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	<title>Shweta Tiwari</title>
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		<title>Shweta Tiwari</title>
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		<title>हिचकी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Oct 2016 15:34:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[सांसें रुकती सी होंगी ना तुम्हारी जैसे कहीं दबे हुए हो घुटन तो नहीं हो रही तुम्हें कहीं शायद कुछ भी करने में दिक्कत हो अब थोड़े तड़प रहे होगे शायद मचल भी रहे होगे ज़ेहन में ना जाने कितने नाम होंगे बेचैनी का एक आलम होगा यादों का काफ़िला भी गुज़रा होगा फंसे होने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सांसें रुकती सी होंगी ना तुम्हारी</p>
<p>जैसे कहीं दबे हुए हो</p>
<p>घुटन तो नहीं हो रही तुम्हें कहीं</p>
<p>शायद कुछ भी करने में दिक्कत हो अब</p>
<p>थोड़े तड़प रहे होगे</p>
<p>शायद मचल भी रहे होगे</p>
<p>ज़ेहन में ना जाने कितने नाम होंगे</p>
<p>बेचैनी का एक आलम होगा</p>
<p>यादों का काफ़िला भी गुज़रा होगा</p>
<p>फंसे होने का एहसास मिलेगा</p>
<p>हाथ-पांव मार कर</p>
<p>बाहर आने की नाकामयाब कोशिशें&nbsp;</p>
<p>हां,&nbsp;</p>
<p>सब जुगाड़ कर लोगे तुम</p>
<p>पर चैन कहीं ना आएगा तुमको</p>
<p>थोड़ा तड़पो&#8230;.</p>
<p>थोड़ा छटपटाओ अब</p>
<p>अटके हो मेरी हिचकी में आकर</p>
<p>तुम्हारे साथ तो ये होना ही था&#8230;.</p>
<p><a href="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg"><img data-attachment-id="627" data-permalink="https://tiwarishweta.wordpress.com/2016/10/02/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%95%e0%a5%80/img_0099/" data-orig-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg" data-orig-size="800,500" data-comments-opened="1" data-image-meta="{&quot;aperture&quot;:&quot;0&quot;,&quot;credit&quot;:&quot;&quot;,&quot;camera&quot;:&quot;&quot;,&quot;caption&quot;:&quot;&quot;,&quot;created_timestamp&quot;:&quot;0&quot;,&quot;copyright&quot;:&quot;&quot;,&quot;focal_length&quot;:&quot;0&quot;,&quot;iso&quot;:&quot;0&quot;,&quot;shutter_speed&quot;:&quot;0&quot;,&quot;title&quot;:&quot;&quot;,&quot;orientation&quot;:&quot;1&quot;}" data-image-title="img_0099" data-image-description="" data-image-caption="" data-large-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg?w=714" src="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg?w=714" alt=""   class="alignnone size-full wp-image-627" srcset="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg 800w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg?w=150&amp;h=94 150w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg?w=300&amp;h=188 300w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/10/img_0099.jpg?w=768&amp;h=480 768w" sizes="(max-width: 800px) 100vw, 800px"></a></p>
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		<title>संवरा रिश्ता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Sep 2016 11:14:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[शाम हो चुकी थी। घड़ी ने छः बजा दिए थे। शाल्विका भी अपना समान बाँध कर बस निकलने के लिए तैयार ही बैठी थी। बाहर कार के रुकने की आवाज़ आई। टैक्सी आ गई होगी, ऐसा सोच कर शाल्विका अपने सामान के साथ बाहर निकली। देखा तो ऋषित भी अपनी कार से बाहर निकल रहा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>शाम हो चुकी थी। घड़ी ने छः बजा दिए थे। शाल्विका भी अपना समान बाँध कर बस निकलने के लिए तैयार ही बैठी थी। बाहर कार के रुकने की आवाज़ आई। टैक्सी आ गई होगी, ऐसा सोच कर शाल्विका अपने सामान के साथ बाहर निकली। देखा तो ऋषित भी अपनी कार से बाहर निकल रहा था। शाल्विका आश्चर्य में थी। कभी रात के 10 बजे से पहले ऋषित ने घर की घंटी नहीं बजाई थी। फिर भला आज क्या हुआ? शाल्विका कुछ बोलती, उससे पहले ही ऋषित उसकी तरफ बढ़ा। &nbsp;&#8220;कहीं जा रही हो क्या?&#8221; ऋषित ने शाल्विका के सामान को देखकर सवाल किया।&nbsp;</p>
<p>शाल्विका कुछ बोलती उससे पहले ही ऋषित ने पास आकर उसका हाथ थामा।&nbsp;</p>
<p>&#8220;क्या हुआ? कहां जा रही हो? वो भी बिना बताए? नहीं आता अभी तो? कुछ हुआ क्या?&#8221; ऋषित ने सवालों की लड़ी लगा दी।&nbsp;</p>
<p>&#8216;तुमको क्या हुआ? आज इस समय घर पर? तबीयत ठीक है तुम्हारी? -शाल्विका ने अपना पर्स संभालते हुए ऋषित से पूछा।&nbsp;</p>
<p>ऋषित ने शाल्विका की बातों को नज़रअंदाज़ करते हुए फिर अपनी बात कही- &#8216;कहां जा रही हो? नहीं आता तो?&#8217;</p>
<p>शाल्विका ने कुछ जवाब ना देते हुए सड़क की तरफ देखा कि अब तक टैक्सी आई क्यों नहीं?</p>
<p>ऋषित कुछ देर शाल्विका को खड़ा देखता रहा और फिर कुछ सोचकर बोला कि &#8216;शर्मा जी ने मुझे फोन करके बताया था कि तुमने उन्हें टैक्सी के लिए बोला है। तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था इसलिए उन्होंने मुझे फोन करके कहा कि आज किसी भी टैक्सी का इंतज़ाम नहीं हो पाएगा। माफी मांगी है उन्होंने।&#8217;</p>
<p>शाल्विका ने गुस्से में ऋषित को देखा और फोन पर किसी दूसरी टैक्सी को बुक करने की कोशिश करने लगी।</p>
<p>&#8216;मैं तुम्हें छोड़ दूंगा, जहां भी तुम्हें जाना है। बस एक बार अंदर चलकर मुझसे बात कर लो।&#8217;- ऋषित ने बहुत धीरे से शाल्विका को देखते हुए कहा। शाल्विका ने कोई जवाब नहीं दिया और वो घर के अंदर घुस गई। ऋषित भी उसका सामान लेकर अंदर आ गया।</p>
<p>&#8216;क्या हुआ?&#8217; &#8211; ऋषित ने फिर से सवाल दोहराया।</p>
<p>शाल्विका ने शिकायत वाली नज़रों के साथ कुछ हैरानी से ऋषित को देखा जैसे पूछ रही हो कि क्या अब भी तुम्हें समझ नहीं आया कि क्या हुआ?</p>
<p>ऋषित ने फिर से चुप्पी तोड़ी &#8211; &#8216; क्या कल रात की बात का नतीजा है ये?</p>
<p>शाल्विका ने अब भी ऋषित की किसी बात का कोई जवाब नहीं दिया।&nbsp;</p>
<p>&#8216;देखो, जो भी जैसा था, मैंने तुम्हारे सामने अपनी बातें रख दी थी पर अगर उसका सिला ये है कि तुम मुझे और इस घर को छोड़कर जाने का सोच रही हो, तो फिर तो मैं कभी तुमसे अपनी दिल की बातें नहीं कह पाउंगा। मुझे वक्त लगा ये सब कहने में, पर तुमने ज़रा भी देर नहीं की मुझे छोड़ कर जाने का फैसला लेने में।&#8217; &#8211; ऋषित ये सब कहते कहते रुक गया, जैसे उसके शब्द उसके गले में ही फंस गए हो।&nbsp;</p>
<p>शादी के पांच साल बाद ऋषित ने ना जाने क्या सोच कर अपना अतीत शाल्विका से बांटा था। उसे मधुरिमा के बारे में बताया था। मधुरिमा, जिसे ऋषित ने बेहद चाहा, पर उसके रिश्ते उसके साथ कभी मधुर नहीं बन पाए और ऋषित की शादी हो गई शाल्विका के साथ। अब शादी के पांच साल बाद जब मधुरिमा ने ऋषित को फोन किया तो ऋषित ने सब कुछ शाल्विका के साथ शेयर किया। बस, यही बात शाल्विका के दिमाग में बैठ गई और उसने घर छोड़ कर जाने का मन बना लिया। इस पांच साल में ऋषित ने शाल्विका को बेहद प्यार किया। प्यार में अगर दुनिया जन्नत सी लगती है तो हां, शाल्विका ने वो दुनिया देखी और अब तक वो देख भी रही थी।</p>
<p>&#8216;मैं भी अब किसी बीहड़ जंगल में, किसी पेड़ की डाली पर उस चाहत को टांग कर भूल जाना चाहती हूं, जो कभी तुमसे हुई। तुम जिस सोच में घिरे बैठे हो, उस सोच की आगोश में आकर दम घुटने से मेरी मौत ही होगी।&#8217; &#8211; शाल्विका ने अपने आंसूओं पर काबू पाने की नाकामयाब कोशिश करते हुए कहा।&nbsp;</p>
<p>ऋषित हैरान था, शायद उसे शाल्विका से इस नासमझी की उम्मीद नहीं थी। उसने फिर एक कोशिश की &#8211; &#8216; देखो, अतीत हमेशा व्यतीत होता है। मधुरिमा मेरा कल थी, तुम आज हो।&#8217;</p>
<p>शाल्विका इस बात को सुनकर हंस पड़ी जैसे ऋषित ने जाने कितना घिसा पिटा डायलॉग मारा हो। शाल्विका ने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा &#8211; &#8216; तुमने कभी मुझे प्यार किया ही नहीं। तुम्हारा प्यार सिर्फ बिस्तर तक ही सीमित है। खुशी की स्थिति में हो या दुख में या फिर गुस्से में ही क्यों ना हो, तुम्हारे सारे भाव एक ही रुप में निकलते हैं।&#8217;</p>
<p>ऋषित शायद इस बात के लिए तैयार नहीं था। ये बात आ कहां से गई, या इस समय इस बात का क्या मतलब है, ये बात उसे समझ नहीं आई, पर वो शांत ही रहा। शायद समझदार था इसीलिए जानता था कि एक औरत गुस्से में कुछ भी बोल सकती है और उसकी बात का वर्तमान बात से कोई मतलब हो, ऐसा ज़रुरी भी नहीं।&nbsp;</p>
<p>&#8216;शाल्विका&#8217;- ऋषित ने धीरे से अपनी पत्नी का नाम पुकारा। &#8216; क्या तुम्हारे मन में मुझे खोने का डर समाया है? क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें छोड़ दूंगा?&#8217;</p>
<p>&#8216;सब कहते हैं कि भगवान ने औरतों को कमज़ोर बनाया है पर एक मर्द की असुरक्षा की भावना को कोई क्यों नही देखता? हां, वो तुम्हारा डर ही है, तुम्हारी असुरक्षा का भाव ही है, जो मुझ पर इस तरह बरसता है, जो तुम्हें इस कदर बदसूरत बनाता है। तुम मुझे खोने से डरते रहे, अब इससे ज़्यादा तुम्हें क्या पाउंगी मैं? पर इस डर ने, इस चाहत ने या यूं कह लेने दो कि इस भूख ने जो भाव मुझे दिए हैं, अब वो चुभते हैं। देखो, कैसे मेरा दर्द रिसता हुआ इस रिश्ते में भी घुल सा गया है और तुम कहते हो कि मैं तुम्हें खोने से डरती हूं।&#8217; शाल्विका ने एक ही सांस में ऋषित की बातों का जवाब दे दिया। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले जा रही है, पर ज़िद भी तो एक चीज़ होती ही है ना।</p>
<p>साथ रहने पर अपने साथी की सोच, उसके रिएक्शन का आइडिया मिल ही जाता है और ऋषित भी इस समय अपनी बीवी को समझ पा रहा था। वो उठकर आया और शाल्विका के हाथों को अपने हाथों में लेकर सहलाने लगा।</p>
<p>&#8216;तुम्हें पता है कि मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। एक मर्द हूं, सिर्फ इस नाते मुझे बुरा साबित मत करो। जिस बात पर तुम भड़क रही हो, वो मेरा कल था, जिसका मेरे आज से कोई लेना देना नहीं है। संभव है कि तुम्हारा भी कोई कल हो, मैंने कभी पूछा नहीं&#8230;इसलिए नहीं कि पूछ नहीं सकता था बल्कि इसलिए कि जानना नहीं चाहता था क्योंकि तुम्हारा कल चाहे जिसके साथ जुड़ा हो, आज सिर्फ मेरे साथ है। तुम घर छोड़कर जाना चाहती हो, पर उसके बाद क्या? गुस्से में घर छोड़कर जाना आसान है, मेरे लिए भी&#8230;पर हमने ये रिश्ता संवारने के लिए बनाया है, बिखेरने के लिए नहीं। तुम्हारे गुस्से पर मेरा गुस्सा आना चुटकी बजाने जैसा था, आसान था तुम्हें जाने देना, तुम्हें यूं ना समझाना, पर उसके बाद क्या? तुम्हें लगता है कि मेरे हर भाव बिस्तर पर ही निकलते हैं, तो क्या सच में ऐसा है? मैं एक मर्द हूं और मेरे-तुम्हारे बीच में भावों को दर्शाने के तरीके का अंतर हमेशा ही रहेगा, पर उसको इस तरह लेकर मुझे बेइज़्ज़ती का एहसास करवाने का मिशन तुम्हें भी सुख नहीं देगा। बहुत सारी बातें होती हैं मर्दों के बारे में कि उनका नाड़ा ढीला होता है या नाभी के ऊपर की भूख से ज़्यादा नाभी के नीचे की भूख होती है, पर सबको एक ही तराजू में मत तौलो। क्या इन 5 सालों में तुम्हें कभी भी इस बात का एहसास हुआ है कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता या उसमें कमी आई है, या सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात ये कि मेरा चक्कर बाहर किसी के साथ चल रहा है? शाल्विका, 5 साल काफी होता है अपनी बीवी से बोर होने के लिए या यूं कहूं कि उसके जिस्म से बोर होने के लिए। क्या तुम्हें किसी पल इस बात का एहसास हुआ कि मेरी चाहत में ज़रा भी कमी आई हो? मर्द तो वैसे बदनाम है ही कि वो कुछ नहीं संभालता, सब औरतों को ही करना होता है पर शाल्विका, मैं तुम्हारी ज़िंदगी का मर्द हूं। मैं संभालना चाहता हूं&#8230;तुम्हें, मुझे और इस रिश्ते को&#8230;.हमेशा ही।</p>
<p>ऋषित की बातें सुनकर शाल्विका की ऑंखों में आंसू आ गए थे। उसके मन में आया कि अभी ऋषित से वो एक बेल की तरह लिपट जाए, पर शायद मन पर ग्लानि का बोझ था या जबरदस्ती की इस ज़िरह का दुख, वो ख़ामोशी के साथ सिसकती रही। ऋषित ने आगे बढ़कर उसको कंधे से उठाया और गले से लगा लिया।&nbsp;</p>
<p>शाल्विका के मुंह से शब्द नहीं निकले पर ऑंखों से आंसू बहुत बहे और साथ ही बहा बहुत कुछ, जो एक रिश्ते को जाम कर रहा था। टूटना, चटकना, बिखरना&#8230;.सब आसान है&#8230;.बहुत ही आसान है, पर उसको संवारना ज़रा मुश्किल है।&nbsp;</p>
<p>मुमकिन था कि सब बिखर जाता, जो कि सबसे आसान भी है पर वो नहीं हुआ क्योंकि इसी सामाज के एक मर्द ने संभाल लिया था&#8230;.अपना प्यार, अपना रिश्ता और अपनी दुनिया&#8230;</p>
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		<title>&#8216;पिंक&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Sep 2016 00:56:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[2-4 दिन पहले &#8216;पिंक&#8217; फ़िल्म देखी। बहुत अच्छी लगी। इसलिए नहीं कि एक महिला हूँ या मैंने कोई महिला मुक्ति मोर्चा खोल रखा है, बल्कि इसलिए कि इसमें कुछ बिंदु ज़िंदगी से जुड़े ऐसे मिल गए, जो मैं या मुझ जैसे कई लोग ख़ुद से जोड़ कर देख सकते हैं।&#160;अक्सर ऐसा होता है कि जब [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>2-4 दिन पहले &#8216;पिंक&#8217; फ़िल्म देखी। बहुत अच्छी लगी। इसलिए नहीं कि एक महिला हूँ या मैंने कोई महिला मुक्ति मोर्चा खोल रखा है, बल्कि इसलिए कि इसमें कुछ बिंदु ज़िंदगी से जुड़े ऐसे मिल गए, जो मैं या मुझ जैसे कई लोग ख़ुद से जोड़ कर देख सकते हैं।&nbsp;अक्सर ऐसा होता है कि जब हम कोई फ़िल्म देखते हैं तो उसके किसी किरदार में या किसी परिस्थिति में ख़ुद को देख ही लेते हैं। मुझे यक़ीन है कि आप भी इससे बच नहीं पाए होंगे। मैं भी नहीं बच पाती (कुछेक फ़िल्मों को छोड़ दिया जाए तो)</p>
<p>कितनी &#8216;थ्योरी&#8217; बनी हुई है ना एक लड़की को लेकर। सबसे आसान थ्योरी तो ये कि कभी किसी लड़की को हराना हो तो उसके किरदार पर ऊँगली उठा दो। हाँ हाँ, यक़ीन कीजिए, किसी महिला को हराने का इससे आसान तरीक़ा आपको कुछ और नहीं मिल सकता है। यक़ीन तो इस बात पर भी कीजिए कि कई बार ये काम कोई लड़की ही किसी लड़की के लिए कर देती है।&nbsp;</p>
<p>मुझे याद आती है वो शाम, जब तुमने कहा था कि मुझे अपनी &#8216;बॉडी लैंग्वेज&#8217; पर ध्यान देना चाहिए। मेरे पूछने पर कि क्या किया मैंने, तुम उखड़ से गए थे। मेरा लोगों से हंस कर बात करना तुम्हें नहीं भाता था। मैं समझ नहीं पाती थी कि आखिर इसमें ग़लत क्या है? मैं कहती भी थी कि मैं ऐसी ही हूं, पर तुम्हारे अनुसार लोग मेरी हंसी की वजह से मुझे अलग तरीके से लेते थे। वो एक तरीके से &#8216;इन्विटेशन&#8217; होता था। मैं इसे नहीं समझ पाई। सुनो, तुम भी तो बहुत हंस कर बात करते थे सबसे, क्या तुमने कभी ऐसे किसी को इन्वाईट किया था?</p>
<p>हां, याद है मुझे। महिमा के बीमार होने पर उसके पापा फ्लैट में मिलने आए थे। अगले ही दिन पड़ोस में रहने वाले सागर ने पूछ ही लिया था कि कल वो एक आदमी आया था ना। दोस्त था क्या तुम्हारा? तुम्हें क्यों जानना है कि किसी के घर कोई आया, तो उससे उसका क्या रिश्ता है? क्या अकेली लड़की के पास आने वाला मर्द सिर्फ उसका दोस्त, या यूं कहूं कि &#8216;ब्वॉय फ्रैंड&#8217; ही हो सकता है? जब तुम्हारे पास पापा, चाचा, मामा के रिश्ते हैं, तो किसी लड़की के क्यूं नहीं हो सकते? और अगर मान भी लिया जाए कि ब्वॉय फ्रैंड ही आया है, तो तुम्हारी नींद इस बात से क्यों हराम होती है? ऐसी क्या ख़्वाहिश दबाए बैठे हो, जिसको सोच कर लगता है कि किसी दूसरे की वो पूरी हो जाएगी?</p>
<p>पिताजी कहते हैं कि समाज और परिवार के साथ रिदम बैठा कर चलना चाहिए, पर आज के हालात देखकर लगता है कि खुद का खुद की ज़िंदगी के साथ तालमेल बैठ जाए, वही काफी है। लोग &#8216;जजमेंटल&#8217; होते हैं। हर चीज़ को जज करते हैं। हंस कर बात करने का मतलब &#8216;इन्वाइट&#8217; करना होता है, साथ बैठ कर &#8216;पी&#8217; लिया तो उसके बाद तो सिर्फ बिस्तर के ही सपने आएंगे। अपने घर खाने पर बुला लिया तो मतलब आपकी ज़िंदगी पर आने वाले का कॉपी राइट हो गया।&nbsp;</p>
<p>हां, मैं जानती हूं कि बहुत सारे लोग ऐसे नहीं हैं, पर मैं ये भी जानती हूं कि बहुत सारे लोगों में बहुत सारा हिस्सा ऐसा ही है। हर कोई अपनी ज़िंदगी में एक &#8216;कहानी&#8217; चाहता है। चुंकि खुद की ज़िंदगी की कहानी से डर लगता है इसलिए दूसरों की ज़िंदगी को ही एक कहानी का रुप देते हैं और उसको इंजॉय करते हैं। वैल, कुछ तो &#8216;टेस्टी&#8217; सा हासिल होता ही होगा। बता नहीं सकती मैं&#8230;</p>
<p>स्तुति के ब्वॉय फ्रैंड ने उसको इसलिए छोड़ा कि उसने शादी से पहले अपने आप को नहीं सौंपा, तो मिहिर ने अदिति को ये कह कर छोड़ दिया कि जो शादी से पहले खुद को इस तरह सौंप सकती है, उसने ना जाने किस किस को खुद को सौंपा होगा। क्या चाहते हो तुम? चाहते क्या हो? सिर्फ अपनी आसान सी ज़िंदगी, जो जब जिस रुप में जहां चाहो, वहां वैसे ही वो मिल जाए? क्या चाहते क्या हो?</p>
<p>अगर आशिमा अकेली है, तो वो क्यों किसी के साथ बाहर नहीं जा सकती या शहर से बाहर घूमने का प्लान नहीं कर सकती? क्यों उसे इस नज़र से देखा जाना चाहिए कि गर वो किसी लड़के दोस्त के साथ छुट्टियां मना कर आई है, तो हमबिस्तर हो कर आई ही होगी? पर क्या करें ना, वो कहते हैं ना-&#8216;मन का क्या है, वो तो कहीं भी उड़ कर जा सकता है&#8217;। तो बस&#8230;. तुम्हारा ये मन काबू में आता कहां है भला? चीज़ों को गढ़ने में, गढ़ कर उन्हें सोचने में, सोच कर उसको 2-4 लोगों से कह देने में जो मज़ा है, भला वो तुम्हें कहीं और कहां मिलेगा? है ना?</p>
<p>तुम सुन रहे हो ना, तुम&#8230; और तुम भी&#8230;.और जो तुम चश्मे के नीचे से अपनी कटिल मुस्कान के साथ मुझे देख रहे हो, तुम भी&#8230; तुम सब से पूछ रही हूं&#8230; चाहते क्या हो? बिस्तर के बाहर कोई चीज़ कभी दिखाई देती है या समझ में आती है? मॉल में अपनी बीवी के साथ हाथ थामे चलते हो और दूसरे जोड़े को देखकर पहेली बुझाने लगते हो कि उन दोनों के बीच क्या रिश्ता है या वो लोग क्या और कैसे रहते होंगे? तुम अपने दोस्तों से दोस्ती का रिश्ता मरते दम तक निभा सकते हो पर मुझसे ये उम्मीद कि अब जब तुम्हारे साथ हूं तो बाकी सब भूल जाऊं। यकीं करना तुम्हें कभी नहीं सीखा।&nbsp;</p>
<p>सारी ज़िंदगी तो इसी सरदर्दी में बीत जाती है कि लोग क्या कहेंगे? अरे! तुम पागल हो क्या? तुम अभी भी नहीं समझ रही, तुम चाहे &#8216;ये&#8217; करो या &#8216;वो&#8217;, लोग वही कहेंगे, जो कहने में उन्हें &#8216;कहानी&#8217; मिलेगी, जिसे दूसरों को बांच कर उन्हें कालिदास होने का सुख प्राप्त होगा। वो तुम पर हाथ आज़माना चाहते हैं और जब खुद नहीं आज़मा पाते, तो दूसरों पर यह तीर चला देते हैं। निकल आओ इस तकलीफ से। यकीं करो, ये तीर लगने पर नहीं चुभता, जितना सोचने पर&#8230;.</p>
<p>&#8216;पिंक&#8217; अच्छी फ़िल्म है। नहीं देखी तो देखना ज़रुर। इस फ़िल्म के ज़रिए एक कोशिश तो की गई है, उस मनगढ़त हिप्पोक्रेसी को तोड़ने की, जो अपनी सुविधा के लिए तुम सब ने मिल कर बना ली है। जाओ, तुम भी जाओ और देखो इसे। जानती हूं कि देखते वक्त यही सोचोगे कि तुम भी इसी तरह तो सोचते हो। शर्म आए तो पास बैठी किसी महिला के पिंक दुपट्टे में अपना मुंह छिपा लेना। हो सकता है कि सदियों से जमी तुम्हारी सोच ज़रा सा ही सही, पिघल सके।&nbsp;</p>
<p>जानती हूं कि आज अपनी सोच इस तरह बेलिबास तुम्हारे सामने रखी है तो फिर जज करोगे, कुछ कहोगे, कुछ चुभाओगे&#8230;.पर अब चुप्पी नहीं भाती मुझे। मैं तुम्हारी उस तमाम सोच को &#8216;नो&#8217; कहती हूं, जिसने अब तक मुझे जकड़ कर रखा था। याद रखना, मेरी &#8216;नो&#8217; का मतलब &#8216;नो&#8217; (नहीं) ही है, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं।&nbsp;</p>
<p>जानती हूं कि &#8216;पिंक&#8217; कलर एक निशानी है एक लड़की की। माना जाता है कि लड़की है तो उसका सब &#8216;पिंक&#8217; होगा और लड़का है तो &#8216;ब्लू&#8217;। ब्लू रंग गहरा होता है जो आसानी से किसी भी रंग को दबा सकता है, पर याद रखना, तुम्हारा ये रंग या तुम्हारी ये सोच मुझे कभी डरा नहीं सकती। &#8216;पिंक&#8217; रंग देखते ही तुम्हारी ऑंखों में जो रंग उतरता है ना, मुझे वो कतई बर्दाश्त नहीं।</p>
<p>&#8216;पिंक&#8217; रंग सॉफ्ट तो हो सकता है, पर वो कच्चा या कमज़ोर नहीं है&#8230;</p>
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		<title>मुबारक हो, बेटी हुई है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Sep 2016 21:29:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[&#8216;मुबारक हो, बेटी हुई है&#8217;- डिलीवरी रूम से नर्स ने निकलते हुए ख़ुशख़बरी दी। मैं अपनी माँ और दीदी के साथ रूम के बाहर खड़ी थी। इस बात को सुनते ही हम तीनों चीख़ पड़े और रोते हुए एक दूसरे से गले मिले। मेरी बहन की शादी के 5 साल हो चुके थे। भारतीय परम्परा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;मुबारक हो, बेटी हुई है&#8217;- डिलीवरी रूम से नर्स ने निकलते हुए ख़ुशख़बरी दी। मैं अपनी माँ और दीदी के साथ रूम के बाहर खड़ी थी। इस बात को सुनते ही हम तीनों चीख़ पड़े और रोते हुए एक दूसरे से गले मिले।</p>
<p>मेरी बहन की शादी के 5 साल हो चुके थे। भारतीय परम्परा को निभाते हुए रिश्तेदारों ने शादी के एक साल बाद ही  &#8216;बेटा ख़ुशख़बरी कब दोगी?&#8217; &#8211; ये सवाल पूछना शुरू भी कर दिया था। बहन और उसके पति ने सोच रखा था कि माता &#8211; पिता बनने का सुख उन्हें 2-3 सालों बाद ही चाहिए। सभी ज़रा बेसब्री से &#8216;किसी गुड न्यूज़&#8217; का इंतज़ार कर रहे थे। वो वक़्त भी आ ही गया।</p>
<p>किसी दिन यूँ ही शाम को मैंने कहा कि कुछ दिक़्क़त आ रही है तो और भी रास्ते हैं। चल डॉक्टर से मिलते हैं। मेरी बहन मेरी बात को सुन कर मुस्कुरा दी। मैं हैरान कि दुखी होने की जगह यह इतनी आराम से कैसे हंस रही है? उसने मेरा हाथ पकड़ के कहा कि चिंता मत कर, सब ठीक है। मेरे दिमाग़ की बत्ती ज़रा देर में जली और बात को समझते ही मैं ख़ुशी से चीख़ पड़ी, जैसे बच्चा भी अभी ही हो गया।&nbsp;</p>
<p>धीरे धीरे समय बीता। ये खा, ये मत खा&#8230;ऐसा कर और ऐसा मत कर जैसी सौ हिदायतों के साथ उसने अपने 9 महीने पूरे किए। मां एक महीने पहले ही अपना फर्ज़ निभाने आ गई। बेचारी वो ठहरी सीधी सादी। हमेशा कहती कि मैं भला कितना ही संभाल पाउंगी, पर हां, &#8216;मॉं&#8217; के नाम पर जो राहत मिल जाए, उतना ही काफी है। कहने कि ज़रुरत नहीं कि हर कोई &#8216;मां&#8217; के होने पर मिलने वाले सुकून को जानते ही होंगे। हम सब भी मॉं के आने पर वैसे ही खुश हुए। &#8216;आज ये बना दो&#8217;, &#8216;आज ये खाएं क्या&#8217;, &#8216;चलो मॉल घूम कर आते हैं&#8217;&#8230;.दिन ऐसे ही गुज़र रहे थे। सुबह शाम टहलना, गप्पें लड़ाना, चाय के समय आने वाले सदस्य के लिए नई नई प्लानिंग करना, मां के फोन पर दिन में पिताजी के तकरीबन  7-8 फोन देखकर दबे मुंह हंसना, क्या पापा आपका मन नहीं लग रहा?- कहकर पिताजी को छेड़ना&#8230;.वक़्त ऐसे ही बीत रहा था।&nbsp;</p>
<p>बहन ने एक दिन रात को कमर दर्द की शिकायत की। अगले दिन रूटीन चेकअप के लिए हॉस्पिटल जाना ही था, तो हमने सुबह तक का इंतज़ार किया। बहन के पति को हमने ज़िद करके ऑफिस भेजा कि कुछ इमरजेंसी होगी, तो बुला लेंगे। हॉस्पिटल जाकर पता चला कि ये जो कमर दर्द है, दरअसल ये ही &#8216;वो दर्द&#8217; है, जिसे दुनिया का सबसे तेज़ दर्द कहते हैं। डॉक्टर ने एडमिट होने की बात कही। मैंने फोन कर बहन के पति को भी बुलाया। वो भागा भागा आया और कागज़ी काम करने लगा। बहन का चीखना शुरु हो चुका था। मैंने कभी इतनी पास से ये सब नही देखा था, तो मैंने रोना शुरु कर दिया। मॉं बेचारी सब संभालने में लगी पड़ी थी। मैंने अपनी बड़ी बहन को फोन किया &#8211;  &#8216;फटाफट आ, डॉक्टर ने एडमिट कर लिया है। वो चीख रही है, मैं रो रही हूं, मॉं अकेले सब संभालने में लगी पड़ी है।&#8217; बड़ी बहन भी शायद उड़ती हुई सी हॉस्पिटल पहुंची। हम सब की धड़कनें बहुत तेज़ चल रही थीं।</p>
<p>&#8216;आप सब बाहर इंतज़ार कीजिए&#8217;- कहकर हमें कमरे से बाहर जाने का इशारा किया गया। मैं, मॉं और दीदी बाहर आ गए। बहन दर्द में चीखें मार रही थी, उसका पति हाथ पकड़ कर उसका मनोबल बढ़ा रहा था, नर्स भाग भाग कर ऑपरेशन का सारा सामान ला रही थी। हम बाहर से बस अपनी बहन की चीखें सुन रहे थे।&nbsp;</p>
<p>मैं पिछले तीन घंटे से उसको दर्द में बिलखता देख रही थी। बीच में ज़्यादा दर्द बढ़ने की स्थिति में उसने कहा भी कि अब वो नहीं सह सकती, डॉक्टर को बोलो कि सिज़ेरियन कर दे, पर सुनी हुई बातों के आधार पर मैंने उसे मना किया। मॉं ने भी अपने तरीके से समझाया। डिलीवरी के समय वो मॉं मॉं कहकर चिल्लाती रही। उसके पति ने उसे हंसाने के लिए छेड़ा भी कि कोई एक ही मिल सकता है, मॉं या मैं, आपको कौन चाहिए? मैं जानती हूं कि उस वक्त शायद मेरी बहन ने अपने पति को गाली ही दी होगी, पर बाद में वो उसके लिए एक अच्छा एहसास ही होगा। उसका पति बार बार &#8216; इट्स ओके&#8217; कहकर उसका मनोबल बढ़ा रहा था और वो दर्द में भी उस पर  चीख रही थी कि &#8216;नो, इट्स नॉट ओके&#8217;।&nbsp;</p>
<p>आधे घंटे की मशक्कत के बाद हमें एक रोने की और एक हंसने की आवाज़ आई। मेरी बहन ने एक बेटी को जन्म दिया था। एक खूबसूरत परी इस दुनिया में आ चुकी थी। &#8216;कुछ एक्सपर्ट डॉक्टर्स&#8217; ने तो कह दिया था कि मेरी बहन मॉं नहीं बन पाएगी, पर ना केवल वो स्वाभाविक तरीके से मॉं बनी, बल्कि नॉर्मल डिलीवरी भी हुई।&nbsp;</p>
<p>अपनी बहन के पति को देखकर मैं हैरान थी। जिस तरह से वो बहन का साथ दे रहा था, वो कम ही देखने को मिलता है। कई लोग तो इस खूबसूरत मौके को गंवा देते हैं। मॉं को तो सारी शाबाशी जाती ही है, पर मैंने महसूस किया कि मेरी बहन ने इन सबको इतनी आसानी से झेला तो उसकी बहुत बड़ी वो वजह थी, जो उसके पति के साथ ने उसको दी थी। हम सब घरवालों को जहां फोन करने में और बेबी को देखने में लगे पड़े थे, वो बस अपनी बीवी का हाथ पकड़े खड़ा था। बहन के पूरी तरह सामान्य होने के बाद उसने बेटी को देखा और उसके बाद उसने अपने माता पिता को इस खुशी की इत्तिला दी। मेरी बहन अपने पति को अक्सर &#8216;डोडो&#8217; कहकर बुलाती है। एक दिन मैंने पूछा भी कि &#8216;डोडो&#8217; का क्या मतलब होता है, तो पता चला कि ये एक चिड़िया है, जो काफी कम पाई जाती है। हां, सही नाम रखा था मेरी बहन ने अपने पति का। उस जैसे जीवनसाथी सच में कम पाए जाते हैं।</p>
<p>घर में रौनक है। हर कोई खुश है। बड़ी दीदी के बेटे को जहां ऐसा लग रहा है कि वो अभी से बाप बन गया और एक जिम्मेदारी उस पर आ गई, तो बेटी इसलिए खुश है कि उसको कोई जोड़ीदार मिल गया। एक बेटा इसलिए खुश है कि खेलने के लिए खिलौना आ गया, तो दूसरा इसलिए खुश है कि अब एक राखी ज़्यादा बंधेगी। वो &#8216;बेटी&#8217; उर्फ अपनी छोटी बहन को देखने के लिए 18 मंज़िल सीढ़ी से चढ़कर आने की भी हिम्मत रखते हैं। मॉं-पिताजी नाना-नानी बन कर खुश हैं तो कोई दादा-दादी बन कर। दीदी खुश है कि उसे फिर से वो सब करने का मौका मिलेगा, जो उसने तकरीबन 13-14 साल पहले किया था। कोई मामा बना, कोई चाचा तो कोई बुआ। एक जन्म ने कईयों को कितना कुछ बना दिया ना&#8230;</p>
<p>मैं भी बहुत खुश हूं। जब पहली बार नर्स ने उसे मेरे हाथों में दिया तो मैं अंदर से कांप रही थी। मैंने पहली बार ये पूरी प्रक्रिया इतने करीब से देखी। मैंने पहली बार तुरंत जन्मे बच्चे को अपनी बांहों में लिया था। उसको अपनी बांहों में भरकर एक अजीब ही एहसास से भर उठी मैं, जिसे चाह कर भी बयां नहीं कर पाउंगी। मुझे वो सारी तकलीफें याद आ गईं, जो मैंने मॉं को दी थी। नहीं, हम चाहे जो करें अपनी ज़िंदगी में, अपनी बहन का दर्द देखने &nbsp;के बाद इतना समझ में आया कि हम सबको अपने मॉं बाप को तो तकलीफ नहीं ही देनी चाहिए। सच में अजीब सा था सब कुछ। कुछ समय पहले तक जो मेरी बहन के पेट के अंदर अपनी ज़िंदगी जी रही थी, वो अब मेरी बाहों में थी। मेरी रोती बहन अपने बच्चे के रोने को सुनकर हंस पड़ी थी। बच्ची का वो पहला रोना हर मॉं को एक मुस्कुराहट देता होगा। मेरी बहन को भी वही खुशी मिली। वो अब तक की अपनी सारी तकलीफ भूल चुकी थी। एक दर्द ने उसे ज़िंदगी का सबसे हसीन तोहफा जो दिया था।&nbsp;</p>
<p>मैं बहुत खुश हूं। मेरी बहन ने मॉं बनकर मुझे &#8216;मॉं सी&#8217; बनने का सुख दिया है। मैं समझ चुकी हूं कि ज़िंदगी के सबसे तेज़ दर्द के बाद सबसे खूबसूरत चीज़ पैदा होती है। मैं भी दर्द से गुज़र रही हूं और उम्मीद है कि मेरा ये दर्द भी मेरी ज़िंदगी को सबसे हसीन तोहफा देगा&#8230;</p>
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		<title>मैं हमेशा रहूंगी&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Aug 2016 07:53:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[कुछ अजीब सी कशिश थी उस चाँद में कि मैं अपनी निगाहें ना फेर पाई। घर से निकलते ही उस पर नज़रें गड़ीं और बस वही जमी रह गईं। मैं अक्सर चाँद को देखती थी और तुम अक्सर मेरा मज़ाक़ बनाते थे कि देखने से वो उतर कर नीचे जमीं पे नहीं आ जाएगा। मैं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ अजीब सी कशिश थी उस चाँद में कि मैं अपनी निगाहें ना फेर पाई। घर से निकलते ही उस पर नज़रें गड़ीं और बस वही जमी रह गईं। मैं अक्सर चाँद को देखती थी और तुम अक्सर मेरा मज़ाक़ बनाते थे कि देखने से वो उतर कर नीचे जमीं पे नहीं आ जाएगा। मैं अपने जवाब में बस तुम्हें देख कर मुस्कुराती। कितना हँसते थे ना तुम अपनी इन समझदारियों पर।&nbsp;मौसम ने करवट ली और हम दोनों की क़िस्मत में जुदाई आई। तुम्हारी समझदारी गुम हो चुकी थी। बिछोह की मार ने सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तुम्हें दी थी। अब तुम अक्सर चाँद देखते&#8230;शायद उस चाँद में मेरी नज़रों को ढूँढते थे। मैं ख़ुद से ज़्यादा तुम्हारी परेशानी से परेशान थी। मैं जानती थी कि कभी दूर होने का समय आया तो मैं ख़ुद को संभाल लूँगी&#8230;.पर तुम? तुम कैसे रह पाओगे या ख़ुद को संभाल पाओगे? तुम चुप से हो गए थे और तुम्हारी इस चुप्पी में मेरा मन जलता ही जा रहा था।&nbsp;</p>
<p>हर फूल हर गमले में नहीं खिलता पर यह क़ाबिलियत तुम में थी कि तुम चुन चुन कर उस फूल को लेकर आते थे जो मेरे गमले में खिल सके। हाँ, हो सकता है कि प्यार मेरे भाग्य में रहा होगा पर वो ख़ूबसूरत दुनिया जो तुम्हारे आने के बाद मुझे मिली, वो भला और कहाँ मिलती मुझे? सबसे छुपा और बचा के रखने का वादा तुमने हमेशा निभाया। तुम्हारे साथ मैं कुछ अलग ही रहती&#8230;</p>
<p>तुम रह नहीं पाए और छुट्टी लेकर आ ही गए मेरे पास। ऑफ़िस के गार्ड ने आकर &#8216;कोई मिलने आया है&#8217; का संदेश दिया। मैं बाहर गई तो बेताबी में तुमको चहलक़दमी करते देखा। तुम्हारी उस बेचैनी ने मेरे चेहरे पे एक शर्मीली सी मुस्कुराहट दी। ड्राइवर को हमने कार लेकर घर जाने के लिए कहा और ख़ुद टैक्सी ली। पूरे रास्ते तुमने मेरा हाथ थामे रखा। पहली बार हम अलग हुए थे और उसकी तपिश मैंने तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट में महसूस कर ली थी। बिना कुछ बोले सब सुनने का वो सफर शायद हम दोनों कभी ना भूल पाएं।&nbsp;</p>
<p>&#8216;फिर से चांद को देख रही हो?&#8217;- तुमने खुली छत पर मुझे देखते हुए अपना चिरपरिचित सा सवाल दागा। मैं भी हमेशा की तरह हंसी। &#8216;वैसे पता है, पहली बार मुझे भी इस चांद की कीमत पता चली है। इन दूरियों में इसे ही देखकर नज़दीकियों का एहसास पाया है मैंने। तुम्हें नहीं मालूम, पर इस चांद में तुम्हारी आँखें दिखती हैं मुझे। सुनो, क्या मैं अपने सारे किए हुए वादे निभाता हूं? जिन खुशियों की तुम हकदार हो, क्या वो सब तुम्हारे हिस्से आ पाई? क्या अभी भी तुम्हें लगता है कि &#8216;वो&#8217; मैं ही हूं, जिसे पाने की ख़्वाहिश तुमने हमेशा से की थी?&#8217; तुमने मेरा हाथ पकड़ कर सब कुछ कह दिया था। मैं हैरान होने के साथ एक अलग ही भाव लिए बैठी थी। समझ नहीं आया कि ये तुम्हारा डर था, जिसे इन कुछ दिनों की दूरियों ने पैदा किया था, या ये किसी नई जिम्मेदारी का एहसास था?&nbsp;</p>
<p>मैं तुमको एकटक देखी जा रही थी। जानती थी कि अब तुम्हें सब समझ आ गया है। हर रात चाँद के इस बढ़ते घटते कतरन को देखना अब तुम्हें भी भाता था। तुम अक्सर मुझे अपनी ज़िन्दगी की ठौर कहते और मैं बस इतराया करती। एक मर्द जब अपनी औरत को लेकर संजीदा हो तो ज़माना अक्सर उसे हजम नहीं कर पता पर मेरी ज़िंदगी के लिए यह बात गर्व करने जैसी थी।&nbsp;</p>
<p>धीरे धीरे गिरहें खुलती हैं, ये बात हम दोनों ही समझ रहे थे। अक्सर ऐसा होता है कि हम जिस जहाँ को ढूँढते हैं, वो हमें नहीं मिलता पर जब मिल जाए तो उससे हसीन तोहफ़ा और कुछ नहीं होता। मैं ख़ुश थी और मुझसे ज़्यादा तुम&#8230; हर चीज अपना असर दिखाने में एक उम्र लगाती है, पर कुछ चीज़ें बस यूं ही हो जाती हैं।&nbsp;</p>
<p>तुम हमेशा डरते थे मुझे खोने से। ऐसा नहीं कि तुम्हें तुम्हारी हथेलियों की पकड़ पर भरोसा नहीं था पर शायद इस बात का एहसास ज़रुर था कि कई बार हर मजबूती के बाद भी हाथ और साथ छूट जाते हैं। दिन और रात जलते बुझते रहते थे और उसी के साथ तुम्हारा दिल भी। तुम्हें डर था कि एक दिन आँधी चलेगी और सब उड़ा ले जाएगी। मैं तुम्हें विश्वास दिलाने में लगी ही रहती। मैंने कई दफे कहा भी कि मैं अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ तुम पर खर्च करने वाली हूं, पर तुम हड़बड़ाते रहे। शायद तुमने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ खोया था, इसलिए ये डर अंदर तक बैठ गया था, जो बाहर आने का नाम नहीं ले रहा था।&nbsp;</p>
<p>हर रोज़ दबे पांव चांद निकलता और अपने व्यवहार से पलट तुम्हारी व्याकुलता को कम कर जाता। बेचैनी में डूबा गीला वो मन अब चांद की छांव में सूखने लगा था। तुम उदास थे, ऐसा नहीं था&#8230;पर हां, चुप ज़रुर थे। खोने का डर पाने के सुख को रोकता था। मेरे पास कोई ऐसी तरकीब नहीं थी, जो तुम्हें शांत करे। हां, ये ज़रुर हुआ कि मैं ख़ामोशी के साथ एक रिश्ता बुनने लगी&#8230;तुम्हारे साथ&#8230; जिसको तुम कभी भी ओढ़ सकते थे। ज़िंदगी इन्हीं सायों के बीच गुज़र रही है। मैं भी गिरती पड़ती संभाल रही हूं सब&#8230;संभल भी रही हूं&#8230;&nbsp;</p>
<p>याद रखना, गर कभी ना रहूं तो हमारे रिश्ते को ओढ़ लेना या उस चांद को देख लेना&#8230;मैं उसमें ही कहीं समाई मिलूंगी&#8230;</p>
<p><a href="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0035.jpg"><img loading="lazy" data-attachment-id="610" data-permalink="https://tiwarishweta.wordpress.com/2016/08/23/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%80/img_0035/" data-orig-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0035.jpg" data-orig-size="480,360" data-comments-opened="1" data-image-meta="{&quot;aperture&quot;:&quot;0&quot;,&quot;credit&quot;:&quot;&quot;,&quot;camera&quot;:&quot;&quot;,&quot;caption&quot;:&quot;&quot;,&quot;created_timestamp&quot;:&quot;0&quot;,&quot;copyright&quot;:&quot;&quot;,&quot;focal_length&quot;:&quot;0&quot;,&quot;iso&quot;:&quot;0&quot;,&quot;shutter_speed&quot;:&quot;0&quot;,&quot;title&quot;:&quot;&quot;,&quot;orientation&quot;:&quot;1&quot;}" data-image-title="img_0035" data-image-description="" data-image-caption="" data-large-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0035.jpg?w=480" src="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0035.jpg?w=714" alt=""   class="alignnone size-full wp-image-610" srcset="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0035.jpg 480w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0035.jpg?w=150&amp;h=113 150w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0035.jpg?w=300&amp;h=225 300w" sizes="(max-width: 480px) 100vw, 480px"></a></p>
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		<title>पी वी सिंधू</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Aug 2016 19:42:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[चारों तरफ़ हंगामा है, बहुत शोर है। ख़ुशी की लहर मानो पूरे देश में है। ओलम्पिक में मेरी बहुत रुचि हो, ईमानदारी से कहूँ तो ऐसा नहीं है। एक बार लाइव देखने का मौक़ा मिला था, जिसको मैंने इंजॉय किया था, पर टीवी के आगे मैं इसको देखने बैठूँ, ऐसा नहीं होता&#8230;पर बैड्मिंटन के सेमी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>चारों तरफ़ हंगामा है, बहुत शोर है। ख़ुशी की लहर मानो पूरे देश में है। ओलम्पिक में मेरी बहुत रुचि हो, ईमानदारी से कहूँ तो ऐसा नहीं है। एक बार लाइव देखने का मौक़ा मिला था, जिसको मैंने इंजॉय किया था, पर टीवी के आगे मैं इसको देखने बैठूँ, ऐसा नहीं होता&#8230;पर बैड्मिंटन के सेमी फ़ाइनल मैच में ऐसा हुआ। जापान और इंडिया का वो रोचक मुक़ाबला मैंने देखा और मैं फ़िनाले  का इंतज़ार करने लगी। स्पेन और भारत का मैच&#8230;घर में हम सब बैठ कर देख रहे थे। शायद कई घरों का यही हाल होगा। तीन सेट के इस मैच में पहला भारत से सिंधू ने जीता और बाकी के दो सेट स्पेन से मेरीन ने। मैच खत्म होने के बाद मेरीन खुशी से रो पड़ी तो सिंधू ने खुद को संभाला। उसने अपना और मेरीन का रैकेट लेकर जमा करवाया। मेरीन से जाकर हाथ मिलाया और दोनों गले मिलीं। मैं हैरान हो रही थी दोनों को देखकर। लग रहा था कि थोड़ी देर पहले तक ये दोनों एक दूसरे को मारने पर उतारू थीं, चाहे खेल में ही सही, पर अब इतनी आसानी से एक दूसरे से गले कैसे मिल रही हैं? दीदी के बेटे ने कहा कि मैच फिक्स था क्या मौसी? मैं हंस पड़ी उसके मासूम सवाल पर क्योंकि मैं समझ रही थी कि मेरी तरह वो भी उनके इस गले मिलने की कला को पचा नहीं पा रहा था। हॉस्टल में डांस और स्पोर्ट्स के बीच मैंने डांस चुना था, शायद इसलिए भी मैं इस &#8216;Sportsman spirit&#8217; को समझने में असमर्थ रही।</p>
<p>मेरीन ने बहुत उम्दा खेला था और सिंधू ने उसे टक्कर भी अच्छी दी। कई लोग खुश होंगे कि भारत को एक और मेडल मिला&#8230;पहली भारतीय महिला, जो सिल्वर मेडल लेकर आ रही है&#8230;चलो, कुछ तो आया ही। कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो इस क्षण भी सच्चे देशभक्त बनकर गाली दे रहे होंगे कि ज़रा सा और बेहतर खेलती तो गोल्ड ला सकती थी। वर्ल्ड की नंबर वन बैडमिंटन प्लेयर मेरीन को इस ओलंपिक में पहली बार सिंधू ने ही हराया, इस बात से भी शायद कई लोगों को कोई फर्क ना पड़ता हो। सरकार भी पैसे और नौकरी का ऑफर देकर अपनी महानता सिद्ध करेगी। फेसबुक पर महिलाओं को लेकर एक क्रांति भी आ गई कि हर क्षेत्र में तो महिलाएं ही आगे हैं, पुरुष वर्ग कहां है? पुरुष वर्ग शायद ये सोच कर खुश हो रहा होगा कि जितनी भी महिलाएं जीत रही हैं, इन सबका कोच तो पुरुष ही है ना। शोभा डे को भी जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान और सबसे ज़्यादा नसीहत मिल चुकी होगी।  यह सब कुछ अच्छा है गर ये ऐसा ही बना रहे। मुझे डर लगता है जिस तरह हम चीज़ों को लेकर रिएक्ट करते हैं। पल में सर चढ़ाने और पल में उतारने या उसे भूल जाने में हमें महारत हासिल है। हम नहीं समझते उस दिल को, उस भाव को जो हार-जीत से परे गले मिलता है। सोच रही हूं कि जिन कपड़ों में सिंधू ने जीत कर देश की इज़्ज़त बढ़ाई, उन कपड़ों में अपने ही देश में वो इज़्ज़त गंवा सकती है।&nbsp;</p>
<p>सही बात कही किसी ने कि भारत देश में वो अल्ट्रासाउंड में अपनी पहचान से बच गई इसलिए देश की इज़्ज़त भी बच गई। बेटी बचाओ, इज़्ज़त बढ़ाओ जैसी तमाम बातें हैं जो छाई हैं। कब तक असरदार हैं या दिमाग में हैं, नहीं पता&#8230; और ये जो मुझे नहीं पता है ना, वो ही परेशान कर रहा है।&nbsp;</p>
<p>वक़्त वक़्त पर औरतें बताती हैं कि वो क्या हैं और क्या कर सकती हैं, फिर भी समाज की याद्दाश्त इतनी कमजोर कैसे होती है कि वो सब भूल जाता है? उसे ये मेडल, ये खुशी की लहर, ये मेहनत, तोहफे में देश को मिला ये गर्व याद क्यों नहीं रहता? एक औरत को सोचते वक़्त क्यों उसे सिर्फ उसके उभार दिखाई देते हैं? क्यों समाज एक औरत को बिस्तर और रसोई से बाहर नहीं देखना चाहता?</p>
<p>सब कहते हैं कि समय बदलेगा। मैं भी इसी इंतज़ार में हूं कि समय बदले और मुझे ये सब समझ में आ जाए। चलिए, फिलहाल तो दिमाग को शांत कर मैं सिंधू द्वारा दी गई इस अनमोल खुशी को सेलिब्रेट करूं&#8230;.आप भी कर रहे हैं ना???</p>
<p><a href="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0033.jpg"><img loading="lazy" data-attachment-id="605" data-permalink="https://tiwarishweta.wordpress.com/2016/08/20/%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%82/img_0033/" data-orig-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0033.jpg" data-orig-size="623,450" data-comments-opened="1" data-image-meta="{&quot;aperture&quot;:&quot;0&quot;,&quot;credit&quot;:&quot;&quot;,&quot;camera&quot;:&quot;&quot;,&quot;caption&quot;:&quot;&quot;,&quot;created_timestamp&quot;:&quot;0&quot;,&quot;copyright&quot;:&quot;&quot;,&quot;focal_length&quot;:&quot;0&quot;,&quot;iso&quot;:&quot;0&quot;,&quot;shutter_speed&quot;:&quot;0&quot;,&quot;title&quot;:&quot;&quot;,&quot;orientation&quot;:&quot;1&quot;}" data-image-title="img_0033" data-image-description="" data-image-caption="" data-large-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0033.jpg?w=623" src="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0033.jpg?w=714" alt=""   class="alignnone size-full wp-image-605" srcset="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0033.jpg 623w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0033.jpg?w=150&amp;h=108 150w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0033.jpg?w=300&amp;h=217 300w" sizes="(max-width: 623px) 100vw, 623px"></a></p>
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	</item>
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		<title>हमउम्र प्यार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 17 Aug 2016 18:09:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[सुनो ना, लोग हैरान हैं, बहुत परेशान हैं साठ साल में ये कैसा साथ झुर्रियों में कैसे पकड़ा हाथ मेरी ज़िंदगी में तेरा आना दे रहा है सौ सौ ताना शादी की उम्र नहीं यह तेरी ना लाँघना अब घर की देहरी जब वक़्त था तब सोई रही शादी की बात थी सबने कही बूढ़ी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सुनो ना,<br />
लोग हैरान हैं, बहुत परेशान हैं</p>
<p>साठ साल में ये कैसा साथ<br />
झुर्रियों में कैसे पकड़ा हाथ</p>
<p>मेरी ज़िंदगी में तेरा आना</p>
<p>दे रहा है सौ सौ ताना</p>
<p>शादी की उम्र नहीं यह तेरी</p>
<p>ना लाँघना अब घर की देहरी</p>
<p>जब वक़्त था तब सोई रही</p>
<p>शादी की बात थी सबने कही</p>
<p>बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम</p>
<p>कैसे जाएगा यह पैग़ाम&nbsp;</p>
<p>मत कर ये मज़ाक़ तू अब</p>
<p>इसे कौन पचा पाएगा कब</p>
<p>तू रोक दे यह सात फेरे</p>
<p>रह जाने दे सपने अधूरे</p>
<p>सुन कर ये सब हूँ परेशान</p>
<p>उम्र की सीमा पर हूँ हैरान&nbsp;</p>
<p>शादी करने में हो गर देर</p>
<p>ख़ुशियाँ लेंगी क्या मुँह फेर</p>
<p>तुम ही कहो अब क्या करूँ</p>
<p>तुम बिन अब कैसे जियूँ</p>
<p>सुनो प्रिये,</p>
<p>छोड़ दो दुनिया की बात</p>
<p>समझो बस ख़ुद के जज़्बात</p>
<p>हर सीमा से परे है प्यार</p>
<p>बस इस पर ही हो ऐतबार</p>
<p>साथ की कोई उम्र नहीं</p>
<p>प्यार ने यह बात कही</p>
<p>वक़्त के घेरे से आज़ाद है प्यार</p>
<p>उम्र का नहीं मोहताज़ है प्यार</p>
<p>हमउम्र है हर उम्र में वो</p>
<p>आया साथ निभाने जो</p>
<p>मैं साथ तेरे तू साथ मेरे</p>
<p>बस यही सच सबसे परे &nbsp;</p>
<p>यही पर ज़िंदगी बसती है</p>
<p>साथ वो सुंदर दिखती है&nbsp;</p>
<p><a href="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0032.jpg"><img loading="lazy" data-attachment-id="602" data-permalink="https://tiwarishweta.wordpress.com/2016/08/17/%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/img_0032/" data-orig-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0032.jpg" data-orig-size="400,378" data-comments-opened="1" data-image-meta="{&quot;aperture&quot;:&quot;0&quot;,&quot;credit&quot;:&quot;&quot;,&quot;camera&quot;:&quot;&quot;,&quot;caption&quot;:&quot;&quot;,&quot;created_timestamp&quot;:&quot;0&quot;,&quot;copyright&quot;:&quot;&quot;,&quot;focal_length&quot;:&quot;0&quot;,&quot;iso&quot;:&quot;0&quot;,&quot;shutter_speed&quot;:&quot;0&quot;,&quot;title&quot;:&quot;&quot;,&quot;orientation&quot;:&quot;1&quot;}" data-image-title="img_0032" data-image-description="" data-image-caption="" data-large-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0032.jpg?w=400" src="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0032.jpg?w=714" alt=""   class="alignnone size-full wp-image-602" srcset="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0032.jpg 400w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0032.jpg?w=150&amp;h=142 150w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0032.jpg?w=300&amp;h=284 300w" sizes="(max-width: 400px) 100vw, 400px"></a></p>
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		<title>बावली तनु</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Aug 2016 18:59:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[&#8216;बावली&#8217; &#8211; हां, यही वो पहला शब्द था जो तनु दी को देखकर मेरे दिमाग में आया था। मेरे से बहुत बड़ी थी वो। कभी आमना सामना भी नहीं हुआ था। हां, एक समारोह में हम मिले थे पर कोई ख़ास बातचीत नहीं। उन्होंने किसी बात पर आकर मेरी तारीफ की थी और कहा था [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;बावली&#8217; &#8211; हां, यही वो पहला शब्द था जो तनु दी को देखकर मेरे दिमाग में आया था। मेरे से बहुत बड़ी थी वो। कभी आमना सामना भी नहीं हुआ था। हां, एक समारोह में हम मिले थे पर कोई ख़ास बातचीत नहीं। उन्होंने किसी बात पर आकर मेरी तारीफ की थी और कहा था कि कभी बदलना मत, हमेशा ऐसे ही रहना। मैंने भी मुस्कुरा के हां में सर हिलाया था। उनकी फोटो कभी कभी दिखती थी, जो हमेशा सेल्फी रहती थी। कभी अकेले की तो कभी अपने कुत्ते ड्यूक के साथ। जब जब उनकी फोटो देखती तो पहला ख़्याल जेहन में यही आता था कि अजीब बावली सी हैं। दिमागी दिक्कत है शायद।&#8217;</p>
<p>&nbsp;क्या मुझे तुम्हारा नंबर मिल सकता है? मुझे तुमसे बात करने का बहुत मन है। मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो।&#8217; मुझे यही &nbsp;मैसैज भेजा था तनु दी ने। समय देखा तो रात के 11.45 हो रहे थे। मैं हैरान कि ना जान ना पहचान, मैं तेरा मेहमान वाला किस्सा हो गया ये तो। मैंने उन्हें टालने की कोशिश की कि सुबह आपको फोन करती हूं, पर वो बच्चों सी ज़िद लिए बैठी थी। मैंने उन्हें नंबर दिया और बताने की ज़रुरत नहीं कि 1 सेकेंड के अंदर ही मेरे फोन की घंटी बज रही थी। मैंने फोन उठाया तो चहकती सी आवाज़ आई जिसने एक ही सांस में मुझे बताना चाहा कि वो मुझे कितना पसंद करती हैं।&nbsp;</p>
<p>मैं ठहरी एक आम सी लड़की, जो ना चाहते हुए भी दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगती है। उनकी बातें सुनकर मुझे खुशी की जगह हैरानी हो रही थी। उनका फोन रखते ही मैंने अपनी बड़ी बहन को फोन किया और अभी अभी जो ज़िंदगी में ये खूबसूरत सा, ना समझ में आने वाला हादसा हुआ था, उससे रुबरु करवाया। बहन ने कहा कि अच्छी बात है कि कोई आपको पसंद करता है, पर उससे अच्छी बात कि कोई आपको अपनी इस बात से वाकिफ़ करवाता है। उन्होंने करवाया है, तो खुश हो। ज़िंदगी की खुशियों से इतना भी नहीं डरना चाहिए। मैंने भी हामी भरी पर मेरे लिए तनु दी उस दिन और बावली बन गई थीं।&nbsp;</p>
<p>ज़िंदगी ने शायद तनु दी की सुन ली और मुझे उनके ही शहर जाना पड़ा। जिस दिन जा रही थी, उस दिन बहन बहुत परेशान थी। कैसे रहेगी अकेले, वहां तो किसी को जानती भी नहीं। अपना ख़्याल रखना, कुछ भी हो तो फोन करना, वापस आ जाना। मैं भी एक अंजान से शहर में धड़कते दिल के साथ चली गई। मन में डर था, ऐसी बात नहीं, पर बस मन बहुत स्थिर नहीं था। जाने से पहले ध्यान आया कि तनु दी भी वही हैं तो एक मैसेज छोड़ा कि आपके शहर में हूं, समय मिला तो मिलेंगे। पहले ही बता चुकी हूं कि मैंने उन्हें बावला मान लिया था और तनु दी ने फिर से मेरी इस सोच पर अपनी मोहर लगा दी मुझे 5 घंटे में 5 बार फोन करके। वो बेचैन थी, जैसे उस शहर में अगर मुझे किसी परेशानी का सामना करना पड़ा तो उनका जीवन व्यर्थ होगा।&nbsp;</p>
<p>उनका ड्राइवर आया और अपनी गणित के साथ मैं उनके घर पहुंची। वो ऐसे लिपटी जैसे जाने कितने बरसों बाद हम मिल रहे थे। उनकी खुशी उनकी आंखों से, उनके चेहरे से, उनकी बातों से&#8230;.यूं कह लीजिए कि उनके रोम रोम से ज़ाहिर हो रही थी। मैं बस उनको देखे जा रही थी। लगा कि उनका बावलापन शायद एक संक्रामक रोग है, जो अब मुझमें आ गया है और इसीलिए मैं उन्हें यूं देखी जा रही हूं। उनके घर का हर एक सदस्य मुझसे भली भांति परिचित था। मैं हैरान थी क्योंकि जिस कुत्ते की फोटो मैं हमेशा देखती रहती थो, वो भी मेरी गोद में आकर यूं बैठ गया, जैसे जाने कबसे मुझे जानता हो। कुत्ते को देखकर दूर से ही चीखने वाली मैं उसको सहला रही थी। मैं हैरां सी थी कि ये सब हो क्या रहा है मेरे साथ।</p>
<p>बातों का सिलसिला शुरु हुआ। उन्होंने बताया कि वो अभी भी पढ़ाई करती हैं। जाने कितने ही कोर्स उन्होंने कर लिए हैं और जाने कितने ही अभी करने हैं। &#8216;क्या करना चाहती हैं आप आगे?&#8217;- मैंने दुनियादारी वाला सवाल किया। उन्होंने बहुत ही सहज तरीके से कहा कि &#8216; कुछ नहीं। बस अच्छा लगता है, इसलिए। मैं तो बस खुश रहना चाहती हूं।&#8217; जितनी सहजता से उन्होंने वो बात कही, यकीं मानिए, उतनी ही सहजता से वो मुझे पसंद भी आई।&nbsp;</p>
<p>वक्त की बात है कि मुझे उनके साथ वक्त बीताने का वक्त मिला। मैं खुश थी उनसे मिलकर। सच कहूं तो हैरान भी।  आज भी ऐसे लोग होते हैं, जो हर जोड़ घटाव से परे होते हैं। उनके लिए सब अच्छा था। किसी से कोई शिकायत कभी रही हो तो रही हो, आज उसका ज़रा सा भी अंश देखने को नहीं मिला। मन को साफ रखना और हर चीज़ में एक सकारात्मकता देखना मुश्किल है पर उनकी नज़रों से मुझे भी वो आसान लगा। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं उन्हें इतनी अच्छी क्यों लगी, पर हां, मुझे ये पता चल गया था कि वो बावली तनु दी मुझे बहुत अच्छी लग रही हैं। बातों बातों में कुछ कुछ बातें वो इतनी सहजता से कह देती थीं, जिसमें ज़िंदगी की खुशियों के राज़ छिपे रहते थे।&nbsp;<br />
कई बार उनकी तस्वीरों को देखकर मैंने अंदाज़ा लगाया कि शायद ज़िंदगी में तनहा होंगी, पर वो भी मिथ उनके पति से मिलने के बाद टूट गया। जीवन साथी के साथ का असर होता है, ये मैंने महसूस किया। एक दिन दी को मैंने कहा कि आपको कोई चाहिए जो आपको हमेशा पैंपर करे, आपका ख़्याल रखे, आपके झटपट बदलते मन को संभाले। तनु दी ने हंसकर कहा कि इसीलिए तो तेरे जीजाजी मेरी ज़िंदगी में हैं। मैंने भी हामी भरी क्योंकि वो एक बात मैं भी महसूस कर रही थी। पति पत्नी सहज थे, इसलिए घर का हर सदस्य अपने आप में सहज दिखा।&nbsp;</p>
<p>एक दिन यूं ही किसी बात की ज़िक्र में मैंने उनसे पूछ लिया कि मन को कुछ ना पसंद आने की स्थिति में क्या करती हो? उन्होंने बड़ी आसानी से कहा कि खुश तो खुद को रहना है। दूसरे उस खुशी में सहायक बन सकते हैं, आपके बदले खुश या दुखी नहीं हो सकते। मैंने उन्हें हंस कर कहा भी कि मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इस बावली को इतना सब कुछ समझ में आता है।&nbsp;</p>
<p>मैं जानती हूं कि हम में से कई लोग जजमेंटल होते हैं, कई बार मैं भी&#8230;तनु दी के केस में ख़ासकर&#8230;.अब जब उनके साथ नहीं हूं तो पीछे पलट कर देख पा रही हूं। समझ पा रहीं हूं कि हर चीज़ दूर से देखकर समझ नहीं आती। लम्हों को उठाकर देखना पड़ता है, तभी उसमें छिपी दास्तां पता चलती है और आप उससे जुदा होने की बजाए जुड़ पाते हो।&nbsp;</p>
<p>कई छोटे छोटे लम्हें हैं, जिसका पूरा ब्यौरा देना मुश्किल है। शायद सब जता पाऊं या बता पाऊं वो भी आसान नहीं। एक दिन मिलने का सोचा था पर साथ लंबा हुआ। उनसे मिलने के बाद ना शहर अंजान रहा और ना ही वहां के रास्ते। सीखा मैंने कि खुश रहना सच में आसान सा काम है।</p>
<p>अब बस इतना जानती हूं कि मुझे बावलापन अच्छा लगा है&#8230;और वो बावली सी तनु दी भी&#8230;</p>
<p><a href="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg"><img loading="lazy" data-attachment-id="598" data-permalink="https://tiwarishweta.wordpress.com/2016/08/10/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%81/img_0031/" data-orig-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg" data-orig-size="1600,1200" data-comments-opened="1" data-image-meta="{&quot;aperture&quot;:&quot;0&quot;,&quot;credit&quot;:&quot;&quot;,&quot;camera&quot;:&quot;&quot;,&quot;caption&quot;:&quot;&quot;,&quot;created_timestamp&quot;:&quot;0&quot;,&quot;copyright&quot;:&quot;&quot;,&quot;focal_length&quot;:&quot;0&quot;,&quot;iso&quot;:&quot;0&quot;,&quot;shutter_speed&quot;:&quot;0&quot;,&quot;title&quot;:&quot;&quot;,&quot;orientation&quot;:&quot;1&quot;}" data-image-title="img_0031" data-image-description="" data-image-caption="" data-large-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg?w=714" src="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg?w=714" alt=""   class="alignnone size-full wp-image-598" srcset="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg 1600w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg?w=150&amp;h=113 150w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg?w=300&amp;h=225 300w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg?w=768&amp;h=576 768w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg?w=1024&amp;h=768 1024w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0031.jpg?w=1440&amp;h=1080 1440w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px"></a></p>
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		<title>बस यूं ही&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Aug 2016 18:00:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[कुछ खुशियों को आना होगा, कुछ दुखों को जाना होगा कब तक रुह रहेगी प्यासी, कभी तो खुद को पाना होगा चुभ कर कोई दर्द रिसेगा, नैनों से जब अश्क बहेगा जिस चोट से बदलेगा जीवन, सुंदर सा वो ताना होगा हैं घर से निकले जब कदम, मिले ना जाने कितने ग़म भटक ले चाहे [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ खुशियों को आना होगा, कुछ दुखों को जाना होगा</p>
<p>कब तक रुह रहेगी प्यासी, कभी तो खुद को पाना होगा<br />
चुभ कर कोई दर्द रिसेगा, नैनों से जब अश्क बहेगा</p>
<p>जिस चोट से बदलेगा जीवन, सुंदर सा वो ताना होगा</p>
<p>हैं घर से निकले जब कदम, मिले ना जाने कितने ग़म</p>
<p>भटक ले चाहे जितने रस्ते, घर तो फिर से आना होगा<br />
कर के देखो बार बार, दर्द बिना ना मिलता प्यार</p>
<p>इस प्यार के भी हैं नखरे, शर्तों पर ही माना होगा<br />
गीत में भी छिपा है राज़, सुर बिना ना लगते साज</p>
<p>दूरी में नज़दीकी के गीत,मन को अब तो गाना होगा<br />
हैं गवाह यहां कई सारे, दुख में भी होते नींद के मारे</p>
<p>नमक बिना कोई स्वाद नहीं, खाना फिर भी खाना होगा</p>
<p><a href="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg"><img loading="lazy" data-attachment-id="595" data-permalink="https://tiwarishweta.wordpress.com/2016/08/01/%e0%a4%ac%e0%a4%b8-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%80/img_0030/" data-orig-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg" data-orig-size="926,720" data-comments-opened="1" data-image-meta="{&quot;aperture&quot;:&quot;0&quot;,&quot;credit&quot;:&quot;&quot;,&quot;camera&quot;:&quot;&quot;,&quot;caption&quot;:&quot;&quot;,&quot;created_timestamp&quot;:&quot;0&quot;,&quot;copyright&quot;:&quot;&quot;,&quot;focal_length&quot;:&quot;0&quot;,&quot;iso&quot;:&quot;0&quot;,&quot;shutter_speed&quot;:&quot;0&quot;,&quot;title&quot;:&quot;&quot;,&quot;orientation&quot;:&quot;1&quot;}" data-image-title="img_0030" data-image-description="" data-image-caption="" data-large-file="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg?w=714" src="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg?w=714" alt=""   class="alignnone size-full wp-image-595" srcset="https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg 926w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg?w=150&amp;h=117 150w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg?w=300&amp;h=233 300w, https://tiwarishweta.wordpress.com/wp-content/uploads/2016/08/img_0030.jpg?w=768&amp;h=597 768w" sizes="(max-width: 926px) 100vw, 926px"></a></p>
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		<title>कभी कभी&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[meshweta]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Jul 2016 06:02:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[कभी कभी यूं ही बहुत खुश होती हूं&#8230;वजह नहीं पता होने के बावजूद। कभी कभी बस यूं ही रोने का मन करता है। एक अजीब सी बेचैनी, जैसे कुछ अंदर घुट सा रहा हो। कभी कभी ज़िंदगी के फलसफे बड़ी आसानी से समझ भी आ जाते हैं। कभी कभी सब कुछ इतना उलझा सा लगता [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कभी कभी यूं ही बहुत खुश होती हूं&#8230;वजह नहीं पता होने के बावजूद। कभी कभी बस यूं ही रोने का मन करता है। एक अजीब सी बेचैनी, जैसे कुछ अंदर घुट सा रहा हो। कभी कभी ज़िंदगी के फलसफे बड़ी आसानी से समझ भी आ जाते हैं। कभी कभी सब कुछ इतना उलझा सा लगता है, जैसे वो कभी नहीं सुलझ पाएगा।&nbsp;कभी कभी तो यूं भी होता है कि साज़िशों पर भी ऐतबार बढ़ता है तो कभी बेवफाईयों के बाद भी विश्वास घटने का नाम नहीं लेता। कभी लगता है कि किसी भी चुनौती का यूं ही चुटकी में सामना कर सकती हूं तो कभी एक छोटे से गड्ढे को पार करना भी समंदर पार करने जैसा प्रतीत होता है।&nbsp;</p>
<p>कभी किसी की बातों से यूं प्रभावित हो जाती हूं, जैसे बरसों से उस पर भरोसा हो तो कभी हर किसी पर मेरे शक का कीड़ा कुलबुलाता ही रहता है। कभी सबसे खुद को पूरी तरह छिपाना चाहती हूं तो कभी खुल कर किसी के सामने आने की चाहत भी होती है। कभी &#8216;शोले&#8217; की बसंती की तरह मेरी जुबान भी रुकने का नाम नहीं लेती तो कभी मेरी ख़ामोशी मुझे ही कचोटने लगती है। कभी बारिश के पानी में भीग कर मन तक को गिला करती हूं तो कभी पानी से उठते बुलबुले की तरह ही खुशी भी कुछ सेकेंड में खत्म सी हो जाती है। कभी मैं मुझे सबसे भली लगती हूं तो कभी मुझे मुझसे बड़ा शैतान और कोई नहीं दिखता है।&nbsp;</p>
<p>कभी नया शहर, नई नौकरी और नया घर बेहद उत्साह पैदा करता है तो कभी वही पुरानी छोटी तंग गलियां मुझे खींचती है। कभी फाइव स्टार का खाना रुखा सा लगता है तो कभी रास्ते पर लगे ठेले की आइसक्रीम खाकर आत्मा भी तृप्त सी लगती है। कभी कभी भीड़ में भी मैं खुद को तनहा सा पाती हूं तो कभी अकेलेपन में भी मेरी खुद से मुलाकात हो जाती है।&nbsp;</p>
<p>कभी सदियों तक साथ रहकर भी कोई मन को छू नहीं पाता है तो कभी कोई एक छोटी सी मुलाकात में ही रुह में उतर जाता है। हां, मेरे साथ ये सब होता है&#8230; तुम्हारे साथ भी क्या ऐसा ही होता है?</p>
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