<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201</atom:id><lastBuildDate>Thu, 08 Oct 2026 11:38:04 +0000</lastBuildDate><category>Psychology</category><category>Diary</category><category>Love</category><category>Life</category><category>Memories</category><category>Wine</category><category>Situation</category><category>Headache</category><category>waiting</category><category>Nostalgia</category><category>Love Story</category><category>Girl</category><category>Idea</category><category>Photography</category><category>Story</category><category>Abstract Scenes</category><category>Experiment</category><category>Gift</category><category>Saagar-O-Meena</category><category>May</category><category>Eyes</category><category>Poetry</category><category>Live Reporting</category><category>Rain</category><category>Delhi</category><category>Cinema</category><category>Silent Era</category><category>Village</category><category>Aawara</category><category>Anger</category><category>Drama</category><category>Fire</category><category>Indian Movies</category><category>Child</category><category>Daughter</category><category>Letters</category><category>Midnight Children</category><category>Draft</category><category>Theme</category><category>Comedy</category><category>Flashback of Indian Movies</category><category>Art Films</category><category>Grandmother</category><category>Hard Gravy</category><category>Komal</category><category>Random</category><category>Script</category><category>Tar</category><category>B'day</category><category>Coaltar</category><category>Dostoevsky</category><category>Flirting</category><category>India</category><category>Khurafat</category><category>Nicotine</category><category>Offbeat Cinema</category><category>Online Chatting</category><category>Phone</category><category>Podcast</category><category>Radio Drama</category><category>Reni</category><category>Revolution</category><category>Timepaas</category><category>Aalamaara</category><category>Aproov</category><category>Autobiography of Dada Saheb Falke</category><category>Bhagat Singh</category><category>Censorship</category><category>Challenge</category><category>Current Affairs</category><category>Fever</category><category>Geeta</category><category>Handwriting</category><category>Parallel Films</category><category>Patriotism</category><category>Rajia-Harun</category><category>Satire</category><category>Sound in Indian Cinema</category><category>Sun</category><category>alarm</category><category>school</category><category>sensuous</category><category>sunita</category><title>सोचालय</title><description>I do not expect any level of decency from a brat like you..</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (सागर)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>275</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><copyright>MUSIC, PICTURES &amp; EDUCATIONAL CONTENT IN THIS BLOG ARE USED FOR EDUCATIONAL, ENTERTAINMENT, ANALYTICAL AND NON PROFIT PURPOSE. IF ANY COPYRIGHT IS VIOLATED, KINDLY INFORM AND WE WILL IMMIDIATELY REMOVE THEM.</copyright><itunes:subtitle>I do not expect any level of decency from a brat like you..</itunes:subtitle><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-8279983303666927727</guid><pubDate>Sat, 16 Apr 2016 15:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2016-04-16T20:51:00.396+05:30</atom:updated><title>उसने दिल पर चीरा लगाकर उसमें अपने होंठों का प्राणवान चुम्बन के बिरवे रोप दिए।</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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सौ तड़कती रातें हैं फिर एक मिलन का दिन है। एक हज़ार बद्दुआएं हैं, फिर नेमत की एक घनघोर बारिश है। बारिश कम है जीवन में, प्यास अधिक। इतनी अधिक कि कई बार बारिश के दिन भी प्यास नहीं बुझती। लगातार लगती प्यास हमें मारती है, पत्थर बनाती है। सूखे प्यास का नमी भरा एहसास बारिश वाले दिन ही होता है। दरअसल आज जब मेरी प्यास बुझ रही थी तब मुझे अपने प्यासे होने का सही अर्थ संदर्भ सहित समझ में आया।&lt;/div&gt;
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उसका हाथ अपने हाथ में लिया तो एक ढाढस सा लगा जैसे कोई एक सक्षम व्यक्ति कारगर उपाय बता रहा हो। वो अनपढ़ जाने किस तरह की शिक्षित है कि वह मुझ जैसे अहंकारी में भी कृतज्ञता का भाव पैदा कर देती है।&lt;/div&gt;
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हमने बहुत कोशिश की एक होने की। लेकिन इसी प्रयास में हमारा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि हमें एक दूसरे की जरूरत हमेशा रहेगी और हम अधूरे ही रहेंगे। यहां तक कि जिस जिस चुंबन में हमने अपने आप को पूरा समेट कर एक दूसरे में उड़ेल दिया, वहीं वहीं हमें अपने विकलांगता का एहसास हुआ।&lt;/div&gt;
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कोई मां बाहर अपने बच्चे को मार रही है। बच्चा ज़ोर ज़ोर से किकियाए जा रहा है। मां गुस्से में उसे और धुन देती है। बच्चे के रोने में चिल्लाहट बहुत है। एक घौलाती हुई वेदना। चीत्कार जिसे शब्द नहीं मिल रहे हैं। बच्चा बेबस हो दोनों बाहें पसार मां की ओर आना चाह रहा है। आंखें सजल हैं लेकिन उसमें &amp;nbsp;आंसू के नए नए खेप नहीं आ रहे हैं। वह अपने आंसू बचा रहा है कि जब मां उसे फिर से खींच कर अपने कलेजे से लगाएगी तब वह जाने कहां से आंसूओं का अंबार लाएगा और रोने का सही मतलब समझाएगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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मैं भी तुम्हारे सामने ऐसे ही होता हूं रानी।&lt;/div&gt;
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प्रेम में जब आज हम लबालब हुए, दुनिया थोड़ी और सहन करने की ताकत आई।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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एक बैले डांसर का सा शरीर सौष्ठव है तुम्हारा। नाभि से तरंग उठता है, नितंब में उद्वेलन होता है। नाक फड़फड़ाती है और प्रेमी झंकृत हो जाता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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प्रेम नृत्य है और हर प्रेमिका एक नृत्यांगना है।&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2016/04/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>7</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-1982556125681533146</guid><pubDate>Sun, 24 Jan 2016 10:02:00 +0000</pubDate><atom:updated>2016-01-24T15:32:48.342+05:30</atom:updated><title>कुछ खयाल</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;br /&gt;चाय के कप से भाप उठ रही है। एक गर्म गर्म तरल मिश्रण जो अभी अभी केतली से उतार कर इस कप में छानी गई है, यह एक प्रतीक्षा है, अकुलाहट है और मिलन भी। गले लगने से ठीक पहले की कसमसाहट। वे बातें जो कई गुनाहों को पीछे छोड़ कर भी हम कर जाते हैं। हमारे हस्ताक्षर हमेशा अस्पष्ट होते हैं जिन्हें हर कोई नहीं पढ़ सकता। जो इक्के दुक्के पढ़ सकते हैं वे जानते हैं कि हम उम्र और इस सामान्य जीवन से परे हैं। &lt;br /&gt;कई जगहों पर हम छूट गए हुए होते हैं। दरअसल हम कहीं कोई सामान नहीं भूलते, सामान की शक्ल में अपनी कुछ पहचान छोड़ आते हैं। इस रूप में हम न जाने कितनी बार और कहां कहां छूटते हैं। इन्हीं छूटी हुई चीज़ों के बारे में जब हम याद करते हैं तो हमें एक फीका सा बेस्वाद अफसोस हमें हर बार संघनित कर जाता है। तब हमें हमारी उम्र याद आती है। गांव का एक कमरे की याद आती है और हमारा रूप उसी कमरे की दीवार सा लगता है, जिस कमरे में बार बार चूल्हा जला है और दीवारों के माथे पर धुंए की हल्की काली परत फैल फैल कर और फैल गई है। कहीं कहीं एक सामान से दूसरे सामान के बीच मकड़ी का महीन महीन जाला भी दिखता है जो इसी ख्याल की तरह रह रह की हिलता हुआ दिखता है। उस कमरे की दीवार हमारा माथा है। हमारे माथे की शिकनें यही चढते उतराते जाले हैं। बहुत एकाग्रता से आधी रात को देखने पर यह समुद्र में उठते ज्वार भाटे की तरह दिखते हैं। घटनाएं और उसमें उठाए हुए हमारे कदम इनमें नज़र आते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;दरअसल इस वक्त का आईना दृश्यों से भरा हुआ एक खाली ऑब्जेक्ट है। आईने में हमेशा कोई प्रतिबिंब होता है और भौतिकी के कई अध्याय तो आईने के लिए गुण अवगुन से अटे हुए हैं। क्या जीवन पर कोई साइंस लागू हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;इमोनश्नल होना अपने साथ बहुत सारी प्रैक्टिल प्राब्लम लेकर आता है। बावजूद इसके, इसके बगैर मनुष्य, मनुष्य नहीं हो पाता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;कई बार ऐसा लगता है कि 30 की उम्र में मैं जीवन के अंतिम घेरे पर खड़ा हूं। यहां से बहुत सारी चीज़ों के लिए पछतावा भी है, अपनी अज्ञानता का एहसास भी और अगर फिर से उसे सुधारने का अवसर मिले तो इसका गाढ़ा ‘काश’ भी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;कई बार हमारे होने के की शिनाख्त जल्दबाजी में लिए गए चुंबन की तरह महबूब के लिपस्टिक के घसीटे गए निशान में भी रह जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;होठों की भी अजीब आदत है। इसे चाय का स्वाद पता होता है, दोहराव का शिकार ये कभी कभी मेरे अंदर यह भरम डालता है कि शायद कप पर होंठ लगाने और चाय की सिप उठाने से ठीक इसका मिलन हो जाता है। दोहराव की क्या यही आदत प्रेम है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;इस दुनिया में जीना सरल हो जाए, लोग अपने शौक पूरे करते हुए पुरसुकून तरीके से जी सकें। आती जाती सांसों पर किसी तरह का कोई भार न लगे। जीवन उधार न हो। इतनी सी इच्छा इस इतवार सर उठा रही है।&lt;br /&gt;ज़मीर अधिक दिन तक सोया नहीं रह सकता। इसकी मौत अपनी हत्या है। एक लोलुप लिजलिजी सी देह जो जब हरकत करे तो हाथ पैर, उंगलियां नहीं बल्कि अपने अपराध की सज़ा में घिसटती कोई काला साया लगे। &lt;br /&gt;मैं अक्सर खुद को एक यात्रा में पाता हूं जहां बस यह समझना है पेड़ों की हिलती टहनियां मुझे विदा कर रही है या मेरा स्वागत कर रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;प्रकृति और स्त्री से मैं कभी नहीं ऊबता हालांकि दोनों एक दूसरे का ही रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;प्रतीक्षा में आदमी को पिता का कंधा हो जाना चाहिए। वह प्रशांत गर्दन, डोलते जहाज के उस दुधमुंहे लंगर की कड़ी जैसा होता है, जो ज़मीन से लग जाना चाहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;मां के अंतर के बारे में मैं कुछ नहीं जानता बजाय इसके कि मैं उससे सटा रहना चाहता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2016/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-6138425536310220232</guid><pubDate>Thu, 31 Dec 2015 14:51:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-12-31T20:21:05.531+05:30</atom:updated><title>झूलते हुए रस्सी में मरोड़ बनी रहती थी, पकड़ थी कि ढीली पड़ जाती थी।</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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एहसास में बने रहने का नाम जिंदगी है वरना तुम पत्थर हो। गलतियां करो, और पछताने से ज्यादा रोया करो। उस शाम जब तुमने जब ये कहा था झील में किसी ने पत्थर फेंका था, कुछ पानी दो गुच्छे ‘टुभुक’ की आवाज़ के साथ उछले थे। बात सच्ची थी। मुझे अब भी याद है। दिन भर की हंसी मजाक के बाद यह पहली गंभीर बात तुमने कही थी जो तुम्हारे हिसाब से दिन का पहला मजाक था। तुम्हारे मंुह से जब भी इस तरह की बात निकलती थी, तुम हथेली से मुंह दाब कर बेतहाशा हंसती थी। अचानक से तुम्हारे ऐसा बोलने के बाद भी तुम आदतन हंस हंस कर दोहरी होने लगी थी।&lt;/div&gt;
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दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं एक जो लम्हे को जी कर आगे बढ़ जाते हैं, उन लोगों के लिए जो इसे अपने मन में टांक लेंगे। दूसरे टाइप के लोग पहले में ही आ गए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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तुमने यह बात जब मुझसे कही थी तो मेरे दामन से उम्मीद का आखिरी सिरा भी छूट रहा था। मैंने भी आदतन तुम्हारी इस बात को नहीं माना। इस मामले में भी दो तरह के लोग होते हैं। एक समझाने मात्र से समझ जाने वाले। और दूसरा टाइप वाले में मैं हूं - मुझे ठोकर खाने, खाते जाने, चीज़ों को उसके हाल पर छोड़ देने और अगर हो पाया तो समय हाथ से निकलने के बाद खुद ही सुधरने की आदत है। लोगों का सब्र चूक सकता है मुझे समझाते समझाते।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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मैं तुम्हें निराश नहीं करना चाहता लेकिन मेरे अंदर का अंधेरा खत्म नहीं हो रहा है। सवालों के जवाब तरतीब से नहीं मिल रहे। किसी से वाजिब तरीके से प्रश्न भी नहीं पूछ पा रहा हूं। कभी कभी कुछ उठता है और अपने ही अंदर लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। मैं न चाहते हुए भी अपने रास्ते में खुद भी दीवार बन गया हूं। चश्मा धंुधला पड़ गया है मेरा। अजीब बात है ऐसे इलाके में हूं जहां रोज़ 4 वक्त अजान सुनता हूं। लेकिन इनर कॉलिंग नहीं आ रही है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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मैंने देख लिया और कहीं मेरी तृप्ति नहीं है। और टूटे फूटे ढंग से ही सही यही काम मैं थोड़े मन से कर पाता हूं। मेरे जिंदा रहने के लिए लिखना बहुत जरूरी है। लिखना मेरे लिए अच्छा है। यही मेरा मुक्ति मार्ग है।&lt;/div&gt;
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मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाला साल मुझसे मेहनत करवाएगा, विज़न साफ होगा और मैं लिख सकूंगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/12/blog-post_31.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-3502851825538924533</guid><pubDate>Sun, 27 Dec 2015 15:28:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-12-27T20:58:29.090+05:30</atom:updated><title>लोग क्यों मरते हैं</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
बाबा लोग मरते कैसे हैं? क्या किसी प्रतीक्षा में? चमत्कार के? आत्मीय मिलन के? किसी से कुछ कहने के? कैसे मरते हैं?&lt;br /&gt;क्यों देखने में ऐसा लगता है कि वो एक एक दिन के साथ पक रहे हैं। उनकी आंखों पर जैसे एक मसनुई सी चमक की परत चढ़ी जाती है। क्यों वे अपने हृदय की गहराई से हमें कॉल तो करते हैं लेकिन हम उन्हें सुन कर भी अनसुना कर जाते हैं। ऐसा नहीं है कई बार लोगों की पुकार जिसे हम सच्ची पुकार कह सकते हैं, सुनाई दी है। ऐसा क्यों होता है कि आड़े वक्त हम प्रमादवश किसी दो कौड़ी के क्षणिक रिश्ते, किसी भौतिक वस्तु की लालच में उस व्यक्ति को सरासर नज़रअंदाज कर जाते हैं जिन्हें हमें कभी किसी खाई से सरपट बाहों में भरकर उठा लिया था। यह खाई कैसी जानलेवा खाई थी न। जानलेवा शब्द गलत है यहां लेकिन एक पूरे समूचे संभावनाशील चीजों का चले जाना कितना त्रासद है न! जो हमारी आत्मा को बचा लेते हैं और वापस से हमें सुरक्षित हमारे ही हाथों में सौंप देते हैं हम कैसे उससे विमुख हो जाते हैं। क्या हमें पता होता है कि जीवन दर्शन में वो हमारा पिता है और हमे अउस पिता के सामने अपने छुटपने का अहसास होता है। कई बार नज़र चुराने की क्रिया की शुरूआत आत्मज्ञान से ही उपजती है। &lt;br /&gt;हम भूल जाते हैं कि हम खुले चबूतरे पर घायल, कराहते कबूतर थे जिसे सामान्य पक्षी भी डेग डेग भरकर अपने चोंच से और लहूलुहान कर रहा था, उसने सिद्धार्थ की तरह हमें उठाया, मरहम पट्टी की और सुरम्य वातावरण की कोमल हथेलियों में, नीले नभ में उन्मुक्त उड़ने को छोड़ दिया। &lt;br /&gt;ये ठीक होते ही हमें हमारे पंजों और पंखों पर इतना आत्मविश्वास कहां से आ जाता है बाबा कि हमारा एक ही क्षण में रूपांतरण हो जाता है। &lt;br /&gt;समाज में हर सहारा देने वालों का यही गत क्यों है? क्या यह एहसासबोध और ग्लानि ही हमें मारती है। या हमारी हर जीत हमें थोड़ा और पुख्ता बनाने के साथ साथ हमें अंदर से और खोखला भी करती है। क्या हम यहां सचमुच अपनी श्रेष्ठता साबित करने, अपनी महत्वकांक्षा को पोषित करने ही आए थे। क्या हर जीत हमारे अहं को चारा देने का काम करती है। &lt;br /&gt;आज मैं गीता के कई उद्धरणों से खुद को जोड़ पा रहा हूं जैसे एक क्षण में मैं करोड़ों का स्वामी हो जाता हूं और अगले ही पल दरिद्र। &lt;br /&gt;हम कैसे होते जा रहे हैं कि न किसी से खुल कर लड़ पाते हैं, न किसी से खुल कर कह पाते हैं? हमें ठीक से पोषित और शोषित होना भी नहीं आता। &lt;br /&gt;क्या किसी से बात न कर पाने की वजह से भी हम मरते जाते हैं बाबा? मरना एक दिन की तो बात नहीं होती। और मरने के प्रकार भी अलग अलग होते हैं। हम एकजुट होकर तो सांस के रूकने पर ही मरते हैं लेकिन टुकड़ों टुकड़ों में दिन में कई बार, लम्हों में बहुत बार मरते हैं। लेकिन हमें इतना नाजुक नहीं होना चाहिए और मरने के सही कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: 'Arial Unicode MS';"&gt;
 

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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/12/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-8537192375052643712</guid><pubDate>Thu, 17 Dec 2015 17:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-12-17T22:43:50.218+05:30</atom:updated><title> हमारे साथ रहो, न रहो।</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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&lt;span style="font-family: &amp;quot;arial unicode ms&amp;quot;;"&gt;&lt;br /&gt;कोई बेचैनी का परदा है जो रह रह कर हिल जाता है। खिड़की के उस पार से हवा की हिलोर उठ ही जाती है। धूल धक्कड़ से कमरा भर जाता है। इसे अपने हाल पर छोड़ दो तो हर सामान पर परत चढ़ जाती है। फिर इनके बीच से कोई सामान उठाना ऐसा लगता है हीरे की दुकान से पेंडेंट उठा रहे हों। इसी में से एक है तुम्हारी हेयर क्लिप। शार्क मछली की तरह खूंखार तरीके से दांत फाड़े हुए। अभी जिस एंगल से यह देख रहा हूं एक रूद्रवीणा रखी लगती है। ठहर गया हूं इसे देखकर। समय जैसे फ्रीज हो गया है। वक्त की सारंगी जैसे किसी नौसिखिए से एक पूरी पर अकेली तार पर अनजाने में ही बज गई हो और वह धुन दिल की टीस का तर्जुमा हो। वो धुन फिर नहीं लौटता। जानता हूं कि तुम भी दोबारा नहीं लौटोगी। दोबारा कुछ नहीं लौटता। हम फोटोकॉपी करने की कोशिश करते हैं, अपना प्रयास करते हैं और हू ब हू वैसा हो फिर से होने की कामना करते हैं। लेकिन दोबारा से वह करते हुए थोड़ा समझदार हो जाते हैं, नादानी जाती होती है। तुमने कैसा उजास भरा है मेरे अंतस में! एक समानांतर दुनिया ही खोज दी जहां हर अमूर्त वस्तु प्राणवान है। हर स्थूल चीज़ें चलती फिरती शय है। ऐसा लगता है जैसे खजाना पास ही है। एक अदृश्य सोता अब दिख ही जाने वाला है। उसकी आवाज़ दृश्य है। यहां हमारे पैरों की चर्र-पर्र की आवाज़ भी शोर लगता है। यहां हर कल्पना सच है। यहां हर सच जो अब तक मानते हुए आए हैं, एक सरासर झूठ है। मैं नहीं जानता कि इस रिश्ते का नाम क्या है। जो एक शब्द तुम्हारे मन में उपज रहा होगा वह इंसानी और साहित्यिक जगत का सबसे ज्यादा मिसकोट और मिस्यूज करने वाला संदर्भ बन गया। हमने उसकी गरिमा नष्ट कर दी है और उसे बेहद हल्का बना दिया है। हमने धरती, हवा, पानी सब दूषित किया, इसे भी। हम इसका नाम नहीं लेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-8051311024609407917</guid><pubDate>Fri, 13 Nov 2015 13:58:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-11-13T19:28:18.815+05:30</atom:updated><title>एक भारी शाम का हाले दिल</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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अपने दामन में जाने कितने दुख दबा रखे हैं आज आसमान ने कि मटमैला दिख रहा है। भादो महीने के गंगा नदी के मटमैले पानी की तरह जिसके सैलाब में ढेर सारे गति रोकने वाले पेड़ अपने जड़ समेट बह जाते हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
लेकिन बादलों में बहाव नहीं है। इसलिए आसमान ठहरी हुई है। अपनी जगह हल्की लाल बुझते बालू की तरह। भारी। और शामों के मुकाबले सर पर ज्यादा झुकी हुई। औसत गीलेपन से ज्यादा भीगे स्पंज की तरह। एक हज़ार चोट सहे हैं और सौ बात छुपाए तो एक और ही सही।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
जो मन भारी है तो इस बात कि क्यों आए दिन बताना पड़ता है। क्यों हर बार अपनी ईमानदारी साबित करनी पड़ती है। रिश्ता सिमटता है तो उसका नाम प्रेम पड़ जाता है। यह मनी प्लांट है, फैलती लत्तरों जैसा। एक पत्ते से पेड़ सकता है और पेड़ से वापस एक पत्ते के रूप में अलग हो सकता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
इंडिया हैबिटैट सेंटर की वह शाम हसीन थी। सर्दी अभी आई न थी और गर्मी जा रही थी। शाम दो मौसिमों के मिलने और बिछड़ने का जंक्शन था। मैं गर्मी के रूप में अपने दिल में उमस भरे उससे मिलने आया था। और वो जैसलमेर के खुले आसमान तले औंधी लेटी रेत के ठंढे धोरों की तरह। मेरी बड़ी से बड़ी चिंता उसके हंसी के आगे धूल थी। जिन बातों और हादसों से मैं सिगरेट के कश पर कश खींच कर अपने दिल को जलाता था वह अपनी आंखों के पोर में काजल की लकीर खींच कर, अपने गाल पर झूलती लट को बार बार कान के पीछे ले जाती।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
जिंदगी के जेल में मुलाकाती का समय तय था। वस्ल का वक्त, तवे पर पिघलते मख्खन सा था। उसका कागजी दुपट्टा भी तो ऐसा ही था। हाथ से निकल निकल जाता था। कुछ लम्हा जब वो मेरी मुठ्ठी में रहता तो पसीने से हाथ गीले हो जाते और लगता पटना में कोई रंगीन सिनेमा देख रहा हूं और हाथ में उस फिल्म का टिकट भीग कर गल रहा है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
मैं कई बार अपने दायीं हाथ को उसका हाथ मानकर पकड़ता हूं। अपनी कलाई पर उसकी उंगलियां टटोलता हूं। अपनी ही कलाई को उसकी मानकर उसे चूमता हूं। क्या वह अपने पिंजड़ों पर मेरे तर्जनी उंगली से ठक-ठक करने की आवाज़ नहीं सुनाई देती होगी? लाख चाहकर भी दो जिस्म एक जान नहीं हुआ जा सकता।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
उसकी हंसी ने मेरे सीने पर दांत गड़ाए हैं। मुझे उसकी हंसी से कटना अच्छा लगता है। वह किसी और की है इस ईर्ष्या के मारे जलता मैं, अपना बहता लहू देखकर संतुष्टि से भर जाता हूं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
विरह में जलना अच्छी अनुभूति है। यह पाप करने के बाद पश्चाताप करने की तरह है। अपने अंदर देवत्व पाने जैसा है। फिल्टर होने की तरह है। औरों से कुछ अलग महसूसियत रखने जैसा है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
क्या मैं अपनी पलकें उलट कर तुम्हारे माथे पर रख दूं रानी !&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
हंस दो जो तुम अगर तो आसमान में ठहरे इन बादलों में बहाव आए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/11/blog-post_13.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-5983528823059256097</guid><pubDate>Thu, 05 Nov 2015 16:51:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-11-05T22:25:17.773+05:30</atom:updated><title>माचिस की सुग्गा नाक पर का मसाला </title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;span style="font-family: &amp;quot;arial unicode ms&amp;quot;;"&gt;
 

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&lt;br /&gt;
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गुस्साती है वह तो जैसे आम के मीठका अचार से चाशनी सूख जाती है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
पूरी जल चुकने के बाद काठ पर खत्म हुई मोमबत्ती बैठ जाती है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
छेड़ते जाओ उसको हर मुलायम परत उघड़ती है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
मुंह फुलाना भी उसका मेरी उंगलियों को मुलायम बनाता&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
उसके गुस्से की ज़रा ज़रा कागजी चुप्पी मेरे दिल पर पैठ जाती है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
देर तक काबिज रहता है पोरों पर वह एहसास मोम का&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
मैं लाख जतन करता हूं मनाने का उसको&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
त्यौरियां तब थोड़ी और चढ़ आती है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
ज़रा सा वह और हसीन हो जाती है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
मैं ख्याल करता हूं कि मुझे उसका अधखुला सीना दिखता है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
कई बातों को जब्त किए जो ऊपर नीचे होता रहता है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
उस वादी से अनकहे शिकवों का धुंआ उठता रहता है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
मैं शब्द तलाशता रहता हूं बोलने को फिर से उससे&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
वह देर तक बात बनने नहीं देती है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
चाहता हूं समय के प्रेशर कुकर में प्रेम की दाल गले&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
मगर वह गलने नहीं देती है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
हाथ रखूं हाथ पर उसके झटक देती है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
नीचे झुक कर जो उसकी आंखों में झांकूं तो मुंह फेर लेती है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
उसे मनाने के लिए मैं नए सिरे से कोई बात उठाता हूं&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
और उसके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश करता हूं&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
जानती है वह शायद ये भी&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
कि मेरी हथेली के स्पर्श से उसके अंदर का गुस्सा थमने को होगा&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
मैं गुस्से की लौ उसकी जितना कम करना चाहता हूं&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
रास वह अपनी नाराज़गी की और ऊंची किए जाती है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
दिन बीतने को है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
उसकी चुप्पी कायम है&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
और मेरा दिल......&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
गुलाब के कांटों में फंसकर फट गए दुपट्टे सा फड़फड़ा रहा है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-5532065919863638968</guid><pubDate>Thu, 29 Oct 2015 13:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-10-29T19:24:34.171+05:30</atom:updated><title>विलंबित ताल</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;span style="font-family: 'Arial Unicode MS';"&gt;
 

&lt;/span&gt;
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&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi2kuFjgWBJhfd3fvMUEMtf-RSTKMmec_V2yrPU9rxShfQImbb-ETIdOM9F5ekQlvv5pyaa37uYfOmorZVdKWaaOsBO9GuMa2qS_sAzBwnvTfxiSWkFjBWvijbBKoM6lzmUl5O1cpeZboA/s1600/dscf0652_crop_480x360.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi2kuFjgWBJhfd3fvMUEMtf-RSTKMmec_V2yrPU9rxShfQImbb-ETIdOM9F5ekQlvv5pyaa37uYfOmorZVdKWaaOsBO9GuMa2qS_sAzBwnvTfxiSWkFjBWvijbBKoM6lzmUl5O1cpeZboA/s320/dscf0652_crop_480x360.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
हर ताल विलंबित है। हर कदम लेट है। कदम के रूप में एक पैर उठता है तो दूसरी ज़मीन पर रखने की दर लेट है। पेड़ों के पत्ते एक बार जब झूम कर बांए से दाएं जाते हैं तो उनका फिर से दांए से बांयी ओर जाना लेट है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
आदमी घर से निकलने वाला था पर लेट है। स्टेशन से गाड़ी खुलने में लेट है। बहुत मामले रूके पड़े हैं और उनपर कार्यवाई लेट है। दफ्तर में टेबल से फाइलों का सरकना रूका है। चमत्कार होना रूका हुआ है। प्रेम होना तक मुल्तवी है। की जा रही प्रतीक्षा भी होल्ड पर है। बारिश रूकी हुई है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
जाम से शहर रूका हुआ है। गाए जाने वाला गीत भी जुबां पर रूका है। किसी से कुछ कहना रूका है। किसी से झगड़ लेने की इच्छा रूकी है। किसी के लिए गाली भी हलक में रूकी हुई है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
बाप से बहस करना रूक गया है। मां को घर छोड़कर भाग जाने की धमकी भी पिछले कुछ महीनों से नहीं दी गई है। लिखना रूका है। पढ़ना ठप्प है। जीना रूका पड़ा है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
पेड़ों पर के पत्ते रूके हुए हैं। आसमान में चांद रूक गया है। किसी का फोन पर हैलो बोलकर रूकना, रूक गया है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
कुछ हो रहा है तो उसका एहसास होना रूक गया है। सिगरेट जल्दी खत्म होना रूक गया है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
बारिश अपने बरसने में रूकी है। ऐसा लगता है कि पूरे शहर में इंतज़ार की बारिश है। सभी अपनी चाहत की दहलीज पर छाता ताने खड़े हैं। वह कभी आसमान देखता है तो कभी बाहर का मौसम। फिर अंदाजे लगाता है और साथ वाले इंतज़ारी को अपने अनुमान बताता है। मन में यह दृश्य भी रूक गया है कि कहीं उसका कोई मुलाकाती भी रूका होगा।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
और इसी दृश्य का रूकना भी रूका हुआ है। प्ले बटन आंखों से ओझल है और पॉज रूका पड़ा है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
उम्र रूकी है। गणना करना रूक गया है। अच्छा-बुरा सोचना भी रूका है। नफे नुकसान का हिसाब लगाना भी बंद है।&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
रूक जाने की इच्छा गलत समय तो जरूर है मगर रूकने की यह चाहत बरसों से अंदर रूकी थी। मन वहीं रूका है जो पल अतीत में तेज़ी से चल रहा था। उनमें पंख लगे थे और जिसके रूक जाने के बारे में भी हम सोच नहीं पा रहे थे।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
कुछ लम्हें रूक गए हैं और उनमें जीने की चाहत अंदर रूकी पड़ी है। बस यही चल पड़ने की घड़ी है जो रूकना चाहता है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/10/blog-post_29.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi2kuFjgWBJhfd3fvMUEMtf-RSTKMmec_V2yrPU9rxShfQImbb-ETIdOM9F5ekQlvv5pyaa37uYfOmorZVdKWaaOsBO9GuMa2qS_sAzBwnvTfxiSWkFjBWvijbBKoM6lzmUl5O1cpeZboA/s72-c/dscf0652_crop_480x360.jpg" width="72"/><thr:total>31</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-5949963195511309550</guid><pubDate>Sat, 10 Oct 2015 15:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-10-10T21:12:01.252+05:30</atom:updated><title>देख तो दिल कि जां से उठता है</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;
देख तो दिल कि जां से उठता है&lt;/blockquote&gt;
&lt;blockquote class="tr_bq"&gt;
ये धुंआ कहां से उठता है&lt;/blockquote&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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कई बारी यह लगता है कि जैसे दिल पिछली रात ही जला दी गई बस्ती है जहां अगली सुबह हम राख चुनने जाते हैं। यादें हैं कि मरती नहीं, अनवरत सताती है। और जो भूलने की कोशिश करो तो कोसी नदी के सैलाब की तरह दोबारा ज्यादा खतरनाक तरीके से लौटती है। और अगर याद करने बैठो तो उनके संग बॉटल में लगे मनी प्लांट की तरह कोने निकलने लगते हैं। सिरा से सिरा जुड़ने लगता है और लत्तर बनने लगता है। कौन सी कानी कहां जाएगी और जाकर किससे मिल जाएगी कहना मुश्किल है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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हम अपने दिमाग की तरह कहानियों का उपयोग भी बदमुश्किल एक दो प्रतिशत ही कर पाते हैं। वजह - कहानियों के भीतर कहानी। कई सतहों पर कहानी। परत दर परत कहानी। चीज़ों को श्वेत और श्याम में अगर हम देखने का हुनर विकसित कर लेते हैं तो ज़रा सा ज्यादा महसूस करने की भावना हममें उन विषय वस्तु के प्रति सहानुभूति भी जगा जाती है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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यह हमारे महसूस करने की ही ताकत है कि हम बिना मजनूं हुए मजनू का दर्द समझ सकते हैं, बिना जेबकतरा हुए जेब काटने वालों की मानसिकता समझ सकते हैं। इसलिए हमें जजमेंटल नहीं हुआ जाता है। हम अपने दायरे में रहते हुए भी रोमियो से कम प्रेम नहीं करते और रांझे जैसा ही विरह का दर्द समझते हैं। यही वजह है कि हम एक ठरकी आदमी द्वारा भी उसके खुद को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने भर से वो हमारे दिल पर असर कर जाता है।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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तो मन जो है चक्कर लगाने का नाम है और दिल कन्फ्यूज होते रहने का। जिंदगी कहीं जाकर नहीं लगती कि अलां जगह जाकर यह अपने सर्वोत्तम रूप में होगी। यह ऊंचाई पर जाकर मरने वाली बात होती है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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आजकल आध्यात्मिकता भी बड़ी ज़ोर मारने लगी है मेरे अंदर। अब जैसे शंकराचार्य से सुनी कहानी बहुत हांट करती है कि दिन भी भर ज़मीन पर अपना आधिपत्य करने वाला आदमी जब शाम को मरा तो उसकी जरूरत सिर्फ उतने भर ज़मीन की हुई जितने पर उसने दम तोड़ा। इस तरह की कई और लड़ाईयां मेरे भीतर इन दिनों लगातार चल रही है। ऐसा नहीं है कि यह मुझे कन्फ्यूज कर रही है लेकिन ऐसा है यह मुझे तंग कर रही है। लगातार अपना ध्यान मेरी ओर खींच रही है। मैं समय से पहले बूढ़ा होने की ओर अग्रसर हूं। दोस्त कहते हैं मैं जवान हुआ ही नही। बचपन के बाद सीधे बुढ़ापा आ गया।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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प्रेम भी बूढ़ों की तरह ही करने लगा हूं। हालांकि वासना के क्षणों में वह उबाल त्याग नहीं पाया हूं लेकिन बाकी सारे लक्षण, एक दूसरे के प्रति परिचय भरा समर्पण और शायद प्रेम से ऊपर की जो अवस्था और साथ होने भर की जो जरूरत होती है उसे महसूस करता हूं। आगत की प्रतीक्षा ने मुझे पत्थर बना दिया है। उम्मीदें जड़ हो चली हैं। ऐसा लगता है अगर निर्जीव चीज़ों को भी सहलाता रहा तो शायद वो जीवित हो उठेगी या ऐसा करते करते खुद मैं ही निर्जीव हो जाऊंगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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इधर पिछले महीनों से सुनने की आवृत्ति भी बढ़ गई लगती है। मधुर संगीत पसंद है लेकिन इस दुनिया में जो भी बेसुरा है वह कानों को अप्रिय लगता है। हर आवाज़ अपसे स्तर से ज्यादा बढ़कर मेरे कानों में आती है और मुझे वह टाइमलाइन पर किसी फटे हुए धब्बे की तरह, गाढ़े घर्षण के रूप में खुली दिखाई देती है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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कुल मिलाकर अपनी हालत बरसात के दिनों में हवा से बचाए जाते सीमेंट की बोरी की तरह है जिसमें लाख कोशिशें के बाद भी हवा लग ही जा रही है और इसके बायस अब वो बोरी यहां वहां से जम रही है। कहीं से फट कर कभी बुरादे की तरह उड़ता हूं तो कहीं वे आपस में मिलकर मोटे मोटे गांठ में बदल रहे हैं। कहीं से वे चखने पर मिट्टी का सौंधा स्वाद लिए हुए है तो कहीं कहीं वह कंकड़ की तरह सख्त और बेस्वाद हो गया है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/10/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-3524866395315125572</guid><pubDate>Tue, 06 Oct 2015 15:06:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-10-06T20:36:57.255+05:30</atom:updated><title>हिसाब</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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आखिर क्या जोड़ता है हमें। हमारे अंदर का खालीपन। या एक दूसरे के अंदर जब्त दर्द को हम कुरेद देते हैं। ऐसे तो कोई हर्ट नहीं करता जैसे तुम मुझे कर देती हो। ऐसे तो कोई नहीं छूता जिससे मैं तुम्हारी राह में बिछ बिछ जाता हूं। ऐसे तो कोई इस्तेमाल नहीं करता कि इस्तेमाल होते वक्त तो तकलीफ होती है और तुम बेहद थकाती भी हो लेकिन उसके बाद यह सोच कर अच्छा लगता है कि मुझे तुम्हारे द्वारा ही इस्तेमाल होना है और तुम ही मुझे इस्तेमाल के दौरान सबसे अच्छा एक्सप्लोर कर पाती हो।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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कभी कभी ऐसा लगता है जैसे किसी लंबी यात्रा पर जाने वाला हूं। या बिछड़ने वाला हूं तुमसे। या हमारे बीच कल को एक बेहद लंबी चुप्पी पसर जाएगी। कि हम एक दूसरे से बोलना बंद कर देंगे लेकिन एक दूसरे से हमारी उम्मीदें खत्म नहीं होंगी। लेकिन ये उम्मीदें हैं भी तो कैसी... एक दूसरे को याद करने की, मेरे लिखने की, तुम्हारी आवाज़ सुनने की, साथ समय बिताने की, जाने क्या क्या आपस में बातें करने की.... तुम्हें देख लेने की.... तुम्हारे लिए रोने की, तुम्हीं से हर्ट होने की....&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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कई बारी लगता है तुम किसी अजाने देस के अंचल में गाई जाने वाली लोकगीत हो जिसकी धुन मुझे खिंच गई लेकिन मैं उसे समझ नहीं पाया। उसका अर्थ मुझे नहीं पता। मैं कहां कुम्हार का बेटा जो नौसिखिया है और तुमएक पका हुआ मटका जो टिमक टिमक कर बजता है लेकिन कोई तो रिश्ता है ही हमारे बीच। तुम्हें बरतने का हुनर मुझमें नहीं। एक एक अनकही चाहत तो है। चाहत की एक अदृश्य डोर तो है। जो बातें मेरे द्वारा कही गई है। और वो तेरे दिल में वैसे का वैसा उतर गया है वह और कहां से आएगा। इसके ठीक उलट मैं भी कहां से वैसी कोई दूसरा खोज सकूंगा जो लगभग तोड़ ही दे और फिर हौले हौले उस पर अपने होठों से बोसे दे। वो नर्म नर्म इलाज कहां मिलेगा मुझे।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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समझदार उम्र के चाहत की अपनी बेबसी होती है। एक दूसरे के उम्र में हम बाधक नहीं बनना चाहते। एक दूसरे के साथ रह नहीं सकते। एक दूसरे के बिना भी नहीं रह सकते। अय्याशी और धोखा हमसे हो नहीं पाता। दिल की बात किसी से कह नहीं पाते। दुनिया को जजमेंटल होने से फुर्सत नहीं। कुलमिला कर दिल ही में एक बाज़ार खुल जाता है और हम मूक होकर तमाशा देखते रहते हैं। हम खुद अपने आप पर हंसते हैं, रोते हैं, किलसते हैं और अपनी ख्वाहिशों पर अंगारे डालते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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आखिर क्यों नहीं कुछ और जगह ले पाता तुम्हारी? एक बार तुम्हें देख लेने के बाद हमें जाने किस सकून की राह दिख गई थी। एक बार तुम्हारा स्पर्श होने के बाद कौन सी छुअन ऐसी जागी कि कहीं भी करार नहीं आता। एक बार तुम्हारी देह गंध मिल जाने पर कौन सी आदिम प्यास जग गई कि हम पढे लिखे और विवेकवान होकर भी प्रेम में एक जंगली बैल की तरह हो जाते हैं।&lt;/div&gt;
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तुम एक सांस हो। जीवनदायिनी। लेकिन तुम्हीं बेसांस भी करती हो। हर निकलते सांस के साथ लगता है जैसे अंदर फंसकर टूटा हुआ कांटा निकल गया हो। हम उम्र के साथ और भारी होते जाते हैं। अपने इन तकलीफों को कहां रख आएं हम कि जब जब लगता है अब जीना आ गया या अब हमने खुद पर काबू पाना सीख लिया कि तभी वो सैलाब दूगनी तेज़ी से हमारे ऊपर कहर बनकर टूटता है। बताओ रानीजान, ऐसा क्यों होता है कि कठघरे में हर बार हम अकेले ही नज़र आते हैं? कि हम हिसाब देते देते बेहिसाब हो जाते हैं तब भी हिसाब देने को हमें उतारा जाता है।&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/10/blog-post_6.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-9040628611628529497</guid><pubDate>Fri, 02 Oct 2015 14:35:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-10-02T20:05:36.773+05:30</atom:updated><title>प्रति-शोध</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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ऐसा लगा कि तुमने सरे बाज़ार मेरे जवान और कोमल सीने से दुपट्टा उड़ा दिया। उसी सीने का ख्याल कर तुम किसी अंतरंग पल मुझसे कहते थे कि तुम्हारा यह छुपा हुआ सीना मुझे शरीर बनाता है। आज सबके सामने जो तुमने यूं उघाड़ा तो मैं एक ही पल में जीते जी मर गई। लगा किसी ने तीन सेल वाली टार्च की बत्ती आंखों में ही जला दी। अंधी हो गई अपमान और शर्म के मारे।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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मेरा कंधा झूठा होकर सिकुड़ गया था। एक स्त्रीसुलभ परदा। निर्लज्जता से लोहा लेती लाज। ऐसी लाज जो हारती नहीं बस बेबस महसूस करती है कि तुमने बराबरी से युद्ध नहीं किया। तुमने युद्ध के नियम तोड़े। दरअसल तुम्हें अपनी तय हार की जानकारी थी। तुम्हें पता था कि तुम देर तक टिक नहीं सकोगे। ऐसे में अपने मरदानेपन के खोखले अहंकार में चूर होकर तुम ऐसे चाल चलकर स्वयं को विजेता समझते हो। हर बार स्तंभन को तैयार तुम्हारा लिंग तुम्हें मदांध करता है।&lt;/div&gt;
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लेकिन,&lt;/div&gt;
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मैं पुर्ननवा हूं हर पल नई हो जाने वाली। चार ही दिन बाद जब मुझे किसी महफिल या जलसे में देखोगे तो तुम्हारे अंदर पलने वाली व्यस्नी मछली तड़प उठेगी। फिर वैसी ही हूक उठेगी। यह देखकर और तिल मिल मरोगी कि आज दुनिया जिसके लिए आहें भर रही है उसी को तुमने नीलाम किया था। फिर पहले से भी ज्यादा जंगली और वहशी होकर मेरा ख्याल करोगे। और पछताआगे कि साली के साथ अलां अलां काम नहीं किया था अबकी हाथ लगे ये सारे काम ऐसे ऐसे करूंगा। मैं नहीं जाऊंगी बदला लेने न ही किसी को भड़काऊंगी। तेरा अपना अवसाद ही मारेगा तुझे। बूंद बूंद भभकते तेज़ाब गिरती रहेगी तुझ पर।&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/10/blog-post_2.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-4639335806219672047</guid><pubDate>Thu, 01 Oct 2015 15:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-10-01T20:46:38.720+05:30</atom:updated><title>प्रतीक्षा</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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जीवन जीते जीते हम कितनी चीज़ों से मोह लगा बैठते हैं। ख्वाहिशें हैं कि कभी खत्म नही होती। हर मुहाने पर जाकर सोचते हैं कि काश थोड़ा और होता... कभी किसी रिश्ते में... कभी कोई मीठा सा लम्हा.... वक्त है कि ऐसे पलों पर भागा जाता है और रेशम पर रेशम की तरह फिसलता जाता है। हम यह सोचते हैं कि ज़रा और चलता।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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हमारा दिल भी अजीब होता है। हम किसी न किसी मोड़ पर किसी न किसी को चांस देते हैं। कभी घटनाओं के दोहराव में तो कभी अनुभव के लिए तो कभी एक उम्मीद में जो हमारी आत्मा में रोशन राह भर दे। आत्महत्या करने के कई मौके आते हैं और अगर अभागे न हुए तो कोई दिलबर हमें फिर से मिलता है। हम खुद को प्यार के मौके भी देते हैं। कुछ कम देते हैं और मेरे जैसा आदमी ज्यादा देता है। दिल कभी नहीं भरता। यह शाश्वत भूखा और प्यासा है। हर वक्त थोड़ा और मोहलत मांगते हम न जाने कितनी ही घटनाओं, संबंधों, दृश्यों से अपना दिल जुड़ा लेते हैं और यह मोह हमारे लिए परेशानी का सबब बन जाता है।&lt;/div&gt;
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मैं यह क्यों लिख रहा हूं पता नहीं। मन में किसी स्तर पर शायद चल रही है यह बात इसलिए लिख रहा हूं। इसकी शुरूआत क्या है, क्यों है, और इसकी अगली कड़ी क्या है नहीं जानता। मैं कामना में डूबा एक भोगी आदमी हूं जो अपनी वासनाओं में ही लिप्त रहता है। भला मेरा इस तरह से सोचने का क्या मतलब। मैं क्यों अपने ट्रैक से हटकर सोच बैठा। मेरी चाहतें, कामनाएं, वासनाएं तो चिरयुवा हैं। वह इतनी पिपासु हैं कि कभी शांत नहीं होती और वह अपने दोहराव और घेरे में ही घूमती रहने के बावजूद नहीं थकती।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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क्या मैं बूढ़ा हो रहा हूं। या मैं थकने लगा हूं। क्या मेरी ऊर्जा जाती रही है। उम्रदराज़ लोग मुझे शुरू से आकर्षित करते रहे हैं कहीं यह चाहत ही तो मुझे ऐसा नहीं बना रही। या कुछ चीज़ों की प्रतीक्षा ने कहीं मेरी आंखों को पथरा तो नहीं दिया। मेरी सूनी आंखें आखिर किसकी प्रतीक्षा करती है। क्यों सारी जानकारी होने के बाद भी हम जीने के स्तर पर सामान्यों जैसा जीते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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किसी से खुलकर बात न कर पाना तो कहीं इस तरह के उलझनों का कारण तो नहीं है।&lt;/div&gt;
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जूते का सोल है जीवन। घिसा जा रहा है। हम जूते की तरह सर्वाइव कर रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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शाम का सन्नाटा फिर से काबिज है। और मेरा मन तुम्हारी ओर लौटने लगा है। दिन भर काम कर लिया मैंने। आज कल तुम ही मेरी शराबखाना हो। दिन भर के बाद की ठौर हो। मैं भी कितना मतलबी हूं। दिन में कई बार याद आने के बाद भी कुछ नहीं कर पाता हूं। लेकिन शाम होते ही तुम्हारे ख्यालों से मुझे बीयर की महक आने लगती है। तुम्हारी तस्वीर देखता हूं तो लगता है जैसे मेले में अपनी सहेलियों से छूट गई लड़की हो। आंखों में वही लहक लिए कि जो भी मिलेगा तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुंचा देगा। लेकिन मैं खुद भटका हुआ हूं घर से। खबर तो है मुझे कि तुम्हें कैसा लगता होगा लेकिन शायद पहुंचा नहीं सकूंगा। मैं तुममें अपना घर देखता हूं। तुम्हारे साथ शायद घर तलाशने की सोचूं मैं। तुम मिल तो गई हो मुझे लेकिन मुझे नहीं पता कि मुझे तुम्हारा करना क्या है। सिर्फ पाने खाने का नाम प्रेम नहीं है, अगर ऐसा होता तो मैं विजेता था। अच्छी बात यह है प्रेम में कि इसे दुनिया की नज़र से नहीं देख सकते हम। हमें एक दूसरे के लिए ही होना है।&lt;/div&gt;
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एक दूसरे को समझने को भी जरूरी नहीं मानता मैं। बस जस्ट बी विद मी।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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कभी कभी मन होता है कि तुम्हारा नाम लिखकर एक बोतल में डाल कर बस बहा दें। कभी कभी यह भी लगता है कि मैं तुम्हें संभाल नहीं पाता। तुम जहां हो वहीं, वहीं से सही हो।&lt;/div&gt;
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शाम गहरा रही है। शहर की ट्रैफिक की लाइटें लाल, नारंगी और हरी हो रही है। घड़ी साढ़े आठ बजा रही है। वह नौ भी बजा देगी लेकिन मुझे तुम्होर साथ होना है। तुम्हारी बांहों में पनाह पाना है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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प्यार में मर्द बच्चा बनता जाता है तुम मां।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/09/blog-post_30.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-3107943609808113059</guid><pubDate>Mon, 28 Sep 2015 15:28:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-09-28T20:58:41.804+05:30</atom:updated><title>जोड़े की आवाज़ </title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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कभी कभी दिमाग की नसों का धड़कना भी सुनाई देती है। घड़ी की टिक टिक की तरह बजती हुई। एक शांत शोर। सर्दी की एक शांत सुबह की तरह जब किसी अभौतिक बात पर सोच सकें। कि जैसे धूप में कुर्सी लगा कर बैठे हों और हाथ पर एक तितली मर्जी से आकर बैठ जाए। बिरंगी तितली। अपनी हर सांस के साथ पंखों को खोले और बंद करे। पंख जब खुले तो किसी कविता की किताब की जिल्द लगे। उनपर बनाने वाले की उम्दा कशीदाकारी हो। गोल गोल हाईलाटेड घेरे, साड़ी की काली किनारी, और थोड़ा ऊपर कभी नीला रंग घुलते तो कभी पीला... तो कभी रंगों में में कई रंग...। एक सपनीला संसार। जैसे पॉलिस करके खुद के रोज़ अपने घर से निकलती हो। अपने ऊपर की लिपस्टिक को और गाढ़ा करके लगाती हो। कभी जो हमारे उंगलियों को छू जाए एक कच्चा रंग हमारे हाथ पर रह जाए। उसका सिग्नेचर’..... &amp;nbsp;छूअन ऐसी जैसे किसी मेमने के कान.... कुछ चीज़ें सुभाव से ही हमारे मन को निर्मल बनाती हैं.....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ के पंख ऐसे होतें हैं जैसे सफेदी जा रही दीवार पर बैठी हो। उसकी तंद्रा भंग हुई हो वो उड़ने के लिए अपने पंखों का गत्ता खोली ही हो कि उस पर सफेदी के छींटे पड़ गए हों।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ के पंख ऐसे होते हैं - जैसे करारा कागज़ी दुपट्टा। हम अपने उंगली से उसका टटकापन महसूस कर सकते हैं। जैसे महबूबा के साथ साथ चल रहे हों... और उससे आधे इंच पीछे भी हों। और ऐसे में उसका दुप्ट्टा अपने दो उंगलियों में ढ़ील देते हुए ऐसे लपेटा हुआ हो, जिससे उनको कहीं से भी कसावट या खिंचाव पता न चले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं इन दिनों उसी तितली के रंगों में गुम रहता हूं। वो उड़ कर चली गई है। लेकिन उस सुग्गा नाक वाली तितली के सुग्गापंखी दुपट्टे का रंग मुझपर छूट गया है। कभी भी फुर्सत में जब मैं जब उस रंग को छेड़ता हूं तो वह और फैलती है। जैसे धमकाती हो कि जैसा है रहने दो ज़रा भी और छूआ तो ये देखो मैं अपने डैने खोल रही हूं - उड़ जाने को।&lt;br /&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/09/blog-post_28.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-5754089551293885525</guid><pubDate>Fri, 11 Sep 2015 15:15:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-09-11T20:45:20.856+05:30</atom:updated><title>एक आवारा लड़की की- सी डेयरिंग आंखें</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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शाम का धुंधलका है। हौले हौले चाय की ली जा रही सिप है। दिन भर के काम के बाद पंखे के नीचे सुस्ताने का अहसास है। एक सपना है कि तुम मेरे ऊपर लेटी हुई हो। हमारे बदन एक दूसरे में गुंथे हुए हैं। सांसें बगलगीर हो। रह रह हरकत हो रही है। एक कुनमुनाहट उठती है जो जिसके आहिस्ते आवाज़ मेरे कानों में जब्त हो जा रही है। मेरे कान यह सब सुनकर जागते हैं। कभी कभी ऐसा भी हो&amp;nbsp;रहा है कि मेरी नाक तुम्हारी कंठ के आस पास के हिस्से में लगती है। मेरे दांतों की हल्की हल्की पकड़ तुम्हारे गले को हौले हौले पीसती है और खतरनाक चीख भरी हंसी बिस्तर से उठती है और रह रह कर वही दम तोड़ देती है। वह हंसी मेरे अंदर झुरझुरी पैदा कर रही है। तुम्हारी छाया में बरगद का पेड़ मैं हुआ जा रहा हूं। तुम्हारी लटों से उलझा अलमस्त। तुम्हारे रूप में एक फक्कड़ सी फकीरी मुझे नसीब हो जाती है।&lt;/div&gt;
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मेरे दो पैरों के बीच सरकी हुई साड़ी से तुम्हारे पैर के अंगूठे बिस्तर की जिस्म में धंस रहे हैं। एक अखाड़े में जैसे बाजी शुरू होने से ठीक पहले जैसे भाले की नोंक धंसायी जाती है। तुम्हारा बदन, यह वो चाक है जिस पर चढ़ कर किसी बर्तन की छब-ढब नहीं बिगड़ती। अपनी आयतन में पूरी तरह वह निखर आता है। फिर तुम्हारे रूप की आंच में ही पक कर उससे टिमक टिमट की आवाज़ आती है।&lt;/div&gt;
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होना, पकना और फिर महुए के पेड़ के पेड़ से रात भर टपकते रस सा भरता संगीत, तुम्हारे माध्यम से इतनी यात्रा होती है।&lt;/div&gt;
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मैं इन दिनों लिखता नहीं हूं फिर भी खुद को भरता हुआ महसूस कर रहा हूं। किसी के भी घुटने के घाव तुम्हारी आवाज़ की चाशनी से भरे जा सकते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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मैं पिस जाता हूं तुम्हारे संग बदन की उस कसरत में। मेरे पास नहीं है तुम जैसी पठानी पीठ। बल्कि मैं तो धारण करता हूं समय की चाबुक, मतलबी रिश्तों के कोड़े। मेरी पीठ एक समझौतावादी पीठ है जबकि तुम्हारी खुले में रखा एक चौड़ा पाट।&lt;/div&gt;
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वे कम झपकने और बार बार एक अनजाना इशारा करती गोल-गोल आंखें मुझे लगातार खींच रही हैं।&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/09/blog-post_11.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjh3TL9pt_i-sHm7iSCv0IpV4vEVrfT7lG7a4ro-sHyQQIUBJF__cP8zsljj_ykyqv7hQ6HUgO8Bj2gGL2PRq5GZVMd8r3Grh4GlQu6wkS8dyV_H2V5lZk882A508QAQVnV9oUouH6VsNM/s72-c/the_scent_of_green_papaya.jpg" width="72"/><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-7677242622974960079</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2015 15:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-09-04T21:16:37.715+05:30</atom:updated><title>समसामयिकी</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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मैं जिससे भी इन दिनों टकराता हूं पाता हूं कि सबने एक तरह से घुटने टेक दिए हैं। वे बहादुर सिर्फ अपने मसलों पर बन रहे हैं। सबकी पहली और आखिरी प्राथमिकता अपना परिवार भर है। देशभक्ति भी अब एक फ्रीलांसिंग नौकरी की तरह हो गई है। संवेदनहीनता और पलायनवाद तो थी अब कहीं न कहीं लोगों ने अपने अंदर ही जैसे गिव अप कर दिया है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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एक काॅपीराइटर होने के नाते, काम के बदले ही सही अपने क्लाइंटों से पैसे पाने के एवज में खुद को गुनहगार मानता हूं। सीधे सीधे शब्दों में मुझे यह समझौता लगता है। जिसके लिए कोई एक्सक्यूज नहीं है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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दरअसल दिल अब कुछ भी नहीं बहलाता। अंदर की लेयर का जागता आदमी मर गया है। और जो ऊपर गतिमान दिखता है वो बस एक व्यसनी शिकारी है, मौके की तलाश में। मुझे अच्छा मौका मिल जाए, मुझे अच्छी नौकरी मिल जाए, मुझे अच्छा प्रेम मिल जाए। सब कुछ मैं, मेरा, मुझे आधारित।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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हम सब एक फ्लैट वाली घरफोड़ू औरत की तरह हुए जा रहे हैं। चुप्पा, कोना दाबने वाला। मेरी बाल्टी, मेरा मग, मेरा पर्दा, मेरा बिजली बिल, मेरा गैस सिलिंडर वाला। न न करते हुए भी, हम पूरा विद्यार्थी जीवन यह प्रण दोहराते रहे कि हमारा देश एक समाजवादी देश है। रेत में सर धंसाए शुर्तरमुर्ग की तरह हम रटते रहे और समाजवादी भारत को पूंजीवादी भारत में बदलने के गवाह बनते रहे।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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हमें रोजी रोटी से फुर्सत नहीं, हमें अपने परिवार की सुविधा से फुर्सत नहीं, बच्चों के इंजीनियरिंग काॅलेज की फीस से फुर्सत नहीं, दलाली खाने से फुर्सत नहीं। रेल और हवाई यात्रा की कन्फर्म सीट से फुर्सत नहीं। होटल की रिज़्र्वड कमरे से फुर्सत नहीं। दरअसल फुर्सत इतनी थी कि हमने यह सब रोग पाल लिया।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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कुछ हो जाता है। जुझारू जीते जागते उठ जाते हैं। विद्वता को पूजने वाला हमारे में कुलबर्गी मारे जाते हैं। देश बच्चों के शव समुद्र तट पर बह आते हैं। जिंदा परमिशन नहीं मिलती तो वे मर कर दस्तक दे रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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साइड इफेक्ट है इस तरह के लिखने का भी। हमारे उम्मीदों को लगभग 30 सालों से हवा नहीं लगी है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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पूरा देश 1857 की क्रांति की तरह विफल हो रहा है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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प्रेम बहुत काॅम्पलीकेटेड विषय बना दिया है हमने। या कि प्रेम जटिल ही है? शायद दिल के लगने से कहीं कोई बड़ा वस्तु है प्रेम। हमारी तो भाषा भी बहुत गरीब है कि हम झट किसी अच्छे लगने वाले एहसास को प्रेम का नाम दे देते हैं। क्या कभी हमारे समझ में आएगा प्रेम? बहुत विरोधाभास है। अगर रोज़ प्रेम को लेकर कुछ नया नया या अलग से एहसास या समझ उपजते रहते हैं तो इस तरह को कभी नहीं समझ सकेंगे कि क्या है प्रेम या रोज़ ही समझते रहेंगे। तो क्या अनपढ़ और जाहिल व्यक्ति नहीं करता प्रेम ? क्या उसके प्रेम करने की योग्यता नहीं है? उसके अंदर उस बुद्धि विशेष का अभाव है? वह कैच नहीं कर पाएगा प्रेम की नित नई परिभाषा को ? अब तो कई बार यह भी लगता है कि हमने प्रेम का सतहीकरण और सरलीकरण कर दिया है। कई बार लगता है प्रेम को हमने दूषित कर दिया है। आम आदमी का रंग देने में, ऊपर ही ऊपर इसे सबकी जिंदगी से जोड़ने में। तो क्या प्रेम संबंधों के इतर भी होता है। हम पहाड़ पर बिना किसी के संपर्क में (यहां तक कि प्रकृति भी) रहकर प्रेम में होने का दावा कर सकते हैं या प्रेम पर भाषण दे सकते हैं। समय के साथ प्रेम बस चर्चा करने, पढ़ने, एक टेबल पर एक टाॅपिक भर का डिशक्शन हो गया है।&lt;/div&gt;
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और हम प्रेम को जानने का कितना दावा भी तो करते हैं। फिर ऐसा भी होता है कि अचानक से कोई पूछ ले कि प्रेम क्या है तो ज़मीन आसमान देखने लगते हैं, एकदम से कोई जवाब नहीं सूझता।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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असल में हम प्रेम कर भी रहे हैं या बौद्धिक चेतना के स्तर पर सिर्फ इसे एक्सप्लोर कर रहे हैं? कहीं यह हमारे सोचने का कंम्फर्ट ज़ोन तो नहीं बन गया है? एक आसान टाॅपिक जो जितना ही डिस्कस किया जा रहा है जीने के स्तर पर वह उतना ही जीवन में गायब है?&lt;/div&gt;
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हम कहां ढ़ूंढ रहे हैं प्रेम ? सिनेमा स्क्रीन पर रचनात्मक रूप से एडिटेड सीन में? या पत्रिका में छपी किसी प्रेम कहानी में ? क्या मैं यह सही लिख रहा हूं? क्या मैं इस पर प्रश्न उठा कर ठीक कर रहा हूं? मतलब क्या मेरा सवाल जायज है?&lt;/div&gt;
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हम सब अपने अपने - अपने तरीके से प्रेम को समझने की कोशिश करते हैं? लेकिन मुझे लगता है आज यह हमारे बैठारी का रोग हो गया है। प्रेम की विवेचना मात्र एक बौद्धिक खुराक बनकर रह गई है। अकेले में चिंतन करने योग्य सब्जेक्ट। जीने से कोसों दूर, रिश्तों में नदारद। अपने अकेलेपन में हम इस किताब का पन्ना पलट रहे हैं। जैसे नैतिकशास्त्र होता है, किसी को धोखा न देना, रिश्वत न लेना, झूठ न बोलना वगैरह.....&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/08/blog-post_14.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-3031608111620530292</guid><pubDate>Thu, 13 Aug 2015 13:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-08-13T19:09:50.600+05:30</atom:updated><title>शापित फसल</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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उसके बारे में कोई एक सूरत नहीं उभरती। जुदा जुदा से कुछ ख्याल ज़हन में आते हैं। मेरी छोटी सी उम्र में उसी का मौसम रहा करता है।&lt;/div&gt;
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किसी रात का ख्वाब थी वो। क्षितिज से उतरती सांझ में दरिया पर सुरमई सी बहती हुई। पानी पर किरोसिन की तरह बहने वाली, रंगीन नक्शे बनाती हुए, फिसल जाने वाली..... जिस्म के रोओं पर रेशम सी सरक जाने वाली। झींगुरों के आवाज़ के बीच प्रतीक्षा की रात गहराती है। कई &amp;nbsp;प्रश्न अनुत्तरित छोड़ जाती है।&lt;/div&gt;
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कई बार लगता है यह क्या है जो मुंह चिढ़ा रहा है। यह क्या है जो मिटता नहीं। यह क्या है जिसकी खरोंचे लगती रहती है। जो कभी खत्म नहीं होता और अपने होने का आततायी एहसास दिलाता रहता है। यह अधूरा होने का एहसास। एक बेकली, एक अंतहीन सूनापन जो अपने खालीपन से भरा हुआ है।&lt;/div&gt;
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एक व्यग्र सुबह की तरह...किसी स्कूली बच्चे के छुट्टी के इंतज़ार की तरह... जैसे किसी भी पल उससे टकराना होगा।&lt;/div&gt;
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किसी दोपहर की फुर्सत सी जैसे - टक-टक, टक-टक की आवाज़ के साथ कठफोड़वा गम्हार की डाली पर अपनी चोंच मारता है। छत पर भिगोकर पसारा गया गेहूं सूख जाता है। पूरे बस्ती में मुर्दा वीरानी छाई रहती है। समय की नाड़ी मंद पड़ जाती है। लगता है जैसे एक बड़े से बंद हौद में छोड़ दिया गया है।&lt;/div&gt;
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आधी रात की घबड़ाहट है वो जब धड़कन अपने ही सीने से निकलकर जिन्न की तरह धम-धम करके ज़मीन पर चलती हुई लगती है। कहां जानता हूं कि अभी रात के तीसरे पहर मैं तमाम चाहतों से मुक्त हो जाऊंगा। मेरे अंदर एक ईश्वर जगेगा। टेबल लैम्प की एकाग्र रोशनी में कलाई घड़ी की थिरकती और चमकती सूई की तरह.... जैसे सारी आपाधापी थम जाएगी वहीं आकर।&lt;/div&gt;
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समय नहीं गुज़रता और आखिरकार गुज़र ही जाता है। एक एक दिन उसके इंतज़ार में जीते जाना। क्या हम इंतज़ार में बूढ़े नहीं होते? मेरा इंतज़ार बूढ़ा हो रहा है अब।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-5862466268488268376</guid><pubDate>Mon, 20 Jul 2015 14:52:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-07-21T12:41:01.137+05:30</atom:updated><title>दृश्य हमारी आंख में मुंतक़िल हो जाता है</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
उदासी का ऐसा घेरा&lt;br /&gt;
जैसे काजल घेरे तुम्हारी आंखों को&lt;br /&gt;
किसी सेनानायक द्वारा की गई मजबूत किलाबंदी&lt;br /&gt;
द्वितीया की चांद की तरह मारे&amp;nbsp;हमें&amp;nbsp;घेर कर।&lt;br /&gt;
पीड़ा तोड़ता है हमारी कमर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेम जैसे - सर्प का नेत्र&lt;br /&gt;
सांझ जैसे नीला विष&lt;br /&gt;
रात जैसे तुम्हारी रोती आंखों से बही&lt;br /&gt;
काजल की अंतहीन क्षेत्रफल वाली सियाह नदी&lt;br /&gt;
बही, उफनी, फैली, चली और निशान छोड़ गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छत पर एक बच्ची घेरे में कित-कित खेलती&lt;br /&gt;
मेमना कोहरे का एक टूसा सहमति से खींचती&lt;br /&gt;
आई बाल बनाती,&lt;br /&gt;
धूप हर मुंडेर से उतर जाती&lt;br /&gt;
सूरज वही दिन लेकर लेकिन हर नए पर चढ़ता&lt;br /&gt;
कलाकारी वही, बस कलाकारों के नए नाम गढ़ता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य हमारी आंखों में बंद&amp;nbsp;हो जाता है&lt;br /&gt;
पेड़ पर हो रही बारिश झड़झड़ाती है&lt;br /&gt;
हमने यह क्या था जो समझने में उम्र गंवा दी&lt;br /&gt;
सुलगता क्या रहा दिल में फिर किसे हवा दी&lt;br /&gt;
हाथ खाली थी खाली ही रही&lt;br /&gt;
तुम जो मिले थे समझने वाले&lt;br /&gt;
कहने वाले, रोने वाले&lt;br /&gt;
कट जाती है नसें मन की&lt;br /&gt;
तलछट में झुंड से छिटके मछली सी&lt;br /&gt;
सर पटकती, धूप में और चमकती फिर प्यास से मरती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य हमारी आंख में बंद&amp;nbsp;हो जाता है&lt;br /&gt;
कोई तितली पस्त होकर अपने पंख खोलती है&lt;br /&gt;
नाव आँखों में चलती है, अंतस उसको खेता है&lt;br /&gt;
किनारे लगने से ज्यादा मंझधार में डोलती है।&lt;br /&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/07/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-1365046555756571351</guid><pubDate>Sat, 18 Jul 2015 14:31:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-07-18T20:01:29.766+05:30</atom:updated><title>हम एक दिन और मर गए</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
बेखुदी है, एक बेहोशी। जैसे कोई बहुत अज़ीज़ में बैठा हमसे दूर जा रहा हो। नाव आंखों से ओझल होती जा रही हो। एक उम्मीद और वो भी बैठती लगे। एक ही संबल जो डूबता जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोड़ी सी बारिश के बाद एक मटमैला पीलापन दीवार पर सरक आया है। खिड़की से दीवार पर जो हिस्सा देख रहा हूं वहां गमले में लगे एक पौधे की डाली डोल रही है। ऐसा लगता है मन यही एक मटमैला पीला दीवार है और इस पर कोई जीवित तंग करता खयाल डोल रहा है। दिमाग पर अब तक उसके एकदम आंखों के पास आकर मुस्कुराने का अक्स याद है। उसके होंठों से निकलता एक अस्फुट स्वर जिसका मतलब समझने की कोशिश में अब तक हूं वो क्या था?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीवार की टेक लगाए बैठा हूं। लेकिन चार पैग के बाद ऐसा लग रहा है कि हथेली और तलवे में जलन है, हल्की खुजली भी....। कुछ मतलब है इसका क्या है नहीं पता। अटपटी और अस्पष्ट सी होठों कुछ बातें हैं जो किसी से कहना है, जिसकी हिम्मत होश में कहने की नहीं होती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हवा में नीचे की ओर बार बार कंधे झुक आते हैं जैसे किसी पर झुकना हो। दूर से कोई देखे तो समझे कि बचपन में सरेशाम से ही ऊंघ रहा हूं। दीवारें क्यों इनती बु बनी खड़ी हैं। इन्हें तो अब सजीव हो जाना चाहिए था। टेबल लैम्प क्यों सर झुकाकर मुंह चिढ़ा रही है। रैक में रखी किताबें भी कुछ नहीं बोलती। शाम नीलेपन से रात के कालेपन में बदल रही है। हम एक दिन और मर गए।&lt;br /&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/07/blog-post_18.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-7971535554548967885</guid><pubDate>Fri, 17 Jul 2015 13:35:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-07-17T19:05:04.724+05:30</atom:updated><title>वेटिंग</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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मन पक रहा है तुम्हारे साथ। समय के साथ धीमे धीमे। कोई जल्दी नहीं। फसल के दाने जैसे पकते हैं अपनी बालियों में.... रोज़ की प्र्याप्त धूप, हवा का सही सींचन, पानी की सही खुराक से। कुम्हार की बनाई हांडी की तरह। बनना, सूखना और फिर आग में सिंकना और तब आती उससे ठमक ठमक की आवाज़। एक बुढ़िया के चेहरे पर झुर्रियों का आना.... किसी वृहत्त कालखण्ड को समेटने वाले उपन्यास के लिए रोज़ पन्ना दर पन्ना दर्ज होते जाना। जैसे लावा संग उजला बालू मिलकर लावा भूनाता है, सुलगते कोयले पर एक फूटी हांडी में हम साथ साथ पक रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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कोई जल्दी नहीं, कोई बेताबी नहीं, बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं, कोई वायदा नहीं की तर्ज़ पर हमारे बीच का रिश्ता पक रहा है। अपनी अपनी जगह पर एक दूसरे में गुम हम अपने रिश्ते में ग्रो कर रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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गजरे की भीने भीने सुगंध की तरह जो सालों बाद भी अवचेतन में तंग करती है। नवीं में गणित के सवाल हल करते समय जब मां बेख्याली में अपने इलाके की लोकगीत गाती है और हम अठ्ठाईस की उम्र में उस लय को याद करते हैं। नारंगी रंग के उस सिंदूर की तरह जिसे हमारे गांव की स्त्रियां अपने नाक से मांग तक धारण करती हैं और मन में वो तस्वीर बस जाती है। दृश्य पकता है हमारे भीतर या भाव?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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हम एक इंतज़ार में जी रहे हैं। फिर से राब्ता शुरू होने के इंतज़ार में। जाने क्या हो जाने के इंतज़ार में....। जब हमारे चेहरे सर्द हो जाएंगे। देखने वाले हमें एक रूखा और खुरदुरा मनुष्य कहने लगेंगे। घिसे हुए जूते पहने पहाड़ी मजदूर की तरह जो हर सुबह गले में पतली सी रस्सी डालकर निकलता है और दिन के तीसरे पहर बेंच पर बैठकर उदास आंखों से सैलानियों को देखता है, उनमें किसी को खोजता है।&lt;/div&gt;
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यह एक खोया हुआ दिन है और तमाम रास्ते तुम्हारी तरफ जा रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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मैं एक सैलानी हूं। तुम्हारे साम्राज्य में आया हूं। अपने पीठ पर बस्ता लटकाए, हाथ में पानी का एक बोलत किए। तुम्हारी अकूत सुंदरता पर मोहित हूं। बनाने वाले ने तुममें नैर्सगिक सौंदर्य बख्शा है। पहाड़, जंगल, नदी, झरना, विस्तार, ढ़लान, सपाट मैदानी भूभाग, एक अप्रतिम शांति जैसे सारे शोर चुप हों। जैसे मन की सारी उलझनों का जवाब मिल गया हो। मेरे अंदर से सारी उलझनें जैसे निकल कर इसी जंगल में बिला गई हो। मैं प्रकृतिस्थ हूं। एक प्रकार से समाधिस्थ। आंखों के आगे इस ढ़लुवा ज़मीन पर छोटे छोटे हरे पेड़ देखता हूं तो लगता है जैसे मेरे अंदर से करूणा की एक ब्रह्मपुत्र फूट रही है। जैसे सारी दुनिया में इस नदी का विस्तार होना चाहिए। जैसे सारी चीज़ें मुझमें ही समाहित हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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इस तरह किसी का हाथ थामे शौकिया किसी बूढ़े सा टग रहा हूं जिसे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं, बस साथ होने का एहसास होना चाहिए। अंदर से अकेले को भी साथ का यह संबल चाहिए। तुम्हारी पनाह में घूमते घूमते यह डिमांड और सप्लाई जैसा कुछ मामला है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;u&gt;खो गए लोगों की याद में&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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1.&lt;/div&gt;
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पेड़ तुम्हारी तरह हंसता है। झब्बा झब्बा सा। फुग्गा बन जाता है। एक छोटे घने हरियाले झाड़ी में जैसे ऊदबिलाव आ घुसता है और अंदर ही अंदर बवाल काटता है। हमारी आंखें एक अनजाने से रोमांच में चमकती रहती हैं और मन में यह ख्याल आता रहता है वो जाने अंदर क्या कर रहा होगा। बड़े बड़े स्तनों वाली किसी परिपक्व महिला की तरह जिसने बिना ब्लाउज़ के अपने बदन पर साड़ी बांधी हो। हंसी तुम्हारे अंदर घुस कर जाने कहां कहां जाती है, पेट हंसता है या तुम्हारी आंखें, भवें, दांत, गाल और कभी कभी तो पूरा बदन ही। लगता है हंसता तो सिर्फ पेट ही है बाकी पर सिर्फ रिफ्लेक्शन आते हैं। मैं वो एक जोरदार, भरपूर हंसी बनकर तुम्हारे अंदर उतरना चाहता हूं जो तुम्हारे शरीर के सभी ऊत्तकों को झिंझोर दे। मुझमें एक हंसी के रूप में इतना वेग हो कि तुम्हारे बाल कंधे पर छितरा जाए, तुम्हारे पैरोंके पंजों को थोड़ी देर के लिए स्पंजी कर दे। तुम पुलक पुलक हंसो और तुम्हारे शरीर का एक एक अणु प्रकाशित हो उठे। शरीर का अंग-अंग मुस्काना या लजाना होता है!&lt;/div&gt;
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2.&lt;/div&gt;
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तुम नाचती हो तो ऐसा लगता है जैसे कुछ कहने की कोशिश में हो। सुख, दुःख, विषाद, प्रेम, उन्माद, सांझा, अंतरंग, व्यक्तिगत इन सब के कहने के बाद भी जो बच जाता है, जो हमें बूढ़ा बनाता है। नाचना पुर्ननवा होना है। जब तुम शुरू होती हो तुम्हारी छाया उतरने लगती है। कंधे पर के बादल दांए बांए होते हुए वो बयान देते हैं जो तुमने कभी न करना चाहा था। नाचना एक सहमति है जैसे कोई बच्चा कबूलता है - क्या करूं, हो गया।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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आधी रात एक दूसरे से लगकर रोने जैसा। नाचना रोने की पुकार को सुनना संभव बनाती है। मेरे श्रवण शक्ति को मजबूत बनाती है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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मैं तुम्हारे साथ नाचना चाहता हूं। उन्माद में नहीं, जलावन की जलती आंच पर आहिस्ते आहिस्ते। सांस की धीमी लौ की तरह। मोमबत्ती के पूरी तरह लग कर फर्श में मिल जाने की तरह।&lt;/div&gt;
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मन का भारीपन जो हर कुछ दिनों पर जम आता है हमारे भीतर। शरीर के रेशे रेशे में तर हो जाऊं, तुम्हारे पसीने, रक्त, अस्थिमज्जा और वीर्य का तत्व बन जाऊं तो समझो कुछ बन सका।&lt;/div&gt;
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लिखना बंद हो गया है। ऐसा लगता है कि मेनीपुलेट हो गया हूं। लिखने के मामले में भ्रष्ट हो गया हूं। टेकेन ग्रांटेड और ईज़ी लेने की आदत पड़ गई है। पहले से आलस क्या कम था! लेकिन अब तो न मेहनत और न ही प्रयास ही। भाव की प्योरिटी भी दागदार हुई है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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कई बार यह भी लगता है कि बस मेरा लिखना तमाम हुआ। जितना जीया हुआ, भोगा हुआ और महसूस किया हुआ या फिर देखा हुआ था लिख दिया। शायद झूठ की जिंदगी जीने लगा हूं। सच से ऊपर उठ गया हूं। ये भी लगता है कि खाली हो गया हूं। जितना था, शराब की बोतल की तरह खत्म कर लुढ़का दिया गया हूं। अब किसी की लात लगती है या हवा तेज़ चलती है तो बस पेट के बल फर्श पर लुढ़कने की आवाज़ आती है जो आत्मप्रलाप सा लगता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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बहुत सारी बातें हैं। कई बार लगता है मीडियम और अपने जेनुइन लेखन के बीच सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा। रेडियो और टी.वी. के लिए जिस तरह के सहज और सरल वाक्यों की जरूरत होती है, उसी आदत में जब अपनी डायरी या ब्लाॅग के लिए लिखता हूं तो अपना ही लिखा बड़ा अपरिचित सा मालूम होता है। कई बार तो फिर से उसे पढ़ने पर हास्यास्पद लगता है।&lt;/div&gt;
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लब्बोलुआब यह कि उम्र जितनी बढ़ती जा रही है, सोचने समझने की शक्ति घटती जा रही है। वो हिम्मत जाने कहां चुकती जा रही है। आधी से अधिक बातों के बारे में लगता है कि यह लिखने से क्या फायदा। या फिर यह भी कोई लिखने की चीज़ है भला।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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जितना बड़ा हो रहा हूं कंफ्यूज हो रहा हूं। भरोसे से आखिर क्या कह सकता हूं?&lt;/div&gt;
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एक सधे वाक्य की तलाश में जीवन जाया कर रहा हूं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/07/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-3390614366114553723</guid><pubDate>Sat, 06 Jun 2015 15:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-06-06T20:50:54.452+05:30</atom:updated><title>तुम हो</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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तुम एक कैनवास हो। धूप और छांव की ब्रश तुमपर सही उतरती है।&lt;/div&gt;
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तुम खुले आसमान में ऊंची उड़ान भरती एक मादा शिकारी चील हो जो ज़मीन पर रंगती शिकार को अपनी चोंच में उठा लेती हो।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
तुम एक सुवासित पुष्प हो जिसे सोच कर ही तुम्हारे आलिंगन में होने का एहसास होता है।&lt;/div&gt;
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तुम एक तुतलाती ऊंगली हो, जिसके पोर छूए जाने बाकी हैं&lt;/div&gt;
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तुम मेरे मरे मन की सर उठाती बात हो&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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तुम हो तो मैं यकीन की डाल पर बैठा कुछ कह पा रहा हूं&lt;/div&gt;
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तुम हो रानी,&amp;nbsp;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhNxpdDBj4d8gtEqG5lHPRw9u_0XxcLrL6TcdmfJE2GBoVPjM3o9IA7ximEv8Vaqn0Ba4gfQNSgDyYXFLbvYybq6TbH75SWQFL0Fga9lf1PuRDly4ZaHD0ugUIxRH9yFuhxtfuGW1LcQMQ/s1600/Untitled.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="179" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhNxpdDBj4d8gtEqG5lHPRw9u_0XxcLrL6TcdmfJE2GBoVPjM3o9IA7ximEv8Vaqn0Ba4gfQNSgDyYXFLbvYybq6TbH75SWQFL0Fga9lf1PuRDly4ZaHD0ugUIxRH9yFuhxtfuGW1LcQMQ/s320/Untitled.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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तुम हो।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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तुम्हारे पीठ की धड़कन सुनता हूं&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
तुम्हारे मुस्काने की खन-खन बुनता हूं&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
मैं स्टेज पर लुढ़का हुआ शराब हूं&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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और तुम उसका रिवाइंड मोड की स्थिति&lt;/div&gt;
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मैं वर्तमान हूं&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
तुम अपनी अतीत में ठहरी सौम्य मूरत&lt;/div&gt;
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तुम हो रानी,&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
तुम हो।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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सेक्सोफोन पर की तैरती धुन&lt;/div&gt;
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तुम्हारा साथ, लम्हों की बाँट, छोटी छोटी बात&lt;/div&gt;
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हरेक उफनती सांस, हासिल जैसे पूरी कायनात&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
आश्वस्ति&lt;/div&gt;
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कि तुम हो।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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तुम हो रानी,&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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तुम हो।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhNxpdDBj4d8gtEqG5lHPRw9u_0XxcLrL6TcdmfJE2GBoVPjM3o9IA7ximEv8Vaqn0Ba4gfQNSgDyYXFLbvYybq6TbH75SWQFL0Fga9lf1PuRDly4ZaHD0ugUIxRH9yFuhxtfuGW1LcQMQ/s72-c/Untitled.jpg" width="72"/><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3688148429960405201.post-790765447571757675</guid><pubDate>Thu, 28 May 2015 15:06:00 +0000</pubDate><atom:updated>2015-05-28T20:36:37.520+05:30</atom:updated><title>पतली लकीर की सिसकी</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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रूम पर की दीवार घड़ी रूक गई है। नौ बजकर पचास मिनट और चालीस सेकेण्ड हुए हैं। और यहीं पर घड़ी रूक गई है। सबसे बड़ी सूई चालीस और इकतालीसवें सेकेण्ड के दरम्यार थिरक रही है। एक हांफती हुई स्पंदन। एक बची हुई सांस। एक खत्म होने की ओर दस्तक। एक पूंछ कटी छिपकली की पूंछ जो बस थोड़ी देर में थम जाएगी।&lt;/div&gt;
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जिंदगी भी यहीं आकर रूक गई है। पैर बढ़ते तो हैं तो लेकिन कोई कदम नहीं ले पाते। इस घड़ी को देखता हूं तो अपने जीवन से बहुत मैच करती है। अव्वल तो एक ही हिस्से में घंटे, मिनट और सेकेण्ड की सूई है। और दूसरी तरफ सपाट मरूस्थल। एक हिस्से में कुछ हैपनिंग। दूसरी ओर निचाट अकेलापन। दरअसल होता क्या है कि हमारे जीवन की घड़ी में भी सभी सूईयां किसी न किसी वक्त एक दूसरे से मिल जाती हैं। बस तभी हमें जिंदा होने का एहसास होता है। उन वक्तों में अपनापन होता है। और बाकी वक्तों में अधूरापन। और बाकी वक्तों में सूनापन। और बाकी वक्तों में खुद से अजनबीपन। और बाकी बचे वक्तों में हम मरते जाते हैं। शनैः शनैः....&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;© Copyright Reserved.© Saagar&lt;/div&gt;</description><link>http://apnidaflisabkaraag.blogspot.com/2015/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (सागर)</author><thr:total>2</thr:total></item></channel></rss>