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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;CkMCRHwzfip7ImA9WxJUFkg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695</id><updated>2009-07-15T15:04:25.286+05:30</updated><title>शिवकुमार मिश्र  और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग</title><subtitle type="html">&lt;br&gt;शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय, ब्लॉग-गीरी पर उतर आए हैं| विभिन्न विषयों पर बेलाग और प्रसन्नमन लिखेंगे| उन्होंने निश्चय किया है कि हल्का लिखकर हलके हो लेंगे| लेकिन कभी-कभी गम्भीर भी लिख दें तो बुरा न मनियेगा|&lt;br&gt;||Shivkumar Mishra Aur Gyandutt Pandey Kaa Blog||</subtitle><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>शिवकुमार ज्ञानदत्त</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09074461549353002715</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>291</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/shivgyan" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId>shivgyan</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><entry gd:etag="W/&quot;CEcBQH0_fyp7ImA9WxJUFUo.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-8213907924930713030</id><published>2009-07-14T11:59:00.005+05:30</published><updated>2009-07-14T17:17:31.347+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-14T17:17:31.347+05:30</app:edited><title>घुन्नन-मिलन</title><content type="html">घुन्नन जब दफ्तर में आया उस समय मैं अपने सीनियर के दफ्तर में हो रही एक मीटिंग में था. जैसे ही खबर मिली, मैंने तुंरत मीटिंग कैंसल की और अपने दफ्तर पहुंचा. मेरे सीनियर ने मीटिंग कैंसल करते वक्त मुझसे कहा; "मिश्रा जी, मीटिंग कैंसल नहीं करनी चाहिए आपको. बहुत ज़रूरी है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उन्हें दो टूक जवाब देते हुए कहा; "सर, अगर बाल-सखा से मीटिंग और आफिसियल मीटिंग के बीच चुनना पड़े तो मैं बाल-सखा से मीटिंग को चुनूँगा."&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर सीनियर डर गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई नई बात नहीं है. वे ऐसे ही डरते रहते हैं. उन्हें इस बात की चिंता सताती रहती है कि मैं कहीं रिजाइन न कर दूँ. जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं बचपन से ही बम्बईया फिल्मों के उस इंस्पेक्टर से प्रभावित रहा हूँ जो इस्तीफा लिखकर जेब में रखता है और बात-बात पर अपने सीनियर को चमकाता रहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दफ्तर आया तो घुन्नन को देखकर लगा जैसे सदियों से बरसात का मुंह न देखे रेगिस्तान में सावन के बादल उमड़ आये. उन्हें अंकवारि भरे पंद्रह मिनट तक भेंटता रहा. इच्छा तो हुई कि एक घंटा तक भेंटे और न जाने कितने वर्षों से घुन्नन को न मिल पाने का मलाल निकाल दें. लेकिन ऐसा हो न सका. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पछतावा हुआ कि घुन्नन से गाँव में क्यों नहीं मिला? गाँव में मिला होता तो कम से कम एक घंटा अंकवारि में भरे रहता घुन्नन को. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, उसके बाद मैंने दफ्तर से पूरे दिन के लिए छुट्टी ले ली. रास्ते से दस किस्म की मिठाइयाँ, तीन पैकेट नमकीन, एक किलो जलेबी पैक करवाई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलेबी की कहानी बड़ी मजेदार है. जब मैं और घुन्नन गाँव के प्राईमरी स्कूल में पढ़ते थे, उनदिनों गाँव में जलेबी की गिनती सबसे प्रिय और हमेशा उपलब्ध रहने वाली मिठाई के तौर पर होती थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी याद है. स्कूल के पिछवाड़े मोहनलाल हलवाई की दूकान थी. ज्यादा बड़ी नहीं थी. गाँव में हलवाई की दूकान कितनी बड़ी रहेगी? छोटी सी दूकान में कांच के कुछ मर्तबान. किसी में लाई रहती थी तो किसी में चूडा. गट्टा, रेवड़ी और गुड़ से बने सेव के लिए मर्तबान अलग से होते थे. एक मर्तबान में नमकीन रखी रहती थी. मिठाई के नाम पर मोहनलाल जलेबियाँ बनाता था. दो तरह की जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी और चीनी से बननेवाली जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी को हम चोटिया जलेबी कहते थे. थोड़ी काली होती थी न. अब तो ऐसी जलेबी के दर्शन दूभर हो गए हैं. शहर से नाता क्या जुड़ा, गाँव का सबकुछ पीछे छूट गया. रास्ते तो छूटे ही, चोटिया जलेबी भी छूट गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो यादकर के केवल आँखों को नम किया जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं और घुन्नन जब क्लास बंक करते तो मोहनलाल की दूकान में बैठकर चोटिया जलेबी खाते. मोहनलाल भी हम दोनों से बहुत प्रसन्न रहता था. उनदिनों जलेबी वजन करके बिकती थी. जब हम ढाई सौ ग्राम जलेबी की फरमाईस करते तो तौलने के बाद मोहनलाल दो जलेबियाँ और रख देता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरल-मना मोहनलाल. अब कहाँ मिलेंगे ऐसे लोग? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जब इतने वर्षों बाद घुन्नन से मिला तो अनायास ही जलेबी की याद आ गई. इच्छा तो हुई कि अगर उपलब्ध होती तो आज चाहे जितनी भी दूर जाना पड़ता, जाते और चोटिया जलेबी खोजकर जरूर लाते. जैसे  ही यह बात मन में आई, मैंने दफ्तर के प्यून को फ़ोन किया. जब मैंने उससे पूछा कि चोटिया जलेबी कहाँ मिल सकती है तो उसे समझ में ही नहीं आया कि मैं कैसी जलेबी की बात कर रहा हूँ. जब मैंने उसे पूरी बात बताई तो उसने कहा कि थोड़ी देर में वो बताएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यून से बात करके मैंने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद घुन्नन से उसके घर-परिवार के बारे में पूछा. उसी समय पता चला कि उसका बेटा अब अट्ठारह वर्ष का हो गया है. समय बीतते देर नहीं लगती. सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस बच्चे को तब देखा था जब वह डेढ़ वर्षों का था, अब अट्ठारह वर्षों का हो गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद है. जब घुन्नन का बेटा एक साल का था, मैं घुन्नन के घर उससे मिलने गया था. उसके बेटे को गोद में लिए बैठा था कि बच्चे ने सू-सू कर दिया. पहले के बच्चे सू-सू करते थे तो जिसकी गोद में करते थे उसके कपडे भीग जाते थे. अब तो बच्चे इतने स्मार्ट हो गए हैं कि सू-सू करते हैं तो पता ही नहीं चलता. कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है कि आज भी बच्चे तो बच्चे ही हैं. असल में स्मार्ट माता-पिता हो गए हैं जो बच्चों को हगीज और न जाने क्या-क्या पहना देते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़माने ने बच्चों को भी बच्चा नहीं रहने दिया. हाय रे सभ्यता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात ही बात में घुन्नन ने बताया कि लड़के का एम बी ए के एंट्रेंस एक्जाम में सेलेक्शन हो गया था लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसका एडमिशन अभी तक नहीं हो पाया. मैंने तुंरत घुन्नन से कहा कि वो पैसे की चिंता न करे. मैं उसकी पढ़ाई के लिए पैसे का इंतजाम कर दूंगा. घुन्नन को बहुत संकोच हुआ लेकिन मैंने अपनी बात मनवा ली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी घुन्नन से और बात हो ही रही थी कि दफ्तर से प्यून का फ़ोन आया. उसने बताया कि कैसे उसने बड़ी मेहनत की लेकिन किसी दूकान का पता नहीं मिला जहाँ चोटिया जलेबी मिलती हो. मैं उसकी बात सुनकर दुखी होने ही वाला था कि उसने बताया कि उसके पड़ोस में हलवाई की दूकान है और वह हलवाई अलग से चोटिया जलेबी बनाने पर राजी हो गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यून की बात सुनकर मुझे लगा जैसे किसी ने मरते हुए को संजीवनी बूटी खिला दी हो. अपनी हालत के  बारे में सोचकर मैं कल्पना करने लगा कि श्री राम को कैसा लगा होगा जब उन्होंने हनुमान जी को संजीवनी बूटी वाले पर्वत के साथ देखा होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, मैंने गाड़ी तुंरत दफ्तर की और मोड़ ली. दफ्तर के नीचे ही प्यून खडा मिल गया. मैंने उसे पाने साथ लिया और उस हलवाई की दूकान की तरफ चल दिया. वहां पहुँच कर हलवाई से आधा किलो जलेबी ली. प्यून ने मजाक में कहा भी इस उम्र में इतनी जलेबी खाना ठीक नहीं लेकिन मैं नहीं माना. फिर मन में आया कि जब इतनी मेहनत करके चोटिया जलेबी खरीद ही ली है तो क्यों न फिर शहर से बाहर कोई  प्राईमरी स्कूल भी खोज लिया जाय. ड्राईवर को ऐसे एक प्राईमरी स्कूल की जानकारी थी. वह हमदोनों को वहां ले गया. संयोग देखिये कि इस स्कूल के पिछवाड़े भी एक हलवाई की दूकान थी. मैंने पहले से ख़रीदी चीनी वाली जलेबी ड्राईवर के हवाले कर दी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने और घुन्नन ने उस दूकान पर बैठकर चोटिया जलेबी खाई. न जाने कितने वर्षों बाद ऐसा लगा कि बिना किसी मशीन का इस्तेमाल किये ही बचपन में पहुँच गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को घुन्नन ट्रेन पकड़कर गाँव चला गया. अब मैं उसके वापस आने की बाट जोह रहा हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाल-सखा के मिलन पर ब्लाग पोस्ट &lt;a href="http://halchal.gyandutt.com/2009/07/semi-urban-man.html"&gt;यहाँ&lt;/a&gt; पढ़ सकते हैं. यह तो साहित्यिक पोस्ट है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-8213907924930713030?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/NWXOWXAsixk" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/8213907924930713030/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=8213907924930713030&amp;isPopup=true" title="25 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/8213907924930713030?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/8213907924930713030?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/NWXOWXAsixk/blog-post_14.html" title="घुन्नन-मिलन" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">25</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/07/blog-post_14.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk4GQH8zfSp7ImA9WxJUEkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-7501642418952922042</id><published>2009-07-10T12:06:00.002+05:30</published><updated>2009-07-10T14:05:21.185+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-10T14:05:21.185+05:30</app:edited><title>वही बात...ब्लॉग को साहित्य कहा जा सकता है या नहीं?</title><content type="html">ब्लॉग को साहित्य कहा जाय या नहीं, इस बात पर बहस अब पुरानी हो चुकी है. आज बालसुब्रमण्यम जी ने भी &lt;a href="http://jaihindi.blogspot.com/2009/07/blog-post_10.html"&gt;एक लेख पब्लिश किया है&lt;/a&gt;. उनके लेख में तमाम बातों का जिक्र किया है जिसकी वजह से साहित्य को साहित्य की मान्यता दी जाती है. उन बातों में से एक बात है;   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;"यदि आज ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह बीस-पच्चीस साल बाद भी पढ़ा जाता रहे, तब इस पर विचार किया जा सकता है कि वह साहित्य कहलाने लायक है या नहीं।"&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;इसपर दो मत नहीं हो सकता कि ऊपर लिखी गई बात भी साहित्य को नापने का एक पैमाना है. लेकिन यह मान्यता कब की है? पुरानी है. जब साहित्य के बारे में यह मान्यता उभरी, उनदिनों में और आज के दिनों में बहुत अंतर है. पहले शिक्षा और ज्ञान की उम्र बहुत लम्बी होती थी. लेकिन आज ऐसा नहीं है. तकनीक के विकास की वजह से ज्ञान या शिक्षा की उम्र धीरे-धीरे घटती जा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक शिक्षा या ज्ञान लेकर शिक्षण संस्थाओं से निकलने वाला छात्र देखता है कि कुछ ही वर्षों में उसके ज्ञान को तकनीकी विकास के दौर में किसी और ज्ञान ने रिप्लेस कर दिया.इसके अलावा ज्ञान और शिक्षा के माध्यम भी बदल गए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप  कंप्यूटर को ही ले लीजिये. कंप्यूटर के क्षेत्र में हर एक-दो वर्ष में कोई नई भाषा आकर पुरानी भाषा को रिप्लेस कर रही है. कंप्यूटर के अलावा आप शिक्षा के किसी भी और डिसिप्लिन को ले लीजिये, वह चाहे इंजीनियरिंग हो, मेडिकल हो,अकाऊंटिंग हो, आर्ट हो, सिनेमा हो, या फिर कुछ और, हर क्षेत्र में बदलाव बड़ी तेजी से हो रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में बदलाव से साहित्य अछूता कैसे रह सकता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बालसुब्रमण्यम जी ने खुद लिखा है कि कैसे पहले राहुल साकृत्यायन और किपलिंग के साहित्य की गिनती अच्छे साहित्य के तौर पर होती थी लेकिन बाद में पुनर्विचार के बाद इन लोगों की कृतियों को खारिज कर दिया गया. मेरा प्रश्न यह है कि अगर इन साहित्यकारों  की कृतियों पर पुनर्विचार के बाद इन्हें खारिज किया जा सकता है तो फिर साहित्य की मान्यताओं पर क्या पुनर्विचार भी नहीं किया जा सकता?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले साहित्य को सहेजने के साधन क्या थे? किताब की शक्ल में साहित्य लिखा जाता था. शोध-कार्यों को भी सहेज कर रखने का जरिया भी किताबें ही थीं. वहीँ दूसरी तरफ ब्लॉग जहाँ पर लिखा जाता है वह माध्यम ही रोज बदलता रहता है. हो सकता है कि हमें कल कोई और माध्यम मिले जिसपर लोग ब्लॉग लिखें. हम विचार करें तो शायद इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि असल में ब्लॉग का आईडिया ही व्यावसायिक है. और चूंकि व्यवसाय के काम में लाया जानेवाला आईडिया समय-समय पर बदलता रहता है इसलिए हो सकता है कि कल ब्लॉग का आईडिया ही पूरी तरह से डिस्कार्ड कर दिया जाय. ब्लॉग को कोई और माध्यम रिप्लेस कर दे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराने साहित्य-लेखन पर व्यावसायिक होने का तमगा कभी नहीं लगा सिवाय इसके कुछ प्रकाशक और लेखक साहित्य को कोर्स की किताबों के तौर पर चलवाने के लिए कुछ करते रहते थे. वहीँ आज के साहित्यकारों को देखिये, कितना पैसा मिलता है इन्हें. तो क्या व्यावसायिक होने का बहाना बनाकर इनके साहित्य को खारिज कर दिया जाय?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी कह सकता है कि जो कुछ पहले लिखा गया और अभी तक पढ़ा जा रहा है, वही असली साहित्य है और आज के साहित्यकार जो लिख रहे हैं, चूंकि उसके आज से पचास साल बाद भी पढ़े जाने की गारंटी नहीं है, लिहाजा उनके द्बारा लिखे जाने वाले साहित्य को साहित्य ही न माना जाय. कालजयी लेखन के चक्कर में आज का साहित्यकार अपने समय के समाज और अपने समय की राजनीति के बारे में बात ही न करे तो फिर उसके साहित्य का समाज के लिए क्या फायदा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी ब्लागिंग में ही न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने लिखना शुरू किया तो देखकर लगा कि बहुत अच्छा लिखते हैं. लेकिन वही लोग अब लिखते ही नहीं. ऐसे में उनका लिखा हुआ लोग आज से बीस साल बाद भी याद रखेंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है. लेकिन ब्लागिंग छोड़ने से पहले उन्होंने जो कुछ भी लिखा, उसे न सिर्फ किताब की शक्ल दी जा सकती है बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वह सारा कुछ लोक हितकारी है और शायद आज से बीस साल बाद भी लोग उसे पढ़ना चाहें. ऐसे में ब्लागिंग छोड़ने से पहले उनलोगों ने जितना लिखा, उसे क्या साहित्य नहीं कहा जा सकता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा शिक्षा के माध्यमों में जिस तरह का बदलाव आ रहा है, हो सकता है कल को शिक्षण संस्थायें कुछ ब्लॉग लेखकों के ब्लॉग को अपने पाठ्यक्रम में ले आयें. आखिर जब फिल्मों को साहित्य के पाठ्यक्रम में रखा जा सकता है तो उसी तरह ब्लॉग को भी तो रखा जा सकता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ब्लॉग को साहित्य कहा जाय या नहीं, इस बात पर बहस करना शायद अभी ठीक नहीं होगा. हाँ, जैसा कि हाल ही में सुना गया है,  कुछ संस्थायें इन्टरनेट पर हिंदी साहित्य को उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत हैं. जब हिंदी साहित्य का एक बड़ा भाग नेट पर उपलब्ध होगा और जब ब्लॉग और साहित्य के पाठक एक ही होंगें, तब शायद यह बहस ही बेमानी हो जाय. तब पाठक खुद ही पता लगा लेगा और एक निर्णय पर पहुंचेगा कि ब्लॉग पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वह सब साहित्य है या नहीं? या फिर उसका एक हिस्सा ऐसा है जिसे साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर सच तो यही है न कि आज साहित्य और ब्लॉग के पाठक बहुत हद तक अलग-अलग हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-7501642418952922042?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/eTHBK_z56pQ" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/7501642418952922042/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=7501642418952922042&amp;isPopup=true" title="38 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7501642418952922042?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7501642418952922042?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/eTHBK_z56pQ/blog-post_10.html" title="वही बात...ब्लॉग को साहित्य कहा जा सकता है या नहीं?" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05417015864879214280</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="15845028583339596592" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">38</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/07/blog-post_10.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CU4CRX08eip7ImA9WxJUFEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-4691245604383932894</id><published>2009-07-04T14:17:00.005+05:30</published><updated>2009-07-13T16:49:24.372+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-13T16:49:24.372+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><title>काहे नहीं एक शायर रिक्रूट कर लेते?</title><content type="html">ममता बनर्जी जी ने रेल बजट पेश कर दिया. करना ही था. बजट होता ही है पेश करने के लिए सो उन्होंने कर दिया. बजटीय परंपरा निभाते हुए उन्होंने बजट के साथ-साथ शेर भी पेश किया. शेर था;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोशनी चाँद से होती है सितारों से 'नेहीं'&lt;br /&gt;मोहब्बत कामयाबी से होती है जुनून से 'नेहीं'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ममता जी शेर से बिलकुल 'नेहीं' डरीं. सीधा उसे पेश कर दिया. वैसे भी अब शेरों से कम ही लोग डरते हैं. ऐसे में ममता जी क्यों डरें? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक बात समझ में नहीं आई. वे तो पश्चिम बंगाल से चुनकर गई हैं. ऐसे में उन्हें गुरुदेव की कोई कविता सुनानी चाहिए थी. गुरुदेव की कविता क्यों नहीं सुनाई उन्होंने? शायद उन्हें गुरुदेव की कविता याद न हो. चलिए माना कि उन्हें  गुरुदेव की कविता याद नहीं थी तो उन्होंने नहीं सुनाई लेकिन कवि सुकान्त की ही कविता सुना देतीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपने एक मित्र से कहा; "और कुछ नहीं तो कवि सुकांत की ही कविता सुना देनी चाहिए थी उन्हें."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्र बोले; "अरे तुम्हें मालूम नहीं क्या? कवि सुकांत बुद्धदेव बाबू के चाचा जी थे. ऐसे में ममता जी उनकी कविता क्यों सुनाएं? वैसे भी ममता जी बंगाल के किसी कवि की कविता सुनाती तो लालू जी उनके ऊपर आरोप लगा देते कि वे भारत की रेलमंत्री होकर ऐसे काम कर रही हैं जिसे देखकर लग रहा है कि वे भारत की नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की रेलमंत्री हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे समझ मे आ गया कि उन्होंने शेर क्यों पेश किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसा शेर? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे बढ़िया शेर तो हमारे मोहल्ले के पप्पू जी सुनाते हैं. ममता जी पप्पू जी से ही शेर लिखवा लेतीं. वैसे भी बजट चाहे वित्तमंत्री पढ़ते हों या रेलमंत्री, वे कविता या शेर जरूर पढ़ते हैं. अपने इस कर्म से बाज तो आयेंगे नहीं. ऐसे में तो उन्हें मंत्रालय के लिए शायर और कवि रिक्रूट कर लेने चाहिए. भाई, अगर आप पुराने कवियों या शायरों की रचनाएँ बजट के साथ नहीं पेश करना चाहते तो कम से कम इतना तो करें कि अपने मंत्रालय में कुछ कवि और शायर रिक्रूट कर लें. संसद और देश इस तरह के शेर सुनने से तो बच जाएगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जो शेर ममता जी ने पढ़ा उसका मतलब क्या हो सकता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब शेर और कविता का मतलब सबके लिए समान हो तो फिर साहित्यिक झमेले ही न हों. आलोचकों की ज़रुरत ही न पड़े. कविताओं और शेरों के भावार्थ-उद्योग पर ताला लग जाए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो पेश है ममता जी के पढ़े गए शेर का  मतलब जो अलग-अलग लोगों के लिए बिलकुल अलग-अलग है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रधानमंत्री जी के विचार:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखो जी, ममता जी ने जो शेर पढ़ा, वो हमारी पिछली सरकार के रवैये को बिलकुल साफ़ करते हुए उसे आगे बढ़ाता है. आपको याद हो तो मैंने अपने एक भाषण में कहा था कि देश के संसाधनों पर माइनोरिटी कम्यूनिटी का हक़ सबसे पहले है. अब आप अगर ममता जी के शेर की पहली लाइन पढेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि चाँद माइनोरिटी में है और तारे मेजोरिटी में. लेकिन रोशनी की बात होती है तो चाँद का ही बोलबाला रहता है. तारे कितने भी हों, वे रोशनी नहीं फैला सकते. जहाँ तक दूसरी लाइन की बात है तो मैं इतना ही कहना चाहूँगा मोहब्बत होनी ही चाहिए. मोहब्बत रहने से कामयाबी मिलती रहेगी. क्योंकि कामयाबी के रास्ते में अगर जुनून आ गया तो हम  देखेंगे कि कोई जुनूनी नेता ने सरकार की कामयाबी से जलते हुए सपोर्ट वापस ले लिया. सरकार गिर जायेगी..... चंगा शेर पढ़ा है जी ममता जी ने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यात्री किराए और माल भाड़े में कोई वृद्धि ही नहीं हुई. हम बहुत निराश हो गए थे. हमें चिंता सताने लगी थी कि हम किस मुद्दे पर विरोध करेंगे? वो तो भला हो ममता जी का जिन्होंने यह शेर पढ़कर हमें उबार लिया. शेर  की दोनों लाइन पर हमें आपत्ति है. पहली लाइन पढ़कर हमें गुस्सा आया कि चाँद माइनोरिटी में है लेकिन पूरी रोशनी पर कब्ज़ा किये बैठा है. वहीँ तारे मेजोरिटी में हैं लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं है. उन्हें रोशनी के लिए जिम्मेदार माना ही नहीं जा रहा है. यह किस तरह की सोच है? और दूसरी लाइन पढिये. मोहब्बत कामयाबी से होती है....यह कहकर हमारे ऊपर फब्ती कसी जा रही है कि हम २००४ के चुनावों में कामयाब नहीं हुए इसलिए हमारे सहयोगी दलों ने हमसे मोहब्बत तोड़ ली थी...इस शेर की वजह से हम इस रेल बजट का विरोध करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ममता जी ने जो शेर पढ़ा है उसका भावार्थ यह है कि हमारी पार्टी और उनकी पार्टी मिलकर काम कर रहे हैं. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उनके शेर की पहली लाइन में लिखा है कि रोशनी चाँद से होती है सितारों से नहीं.......कहने का मतलब यह कि इस  गठबंधन में कांग्रेस ही चाँद है. तृणमूल कांग्रेस, पवार जी की कांग्रेस, डी एम के वगैरह सब तारे हैं. मतलब यह कि सरकार जितनी रोशनी बिखेरेगी, वो सारी रोशनी कांग्रेस पार्टी की है. तारे तो ऐं वें ही हैं जी...उनका कोई खास रोल नहीं है. वैसे भी इस शेर को पढ़कर ममता जी ने बता दिया है कि उन्हें समझ में आने लगा है कि चाँद कौन है और सितारे कौन...जहाँ तक दूसरी लाइन की बात है तो उसका अर्थ यह है कि कांग्रेस पार्टी कामयाब है इसलिए समर्थन देने वाली पार्टियों को उससे मोहब्बत है. बी जे पी वाले जुनूनी लोग हैं इसलिए ममता जी को उनसे मोहब्बत नहीं हुई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लालू प्रसाद जी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ममता बनर्जी को रेल के बारे में का मालूम है? उनको का मालूम कि शेर का होता है. ई भी कोई शेर है? पिछला साल जब हम रेल बजट पढ़े थे तो बोले थे कि होल इंडिया कह रहा है चक दे रेलवे....आज कोई नहीं कह रहा है कि चक दे रेलवे...ई शेर पढने से मंत्रालय चलता है?...पढ़ने से नहीं चलता बल्कि पढ़ाने से चलता है...देखा नहीं था का हमको, आई आई एम में पढ़ाने गए थे हम...तब जाकर पांच साल रेल मंत्रालय चला था...का कहा? ई शेर पर हमारा का विचार है...धुत्त...इससे बढ़िया शेर तो हमारा ऊ कवि लिखता है...अरे उहे जो हमारे ऊपर चालीसा लिखा था...का नाम था उसका...हाँ, रतिराम...का बताएँगे इहाँ...बाईटे में शेर का मतलब बता दें?...शेर का मतलब जानना है त स्टूडियो में बुलाओ..ओइसे भी आजकल तुमलोग बोलाता नहीं है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक रेलयात्री के विचार &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ममता जी ने बढ़िया शेर पढ़ा है. इस शेर को पढ़कर उन्होंने अपनी और अपने सरकार की स्थिति स्पष्ट कर दी है. उनके कहने का मतलब है कि रोशनी चाँद से होती है, इसका मतलब यह है कि रेलवे चाँद की तरह चमके, ऐसा होने का कोई चांस नहीं है. उनके कहने का तात्पर्य है कि रोशनी चाँद से होती है लेकिन चाँद बहुत दूर है. कोई-कोई प्रेमी जैसे प्रेमिका से वादा करता है कि तुम्हारे लिए सितारे तोड़ लाऊँगा वैसे ही ममता जी स्पष्ट कर रही हैं कि सितारे तो ला दूं लेकिन उससे कोई रोशनी नहीं होगी. कोई फायदा नहीं होगा तारे लाने से और चाँद हम ला नहीं सकते. बहुत वजन होता है चाँद का. ऐसे में आपलोग रेलवे के साथ मोहब्बत से रहे. मोहब्बत है तो हमें भी कामयाब समझा जाएगा. गाड़ी-वाड़ी लेट चलने से आपलोग जुनूनी मत हो जाइयेगा......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-4691245604383932894?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/w6D1erXhxJs" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/4691245604383932894/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=4691245604383932894&amp;isPopup=true" title="29 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/4691245604383932894?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/4691245604383932894?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/w6D1erXhxJs/blog-post_04.html" title="काहे नहीं एक शायर रिक्रूट कर लेते?" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">29</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/07/blog-post_04.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkAGRXwyeSp7ImA9WxJVF0o.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-1326368665365537949</id><published>2009-07-02T17:15:00.002+05:30</published><updated>2009-07-05T12:55:24.291+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-05T12:55:24.291+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><title>सौ दिन शासन के...</title><content type="html">पहले वर्षों की बात होती थी. शायद इसलिए कि तब पंचवर्षीय योजनाओं का बोलबाला था. अब नहीं है. आम जनता के बीच पंचवर्षीय योजनाओं की भद्द पिट गई. वैसे तब के और अब के भारत देश में अंतर बहुत बढ़ गया है. पहले नेता जी लोग एक बार सरकार बना लेते थे तो प्लान हमेशा पांच वर्ष के महत्वपूर्ण समय पर केन्द्रित रहता था. बाद में समय बदला तो पता चला कि बनी हुई सरकार पांच वर्षों से पहले भी विदा हो सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब यह सीक्रेट लीक हुआ तो पंचवर्षीय का मतलब पूरी तरह से बदल गया. तब पंचवर्षीय का मतलब यह निकाला जाने लगा कि सपोर्ट देने वाले दल एक वर्ष में सरकार को कितना पंच मारते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपोर्ट देने वाले दलों के 'पंच' का असर यह हुआ कि सरकार बनानेवाले दल अब वर्षों की बात नहीं करते. अब वर्षों की बात करने का कोई फायदा भी नहीं है. अब तो सरकार न बनानेवाले भी चुनावों में कहते फिरते हैं; "अगर हमारी सरकार बन गयी तो विदेशी बैंकों में जमा किये गए काले धन को सौ दिन के अन्दर देश में ला पटकेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में जो सरकार बनाएगा वो तो बोलेगा ही कि देश की सारी समस्याओं का हल सौ दिन के भित्तर कर डालेंगे. जनता भले ही कहे कि; "हे आलमपनाह, हमने आप को पूरे  पांच साल के लिए चुन लिया है. ऐसे में आप समस्याओं का हल पांच साल में ही निकालिए. सौ दिन में सारी समस्याएं साल्व करने की कोई जल्दी नहीं है. लेकिन हल निकालिएगा ज़रूर."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सरकार है कि जिद पर अड़ी है कि; "नहीं, हम तो सौ दिन में सारी समस्याओं को साल्व कर देंगे. तुमको अगर हमारी बात बुरी लगती है तो हम इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते. तुम चाहो तो किसी और देश में जाकर बस जाओ. हम तो सारी समस्याओं का खात्मा सौ दिन में ही करेंगे." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारी जनता कर भी क्या सकती है? कहाँ जाकर बसेगी? ऑस्ट्रेलिया में अपने देश वालों की कुटाई चल रही है. बाकी दुनियाँ में और जगह बची कहाँ है जो वहां जाकर बस जाए? ऐसे में और कोई चारा नहीं है. सिवाय इसके कि सरकारी भलमनसाहत को झेले. इसलिए यह सोचकर संतोष कर रही है कि; "जब तुम सौ दिन में ही सबकुछ करने पर उतारू हो तो हम कर ही क्या सकते हैं? वैसे भी जनता की सुनते ही कब हो?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सौ दिन के कार्यक्रम का जायजा भी लिया जाता होगा. पिछले दिनों में मंत्रियों ने जिस तरह से काम करना शुरू किया है उसे देखकर लगता है कि शायद ऐसा कुछ होता होगा;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकदिन प्रधानमंत्री ने अपने निजी सचिव से पूछा; "भाई, सौ दिनों में  सारी समस्याओं का हल निकालने की दिशा में क्या-क्या हुआ है, इसकी जानकारी के लिए मंत्रीगणों की एक मीटिंग बुलाई जाय."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर सचिव जी बोले; "ठीक कह रहे हैं सर. मार्च महीने के बाद से एक भी मीटिंग नहीं हुई है. सब बहुत उदास हैं. मीटिंग-वीटिंग होती रहती हैं तो मन लगा रहता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री जी ने कहा; "तो कल ही एक मीटिंग बुलवाइए. देखें तो कि मंत्रीगण क्या कर रहे हैं सौ दिवसीय कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीटिंग बुलाई गई. सारे मंत्रीगण आये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री ने सबसे पहले मानव संसाधन विकास मंत्री से पूछा; "और क्या हाल है जी? सौ दिवसीय कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आपने क्या किया?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंत्री जी बोले; "मिस्टर प्राइममिनिस्टर सर, मैंने घोषणा कर दी है कि हम दसवीं की परीक्षा स्क्रैप करने के बारे में गंभीरता से विचार कर रहे हैं. हमारा मंत्रालय काम कर रहा है इसे साबित करने के लिए इससे बढ़िया और क्या हो सकता है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री जी बोले; "सही है. लेकिन आपकी इस घोषणा के ऊपर रिएक्शन कैसा रहा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "लगभग सारे न्यूज चैनल पर हंगामा हो गया. सभी चैनल ने पैनल डिस्कशन का आयोजन किया. हमने तो सारे कार्यक्रम की सीडी देखी. मुझे बहुत अच्छा लगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री बोले; "आपके मंत्रालय पर हमें नाज है. सौ दिनों में इससे बढ़िया काम और कुछ हो भी नहीं सकता."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद वे पेट्रोलियम मिनिस्टर से मुखातिब हुए. बोले; " और जी, क्या हाल हैं? आपके मंत्रालय में क्या हुआ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट्रोलियम मिनिस्टर बोले; "हाल बढ़िया है सर. हम युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री ने पूछा; "क्या-क्या किया आपके मंत्रालय ने?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट्रोलियम मिन्स्टर बोले; "हमने तो एक दिन कह दिया कि हम पेट्रोलियम प्राइस को डी-रेगुलेट कर देंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री बोले; "एक दिन कुछ कह देने से क्या होगा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट्रोलियम मिनिस्टर बोले; "पूरी बात तो सुनिए सर. हम दूसरे दिन ही बोल दिए कि हम प्राइस डी-रेगुलेट नहीं कर सकते." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर प्रधानमंत्री बहुत प्रभावित हुए. बोले; "यह होता है परफॉर्मेंस. सीखिए आपलोग. पेट्रोलियम मिनिस्टर &lt;br /&gt;से सीखिए कुछ. और क्या-क्या करने का सोचा है आपने?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट्रोलियम मिनिस्टर अब तक खुश हो लिए थे. बोले; "अब केवल एक ही काम बाकी रह गया है सर. डीजल और पेट्रोल का दाम बढ़ाना."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री बोले; "अरे तो बाकी क्यों छोड़ना? शुभ कार्य में देरी कैसी?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट्रोलियम मिनिस्टर बोले ; "बस, अब मीटिंग से जाते ही एक प्रेस कांफ्रेंस करता हूँ और दाम बढा देता हूँ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट्रोलियम मिनिस्टर से नज़र हटी तो होम मिनिस्टर दिखाई दिए. प्रधानमंत्री उन्हें देखकर खुश हो गए. खुश होने का कारण था कि होम मिनिस्टर अब फाइनेंस मिनिस्टर नहीं हैं. प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा; "और जी होम मिनिस्टर साहब, क्या हाल हैं आपके डिपार्टमेंट के? कैसा चल रहा है सबकुछ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होम मिनिस्टर बोले; " हमारी पूरी एनर्जी सौ दिवसीय कार्यक्रम पर लगी है सर. हम अभी उद्घाटन में बिजी हैं. एन एस जी की यूनिटें खोल रहे हैं. मुंबई में उद्घाटन कर चुके है. चेन्नई जाना है. फिर बाकी की जगहें."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमन्त्री जी बोले; "लेकिन केवल उद्घाटन करने से क्या होगा? और भी कुछ कीजिये."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होम मिनिस्टर बोले; "और भी तो कर ही रहा हूँ न सर. जहाँ भी उद्घाटन करता हूँ वहीँ पर प्रेस कांफ्रेंस करके तुंरत बता डालता हूँ कि आई बी की रिपोर्ट है कि देश के शहरों पर हमले हो सकते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर प्रधानमंत्री बहुत खुश हुए. उनके मन में आया कि इन्हें उसी समय भारत रत्न पुरस्कार दे दें लेकिन वहां पर पुरस्कार देने का माहौल सही नहीं था. प्रोटोकाल गड़बड़ा जाता इसलिए वे मन मारकर रह गए. इधर-उधर देखा तो हेल्थ मिनिस्टर दिखाई दिए. प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा; "और जी, आपके मिनिस्ट्री के क्या हाल हैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेल्थ मिनिस्टर खुश हो गए. उन्होंने कहा; "हम भी वार लेवल पर काम कर रहे हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री ने हेल्थ मिनिस्टर की ख़ुशी का जवाब खुश होकर दिया. उन्होंने खुश होते हुए पूछा; "आपने भी कुछ बयान वगैरह दिया या नहीं अभी तक?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेल्थ मिनिस्टर को लगा कि अपने कर्मों का हिसाब तुंरत दिया जाय. वे बोले; "मैंने भी बयान दे दिया है सर."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमन्त्री ने पूछा; "क्या बयान दिया आपने?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेल्थ मिनिस्टर बोले; "हमने तो कह दिया कि सिनेमा के परदे पर सिगरेट पीते हुए सीन बंद करना ही है तो सबसे पहले बलात्कार के सीन बंद किये जाएँ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री को लगा कि अब सिनेमा का पर्दा स्वच्छ  होकर रहेगा. वे बोले; "वैरी वेल डन. कीप इट अप. हमें अपना  पूरा ध्यान सौ दिवसीय कार्यक्रम पर रखना है. हमें दिशाहीन नहीं होना है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री और हेल्थ मिनिस्टर की बात को दो वेटर सुन नहीं पा रहे थे. एक ने दूसरे से पूछा; "प्राइम मिनिस्टर साहब क्या कह रहे होंगे हेल्थ मिनिस्टर से?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा बोला; "अरे हेल्थ मिनिस्टर से और क्या कहेंगे? पूछ रहे होंगे कि नकली दवाईयों की बिक्री कैसे रोकी जा सकती है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों वेटर ने एक-दूसरे को देखा और हंसने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद रेलमंत्री, खेलमंत्री, शिक्षा मंत्री, सड़क मंत्री, कृषि मंत्री वगैरह मिले. अब तक पूरा वातावरण बन चुका था. प्रधानमंत्री जी के सामने अंतिम पेशी हुई पर्यावरण मंत्री की. प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा; "और जी, क्या हाल हैं पर्यावरण के? आपने क्या किया इस प्रोग्राम को सफल बनाने के लिए?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्यावरण मंत्री बोले; "सर, मैंने नॉएडा में बनने वाले मायावती जी के स्टेच्यू प्रोजेक्ट पर नोटिस भेज दिया है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री  जी बोले; "लेकिन अब नोटिस क्यों भेजा गया? ये प्रोजेक्ट तो काफी समय से चल रहा है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्यावरण मंत्री बोले; "वो तो मुझे देखना पड़ेगा सर कि नोटिस अभी क्यों भेजा गया. लेकिन मुझे लग रहा है कि पहले नोटिस इसलिए नहीं भेजा गया क्योंकि जब प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, उनदिनों मायावती जी सरकार को समर्थन दे रही थीं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री बोले; "छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी. अब नोटिस भेजकर प्रोजेक्ट रोकवा दीजिये. अब तो हमारे पास बहुमत है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीटिंग ख़तम हो गई. जब सारे मंत्री वगैरह चले गए तो वही दो वेटर मीटिंग को लेकर बातें करने लगे. एक बोला; "अच्छा, मंहगाई को लेकर क्या बात हुई? प्राइम मिनिस्टर साहब ने किसी से कुछ पूछा या नहीं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा बोला; "किससे बात करते? अभी तक मंहगाई मंत्री कौन होगा, यह तय नहीं हुआ है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नकली दवाइयों की बिक्री और मंहगाई को रोकने का काम भी जल्द ही होना चाहिए. शायद अगली मीटिंग में कुछ फैसला हो जाए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-1326368665365537949?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/vJcUvNG_SWo" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/1326368665365537949/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=1326368665365537949&amp;isPopup=true" title="23 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/1326368665365537949?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/1326368665365537949?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/vJcUvNG_SWo/blog-post.html" title="सौ दिन शासन के..." /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">23</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/07/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A04BRHY8fip7ImA9WxJVFUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-5857457094755170421</id><published>2009-06-30T11:33:00.005+05:30</published><updated>2009-07-03T11:15:55.876+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:15:55.876+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लागरी" /><title>भेज रहा हूँ नेह-निमंत्रण प्रियवर तुम्हें पढ़ाने को</title><content type="html">ब्लागिंग करते हैं. एक जगह बैठे-बैठे लिख लेते हैं. वहीँ बैठे-बैठे छाप देते हैं. न तो प्रकाशक के आफिस के चक्कर लगाने की ज़रुरत है और न ही लेख के वापस लौट आने की आशंका. झमेला केवल पाठक ढूढ़ने का है. वो भी करने के लिए कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है. मेल में ढेर सारा नाम भरा और सेंड नामक बटन क्लिकिया दिया. कुछ-कुछ वैसा कि;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भेज रहा हूँ नेह-निमंत्रण प्रियवर तुम्हें पढ़ाने को &lt;br /&gt;हे मानस के राजहंस तुम आ जाना टिपियाने को &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कई महीने से चल रहा मेरा यह प्लान आज सुबह-सुबह मुझे भारी पड़ गया. &lt;a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/08/blog-post_11.html"&gt;आज बड़े दिनों बाद लालमुकुंद&lt;/a&gt; पधारे. आफिस में आये तो मैं धन्य हो लिया. पाठक अगर ब्लॉगर से मिलने  खुद आये तो ब्लॉगर धन्य-गति को प्राप्त होगा ही. मैं भी प्राप्त हुआ. उनके बैठते ही पानी मंगवाया. साथ ही कोल्डड्रिंक्स लाने की व्यवस्था में जुट गया. लेकिन एक बात का आभास हो रहा था. लालमुकुंद मेरी इस व्यवस्था से खीझे जा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय के लिए तो उन्होंने खुद को संभाला लेकिन अचानक ज्वालामुखी की तरह फट पड़े. बोले; "तुम कैसे आदमी हो? ठीक है, ब्लागिंग करते हो लेकिन जितनी बार पोस्ट लिखते हो, पढने के लिए मेल क्यों ठेल देते हो?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर मुझे कुछ अजीब सा लगा. पता नहीं क्यों लग रहा था कि वे कुछ नाराज हैं. सामने वाला अगर नाराज हो जाए तो तुंरत गंभीर हो जाना श्रेयस्कर रहता रहता है. लिहाजा मैंने भी गंभीरता की मोटी चादर से मुख को ढांपते हुए कहा; " वो तो देखो, एक एक्सरसाइज टाइप है. मुझे लगता है कि तुम मेरे लेखों को बड़ी गंभीरता से पढ़ते हो. टिप्पणी नहीं देते वो एक अलग बात है लेकिन मुझे भरोसा है कि तुम मुझे सुझाव दोगे कि लेख में क्या कमी है. इसी बात के चलते मैं तुम्हें मेल भेज देता हूँ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहते हुए मेरे मुख पर हल्की सी मुस्कान आ गई. बस, वे तो और बिफर पड़े. बोले; "मैं मजाक के मूड में नहीं हूँ. आज इस तरफ आया था तो सोचा कि तुमसे मिलूँ और इस मुद्दे पर बात करूं. तुम्हें मालूम है, अपनी पोस्ट पढ़वाने के लिए जो मेल भेजते हो, उसका क्या करता हूँ मैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "जाहिर है, उस लिंक को क्लिक करके मेरे लेख पढ़ते होगे. आखिर मैं मेल इसीलिए भेजता हूँ कि तुम मेरे लेख पढ़ सको."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर और बिफर पड़े. बोले; "सीधा डिलीट करता हूँ मैं. तुंरत. पिछले न जाने कितने महीनों से तुमने  परेशान करके रखा है मुझे. और केवल तुम्ही नहीं हो. न जाने और कितने भाई-बन्धु हैं तुम्हारे जो ऐसा करते हैं . तुमलोगों को क्या लगता है, तुम्हारे लेख इस तरह से लोग पढेंगे? अगर ऐसा ही है तो क्या ज़रुरत है ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत की?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत की अपनी भूमिका है. लेकिन मेल की भी अपनी भूमिका है. आज ज़रुरत है नेट पर हिंदी को आगे बढाने की. हम हिंदी की सेवा कर रहे हैं. सेवा बिना कष्ट के तो असंभव है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर मन ही मन कुछ बुदबुदाए. लगा जैसे कह रहे हों; "हिंदी की सेवा! माय फुट."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "लेकिन मेरे लेख तो और लोग पढ़ते हैं. कुछ तो टिप्पणी भी देते हैं. बहुत लोग पसंद करते हैं. ब्लॉगवाणी पर मेरे लेख को ऊपर पहुंचा देते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर उन्होंने माथे पर हाथ रख लिया. बोले; "तुमको क्या लगता है? लोग तुम्हारे लेख पर टिप्पणियां देते हैं इसका मतलब क्या निकालते हो तुम?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "इसका मतलब और क्या हो सकता है? लोग मेरे लेख, मेरी कवितायें बहुत पसंद करते हैं. और क्या मतलब हो सकता है इसका?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "अरे मूढ़मति. दुनियाँ का कुछ पता भी तुम्हें? कौन क्या सोचता है तुम्हारे लेखों के बारे में? जो भी चैट पर मिलता है वो तुम्हारा नाम लेकर यही कहता है कि तुमने उन सब को कितना परेशान कर रखा है. &lt;a href="www.hindini.com/fursatiya"&gt;अनूप जी&lt;/a&gt; परसों चैट पर मिल गए. बोले शिव कुमार मिश्र ने मेल भेज-भेज कर हालत खराब कर दी है. पोस्ट पब्लिश किये नहीं कि तुंरत मेल भेज दिया. पागल कर दिया है इन्होने."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "लेकिन उनकी टिप्पणियों से तो ऐसा नहीं लगता. मेरी एक पोस्ट पर तो उन्होंने "जय हो" भी लिखा था."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "हे भगवान. कुछ नहीं समझाया जा सकता इस आदमी को. तुम्हें मालूम है उन्होंने "जय हो" क्यों लिखा था? इसका कुछ आईडिया है तुम्हें?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "इसका मतलब तो यही होता है कि उन्हें वो लेख बम्फाट लगा होगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोले; "ऐसा कुछ नहीं है. वे तो चाहते थे कि वे "क्षय हो" लिख दें लेकिन "क्षय हो" लिखने लिए टाइम लगता इसलिए उन्होंने "जय हो" लिख  डाला. "जय" टाइप करने के लिए केवल तीन 'की' यूज करने की ज़रुरत होती है.  वहीँ "क्षय" टाइप करने के लिए पूरे पांच 'की' यूज करना पड़ता है. अब कौन झमेला करे. ऐसे में उन्होंने सोचा होगा कि "जय हो" लिख दो. इसका भी मन रह जाएगा. नहीं तो ऐसा न हो कि ये टंकी पर चढ़ जाए."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "लेकिन मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं हो रहा. मैं इसे सही नहीं मानता."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी  बात सुनकर बोले; "तुमको जो मानना है वो मानो. लेकिन सच तो यही है कि लोग तुमसे परेशान है. &lt;a href="http://www.udantashtari.blogspot.com/"&gt;समीर जी&lt;/a&gt; से चैट पर बात हो रही थी. वे भी तुमसे परेशान हैं. कह रहे थे कि पता नहीं मुझे भी क्यों मेल भेज देते हैं. मैं तो बिना मेल मिले ही टिप्पणियां करता हूँ. फिर ऐसे में मेल भेजकर परेशान क्यों करते हैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "लेकिन समीर भाई से तो मैं कलकत्ते में जब मिला तो उन्होंने तो मुझे इस बात की शिकायत नहीं की."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "ये उनका बड़प्पन है, जिसे तुम अपने लिए शाबासी मान रहे हो. कोई भला आदमी सबकुछ सामने कहकर तुम्हें लताड़े तब तुम्हें समझ में आएगा क्या?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "तो क्या किया जाय? अब से मेल भेजना बंद कर दूँ क्या?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुनकर मुझे ऐसी नज़रों से देखा जैसे मेरे अन्दर की बेवकूफी को मीटर टेप लेकर नाप रहे हों. बोले; "तो क्या तब बंद करोगे जब लोग पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखाना शुरू करेंगे? नहीं, बोलो तुम कब बंद करना चाहते हो? तुम्हें पता है, आजकल चिट्ठाकार कौन सा गाना गाते रहते हैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "नहीं मालूम. कौन सा गाना गा रहे हैं आजकल चिट्ठाकारगण"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे  बोले; "सब तुम्हारे और तुम्हारे साथियों के मेल से इतना डरने लगे हैं कि सारे एक ही गाना गा रहे हैं; &lt;strong&gt;'ज़रा सी आहट सी होती है तो दिल पूछता है, कहीं ये वो तो नहीं&lt;/strong&gt;.' सब इतना डरे हुए हैं तुम्हारे मेल देखकर."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ में नहीं आया कि क्या कहूँ? मैं सोच ही रहा था कि कुछ कहूँ तब तक वे बोले पड़े; "और बाकी को तो जाने दो. &lt;a href="http://halchal.gyandutt.com/"&gt;ज्ञान जी&lt;/a&gt; ने एक दिन मुझसे कहा कि तुम उन्हें भी मेल भेज देते हो. जब उनका कमेन्ट ब्लाग पर नहीं मिलता तो एस एम एस देकर फिर से बताते हो ताकि वे तुंरत कमेन्ट करें. मुझसे कोई कह रहा था कि तुम &lt;a href="http://taau.taau.in/"&gt;ताऊ जी&lt;/a&gt; को भी फोन कर देते हो कि एक पोस्ट डाली है, देखिएगा. तुम्हें क्या लगता है? ताऊ जी भी स्टॉक मार्केट वाले हैं तो तुंरत आकर तुम्हें कमेन्ट देंगे? तंग रहते हैं वे भी तुमसे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालमुकुंद जी ने इतनी खरी-खोटी सुनाई कि क्या कहूँ? सबकुछ लिखने जाऊँगा तो पोस्ट पंद्रह पेज की हो जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, मेरी तरह मेल भेजकर पढ़वाने और टिपियाने की एक्सरसाइज करने वाले मित्रों, चलो आज से ही वचन लें कि हम किसी को अब से मेल लिखकर अपनी कविताओं और अपने लेख का लिंक नहीं देंगे. अगर हमारे भाग्य में लिखा ही होगा कि हम परसाई, अज्ञेय, गालिब और दिनकर बनें तो हमें ये सब बनने से कोई नहीं रोक पायेगा. हम बनकर रहेंगे. मेल भेजें या न भेजें.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-5857457094755170421?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/5R2Hm9FhNpM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/5857457094755170421/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=5857457094755170421&amp;isPopup=true" title="45 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5857457094755170421?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5857457094755170421?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/5R2Hm9FhNpM/blog-post_30.html" title="भेज रहा हूँ नेह-निमंत्रण प्रियवर तुम्हें पढ़ाने को" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">45</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_30.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A04NSH05eCp7ImA9WxJVFUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-3667329931144948050</id><published>2009-06-29T12:02:00.003+05:30</published><updated>2009-07-03T11:16:39.320+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:16:39.320+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अर्थशास्त्र" /><title>बजटोत्सव पर निबंध</title><content type="html">जैसा कि हम जानते हैं, ये बजट का मौसम है. टीवी न्यूज चैनलों ने अपनी-अपनी औकात के हिसाब से बजट पर आम आदमी, दाम आदमी, माल आदमी, हाल आदमी, बेहाल आदमी वगैरह की डिमांड और सुझाव वगैरह वित्तमंत्री तक पहुंचाने शुरू कर दिए हैं. कोई 'डीयर मिस्टर फाइनेंस मिनिस्टर' के नाम से प्रोग्राम चला रहा है, कोई 'डीयर प्रणब बाबू' तो कोई 'वित्तमंत्री हमारी भी सुनिए' नाम से. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद आया, एक आर्थिक संस्था द्बारा साल २००८ में आयोजित किया गया एक कार्यक्रम. 'सिट एंड राइट' नामक इस कार्यक्रम में प्रतियोगियों को बजट के ऊपर निबंध लिखने के लिए उकसाया गया था. पेश है उसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले एक प्रतियोगी का निबंध. सूत्रों के अनुसार चूंकि इस आर्थिक संस्था को सरकारी ग्रांट वगैरह मिलती थी, लिहाजा इस प्रतियोगी के निबंध को रिजेक्ट कर दिया गया था. आप निबंध पढिये.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट एक ऐसे दस्तावेज को कहते हैं, जो सरकार के न होनेवाले इनकम और ज़रुरत से ज्यादा होनेवाले खर्चे का लेखा-जोखा पेश करता है. इसके साथ-साथ बजट को सरकार के वादों की किताब भी माना जा सकता है. एक ऐसी किताब जिसमें लिखे गए वादे कभी पूरे नहीं होते. सरकार बजट इसलिए बनाती है जिससे उसे पता चल सके कि वह कौन-कौन से काम नहीं कर सकती. जब बजट पूरी तरह से तैयार हो जाता है तो सरकार अपनी उपलब्धि पर खुश होती है. इस उपलब्धि पर कि आनेवाले साल में बजट में लिखे गए काम छोड़कर बाकी सब कुछ किया जा सकता हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार का चलना और न चलना उसकी इसी उपलब्धि पर निर्भर करता है. कह सकते हैं कि सरकार है तो बजट है और बजट है तो सरकार है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के तमाम कार्यक्रमों में बजट का सबसे ऊंचा स्थान है. बजट बनाना और बजटीय भाषण लिखना भारत सरकार का एक ऐसा कार्यक्रम है जो साल में सिर्फ़ एकबार होता है. सरकार के साथ-साथ जनता भी पूरे साल भर इंतजार करती है तब जाकर एक अदद बजट की प्राप्ति होती है. वित्तमंत्री फरवरी महीने के अन्तिम दिन बजट पेश करते हैं. वैसे जिस वर्ष संसदीय लोकतंत्र की मजबूती जांचने के लिए चुनाव होते हैं, उस वर्ष 'सम्पूर्ण बजट' का मौसम देर से आता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय बजट का इतिहास पढ़ने से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि पहले बजट की पेशी शाम को पाँच बजे होती थी. बाद में बजट की पेशी का समय बदलकर सुबह के ११ बजे कर दिया गया. ऐसा करने के पीछे मूल कारण ये बताया गया कि अँग्रेजी सरकार पाँच बजे शाम को बजट पेश करती है लिहाजा भारतीय सरकार भी अगर शाम को पाँच बजे बजट पेश करे तो उसके इस कार्यक्रम से अँग्रेजी साम्राज्यवाद की बू आएगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोगों का मानना है कि बजट सरकार का होता है. वैसे जानकार लोग यह बताते हैं कि बजट पूरी तरह से उसे पढ़ने वाले वित्तमंत्री का होता है. बजट लिखने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम बजट में 'कोट' की जाने वाली कविता के सेलेक्शन का होता है. ऐसा इसलिए माना जाता है कि बजट पढ़ने पर तालियों के साथ-साथ कभी-कभी गालियों का महत्वपूर्ण राजनैतिक कार्यक्रम भी चलता है लेकिन बजटीय भाषण के दौरान जब मेहनत करके छांटी गई कविता पढ़ी जाती है तो केवल तालियाँ बजती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट में कोट की जाने वाली कविता किसकी होगी, ये वित्त मंत्री के ऊपर डिपेण्ड करता है. जैसे अगर वित्तमंत्री तमिलनाडु राज्य से होता है तो अक्सर कविता महान कवि थिरु वेल्लूर की होती है. अगर वित्तमंत्री पश्चिम बंगाल का हो तो फिर कविता कविगुरु रबिन्द्रनाथ टैगोर की होती है. लेकिन वित्तमंत्री अगर उत्तर भारत के किसी राज्य या तथाकथित 'काऊ बेल्ट' का होता है तो कविता या शेर किसी भी कवि या शायर से उधार लिया जा सकता है, जैसे दिनकर, गालिब वगैरह वगैरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नब्बे के दशक तक बजटीय भाषणों में सिगरेट, साबुन, चाय, माचिस, मिट्टी के तेल, पेट्रोल, डीजल, एक्साईज, सेल्स टैक्स, इन्कम टैक्स, सस्ता, मंहगा जैसे सामाजिक शब्द भारी मात्रा में पाये जाते थे. लेकिन नब्बे के दशक के बाद में पढ़े गए बजटीय भाषणों में आर्थिक सुधार, डॉलर, विदेशी पूँजी, एक्सपोर्ट्स, इम्पोर्ट्स, ऍफ़डीआई, ऍफ़आईआई, फिस्कल डिफीसिट, मुद्रास्फीति, आरबीआई, ऑटो सेक्टर, आईटी सेक्टर, इन्फ्लेशन, बेल-आउट, स्कैम जैसे आर्थिक शब्दों की भरमार रही. ऐसे नए शब्दों के इस्तेमाल करके विदेशियों और देश की जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि भारत में बजट अब एक आर्थिक कार्यक्रम के रूप में स्थापित हो रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो लोगों का मानना है कि बजट बनाने में पूरी की पूरी भूमिका वित्तमंत्री और उनके सलाहकारों की होती है लेकिन जानकारों का मानना है कि ये बात सच नहीं है. जानकार बताते हैं कि बजट के तीन-चार महीने पहले से ही औद्योगिक घराने और अलग-अलग उद्योगों के प्रतिनिधि 'गिरोह' बनाकर वित्तमंत्री से मिलते हैं जिससे उनपर दबाव बनाकर अपने हिसाब से बजट बनवाया जा सके. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकारों की इस बात में सच्चाई है, ऐसा कई बार बजटीय भाषण सुनने से और तमाम क्षेत्रों में भारी मात्रा में दी जाने वाली छूट और लूट वगैरह को देखकर पता चलता है. कुछ जानकारों का यह मानना भी है कि सरकार ने कई बार बजट निर्माण के कार्य का निजीकरण करने के बारे में भी विचार किया था लेकिन सरकार को समर्थन देनेवाली पार्टियों के विरोध पर सरकार ने ये विचार त्याग दिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट का भाषण कैसे लिखा जाए, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कौन से पंथ पर चलने वाले सरकार को समर्थन दे रहे हैं. जैसे अगर सरकार को वामपंथियों से समर्थन मिलता है तो निजीकरण, सुधार जैसे शब्द भारी मात्रा में नहीं पाए जाते. उस स्थिति में सुधार की जगह उधार जैसे शब्द ले लेते हैं. वहीँ, अगर सरकार को समर्थन  की ज़रुरत न पड़े तो फिर वो जो चाहे, जहाँ चाहे वैसे शब्द सुविधानुसार लिख लेती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट के मौसम में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव भारी मात्रा में परिलक्षित होते हैं. 'बजटोत्सव' के कुछ दिन पहले से ही वित्तमंत्री के पुतले की बिक्री बढ़ जाती है. ऐसे पुतले बजट प्रस्तुति के बाद जलाने के काम आते हैं. कुछ राज्यों में 'सरकार' के पुतले जलाने का कार्यक्रम भी होता है. पिछले सालों में सरकार के वित्त सलाहकारों ने इन पुतलों की मैन्यूफैक्चरिंग पर इक्साईज ड्यूटी बढ़ाने पर विचार भी किया था लेकिन मामले को यह कहकर टाल दिया गया कि इस सेक्टर में चूंकि छोटे उद्योग हैं तो उन्हें सरकारी छूट का लाभ मिलना अति आवश्यक है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुतले जलाने के अलावा कई राज्यों में बंद और रास्ता रोको का राजनैतिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है. बजट का उपयोग सरकार को समर्थन देने वाली राजनैतिक पार्टियों द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी देने में भी किया जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यक्रमों के अलावा एक और कार्यक्रम होता है जिसे बजट के 'टीवीय विमर्श' के नाम से जाना जाता है. ऐसे विमर्श में टीवी पर बैठे पत्रकार और उद्योगपति बजट देखकर वित्तमंत्री को नम्बर देने का सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाते हैं. देश में लोकतंत्र है, इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण बजट के दिन देखने को मिलता है. एक ही बजट पर तमाम उद्योगपति और जानकार वित्तमंत्री को दो से लेकर दस नम्बर तक देते हैं. लोकतंत्र पूरी तरह से मजबूत है, इस बात को दर्शाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों में बीच-बीच में 'आम आदमी' का वक्तव्य भी दिखाया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय सरकार के बजटोत्सव कार्यक्रम पर रिसर्च करने के बाद हाल ही में कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों ने अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में भारतीय बजट के नाम से एक नया अध्याय जोड़ने पर विमर्श शुरू कर दिया है. कुछ विश्वविद्यालयों का मानना है; 'अगर भारत सरकार के बजट को पाठ्यक्रम में रखा जाय तो न सिर्फ अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा अपितु राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी भी लाभान्वित होंगे.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशा है भारतीय सरकार के बजट की पढ़ाई एकदिन पूरी दुनियाँ में कम्पलसरी हो जायेगी. भारतीय बजट दिन  दूनी और रात चौगुनी तरक्की करेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जय हिंद का बजट&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-3667329931144948050?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/ul1VhhBlZ0g" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/3667329931144948050/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=3667329931144948050&amp;isPopup=true" title="20 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3667329931144948050?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3667329931144948050?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/ul1VhhBlZ0g/blog-post_29.html" title="बजटोत्सव पर निबंध" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">20</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_29.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkcARHo8cSp7ImA9WxJVFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-928879966560423075</id><published>2009-06-27T17:55:00.001+05:30</published><updated>2009-07-03T11:17:25.479+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:17:25.479+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लागरी में मौज" /><title>जिज्ञासु अभिषेक और क्लाइमेक्स वाले युधिष्ठिर</title><content type="html">&lt;a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_23.html"&gt;पिछली पोस्ट&lt;/a&gt; पर अपनी टिप्पणी में &lt;a href="http://ojha-uwaach.blogspot.com"&gt;अभिषेक&lt;/a&gt; ने पूछा; "&lt;strong&gt;ई क्लाइमेक्स में युधिष्ठिर जी क्या कर रहे हैं?"&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिषेक जिज्ञासु ब्लॉगर हैं. बाकी के लोग नहीं हैं. इसलिए मैंने सोचा कि अभिषेक की जिज्ञासा का समाधान करना चाहिए. मेरे मन में आया कि; 'कहीं ऐसा न हो कि अभिषेक की जिज्ञासा का समाधान न करने पर एक टिप्पणीकार नाराज़ हो जाए और भविष्य में लिखी जाने वाली पोस्ट पर टिप्पणी ही न करे. ऐसे में हमें तो एक टिप्पणी का नुकशान हो जाएगा न. (इस बात पर स्माईली नहीं लगाऊँगा. यह बहुत गंभीर बात है.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो यह रहा अभिषेक की जिज्ञासा का उत्तर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर के हवाले से हम जानते हैं कि मन सबसे तेज भागता है. क्या कहा? युधिष्ठिर के हवाले से कैसे जानते हैं? अरे, मेरे कहने का मतलब उन यक्ष जी के सवालों को याद कीजिये जो उन्होंने युधिष्ठिर जी के भाइयों से पूछा था. तालाब के किनारे. जहाँ युधिष्ठिर के भाई प्यास बुझाने गए और सवालों का जवाब न जानने के कारण उन्हें मरना पड़ा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजीब बात है. जो ज्ञानी नहीं हैं, उनको इस दुनियाँ में जीने का अधिकार नहीं है क्या? लेकिन सवाल तो अपनी जगह हैं. आखिर ऐसा क्यों कि उनके भाइयों को यक्ष द्बारा पूछे गए सवालों के जवाब नहीं मालूम थे? क्या युधिष्ठिर चाहते थे कि उनके पास जितना ज्ञान था, सबकुछ भाइयों को नहीं देना है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और भी सवाल हैं. आखिर सबकुछ घटने के बाद युधिष्ठिर जी सीन में क्यों आये? वही सबसे पहले पानी लाने क्यों नहीं गए? अगर सबसे पहले वही पानी लाते जाते और ये बखेड़ा ही नहीं होता.        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप अगर यह सोच रहे हैं कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ तो मेरा जवाब है कि मेरे पास भी तो मन है. मन तेज भागा तो यह साब बातें मन में आईं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य की बात है न? बाकी भाईयों के मन में यह बात नहीं आई लेकिन युधिष्ठिर के मन में ही क्यों आई? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद इसलिए की अज्ञातवास के दौरान बाकी के भाई तो काम-वाम करते थे. जंगल से लकड़ी इकठ्ठा करके लाते थे. खाना बनाते थे. झाडू वगैरह देते थे और युधिष्ठिर आराम से बैठे रहते थे. भीम से पाँव दबवाते थे सो अलग. जो आदमी कोई काम न करे उसके भीतर अध्यात्म कूट-कूट के भर जाता है. तब वह सरल टाइप कुछ सोचता ही नहीं. जब भी सोचता है, गूढ़ ही सोचता है. उसके लिए भोजन और भाषण के अलावा आध्यात्म का सहारा रहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मन के तेज भागने वाली बात युधिष्ठिर को किसी ने बताई थी या फिर उन्होंने खुद से जान लिया था? अगर किसी ने बताई होगी तब तो ठीक. लेकिन अगर उन्होंने खुद ही पता लगाई होगी तो कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद ऐसा कुछ हुआ हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन आराम करते-करते युधिष्ठिर थक गए होंगे. थक गए तो उठकर बैठ गए होंगे. बैठे-बैठे बोर हो गए होंगे. बोर होते-होते सोचा होगा कि; "बोर क्यों होना? जब बैठे ही हैं तो कुछ सोच डालते हैं."&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बस उन्होंने सोचना शुरू कर दिया होगा; ' अज्ञातवास ख़त्म होने दो, वापस हस्तिनापुर जायेंगे. कृष्ण को बुला लेंगे. उनके साथ बैठकर प्लान बनायेंगे. पहले सीधे-सीधे युद्ध नहीं करेंगे. पहले पाँच गाँव मांगेंगे. दुर्योधन है तो काइयां, इसलिए आराम से तो देगा नहीं. गाली-वाली बकेगा ऊपर से. उसकी वोकावुलरी कित्ती तो खराब है. उसके 'लुक्खेपन' की वजह से हम जनता की सारी सहानुभूति इकट्ठी कर लेंगे. जनता को बताएँगे कि देखो, ये दुर्योधन हमें गद्दी तो छोडो, पाँच गाँव भी नहीं दे रहा. युद्ध की पचास प्रतिशत भूमिका केवल इसी बात पर तैयार कर लेंगे. युद्ध शुरू हो जायेगा तो कौरवों के महारथियों को एक एक करके रास्ते से हटाते जायेंगे. गुरु द्रोण से भी थोडा झूठ बोलना पड़े तो चलेगा. आख़िर युद्ध में सब कुछ जायज है.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सोचते-सोचते अचानक युधिष्ठिर ने यूरेका-यूरेका चिल्लाना शुरू कर दिया होगा. द्रौपदी ने चेहरे पर आश्चर्य के भाव रखकर पूछा होगा; "आप यूरेका-यूरेका नामक गीत क्यों गा रहे हैं, हे आर्यपुत्र?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युधिष्ठिर ने बताया होगा कि; "प्रिये अभी-अभी मुझे पता चला कि मन सबसे तेज भागता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुनकर द्रौपदी जी ने कहा होगा; " ओह. पता चल गया. बहुत बढ़िया बात. अब इसे याद रखियेगा. जब यक्ष प्रश्न करेंगे तो फट से जवाब दे दीजियेगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;............................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो भइया अभिषेक, युधिष्ठिर जी के बहकावे में आकर हम दुपट्टा चोरी काण्ड पर अपने मन को यहाँ-वहां, जहाँ-तहाँ दौड़ा दिए थे.वैसे यक्ष जी ने और भी प्रश्न पूछे थे. उन प्रश्नों के ऊपर भी कभी मन दौड़ाया जाएगा....:-)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-928879966560423075?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/kk3UHV7BNHw" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/928879966560423075/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=928879966560423075&amp;isPopup=true" title="19 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/928879966560423075?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/928879966560423075?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/kk3UHV7BNHw/blog-post_27.html" title="जिज्ञासु अभिषेक और क्लाइमेक्स वाले युधिष्ठिर" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05417015864879214280</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="15845028583339596592" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">19</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_27.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkYHQnk8cSp7ImA9WxJVFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-3227426059259831820</id><published>2009-06-23T05:45:00.002+05:30</published><updated>2009-07-03T11:18:53.779+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:18:53.779+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फिल्म" /><title>जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया</title><content type="html">जैसे ही शेव करना शुरू किया, वैसे ही टीवी पर चल रहे एक गाने के बोल सुनाई दिए; "जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा तो गाना है. मन में आया कि अगर नायिका का दुपट्टा चोरी काण्ड फेमस हो जाए तो क्या होगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़र्ज़ कीजिये कि जिस नायिका का दुपट्टा चोरी हो गया वह अगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दे तो अपनी इन्वेस्टीगेशन के बाद थानेदार क्या रिपोर्ट दे सकता है? शायद कुछ ऐसी;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नायिका द्बारा दुपट्टे चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद हमने मामले की विस्तृत और समग्र तहकीकात की. दुपट्टा चोरी की ऐसी कोई घटना हमारे थाने के इलाके में इससे पहले कभी नहीं हुई है. यह नए किस्म का चोर है जो केवल दुपट्टा चुराता है. नायिका भी चोर के इस कर्म से हैरान है. नायिका के द्बारा इस घटना के ऊपर एक गाना भी गया गया है. गाने की पहली लाइन सुनकर ही लग रहा है कि नायिका भी इस बात से आश्चर्यचकित है कि यह कैसा चोर है जो दुपट्टा चुराता है. तहकीकात के दौरान ही यह पता चला कि नायिका ने दुपट्टे के साथ अपने सलवार और कमीज़ भी धोकर सूखने के लिए डाला था. लेकिन चोर ने सलवार और कमीज़ में कोई इंटेरेस्ट नहीं दिखाया. उसका टारगेट केवल दुपट्टा चोरी करने का था. चूंकि दुपट्टा चोरी की यह पहली घटना है इसलिए हम पास्ट रिकार्ड्स देखकर और पहले से सॉल्व किये गए किसी केस का रेफेरेंस लेकर चोर को पकड़ सकें, इसका भी कोई चांस नहीं है. लिहाजा हम सरकार से दरख्वास्त करते हैं कि यह केस सीबीआई की उस शाखा को सौंप दिया जाय जो कपड़ों की चोरी के मामले हैंडल करता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थानेदार रिपोर्ट तो लिख देगा. लेकिन तब तक मामला अखबार में छप चुका होगा. दुपट्टे की चोरी की ऐसी सनसनीखेज घटना को कवर करने के लिए टीवी वाले पहुँच जायेंगे. इस घटना पर टीवी वाले शायद कुछ इस तरह का कवरेज करें;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टूडियो में विशेष कार्यक्रम "चोरी हुआ दुपट्टा" का संचालन कर रहे एंकर, नीलाभ जी बहुत एक्साइटेड रहेंगे. आखिर यह विशेष कार्यक्रम बिलकुल नए विषय पर है. स्टूडियो में खड़े-खड़े नीलाभ जी कहेंगे;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जी हाँ. चोरी भी किस चीज की? दुपट्टे की. दुपट्टे की चोरी की घटना शायद ही पहले हुई हो. आज हम आपको इस सनसनीखेज घटना पर विशेष दिखाने जा रहे हैं. कहीं न कहीं दुपट्टे की चोरी की यह घटना बहुत ही गंभीर है. आखिर किसने की दुपट्टे की चोरी? कौन है वह जो सोने-चांदी चोरी करने के बजाय दुपट्टा चोरी कर रहा है? कौन है वह चोर?..... यह जानने के लिए चलते हैं हमारे संवाददाता सुधीर विनोद के पास.....सुधीर आपको हमारी आवाज़ आ रही है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जी हाँ. नीलाभ मुझे आपकी आवाज़ आ रही है"; सुधीर विनोद जी बोलेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सुधीर क्या है यह पूरा मामला? दुपट्टे की इस चोरी के पीछे किसका हाथ हो सकता है? क्या कहती है वह नायिका जिसका दुपट्टा चोरी चला गया है?" नीलाभ जी पूछेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नीलाभ दुपट्टे के चोरी चले जाने के बाद उस नायिका को इतना गहरा सदमा लगा है कि उसने पिछले दो दिन से कुछ खाया नहीं है. लिहाजा इस घटना पर बात करने के लिए वे हमारे साथ नहीं है"; सुधीर विनोद जी बोलेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना सुनकर नीलाभ जी आश्चर्यचकित रह जायेंगे. वे कहेंगे; "लेकिन सुधीर खबर है कि दुपट्टा चोरी की घटना के बाद नायिका ने एक गाना भी गाया कि; "जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया." ऐसे में नायिका के सदमे वाली बात कहाँ तक सही है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीलाभ की बात सुनकर सुधीर बोलेंगे; "नीलाभ इस गाने की बाबत मैंने नायिका के पड़ोसियों से सवाल दागा था. लगभग सभी का कहना था कि नायिका ने वह गाना सदमा लगने की वजह से ही गाया था. उसने गाना खुश होकर नहीं गाया था. पडोसियों का कहना है कि नायिका का पास्ट रिकार्ड्स बताता है कि जब उसे सदमा लगता है, वह गाने गाती है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीलाभ जी बोलेंगे; "सुधीर, क्या अभी वहां पर नायिका का कोई पड़ोसी मौजूद है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुधीर जी बोलेंगे; "नीलाभ पड़ोसियों को और काम ही क्या है? टीवी कैमरा देखकर सब अपना-अपना घर छोड़कर सड़क पर आ गए हैं. आप देख सकते हैं, मेरे आजू-बाजू, पीछे-आगे पड़ोसी ही पड़ोसी मौजूद हैं. चलिए इनमें से कुछ के साथ बात करते हैं....हाँ क्या नाम है आपका?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पप्पू. जिनका दुपट्टा चोरी हुआ है, मेरा घर उनके घर के बायें तरफ है"; पप्पू जी बोलेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जी ये बताइए कि आपको कब पता चला कि नायिका का दुपट्टा चोरी चला गया?"; सुधीर विनोद सवाल दागेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"देखिये मैं आपको शुरू से बताता हूँ. मैं सुबह उठा. बिना ब्रश किये मैंने नाश्ता किया. माँ ने बाज़ार से सब्जी लाने के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया. फिर मैं टीवी पर डब्लू डब्लू ऍफ़ देखने लगा.........फिर..."; पप्पू जी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"संक्षेप में बताइए. हम आपको इतना फूटेज नहीं दे सकते"; सुधीर विनोद बोलेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नहीं. मैं संक्षेप में ही बता रहा था. आपने मुझे बीच में क्यों रोका? वैसे भी आपलोग कभी कोई बात संक्षेप में नहीं करते तो हम कैसे करें?"; पड़ोसी पप्पू बोले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना कहने के बाद पप्पू जी को लगा कि संवाददाता उनके हाथ से माइक छीन न ले. वे डर गए. फिर बोले; "ओके ओके...ठीक है मैं संक्षेप में बताता हूँ. मुझे करीब दोपहर के बारह बजे तब पता चला जब उन्होंने गाना शुरू किया कि; "जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया"; पप्पू जी बोलेंगे.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नीलाभ जैसा कि आप देख सकते हैं. नायिका के पड़ोसी पप्पू जी को गाने की वजह से करीब बारह बजे पता चला कि दुपट्टा चोरी चला गया है. इसका मतलब करीब दस बजे की घटना होनी चाहिए. चोर ने करीब दस बजे दुपट्टा चोरी किया होगा. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि दस बजे दुपट्टा चोरी गया होगा तो नायिका को इस बात का पता करीब ग्यारह बजे चला होगा. उसके बाद दस मिनट तक वो सदमे में होगी. फिर करीब सवा ग्यारह बजे से उसने गाना लिखना शुरू किया होगा. करीब पंद्रह मिनट में गाना लिखा गया होगा. फिर एक्स्ट्रा कलाकारों और सखियों को इकत्र करने में और ऑर्केस्ट्रा के प्रबंध करने में करीब आधा घंटा लगा होगा. फिर जाकर बारह बजे से नायिका ने गाना शुरू किया होगा....हमारा तो यही मानना है...जी... नीलाभ"; सुधीर विनोद जी जवाब देंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर नीलाभ जी बोलेंगे; "जी हाँ. सुधीर, धन्यवाद. आप इस घटना पर अपनी नज़र बनाये रखें. आप अगले तीन दिन तक वहीँ जमे रहिये. प्रोग्राम एडिटर से आर्डर है कि अभी अगले पॉँच दिन तक हमें इस घटना पर रोज एक विशेष दिखाना है. तो ये था हमारा विशेष कार्यक्रम "चोरी हुआ दुपट्टा." आगे की खबरों के लिए देखते रहिये परसों तक..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात टीवी तक पहुँच गई तो समाज के बाकी तपके भी टूट पड़ेंगे. समाजशास्त्री इस घटना की व्याख्या करते हुए लिखेंगे;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कई सौ वर्षों से भारतीय समाज में दुपट्टा इज्ज़त का प्रतीक माना जाता रहा है. जैसे पुरुष के केस में पगड़ी को इज्ज़त का प्रतीक माना जाता है ठीक उसी तरह महिलाओं के केस में दुपट्टे को इज्ज़त का प्रतीक माना जाता रहा है. लेकिन आज तक किसी नायक ने ऐसा कोई गाना नहीं गाया जिससे पता चले कि किसी चोर ने किसी पुरुष की पगड़ी चोरी की हो. आजतक ऐसा कहीं नहीं सुना गया कि पगडी चोरी चली जाने से किसी पुरुष ने गाना गाया हो कि; 'जाने कैसा चोर था, जो पगड़ी चुरा गया'. इससे यह सिद्ध होता है कि दुपट्टा चोरी करके एक बार फिर से महिलाओं को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है. सदियों से चली आ रही समाज पर पुरुष की पकड़ का प्रतीक है दुपट्टा चोरी की यह घटना.  आज एक बार फिर से यह साबित हो गया कि महिलाओं को आदर देना भारतीय पुरुष कभी नहीं सीखेगा"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ समाजशास्त्री इस तरह का वक्तव्य देगा वहीँ इतिहासकार शायद ऐसा कुछ लिखे;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इतिहासकारों का मानना है कि दुपट्टा चोरी की घटना आधुनिक भारतीय इतिहास में पहली बार हुई थी. हालांकि इससे पहले चोर काजल, नज़र वगैरह चुराता रहा है लेकिन ज्यादातर इतिहासकारों का मत है कि नब्बे के दशक के मध्य में समाज में चोरी की घटनाओं में जो इजाफा हुआ, उनमें से साठ से सत्तर प्रतिशत घटनाएं हलाँकि कपडों की चोरी की हुई थी. लेकिन ज्यादातर केस में धोती-कुरता और लुंगी  चोरी हुई थी. इतिहासकार इस बात से एकमत हैं कि कुछ विदेशी तस्कर भारतीय संस्कृति से जुड़े शिलालेख, मूर्तियाँ, और हस्तकला की चीजें चोरी करवा कर बोर हो चुके थे लिहाजा उन्होंने कपड़ों की चोरी करवानी शुरू कर दी. इस घटना से एक बात और प्रकाश में आती है कि इस दशक में जितने भी लोग चोरी के पेशे से जुडे उनमें से ज्यादातर कपड़े की चोरी के पेशे में आये......"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन भी कितना तेज दौड़ता है. ये सब युधिष्ठिर जी की वजह से...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-3227426059259831820?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/GcYZRNoKpf8" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/3227426059259831820/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=3227426059259831820&amp;isPopup=true" title="33 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" 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gd:etag="W/&quot;D0YDQHk6eSp7ImA9WxJWE0U.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-1003790679407773042</id><published>2009-06-19T05:30:00.003+05:30</published><updated>2009-06-19T09:49:31.711+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-19T09:49:31.711+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दुर्योधन की डायरी" /><title>दुर्योधन की डायरी - पेज १६०५</title><content type="html">मिल गई इज्ज़त मिट्टी में. इज्ज़त भी अजीब चीज है. किसी को दे दो तो खुद को भी मिलती है. नहीं दो तो मिट्टी को मिल जाती है. जिसने भी इज्ज़त के इस लेन-देन की नीति निर्धारित की थी, उसे इस तरह की किसी भी  अनिवार्यता को रखना ही नहीं चाहिए था.  मैं पूछता हूँ कि ये कहाँ की नीति है कि इज्ज़त दो तभी इज्ज़त मिले? मैं कहता हूँ, कम से कम राजपुत्रों को इस अनिवार्यता से बरी कर देना चाहिए था. उनके लिए अलाऊ रहे कि वे इज्ज़त दें या न दें, उन्हें इज्ज़त मिलनी ज़रूर चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं मालूम था कि द्रौपदी के स्वयंवर में जाकर यह हाल हो जाएगा. गए थे जीतने द्रौपदी को, जीत तो पाए नहीं, ऊपर से जब से वहां से लौटे हैं, पूरे कुनबे में किच-किच मची हुई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब एक-दूसरे पर दोष दाग रहे हैं. दुशासन मुझे गरिया रहा है. मामाश्री मुझे और दुशासन को गरिया रहे हैं. कर्ण उधर भुरकुसाए बैठा है. इस बात पर भुरकुसाए बैठा है कि कि द्रौपदी ने उसे सूत-पुत्र क्यों कहा? विकट इमोशनल बन्दा है ये कर्ण भी. मैं कहता हूँ कह दिया तो कह दिया. औरतों की बात को लेकर इतना इमोशनल होने से चलेगा क्या? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तो कहता हूँ कि काहे नहीं ऑन द स्पॉट झूठ बोल दिया कि वो सूत-पुत्र नहीं बल्कि बहुत बड़े क्षत्रिय खानदान का चिराग है. ये तो कुम्भ के मेले में खो गया था बोलकर उसका लालन-पालन सूत के घर हुआ. कुम्भ के मेले में खोया है तो एक न एक दिन तो अपनी माँ से मिलेगा ही. जिस दिन माँ से मिलेगा उसदिन एस्टेब्लिश कर देगा कि वह क्षत्रिय है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असली झमेला तो बाहर वालों की वजह से है. कोई कह रहा है कि वाण चलाने की पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं होने की वजह से हारे. कोई कह रहा है कि जाने से पहले कम से कम चार सप्ताह का शिविर होना चाहिए थे. शिविर में जमकर प्रैक्टिस की जाती तो धनुष-वाण के खेल में पास हो जाते. ऐसे में द्रौपदी को अर्जुन नहीं जीत पाता.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन किसे पता था कि ऐसे विकट खेल का आयोजन होगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई नहीं देखता कि कितना कठिन काम था वहां. अरे आज तक तो कहीं नहीं देखा था कि मछली को ऊपर टांग कर घुमाया जाय और कहा जाय कि नीचे रखे बर्तन के तेल में देखकर मछली पर वाण दागना है. मैं कहता हूँ कि प्रतियोगिता तो ऐसी होनी चाहिए थी कि दस फीट की दूरी पर रस्सी में बांधकर मछली को लटका देते और वाण चलाने के लिए कहते. देखते फिर कि हर वाण सही निशाने पर लगता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी  कठिन परीक्षा भी लेता है कोई भला? मुझे तो इसमें केशव की चाल लगती है. उन्हें पता था कि हमलोग इसमें नहीं सकेंगे. बस उन्होंने मरवा दिया हमें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर अर्जुन वगैरह इतने खुश हैं कि मुझे तो ज्यूस तक नहीं पच रहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया तो पीछे ही पड़ गई है. हर अखबार, हर टीवी चैनल मज़ाक उड़ा रहा है. एडिटोरियल में पूरे कुनबे की ऐसी-तैसी की जा रही है. कोई कह रहा है कि गुरु द्रोण के आश्रम में रहकर मैंने क्या झक मारा है? क्या कुछ नहीं सीखा? कोई कह रहा है कि मुझे वाण पकड़ने तक की तमीज नहीं है. पढ़कर लग रहा है कि ये लिखने वाले सामने होते तो इन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर अभी एक महीना भी नहीं हुआ जब यही लोग धनुष-वाण, भाला प्रक्षेपण और तलवारबाजी के अभ्यास शिविर देखकर मेरी, दुशासन और कर्ण की बड़ाई करते नहीं अघाते थे. आज यही लोग कह रहे हैं कि अभ्यास शिविर में वाण चलाना एक बात है और सही जगह पर चलाना दूसरी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इन मीडिया वालों को कौन समझाए कि एक योद्धा के लिए क्या धनुष-वाण चलाना ही काम है? और कोई काम नहीं है क्या? घूमना-फिरना, आखेट करना, हाट में जाकर वस्त्र, परफ्यूम वगैरह खरीदना क्या काम नहीं है? वो कौन करेगा?        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर से एक गुरु द्रोण हैं. उन्हें जो कुछ कहना था पिताश्री के सामने कहते. क्या ज़रुरत थी मीडिया के सामने सबकुछ कहने की? हस्तिनापुर की मीडिया के सामने कह दिया कि अभ्यास शिविर में धनुष-वाण वगैरह चलाकर हम थक गए थे. हद आदमी हैं गुरु द्रोण भी. अरे हम थक रहे थे तो आप क्या कर रहे थे? हमें थकने से रोका क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप दिल से चाहते थे कि आपका प्रिय शिष्य अर्जुन स्वयंवर जीत जाए? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुशासन ने तो कह दिया कि गुरु द्रोण अपनी औकात में रहे, यही उनके लिए अच्छा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी महीने के अंत में एक और स्वयंवर है. क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा. सभी इस बात के पीछे पड़े थे  कि कुनबे की बागडोर मुझसे छीनकर किसी और को दे दी जाय. कुछ लोग तो विकर्ण का नाम सुझा भी चुके हैं. वो तो भला हो पिताश्री और कृपाचार्य जी का जिन्होंने एक बार फिर से मुझे ही कुनबे की बागडोर संभला दी है. &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;अब देखते हैं इस स्वयंवर में क्या होता है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-1003790679407773042?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/LgJfdH3XjZ4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/1003790679407773042/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=1003790679407773042&amp;isPopup=true" title="32 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/1003790679407773042?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/1003790679407773042?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/LgJfdH3XjZ4/blog-post_19.html" title="दुर्योधन की डायरी - पेज १६०५" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">32</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_19.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkUFRX8zfCp7ImA9WxJVFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-3673318910574687939</id><published>2009-06-16T11:37:00.005+05:30</published><updated>2009-07-03T11:20:14.184+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:20:14.184+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लागरी" /><title>शत-प्रतिशत निरापद-लेखन</title><content type="html">निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद &lt;br /&gt;निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद निरापद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-3673318910574687939?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/48KhziHaQyw" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/3673318910574687939/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=3673318910574687939&amp;isPopup=true" title="35 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3673318910574687939?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3673318910574687939?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/48KhziHaQyw/blog-post_16.html" title="शत-प्रतिशत निरापद-लेखन" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">35</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkUBQn89cSp7ImA9WxJVFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-7834376854502307560</id><published>2009-06-15T17:03:00.007+05:30</published><updated>2009-07-03T11:20:53.169+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:20:53.169+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लागरी" /><title>अम्मा जरा देख तो ऊपर</title><content type="html">कक्षा एक में ये कविता पढ़ी थी. कोर्स की किताब में थी. बहुत प्यारी कविता है. मुझे तो तब से याद है. आपको भी याद होगी. अगर याद नहीं हो, तो याद ताजा कर लें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अम्मा जरा देख तो ऊपर &lt;br /&gt;चले आ रहे हैं बादल&lt;br /&gt;गरज रहे हैं, बरस रहे हैं&lt;br /&gt;दीख रहा है जल ही जल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हवा चल रही क्या पुरवाई &lt;br /&gt;भीग रही है डाली-डाली&lt;br /&gt;ऊपर काली घटा घिरी है&lt;br /&gt;नीचे फैली हरियाली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीग रहे हैं खेत, बाग़, वन &lt;br /&gt;भीग रहे हैं घर, आँगन &lt;br /&gt;बाहर निकलूँ मैं भी भीगूँ&lt;br /&gt;चाह रहा है मेरा मन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में किसी पत्रिका में पढ़ी एक और कविता याद आ गई. आप भी पढें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुक-छुक करती, छुक-छुक करती &lt;br /&gt;रेल चली जब दिल्ली से &lt;br /&gt;टीटी चूहा झट आ पहुंचा &lt;br /&gt;टिकट मांगने बिल्ली से &lt;br /&gt;लेकिन बिल्ली बिना टिकट की&lt;br /&gt;चूहे ने तब ली खिल्ली&lt;br /&gt;झट जुर्माना करके बोला&lt;br /&gt;गंदी होती है बिल्ली &lt;br /&gt;.................................................................... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म कलाकार जोगिन्दर नहीं रहे. उन्हें मेरी श्रद्धांजलि.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;औत अंत में:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल हुए ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप के मुकाबले में इंग्लैंड ने भारत को हरा दिया. इस हार की वजह से भारतीय टीम अब वर्ल्ड कप प्रतियोगिता से बाहर हो गई है. भारतीय टीम के प्रशंसक दुखी हैं. वैसे मेरा मानना है कि टीम ने खेल भावना के साथ अपना काम किया. जीत-हार तो खेल का हिस्सा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-7834376854502307560?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/NFXFphatBBM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/7834376854502307560/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=7834376854502307560&amp;isPopup=true" title="32 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7834376854502307560?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7834376854502307560?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/NFXFphatBBM/blog-post_15.html" title="अम्मा जरा देख तो ऊपर" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">32</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkUNQHY5cSp7ImA9WxJVFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-3772464520771256525</id><published>2009-06-11T13:17:00.006+05:30</published><updated>2009-07-03T11:21:31.829+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:21:31.829+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लागरी" /><title>अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत</title><content type="html">हम ब्लॉगर लोग आम आदमी हैं. इसलिए ब्लॉग लिखते हैं. आते-जाते जो कुछ भी देखते हैं, टांक देते हैं ब्लॉग पर. ई ससुर गूगल ने सर्वर क्या दिया हमारी तो खिल गईं. अरे मैं बाँछों की बात कर रहा हूँ. खिल गईं. एक आईडी क्रीयेट किये और शुरू हो गए. क्या-क्या नहीं लिख डाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हमको रास्ते में यह दिखा. कल शाम को वह दिखा था. ई राजनीति बहुत गंदी हो गई है. आतंकवाद बहुत बढ़ गया है. मंहगाई बढ़ गई है. अंग्रेजी बढ़ गई है. हिंदी कम गई है. अंग्रेजी को बढावा देना गुलामी की निशानी है. आतंकवादी से सख्ती से निबटना होगा. कसाब को डायरेक्ट फांसी काहे नहीं दे देती सरकार? अफ़ज़ल गुरु की फांसी में इतना दिन काहे लग रहा है? वर्ण व्यवस्था कब ख़तम होगी? किसान काहे आत्महत्या कर रहा है? महिला आरक्षण को लेकर इतना हंगामा क्यों है? कसाब अपना बयान काहे बदल दिया? हम सेकुलर हैं, तो तुम कम्यूनल काहे हो? साध्वी प्रज्ञा के साथ इतनी बदसलूकी काहे हो रही है? हिन्दू आतंकवाद शब्द काहे इस्तेमाल किया जा रहा है? कम्यूनिष्ट इतनी बुरी तरह से काहे हारे? क्या दुनियाँ से कम्यूनिज्म के ख़तम होने की शुरुआत हो गई है? उड़ीसा में चर्च पर काहे हमला हो रहा है? मुतालिक जैसों की धुलाई काहें नहीं होनी चाहिए? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय भुजंग काट लेगा तो क्या होगा? वेद में व्यवस्था को लेकर ई कहा गया है. जंगल की आग से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? पर्यावरण खराब क्यों हो रहा है? हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि. आदित्य जी को श्रद्धांजलि. गत्यात्मक ज्योतिष खराब है. फलित ज्योतिष अच्छा है. जलित ज्योतिष उससे भी अच्छा है. हम ऐसा मानते हैं तुम क्या कर लोगे? हिन्दू कौन थे? हिंदी भाषा किधर जा रही है? किस रफ़्तार से जा रही है? परसों तक कहाँ पहुँच जायेगी? कविता क्या है? कविता इंसान को जगाती है या फिर गौरैया के लिए लिखी जाती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काहे? काहे? काहे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब यह है कि आम आदमी हैं तो यही सब लिखेंगे न. ख़ास होते तो किसी मैगजीन में लिख रहे होते. केंचुकी फ्रायड चिकेन और मैकडोनाल्ड की वजह से एक ख़ास समाज किस दिशा में जा रहा है उसका विश्लेषण कर रहे होते. तब अगर कसाब के मुक़दमे की बात करते तो इस बात को ध्यान में रखकर करते कि अंतर्राष्ट्रीय कूटिनीति का इस मुक़दमे पर क्या असर पड़ता है. अमेरिका का मीडिया क्या चाहता है? एमनेस्टी इंटरनेशल के लोग इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं?  अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने की बात करते तो यह ध्यान में रखते कि यूरोपियन यूनियन भारत से क्या चाहता है? मैकडोनाल्ड की किसी खास वर्ग के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते तो उससे उपजने वाली आर्थिक नीतियों का अध्ययन करते हुए लिखते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन भैया, हम तो आम आदमी हैं. ऐसे में जो कुछ लिखेंगे वह सब आम आदमी की भाषा में ही होगा. हम तो यह सुनकर लिखना शुरू किये थे कि; "ब्लॉग अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ब्लॉग विशेषज्ञ ने यह लाइन गढी होगी. लेकिन हमें तो मरवाने पर उतारू दीखता है यह ब्लॉग विशेषज्ञ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वाक्य सुनकर हम तो उड़ने लगे. जो मन में आया, लिख डाला. ऊपर से संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी वाला सर्टिफिकेट दिया है. अब इस सर्टिफिकेट और कुछ टूटे-फूटे विचारों से लैस हम निकल लिए ब्लॉग लिखने. आम आदमी छोटे-छोटे काम कर के महान होने के सपने देखता रहता है. वही बात हम ब्लॉगर लोगों के साथ है. सोचते हैं;"चलो ब्लॉग लिखकर महान हो लेते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ऐसे में अगर कोई आकर यह कहे कि ऐसा करने से फंस जाओगे तो? हमें तो लगेगा न कि यहाँ हम ब्लॉग लिखकर महान हुए जा रहे थे और आप आ गए बीच में. हमारी महानता पर ताला लगाने. महान होने का हमारा प्लान चौपट करने. आम आदमी को महान होने का हक़ नहीं है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम ब्लॉग लिखेंगे तो आम आदमी की तरह. इसलिए जब अफ़ज़ल गुरु की बात करते हैं तब केवल यह याद रहता है कि उसे फांसी की सज़ा हो गई है. यह भी याद रहता है कि कुछ नेताओं ने और कुछ मानवाधिकार वालों उसे बचाने की मुहिम छेड़ रखी है. हमें इस बात से क्या लेना-देना कि यूरोपियन यूनियन अफ़ज़ल गुरु के मामले में भारत पर क्या दबाव डाल रहा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में हम क्या लिखें? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जब किसानों की आत्महत्या की बात करेंगे तो यही न लिखेंगे कि सरकार की नीतियों की वजह से किसान मारा जा रहा है? हमें नहीं मालूम कि विदर्भ और बुंदेलखंड की आर्थिक दशा क्या है? किसान किस फसल की खेती करता है? वहां उपलब्ध साधन क्या हैं? हम तो जी आम आदमी की तरह यही सोचते मरे जा रहे हैं कि न जाने कितने लोग अपना जीवन ख़त्म कर ले रहे हैं.               &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जब न्याय-व्यवस्था पर लिखेंगे तो एक आम आदमी की धारणा लिए लिखेंगे. हमें तो केवल इतना पता है कि अदालतें न जाने कितने वर्षों से चल रहे न जाने कितने मुकदमें निबटा नहीं पा रही. क्यों नहीं निबटा पा रही, उसपर दिया जलाकर रौशनी दिखाना ख़ास लोगों का काम है. हमें केवल इतना जानते हैं कि वकील अपने दांव-पेंच कैसे चलाते हैं. हमें केवल इतना पता है कि इसकी वजह से मुकदमें कैसे खिंचते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें क्या पता कि आम आदमी की सोच लिए हम अगर कुछ लिख देंगे तो उससे अदालत की अवमानना होगी? हमें तो बस इतना मालूम है कि नेता टाइप लोग न जाने कितनी बार उच्चतम न्यायालय तक की अवमानना करते नहीं अघाते. लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं होता. हमें तो बस इतना पता है कि आये दिन न्याय पालिका में भ्रष्टाचार की बातें होती रहती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन मुद्दों के फ़ाइनर पॉइंट्स पर प्रकाश डालने का काम किसी प्रशांत भूषण, किसी फली नारीमन या किसी सोली सोराबजी के जिम्मे है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में हम और क्या लिखेंगे? ब्लॉग लिखने से बदलाव होता है, ऐसा कोई गुमान नहीं पाल रक्खा है हमने. हमें तो यही समझ में आता है कि टीवी के पैनल डिस्कशन या फिर सेमिनार आयोजित करने से अगर बदलाव नहीं आ पाया तो फिर शायद ब्लॉग का नंबर आये..:-)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब क्या अनिवार्य हो जाएगा कि ब्लॉग लिखने से पहले भारतीय अचार संहिता की धाराएं रट लो? साइबर कानूनों को घोंट डालो. हमारे लेख से किस-किस को नाराजगी होगी उसकी एक लिस्ट बना लो. इतना सबकुछ कर लो उसके बाद लिखना. चार साल लग जायेंगे सारी तैयारी करने में. हो सकता है उसके बाद जब लिखने की बारी आये तो पता चले कि गूगल जी ने फ्री की सुविधा हटा ली. ऐसे में हमारा ब्लॉग कैरियर तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिव्यक्ति का माध्यम क्या केवल ब्लॉग ही है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तो अभी आया है. हाल ही में. इससे पहले जो लोग व्यंग वगैरह लिख डालते थे उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी? क्या होता अगर कोई अधिकारी, कोई मास्टर, कोई नेता, कोई राजनीतिक पार्टी, कोई डॉक्टर, कोई वकील, कोई थानेदार, कोई गवर्नर, कोई मुख्यमंत्री किसी परसाई जी, किसी शरद जोशी जी या किसी श्रीलाल शुक्ल जी से नाराज़ हो जाता तो? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज में न जाने किन-किन विसंगतियों पर इन लोगों ने लिखा. किसी को छोड़ा नहीं. लेकिन मैंने तो नहीं सुना कि किसी ने इन्हें अदालत में घसीट लिया हो. ऐसा होता तो क्या-क्या हो सकता था? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखते कि सन पचहत्तर से ही परसाई जी केवल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. किसी दिन जबलपुर में मुक़दमे की सुनवाई रहती तो यह कहते सुने जाते कि;"क्या कहें, वकालत में व्याप्त विसंगतियों के बारे में लिख दिया था. गवाह कैसे तोडे जाते हैं. तारीख कैसी ली जाती है. जबलपुर बार असोसिएशन ने मुकदमा ठोक दिया. अब तो झेलना पड़ेगा ही. मेरी भी मति मारी गई थी. काहे व्यंग लिखने गए?"&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कोई कहता कि; " कोई बात नहीं. ऐसा होता रहता है. सब ठीक हो जाएगा." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात पर शायद बोलते; "अरे क्या ख़ाक ठीक हो जाएगा? अभी कल ग्वालियर में मुक़दमे की सुनवाई है. &lt;strong&gt;रानी नागफनी की कहानी&lt;/strong&gt; में डॉक्टर भाई लोगों के बारे में लिख दिया था कि कैसे जब मार्केट में कोई दवाई भारी मात्रा में आ जाती है डॉक्टर लोग हर रोग में मरीज को वही दवाई प्रिस्क्राईब कर देते हैं. कल की तारीख निबट जाए तो अगले मंगलवार को हैदराबाद जाना है. राजनीति पर लिखे गए एक लेख में चेन्ना रेड्डी को खींच लिए थे. भाई ने आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखते कि सन पचहत्तर के बाद उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं. तब से सन पंचानवे तक बेचारे मुकदमों में उलझे-उलझे इस असार संसार से कूच कर जाते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा लगता अगर ऐसा कुछ हो जाता तो? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजय गांधी की खिंचाई न जाने कितनी बार की होगी उन्होंने. अशोक मेहता से लेकर राम मनोहर लोहिया, और जय प्रकाश नारायण से लेकर राज नारायण तक किसी को नहीं छोड़ा. लेकिन क्या इन लोगों ने उनको मुकदमों में फंसाकर जोत डालने की कसम खाई? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या फिर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ और मायने थे? या कहीं ऐसा तो नहीं कि परसाई जी अपने समय के बाहुबली थे जिनसे सब डरते थे इसलिए किसी ने डर के मारे मुकदमा नहीं दायर किया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर एक आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत क्या है? जेलयात्रा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-3772464520771256525?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/hlfIwaDoh0o" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/3772464520771256525/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=3772464520771256525&amp;isPopup=true" title="55 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3772464520771256525?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3772464520771256525?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/hlfIwaDoh0o/blog-post_11.html" title="अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">55</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_11.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkQGRXs8fCp7ImA9WxJVFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-3796054888371288410</id><published>2009-06-08T18:00:00.002+05:30</published><updated>2009-07-03T11:22:04.574+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-03T11:22:04.574+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लागरी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता" /><title>बाँट रहे सर्टिफिकेट गाकर सेकुलर राग</title><content type="html">कभी नहीं सोचा था कि इस तरह का कुछ लिखना पड़ेगा. क्योंकि सेकुलर और कम्यूनल जैसे मुद्दों पर बहस का काम बड़े-बड़े ज्ञानी, विद्वान् करते हैं. लेकिन इनमें से ही एक विद्वान जी ने कुछ ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणी करने की वजह से मुझे &lt;a href="http://hamarahindustaan.blogspot.com/2009/06/blog-post.html"&gt;कम्यूनल घोषित कर दिया है&lt;/a&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब घोषित कर दिया है तो कर दिया है. विद्वान् हैं. विद्वान टाइप लोग कुछ भी करते रहते हैं. लेकिन भैया, मेरा कहना है कि मैंने क्या टिप्पणी की, वह तो देख लेते. केवल टिप्पणी करने की वजह से ही कम्यूनल घोषित कर दिया आपने?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन विद्वान जी के विद्वत्ता देखकर सेकुलर और सेकुलरिज्म के जो मायने मुझे समझ में आये, वह इन 'धोयों' में हैं. देखिये जरा, आप सेकुलरिज्म की जो परिभाषा जानते हैं, वो ऐसी ही है क्या?      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सेकुलर हैं जनम से और कम्यूनल हैं आप &lt;br /&gt;संग  हमरे  जो  न  चले  लेंगे  गर्दन  नाप  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद को सेकुलर कह दिए ठप्पा लिया लगाय &lt;br /&gt;वे  टस से  मस न करें चाहे सब मरि जाय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साठ साल से गा रहे अपना सेकुलर गान &lt;br /&gt;बाकी  चाहे  जो कहें सुनें न उनका तान &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाँट  रहे  सर्टिफिकेट  गाकर सेकुलर राग&lt;br /&gt;सेकुलर साबुन यूज कर छुपा लिए सब दाग  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे जिसको  सेकुलर  कहें वह सेकुलर हो जाय &lt;br /&gt;जिसको वे कम्यूनल कहें मिट्टी में मिल जाय &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठे  हैं  जो  उस  तरफ  देते अपनी राय     &lt;br /&gt;उन्हें समर्थन दे अगर फट सेकुलर हो जाय &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किया  बहाना बहस का पोस्ट दिया है चढाय&lt;br /&gt;चार नाम ले लिख दिया सब कम्यूनल है भाय &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बहसी पोस्ट' चढाय जो चहु दिक् फैले नाम&lt;br /&gt;बड़े-बड़े  सेकुलर  यहाँ  करते  उन्हें सलाम &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम समझायें धर्म क्या तुम बस सुनते जाव &lt;br /&gt;जो कह दें  वह  फाइनल  हमरा ऊंचा भाव &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेकुलर  ही  जाने  यहाँ क्या है हिन्दुस्तान &lt;br /&gt;बाकी सब चिरकुट यहाँ उनको नहीं कछु ज्ञान &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसकी चाहें फिक्स कर 'हाफ-पैन्टिया' जात&lt;br /&gt;ले  लाठी दौडाय दें,  उसकी  क्या  औकात&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-3796054888371288410?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/k2WO43rAb2k" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/3796054888371288410/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=3796054888371288410&amp;isPopup=true" title="31 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3796054888371288410?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3796054888371288410?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/k2WO43rAb2k/blog-post_08.html" title="बाँट रहे सर्टिफिकेट गाकर सेकुलर राग" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05417015864879214280</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="15845028583339596592" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">31</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post_08.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkUNRnwyfCp7ImA9WxJXGEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-7451543414612496943</id><published>2009-06-05T05:30:00.002+05:30</published><updated>2009-06-13T13:34:57.294+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-13T13:34:57.294+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अर्थशास्त्र" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><title>साहेब, यूरिया पर सब्सिडी बढा देते तो......</title><content type="html">अस्सी और नब्बे के दशक तक दूध वाला घर पर दूध दे जाता था. गाय का 'प्योर' दूध. बेचारा कभी-कभी पानी मिलाना भूल जाता था. जिस दिन पानी मिलाना भूल जाता था, हम सब को दूध के प्योर होने पर शंका होने लगती थी. उस दिन कहना नहीं भूलते थे कि; "आज दूध कुछ ठीक नहीं लग रहा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन जब उससे कहते कि कल का दूध ठीक नहीं लगा तो हंसते हुए बोलता; " कल पानी मिलाना भूल गए थे."&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दूध वाले से हमेशा शिकायत ही रहती थी. उसके सामने तो कुछ नहीं कहते थे लेकिन उसके जाने के बाद शुरू हो जाते थे; "इसकी बदमाशी बढ़ गई है. पहले केवल पानी मिलाता था, आजकल मूंगफली पीस कर दूध में मिला देता है जिससे दूध गाढा दिखे. इसे अब छुड़ाना ही पडेगा." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन दूसरे दिन फिर पानी वाला दूध पीकर संतोष कर लेते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल दूध वाले को गाली देना बंद हो गया है. आज तो उस दूध वाले को याद करके आँखों में आंसू आ जाते हैं. यह कहते हुए ठंडी सांस लेते हैं कि; "अब कहाँ मिलेंगे ऐसे ईमानदार दूधवाले? कितना ईमानदार था बेचारा. दूध में केवल पानी और मूंगफली मिलाता था."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच में. अगर ऐसे दूध वाले मिल जाते तो पूरा मोहल्ला मिलकर राष्ट्रपति को एक ज्ञापन दे डालता कि; "इस ईमानदार दूधवाले को गोल्ड मेडल दिलवाईये क्योंकि यह दूध में केवल पानी और मूंगफली मिलाता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर ऐसा क्यों न हो?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बाजार से पैकेट वाला दूध आता है. सालों तक ये कहकर पीते रहे कि "दूध ताजा तो नहीं रहता लेकिन प्योर रहता है." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह क्या? टीवी न्यूज चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन करके बताया कि दूध में यूरिया, डिटर्जेंट, शैंपू वगैरह मिलाया जाता है. कहते हैं यूरिया मिलाने से दूध ज्यादा गाढा और सफ़ेद लगता है. उसके प्योर दिखने में कोई शक नहीं रहता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से पता चला है, गिलास में रखे दूध को शक की निगाह से देखते हैं. खुद से मन ही मन 'लाऊडली' सवाल पूछ लेते हैं; "दूध पी रहे हो कि यूरिया?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के लोगों के अलावा टीवी पर दूध कंपनी के कर्मचारियों को देखा. एक मंत्री बता रहे थे कि किसी को छोडेंगे नहीं. अब इसपर क्या कहा जाय? राजू श्रीवास्तव की तरह खीसें निपोरते हुए पूछ लें कि; " भैया छोड़ने की बात तो तब आएगी जब पहले पकड़ोगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिलावटी मामलों पर सरकार के एक अफसर को टीवी पर बोलते हुए देखा. उन्होंने समझाया कि किस तरह से खाने की चीजों में मिलावट रोक पाना आसान नहीं है. कह रहे थे "देखिये, हमारे देश में कानून ढीला है. सालों से बदलाव नहीं हुआ है. फ़ूड इंसपेक्टर कम हैं. नगर निगम ध्यान नहीं देता. ये मिलावट करने वाले एक्सपर्ट होते हैं. पुलिस भी इनसे मिली हुई है. फिर भी हम कोशिश तो कर ही रहे हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अपने आपसे बहुत नाराज हुआ. मन में अपने आपको धिक्कारा. मैंने सोचा "एक ये हैं जिन्हें देश में होने वाले हर वाकये की जानकारी है और एक मैं हूँ जिसे कुछ नहीं पता. कम से इतना तो पता कर सकता हूँ कि मिलावट करने वाले बड़े एक्सपर्ट होते हैं. देश का कानून पुराना और ढीला है." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी वाले बता रहे थे कि लगभग पूरे उत्तर भारत में बिकने वाला दूध इसी तरह का है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब यह कि पूरी तरह से आर्गेनाइज्ड ऑपरेशन है. यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में कुछ ऐसा देखने को मिलेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी पर दूध में मिलावट करने वाले गिरोह के लोग शिकायत भरे लहजे में कह रहे हैं; "अब इस मिलावट के धंधे में भी ज्यादा कुछ प्राफिट नहीं रहा अब. पानी के अलावा बाकी सब कुछ मंहगा है. सरकार ने यूरिया पर से जब से सब्सिडी घटाई &lt;br /&gt;है, हमारा तो धंधा ही चौपट हो गया. डिटर्जेंट पर एक्साईज ड्यूटी इतनी बढ़ गयी है कि अब दूध के मिलावट वाले धंधे में मुनाफा कमाना बहुत कठिन हो गया है. "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानवाधिकार वाले कहेंगे; " क्या कर रही है सरकार? समाज के किसी वर्ग को तो मंहगाई की मार से बचाए. इन लोगों के लिए कम से कम यूरिया और डिटरजेंट तो सस्ता करवा सकती है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाई लोग यह भी कह सकते हैं कि; "धंधा करने के लिए पुलिस से लेकर इलाके के नेता को पैसा देना पड़ता है. कम से कम नेताओं और पुलिस वालों से तो कह सकती है कि भैया, इन लोगों का ख़याल रखो. इनके लिए अपनी 'फीस' में से कुछ छोड़कर इन्हें राहत दो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट आ रहा है. प्रणब बाबू जल्द ही बजट पेश कर देंगे. अभी दो दिन पहले ही उद्योगपतियों का एक दल गिरोह बनाकर वित्त मंत्री से मिल चुका है. ये भाई लोग अपने-अपने उद्योगों के लिए कस्टम और एक्साईज में कटौती की मांग वांग तैयार कर चुके होंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में मैं तो इस बात के पक्ष में हूँ कि मिलावट उद्योग के लोगों को भी वित्तमंत्री से मिलना चाहिए. दूध में मिलावट करने वाले कम से कम यूरिया पर मिलने वाली सब्सिडी को बढ़ाने की मांग कर ही सकते हैं. साथ में डिटरजेंट और बाकी के 'रा मैटीरियल' पर सेल्स टैक्स, कस्टम, एक्साईज वगैरह कम करने की मांग भी जरूर करें. भाई, सरकार को भी इनकी मांगें माननी चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या पता? आज ये लोग यूरिया, डिटर्जेंट, शैंपू मिला रहे हैं. हो सकता है कल को इनका कोई प्राइवेट वैज्ञानिक यह खोज कर ले कि दूध में एसिड मिलाने से दूध न सिर्फ सुन्दर दीखता है बल्कि स्वादिष्ट भी हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचिये, तब क्या होगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-7451543414612496943?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/SDI0Xdxx8bQ" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/7451543414612496943/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=7451543414612496943&amp;isPopup=true" title="23 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7451543414612496943?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7451543414612496943?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/SDI0Xdxx8bQ/blog-post.html" title="साहेब, यूरिया पर सब्सिडी बढा देते तो......" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">23</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/06/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkMCRHY7fSp7ImA9WxJXFkk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-7186017883474661364</id><published>2009-05-30T16:05:00.003+05:30</published><updated>2009-06-10T18:57:45.805+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-10T18:57:45.805+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अर्थशास्त्र" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता" /><title>तरही कविता - मंदी के मारे उर्वशी और पुरुरवा</title><content type="html">तरही कविता लिखने के दूसरे चरण में इस बार &lt;strong&gt;दिनकर जी द्बारा रचित उर्वशी&lt;/strong&gt; पर नज़र गई. मुझे लगा कुछ तुकबंदी फिर से इकठ्ठा हो सकती है. फिर ट्राई किया तो तुकबंदी इकठ्ठा हो गई. आप झेलिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात का समय. आकाश मार्ग से जाती हुई मेनका, रम्भा, सहजन्या और चित्रलेखा पृथ्वी को देखकर आश्चर्यचकित हैं. उन्हें आश्चर्य इस बात का है कि मुंबई के साथ-साथ और भी शहरों के शापिंग माल सूने पड़े हैं. मल्टीप्लेक्स में कोई रौनक नहीं है. दिल्ली में कई निवास पर कोई हो-हल्ला नहीं सुनाई दे रहा. लेट-नाईट पार्टियों का नाम-ओ-निशान नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कई सालों से शापिंग माल और मल्टीप्लेक्स की रौनक देखने की आदी ये अप्सराएं हलकान च परेशान हो रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सहजन्या&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोप हुआ है जाल रश्मि का, है अँधेरा छाया&lt;br /&gt;रौनक सारी कहाँ खो गई, नहीं समझ में आया &lt;br /&gt;शापिंग माल में लाईट-वाईट नहीं दीखती न्यारी &lt;br /&gt;कार पार्किंग दिक्खे सूनी, सोती दुनिया सारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुझे पता है रम्भे, क्या इसका हो सकता कारण?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रम्भा&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसा प्रश्न किया सहजन्ये, कैसे करूं निवारण?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है इसका उत्तर दे उर्वशी बेचारी &lt;br /&gt;पर अब महाराज पुरु की भी दिक्खे नहीं सवारी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सहजन्या&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे सवारी कैसे दिक्खे, महाराज सोते हैं &lt;br /&gt;मैंने सुना है, वे भी अब तो दिवस-रात्रि रोते हैं &lt;br /&gt;पृथ्वी पर मंदी छाई है, ठप है अर्थ-व्यवस्था  &lt;br /&gt;नहीं पता था, हो जायेगी ऐसी विकट अवस्था&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेनका &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थ-व्यवस्था की मंदी तो, दुनियाँ ले डूबेगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सहजन्या &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हुआ ऐसा तो फिर उर्वशी बहुत ऊबेगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराज पुरु की चिंताएं उसे ज्ञात हो शायद &lt;br /&gt;दिन उसके दूभर हो जाएँ स्याह रात हो शायद &lt;br /&gt;मर्त्यलोक की सुन्दरता पर मिटी उर्वशी प्यारी&lt;br /&gt;किसे पता था होगी दुनियाँ इस मंदी की मारी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं किस हालत में उर्वशी वहां पर होगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेनका &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहती है सहजन्ये वो जाने कहाँ पर होगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सहजन्या &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह तो होगी वहीँ, जहाँ पर महाराज होते हैं &lt;br /&gt;दिन में विचरण करते हैं, और रात्रि पहर सोते हैं&lt;br /&gt;पिछली बार गए थे दोनों, गिरि गंधमादन पर &lt;br /&gt;हो सकता है अब जाएँ वे, किसी धर्म-साधन पर &lt;br /&gt;लेकिन उनका आना-जाना, अब दुर्लभ हो शायद &lt;br /&gt;मंदी के कारण न उनको, अर्थ सुलभ हो शायद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चित्रलेखा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरी कहाँ तू भी सहजन्ये मंदी-मंदी गाती  &lt;br /&gt;महाराज को कैसी मंदी, दुनियाँ उनसे पाती &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेनका &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाने की बातें करके, ये  अच्छी याद दिलाई &lt;br /&gt;सखी उर्वशी को क्या मिलता, उत्सुकता जग आई &lt;br /&gt;तुझे याद हो शायद, उसका कल ही जन्मदिवस है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सहजन्या &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराज क्या देंगे उसको, मंदी भरी उमस है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराज पुरुरवा के साथ उर्वशी उद्यान में विचरण कर रही है. कल उसका जन्मदिवस है. महाराज चिंतित हैं. उसे इस बार क्या उपहार दें? पिछले बार इक्यावन तोले का नौलखा हार दिया था. पाश्चात्य देशों से मंगाया गया बढ़िया परफ्यूम और चेन्नई से मंगाई गई नेल्ली चेट्टी की साडियां दी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस बार छाई मंदी की वजह से प्रजा से भी धन वगैरह की प्राप्ति नहीं हुई है. खजाने में केवल एक सप्ताह के आयात के लिए ही फॉरेन एक्सचेंज बचा है. ऐसे में इम्पोर्टेड चीजें मंगाकर उपहार स्वरुप उर्वशी को देना संभव नहीं है. महाराज सोच रहे हैं कि उर्वशी कुछ मांग न बैठे. इसलिए वे आज के लिए उर्वशी से विदा होना चाहते हैं.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुरुरवा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिर-कृतज्ञ हूँ, साथ तुम्हारा मन को करता विह्वल   &lt;br /&gt;जब से हम-तुम मिले, लगे ये धरा हो गई उज्जवल &lt;br /&gt;मन के हर कोने में, बस तुम ही तुम हो हे नारी &lt;br /&gt;लेकिन हमको करनी है, अब चलने की तैयारी &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उर्वशी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलने की तैयारी! लेकिन क्योंकर कर ऐसी बातें?&lt;br /&gt;चाहें क्या अब महाराज, हो छोटी ही मुलाकातें?&lt;br /&gt;शायद हो स्मरण कि मेरा जन्मदिवस है आया &lt;br /&gt;एक वर्ष के बाद हमारे लिए, ख़ुशी है लाया &lt;br /&gt;पिछले बरस मिला था मुझको हार नौलखा,साड़ी&lt;br /&gt;मैं तो चाहूँ मिले इस बरस, बी एम डब्यू गाड़ी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुरुरवा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाड़ी दूं उपहार में कैसे, मंदी बड़ी है छाई&lt;br /&gt;ज्ञात तुम्हें हो अर्थ-व्यवस्था, है सकते में आई&lt;br /&gt;खाली हुआ खजाना मेरा, समय कठिन है भारी &lt;br /&gt;अब तो हमको करनी है, बस चलने की तैयारी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उर्वशी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर-फिर से क्यों बातें करते हमें छोड़ जाने की?&lt;br /&gt;जाना ही था कहाँ ज़रुरत थी वापस आने की?&lt;br /&gt;या फिर देख डिमांड गिफ्ट का छूटे तुम्हें पसीना &lt;br /&gt;समझो नहीं मामूली नारी, मैं हूँ एक नगीना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझो भाग्यवान तुम खुद को, मिली उर्वशी तुमको &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुरुरवा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाहक ही तुम रूठ रही हो, थोड़ा समझो मुझको &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसे की है कमी और अब लिमिट कार्ड का कम है &lt;br /&gt;धैर्यवान हो सुनो अगर, तो बात में मेरी दम है &lt;br /&gt;मुद्रा की कीमत भी कम है, ऊपर से यह मंदी &lt;br /&gt;क्रेडिट क्रंच साथ ले आई, पैसे की यह तंगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उर्वशी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओके, समझी बात तुम्हारी, मैं भी अब चलती हूँ &lt;br /&gt;वापस जाकर देवलोक में, सखियों से मिलती हूँ &lt;br /&gt;जब तक मर्त्यलोक में मंदी, यहाँ नहीं आऊँगी &lt;br /&gt;देवलोक में रहकर, सारी सुविधा मैं पाऊँगी &lt;br /&gt;थोड़ा धीरज रखो, शायद अर्थ-व्यवस्था सुधरे &lt;br /&gt;हो सुधार गर मर्त्यलोक में, और अवस्था सुधरे &lt;br /&gt;अगर तुम्हें ये लगे, कि सारी सुविधा मैं पाऊँगी   &lt;br /&gt;एक मेल कर देना मुझको, वापस आ जाऊंगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना कहकर उर्वशी आकाश में उड़ गई. पुरुरवा केवल उसे देखते रहे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब पृथ्वी पर अर्थ-व्यवस्था में सुधार की राह देख रहे हैं. कोई कह रहा था कि अर्थ-व्यवस्था जल्द ही सुधरने वाली है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-7186017883474661364?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/Sdk4Vcv2LkE" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/7186017883474661364/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=7186017883474661364&amp;isPopup=true" title="16 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7186017883474661364?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7186017883474661364?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/Sdk4Vcv2LkE/blog-post_30.html" title="तरही कविता - मंदी के मारे उर्वशी और पुरुरवा" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_30.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk4HQn4zeSp7ImA9WxJXEU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-3757798522241938357</id><published>2009-05-29T18:45:00.002+05:30</published><updated>2009-06-04T19:45:33.081+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-04T19:45:33.081+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अर्थशास्त्र" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता" /><title>तरही कविता ---मंदी लाई दिन काला</title><content type="html">आजकल तरही गजल की बात खूब हो रही है. कई बार सोचा कि तरही कविता की बात क्यों नहीं होती. आज सोचा तरही कविता ट्राई की जाए. ट्राई किया तो ये पाव-किलो तुकबंदी इकट्ठी हो गई. आप झेलिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठक बन्धुवों को अगर बुरा लगे तो उसके लिए एडवांस में क्षमा प्रार्थी हूँ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रोथ रुक गई जीडीपी की, मंदी  ने  मारा  पाला &lt;br /&gt;मील-फैक्टरी सूनी पड़ गई, उनपर लटक रहा ताला &lt;br /&gt;लोन लिया था बैंकों से जो, एक्सपेंशन की खातिर वो &lt;br /&gt;ब्याज जोड़कर डबल हो गया, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खूब कमाया डॉलर में,  था फारेन ट्रैवेल का मतवाला &lt;br /&gt;यू एस ए हो चाहे यूके, सबको ही सलटा डाला&lt;br /&gt;आज हाल तो ये है, शिमला जाना भी दूभर है अब &lt;br /&gt;लिमिट ख़तम है आज कार्ड का, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्डर बुक में जो आर्डर थे, तुरत-फुरत निपटा डाला&lt;br /&gt;डॉलर आया घर में जब, बस शेयर में लगवा डाला &lt;br /&gt;गिरा हुआ है शेयर प्राईस, आर्डर भी अब हाथ नहीं &lt;br /&gt;कैसे खर्च चलेगा भगवन, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय था मिनट-मिनट पर, मिलता था काफी प्याला   &lt;br /&gt;वीक-एंड की शामें, ले जाती थी सीधे मधुशाला &lt;br /&gt;बंद हुई ये परिपाटी अब, सारी रौनक चली गई &lt;br /&gt;नहीं मिले अब चाय-वाय भी, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शर्म-ग्रंथि सब जला चुकी हो, जिसके अंतर की ज्वाला&lt;br /&gt;जिसका अंतर्मन ये बोले, दुनियाँ एक धरमशाला &lt;br /&gt;जिसने चमड़ी मोटी कर ली, जो उधार ले जीता हो &lt;br /&gt;वही टिकेगा इस दुनियाँ में, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसलमान हो चाहे हिन्दू, सबको घायल कर डाला &lt;br /&gt;मंहगाई की राह पर चलकर, पाँव पड़ा दर्जन छाला &lt;br /&gt;चावल चीनी एक भाव के, दाल की बातें कौन करे &lt;br /&gt;आलू सोलह रूपये किलो, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृदु भावों वाले जीवन में, कटुता भाव जगा डाला &lt;br /&gt;मीठी स्मृतियों पर पड़ गया, तीखा सा मोटा जाला &lt;br /&gt;ऐसे दिन भी आने थे ये ज्ञात नहीं था हे बंधु&lt;br /&gt;रातों का कटना दूभर है, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ मिट गईं, कोई नहीं रोने वाला &lt;br /&gt;बैंक-वैंक तो कितने डूबे, कोई नहीं गिनने वाला &lt;br /&gt;दशकों लगे जिन्हें बनने में, घंटों में वे उखड़ गए&lt;br /&gt;जो हैं बचे डरे जीते हैं, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थ-व्यवस्था की मंदी ने, खेला चौपट कर डाला &lt;br /&gt;बची-खुची थी राजनीति, उसपर भी अब छाया पाला &lt;br /&gt;बन-ठन कर तैयार खड़े थे, शासन में जम जायेंगे &lt;br /&gt;आज खड़े हैं चुप्पी साधे, मंदी लाई दिन काला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीएम इन वेटिंग थे अब तक, नहीं पहन पाए माला &lt;br /&gt;दांव आख़िरी काम न आया, उलट गया सत्ता प्याला &lt;br /&gt;जीवन भर की सारी मंशा, पल भर में बस हवा हुई &lt;br /&gt;गया रसों से स्वाद सभी अब, मंदी लाई दिन काला&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-3757798522241938357?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/mO2IwrHqmTY" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/3757798522241938357/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=3757798522241938357&amp;isPopup=true" title="16 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3757798522241938357?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/3757798522241938357?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/mO2IwrHqmTY/blog-post_29.html" title="तरही कविता ---मंदी लाई दिन काला" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_29.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0EAQ387eSp7ImA9WxJRGU0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-5733612181539512793</id><published>2009-05-21T17:03:00.000+05:30</published><updated>2009-05-21T17:04:02.101+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-21T17:04:02.101+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शिक्षा" /><title>सेंट मोला मेमोरियल - भाग ५</title><content type="html">खेलने के मैदान को स्कूल का हिस्सा न बनाए जाने के लिए राम अवतार जी ने जो तर्क दिया वो अकाट्य था. सही बात है. पैसे से क्या नहीं किया जा सकता? पैसे से स्कूल बनवाया जा सकता है. पैसे से स्कूल हटवाया जा सकता है. पैसे से स्कूल के लिए मैदान बनवाया जा सकता है और पैसे से ही स्कूल के लिए मैदान नहीं भी बनवाया जा सकता है. शायद इसीलिए राम अवतार जी की बात पर रमेश बाबू भी कुछ नहीं बोले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी उन्हें पता था ढेर सारी बातें होती हैं जिनपर क्लायंट का फैसला ही आखिरी फैसला होता है. लिहाजा वे चुप ही रहे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात आगे चली तो स्कूल के लिए तमाम और ज़रूरी बातों के बीच से होते हुए बात ह्यूमन रिसोर्स पर जाकर रुकी. स्कूल के लिए मास्टरों की भर्ती कैसे की जानी चाहिए? क्या जुगत लगाई जाय कि सस्ते और टिकाऊ मास्टर मिलें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम आदमी को अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि; "सस्ता रोवे बार-बार, मंहगा रोवे एक बार." लेकिन राम अवतार जी कोई आम आदमी तो हैं नहीं. ऐसे में वे हर उस बात को नहीं मानते जिसे आम आदमी मानता है. अगर उनके अपने बिजनेस मॉडल को देखा जाय तो यही साबित होगा कि उनके हिसाब से सस्ती चीज ही अक्सर टिकाऊ होती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी तेल-मिल या फिर दूकान पर काम करने वाले मजदूरों को अगर देखा जाय तो राम अवतार जी के इस सिद्धांत की पुष्टि होती है. उन्होंने नियम बना लिया है कि मुटिया-मजदूरों को मजदूरी जितनी कम दी जा सके, उतना ही अच्छा. इसके पीछे तर्क यह है कि अगर मजदूरों को मजदूरी कम मिले तो वे हमेशा हलकान-परेशान रहेंगे. परेशानी से सराबोर मजदूर आगे की सोच ही नहीं सकता. उसे ये सोचने की फुरसत ही नहीं रहेगी कि मजदूरी कम मिल रही है तो कहीं और देखा जाय.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी को यह सिद्धांत रुपी जायदाद उनके पिताश्री से विरासत में मिली है. माडर्न बिजनेस प्रैक्टिस जिसमे ये माना जाता है कि न्यायपूर्ण मजदूरी किसी भी मजदूर को खुश रखती है इसलिए वह अच्छा काम करता है, के लिए राम अवतार जी के बिजनेस सिद्धांतों की लिस्ट में कोई जगह नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, बात जब सस्ते और टिकाऊ मास्टरों की हुई तो काफी बातचीत और ब्रेन स्टोर्मिंग के बाद रमेश बाबू और राम अवतार जी के बीच इस बात पर आम सहमति बनी कि प्राइवेट स्कूल में कम सैलरी पाने वाले अध्यापकों को थोड़ी ज्यादा सैलरी का लालच देकर फोड़ा जा सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे अध्यापक जिनका घर-परिवार ट्यूशन किये बिना नहीं चलता. जो प्राइवेट स्कूलों से मिलने वाली सैलरी बिना किसी ना-नुकर के इसलिए ले लेते हैं क्योंकि इन स्कूलों में पढाने से ही उन्हें ट्यूशन मिलते हैं. ये अध्यापक सुबह-शाम उस महापुरुष की आराधना करते हैं जिसने ट्यूशन नामक प्रोफेशन का आविष्कार किया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों इस बात पर सहमत हो गए कि सस्ते और टिकाऊ अध्यापकों की खोज प्राइवेट स्कूलों तक जाकर ख़त्म होती है. वहां से आगे जाने की ज़रुरत ही नहीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अध्यापकों के बाद बारी आई चपरासियों की. किसी भी स्कूल के लिए अध्यापक के बाद महत्व के पैमाने पर चपरासी का नंबर आता है. चपरासी घंटा न बजाये तो पढाई की शुरुआत न हो. वहीँ चपरासी घंटा न बजाये तो पढाई बंद भी नहीं होगी. चपरासी के महत्व को आगे रखकर दोनों ने बड़ा गहन चिंतन किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बातचीत आगे चली तो रमेश बाबू ने सजेस्ट किया कि जैसे अध्यापकों को प्राइवेट स्कूल से खींचा जा सकता है वैसे ही क्यों न चपरासियों को भी वहीँ से खींच लिया जाय. रमेश बाबू के इस विचार को राम अवतार जी ने अपने विचारों की गुलेल चलाकर घायल कर दिया. रमेश बाबू का विचार वहीँ टेबल पर घायल पड़ा बिलबिलाने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ ही अपने विचारों की गुलेल से राम अवतार जी ने एक विचार और दागा. वे बोले; "अरे क्या ज़रुरत है चपरासी बाहर से लाने की? मैं आपको एक तरकीब बताता हूँ. हमारे यहाँ जो मुटिया लोग काम करते हैं, उन्ही में से सात-आठ को चपरासी बना डालते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर रमेश बाबू अचंभित. उन्हें समझ में नहीं आया कि राम अवतार जी ऐसा क्यों कह रहे हैं? एक बार के लिए उन्हें लगा कि ऐसा करने से तो राम अवतार जी की तेल-मिलों और दूकानों में काम का हर्ज़ होगा. यही सोचते हुए उन्होंने कहा; "लेकिन फिर आपका काम कैसे चलेगा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर राम अवतार जी मुस्कुरा दिए. बोले; "आप भी न. अरे, मैं इस बात पर ऐसा इसलिए कहा रहा हूँ कि पूरा का पूरा बिजनेस सेंस बनता है यहाँ. अब देखिये, अगर स्कूल के लिए नया चपरासी बाहर से लेने जायेंगे तो उसे चपरासी की सैलरी देनी पड़ेगी. और आप तो जानते ही है कि ऐसा करना कितना मंहगा साबित होगा. ऐसे में अगर दूकान से लाकर किसी मुटिया को चपरासी बना दिया जाय तो दो बातें होंगी. उसकी जगह जिसको भी लेंगे उसे मुटिया की सैलरी मिलेगी. और इसे चपरासी बना देंगे तो ये भी खुश हो जाएगा. एक तरह से इसका प्रमोशन हो जाएगा. मुटिया को अगर चपरासी का काम मिल जाए तो वो इतना खुश हो जाएगा कि सैलरी बढाने की बात करेगा ही नहीं. "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी की बात सुनकर रमेश बाबू को लगा कि उनके हाथ में होता तो वे राम अवतार जी को चेंबर ऑफ़ कामर्स से गोल्ड मैडल विद सर्टिफिकेट दिला देते. और तो और इनके बिजनेस सिद्धांतों को आई आई एम के पाठ्यक्रम में डलवा देते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधे मन से राम अवतार जी को गरियाते और आधे मन से उनकी सराहना करते हुए उन्होंने कहा; " बढ़िया आईडिया दिया आपने."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अध्यापक और चपरासी के बारे फैसला लगभग ले लिया गया. उसके बाद नंबर आया हेडमास्टर साहब का. बात चली तो रमेश बाबू ने कहा; "हेड मास्टर के बारे में आपको चिंता करने की ज़रुरत ही नहीं है. हेड मास्टर तो अपने हाथ में हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर राम अवतार जी को लगा कि शायद उन्होंने फ़ोन पर बात होने के बाद किसी हेड मास्टर साहब से प्लान के बारे में बात की होगी. यही सोचते हुए उन्होंने रमेश बाबू से पूछा; "आपने किसी हेड मास्टर से बात की है क्या?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "अरे नहीं. बिना आपसे पूछे मैं किसी से भला कैसे बात कर सकता हूँ? वो तो मैं इसलिए कह रहा था कि अपने एक आरएनपी सर हैं. हायर सेकंडरी में मुझे ट्यूशन पढ़ाते थे. बहुत पुराना सम्बन्ध है अपना. उनका आईटी रिटर्न भी अपने यहीं से मैं ही डलवा देता हूँ. परमेश्वरी विद्यालय में पढ़ाते हैं. एक्सपेरिएंस भी है. काबिलियत भी. वे इस जॉब के लिए परफेक्ट रहेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब अगर आपके मन में सवाल उठे कि आरएनपी सर कौन ठहरे तो फिर पढिये. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरएनपी सर का पूरा नाम राम नारायण पाठक है. अंग्रेजी में एमए किया है. उसके बाद बीएड करके अध्यापन में उतर गए. पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के किसी गाँव के हैं. कलकत्ते में परमेश्वरी विद्यालय में पिछले पचीस साल से पढ़ाते हैं. इन्हें स्कूल से सैलरी उतनी ही मिलती है जितनी प्राइवेट स्कूलों में औरों को मिलती है. घर-परिवार ट्यूशन से चलता है. पाठक सर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठक सर की बड़ी तमन्ना थी कि वे किसी दिन परमेश्वरी विद्यालय के हेड मास्टर बनें. जब तक त्रिपाठी जी वहां के हेड मास्टर थे, तब तक पाठक सर को लगता था कि त्रिपाठी जी के बाद वही हेड मास्टर बनेंगे. इस आशा में इन्होने करेसपांडेंस के जरिये इतिहास विषय में भी एमए किया. इन्हें लगा कि डबल एमए करने हेड मास्टर पद के लिए इनकी दावेदारी और पुख्ता हो जायेगी. पाठक सर पूरी तैयारी किये बैठे थे कि त्रिपाठी जी के रिटायरमेंट के बाद यही हेड मास्टर बनेंगे. लेकिन हाय री किस्मत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस किस्मत ने इनका साथ छोड़ दिया. इन्हें नहीं पता था कि त्रिपाठी जी के रिटायरमेंट प्लान में एक चैप्टर यह भी था कि वे जब रिटायर होंगे तब अपने रिश्तेदार दूबे जी, जिनकी नौकरी उन्होंने इस स्कूल में लगवाई थी, उन्हें हेड मास्टर बनाकर जायेंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूबे जी भी हेडमास्टर केवल इसलिए नहीं बने थे कि वे त्रिपाठी जी के रिश्तेदार थे बल्कि इसलिए बन पाए थे कि वे स्कूल के हेड ट्रस्टी सोमानी जी के घर सुबह-शाम रामचरित मानस का सस्वर पाठ करते थे. रामचरित मानस का यह सस्वर पाठ ही उनके हेडमास्टर बनने में सहायक सिद्ध हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूबे जी के हेडमास्टर बनने के बाद मानो पाठक जी का परमेश्वरी विद्यालय में अध्यापन से दिल ही उठ गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जारी रहेगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२१ मई, २००७ को मैंने &lt;a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2007/05/blog-post_21.html"&gt;पहली पोस्ट&lt;/a&gt; लिखी थी. मजे की बात यह कि उसी दिन पब्लिश भी कर दी थी. इस लिहाज से देखें तो आज ब्लागिंग में दो साल पुराने हो लिए हम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने क्या कहा? ये सब मैं क्यों बता रहा हूँ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजी साहब, बधाई तो बनती है न.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-5733612181539512793?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/LMOf_5ri4rI" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/5733612181539512793/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=5733612181539512793&amp;isPopup=true" title="13 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5733612181539512793?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5733612181539512793?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/LMOf_5ri4rI/blog-post_21.html" title="सेंट मोला मेमोरियल - भाग ५" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_21.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0QHSXk9fyp7ImA9WxJRGEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-5971884235774496672</id><published>2009-05-20T11:14:00.004+05:30</published><updated>2009-05-20T17:05:38.767+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-20T17:05:38.767+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शिक्षा" /><title>सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग ४</title><content type="html">पंकज सिंह जी के बारे में याद आते ही राम अवतार जी आश्वस्त हो गए. उन्हें याद आया कि न जाने कितनी बार वे पंकज सिंह जी को रमेश जी के आफिस में देख चुके हैं. जितनी बार उन्होंने पंकज सिंह जी को वहां देखा, हर बार रमेश बाबू ने राम अवतार जी के सामने सिंह जी की तारीफों के पुल ही बांधे थे. उनकी काबिलियत की चर्चा करते हुए रमेश बाबू ने हर बार यही बताया था कि कैसे दिल्ली के मंत्रालय वगैरह में काम करवाना पंकज सिंह जी के बायें हाथ का खेल है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज सिंह जी की काबिलियत को साबित करने के लिए रमेश बाबू ने न जाने कितनी कहानियां सुनाई होंगी. तरह-तरह की कहानियां. तरह-तरह की उनकी परेशानियां. हर परेशानी का पंकज सिंह जी के द्बारा तरह-तरह से इलाज किया जाना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कंपनी अफेयर मिनिस्ट्री में कोई काम फंस गया था तो कभी फायनांस मिनिस्ट्री में. कभी सामाजिक न्याय मंत्रालय में तो कभी पंचायत मंत्रालय में. लेकिन हर बार पंकज सिंह जी ने रमेश बाबू को संकट से उबार दिया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकट से हनुमान छोडावें, मन-क्रम बचन ध्यान जो लावें....टाइप हिसाब था दोनों के बीच. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात आगे बढ़ी तो राम अवतार जी को लगने लगा कि सारी बातें फ़ोन पर नहीं की जा सकतीं. आखिर मामला भी तो कोई छोटा-मोटा नहीं था. धंधे के डाईवर्शीफ़िकेशन की बात थी. सालों से चले आ रहे उनके विश्वास कि &lt;strong&gt;तेल के धंधे से बढ़िया और कोई धंधा नहीं है&lt;/strong&gt; को इस स्कूल के धंधे ने हिला डाला था. और जो बात राम अवतार जी के विश्वास को हिला दे वो किसी भी तरह से छोटी नहीं हो सकती थी. लिहाजा उन्होंने सोचा कि रमेश बाबू के आफिस जाकर ही बाकी की बातें हो सकती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही सोचते हुए उन्होंने रमेश बाबू से पूछा; "अच्छा एक बात बताईये. आज शाम को क्या कर रहे हैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी द्बारा अचानक पूछे गए इस सवाल से रमेश बाबू को जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ. न जाने कितनी बार वे राम अवतार जी द्बारा अचानक पूछे गए ऐसे सवालों को झेल चुके थे. उन्हें पता था कि जब भी राम अवतार जी का कोई काम होता है तो वे फ़ोन पर बात करते हुए अचानक ऐसे ही सवाल दाग देते थे. ऐसे सवालों का मतलब यह होता था कि राम अवतार जी किसी भी हालत में आज शाम को मिलकर रहेंगे. रमेश बाबू का पहले से बनाया हुआ कोई प्रोग्राम रहे या न रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, राम अवतार जी के सवाल के जवाब में रमेश बाबू ने कहा; "मैं शाम को खाली ही हूँ. आप आ जाइये. बाकी बातें यहीं आफिस में करेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू ने ये कह तो दिया लेकिन इतना कहने के बाद उन्हें बड़ा पछतावा हुआ. उन्होंने खुद को मन ही मन धिक्कारा. उन्हें लगा कि एक बार में ही मान जाना और राम अवतार जी को आफिस बुलाना ठीक नहीं हुआ. ऐसा करने से इम्पार्टेंस घट जाता है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें लगा कि वे कम से कम राम अवतार जी के ऊपर एहसान जताते हुए यह तो कह ही सकते थे कि; "प्लान तो ये था कि आज घर ज़रा जल्दी चला जाऊं. हमारे साले साहब आ रहे हैं शाम को. लेकिन कोई बात नहीं. आपका का काम सबसे से पहले. बाकी काम बाद में होता रहेगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब तो बात निकल गई थी. अचानक उनकी नज़र अपने चेंबर की दीवार पर चिपके उस स्टिकर पर गई जिसपर कई चीजों की लिस्ट बनी थी. वे चीजें जो वापस नहीं आतीं. लिस्ट लम्बी थी. हरिद्वार बेस्ड किसी धार्मिक मठ ने यह स्टिकर बनवाया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर देश में सामजिक चेतना को जगाने की जिम्मेदारी मठों के ऊपर है.     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लम्बी लिस्ट में तमाम चीजों का जिक्र था जो वापस नहीं आतीं. इन चीजों की लिस्ट में लिखा था; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीर कमान से &lt;br /&gt;बात जुबान से &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टिकर देखकर वे खिसिया गए. उन्हें लगा कि सालों से स्टिकर उनके चेंबर की दीवार पर चिपका है लेकिन इसके बावजूद उनसे गलती हो गई और बात जुबान से निकल गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके चेहरे पर "धिक्कार है" टाइप भाव उभर आये. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, अब कुछ किया नहीं जा सकता था. अब उनके हाथ में कुछ नहीं था. वैसे भी, उन्हें इस बात से कोई ऐतराज नहीं था कि शाम को राम अवतार जी उनके आफिस में आयेंगे और उन्हें झेलना पड़ेगा. उन्हें ऐतराज इस बात से था कि एहसान जताने के एक मौका उनके हाथ से जाता रहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुस्से में उन्होंने चपरासी को झाड़ दिया. चपरासी की गलती केवल इतनी थी कि वो गिलास में रखे पानी को ढांकना भूल गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर राम अवतार जी ने फैसला कर ही लिया था कि बाकी की बातें रमेश बाबू के आफिस जाकर करनी हैं. वे शाम को दूकान से जल्दी निकलने की तैयारी करने लगे. अपने मैनेजर याने मौसी के बेटे को बुलाया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप मन ही मन ज़रूर खिसिया रहे होंगे कि;"क्या मैं हर बार "मौसी का बेटा-मौसी का बेटा" लिखता रहता हूँ. अरे, इस मैनेजर याने मौसी के बेटे का कोई नाम भी तो होगा?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपका खिसियाना जायज है. मौसी के इस बेटे का ज़रूर एक नाम है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे पूरी दुनियाँ के माँ-बाप शेक्सपीयर बाबू से प्रभावित नहीं हुए और उनकी ये बात नहीं मानी कि; "नाम में क्या रक्खा है?" वैसे ही मौसी के इस बेटे के माँ-बाप भी शेक्सपीयर बाबू से बिलकुल प्रभावित नहीं हुए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिहाजा उन्होंने अपने बेटे का नाम रख कर शेक्सपीयर बाबू के इस सदुपदेश की ऐसी-तैसी कर डाली. नाम रक्खा सुशील. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अब से मौसी के इस बेटे को हम सुशील के नाम से जानेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, तो राम अवतार जी ने सुशील को बुलवाया. सुशील जब उनके चेंबर में दाखिल हुआ तो उन्होंने कहा; " सुन, आज शाम को मैं नहीं रहूँगा. हावड़ा वाले गोदाम में सरसों गिरेगी आज. उसको देख लेना. और टू चालान पर साइन मत करना. बोलना भैया कल करेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे अदालतों में जज साहब लोग अपना फैसला सुनाते हैं, वैसे ही राम अवतार जी ने अपना फैसला सुना डाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा उन्होंने सुशील को दो-चार और हिदायतें दी जो किसी लिहाज से ज़रूरी नहीं थीं. मालिक द्बारा दी गई हिदायतें ज़रूरी हों, ये किसी बिजनेस-शास्त्र की किताब में नहीं लिखा है. आफिस से निकलने के पहले मालिकों द्बारा दी जाने वाली ज्यादातर हिदायतें गैर-ज़रूरी ही होती हैं. मालिक ऐसी हिदायतें केवल इसलिए देता हैं क्योंकि उसे मालिक-धर्म का पालन करना रहता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई समाज-शास्त्री भाइयों की मानें तो मालिक अगर हिदायत न दे तो उसके पेचिस से पीड़ित होने का चांस रहता है. ऐसे में यही श्रेयस्कर है कि मालिक उठते-बैठते ज़रूरी-गैर ज़रूरी हिदायतें देता रहे. उसका स्वास्थ ठीक रहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी तो इस सिद्वांत को आँख मूंदकर फालो करते हैं. लिहाजा वे हमेशा स्वस्थ रहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, शाम को राम अवतार जी पहुँच गए रमेश बाबू के आफिस. मिलते ही दुआ-सलाम का बाजा बजा. बात आगे चली तो रमेश बाबू ने कहा; "ठीक सोचा है आपने. आज के डेट में इससे बढ़िया कोई धंधा नहीं है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू की बात सुनकर राम अवतार जी ने मन ही मन अपना कालर ऊपर कर डाला. मुस्कुराते हुए बोले; "अरे, मेरा तो दिमाग ही फिर गया. सनी का एडमिशन करवाने न जाता तो ये आईडिया तो आता ही नहीं. फिर सोचा कि बड़ा झमेले वाला काम होगा. ऐसे में इसके बारे में सोचना ठीक नहीं होगा. वो तो उस दिन आपसे बात की तब जाकर थोड़ा कांफिडेंस आया कि इस बिजनेस में उतरा जा सकता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर रमेश बाबू ने उन्हें एक बार फिर अस्योर करते हुए कहा; "आप तो अपने आदमी हैं. मैंने तो उस दिन भी कहा कि बस आप सारा काम मेरे ऊपर छोड़ दीजिये. अरे सबसे बड़ा काम है मंत्रालय से मान्यता दिलवाना. दिल्ली वाला सारा काम पंकज कर ही देगा. आप कहें तो उसको कल ही बुलवा लूँ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी एक बार फिर से आश्वस्त हुए. मालिक टाइप लोग समय-समय पर आश्वस्त होते रहें तो आस-पास के कई लोगों की उम्र बढ़ जाती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ सोचते हुए बोले; "आप तो हैं ही. फिर मुझे किस बात की चिंता? मुझे तो इतना मालूम है कि स्कूल बनेगा तो केवल मेरा नहीं होगा. स्कूल तो आप का ही होगा. सारा क्रेडिट आपका. मेरा क्या है, मैं तो केवल इतना मानता हूँ कि भगवान ने समाज के लिए कुछ करने लायक बनाया है तो अपना भी धरम बनता है कि जो कुछ बन पड़े किया जाए."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना कहकर वे रमेश बाबू की तरफ देखने लगे. शायद उन्हें रमेश बाबू के रिएक्शन का इंतजार था. दोनों की नज़रें मिलीं तो दोनों ठहाका लगाकर हंसने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हंसी रुकी तो रमेश बाबू बोले; "बिल्कुल जी बिल्कुल. मैंने तो आपको कहा ही कि दिल्ली का काम आप मेरे ऊपर छोड़ दें. आप तो बस ज़मीन वगैरह का इंतजाम कीजिये. वैसे आप कहेंगे तो स्टेट गौव्मेंट से ज़मीन की बात भी चलाई जा सकती है. चैनल सब है अपने पास. हाँ, लेकिन एक बात है. स्टेट गौव्मेंट के पास गए तो थोडी देर हो सकती है. जानते ही हैं सरकारी काम इतने जल्दी तो होने से रहा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू की बात सुनकर राम अवतार जी बोले; " वो तो ठीक रहेगा. अरे अपने अप्लाई तो कर ही देते हैं. देर से ही सही, ज़मीन तो मिल ही जायेगी. जब मिल जायेगी तो स्कूल का काम आगे बढा देंगे. एक और ब्रांच खोल देंगे. हाँ जब तक गौव्मेंट से ज़मीन नहीं मिलती, तबतक पहले स्कूल के लिए अपने पास जगह की कमी नहीं है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू उनकी बात सुनकर खुश हो गए. बोले; "मतलब ज़मीन है आपके पास?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी ने उनकी बात का जवाब देते हुए कहा; "ज़मीन तो नहीं है, हाँ वो अपना बी टी रोड वाला गोदाम है न, अरे वही बड़ा वाला गोदाम. वैसे ही पड़ा है सालों से. किसी काम तो आता नहीं. इसी काम में आ जायेगा. पिताजी ने बड़े सस्ते में काबाडा था उसे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू ने पूछा; "क्या एरिया होगा उसका?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी ने बताया कि गोदाम करीब बारह हज़ार स्क्वायर फीट का है. पूरा खाली. आगे बोले; "बस स्ट्रक्चर ही तो चेंज करना है. गोदाम को स्कूल बनाने में कितना समय लगेगा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू को इस गोदाम के बारे में जानकारी थी. राम अवतार जी का गोदाम को स्कूल में बदलने का आईडिया उन्हें अच्छा तो लगा लेकिन उनके मन में कुछ सवाल भी आये. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "लेकिन वो तो बड़े कंजेस्टेड जगह में है. सामने तो बिलकुल भी जगह नहीं है. मेरे कहने का मतलब है कि स्टूडेंट्स के खेलने-कूदने के लिए भी तो कुछ जगह रहनी चाहिए?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी को ये सवाल बिलकुल नहीं भाया. मन ही मन सोचने लगे कि स्कूल में बच्चों के खेलने-कूदने की क्या ज़रुरत है? अरे बच्चे वहां पढने आयेंगे कि खेलने-कूदने? पता नहीं किस जाहिल ने स्कूल में खेल-कूद को प्राथमिकता देने की बात कही? क्या ज़माना आ गया है कि लोग पढाई-लिखाई से ज्यादा खेल-कूद को महत्व देने लगे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में तो देश का फ्यूचर पूरी तरह से बरबाद हो जाएगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें यह भी लगा कि जितनी जगह बच्चों के खेलने के लिए छोड़ी जाती है, उसमें एक पूरा हाऊसिंग काम्प्लेक्स डेवलप हो सकता है. खेलने-कूदने के लिए जगह छोड़ना तो करोडों रूपये की बरबादी है. पता नहीं लोगों को बिजनेस सेंस कब आएगा?&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;खैर, यही सोचते हुए वे बोले; "अरे क्या ज़रुरत है खेल-कूद की? वैसे अगर खेल-कूद के लिए जगह न होना स्कूल की मान्यता प्राप्त करने के रास्ते में रुकावट बनेगी तो अन्दर एक रूम बनवा देंगे. एक टेबल टेनिस का टेबल और कैरम वगैरह का प्रबंध करवा देंगे. क्या है? वैसे भी हर काम पैसे से होता है. वो सब ठीक हो जाएगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जारी रहेगा......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-5971884235774496672?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/FXpQqD4FDrg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/5971884235774496672/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=5971884235774496672&amp;isPopup=true" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5971884235774496672?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5971884235774496672?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/FXpQqD4FDrg/blog-post_20.html" title="सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग ४" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_20.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0QERH8yeip7ImA9WxJRGEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-4377369850434927650</id><published>2009-05-14T13:30:00.002+05:30</published><updated>2009-05-20T17:05:05.192+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-20T17:05:05.192+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शिक्षा" /><title>सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग ३</title><content type="html">भाग १ पढने के लिए &lt;a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post.html"&gt;यहाँ क्लिकियायें&lt;/a&gt;...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाग २ पढने के लिए &lt;a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html"&gt;यहाँ क्लिकियायें &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू राम अवतार जी को झेलने के लिए कमर कस चुके थे. और कर भी क्या सकते थे? राम अवतार जी को झेलने का उनका अनुभव हमेशा उनके काम आता है. वैसे भी राम अवतार जी जैसे ट्रेडर के साथ 'ट्रेडरई' कैसे की जाती है, उन्हें बखूबी पता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंस्टीच्यूट ने अपने सिलेबस में नहीं रक्खा तो क्या हुआ, ऐसे क्लाइंट के साथ बात करके सब सीख जाते हैं.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, राम अवतार जी के सवाल कि; "बच्चे कैसे हैं?" के जवाब मेंने &lt;br /&gt; चोखानी जी ने कहा; बच्चे तो ठीक-ठाक हैं. पिछले पंद्रह दिनों से छोटे वाले के एडमिशन के लिए बहुत बिजी था."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका जवाब सुनकर मानो राम अवतार जी की बांछे खिल गईं. उन्होंने प्लान बनाकर रखा था कि अगला सवाल वे श्याम बाबा के कीर्तन समारोह में उनकी अनुपस्थिति के बारे में पूछेंगे लेकिन जैसे ही चोखानी जी ने बच्चे के एडमिशन की बात की, उन्होंने सवाल को ड्राप करना ही उचित समझा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले कि बात कहीं और खिसके वे तुंरत बोल पड़े; "अरे मत पूछिए. मैं भी उसी चक्कर में फंसा था. क्या ज़माना आ गया है. एक हम लोग थे जो बीस रूपये फीस देकर बी कॉम तक पढ़ लिए और एक आज का हाल है कि दूसरी क्लास में एडमिशन के लिए पचीस हज़ार तो डोनेशन देना पड़ता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोखानी जी ने भी शायद अपने बेटे की एडमिशन कथा अभी तक किसी के साथ शेयर नहीं की थी. लिहाजा दोनों ने एक साथ करीब पांच मिनट तक एडमिशन को लेकर अपने अनुभव शेयर किये. दोनों के मन में रखी भड़ास धीरे-धीरे करके मुंह के रास्ते बाहर हो रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे ही राम अवतार जी को लगा कि कहीं बात खिसक कर जमाने के खराब होने पर पहुंचे वैसे ही उनका व्यापारी दिमाग बोल पड़ा; "अब असली मुद्दे पर आ जाओ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिमाग का सुझाव मानते हुए वे चोखानी जी से बोले; "लेकिन एक तरह से देखें तो सरकार भी कितना करेगी शिक्षा के लिए? वैसे भी सरकार मदद ही तो कर रही है. मैं कह रहा हूँ, जिसके पास पैसा है, उसके स्कूल के धंधे में जाने का रास्ता तो दिखा ही दिया है सरकार ने."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी की बात सुनकर रमेश बाबू मन ही मन सोचने लगे कि असली व्यापारी इसे कहते हैं. आखिर जो आदमी विषम परिस्थियों में भी व्यापार का आईडिया निकाल ले, उससे बड़ा व्यापारी और कौन है? न जाने कितने उद्योगपति और व्यापारी इस बात का इंतजार करते हैं कि कोई सूखा आये...कोई बाढ़ आये...और कुछ नहीं तो कहीं युद्ध वगैरह ही शुरू हो जाए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी विषम परिस्थितियां मौजूदा व्यापारियों को सुदृढ़ तो करती ही हैं, नए लोगों को भी व्यापार वगैरह करने का मौका देती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, रमेश बाबू कुछ सोचते हुए बोले; "एक दम सही बात कह रहे हैं. मैं तो कहता हूँ कि इस बारे में आपको खुद भी सोचना चाहिए. कोई बहुत बड़ी बात नहीं है स्कूल खोलना. अरे मैं कहता हूँ, पैसा है तो आदमी कुछ भी कर सकता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी को रमेश बाबू की बात खूब जमी. लेकिन कहीं रमेश बाबू को उनके प्लान और उनकी उत्सुकता के बारे में पता न चल जाए इसलिए वे बोले; "अरे क्या बात कह रहे हैं आप? मैं और स्कूल के धंधे में! नहीं-नहीं ये काम हमसे नहीं होगा. भाई अपना जमा-जमाया काम ही काफी है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू बोले; "अरे क्यों नहीं होगा? आप क्या समझते हैं, जिन लोगों के स्कूल हैं वे क्या पहले से स्कूल चलाते थे? आखिर बिड़ला जी भी तो पहले एम्बेसडर ही बनाते थे. सीमेंट ही तो बनाते थे. जब वे कर सकते हैं तो आप क्यों नहीं कर सकते? वैसे भी आपको क्या करना है? आप तो बस हाँ कीजिये. बाकी का काम तो मुझपे छोडिये."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी को लगा कि अब ज्यादा फूटेज खाने की जरूरत नहीं रही. फिर भी आखिरी मनौव्वल का रास्ता साफ़ करते हुए उन्होंने पूछ लिया; "आपको लगता है मैं इस धंधे में जा सकता हूँ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू को लगा कि इन्हें कांफिडेंस देने की ज़रुरत है. वे बोले; "अरे मैंने कहा न कि बाकी का काम आप मेरे ऊपर छोडिये. आप तो बस हाँ कीजिये उसके बाद देखिये. आपका हर काम तड-तड होगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों एक दूसरे को उकसा रहे थे.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी अब तक आश्वस्त हो चुके थे कि उनका निशाना ठीक जगह लगा. फिर भी रमेश बाबू को थोड़ा और उकसाने के लिए उन्होंने फिर कहा; "बड़ा झमेला है रमेश जी. स्कूल की मान्यता वगैरह दिलाना. हेड मास्टर खोजना. मास्टर खोजना.....सबसे बड़ा झमेला है सरकारी मान्यता दिलाना."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात सुनकर रमेश जी को लगा कि कहीं सरकारी मान्यता मिलने या फिर सी बी एस ई से एफिलियेशन न मिलने के डर से कहीं ये अपना प्लान त्याग न दें. वे तुंरत बोल पड़े; "अरे राम अवतार जी, मैंने कहा न कि आपको चिंता करने की ज़रुरत नहीं है. ये सारा काम मेरे ऊपर छोडिये."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम अवतार जी को लगा कि रमेश बाबू के मन को एक बार फिर से टटोलने की ज़रुरत है. उन्होंने पूछा; "तो क्या कोई आदमी है आपके पास जो दिल्ली में सी बी एस ई वाला काम वगैरह करा दे?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे मैंने कहा न कि आप मुझपे छोडिये. वो अपना पंकज है न, अरे वही पंकज सिंह, आपका दिल्ली से रिलेटेड हर काम करवा कर देगा. उसके रहते आप को किस बात की चिंता?"; रमेश बाबू ने राम अवतार जी को फिर से आश्वस्त किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब अगर आपके मन में यह सवाल उठा रहा है कि पंकज सिंह कौन हैं, तो फिर पढिये कि वे कौन हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज सिंह जी को बोल-चाल की भाषा में 'बहुत पहुँची हुई चीज' कहा जाता है. ग्रेजुयेशन तक की पढ़ाई की है सिंह जी ने. ग्रेजुयेशन के दौरान तो क्या उससे न जाने कितने पहले से दुनियाँदारी की सारी बातें वे सीख चुके थे. ग्रेजुयेशन की पढ़ाई तो इसलिए की क्योंकि माँ-बाप चाहते थे कि ग्रैजुएट हो जाएँ तो शादी-व्याह में कोई असुविधा नहीं होगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब राजनीतिशास्त्र से बीए की पढ़ाई कर रहे थे तभी इन्होने सबसे बड़े सामाजिक सत्य का पता लगा लिया था. और वो ये था कि पढ़ाई-लिखाई का काम बेवकूफ करते हैं. पढ़-लिख कर पैसा ही तो कमाना है. ऐसे में अगर कोई अपनी प्रतिभा के दम पर बिना पढ़े-लिखे ही पैसा कमाने की काबिलियत रखता हो तो क्या ज़रुरत है पढाई-लिखाई की? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कालेज के दिनों से ही छात्र राजनीति के आधार स्तंभ बन चुके थे. छात्रों की भलाई का काम इन्होने अपने मज़बूत कन्धों पर ले लिया था. जैसे-जैसे भलाई करते गए इनके कंधे मज़बूत होते गए. कालेज में एडमिशन लोलुप छात्रों का पैसे लेकर एडमिशन करवाने का धंधा इन्होने छात्र जीवन में ही शुरू कर दिया था. कद धीर-धीर बढ़ने लगा तो मार-पीट जैसा पूण्य कार्य भी करने लगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के एक 'राजनेता' से पंकज सिंह जी बहुत बहुत प्रभावित रहते थे. हमेशा कहते थे कि उनको देखो. पहले क्या थे? छात्र नेता ही तो थे. कलकत्ते के ही थे. अरे यहीं सेंट्रल एवन्यू में जाम वगैरह करवाने का काम करते थे. और आज देखो. हिन्दुस्तान की सरकार बनेगी कि बिगडेगी, इस बात का निर्धारण वही करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन राजनेता से प्रभावित पंकज सिंह जी उन्ही के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. महीने में पचीस दिन कलकत्ते से दिल्ली आते-जाते रहते हैं. एक पाँव कलकत्ते में तो दूसरा राजधानी एक्सप्रेस में रहता है. किसी भी मंत्रालय में कोई भी काम करवाने का दावा करते हैं. कंपनी अफेयर मिनिस्ट्री हो या फिर फायनांस मिनिस्ट्री, स्टील मिनिस्ट्री हो या फिर ह्युमन रिसोर्स मिनिस्ट्री, हर मिनिस्ट्री में कोई भी काम करवा सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कलकत्ते में रहते हैं तब हनुमान जी के मंदिर में शाम को जाना नहीं भूलते. वहां जाते हैं, इस बात का पता इनके माथे पर सिन्दूर वाले चन्दन को देखने से लग जाता है. लगता है जैसे भगवान जी को धंधे में पार्टनर बना रक्खा है इन्होने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जारी रहेगा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-4377369850434927650?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/GASPNM5Ah00" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/4377369850434927650/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=4377369850434927650&amp;isPopup=true" title="16 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/4377369850434927650?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/4377369850434927650?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/GASPNM5Ah00/blog-post_14.html" title="सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग ३" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_14.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEEERHg5fSp7ImA9WxJREEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-7477185601633823344</id><published>2009-05-11T16:20:00.003+05:30</published><updated>2009-05-11T18:26:45.625+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-11T18:26:45.625+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दुर्योधन की डायरी" /><title>दुर्योधन की डायरी - पेज ३४५९</title><content type="html">आज पढ़िए युवराज दुर्योधन की डायरी का वह पेज जिसमें उन्होंने मामाश्री शकुनि द्बारा भेद-नीति को एक नया ही आयाम दिए जाने के बारे में लिखा है. कहते है यह प्रसंग महाभारत के प्रथम संस्करण में था. बाद के संस्करणों से इस प्रसंग को निकाल दिया गया. इतिहास में से बहुत सारा कुछ निकलता रहता है. कभी-कभी कुछ जुड़ भी जाता है. यह प्रसंग उन्ही में से एक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;........................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्य है मामाश्री भी. हलचल मचवाना कोई उनसे सीखे. सच कहें तो उनसे सीखने के लिए क्या कुछ नहीं है इस संसार में. प्रेस मैनेजमेंट से लेकर पितामह मैनेजमेंट तक, कोई ऐसी बात नहीं है जिसे मामाश्री मैनेज नहीं कर सकें. माताश्री के तथाकथित विचारों की काट से लेकर चचा विदुर की खाट तक, मामाश्री सबकुछ खड़ी कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी लगता है जैसे ये नहीं होते तो पृथ्वी रसातल में चली जाती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परसों की ही बात ले लो. जैसे ही गुप्तचरों के एक ग्रुप ने फील्ड से वापस आकर रिपोर्ट दी कि कुरुक्षेत्र में हमारी हार हो सकती है, हमारा तो दिमाग घूम गया. एक मिनट के लिए लगा कि इतनी मेहनत सब बेकार चली जायेगी? क्या-क्या नहीं किया?  द्वारका जाकर केशव की सेना माँगी. तिकड़म लगाकर मद्र नरेश महाराज शल्य को अपनी तरफ ले आया. कर्ण को पटाया. न जाने कितने पापड़ बेले. लेकिन गुप्तचरों के द्बारा इस तरह का सन्देश लाने से तो कुछ समय के लिए मेरा हर्ट का टुकड़ा-टुकड़ा हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ गुप्तचरों द्बारा दी गई सूचना से मैं हलकान हुआ जा रहा था, वहीँ मामाश्री बिना किसी टेंशन के बैठे थे. मैंने उनसे टेंशन न करने का कारण पूछा तो बोले; "चिंता तो चिता से भी डेंजर होती है पुत्र दुर्योधन."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गजब आदमी हैं. इन्हें किसी बात का टेंशन ही नहीं रहता. वैसे भी ठीक ही है. जो आदमी हमेशा दूसरों को टेंशनग्रस्त रखे, उसे किस बात की टेंशन? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय. मैंने जब अपनी बात रखी तो बोले; "अब तो युद्ध की तैयारी पूरी हो चुकी है भांजे, अब क्या किया जा सकता है? वैसे भी तमाम नरेश, रथी, अधिरथी, महारथी वगैरह तो अपना-अपना समर्थन दोनों दलों को दे ही चुके हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने पूछा कि क्या अब कोई उपाय नहीं है तो बोले; "ऐसा कैसे हो सकता है? मेरे रहते उपाय न रहे ऐसा सपने में भी न सोचना वत्स."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लो कर लो बात. जब उपाय है तो उसे बताईये. काहे फूटेज खा रहे हैं. मुझे लगता है कि ज्ञानी और विद्वान टाइप लोग कोई उपाय तुंरत बता दें तो उनका महत्व कम हो जाता है. इसीलिए मामाश्री भी इतनी भूमिका बाँध रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब उन्होंने उपाय बताया तो मैं दंग रहा गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर तक आँखें बंद रखने के बाद अचानक ध्यान-मुद्रा में ही कहना शुरू किया. बोले; "साम, दाम, दंड वगैरह के लिए समय भले ही चला गया हो वत्स दुर्योधन लेकिन भेद के लिए समय कभी नहीं जाता. इसलिए अब भेद का सहारा लेना ही नीतिगत सही होगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सोच रहा था कि भेद कहाँ से लायेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद मेरी सोच को ताड़ गए. मुझे देखते ही बोले; "यही सोच रहे हो न वत्स कि मैं क्या कहने वाला हूँ? तो सुनो. भेद-नीति के तहत कल सुबह ही तुम एक प्रेस कांफ्रेंस कर डालो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने पूछा कि मुझे प्रेस कांफ्रेंस में बोलना क्या है तो बोले; "मेरी बात ध्यान देकर सुनो वत्स. प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत में ही पत्रकारों से कहो कि बलराम, जो अभी तक निष्पक्ष थे, अब हमारी तरफ से लड़ेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जब इस बात पर शंका जाहिर की, कि अगर पत्रकार डिटेल मांगेंगे तो मैं क्या कहूँगा तो बोले; "तुम्हें केवल इतना कहना है कि बलराम जी से हमारी बात हुई है. उन्होंने हमें ही समर्थन देने का वादा किया है." आगे बोले; "और लगे हाथ पत्रकारों को यह भी बता देना कि अभी तक खुद को निष्पक्ष बताने वाले विदर्भ नरेश रुक्मी भी अब हमारी तरफ से लड़ेंगे."&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;क्या कांफिडेंस है इनका. मान गए इन्हें. मैंने जब उनसे बहस करनी चाही तो बोले; "कल सुबह प्रेस कांफ्रेंस में ये बात तुम बोलना. फिर में दोपहर में एक प्रेस कांफ्रेंस दुशासन से करवा दूंगा. वो भी यही बात बोलेगा. शाम को टेलीविजन के पैनल डिस्कशन में एक चैनल पर जयद्रथ को और दूसरे पर कर्ण से भी यही बात कहलवा देंगे. बस इतने में अपना काम बन जाएगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जब फिर से शक जाहिर किया तो बोले; "तुम डरते बहुत हो पुत्र दुर्योधन. मैं तो सोच रहा हूँ कि दो दिन बाद तुम्ही से फिर एक प्रेस कांफ्रेंस करवा दूँ. उसमें तुम पत्रकारों को बताना कि जब से बलराम और विदर्भ नरेश रुक्मि ने हमारी तरफ से लड़ने के लिए हामी भरी है, खुद सात्यकि, महाराज विराट और शिखंडी तक अपने स्टैंड पर पुनः विचार करने लगे हैं. इन लोगों से हमारे योद्धा संपर्क बनाये हुए हैं. ये हमारी तरफ से लड़ेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाप रे बाप. मान गए मामाश्री को. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से मैंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर प्रेस को बताया है कि बलराम और विदर्भ नरेश महाराज रुक्मि हमारी तरफ से लड़ेंगे तभी से बवाल हो गया है. एक बार तो लोगों ने मेरी बात पर शक जाहिर किया. लेकिन जब मेरी दी हुई बाइट्स को मामाश्री ने 'अपने चैनल' पर दिन भर चलवा दिया तो शक-सुबो की कोई गुन्जाईस ही नहीं रही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद तो बवाल हो गया. मीडिया में एक ही सवाल. जनता भी परेशान सी यही पूछ रही है कि बलराम ने ये क्या कर डाला? उधर पांडव बार-बार बलराम से पूछ रहे हैं कि क्या सच है? खुद बलराम कल दोपहर से ही हलकान हुए जगह-जगह कैमरे के सामने मेरी बात को डिनाय कर रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरह चैनलों पर तो खुद महाराज रुक्मि सफाई दे चुके हैं कि वे हमारी तरफ से नहीं लड़ेंगे लेकिन कोई उनकी बात मानने के लिए तैयार ही नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो पांडव भी सकते में आ गए हैं. जब बलराम और महाराज रुक्मि को लेकर ये हाल है तो कल जब प्रेस कांफ्रेंस में ये बताऊँगा कि शिखंडी, विराट और सात्यकि वगैरह हमारी तरफ से लड़ेंगे तो न जाने क्या हो जाएगा? पूरा हड्कम्पे मच जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान गए मामाश्री को. इनका बस चले तो मुझसे प्रेस कांफ्रेंस में यहाँ तक कहलवा दें कि केशव ने हमारी तरफ से लड़ने का फैसला किया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्य है भेद-नीति. मामाश्री के लिए एक ठो नारा लगाने का मन कर रहा है. बाहर जाकर तो बोल नहीं सकते. डायरिये में लिख देते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक सूरज चाँद रहेगा &lt;br /&gt;मामा तेरा नाम रहेगा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-7477185601633823344?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/vnl8ClhJy-o" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/7477185601633823344/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=7477185601633823344&amp;isPopup=true" title="23 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7477185601633823344?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7477185601633823344?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/vnl8ClhJy-o/blog-post_11.html" title="दुर्योधन की डायरी - पेज ३४५९" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">23</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_11.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEQHSHo8eyp7ImA9WxJREEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-2989493609399137351</id><published>2009-05-08T10:34:00.001+05:30</published><updated>2009-05-11T18:22:19.473+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-11T18:22:19.473+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शिक्षा" /><title>सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग २</title><content type="html">जब से बेटे के स्कूल से लौटे, तभी से उन्हें लगने लगा कि अपने करेंट बिजनेस को डाइवर्सीफ़ाई करने का एक तरीका उन्हें मिल गया है. वैसे भी मालिकाना हक़ जितनी चीजों पर बढ़े, उतना ही अच्छा. उन्हें लगता कि करेंट लिस्ट में अगर स्कूल भी जुड़ जाए तो क्या कहने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन-रात वे इसी बारे में सोचने लगे. एक दिन दूकान पर बैठे-बैठे ही मौसी के बेटे, जिसे मैनेजर बनाकर उन्होंने मौसा-मौसी और खुद उसके ऊपर एहसान किया था, से कह बैठे; "वैसे देखा जाय तो धंधा है चोखा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसी के बेटे की समझ में कुछ नहीं आया. उसे लगा कि सोचते-सोचते अचानक किस बात पर बोल पड़े? वो बेचारा अपने चेहरे पर क्वेश्चन मार्क का स्टिकर चिपकाए उन्हें निहारने लगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका यह व्यवहार उन्हें खल गया. फट से बोले; "तू भी रहेगा गधे का गधा ही. अरे मैं स्कूल के धंधे की बात कर  रहा हूँ."     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने गदहपन का जिक्र होते ही वह जैसे जाग गया. आखिर बेचारा ठहरा मैनेजर. मैनेजर की नींद अक्सर मालिक द्बारा गधा कहे जाने पर खुल जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सकपकाकर बोला; "हाँ, भैया आप ठीक कह रहे हैं. मैं तो कई दिनों से सोच रहा था कि इस धंधे के बारे में आपको बताऊँ. फिर सोचा कि आप पता नहीं कैसे रिएक्ट करेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो भी कैसे हाँ में हाँ नहीं मिलाये. वैसे भी हाँ में ना मिलाने का कोई कारण भी नहीं था. उसकी नज़र में भी स्कूल का धंधा सब धंधों में चोखा था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे बोला; " अरे भैया, खुद बिड़ला जी को ही देख लीजिये. कलकत्ते में ही कम से कम दस स्कूल हैं उनके. और फिर नोपानी जी, अरे वही बिड़ला जी के दामाद. उनके स्कूल का भी कितना नाम है. कलकत्ता तो जाने दीजिये, रांची तक में स्कूल है उनका."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैनेजर की बात सुनकर एक क्षण के लिए उससे प्रभावित हो लिए. उन्हें लगा तेल की दूकान और तेल-मिल के काम के अलावा भी इसे कई बातों का ज्ञान है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार तो मन में आया कि उसकी प्रशंसा कर दें. वे ऐसा करने ही वाले थे कि उनकी अंतरात्मा की आवाज़ ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. अंतरात्मा से आवाज़ आई; " क्या करने जा रहे हो? मालिक होकर मैनेजर की प्रशंसा करोगे? छि..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर ठहर गए. प्रशंसा करने का विचार त्याग दिया और कुछ क्षणों में ही नॉर्मल हो गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नॉर्मलता जब ठहर गई तो बोले; "ठीक है ठीक है. तुझे इन सब बातों में माथा लगाने की ज़रुरत नहीं है. तू तो ट्रांसपोर्ट वाले को फ़ोन कर और देख अगर सरसों आ गई हो तो गोडाउन में रखवाने का इंतजाम कर."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो बेचारा मुंह लटकाए ट्रांसपोर्ट वाले को फ़ोन करने चला गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके जाने के बाद फिर सोचने लगे. स्कूल के धंधे वाली बात मन से जा ही नहीं रही थी. लेकिन अब इस बात पर पछताने लगे कि मैनेजर को वहां से भगाना ठीक नहीं हुआ. आखिर कोई तो चाहिए इस नए धंधे के बारे में बात करने के लिए. दूकान पर काम कर रहे मुटिया-मज़दूरों से तो यह बात की भी नहीं जा सकती. उन्हें क्या मालूम कि प्राइवेट स्कूल किस चिड़िया का नाम है. हाँ, अगर कोई म्यूनिसिपल स्कूल और उनमें छाई अराजकता के बारे में बातें करता तो ये मजदूर बहुत कुछ बोल सकते हैं. उन्होंने इन स्कूलों को बड़े नज़दीक से देखा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैनेजर के जाने से वे और व्याकुल हो लिए. अब इस मुद्दे पर किससे बात करें? दोस्त-यार तो थे नहीं. रिश्तेदारों से नए बिजनेस के बारे में बात करना उनके हिसाब से बिजनेस-धर्म के खिलाफ बात थी.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिर किससे बात करें? सोच ही रहे थे कि उन्हें रमेश चोखानी याद आ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आपके मन में सवाल उठा रहा हो कि रमेश चोखानी कौन ठहरे, तो फिर उनके बारे में भी जानिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोखानी जी राम अवतार मोहन लाल फर्म के ऑडिटर हैं. चार्टर्ड एकाउंटेंट. अकाऊंटिंग, कंपनी ला, इनकम टैक्स पार्टनरशिप एक्ट,....वगैरह वगैरह की जानकारी रखने और राम अवतार जी के फर्म का ऑडिट करने के अलावा भी बहुत से ऐसे काम है जिनमें चोखानी जी माहिर हैं. क्रिकेट की भाषा में बोले तो आलराउन्डर. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कह सकते हैं कि अपने विषयों की जानकारी हो या न हो, लेकिन आजतक कोई काम रुक गया हो, ऐसा नहीं हुआ. हर डिपार्टमेंट में हर काम करने वाले लोग हैं इनके पास. राम अवतार जी के खाते का ऑडिट तो करते ही हैं, गाहे-बगाहे हर सरकारी विभागों का काम भी यही करवाते हैं. ट्रेड लाईसेन्स के रिन्यू करने से लेकर....... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाते के ऑडिट का काम तो सबसे बाद में किया जाता है. वे खाते जो हिंदी में लिखे जाते हैं. राम अवतार जी के हिसाब से हिंदी में खाता रखने का बड़ा फायदा है. रोकड़ लिखते-लिखते एकाउंटेंट कोई भी एंट्री काट सकता है और कारण के रूप में वहां बड़े आराम से लिखा जा सकता है; "भूल से."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी उन्हें इस बात का विश्वास है कि बही-खाता अगर हिंदी में लिखा हुआ रहे तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से निबटने में ज्यादा परेशानी नहीं होती. ज्यादातर इनकम टैक्स अफसरों को हिंदी पढ़ने नहीं आती.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह काम उनके पिताश्री के जमाने से होता आया है. उनके पिताश्री ने उन्हें व्यपार का यह नियम बहुत अच्छी तरह से समझा दिया था. और उनकी बनाई हुई लकीर पर राम अवतार जी आज तक चल रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लकीर पर चलते रहे फिर भी उन्हें फ़कीर नहीं कहा जा सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, रमेश चोखानी जी याद आये तो राम अवतार जी ने उन्हें फ़ोन कर डाला. बोले; "रमेश जी, राम अवतार बोलूँ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस अंदाज़ में इन्होने 'राम अवतार बोलूँ' कहा, उसी से रमेश जी को पता चल गया कि ये कोई नई बात के पीछे पड़ गए हैं. उन्होंने व्यावहारिकता की चादर से अपनी आवाज़ को ढांपते हुए पूछा; "क्या हाल है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्होने इस तरफ से कहा; "हाल तो बढ़िया है. आपके घर का क्या हाल है? बच्चे कैसे हैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमेश बाबू को समझ आ गया कि ये आज उन्हें छोड़ने वाले नहीं. अब ये बच्चे, भाभीजी, माँ, वगैरह के बारे में तो पूछेंगे ही, साथ में और भी बहुत कुछ पूछेंगे. गाड़ी आजकल क्या माइलेज दे रही है? पिछले हफ्ते खाटू वाले श्याम बाबा के कीर्तन में आप क्यों नहीं आये? अगले हफ्ते हमारे यहाँ भी जागरण का प्रोग्राम है....वगैरह..वगैरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब बातों के बारे में सोचते हुए रमेश बाबू खुद को इनके वार झेलने के लिए तैयार करने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......जारी रहेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-2989493609399137351?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/WpD64H_rcs4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/2989493609399137351/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=2989493609399137351&amp;isPopup=true" title="15 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/2989493609399137351?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/2989493609399137351?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/WpD64H_rcs4/blog-post_08.html" title="सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग २" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">15</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post_08.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEQGQXkyeSp7ImA9WxJREEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-7619360864115743345</id><published>2009-05-05T13:03:00.001+05:30</published><updated>2009-05-11T18:22:00.791+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-11T18:22:00.791+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शिक्षा" /><title>सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग १</title><content type="html">नाम : राम अवतार. &lt;br /&gt;पिता का नाम : मोहन लाल. &lt;br /&gt;फर्म का नाम : राम अवतार मोहन लाल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक घर, दो तेल-मिल, तीन दूकान, एक पत्नी, दो बच्चे और साठ कर्मचारियों के मालिक. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनकी मानें तो दुनियाँ में दो प्रकार के लोग रहते हैं. पहले प्रकार के लोगों को नौकर कहते हैं और दूसरे प्रकार के लोगों को मालिक. धंधे से टाइम मिलने पर जब घर जाते हैं तो घर के मालिक बन जाते हैं. जब तक धंधे पर हैं तो दूकान, तेल-मिल और कर्मचारियों के मालिक. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुँचने पर अगर किसी दिन पता चले कि घर के किसी सदस्य ने अपने मन से कोई काम कर दिया है तो उसे फटकारते हुए एक ही सवाल पूछते हैं; " हमसे पूछा क्यों नहीं? मालिक कौन है, तुम कि मैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनकी यह बात घर में भी इनके मालिक होने का एहसास दिलाती रहती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेल के व्यापारी हैं. सरसों का तेल बेचते हैं. कच्ची घानी वाला सरसों का 'आगमार्का' शुद्ध तेल. बेंचते तो और भी कई प्रकार के तेल हैं, लेकिन चूंकि मिलावट के चलते बाकी के तेल सरसों के तेल में गायब हो जाते हैं, लिहाजा बाकी के तेलों की सूची बनाने का भारी-भरकम काम करने की ज़रुरत नहीं पड़ती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आगमार्का' की सैंकटिटी भी बनी रहती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार मज़ाक करते हुए कहते हैं; "मिलावट न करें तो ग्राहक शंका ज़ाहिर करते हुए पूछता है, क्या बात है, इस बार का तेल देखकर लगा रहा है जैसे प्योर नहीं है?"  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बी कॉम तक की पढ़ाई की है. जब पढ़ते थे उन्ही दिनों इनके पिताश्री ने इन्हें दुनियाँ का सबसे बड़ा रहस्य समझा दिया था. उन्होंने बताया था; "किसी से दोस्ती मत करना."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बताते हुए पिताश्री ने इस रहस्य की व्याख्या करते हुए कहा था; "दोस्ती में क्या आनी-जानी है? तुम्हें तो धंधा करना है. वैसे भी दोस्ती करने से पैसे और समय, दोनों की बरबादी है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्होने अपने पूज्य पिताजी की बात गाँठ बंधकर रख ली थी. इन्होने किसी से दोस्ती नहीं की. इन्हें कोई दोस्त नहीं मिला. मिले तो सिर्फ व्यापारी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कक्षा आठ में जब पढ़ते थे, तभी से पिताजी के धंधे की सारी बारीकियां सीख गए थे. सरसों के तेल में कितनी मात्रा में कौन सा तेल मिलाया जाता है? किसे कितने दिन के उधार पर माल देना है? रेपसीड आयल कितनी मात्रा से ज्यादा नहीं मिलाना चाहिए? ज्यादा से ज्यादा कितना तक रेपसीड आयल मिलाया जा सकता है जिससे खाने वाले को लकवा मारने का चांस नहीं रहता...वगैरह..वगैरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बी कॉम की पढ़ाई के वक्त सहपाठियों को उठते-बैठते एक ही बात बताते. कहते; "पैसा कैसे कमाया जाता है, कभी मेरी दूकान पर आकर देखो. उड़ता है पैसा वहां. बस पकड़ने वाला चाहिए."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहपाठी उनकी बात सुनकर आश्वस्त थे कि वे बी कॉम करने के बाद और नहीं पढेंगे.   &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;दस बरस पहले तक का रिकार्ड देखें तो पता चलेगा कि राम अवतार जी शायद ही कभी किसी से प्रभावित होते बरामद हुए हों. गाहे-बगाहे उन लोगों से प्राभावित हो लेते जो उनके व्यापारी थे. जिन्हें वे तेल सप्लाई करते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप पूछेंगे कि व्यापारियों से प्रभावित क्यों होंगे भला? और अगर आप यह सोच रहे हैं कि शायद उन व्यापारियों से प्रभावित होते होंगे जो उनसे भारी मात्रा में माल खरीदते होंगे तो लगे हाथ आपको बता दूँ कि ऐसी कोई बात नहीं. वे तेल के उन व्यापारियों से प्रभावित होते थे जो उनका पैसा कई दिनों तक बकाया रखते थे.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जो व्यापारी उनका पैसा वक्त पर नहीं देता वे उससे यह सोचते हुए प्रभावित हो लेते थे कि;; "मान गए इसे. है कलेजे वाला आदमी. इससे सीखना चाहिए कि पैसा बकाया कैसे रखा जाता है." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने इन उधार-खाऊ व्यापारियों के अलावा पहली बार किसी से प्रभावित हुए तो वे हैं एक प्रसिद्द उद्योगपति.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;करीब पांच बरस पहले बेटे का एडमिशन कराने इन उद्योगपति द्बारा राष्ट्रसेवा में चलाये जा रहे स्कूल में गए थे. वहीँ जाकर पता चला कि लगभग सभी बड़े उद्योगपति स्कूल के धंधे में हैं. बस, तभी से ये हर उस उद्योगपति से प्रभावित होते रहे जो स्कूल के धंधे में हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटे के एडमिशन के लिए अगर एक दिन के लिए दूकान छोड़कर नहीं जाते तो उन्हें पता ही नहीं चलता कि तेल बेचने के अलावा भी कोई धंधा है जिससे पैसा पैदा किया जा सकता है. बहुत मन मारकर उस दिन दूकान को अपने मौसी के बेटे और कुछ कर्मचारियों के हवाले कर गए थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाते समय पढाई-लिखाई को तो गाली दी ही, साथ में ही उन स्कूल वालों को भर पेट गरियाया था जो बेटे का नहीं बल्कि उनका इंटरव्यू लेना चाहते थे.&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;उसके पहले तो वे यह मानने के लिए भी तैयार नहीं थे कि तेल बेचने के अलावा भी दुनियाँ में कोई धंधा है जिससे पैसा कमाया जा सकता है. बेटे का एडमिशन हो गया. बेटे के एडमिशन के लिए दिए गए डोनेशन के पैसे ने उनके अन्दर यह विश्वास भर दिया कि स्कूल का धंधा तेल बेचने के धंधे से ज्यादा लाभदायक है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;...जारी रहेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-7619360864115743345?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/nBi605Rrpu0" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/7619360864115743345/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=7619360864115743345&amp;isPopup=true" title="21 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7619360864115743345?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/7619360864115743345?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/nBi605Rrpu0/blog-post.html" title="सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग १" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">21</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEQCSH04fSp7ImA9WxJREEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-5456376175932831483</id><published>2009-04-30T17:17:00.001+05:30</published><updated>2009-05-11T18:22:49.335+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-11T18:22:49.335+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट" /><title>ऐसे में यह बालर तो सस्ता साबित हुआ.......</title><content type="html">क्रिकेट है तो देश है. देश है तो नेता है. नेता हैं तो उद्योगपति है. उद्योगपति है तो नेतागीरी है. नेतागीरी है तो चमचागीरी है. चमचागीरी है तो नेता हैं. और नेता हैं तो क्रिकेट है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लीजिये वृत्त पूरा हुआ और हम वहीँ पहुँच गए, जहाँ से चले थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फालतू में भूगोल-विदों ने पृथ्वी को गोल साबित करने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किये. मैं तो कहता हूँ क्रिकेट से शुरू करते नेता, चमचा वगैरह से होते आगे चले जाते तो क्रिकेट पर पहुँच जाते. साबित कर देते कि पृथ्वी गोल है.&lt;br /&gt;लेकिन शायद उनदिनों क्रिकेट ऐसा नहीं था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ऐसा हो गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे यह बात तो बहुत दिनों पहले की है. दस साल पहले की बात ही ले लीजिये. उनदिनों क्रिकेट में पैसा होता था. अब स्थिति बदल गई है. अब पैसे में क्रिकेट है. अब सच बात तो यह है कि कवि ने; "सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है" नामक महान 'काव्य एक लाइना' पहले न लिखा होता तो हम ताल ठोंक कर कह देते कि उन्होंने आज के क्रिकेट को देखकर ही प्रेरणा ली कि वे ऐसी लाइन गढ़ सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसे में क्रिकेट समा गया है. बहुत मज़ा आ रहा है. आज ही अखबार में पढ़ रहा था कि इंग्लैंड के खिलाड़ी श्री एंड्र्यू फ्लिंटाफ ने आई पी एल में खेलते हुए तीन विकेट लिए. लिए क्या कमेंटेटर की भाषा में कहें तो झटक लिए. झटक के चल दिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस साल के आई पी एल में अब और नहीं खेलेंगे. तीन विकेट लेकर ही घायल हो गए. जब चले गए तब हिसाब लगाया गया. पता चला उन्होंने जो तीन विकेट लिए उसपर विजय माल्या जी का करीब ढाई करोड़ रुपया खर्च हो गया. तिरासी लाख रुपया प्रति विकेट. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनकर लगा जैसे इस फीस में से अगर बैट्समैन को कुछ किकबैक देने के लिए तैयार हो जाते तो बैट्समैन बेचारा बिना खेले ही अपना विकेट दे देता. न रन-अप पर दौड़ने का झमेला रहता न ही ताकत लगाकर गेंद फेंकनी पड़ती.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप यह तो नहिये पूछिए कि माल्या जी कौन ठहरे? आपने अगर यह पूछ लिया तो याद रखिये ममता दी को कहकर आपके घर के सामने धरना करवा दूंगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, वापस आते हैं माल्या जी पर. माल्या जी कुछ महीने पहले ही अड़ गए थे. नरेश गोयल जी के साथ मिलकर सरकार से लड़ गए थे. बोले; "हमारे पास पैसे नहीं हैं. अगर सरकार ने हमें बिना ब्याज वाला लोन नहीं दिया तो हम अपनी एयरलाइन्स बंद कर देंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकारी सहारे पर या फिर मंदी पर कोई विज्ञापन तो बनता नहीं. बनता होता तो कोई लिख डालता कि; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बेचारा मंदी का मारा &lt;br /&gt;इसे चाहिए सरकारी सहारा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हमदर्द का सिंकारा नहीं होता. अब हमदर्द का सहारा होता है. माल्या जी को दर्द हुआ. ऐसे में उनके हमदर्द निकले हमारे नागरिक उड्डयन मंत्री. दर्द से पीड़ित इन मंत्री जी ने माल्या जी के लिए खुलकर बैटिंग की. प्रेस कांफ्रेंस में चौकों-छक्कों की झड़ी लगा दी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाम लोगों ने ताली बजाई. बोले; "क्या खेलते हैं. वाह!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनके पास पैसा नहीं होता वे तीन विकेट के लिए केवल ढाई करोड़ देते हैं. पैसा रहता तो न जाने क्या दे देते. शायद पचास करोड़ दे देते. बैटिंग करके बनाये गए रनों का हिसाब अलग से होता. उसके पैसे श्री एंड्र्यू फ्लिंटाफ को अलग से मिलते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट को चलनेवाले नहीं बदलते तो कोई बात नहीं, क्रिकेट तो बदल ही गया है. टेस्ट मैच होता था. वन डे होने लगा. उससे भी बोर हो लिए तो ट्वेंटी-ट्वेंटी खेलवा डाला. इससे बोर होंगे तो क्या करेंगे? वो अगले तीन-चार साल में पता चल जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विद्वान टाइप लोग बता रहे हैं कि मंदी की मारी अर्थव्यवस्था में पैसे की कमी हो गई है. उधर विद्वान बता रहे हैं कि पैसे की कमी है और इधर अज्ञानी टाइप लोग पूछ रहे हैं कहाँ है कमी? क्रिकेट खिलाड़ियों को इतना पैसा मिल रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे अज्ञानियों, यह समझो कि पैसे की कमी है तब इतना पैसा मिल रहा है. नहीं तो एक-एक खिलाड़ी को एक विकेट लेने के लिए कम से कम चालीस करोड़ मिलते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाहरुख़ खान परेशान हैं. उन्होंने भी एक-एक विकेट के लिए कितना पैसा खर्चा किया है. पैसा खर्चा हो गया लेकिन टीम नहीं जीत पा रही है. दो मैच तक तो बोले कि; "हम स्पोर्ट्समैन स्पिरिट वाले लोग हैं." तीसरे मैच तक  स्पिरिट में कमी हो गई. चौथे तक स्पोर्ट्स जाता रहा. टीम हारती रही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो खान साहब दक्षिण अफ्रीका से भारत चले आये हैं. आते-आते बोले; "अब तो तभी आऊंगा जब टीम जीतेगी." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाय रे. इतने अमीर आदमी की टीम नहीं जीत पा रही. इतना पैसा खर्चा किया इन्होने. इसके बावजूद टीम नहीं जीत पा रही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक मित्र एक मैच के दूसरे दिन बोले; "कल देखा युवराज सिंह ने दो रन पर आउट होकर क्या किया?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "नहीं तो. क्या किया उन्होंने?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "आउट होते ही अपनी टीम के मालकिन का चेहरा देखने लगा. शायद देखने की कोशिश कर रहा था कि मालकिन कितनी नाराज़ है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही बात है. इस क्रिकेट में कोच का चेहरा ज्यादा मायने नहीं रखता. मालिक-मालकिन का चेहरा मायने रखता है. फोटोजेनिक चेहरा है न. हमेशा फोटोजेनिक चेहरे ही मायने रखते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजीब क्रिकेट है यह ट्वेंटी-ट्वेंटी. तमाम नए तरीके इस्तेमाल होते हैं. अलग तरह का विश्लेषण होता है. स्ट्रेटजी ब्रेक होता है. मैदान में खेल रहे खिलाड़ी से कमेंटेटर भाई लोग डायरेक्ट बात कर लेते हैं. "कैसा फील कर रहे हो?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर से आवाज़ आती है; "हवा चल रही है. हम ऐसा खेल रहे हैं. फील्डिंग साइड वैसा खेल रही है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे प्रभु. आप कैसा खेल रहे हैं वो तो हम देख ही रहे हैं. मुंह से नहीं बताएँगे तो हमें पता नहीं चलेगा क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आने वाले दिनों में नए-नए तरीके और जुडेंगे. जन टूर्नामेंट पूरा हो जाएगा तो हर खिलाड़ी की बैलेंसशीट बनेगी. देखेंगे इस बात पर बहस हो रही है कि फलाने बालर ने पॉँच विकेट तो लिए लेकिन इस पांच विकेट को अगर उनके फीस से डिवाइड करें तो देखेंगे कि प्रति विकेट एक करोड़ का खर्च आया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई विद्वान यह बात भी बीच में ला पटकेगा कि इन पांच विकेट में से दो विकेट ऐसे थे जिन बैट्समैन को फीस के तौर पर दो-दो करोड़ मिले थे. बाकी के तीन को अस्सी-अस्सी लाख मिले थे. मतलब यह कि इन्होने जिन पांच बैट्समैन को आउट किया उनकी टोटल फीस चार करोड़ चालीस लाख थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में यह बालर तो सस्ता साबित हुआ.......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-5456376175932831483?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/v3kbKgoiNKA" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/5456376175932831483/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=5456376175932831483&amp;isPopup=true" title="18 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5456376175932831483?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/5456376175932831483?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/v3kbKgoiNKA/blog-post_30.html" title="ऐसे में यह बालर तो सस्ता साबित हुआ......." /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">18</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/04/blog-post_30.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEQNR3s4eCp7ImA9WxJREEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-1579018981583335102</id><published>2009-04-28T05:01:00.001+05:30</published><updated>2009-05-11T18:23:16.530+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-11T18:23:16.530+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><title>परीक्षा लेने वाले देवता और कैल्कुलेटिव मनुष्य</title><content type="html">परीक्षा देना और लेना, दोनों बहुत महत्वपूर्ण काम है. परीक्षा के लेन-देन का यह कार्यक्रम तब से चला आ रहा है, जब देवता लोग मनुष्य को दूर बैठे देख पाते थे. ऊपर बैठे देवता मनुष्यों को देखते रहते और जब इच्छा होती परीक्षा ले डालते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाम पुरानी धार्मिक कथाओं में भी यही वर्णित है. कोई मनुष्य जब सुख के सागर में कई सालों तक गोते लगा लेता तो आसमान में बैठे देवतागण इस मनुष्य के ऊपर शंका करने लगते. सोचते कि; ' क्या बात है? ये आजकल पूजा वगैरह कम करता है. हमें याद ही नहीं रखता. ये सुख पाकर अँधा तो नहीं हो गया?' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस देवतागण परीक्षा लेना शुरू कर देते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परीक्षा के पहले चरण में इस मनुष्य को थोड़ा और समय दिया जाता. यह सोचते हुए कि; 'थोड़े दिनों के लिए इसे बेनेफिट ऑफ़ डाऊट दे देते हैं. हो सकता है कि ये सुधर जाए.'  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब मनुष्य सुखसागर में गोते लगाना जारी रखता और बेनेफिट ऑफ़ डाऊट देते-देते देवतागण बोर हो जाते तो टेस्ट चेंज करने के लिए इस मनुष्य की परीक्षा ले डालते. उसे दुःख-कष्ट, बीमारी, महामारी, खुमारी वगैरह से गुजारते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर देवताओं का सताया हुआ यह मनुष्य देवताओं की शरण में चला जाता, उन्हें याद कर लेता, उन्हें पूज लेता तो देवतागण प्रसन्न हो जाते. कई बार तो प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती कि इस मनुष्य का कष्ट वगैरह तो दूर करते ही, उसे ऊपर से और बहुत कुछ दे देते. कई बार तो जितना नुकशान हुआ रहता उससे चार गुना ज्यादा तक दे डालते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुष्पवर्षा करते सो अलग.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर बड़ी सॉलिड पटकथा रहती. मनुष्य की परीक्षा भी हो जाती और नीति-कथा वगैरह का भी निर्माण हो जाता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई केसेज में तो परीक्षा देने वाले मनुष्य को जब देवता बहुत सताते तो उसे बचाने के लिए उस मनुष्य की पत्नी सामने आती. देवताओं की पूजा वगैरह करती. देवताओं से क्षमा दान का आग्रह करती. कई बार १२, १६, या अट्ठारह शुक्रवार ब्रत रखती. तब कहीं जाकर देवता जी लोगों का ह्रदय पिघलता और वे उस मनुष्य को क्षमा करते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार तो देवता जी लोग इस मनुष्य या इसकी पत्नी के सामने ही प्रकट हो लेते. हाथ की हथेली से आशीर्वाद ठेलते हुए, प्रसन्न मुख देवता या देवी आकर राज खोलते कि; "पुत्री हम तुम्हारी परीक्षा ले रहे थे. तुम्हारी भक्ति देखकर हम प्रसन्न हुए. कहो, तुमको क्या वरदान चाहिए?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवी-देवताओं की यह बात सुनकर 'पुत्री' प्रसन्न हो जाती. अगर वह इन देवी-देवताओं से वह कुछ नहीं मांगती तो इनलोगों की प्रसन्नता और बढ़ जाती. तब तो मजाल है कि ये लोग उस 'पुत्री' को बिना कुछ दिए वहां से हिल जाएँ. ना. &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;अब ऐसी कथाएँ सामने नहीं आतीं. पता नहीं क्या कारण है? आजकल मनुष्य सुखसागर में गोते तो क्या, और न जाने क्या-क्या लगता रहता है लेकिन मजाल कि देवतागण वैसी परीक्षा ले लें जैसी पुराने जमाने में लेते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद इसीलिए लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि; "ज़माना पहले जैसा नहीं रहा अब." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मित्र से बात चली. वे बोले; "असल में देखा जाय तो नीतिकथाओं का उद्भव और विकास पूरी तरह से बहुत पहले ही हो चुका है. अब इस क्षेत्र में ज्यादा कुछ स्कोप नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं ऐसा उन्होंने क्यों कहा? अगर उनकी बात मान ली जाय तो क्या देवतागण परीक्षा-वरीक्षा इसलिए लिया करते थे ताकि कथाएँ लिखी जा सकें?  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;मुझे लगा घोर नास्तिक आदमी है जो ऐसा बोल रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उनसे पूछा; "यार, क्या तुम नास्तिक हो लिए?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "नहीं ऐसी बात नहीं है. मैं तो ऐसा केवल इसलिए कह रहा हूँ कि आजकल देवता कष्ट वगैरह दें, उससे पहले ही मनुष्य चौकन्ना हो गया है. वो देवताओं को कष्ट देने ही नहीं देता."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पूछा; "मतलब?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "देख नहीं रहे, आजकल मनुष्य ने देवताओं का आशीर्वाद वगैरह पहले से ही न जाने कितने कवच, कंठी, माला, रुद्राक्ष वगैरह में कैद कर लिया है. कोई देवता बचा नहीं है जिसका कवच वगैरह न मिलता हो. टीवी पर नहीं देखा क्या?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा; "हाँ वो बात तो है. लेकिन फिर भी देवतागण देखते तो होंगे ही सबको."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बोले; "वे देखेंगे तो देखें. वैसे भी मनुष्य आजकल बहुत कल्कुलेटिव हो लिया है. वो सोचता है कि भाई तैंतीस करोड़ हमारे और बाकी के धर्मों के पचीस-पचास हज़ार ले लो. कुल मिलाकर तैंतीस करोड़ पचास हज़ार. अब तैंतीस करोड़ पचास हज़ार देवता छ सौ साठ करोड़ मनुष्यों पर कितनी नज़र रखेंगे? पर देवता बीस मनुष्य.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-1579018981583335102?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/_22V6R3-jMI" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/1579018981583335102/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=1579018981583335102&amp;isPopup=true" title="19 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/1579018981583335102?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/1579018981583335102?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/_22V6R3-jMI/blog-post_28.html" title="परीक्षा लेने वाले देवता और कैल्कुलेटिव मनुष्य" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">19</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/04/blog-post_28.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkMHQXcyfyp7ImA9WxJTGU0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-8266441011250183695.post-846745194368832460</id><published>2009-04-27T09:18:00.003+05:30</published><updated>2009-04-28T14:17:10.997+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-28T14:17:10.997+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="माईक्रो पोस्ट" /><title>हजारों साल.....एक माइक्रो पोस्ट</title><content type="html">पिछले करीब दो महीने से जब भी कुछ दोस्तों के साथ राजनीति की बात होती है तो यह शेर हमेशा याद आ जाता है;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हजारों साल 'नर्गिस' अपनी बेनूरी पे रोती है &lt;br /&gt;बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8266441011250183695-846745194368832460?l=shiv-gyan.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/shivgyan/~4/zRp4FzklysM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shiv-gyan.blogspot.com/feeds/846745194368832460/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=8266441011250183695&amp;postID=846745194368832460&amp;isPopup=true" title="16 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/846745194368832460?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/8266441011250183695/posts/default/846745194368832460?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/shivgyan/~3/zRp4FzklysM/blog-post_27.html" title="हजारों साल.....एक माइक्रो पोस्ट" /><author><name>Shiv Kumar Mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16210136982521324733</uri><email>shiv2601@gmail.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="13263255275315862916" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://shiv-gyan.blogspot.com/2009/04/blog-post_27.html</feedburner:origLink></entry></feed>
