक्ष मांग कर रहा था कि स्‍कूल की बिल्डिंग बनवा दी जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मांग के लिए पिछले साल भर से भी ज्‍यादा समय से वह प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ पैर जोड़ रहा था, उनके ऑफिसों के चक्‍कर लगा रहा था लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. हारकर उसने पिछले महीने प्रशासन को लिखित सूचना दे दी कि अमुक तारीख तक उसकी मांग पूरी नहीं होने पर वह अमुक स्‍थान पर आत्‍मदाह कर लेगा. मांग पूरी नहीं हुई और उसने निर्धारित जग‍ह जाकर पूर्व घोषित समय पर दिन दहाड़े आत्‍मदाह कर लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छह दिन तक अस्‍पताल में जिंदगी के मौत से संघर्ष के बाद रविवार को उसकी इहलीला समाप्‍त हो गई. जिस वक्‍त मैं यह शब्‍द लिख रहा हूं उसका मृत शरीर पूर्ण दाह की प्रतीक्षा में रखा हुआ है क्‍योंकि अब उसकी मौत पर राजनीति की बिसात बिछ चुकी है. दिन भर शहर में उसके समुदाय के लोग सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे. शाम को जब शव आया तो अंतिम संस्‍कार करने से रोक दिया गया क्‍योंकि प्रशासन से उसकी मौत का मुआवजा मांगा जा रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इस मामले को सिर्फ इसलिए विस्‍तार से लिख रहा हूं क्‍योंकि यह हमारे समाज के कई कड़वे दुर्भाग्‍यों का दस्‍तावेज है. एक इंसान को स्‍कूल की बिल्‍डिंग बनवाने के लिए अपनी जान देनी पड़ी और तुर्रा यह कि प्रशासन अब भी कह रहा है कि उस इलाके में जमीन उपलब्‍ध नहीं है. राज्‍य सरकार दावे करती है कि कोई भी स्‍कूल भवन विहीन नहीं रहेगा और यहां ऐसे कई दर्जन स्‍कूल हैं जिनका भवन नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रशासन अब लीपा पोती करने की तैयारी में जुटा है. जांच कर ली गई, कोई बलि का बकरा तलाशा जाएगा. लेकिन एक इंसान बेवक्‍त मारा गया, जो अब वापस नहीं आएगा. उसकी पत्‍नी बेवा और बच्‍चे अनाथ हो गए, उन्‍हें अब उसका साथ कभी नहीं मिल सकेगा. लेकिन यह गूंगा-बहरा समाज और संवेदनहीन प्रशासन इससे कतई प्रभावित नहीं हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये किस तरह का समाज हमने बना लिया है, जहां मानवीय संवेदनाएं मर चुकी हैं. क्‍यों एक इंसान स्‍कूल बनवाने के लिए इस तरह अपनी जान गंवाने पर मजबूर हो गया? इस मौत का जिम्‍मेदार कौन है? ऐसे हजारों सवाल हैं जिनके जवाब शायद कोई नहीं देगा. आखिर एक अदने से इंसान की मौत ही तो हुई .......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बकौल दुष्‍यंत:&lt;br /&gt;इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,&lt;br /&gt;अब किसी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-2782135562409173434?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/r6i_sHofTEc" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/r6i_sHofTEc/blog-post_14.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_Vnbj9m08hVo/R4vhedgPwFI/AAAAAAAAAFo/bA9gg1gdUUI/s72-c/shivkumar.gif" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/01/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-8876340898045798018</guid><pubDate>Tue, 08 Jan 2008 16:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-01-08T09:08:02.133-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">बंदर</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ऑस्‍ट्रेलिया</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">हरभजन</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">क्रिकेट</category><title>और तुम्‍हारी नस्‍ल क्‍या है गोरो?</title><description>इंसान की नस्‍लों में भेदभाव का चलन क्‍यों शुरू हुआ और कैसे शुरू हुआ यह तो मैं नहीं बता सकता क्‍योंकि मैं इस क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं हूं. लेकिन मैं यह देख सकता हूं कि हरभजन सिंह पर नस्‍लभेदी टिप्‍पणी करने का आरोप लगाकर प्रतिबंध का दंड देने में रंगभेद जरूर है. ध्‍यान दें मैने नस्‍लभेद नहीं रंगभेद कहा है. ये दोनों अलग अलग शब्‍द हैं तथापि दोनों का आशय किसी न किसी प्रकार के भेदभाव से है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय होने के कारण रंगभेद का शिकार हमें सदियों पहले से बनाया जाता रहा है. मोहनदास करमचंद गांधी से लेकर शिल्‍पा शेट्टी तक यह सिलसिला बदस्‍तूर जारी है. हरभजन तो इसके एक और शिकार मात्र हैं. आप पूछ सकते हैं कि हरभजन पर तो आरोप है फिर वे शिकार कैसे हुए? जवाब यह है कि उन पर लगाया आरोप साबित नहीं होने के बावजूद दंडित किया जाना उनके साथ अन्‍याय था. इसलिए वे भेदभाव के आरोपी नहीं खुद इसके शिकार हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरभजन को इसलिए दंडित किया गया क्‍योंकि उनके खिलाफ गोरी चमड़ी वाले कुछ ऐसे लोगों ने गवाही दी, जो  उन से लाख दर्जे ऊपर सचिन तेंदुलकर की गवाही से महत्‍वपूर्ण मानी गई. सचिन की गवाही भी इसीलिए नहीं मानी गई क्‍योंकि वे गोरी चमड़ी वाले नहीं हैं. यानि माइक प्रॉक्‍टर हो या माइक डेनिस (दक्षिण अफ्रीका दौरा) भारतीय कभी न कभी इन गोरों के शिकार बनते रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आप को सर्वश्रेष्‍ठ साबित करने के लिए ऑस्‍ट्रेलियाई कप्‍तान की रची इस साजिश में वह सचमुच का बंदरनुमा इंसान एंड्रयू सायमंड्स मोहरा बना. यह वही सायमंड्स है जो भारत में बड़ी डींग हांक कर गया था कि मैं सिर्फ खेल से मतलब रखता हूं और बात ठीक भी है. यह भी एक खेल ही था जो ब जरिये हरभजन भारतीय क्रिकेट टीम के साथ खेला गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीटर रोबक जैसा समीक्षक ऑस्‍ट्रेलियाई टीम की थू-थू कर रहा है, तो समझा जा सकता है कि इन गोरों ने क्‍या किया. इन्‍होंने भद्र पुरुषों के खेल के साथ बहुत अभद्रता की है. खेलों को हमेशा से भाईचारे और सद्भाव का संदेश सारी दुनिया में फैलाने का सबसे सशक्‍त माध्‍यम माना जाता रहा है. लेकिन ऑस्‍ट्रेलियाई टीम ने जो कुछ किया उससे न केवल क्रिकेट बल्कि सारी खेल बिरादरी शर्मसार हो रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को इस मामले में कड़ा रवैया बरकरार रखना होगा वरना यह भेदभाव का सिलसिला रुकने वाला नहीं है. यह केवल खेल की बात नहीं है. टीम भारत का प्रतिनिधित्‍व कर रही है इसलिए खिलाडियों का अपमान भारत का भी अपमान है. यदि बीसीसीआई की नजर में इसकी भी अहमियत नहीं है तो लानत है उन पर. यदि हरभजन को निर्दोष नहीं माना जाता तो भारत को दौरा समाप्‍त कर देना चा‍हिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आप को सर्वश्रेष्‍ठ समझने का दंभ इन गोरी चमड़ी वाले बंदरों में सचमुच बहुत ज्‍यादा है.  ये विश्व चैंपियन जरूर हैं पर एक इंसान के रूप में इनका कद बहुत बौना है. रेकार्ड बुक में सिडनी टैस्‍ट भले ही ऑस्‍ट्रेलिया ने जीता लेकिन सच्‍चाई सब जानते हैं. वे भी जिन्‍होंने यह साजिश रच कर खेल को शर्मिंदा किया. इनकी गोरी चमड़ी के नीचे काला दिल है. वे सिर्फ मैच जीते हैं लेकिन हरने वाली सिर्फ भारतीय टीम नहीं है क्‍योंकि सिडनी में क्रिकेट भी हारा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-8876340898045798018?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/9XnmzQgi4nk" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/9XnmzQgi4nk/blog-post_08.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/01/blog-post_08.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-2574013931151961904</guid><pubDate>Sat, 05 Jan 2008 09:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-01-05T02:14:59.727-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">जेल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">पुलिस</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ब्‍लॉगर</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">फरहान</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">सउदी अरब</category><title>पुलिस ने एक ब्‍लॉगर को जेल में डाला</title><description>ब्‍लॉगर्स के लिए यह बुरी खबर है.  सउदी अरब के सबसे लोकप्रय ब्‍लॉग के लेखक फुआद अल फरहान को वहां की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया क्‍योंकि उन्‍होंने राजनीतिक भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपने ब्‍लॉग पर आवाज उठाई. सउदी अरब में काफी लोग अंग्रेजी और अरबी में ब्‍लॉग लिखते हैं लेकिन पुलिस के ऐसे हस्‍तक्षेप का यह पहला मामला है. कुवैत, बहरीन और मिस्र जैसे देशों से ब्‍लॉगर्स को उत्‍पीडि़त किए जाने के समाचार आते रहते हैं. अब सउदी अरब में भी यह शुरू हो गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सीधे नजरिए से देखें तो ऐसी घटनाएं  अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता  के हनन का मामला दिखती है और हम कूद कर इसके खिलाफ भर्त्‍सना के स्‍वर उठाने लगते हैं. फरहान की गिरफ्तारी भी ऐसा ही मामला है और इसकी सभी निंदा कर रहे हैं. उन्‍हें करीब एक माह पहले पकड़ा गया था.  बहरहाल क्‍या यह घटना सिर्फ निंदा किए जाने का विषय मात्र है? या इसके निहितार्थ कुछ और भी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे ख्‍याल से इसका दूसरा पहलू यह है कि ब्‍लॉगिंग अब  एक ऐसी ग्‍लोबल  विधा बन गई है कि इसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. एक ब्‍लॉगर को अपने विचारों की अभिव्‍यक्ति के लिए जेल में बंद किया जाना इस बात का प्रमाण है कि ब्‍लॉग को लोग गंभीरता से लेते हैं. सउदी अरब की सरकार को फरहान के लेखन से कुछ नुकसान होने का अंदेशा था इसीलिए उन्‍हें गिरफ्तार किया गया. हालांकि यह अलग बात है कि इससे फरहान की आवाज को दबाया नहीं जा सका क्‍योंकि उनकी गिरफ्तारी से  उन लोगों का ध्‍यान भी फरहान के ब्‍लॉग की ओर चला गया जो उसे नहीं पढ़ रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैचारिक अभिव्‍यक्ति का हनन करने के लिए  दमन का रास्‍ता बहुत पहले से अपनाया जाता रहा है.  आज भी सरकारें मीडिया को गाहे ब गाहे इस दमनवादी मानसिकता की झलक दिखलाती रहती हैं. पाकिस्‍तान में पिछले दिनों यही किया गया. लेकिन ब्‍लॉगर्स के साथ ऐसा आमतौर पर नहीं होता था. यह नई परंपरा की शुरूआत है और इससे ब्‍लॉगिंग को मजबूती ही मिलेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में भी प्रकारांतर से यह चलता रहता है. हालांकि हमारे यहां ब्‍लॉगर्स को इस तरह जेल नहीं भेजा जाता वरना हर दिन आधे से ज्‍यादा चिट्ठाकार जेल में होते. बहरहाल फरहान की गिरफ्तारी का मामला केवल निंदा करने का विषय नहीं है. इससे प्रमाणित हो गया है कि ब्‍लॉग एक ग्‍लोबल वायस बन चुका है. ब्‍‍लॉगर्स को अपनी इस ताकत का सही दिशा में और सकारात्‍मक इस्‍तेमाल करना चाहिए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-2574013931151961904?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/9hYUnJxD-Hc" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/9hYUnJxD-Hc/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2008/01/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-1942419473966517362</guid><pubDate>Wed, 26 Dec 2007 17:01:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-12-26T09:08:16.358-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">इंसानियत</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नफरत</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">असहिष्‍णुता</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">आतंकवाद</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">हिंसा</category><title>क्‍योंकि वे नहीं जानते क्‍या कर रहे हैं.....</title><description>उड़ीसा का ऐसी आगजनी से पुराना नाता है. ईसा मसीह के जन्‍मदिन पर कंधमाल में चर्चों पर हमले कर आग लगा दी गई. कुछ साल पहले ऐसी ही एक आग में ग्राहम स्‍टेंस और उनके बेटे को जिंदा जलना पड़ा था. हत्‍यारा आज भी जीवित है और हिंदुत्‍व के रखवालों ने उसे हीरो बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह इंसानी असहिष्‍णुता की कौन सी कहानी है जो बार-बार लिखी जाती है? यह समझना मुश्किल है कि गिरिजाघरों को जला कर किस हिंदुत्‍व की रक्षा की जा रही है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम गांधी को भुला चुके हैं लिहाजा आज उनकी दी हुई सीखों को उद्धृत करना शायद अप्रासांगिक हो चुका है. लेकिन गांधी कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे. उस महात्‍मा ने कुछ दशक पहले कहा था कि ईश्वर सत्‍य नहीं बल्कि सत्‍य ही ईश्वर है. तो गिरिजाघरों की आग से जो सत्‍य निकल कर सामने आ रहा है क्‍या वही ईश्वर है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कौन सा दर्शन है? हम मंदिर बनाने के लिए मस्जिद तोड़ देते हैं. गरिजाघरों को आग लगा देते हैं. हम किस सत्‍य की स्‍थापना कर रहे हैं? यह असहिष्‍णुता और उन्‍माद हिंदुत्‍व तो नहीं. तो फिर यह है क्‍या? यह किस समाज और संस्‍कृति का प्रतिनिधित्‍व करता है? यह निश्चित रूप से भारतीय समाज की परंपरा  और संस्‍कृति तो नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सवालों के  जवाब मुझे भी नहीं मालुम. जिस देश की गंगा-जमुनी संस्‍कृति में सर्वधर्म समभाव और भाईचारा सदियों से समाहित रहा हो, वहां धर्म के नाम पर ऐसा उन्‍माद, ऐसी बर्बरता कई सवालों को जनम देती है. इस समाज को यह स्‍वयं तय करना होगा कि इसका सत्‍य क्‍या है? अयोध्‍या, गोधरा, उड़ीसा ... अब और कहां? कितनी आग और?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी किसी धर्मग्रंथ में पढ़ा था कि ईश्वर एक है, उसके नाम अलग हैं, रूप अलग हैं.  यह भी पढ़ा है कि हर इंसान के अंदर परमात्‍मा का अंश है, जिसे आत्‍मा कहते हैं. और यह भी कि आत्‍मा कभी मरती नहीं. मतलब यह कि सभी इंसान परमात्‍मा का अंश हैं. तो यह आतंकवाद, नक्‍सलवाद, जा‍तीय हिंसा और सांप्रदायिकता कहां से आई? एक इंसान की दूसरे के प्रति नफरत की इस आग में इंसानियत और धर्म कहां है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने और कश्‍मीर, कितने और गोधरा, कितने और गुजरात? कितने और धमाके? कितनी और लाशें? कितने और लादेन? कितने और दारासिंह? किस सत्‍य की तलाश है ये? कब रुकेगी यह नफरत की आंधी? मेरे पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं. वह एक वाक्‍य ही फिर याद आ रहा है: हे ईश्वर इन्‍हें क्षमा कर देना क्‍योंकि ये नहीं जानते ये क्‍या कर रहे हैं.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-1942419473966517362?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/HhgsUnhZffw" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/HhgsUnhZffw/blog-post_26.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2007/12/blog-post_26.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-5414832797238569017</guid><pubDate>Sat, 22 Dec 2007 23:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-12-23T04:43:25.389-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मौत का समय</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मेरी मौत कब होगी</category><title>तो मेरी मौत कब होगी? मैने जान लिया</title><description>So when am I going to die? यह एक ऐसा सवाल है शायद जिसके बारे में शायद कोई सोचना भी नहीं चाहता लेकिन मौत ही जीवन का अंतिम सत्‍य है. इसलिए मैने इसे जानने का फैसला किया. &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;लेकिन मेरा अनुरोध है कि जो कमजोर हृदय हों वे इस पोस्‍ट को आगे नहीं पढ़ें.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भला हो इंटरनैट का, यहां हर चीज की जानकारी उपलब्‍ध है. मौत की जानकारी भी मिलती है, बशर्ते आप जानने को उत्‍सुक हों. सो मैने अपनी मौत का समय जान लिया है... मार्च 02, सन् 2034 को 67 साल की उम्र में मेरी नेचरल मौत होना मुकर्रर है, बशर्ते किसी और वजह से मेरी असायमिक मौत ना हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानता हूं...... जानता हूं...... आपको यह बकवास लग रही है लेकिन मेरी नजर में इसका औचित्‍य है. यदि हमें अपने मरने के समय का एक अनुमान हो जाए, तो जिंदगी में कई ऐसे कामों को अधूरा छूटने से बचाया जा सकता है जो आमतौर पर नहीं हो पाते. कोई अपनी वसीयत करने से चूक जाता है, तो कोई तीर्थ यात्रा नहीं कर पाता. किसी का कोई अरमान अधूरा छूट जाता है तो कोई अपने पीछे अधूरे कामों का ऐसा अंबार छोड़ जाता है कि उसके नाते रिश्‍तेदार परेशान होते रहते हैं और मरने वाले को कोसते रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब सिर्फ इतना कि मौत कोई ऐसी शै नहीं कि हम उससे हमेशा डरते ही रहें और इतना ज्‍यादा डरें कि उसके बारे में कुछ सोच भी नहीं पाएं. बकौल गालिब मौत का एक दिन मुकर्रर है, तो क्‍यों न उसी के हिसाब से प्‍लानिंग कर ली जाए. कि मरते वक्‍त कुछ अरमान दिल में रहने का मलाल न रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो मेरे पास 27 साल और हैं इस जिंदगी को जीने के लिए. अब आपकी उस जिज्ञासा का अंत कर देता हूं कि मैने अपनी मौत का समय कैसे जाना. बहुत आसान है. लेकिन मेरा फिर अनुरोध है कि जो कमजोर हृदय हों, वे इस पोस्‍ट को आगे नहीं पढ़ें ना ही उस लिंक पर जाएं जहां मौत के समय की जानकारी मिलेगी. बहरहाल, यदि आपको जानना हो तो बस यहां क्लिक करें &lt;a href="http://www.deathclock.com/"&gt;मौत का समय &lt;/a&gt;मालुम चल जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा यदि आपकी रुचि हो तो आप यह भी जान सकते हैं कि दुनिया में हर क्षण किसा-किस कारण से कितनी मौतें हो रही हैं. यानि &lt;a href="http://www.bostonapartments.com/calculator-death.htm"&gt;मौत का रीयल टाइम काउंटर&lt;/a&gt;.&lt;br /&gt;मौत की उम्र जानिए एक अन्‍य &lt;a href="http://www.nerdtests.com/ft_dead.php"&gt;रोचक पहेली &lt;/a&gt;से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;डिस्‍क्‍लेमर: इस लेख का उद्देश्‍य मृत्‍यु के बारे में दुष्प्रेरणा पैदा करना कतई नहीं है. अपनी बुद्धि का इस्‍तेमाल कर स्‍वेच्‍छा से लिंक पर जाएं.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-5414832797238569017?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/rvEs1gfIfhs" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/rvEs1gfIfhs/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2007/12/blog-post_22.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-2910728502038210480</guid><pubDate>Wed, 05 Dec 2007 16:53:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-12-05T12:38:20.125-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">डॉक्‍टर</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">विरोध</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">गांव</category><title>डॉक्‍टर साब, क्‍या गांवों में इंसान नहीं रहते?</title><description>सरकार ने कहा कि डॉक्‍टरों को एक साल गांवों में काम करने के बाद ही उपाधि दी जाएगी तो इसे लेकर हाय तौबा शुरू हो गई. लड़कियों ने मंत्री महोदय को शादी करने के लिए प्रपोज़ कर के विरोध जताया. ठीक है भई लोकतंत्र में अभिव्‍‍यक्ति की आजादी की सुविधा जो मिली है. लेकिन क्‍या गांवों में काम करने को कहना इतनी बड़ी सजा है कि आपको इस हद तक विरोध जताने के लिए जाना पड़े?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्‍या आपने नहीं पढ़ा कभी कि भारत गांवों में रहता है? डॉक्‍टर गांव में जाकर काम क्‍यों नहीं करें? क्‍या गांवों में लोग नहीं रहते या ग्रामीण बीमार नहीं होते या भावी डॉक्‍टरों ने यह मान लिया है कि उन्‍हें इलाज कराने के लिए चिकित्‍सा सुविधाओं की दरकार नहीं? शायद विराध करने वालों को नहीं मालुम कि सच क्‍या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक्‍कीसवीं सदी के इस तेजी से विकास के प्रथ पर अग्रसर भारत के गांवों में आज भी मच्‍छर के काटने जैसी बीमारी (नाम तो ज्ञानी डॉक्‍टरों को मालुम ही होगा) से हर साल हजारों मौत हो जाती हैं. अपने नन्‍हे बच्‍चे की समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण मौत होने के बाद बाप उसकी लाश कंधे पर रख कर बीस किमी दूर ले जाने पर विवश होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आए दिन अखबारों में खबरें छपती हैं कि महिला ने अस्‍पताल के बाहर पेड़ के नीचे बच्‍चे को जन्‍म दिया या किसी झोलाछाप डॉक्‍टर के दिए इंजेक्शन से मरीज की मौत हो गई. मतलब सिर्फ इतना कि गांवों में ही चिकित्‍सा सुविधाओं को बढ़ाने और अच्‍छे चिकित्‍सकों की जरूरत ज्‍यादा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि जब शिक्षक पढ़ाने के लिए गांवों में जा सकते हैं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता वहां काम कर सकते हैं, पटवारी और पंचायत सचिव रह सकते हैं, तो डॉक्‍टर क्‍यों नहीं? क्‍या ये महान लोग नियम कायदों से ऊपर हैं? जो गांव में रहते हैं वे भी इंसान ही हैं और इसी देश के वासी हैं. यानि उन्‍हें भी वे सब सुविधाएं पाने का पूरा हक है जो सरकार शहरों में रहने वालों को देती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रावधान को बदला नहीं जाना चाहिए. पैसे कमाने के लालच में एक साल के लिए गांवों में काम नहीं करने के लिए बेजा दबाव बना रहे डॉक्‍टरों के सामने सरकार को झुकना नहीं चाहिए क्‍योंकि यह उन करोड़ों लोगों के साफ नाइंसाफी होगी जो गांवों में रहते हैं और अच्‍छी चिकित्‍सा सुविधा से वंचित हैं. जो गांव में काम नहीं करना चाहता वह डॉक्‍टर भी नहीं बने.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-2910728502038210480?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/omOY_LdY-_U" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/omOY_LdY-_U/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://sanjay-uvach.blogspot.com/2007/12/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3857355201382623151.post-8067871036365332187</guid><pubDate>Tue, 20 Nov 2007 23:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-27T13:09:15.640-08:00</atom:updated><title>आपका स्‍वागत है</title><description>मेरे चिट्ठे पर पधारने के लिए धन्‍यवाद. यह चिट्ठा अभी निर्माणाधीन है. जल्‍द ही आप इस पर सामग्री देख पाएंगे. इस चिट्ठे पर मैं अपने मौलिक विचार रखूंगा जो हर विषय पर होंगे.  सामयिक घटनाचक्र,  सामाजिक सरोकार,  चिट्ठाजगत, राजनीति, खेल.... यानि सब कुछ.  आप चाहें तो इसे खिचड़ी चिट्ठा कह सकते हैं लेकिन यह ऐसा ही रहेगा.  अपने विचारों की मौलिक अभिव्‍यक्ति के लिए मैने इस चिट्ठे को चुना है.  आशा करता हूं कि चिट्ठा आपको पसेद आएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे यह सुझाव कुछ मित्रों ने दिया है कि मैं विषयों का घालमेल नहीं करूं तो अधिक उपयोगी चिट्ठे लिख सकूंगा.  लिहाजा मैने अब से अलग-अलग चिट्ठों पर लिखने का निर्णय किया है.  अब से हल्‍की फुल्‍की और रोचक जानकारी देने का काम मेरे  पहले चिट्ठे &lt;a href="http://www.vetaluvach.blogspot.com/"&gt;वेताल उवाच&lt;/a&gt; पर जारी रहेगा और स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी उपयोगी और रोचक जानकारी देने का काम मेरे तीसरे चिट्ठे &lt;a href="http://www.sehatnama.blogspot.com/"&gt;सेहतनामा&lt;/a&gt; पर चलेगा.  अत: इन दोनों चिट्ठों पर भी पधारें.  आपके सुझावों का सदैव स्‍वागत है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857355201382623151-8067871036365332187?l=sanjay-uvach.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/sanjay-uvach/~4/-B2uzRwotPs" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/sanjay-uvach/~3/-B2uzRwotPs/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total 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