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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2enclosuresfull.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><title>सुबीर संवाद सेवा</title><link>http://subeerin.blogspot.com/</link><description>ये एक समाचारों और कहानियों पर आधारित एजेंसी की जाल पत्रिका है जहां आप पाएंगें रोचक समाचार उनका विश्‍लेषण</description><language>en</language><managingEditor>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</managingEditor><lastBuildDate>Wed, 15 Jul 2009 12:33:43 PDT</lastBuildDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">199</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex 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href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><item><title>रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से । स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में आज सुनिये दो युवाओं को अंकित सफर को और प्रकाश अर्श को ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/am6vny-hVKU/blog-post_14.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 13 Jul 2009 22:09:22 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-3585638398291405448</guid><description>&lt;p&gt;( इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में न खुले तो मोजिला या गूगल क्रोम में खोलें । )&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कई सारे फोन आ रहे हैं ओम जी को लेकर । चल मेरी सासू जी का फोन आया । ग्‍व‍ालियर में कवि सम्‍मेलन में उनको मैंने ओम जी से मिलवाया था । वे ओम जी की विनम्रता अभी तक नहीं भूली हैं । बहुत दुखी थीं । कह रहीं थीं कि जिस दिन ओम जी का समाचार सुना उस दिन पूरा दिन मन खराब रहा । ईश्‍वर की सत्‍ता के आगे कौन क्‍या कर सकता है । शायद उसे ओम जी की जियादह ज़रूरत होगी । हम इंसानों के कर्म देख देख कर उसकी भी हंसी खो गई होगी और उसी कारण उसने ओम जी को बुला लिया कि वो भी हंस सके । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आज हम आगे चलते हैं और आगे चलने से पहले बात करते हैं पिछले बार के कन्‍फ्यूजन की । कई लोगों ने प्रकाश सिंह जी को प्रकाश अर्श समझ लिया था । मेरे पास भी उनका कोई चित्र नहीं था सो कुछ नहीं लगा पाया । खैर बाद में पता लगा कि वे &lt;a href="http://www.blogger.com/profile/09425652140872422717"&gt;प्रकाश पाखी&lt;/a&gt; हैं । और &lt;a href="http://ahobilstreasure.blogspot.com/"&gt;अभिव्‍यक्ति&lt;/a&gt; के नाम से अपना ब्‍लाग चलाते हैं । ये है उनका चित्र । &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwCei3bbcI/AAAAAAAAA-w/Oucok9iysOU/s1600-h/prakash%20pakhi%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="prakash pakhi" border="0" alt="prakash pakhi" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwCfrEtpWI/AAAAAAAAA-0/2I1VySQceSM/prakash%20pakhi_thumb.jpg?imgmax=800" width="209" height="224" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;प्रकाश पाखी &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;आज तरही मुशायरे के तीसरे अंक में हम ले रहे हैं दो युवा शायरों को । युवा किस माने में । युवा इस माने में कि ये दोनों ही अभी तक कुंवारे हैं । मेरे विचार में युवा होने की सबसे ठीक परिभाषा यही है कि अगला कुंवारा हो । अब ये मत पूछियेगा कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इस हिसाब से युवा हुए कि नहीं । तो आज हम ले रहे हैं दो बेचलर शायरों को । अंकित को तो ये शिकायत हमेशा रहती है कि मैं उसकी शादी के पीछे पड़ा रहता हूं । बड़ा भाई हूं इतनी परवाह तो होगी ही । छोटा भाई सुंदर हो स्‍मार्ट हो, मुंबई जैसे शहर में रह रहा हो तिस&amp;#160; पर शायर भी हो तो चिंता तो होगी ही ।प्रकाश की चिंता मुझे इसलिये नहीं है कि वो इतना संकोची है कि कुछ कहने में ही ढाई साल लगा देगा । खैर ये तो मजाक की बात । पिछली बार के दोनों ही शायर सुपरहिट हुए हैं । और आज फिर दो&amp;#160; यूवा तुर्क अपनी ग़ज़लें लेकर महफिल में आ रहे हैं । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;पहले सुनते हैं इसी बहर पर गाई हुई ग़ज़ल गायकी के सम्राट श्री जगजीत सिंह साहब की गाई हुई और हिंदी तथा आम बोलचाल की भाषा&amp;#160; को ग़ज़ल की भाषा बनाने में सबसे जियादह योगदान देने वाले देश के मशहूर शायर तथा मध्‍यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्‍यक्ष श्री बशीर बद्र साहब की लिखी हुई ये ग़ज़ल । बद्र साहब इन दिनों अस्‍वस्‍थ हैं तथा स्‍मृति भ्रम का शिकार हो गये हैं । जिसे शायद अल्‍जाइमर भी कहते हैं । ईश्‍वर उनको स्‍वस्‍थ करे । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;सुनिये एल्‍बम विज़न्‍स से ली गई ये ग़ज़ल । ये एल्‍बम इसी प्रकार की दुर्लभ ग़ज़लों से भरा हुआ डबल कैसेट के सेट में आया था । जिसमें कैफ़ भोपाली साहब की मशहूर और मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल कौन आया है यहां भी शामिल थी । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" codebase="http://fpdownload.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=8,0,0,0" width="335" height="28" id="divplaylist"&gt;&lt;param name="movie" 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SarJhukaogeToPathar at archive.org&amp;quot;:&amp;quot;function()&amp;quot;},&amp;quot;-&amp;quot;,&amp;quot;Flowplayer 3.0.5&amp;quot;]}" /&gt;&lt;/object&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;यदि प्‍लेयर न चले तो यहां जाकर सुनें &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a title="http://www.archive.org/details/SarJhukaogeToPathar&amp;#13;&amp;#10;" href="http://www.archive.org/details/SarJhukaogeToPathar"&gt;http://www.archive.org/details/SarJhukaogeToPathar&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;या यहां से डाउनलोड करें । &lt;/p&gt; &lt;a title="http://www.divshare.com/download/7897590-55d&amp;#13;&amp;#10;" href="http://www.divshare.com/download/7897590-55d"&gt;http://www.divshare.com/download/7897590-55d    &lt;br /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;अंकित सफर : &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwCgnTy_mI/AAAAAAAAA-4/uXY3fuMm3cM/s1600-h/as%5B2%5D%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="as[2]" border="0" alt="as[2]" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwCipBCHWI/AAAAAAAAA-8/aYqLaN4oBlQ/as%5B2%5D_thumb.jpg?imgmax=800" width="126" height="191" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अभी तक इनको केवल चित्रों में ही देखा है और जो देखा है उससे ये पाया है कि ये बहुत मासूम सूरत के धनी हैं । फिलहाल मुम्‍बई में किसी बैंक में सेवारत हैं । पूना से इन्‍होंने एमबीए का कोर्स अभी पूरा किया है और तुरंत ही नौकरी में आ गये हैं । उत्‍तराखंड के रहने वाले हैं और अभी इनकी शादी नहीं हूई । इनके लिये कोई सुंदर सी ग़ज़ल की तलाश जारी है जो इनकी जीवन संगिनी बन सके ।    &lt;br /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;हौसले रखता जवां हूँ कोशिशों की धार से.        &lt;br /&gt;कुछ न कुछ मैं सीखता हूँ अपनी हर इक हार से.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#800000"&gt;इक नयी उम्मीद लेके आएगी कल की सहर,        &lt;br /&gt;रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;बात जिसने भी कही ये खूब ही उसने कही,        &lt;br /&gt;हो किसी को जीतना तो जीत लेना प्यार से.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;तू बहुत पीछे कहीं ना छूट जाये आदमी,        &lt;br /&gt;चाहता पाना है सब कुछ तू बड़ी रफ़्तार से.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;या तो वादा ना करो या फिर निभाना भी उसे,        &lt;br /&gt;बस यही हूं चाहता मैं हिंद की सरकार से.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;भीग सारे ही गए कागज़, ग़ज़ल ख़ुद भी &amp;quot;सफ़र&amp;quot;,        &lt;br /&gt;याद के बादल उमड़ बरसे बहुत बौछार से.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वाह वाह वाह बहुत अच्‍छे शेर निकाले हैं अंकित ने । विशेषकर जो मिसरा ए तरह के साथ गिरह बांधी है वो तो जिस प्रकार से सकारात्‍मक सोच लिये हुए है वो आनंद देने वाली है । मिसरे पर सकारात्‍मक गिरह भी बांधी जा सकती है ये बताने के लिये आभार अंकित की इस ग़ज़ल का । शेर आदमी वाला भी बहुत अच्‍छा है । बहुत अच्‍छी ग़ज़ल, मुशायरे को और ऊंचाइयों पर ले जाने के लिये बधाई । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रकाश अर्श : &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwCjVjC5rI/AAAAAAAAA_A/L9aLumUmvkg/s1600-h/66666%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="66666" border="0" alt="66666" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwCkMgSwuI/AAAAAAAAA_E/JGrDclAoYyU/66666_thumb.jpg?imgmax=800" width="142" height="224" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;प्रकाश के बारे में क्‍या कहूं । ये मेरे विचार में श्रद्धेय नीरज गोस्‍वामी जी का पाकेट संस्‍करण है । नीरज जी की विनम्रता, उनकी सौम्‍यता सब कुछ प्रकाश ने मानो नीरज जी से प्राप्‍त की है । बस एक ही चीज नहीं ले पाये नीरज जी की तरह खुलकर कहकहे लगाना और गर्मजोशी । उसमें इनका संकोची स्‍वभाव आड़े आ जाता है । खैर बहूरानी आयेगी तो&amp;#160; उसकी जिम्‍मेदारी होगी संकोची प्राणी को सुधारने की&amp;#160; । ग़ज़ल की परम्‍परा भी प्रकाश के पास नीरज जी से ही आ रही है । और इसका उदाहरण है ये ग़ज़ल । सुनिये और आनंद लीजिये । &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;ज़िन्दगी भर पाला पोसा जिसको इतने प्यार से ..        &lt;br /&gt;कर दिया बूढा बता के बेदखल घर-बार से ...         &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#800000"&gt;रतजगों का, सुर्ख आंखों का सबब बतलायें क्‍या &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;font color="#800000"&gt;रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से&lt;/font&gt;         &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;इश्क के दरिया को सोचा पार कर लूं डूब के        &lt;br /&gt;डर गया ग़ालिब के कहने पर इसी मझधार से ..         &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मेरी धड़कन, मेरी साँसे, मेरी ये तश्नालबी        &lt;br /&gt;अब तलक भी दूर हैं बस इक निगाहे यार से ...         &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;वो मेरे कहने पे देखो आगया था बाम पर        &lt;br /&gt;है खबर उसको भी&amp;#160; मैं जिंदा हूँ बस दीदार से ...         &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मेरा कातिल कर रहा है मुन्सफी खुद कत्ल की        &lt;br /&gt;फैसला पढ़ लेना ये तुम भी किसी अखबार से ...         &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;वो जवानी भूल बैठा चौकसी सीमा पे कर        &lt;br /&gt;और हम सोते रहे निर्भय किसी भी वार से ...         &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;चीखती है अस्मतें और चुप है सारी गोलियां        &lt;br /&gt;जनपदों में दर्ज शिकवे है पड़े बेकार से ...&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वाह वाह वाह क्‍या श्‍ोर निकाले हैं । विशेषकर कातिल वाला और गालिब साहब को समर्पित शेर तो बहुत उम्‍दा हैं । आज तो दोनों ही युवा तुर्कों ने आनंद ला दिया है । मुशायरा अपनी ऊंचाइयों पर हैं । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुछ जानकारी : &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://ngoswami.blogspot.com/2009/07/blog-post.html"&gt;नीरज जी के ब्‍लाग&lt;/a&gt; पर एक मिली जुली ग़ज़ल लगी है । कुछ शेर मैंने लिखे है कुछ नीरज जी ने लिखें हैं । हर नदी में हो रवानी भूल जा, बिन दुखों के जिंदगानी भूल जा । ये बहर हमारी तरही मुशायरे की बहर की छोटी बहन है । ये उससे एक साल छोटी है । इसका नाम है बहरे रमल मुसद्दस महजूफ । ये हमारी बहर की छोटी बहन क्‍यों हुई भला । दरअसल में इसमें एक रुक्‍न कम है इसलिये ये एक साल छोटी हुई । इस बहर का वज्‍न होता है &lt;strong&gt;फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलुन/या फाएलान 2122-2122-212या2121 ।&lt;/strong&gt;&amp;#160; आपको कोई गीत या ग़ज़ल याद आती है इस पर । चलिये एक तो मैं ही बता देता हूं । गालिब साहब की लिखी वो ग़ज़ल जो गुलजार साहब के सीरियल गालिब में बहुत लो‍कप्रिय हुई थी । एक फकीर उसको गाता है और उसकी धुन तो जगजीत साहब ने क्‍या बनाई थी । गाया विनोद सहगल जी ने था ।&amp;#160; याद आया आपको&lt;strong&gt; &lt;/strong&gt;चलिये मैं ही बता देता हूं । &lt;strong&gt;कोई दिन गर जिंदगानी और है । इस बहरों में दूसरी कुछ मुसद्दस बहरों की तरह मिसरे में एक मात्रा बढा़ने की छूट होती है ।और उस कारण फाएलुन 212 का फाएलान 2121 हो जाता है ।&lt;strong&gt;&amp;#160; हो चुकीं ग़ालिब बलाएं सब तमाम&lt;/strong&gt;&amp;#160; में आखिरी का रुक्‍न 2121 ही हो गया है । &lt;/strong&gt;&amp;#160; आपको कोई और गीत या ग़ज़ल याद आता है आता हो तो बतायें । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;रविकांत&lt;/strong&gt;&amp;#160; ने &lt;a href="http://jivanamrit.blogspot.com/2009/07/blog-post_12.html"&gt;अपने ब्‍लाग&lt;/a&gt; पर एक सुंदर गीत लगाया है जो कि लिखा गया तो छंद पर है जिस छंद पर शिव तांडव स्‍तोत्र की रचना हुई । शिव तांडव स्‍तोत्र को मैं विश्‍व की सबसे प्रभावशाली कविता मानता हूं । उसमें जो कुछ है वो किसी अन्‍य कविता में नहीं हैं । &lt;strong&gt;जटाटवी गलज्‍जले प्रवाह पावितस्‍थले ।&lt;/strong&gt;&amp;#160; कभी मौका मिला तो सस्‍वर भी सुनाऊंगा । ये मुझे पूरी याद है । मेरे जैसे मंदिर नहीं जाने वाले को भी ये कविता केवल उसके प्रभावों के चलते याद है । हालंकि अब कुछ विस्‍मृत हो रही है । वैसे ये मुफाएलुन-मुफाएलुन-मुफाएलुन-मुफाएलुन है । अर्थात 1212-1212-1212-1212 ये बहरे हजज मुसमन मकबूज होती है &lt;strong&gt;जटाटवी 1212 गलज्‍जले 1212 प्रवाह पा 1212 वितस्‍थले 1212&amp;#160; इ&lt;/strong&gt;सकी बहरे हजज मुरब्‍बा मकबूज जियादह चलन में है । आपको कोई और गीत या ग़ज़ल या छंद याद आता है इस पर । आए तो बतायें । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#800000"&gt;आज का सवाल :&lt;/font&gt; सावन चल रहा है और शिव की आराधना भी जोरों से हो रही है । कल तो हमारे यहां रात को खूब बरसात भी हुई दो घंटे तक । खैर तो इन दिनों शिव आराधना के लिये रामचरित मानस में से तुलसीकृत शिवाराधना बहुत गाई जाती है । &lt;font color="#0000ff"&gt;नमामी शमीशान निर्वाण रूपं ।&lt;/font&gt; &lt;font color="#0000ff"&gt;क्‍या आप इसकी बहर बता सकते हैं ।&lt;/font&gt; और इस बहर पर हिंदी फिल्‍म का बहुत लोकप्रिय गाना सुझा सकते हैं । मिले तो बतायें और अभी तो आनंद लें सावन की ऋतु में दो कुंवारों की ग़ज़लों का । और देखिये यादों के एल्‍बम में से एक पुराना बहुत पुराना चित्र जो है अपनी मनपसंदीदा और आलटाइम फेवरिट बुलेट के साथ । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwClDJbOxI/AAAAAAAAA_I/BnTpUSrVG4w/s1600-h/bullet%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="bullet" border="0" alt="bullet" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlwCmvjPDGI/AAAAAAAAA_M/Nn3ply8Cy1I/bullet_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="474" height="327" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-3585638398291405448?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/am6vny-hVKU" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-14T10:39:22.383+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">23</thr:total><media:content url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/TwX1_V4ZW9g/playlist" fileSize="53067" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:subtitle> ( इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में न खुले तो मोजिला या गूगल क्रोम में खोलें । ) कई सारे फोन आ रहे हैं ओम जी को लेकर । चल मेरी सासू जी का फोन आया । ग्‍व‍ालियर में कवि सम्‍मेलन में उनको मैंने ओम जी से मिलवाया था । वे ओम जी की विनम्रता अभी तक नहीं भूली हैं । बहुत द</itunes:subtitle><itunes:author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</itunes:author><itunes:summary> ( इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में न खुले तो मोजिला या गूगल क्रोम में खोलें । ) कई सारे फोन आ रहे हैं ओम जी को लेकर । चल मेरी सासू जी का फोन आया । ग्‍व‍ालियर में कवि सम्‍मेलन में उनको मैंने ओम जी से मिलवाया था । वे ओम जी की विनम्रता अभी तक नहीं भूली हैं । बहुत दुखी थीं । कह रहीं थीं कि जिस दिन ओम जी का समाचार सुना उस दिन पूरा दिन मन खराब रहा । ईश्‍वर की सत्‍ता के आगे कौन क्‍या कर सकता है । शायद उसे ओम जी की जियादह ज़रूरत होगी । हम इंसानों के कर्म देख देख कर उसकी भी हंसी खो गई होगी और उसी कारण उसने ओम जी को बुला लिया कि वो भी हंस सके । स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा आज हम आगे चलते हैं और आगे चलने से पहले बात करते हैं पिछले बार के कन्‍फ्यूजन की । कई लोगों ने प्रकाश सिंह जी को प्रकाश अर्श समझ लिया था । मेरे पास भी उनका कोई चित्र नहीं था सो कुछ नहीं लगा पाया । खैर बाद में पता लगा कि वे प्रकाश पाखी हैं । और अभिव्‍यक्ति के नाम से अपना ब्‍लाग चलाते हैं । ये है उनका चित्र । प्रकाश पाखी आज तरही मुशायरे के तीसरे अंक में हम ले रहे हैं दो युवा शायरों को । युवा किस माने में । युवा इस माने में कि ये दोनों ही अभी तक कुंवारे हैं । मेरे विचार में युवा होने की सबसे ठीक परिभाषा यही है कि अगला कुंवारा हो । अब ये मत पूछियेगा कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इस हिसाब से युवा हुए कि नहीं । तो आज हम ले रहे हैं दो बेचलर शायरों को । अंकित को तो ये शिकायत हमेशा रहती है कि मैं उसकी शादी के पीछे पड़ा रहता हूं । बड़ा भाई हूं इतनी परवाह तो होगी ही । छोटा भाई सुंदर हो स्‍मार्ट हो, मुंबई जैसे शहर में रह रहा हो तिस&amp;#160; पर शायर भी हो तो चिंता तो होगी ही ।प्रकाश की चिंता मुझे इसलिये नहीं है कि वो इतना संकोची है कि कुछ कहने में ही ढाई साल लगा देगा । खैर ये तो मजाक की बात । पिछली बार के दोनों ही शायर सुपरहिट हुए हैं । और आज फिर दो&amp;#160; यूवा तुर्क अपनी ग़ज़लें लेकर महफिल में आ रहे हैं । पहले सुनते हैं इसी बहर पर गाई हुई ग़ज़ल गायकी के सम्राट श्री जगजीत सिंह साहब की गाई हुई और हिंदी तथा आम बोलचाल की भाषा&amp;#160; को ग़ज़ल की भाषा बनाने में सबसे जियादह योगदान देने वाले देश के मशहूर शायर तथा मध्‍यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्‍यक्ष श्री बशीर बद्र साहब की लिखी हुई ये ग़ज़ल । बद्र साहब इन दिनों अस्‍वस्‍थ हैं तथा स्‍मृति भ्रम का शिकार हो गये हैं । जिसे शायद अल्‍जाइमर भी कहते हैं । ईश्‍वर उनको स्‍वस्‍थ करे । सुनिये एल्‍बम विज़न्‍स से ली गई ये ग़ज़ल । ये एल्‍बम इसी प्रकार की दुर्लभ ग़ज़लों से भरा हुआ डबल कैसेट के सेट में आया था । जिसमें कैफ़ भोपाली साहब की मशहूर और मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल कौन आया है यहां भी शामिल थी । यदि प्‍लेयर न चले तो यहां जाकर सुनें http://www.archive.org/details/SarJhukaogeToPathar या यहां से डाउनलोड करें । http://www.divshare.com/download/7897590-55d अंकित सफर : अभी तक इनको केवल चित्रों में ही देखा है और जो देखा है उससे ये पाया है कि ये बहुत मासूम सूरत के धनी हैं । फिलहाल मुम्‍बई में किसी बैंक में सेवारत हैं । पूना से इन्‍होंने एमबीए का कोर्स अभी पूरा किया है और तुरंत ही नौकरी में आ गये हैं । उत्‍तराखंड के रहने वाले हैं और अभी इनकी शादी नहीं हूई । इनके लिये कोई सुंदर सी ग़ज़ल की तलाश जारी है जो इनकी जीवन संगिनी बन सके । हौसले रखता जवां हूँ कोशिशों की धार से. कुछ न कुछ मैं सीखता हूँ अपनी हर इक हार से. इक नयी उम्मीद लेके आएगी कल की सहर, रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से. बात जिसने भी कही ये खूब ही उसने कही, हो किसी को जीतना तो जीत लेना प्यार से. तू बहुत पीछे कहीं ना छूट जाये आदमी, चाहता पाना है सब कुछ तू बड़ी रफ़्तार से. या तो वादा ना करो या फिर निभाना भी उसे, बस यही हूं चाहता मैं हिंद की सरकार से. भीग सारे ही गए कागज़, ग़ज़ल ख़ुद भी &amp;quot;सफ़र&amp;quot;, याद के बादल उमड़ बरसे बहुत बौछार से. वाह वाह वाह बहुत अच्‍छे शेर निकाले हैं अंकित ने । विशेषकर जो मिसरा ए तरह के साथ गिरह बांधी है वो तो जिस प्रकार से सकारात्‍मक सोच लिये हुए है वो आनंद देने वाली है । मिसरे पर सकारात्‍मक गिरह भी बांधी जा सकती है ये बताने के लिये आभार अंकित की इस ग़ज़ल का । शेर आदमी वाला भी बहुत अच्‍छा है । बहुत अच्‍छी ग़ज़ल, मुशायरे को और ऊंचाइयों पर ले जाने के लिये बधाई । प्रकाश अर्श : प्रकाश के बारे में क्‍या कहूं । ये मेरे विचार में श्रद्धेय नीरज गोस्‍वामी जी का पाकेट संस्‍करण है । नीरज जी की विनम्रता, उनकी सौम्‍यता सब कुछ प्रकाश ने मानो नीरज जी से प्राप्‍त की है । बस एक ही चीज नहीं ले पाये नीरज जी की तरह खुलकर कहकहे लगाना और गर्मजोशी । उसमें इनका संकोची स्‍वभाव आड़े आ जाता है । खैर बहूरानी आयेग</itunes:summary><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/07/blog-post_14.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/TwX1_V4ZW9g/playlist" length="53067" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7897590-55d</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से, ये पूरा तरही मुशायरा अब समर्पित है अग्रज कवि, मंच पर शालीन और  निष्‍छल हास्‍य के हामी श्री ओम व्‍यास ओम को ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/vp8lb9eUDjg/blog-post_11.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Fri, 10 Jul 2009 20:49:37 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-5665235783599931422</guid><description>&lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlgLncVM0lI/AAAAAAAAA-Y/_PlTpcsUw2Y/s1600-h/omji3%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="omji3" border="0" alt="omji3" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlgLo3UApXI/AAAAAAAAA-c/mfiU5401sG8/omji3_thumb.jpg?imgmax=800" width="120" height="244" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;ओम जी को जाना था सो वो चले गये बावजूद हम सब की दुआओं और शुभकामनाओं के । कवि श्री संदीप शर्मा ने जैसा मुझे बताया था उस हिसाब से मन में कहीं न कहीं ये डर हमेशा ही लगा रहा पिछले एक माह में कि ओम जी हंसाते हंसाते रुला न जायें । और हुआ भी वही । बहुत सारी यादें हैं, बहुत सारी स्‍मृतियां हैं । यादें जो अच्‍छी होती हैं तो भी रुलाती हैं और बुरी होती हैं तो भी । कहीं किसी ब्‍लाग पर कमेंट में मैंने लिखा कि हम अब हंसने के अधिकारी ही नहीं रहें हैं । हम अपने जीवन में इतना कुछ गलत कर रहे हैं क‍ि अब हंसने जैसी निष्‍छल चीज पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं रहा है । और इसीलिये जब ओम जी जैसा कोई आकर हमें हंसाता है तो उस ऊपर वाले को ऐसा लगता है कि ये तो उसके अधिकार क्षेत्र में दखल कर रहा है और बस । ओम जी ने मंचों पर कभी भी फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों को सहारा नहीं लिया । उनकी &lt;strong&gt;कलावती लीलावती की कहानी &lt;/strong&gt;में इतना सौम्‍य हास्‍य है कि उसके आगे लाफ्टर जैसे हजारों कार्यक्रम भी बौने दिखाई देते हैं । उनके जाने के बाद कई बार उनकी कलावती लीलावती का वीडियो देखता रहा । उनकी कलावती लीलावती को आज मंच के कई सारे कवि अपने नाम से पढ़ रहें हैं लेकिन दादा का अपना अलग ही अंदाज था कलावती लीलावती पढ़ने का । सीहोर के मंच पर एक बार एक कवि ने एक अत्‍यंत अशालीन चुटकुला पढ़ दिया जिस पर उसको काफी तालियां भी मिलीं&amp;#160; । मंच पर दादा माणिक वर्मा, सांड नरसिंहपुरी, पवन जैन, अशोक भाटी जैसे कवि बैठे थे । ओम जी ने मुझे पास बुलाया और कहा बिठा दूं इसको । मैंने कहा दादा आप संचालक है जो उचित लगे सो करो । ओम जी ने माइक पर ऐसी झाड़ लगाई उस कवि को और कहा ये श्रोता वही खाते हैं जो हम परोसते हैं, आपके पास कविता हो तो पढ़ो नहीं तो बैठ जाओ । और वो कवि बैठ गये । जनता ने तालियां बजा कर ओम जी के निर्णय पर मुहर लगा दी । ऐसे थे ओम जी । मेरी श्रद्धांजलि और इस बार का पूरा तरही मुशायरा ओम जी की स्‍मृतियों को समर्पित । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlgLsrKxgnI/AAAAAAAAA-g/VecWO1ZGwzc/s1600-h/omji1%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="omji1" border="0" alt="omji1" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlgLwQsVwGI/AAAAAAAAA-k/ugxqLuvu1pk/omji1_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="635" height="270" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;strong&gt;स्‍मृति शेष :- &lt;/strong&gt;सीहोर का वो कवि सम्‍मेलन जिसका संचालन दादा ओम व्‍यास ने किया था&lt;/font&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;तरही मुशायरा &lt;/strong&gt;इस बार का तरही मुशायरा कुछ लम्‍बा चलना है और ये भी कि इस बार काफी अच्‍छी ग़ज़लें मिली हैं और इन ग़ज़लों में बहुत कुछ ऐसा है जो मन को छू लेने वाला है । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;बहर : &lt;/strong&gt;&amp;#160; इस बार हमने जो बहर ली थी वो बहुत ही आसान सी बहर थी । आसान लेकिन बहुत ही लोकप्रिय बहर है ये । कई अच्‍छी ग़ज़लें इस बहर पर लिखी गई हैं । मुनव्‍वर राना साहब की मशहूर ग़ज़ल का मशहूर शेर तो आपको याद ही होगा । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;लौटने में कम पड़ेगी उम्र की पूंजी हमें, आप तक आने में ही हमको ज़माने लग गये &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मुनव्‍वर भाई ने जिन बहरों पर जियादह काम किया है उनमें ये बहर भी है । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक क़ैदी की तरह मेरी अना बेबस रही, ख्‍वाहिशें घेरे रहीं मकड़ी के जाले तरह &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;तो ये है &lt;strong&gt;बहरे रमल&lt;/strong&gt; की एक &lt;strong&gt;मुजाहिफ बहर&lt;/strong&gt; जिसमें चार रुक्‍न हैं । चार में से तीन रुक्‍न तो स्‍थायी रुक्‍न हैं । बहरे रमल यानि कि जिसका स्‍थाई रुक्‍न है &lt;strong&gt;फाएलातनु &lt;/strong&gt;या &lt;strong&gt;2122 &lt;/strong&gt;। अब इस बहर में भी प्रारंभ्‍ा के तीन रुक्‍न तो बिना किसी मिलावट के हैं अर्थात कहीं कोई परिवर्तन नहीं हैं &lt;strong&gt;सालिम रुक्‍न&lt;/strong&gt; हैं । किन्‍तु अंतिम रुक्‍न में से एक पूरा दीर्घ कम हो गया है और वो &lt;strong&gt;2122&lt;/strong&gt; के स्‍थान पर केवल &lt;strong&gt;212 &lt;/strong&gt;ही रह गया है । चूंकि हम&amp;#160; जानते हैं कि जब भी किसी बहर के किसी रुक्‍न में कहीं कोई परिवर्तन होता है &lt;strong&gt;( मात्राओं का कम या जियादह हो जाना) &lt;/strong&gt;तो उस रुक्‍न का एक खास नाम हो जाता है । अब यहां पर इस बहर में &lt;strong&gt;212&lt;/strong&gt; या&amp;#160; &lt;strong&gt;फाएलुन&lt;/strong&gt;&amp;#160; रुक्‍न का नाम है &lt;strong&gt;महजूफ़ &lt;/strong&gt;। जाहिर सी बात है कि इस मुजाहिफ बहर के नाम में अब ये शब्‍द भी आयेगा । तो ये हुई &lt;strong&gt;बहरे रमल मुसमन महजूफ़ &lt;/strong&gt;। तोड़ कर कहें तो ये कि चूंकि स्‍थायी रुक्‍न है &lt;strong&gt;फाएलातुन&lt;/strong&gt;&amp;#160; सो ये है &lt;strong&gt;बहरे रमल&lt;/strong&gt; , चार रुक्‍न हैं इस कारण ये है &lt;strong&gt;मुसमन&lt;/strong&gt;&amp;#160; और &lt;strong&gt;फाएलुन&lt;/strong&gt;&amp;#160; भाइजान इसमें हैं सो ये मुजाहिफ बहर हो गई है जिसके नाम में&lt;strong&gt;&amp;#160; महजूफ़&lt;/strong&gt;&amp;#160; भी शामिल होगा । आइये इस बहर पर &lt;strong&gt;मदन मोहन जी&lt;/strong&gt; की कम्‍पोज़ की हुई, &lt;strong&gt;लता जी&lt;/strong&gt; की गई हुई और &lt;strong&gt;नक्‍शलायलपुरी साहब&lt;/strong&gt; की लिखी हुई ये शानदार ग़ज़ल सुनें । जो फिल्‍म &lt;strong&gt;दिल की राहें&lt;/strong&gt; से है । अगले अंक में इस बहर पर सुनाने के लिये गीत या ग़ज़ल आप को सुझाना है । कई बार फ्लेश प्‍लेयर नहीं मिलने के कारण ये गाने का लिंक नहीं दिखता है । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;object classid="clsid:D27CDB6E-AE6D-11cf-96B8-444553540000" width="350" height="24" id="_7635486230364"&gt; 	&lt;param name="movie" value="http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf?0.20708365396890088" /&gt; 	&lt;param name="allowfullscreen" value="true" /&gt; 	&lt;param name="allowscriptaccess" value="always" /&gt; 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href="http://www.archive.org/details/AapKiBatenKaren"&gt;http://www.archive.org/details/AapKiBatenKaren&lt;/a&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;या&amp;#160; यहां से डाउनलोड करें । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a title="http://www.divshare.com/download/7880870-47c" href="http://www.divshare.com/download/7880870-47c"&gt;http://www.divshare.com/download/7880870-47c&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt; आज हम तरही मुशायरे में दो शायरों को ले रहे हैं । मुशायरे का आगाज़ बहुत ही धमाकेदार हुआ है । &lt;strong&gt;आदरणीय सुधा ढींगरा जी&lt;/strong&gt; की कविता ने समां बांध दिया है । कविता सचमुच ही ऐसी थी जिसे रात के सन्‍नाटे में सुन लो तो आंख से आंसू कब बहने लगेंगें पता ही नहीं चलेगा । सुधा जी का बड़प्‍पन है कि वे हमारे इस छोटे से आयोजन में शामिल हुईं और हमारा मान बढ़ाया । आशा है आगे भी उनका नेह हमें मिलता रहेगा । मेरे लिये भी सौभाग्‍य है कि सावन के माह में एक बड़ी बहन मिलीं । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;दिगम्‍बर नासवा : &lt;/strong&gt;दिगम्‍बर की विशेषता उनकी वे छोटी छोटी प्रेम कविताएं हैं जो मन को छूती हुई गुजरती हैं । दिगम्‍बर नासवा दुबई में रहते हैं और उनकी कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है कि वहां रह कर वे अधिकांश समय प्रेम ही करते हैं । बहुत सुंदर प्रेम कविताएं लिखने वाले दिगम्‍बर तरही मुशायरे में ग़ज़ल का आग़ाज़ कर रहे हैं क्‍योंकि मुशायरे का धमाकेदार आगाज़ तो सुधा जी कविता से कर चुकी हैं । सुनिये दिगम्‍बर को । पहले यो फोटो देखें और जाने दिगम्‍बर की प्रेम कविताओं का राज । &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlgLx6mUjAI/AAAAAAAAA-o/hgsTqDKj_E4/s1600-h/DN-Anita%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="DN-Anita" border="0" alt="DN-Anita" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlgLz57iKyI/AAAAAAAAA-s/q86-rENrFLk/DN-Anita_thumb.jpg?imgmax=800" width="236" height="244" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रोज़ जो नीलाम होता है सरे बाज़ार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;हाँ वही नायाब गुंचा है तेरे गुलज़ार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;होंसला हो दिल में तो कश्ती उतारो लहर में&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;ये समुन्दर पार होता है नहीं पतवार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अपनी यादों के उजाले छोड़ कर क्यों आ गए&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;जागते में सो रहा या सोये में जागा हूँ मैं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;तू नहीं जाने दिगम्‍बर प्‍यार की भाषा अभी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आरजू, अरमान से,&amp;#160; अन्‍जान है तू प्यार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वाह वाह वाह बहुत अच्‍छे शेर निकाले हैं &lt;strong&gt;जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से&lt;/strong&gt;, खूब कहा है विशेषकर मिसरा उला तो बहुत ही बेहतरीन है । जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं । समां बांध दिया बधाई हो । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रकाश सिंह :&lt;/strong&gt;&amp;#160; ये &lt;strong&gt;प्रकाश अ&lt;/strong&gt;र्श नहीं हैं बल्कि &lt;strong&gt;प्रकाश सिंह&lt;/strong&gt; है । पहली बार मुशायरे में आ रहे हैं । इनके बारे में जानने की कोशिश की तथा&amp;#160; चित्र भी तलाशा किन्‍तु नहीं मिला । ये पाठशाला में अभी आये हैं तथा आते ही इन्‍होंने तरही में शामिल होने का शानदार प्रयास किया है । इनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली सो इनका एक मेल ही लगा रहा हूं जो इन्‍होंने मुझे भेजा था । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मैंने ब्लॉग के बारे में दो तीन महीने पहले ही जानना शुरू किया था...कभी कभी कविता लिखने का प्रयास भी किया..छंद के बारे में बहुत कम जानकारी थी...जो भी भाव आते थे कागज पर रख देता था...कभी कभी मात्राओ और वज्न के बारे में जानने का प्रयास किया पर एक गणित का विद्यार्थी हिंदी में कम कुशल ही होता है...फिर गौतम राजरिशी जी के ब्लॉग पर बहुत सुदर छंद में गजले पढ़ी..वहीं आपके बारे में जानकारी मिली...सुबीर संवाद सेवा ब्लॉग पर गया तो दिल बैठ गया ...आपने २००७ में गजल की कक्षाएं शुरू की थी और में बहु पीछे छूट गया था...खेर मैंने हिम्मत नहीं हारी और पिछले एक माह से आपकी पुराणिक पोस्ट्स पढ़ी..बस मोटा मोटा समझ पाया कि रदीफ़ काफिया,मात्राएँ,वज्न,रुक्न,और बहर और मिसरा से शेर और फिर गजल बनती है.. दोनों हाथ सामने रखकर आपके दे दनादन छडिया खाने को को तैयार हूँ...आप कहेंगे तो उड़नतश्तरी को उठा कर मैदान के चार चक्कर लगालूँगा....और अगर आपका नाम डुबो रहा हूँ तो माफ़ कर दीजियेगा...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;   &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रात भर आवाज देता है कोई उस पार से       &lt;br /&gt;साथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार से &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे       &lt;br /&gt;प्रेम के दो बोल काफी क्या मिलेगा खार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;देख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहा       &lt;br /&gt;ज्यूँ घटाएं रातभर जल जल हुईं मल्हार से        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगी       &lt;br /&gt;आँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा       &lt;br /&gt;हाथ खाली थे, सिकंदर जब गया संसार से        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;जाम थामे हाथ में साकी पिलाती बारहा       &lt;br /&gt;राज पाखी तू बता चढ़ता नशा क्यूँ हार से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बहुत बढि़या अंदाज और आगाज है प्रकाश जी, आपको उड़नतश्‍तरी को उठाकर मैदान के चक्‍कर लगाने की ज़रूरत बिल्‍कुल नहीं हैं । &lt;strong&gt;जीत के सारा वो रो पड़ा था बाखुदा, हाथ खाली थे सिकंदर जब गया संसार से&lt;/strong&gt;&amp;#160; एक सिकंदर के साथ बहुत अच्‍छी गिरह बांधी है । आनंद आ गया । मुहावरे और कहावतों को किसी ग़ज़ल के शेर में लेना बहुत मुश्‍किल काम होता है । मेरे एक मित्र हैं &lt;strong&gt;रियाज मोहम्‍मद रियाज &lt;/strong&gt;उनका मतला है&lt;strong&gt;&amp;#160; देश का हम क्‍या हाल सुनाएं, अंधे पीसें कुत्‍ते खाएं ।&lt;/strong&gt;&amp;#160; उसी प्रकार की गिरह बांधी है आपने सिकंदर के साथ । बहुत अच्‍छा है । अब हमारे पास दो प्रकाश हैं एक प्रकाश अर्श और दूसरे प्रकाश सिंह । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;चलिये आनंद लीजिये दोनों ग़ज़लों का और मुझे इजाजत दीजिये । अगले अंक में मिलते हैं दो और शायरों से । जो लोग अभी भी ग़ज़लें भेजना चाहें भेज सकते हैं । अभी एडमीशन चालू हैं । और हां बहर पर फिल्‍मी ये गैर फिलमी गीत ग़ज़ल अवश्‍य सुझायें । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-5665235783599931422?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/vp8lb9eUDjg" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-11T09:19:37.869+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">22</thr:total><media:content url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/ihjCWq9fjFE/playlist" fileSize="53067" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:subtitle> ओम जी को जाना था सो वो चले गये बावजूद हम सब की दुआओं और शुभकामनाओं के । कवि श्री संदीप शर्मा ने जैसा मुझे बताया था उस हिसाब से मन में कहीं न कहीं ये डर हमेशा ही लगा रहा पिछले एक माह में कि ओम जी हंसाते हंसाते रुला न जायें । और हुआ भी वही । बहुत सारी यादे</itunes:subtitle><itunes:author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</itunes:author><itunes:summary> ओम जी को जाना था सो वो चले गये बावजूद हम सब की दुआओं और शुभकामनाओं के । कवि श्री संदीप शर्मा ने जैसा मुझे बताया था उस हिसाब से मन में कहीं न कहीं ये डर हमेशा ही लगा रहा पिछले एक माह में कि ओम जी हंसाते हंसाते रुला न जायें । और हुआ भी वही । बहुत सारी यादें हैं, बहुत सारी स्‍मृतियां हैं । यादें जो अच्‍छी होती हैं तो भी रुलाती हैं और बुरी होती हैं तो भी । कहीं किसी ब्‍लाग पर कमेंट में मैंने लिखा कि हम अब हंसने के अधिकारी ही नहीं रहें हैं । हम अपने जीवन में इतना कुछ गलत कर रहे हैं क‍ि अब हंसने जैसी निष्‍छल चीज पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं रहा है । और इसीलिये जब ओम जी जैसा कोई आकर हमें हंसाता है तो उस ऊपर वाले को ऐसा लगता है कि ये तो उसके अधिकार क्षेत्र में दखल कर रहा है और बस । ओम जी ने मंचों पर कभी भी फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों को सहारा नहीं लिया । उनकी कलावती लीलावती की कहानी में इतना सौम्‍य हास्‍य है कि उसके आगे लाफ्टर जैसे हजारों कार्यक्रम भी बौने दिखाई देते हैं । उनके जाने के बाद कई बार उनकी कलावती लीलावती का वीडियो देखता रहा । उनकी कलावती लीलावती को आज मंच के कई सारे कवि अपने नाम से पढ़ रहें हैं लेकिन दादा का अपना अलग ही अंदाज था कलावती लीलावती पढ़ने का । सीहोर के मंच पर एक बार एक कवि ने एक अत्‍यंत अशालीन चुटकुला पढ़ दिया जिस पर उसको काफी तालियां भी मिलीं&amp;#160; । मंच पर दादा माणिक वर्मा, सांड नरसिंहपुरी, पवन जैन, अशोक भाटी जैसे कवि बैठे थे । ओम जी ने मुझे पास बुलाया और कहा बिठा दूं इसको । मैंने कहा दादा आप संचालक है जो उचित लगे सो करो । ओम जी ने माइक पर ऐसी झाड़ लगाई उस कवि को और कहा ये श्रोता वही खाते हैं जो हम परोसते हैं, आपके पास कविता हो तो पढ़ो नहीं तो बैठ जाओ । और वो कवि बैठ गये । जनता ने तालियां बजा कर ओम जी के निर्णय पर मुहर लगा दी । ऐसे थे ओम जी । मेरी श्रद्धांजलि और इस बार का पूरा तरही मुशायरा ओम जी की स्‍मृतियों को समर्पित । स्‍मृति शेष :- सीहोर का वो कवि सम्‍मेलन जिसका संचालन दादा ओम व्‍यास ने किया था तरही मुशायरा इस बार का तरही मुशायरा कुछ लम्‍बा चलना है और ये भी कि इस बार काफी अच्‍छी ग़ज़लें मिली हैं और इन ग़ज़लों में बहुत कुछ ऐसा है जो मन को छू लेने वाला है । बहर : &amp;#160; इस बार हमने जो बहर ली थी वो बहुत ही आसान सी बहर थी । आसान लेकिन बहुत ही लोकप्रिय बहर है ये । कई अच्‍छी ग़ज़लें इस बहर पर लिखी गई हैं । मुनव्‍वर राना साहब की मशहूर ग़ज़ल का मशहूर शेर तो आपको याद ही होगा । लौटने में कम पड़ेगी उम्र की पूंजी हमें, आप तक आने में ही हमको ज़माने लग गये मुनव्‍वर भाई ने जिन बहरों पर जियादह काम किया है उनमें ये बहर भी है । एक क़ैदी की तरह मेरी अना बेबस रही, ख्‍वाहिशें घेरे रहीं मकड़ी के जाले तरह तो ये है बहरे रमल की एक मुजाहिफ बहर जिसमें चार रुक्‍न हैं । चार में से तीन रुक्‍न तो स्‍थायी रुक्‍न हैं । बहरे रमल यानि कि जिसका स्‍थाई रुक्‍न है फाएलातनु या 2122 । अब इस बहर में भी प्रारंभ्‍ा के तीन रुक्‍न तो बिना किसी मिलावट के हैं अर्थात कहीं कोई परिवर्तन नहीं हैं सालिम रुक्‍न हैं । किन्‍तु अंतिम रुक्‍न में से एक पूरा दीर्घ कम हो गया है और वो 2122 के स्‍थान पर केवल 212 ही रह गया है । चूंकि हम&amp;#160; जानते हैं कि जब भी किसी बहर के किसी रुक्‍न में कहीं कोई परिवर्तन होता है ( मात्राओं का कम या जियादह हो जाना) तो उस रुक्‍न का एक खास नाम हो जाता है । अब यहां पर इस बहर में 212 या&amp;#160; फाएलुन&amp;#160; रुक्‍न का नाम है महजूफ़ । जाहिर सी बात है कि इस मुजाहिफ बहर के नाम में अब ये शब्‍द भी आयेगा । तो ये हुई बहरे रमल मुसमन महजूफ़ । तोड़ कर कहें तो ये कि चूंकि स्‍थायी रुक्‍न है फाएलातुन&amp;#160; सो ये है बहरे रमल , चार रुक्‍न हैं इस कारण ये है मुसमन&amp;#160; और फाएलुन&amp;#160; भाइजान इसमें हैं सो ये मुजाहिफ बहर हो गई है जिसके नाम में&amp;#160; महजूफ़&amp;#160; भी शामिल होगा । आइये इस बहर पर मदन मोहन जी की कम्‍पोज़ की हुई, लता जी की गई हुई और नक्‍शलायलपुरी साहब की लिखी हुई ये शानदार ग़ज़ल सुनें । जो फिल्‍म दिल की राहें से है । अगले अंक में इस बहर पर सुनाने के लिये गीत या ग़ज़ल आप को सुझाना है । कई बार फ्लेश प्‍लेयर नहीं मिलने के कारण ये गाने का लिंक नहीं दिखता है । &amp;#160; गीत यदि सुनाई नहीं दे रहा है तो सीधे इस लिंक पर जाकर सुन लें । http://www.archive.org/details/AapKiBatenKaren&amp;#160; या&amp;#160; यहां से डाउनलोड करें । http://www.divshare.com/download/7880870-47c आज हम तरही मुशायरे में दो शायरों को ले रहे हैं । मुशायरे का आगाज़ बहुत ही धमाकेदार हुआ है । आदरणीय सुधा ढींगरा जी की कविता ने समां बांध दिया है । कविता सचमुच ही ऐसी थी जिसे रात के सन्‍नाटे में सुन ल</itunes:summary><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/ihjCWq9fjFE/playlist" length="53067" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7880870-47c</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>सभी गुरुओं और विद्वजनों को प्रणाम करते हुए आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर हम प्रारंभ करते हैं तरही मुशायरा -रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/W5Gkhk9hW5E/blog-post_07.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 06 Jul 2009 22:39:14 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-4174011392873324529</guid><description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;( नोट अब ये ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में बिल्‍कुल नहीं खुल रहा है यदि आपके साथ भी ऐसा हो तो इसे मोजिला फायर फाक्‍स या गूगल क्रोम में खोलें । )&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;सभी गुरुओं को मेरी और से विनयां‍जलि पोस्‍ट पढ़ने से पहले इसे ज़रूर सुनें &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;object classid="clsid:D27CDB6E-AE6D-11cf-96B8-444553540000" width="350" height="24" id="_21184861109007"&gt; 	&lt;param name="movie" value="http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf?0.9742500983934026" /&gt; 	&lt;param name="allowfullscreen" value="true" /&gt; 	&lt;param name="allowscriptaccess" 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एक ही व्‍यक्ति करता था, शिक्षा भी वहीं देता था और ज्ञान भी वही देता था । इसीलिये तब एक ही दिन होता था गुरूपूर्णिमा का । किन्‍तु धीरे धीरे हुआ ये कि गुरू कम होते गये और शिक्षक बढ़ते गये ।और इसी कारण ये हुआ कि गुरू पूर्णिमा के अलग एक और दिन आ गया जिसे शिक्षक दिवस कहा गया । शिक्षा जो कि निर्धारित पुस्‍तकों में लिखे हुए कुछ पूर्व ये तय किये हुए पाठ हैं जिनको निर्धारित समय में निर्धारित तरीके से ही पढ़ाना है । ज्ञान, जिसमें कुछ निर्धारित नहीं है, जिसकी कोई सीमा नहीं है, जिसको कहीं किसी किताब ये पुस्‍तक में नहीं लिखा गया । वो असीम है, वो अनंत है, उसकी कोई सीमा नहीं होती । तो क्‍या एक बहुत अच्‍छा प्रवचनकार भी गुरू होगा ? मेरे विचार में नहीं हो सकता । एक प्रवचनकार जो कि रेशम के वस्‍त्र पहन कर, गले में सोने की मोटी मोटी मालाएं पहन कर हमें मोह माया से दूर रहने के प्रवचन दे रहा हो, वो किस प्रकार हमारा गुरू हो सकता है । उसकी तो स्‍वयं की ही कथनी और करनी में फर्क है । धर्म पर आधारित प्रवचनकारों को हमारे देश के प्राचीन इतिहास में कभी भी गुरू या संत का दर्जा नहीं दिया गया, उनका एक अलग नाम था कथा वाचक या प्रवचनकार । इनको हम शिक्षक की श्रेणी में ले सकते हैं । जिस प्रकार एक शिक्षक जो रसायन शास्‍त्र का बहुत अच्‍छा ज्ञाता है वो रसायन शास्‍त्र बहुत अच्‍छे से समझाता है उसी प्रकार ये प्रवचनकार भी किसी न किसी धर्मग्रंथ के बहुत अच्‍छे ज्ञाता हैं और इसी कारण ये उस विषय को बहुत अच्‍छे से समझाते हैं और उसी कारण ये भी शिक्षक हैं । शिक्षक के लिये आवश्‍यक नहीं होता कि वो जो कुछ कहे उस पर स्‍वयं भी अमल करे, किन्‍तु गुरू के लिये होता है । इसी कारण ये प्रवचनकार जो विषय विशेषज्ञ हैं ये भी यदि प्रवचन में ये कह रहे हैं कि मोह माया त्‍यागो, और स्‍वयं गले में सोने की मोटी सांकलें डाले हैं, तो भी ये दोषी नहीं हैं । क्‍योंकि ये तो आपको केवल वो बता रहे हैं जो कि किसी ग्रंथ में लिखा है । जिस प्रकार रसायन शास्‍त्र का शिक्षक पोटेशियम साइनाइड के जहरीलेपन का बताते समय उसे चाट कर नहीं बतायेगा, उसी प्रकार ये प्रवचनकार भी हैं । इसके विपरीत गुरू वो होता है जो कुछ कहने से पहले स्‍वयं उस पर अमल करता है । उसकी कथनी और करनी एक ही होती है । वो पुस्‍तकों से ज्ञान लेता है और उस ज्ञान पर आधारित अपनी ही एक धारा तैयार करता है । संत की परिभाषा और भी ऊपर है और वहां तक पहुंचना एक बहुत ही दुष्‍कर कार्य है । कुल मिलाकर बात ये कि शिक्षक वो होता है हमें पूर्व से बने हुए रास्‍तों पर चलने की शिक्षा प्रदान करता है, गुरू वो होता है जो हमें नये रास्‍ते स्‍वयं बनाने का ज्ञान देता है और संत वो होता है जो कि न तो पूर्व से बने रास्‍तों पर चलता है न ही नये बनाता है, वो तो चलता जाता है और उसके पद चिह्न ही आगे चलकर रास्‍ते बन जाते हैं । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;मेरे जीवन में कई सारे शिक्षक आये और कुछ गुरू भी आये । पहले गुरू जिनका मैं आज स्‍मरण करना चाहता हूं वो थे स्‍वर्गीय श्री मुरलीधर जी जोशी । ये वास्‍तव में तो शिक्षक थे और मुझे पढ़ाते थे । लेकिन ये वास्‍तव में गुरू थे । वे बहुत ही अलग तरह के थे । ग़रीब होने के बाद भी एक विचित्र प्रकार के स्‍वाभिमान से ठसाठस । गाते बहुत अच्‍छा थे । उनकी आवाज़ में 'आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें सुनने का एक अलग ही आनंद था । एक बार मैंने देखा कि उनकी शर्ट पर एक खटमल चल रहा है । मैंने कहा मास्‍साब हाथ सीधा करें मैं उसको मार देता हूं । वे मुस्‍कुराये और एक काग़ज फाड़ा उस पर उस छोटे से जीव को बिठाया और बाहर पेड़ों पर छोड़ दिया । मैंने कहा मास्‍साब ये क्‍यों किया तो बोले दया करने से अच्‍छा आनंद कोई नहीं हैं । उनसे बहुत कुछ सीखा । किन्‍तु असमय ही एक रात वे सोये तो उठे ही नहीं । मेरे अंदर करुणा का बीजारोपण करने वाले वही थे । मेरे पिता जो कि आज भी कर्म करते हैं रिटायरमेंट के लगभग बारह साल बाद भी, उनसे मैंने सीखा कि कर्म ही प्रधान है, उनसे एक बात और सीखी कि पैर उतने ही फैलाओ जितनी चादर हो । वे कभी भी कर्ज पर कोई चीज लेने की वकालत नहीं करते । फिर मेरी मां जिन्‍होंने मुझे स्थिर चित्‍त रहना सिखाया और प्रतिक्रिया देने के बजाय सहज रहने के गुण दिये । फिर काफी लोग मिले । जैसे श्री नारायण कासट जी जिन्‍होंने मुझे कविता के बारे में काफी ज्ञान दिया । श्री रमेश हठीला जी जिन्‍होंने गीत की रचना करना सिखाया और पुस्‍तकों से सीखा गया बहुत सारा ज्ञान जो उन रचनाकारों के कारण सीख पाया । जिनकी वे पुस्‍तकें थीं । रेणु जी, गुलशन नंदा जी, मन्‍‍टो जी, कमलेश्‍वर जी, रविन्‍द्र कालिया जी ये वो कहानीकार हैं जिन्‍होंने मुझे कहानी से परिचय करवाया, मैं एकलव्‍य की तरह इनसे बिना मिले ही इनके साहित्‍य को गुरू बना कर साधना करता रहा । लता मंगेशकर जी की आवाज़ को भी मैं अपना गुरू मानता हूं क्‍योंकि उसी आवाज़ ने मुझे बताया कि जीवन में सुरीला होना कितना ज़रूरी है ।&amp;#160; आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर सभी गुरुओं को मेरी विनयांजलि, मैं जहां भी आज हूं वहां कतई नहीं होता यदि ये सब नहीं होते । मुझे जो कुछ बनाया है वो मेरे गुरुओं ने बनाया है । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;तरही मुशायरा इस बार का काफी रोचक होना है । इस बार जो ग़ज़लें प्राप्‍त हुई हैं उनमें कुछ शेर तो बस ऐसे हैं कि मन को छूते हुए गुजर जाते हैं । इस बार का मिसरा था &lt;strong&gt;रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से&lt;/strong&gt;&amp;#160; । कई लोगों ने मिसरे को खूब सराहा । हकीकत ये है कि बरसों पहले डायरी में अटकाया ये मिसरा जिस पर कभी मिसरे से आगे कुछ नहीं कर पाया उस पर लोगों ने इतनी सुंदर ग़ज़लें लिख दीं कि अपने पर शर्म आती है । कंचन ने आज फोन लगाया तो बड़ी अच्‍छी बात कही &lt;strong&gt;गुरूजी आवाज़ तो कोई सबको ही देता है रात भर लेकिन कवि उस आवाज़ को&amp;#160; पहचान लेता है और उसे शब्‍दों में ढाल देता है ।&lt;/strong&gt;&amp;#160; कंचन ने मानों मिसरे को पूरा खोल कर रख दिया ।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt; एक दिन मोबाइल पर अचानक एक बहुत ही सुरीली आवाज़ सुनाई दी पहले तो मैं हलो से आगे ही कुछ नहीं कह पाया क्‍योंकि आवाज़ का सुरीलापन ही कुछ नहीं कहने दे रहा था । फिर आवाज़ ने अपना परिचय दिया &lt;strong&gt;मैं सुधा ढींगरा बोल रही हूं। &lt;/strong&gt;हिंदी की जानी मानी कथाकार जिनकी कहानियां हिंदी की लगभग हर पुस्‍तक में मैंने तब पढ़ीं जब मैं लिखना सीख रहा था, एक क्षण को मैं स्‍तब्‍ध सा रहा ही कुछ बोल पाया । सुधा दीदी ने कहा कि&amp;#160; आप ने एक पंक्ति अपने ब्लाग पर डाली थी, मैं ग़ज़ल तो नहीं लिखती पर एक छंदमुक्त कविता पढ़ने के लिए भेज रही हूँ. वह पंक्ति मुझे बहुत पसंद आई और कुछ लिखा गया, पंजाब के चर्चित प्रेमियों पर । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt; ये हमारा सौभाग्‍य है कि हिंदी की इतनी दिग्‍गज कथाकार &lt;a href="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaOmDhingra/SudhaOmDhingra.htm"&gt;डॉ. सुधा ओम ढींगरा&lt;/a&gt; जी की एक बहुत ही सुंदर कविता हमें आर्शिवाद के रूप में प्राप्‍त हुई है । आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर ये सुंदर कविता समर्पित है सभी गुरुजनों को । एक बात जिन दिनों में कहानी लिखना सीखने के दौर में था तब जिन लेखिकाओं की कहानियां मुझे खूब भाती थीं उनमें सुधा जी भी हैं, मालती जोशी जी, ममता कालिया जी, नूर जहीर दीदी और सुधा जी । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;पहले सुधा जी का परिचय डॉ. सुधा ओम ढींगरा,कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, समाज सेवी और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अनथक सिपाही।हिन्दी, उर्दू और पंजाबी की चर्चित पत्रकार हैं। जालन्धर रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की कलाकार रही हैं। मेरा दावा है (अमेरिका के हिन्दी कवियों का काव्य संग्रह), तलाश पहचान की (काव्य संग्रह), माँ ने कहा था (काव्य कैसेट), परिक्रमा (पंजाबी से हिन्दी में अनुवादित उपन्यास), सफर यादों का (काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन), वसूली (कहनी संग्रह प्रकाशनाधीन), और गंगा बहती रही (उपन्यास प्रकाशनाधीन), मेरा दावा है (भाग दो) -कार्य चल रहा है। काव्य सहयोग विश्वा तेरे - काव्य सुमन (सम्पादक गिरीश जौहरी), प्रवासी हस्ताक्षर (सम्पादक डॉ. अंजना संधीर), सात समन्दर पार से (सम्पादक डॉ. अंजना संधीर), पश्चिम की पुरवाई (सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय, सत्यनारायण मौर्य ’बाबा’) पत्रकारिता : संवाददाता -प्रवासी टाइम्स (यू.के.) स्तंभ लेखिका - शेरे-ए-पंजाब (पंजाबी) विदेशी प्रतिनिधी - पंजाब केसरी, जगवाणी, हिन्द समाचार सम्मान : 21 सितम्बर, 1996 अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक काय… के लिए वाशिंगटन डी.सी. में एम्बैसेडर नरेश चन्द्र से सम्मानित। हिन्दी साहित्य की सेवाओं के लिए नार्थ कैरोलाईना में नागरिक अभिनंदन। ’हैरिटेज सोसाइटी (नार्थ कैरोलाइना)’ द्वारा &amp;quot;प्रतिष्ठित कवियत्री, वर्ष 2005&amp;quot; से सम्मानित। सम्पर्क : ceddlt@yahoo.com&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlLfd4ZQN5I/AAAAAAAAA-Q/51FcTDf4rVU/s1600-h/Sudha_Om_Dhingra%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="Sudha_Om_Dhingra" border="0" alt="Sudha_Om_Dhingra" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SlLffefOXsI/AAAAAAAAA-U/JstL8uT5ZSM/Sudha_Om_Dhingra_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="148" height="199" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रात भर आवाज़ देता है       &lt;br /&gt;कोई उस पार से......        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;सुन सोहणी उसे       &lt;br /&gt;उठा माटी का घड़ा        &lt;br /&gt;तैर जाती है        &lt;br /&gt;चनाव के पानियों में        &lt;br /&gt;मिलने अपने महिवाल को        &lt;br /&gt;खड़ा है जो नदी के उस पार.....        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;सस्सी भटकती है थलों में       &lt;br /&gt;सूनी काली रातों में        &lt;br /&gt;छोड़ गया था पुन्नू सोती सस्सी को        &lt;br /&gt;पुन्नू पुन्नू है पुकारती        &lt;br /&gt;शायद सुन ले वह उसकी पुकार        &lt;br /&gt;खड़ा है जो मरू के उस पार......        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;फ़रहाद तोड़ता है पहाड़       &lt;br /&gt;नदी दूध की निकालने        &lt;br /&gt;शर्त प्यार की पूरी करने        &lt;br /&gt;तड़प रहा है मिलने शीरी से        &lt;br /&gt;पहुँच न पाया उस तक        &lt;br /&gt;खड़ी है जो पहाड़ों के उस पार......        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;साहिबा ने छोड़ा घर- बार       &lt;br /&gt;छोड़े भाई और परिवार        &lt;br /&gt;भाग निकली मिर्ज़ा संग        &lt;br /&gt;गीत में हेक जब लगाई उसने        &lt;br /&gt;खड़ा है जो झाड़ियों के उस पार......        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;हीर ने झाँझर की आवाज़ दबा       &lt;br /&gt;ओढ़नी से मुँह छुपा        &lt;br /&gt;चुपके से मिलने निकल पड़ी        &lt;br /&gt;मधुर स्वर राँझे का उभरा जब        &lt;br /&gt;खड़ा है दूर जो घरों के उस पार.........&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="left"&gt;तरही मुशायरे का इससे अच्‍छा आगाज़ कुछ नहीं हो सकता था । सुधा जी हिंदी की जिस प्रकार सेवा कर रहीं हैं वो अद्भुत हैं । उनके कार्यों को देखकर लगता है कि हां हिंदी की लड़ाई हम हारेंगें नहीं आखिर जीत हमारी ही होगी । आनंद लीजिये इस बहुत ही सुंदर कविता का । सभी गुरुजनों को पुन: पुन: प्रणाम । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-4174011392873324529?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/W5Gkhk9hW5E" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-07T11:09:14.261+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">18</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/07/blog-post_07.html</feedburner:origLink></item><item><title>गरज कर झूम कर बादल उठे हैं आ भी जाओ तुम ( बरसाती ग़ज़ल) । एक अजूबा हमारे शहर में हुआ बरसात एक बूंद भी नहीं हुई लेकिन नदी में जबरदस्‍त बाढ़ आ गई ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/2pwxj9x17dA/blog-post.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 06 Jul 2009 03:49:12 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-1481433726998985674</guid><description>&lt;p&gt;बरसात, एक ऐसी ऋतु जो हर कवि, लेखक, शायर की सबसे पसंदीदा ऋतु होती है । जब उमड़ घुमड़ के काले मेघ आसमान पर छाते हैं तो ऐसा लगता है मानो आसमान धरती को प्रेम करने के लिये झुका जा रहा है । बहुत पहले एक वर्षा गीत लिखा था अब पूरा तो याद नहीं लेकिन कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं &lt;strong&gt;''मत कहो इसे घन गर्जन है, ये नभ का प्रणय निवेदन है'' ''चपला है या वरमाला है, अंबर ने जिसे उछाला है'' &lt;/strong&gt;वर्षा मंगल काव्‍य गोष्टियों में इसको बहुत पसंद किया जाता था । अब तो लगभग विस्‍मृत सा हो गया है ये गीत शायद पुरानी किसी डायरी में हो मिला तो पूरा सुनाने की कभी कोशिश करूंगा ।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;बरसात के गीत- &lt;/strong&gt;बरसात को लेकर कई सारे गीत बने हैं । कुछ तो ऐसे हैं कि जो वर्षा का पूरा चित्र सामने ले आते हैं । मेरी कई सारी जो इच्‍छाएं अधूरी हैं उनमें एक ये भी है कि कभी किसी वर्षा से घिरे पहाड़ी जंगल में रात बिताऊं और रात भर वर्षा की ध्‍वनियां सुनूं । वर्षा जो सबसे बड़ी संगीतकार है ।&amp;#160; फिलहाल तो ये गीत सुनाने की इच्‍छा हो रही है जो फिल्‍म परख का है और जिसे लता जी ने ऐसे गाया है कि यूं लगता है मानो सामने बरसात हो ही रही हो । मेरे पसंदीदा वर्षा गीत में&lt;strong&gt;&amp;#160; बरसन लागीं सावन बुंदिया-बेगम अख्‍तर, रिमझिम गिरे सावन- लताजी तथा किशोर जी, नाच रे मयूरा नाच रे मयूरा-मन्‍नादा, सावन की रिमझिम में -मन्‍ना दा, बादल तो आये लहरा के छाये-लताजी, अंबुआ तले डोला रख दे मुसाफिर-सुधा मल्‍होत्रा, उमड़ घुमड़ के आई घटा-दो आंखें बारह हाथ, हरियाला सावन ढोल बजाता-दो बीघा जमीन, बादल यूं गरजता है-बेताब, रिमझिम के तराने लेकर आई-काला बाजार, लगी आज सावन की- चांदनी,&amp;#160;&amp;#160; &lt;/strong&gt;और कई कई गीत हैं । कभी अलग से हम इन गीतों की बात करेंगें । फिलहाल तो ये गीत सुनें ।&lt;object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" codebase="http://fpdownload.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=8,0,0,0" width="335" height="28" id="divplaylist"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7840118-c02" /&gt;&lt;embed src="http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7840118-c02" width="335" height="28" name="divplaylist" type="application/x-shockwave-flash" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बरसात का चमत्‍कार-&lt;/strong&gt;बरसात का ही एक अनोखा चमत्‍कार सीहोर में हुआ । शहर से होकर बहने वाली छोटी सी नदी सीवन पिछले पांच महीनों से बिल्‍कुल ही सूखी पड़ी थी । कल भी दोपहर तक वही हालत थी कि लोग पानी बरसने की उम्‍मीद लगाये बैठे थे । बच्‍चे उसी प्रकार सूखी नदी में खेल रहे थे जैसे खेलते हैं । कि अचानक चमत्‍कार हुआ अचानक देखते ही देखते नदी उफन पड़ी और इस प्रकार की बात की बात में बाढ़ जैसा दृष्‍य हो गया । लोग हैरान थे कि आसमान खाली है कहीं कोई बारिश नहीं है फिर ये बाढ़ कहां से आ गई । पूरा शहर नदी के किनारे एकत्र हो गया । पता चला कि ऊपर कहीं पहाड़ी इलाके में जोरदार बारिश हुई है जो नदी का जल संग्रहण क्षेत्र है । वहीं का पानी ये आ रहा है । इसे कहते हैं प्रकृति का चमत्‍कार इधर सर पर सूरज चमक रहा था । लोग पानी को तरस रहे थै और उधर सूखी नदी में अचानक ही बाढ़ आ गई । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;तरही मुशायरा-&lt;/strong&gt;तरही मुशायरे को लेकर इस बार काफी उत्‍साह लोगों ने दिखाया है और काफी लोगों की ग़ज़लें मिल चुकी हैं । इस बार की ग़ज़लें सचमुच ऐसी हैं कि सुनने में आनंद आ जायेगा । मेरी इच्‍छा तो ये थी कि सभी की ग़ज़लें उन्‍हीं की आवाज में लगाता किन्‍तु बात वही है कि सबके पास रिकार्डिंग की सुविधा जाने हो या न हो । चलिये ऐसा करेंगें कि इस बार एक वर्षा मंगल काव्‍य गोष्‍ठी करेंगें जिसमें कि सभी की आवाज में ही कविताये होंगीं । फिलहाल तो बात तरही मुशायरे की जिसको लेकर कई सारी रचनाएं तो आ गई हैं और अभी भी आ रही हैं । मेरा विचार है कि 7 जुलाई को तरही मुशायरे का आयोजन प्रारंभ करने का । अपने सभी ज्ञात अज्ञात गुरुओं और उस्‍तादों को गुरू पूर्णिमा के अवसर पर अपनी और से समर्पित करते हुए ये तरही मुशायरे का आयोजन करने की इच्‍छा है । ज्ञात अज्ञात इसलिये क्‍योंकि कई सारे ऐसे हैं जिन्‍होंने मुझे हाथ पकड़ कर सिखाया तो कई ऐसे हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा कभी मिला नहीं । उन सबको मेरी और से एक भावांजलि होगा इस बार का तरही मुशायरा । तो 7 जुलाई गुरू पूर्णिमा को हम प्रारंभ करते हैं मिसरे ' रात भर आवाज देता है कोई उस पार से' जिस पर कई अच्‍छी रचनायें हैं । और हां अगला मुशायरा केवल बहर पर होगा जिसमें कोई मिसरा नहीं दिया जायेगा केवल बहर दी जायेगी जिस पर लिखना होगा । और उसमें कम से कम एक शेर बरसात पर, एक सावन पर और एक बहन पर या राखी पर रखना होगा । बहर क्‍या होगी वो जल्‍द ही । &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक बहुत पुरानी ग़ज़ल-&lt;/strong&gt;&amp;#160; बरसात से याद आया कि जब लिखना सीख रहा था । उस समय उस्‍ताद लोग कहते थे कि इस पर लिखो उस पर लिखो । कभी दीपावली आ जाती थी तो आदेश होता था कि दीवाली की गोष्ठियां होनी है दीवाली पर लिखो कभी होली तो कभी कुछ और । ऐसे ही कभी किसी वर्षा मंगल में जाना था सो उस्‍ताद का आदेश हुआ कि बरसात पर ग़ज़ल लिख कर लाना । वो दौर था जब ग़ज़ल का ककहरा सीख ही रहे थे । खैर जैसे तैसे लिख कर ले गये । कुछ शेर पसंद भी किये गये । आज बरसों बाद वो ग़ज़ल कहीं से निकली तो यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं । ग़ज़ल जस की तस है जैसी उस समय लिखी थी वैसी ही । कुछ परिवर्तन करके उसका टटकापन समाप्‍त नहीं करना चाहता । जहां जो कमियां हैं वे भी वैसी ही हैं जो लगभग पन्‍द्रह साल पहले की उस गोष्‍ठी के समय थीं । एक और ग़ज़ल भी निकली है जो रक्षाबंधन पर हुई एक बहनों की गोष्‍ठी के लिये लिखी थी । उसे बाद में दैनिक भास्‍कर ने भी छापा । वो कभी बाद में आज तो ये बरसाती ग़ज़ल । आज माड़साब पकड़ में आये हैं एक पुरानी ग़ज़ल देकर सो इसमें खूब छांटिये दोष बहर के कहन के, मात्राओं के, उच्‍चारण के और खबर लीजिये माड़साब की । चूंकि पन्‍द्रह साल पुरानी ग़ज़ल है अत: दोष तो होंगें ही । &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sk7v5knfFaI/AAAAAAAAA90/GVXU6wYbQzw/s1600-h/rain_forest_tropic%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="rain_forest_tropic" border="0" alt="rain_forest_tropic" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sk7v7gDi1FI/AAAAAAAAA94/Z8X5Pay0dSQ/rain_forest_tropic_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="477" height="360" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;गरज कर झूम कर बादल उठे हैं ,आ भी जाओ तुम ।       &lt;br /&gt;तुम्हारी राह में मौसम बिछे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;कहीं पर बात हम तुम में ,कोई ठहरी हुई सी है ।       &lt;br /&gt;शुरू करने हमें कुछ सिलसिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;जहां पर ख्वाब कोई हमने तुमने ,मिल के रोपा था ।        &lt;br /&gt;वहीं उस मोड़ पर ही हम खड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;जहां तक देखिये नज़रों की हद तक ,सिर्फ बारिश है ।       &lt;br /&gt;फुहारों के दुपट्टे से उड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;बुझा है चांद का कंदील अब तो बस अंधेरा है ।       &lt;br /&gt;सितारों के भी सब दीपक बुझे हैं , आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;लगे है यूं के ज्यों पाज़ेब खनकाई&amp;#160; है ये तुमने ।       &lt;br /&gt;छमाछम छम छमाछम सुर बजे हैं ,आ भी जाओ तुम॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अंधेरी रात है ,बरसात है ,और उफ़ ये तनहाई ।       &lt;br /&gt;सबर के जाम अब मुंह तक भरे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;कहीं झींगुर की चिकमिक है ,कहीं बारिश की छम छम है ।       &lt;br /&gt;सभी सुर आज आपस में&amp;#160; मिले हैं&amp;#160; ,आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अंधेरा है भले बाहर ,मगर घर में उजाला है ।       &lt;br /&gt;तुम्हारी याद के दीपक जले हैं ,आ भी जाओ तुम॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;भिगो कर हाथ बारिश में, मुझे छूती हैं आ आकर ।       &lt;br /&gt;हवाऐं&amp;#160; आज पागल सी फिरे हैं , आ भी जाओ तुम ॥ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अभी कल तक तो बंजर था ,मगर अब आके देखो तो।       &lt;br /&gt;यहां पर हसरतों के गुल खिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sk7wi3W9O7I/AAAAAAAAA98/aBQrTcGuqHU/s1600-h/rain_forest11024x768%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="rain_forest11024x768" border="0" alt="rain_forest11024x768" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sk7wmGPuDDI/AAAAAAAAA-E/Qg3NgMGv650/rain_forest11024x768_thumb%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="482" height="362" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-1481433726998985674?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/2pwxj9x17dA" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-06T16:19:12.147+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><media:content url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/NeHn0ARTXqc/playlist" fileSize="53067" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:subtitle> बरसात, एक ऐसी ऋतु जो हर कवि, लेखक, शायर की सबसे पसंदीदा ऋतु होती है । जब उमड़ घुमड़ के काले मेघ आसमान पर छाते हैं तो ऐसा लगता है मानो आसमान धरती को प्रेम करने के लिये झुका जा रहा है । बहुत पहले एक वर्षा गीत लिखा था अब पूरा तो याद नहीं लेकिन कुछ पंक्तियां</itunes:subtitle><itunes:author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</itunes:author><itunes:summary> बरसात, एक ऐसी ऋतु जो हर कवि, लेखक, शायर की सबसे पसंदीदा ऋतु होती है । जब उमड़ घुमड़ के काले मेघ आसमान पर छाते हैं तो ऐसा लगता है मानो आसमान धरती को प्रेम करने के लिये झुका जा रहा है । बहुत पहले एक वर्षा गीत लिखा था अब पूरा तो याद नहीं लेकिन कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं ''मत कहो इसे घन गर्जन है, ये नभ का प्रणय निवेदन है'' ''चपला है या वरमाला है, अंबर ने जिसे उछाला है'' वर्षा मंगल काव्‍य गोष्टियों में इसको बहुत पसंद किया जाता था । अब तो लगभग विस्‍मृत सा हो गया है ये गीत शायद पुरानी किसी डायरी में हो मिला तो पूरा सुनाने की कभी कोशिश करूंगा । बरसात के गीत- बरसात को लेकर कई सारे गीत बने हैं । कुछ तो ऐसे हैं कि जो वर्षा का पूरा चित्र सामने ले आते हैं । मेरी कई सारी जो इच्‍छाएं अधूरी हैं उनमें एक ये भी है कि कभी किसी वर्षा से घिरे पहाड़ी जंगल में रात बिताऊं और रात भर वर्षा की ध्‍वनियां सुनूं । वर्षा जो सबसे बड़ी संगीतकार है ।&amp;#160; फिलहाल तो ये गीत सुनाने की इच्‍छा हो रही है जो फिल्‍म परख का है और जिसे लता जी ने ऐसे गाया है कि यूं लगता है मानो सामने बरसात हो ही रही हो । मेरे पसंदीदा वर्षा गीत में&amp;#160; बरसन लागीं सावन बुंदिया-बेगम अख्‍तर, रिमझिम गिरे सावन- लताजी तथा किशोर जी, नाच रे मयूरा नाच रे मयूरा-मन्‍नादा, सावन की रिमझिम में -मन्‍ना दा, बादल तो आये लहरा के छाये-लताजी, अंबुआ तले डोला रख दे मुसाफिर-सुधा मल्‍होत्रा, उमड़ घुमड़ के आई घटा-दो आंखें बारह हाथ, हरियाला सावन ढोल बजाता-दो बीघा जमीन, बादल यूं गरजता है-बेताब, रिमझिम के तराने लेकर आई-काला बाजार, लगी आज सावन की- चांदनी,&amp;#160;&amp;#160; और कई कई गीत हैं । कभी अलग से हम इन गीतों की बात करेंगें । फिलहाल तो ये गीत सुनें । बरसात का चमत्‍कार-बरसात का ही एक अनोखा चमत्‍कार सीहोर में हुआ । शहर से होकर बहने वाली छोटी सी नदी सीवन पिछले पांच महीनों से बिल्‍कुल ही सूखी पड़ी थी । कल भी दोपहर तक वही हालत थी कि लोग पानी बरसने की उम्‍मीद लगाये बैठे थे । बच्‍चे उसी प्रकार सूखी नदी में खेल रहे थे जैसे खेलते हैं । कि अचानक चमत्‍कार हुआ अचानक देखते ही देखते नदी उफन पड़ी और इस प्रकार की बात की बात में बाढ़ जैसा दृष्‍य हो गया । लोग हैरान थे कि आसमान खाली है कहीं कोई बारिश नहीं है फिर ये बाढ़ कहां से आ गई । पूरा शहर नदी के किनारे एकत्र हो गया । पता चला कि ऊपर कहीं पहाड़ी इलाके में जोरदार बारिश हुई है जो नदी का जल संग्रहण क्षेत्र है । वहीं का पानी ये आ रहा है । इसे कहते हैं प्रकृति का चमत्‍कार इधर सर पर सूरज चमक रहा था । लोग पानी को तरस रहे थै और उधर सूखी नदी में अचानक ही बाढ़ आ गई । तरही मुशायरा-तरही मुशायरे को लेकर इस बार काफी उत्‍साह लोगों ने दिखाया है और काफी लोगों की ग़ज़लें मिल चुकी हैं । इस बार की ग़ज़लें सचमुच ऐसी हैं कि सुनने में आनंद आ जायेगा । मेरी इच्‍छा तो ये थी कि सभी की ग़ज़लें उन्‍हीं की आवाज में लगाता किन्‍तु बात वही है कि सबके पास रिकार्डिंग की सुविधा जाने हो या न हो । चलिये ऐसा करेंगें कि इस बार एक वर्षा मंगल काव्‍य गोष्‍ठी करेंगें जिसमें कि सभी की आवाज में ही कविताये होंगीं । फिलहाल तो बात तरही मुशायरे की जिसको लेकर कई सारी रचनाएं तो आ गई हैं और अभी भी आ रही हैं । मेरा विचार है कि 7 जुलाई को तरही मुशायरे का आयोजन प्रारंभ करने का । अपने सभी ज्ञात अज्ञात गुरुओं और उस्‍तादों को गुरू पूर्णिमा के अवसर पर अपनी और से समर्पित करते हुए ये तरही मुशायरे का आयोजन करने की इच्‍छा है । ज्ञात अज्ञात इसलिये क्‍योंकि कई सारे ऐसे हैं जिन्‍होंने मुझे हाथ पकड़ कर सिखाया तो कई ऐसे हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा कभी मिला नहीं । उन सबको मेरी और से एक भावांजलि होगा इस बार का तरही मुशायरा । तो 7 जुलाई गुरू पूर्णिमा को हम प्रारंभ करते हैं मिसरे ' रात भर आवाज देता है कोई उस पार से' जिस पर कई अच्‍छी रचनायें हैं । और हां अगला मुशायरा केवल बहर पर होगा जिसमें कोई मिसरा नहीं दिया जायेगा केवल बहर दी जायेगी जिस पर लिखना होगा । और उसमें कम से कम एक शेर बरसात पर, एक सावन पर और एक बहन पर या राखी पर रखना होगा । बहर क्‍या होगी वो जल्‍द ही । एक बहुत पुरानी ग़ज़ल-&amp;#160; बरसात से याद आया कि जब लिखना सीख रहा था । उस समय उस्‍ताद लोग कहते थे कि इस पर लिखो उस पर लिखो । कभी दीपावली आ जाती थी तो आदेश होता था कि दीवाली की गोष्ठियां होनी है दीवाली पर लिखो कभी होली तो कभी कुछ और । ऐसे ही कभी किसी वर्षा मंगल में जाना था सो उस्‍ताद का आदेश हुआ कि बरसात पर ग़ज़ल लिख कर लाना । वो दौर था जब ग़ज़ल का ककहरा सीख ही रहे थे । खैर जैसे तैसे लिख कर ले गये । कुछ शेर पसंद भी किये गये । आज बरसों बाद वो ग़ज़ल कहीं से निकली तो यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं । ग़ज़ल</itunes:summary><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/07/blog-post.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/NeHn0ARTXqc/playlist" length="53067" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7840118-c02</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से, कौन देता है कोई नहीं जानता लेकिन कोई है तो सही जो पुकारता है और कवि, शायर, कहानीकार उसको तलाशता रहता है ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/9_2YQm_MJPk/blog-post_29.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Sun, 28 Jun 2009 20:03:17 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-1072840049143876566</guid><description>बहुत दिनों के बाद आ रहा हूं । दरअसल में कुछ नया काम प्रारंभ किया है सो उसकी व्‍यस्‍तता बनी है । जो नया काम प्रारंभ किया है उसमें आप सबकी शुभकामनाएं चाहिये कि उसमें सफलता मिले । नये काम को लेकर कई दिनों से ऊहापोह की हालत थी । रविकांत और वीनस केसरी से मामले में चर्चा की इसलिये कि दोनों उसी इलाके के हैं । दोनों ने ही जब ग्रीन सिग्‍नल दिया तो काम प्रारंभ करने का हौसला आया । अपने कम्‍प्‍यूटर प्रशिक्षण संस्‍थान में हम लोग कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर, नेटवर्किंग तथा ग्राफिक्‍स आदि का काम करवाते हैं । किन्‍तु पिछले कुछ दिनों से लग रहा था कि कुछ कालेज स्‍तर का काम भी किया जाये । सो बस वही काम प्रारंभ किया है । अब देखें कि कहां तक पहुंचते हैं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तरही मुशायरा -&lt;/span&gt; इस बार के तरही को लेकर कई अच्‍छी रचनाएं मिल रही हैं । सुधा ओम ढींगरा जी ने उस मिसरे को लेकर एक बहुत ही सुंदर कविता लिख भेजी है । कविता ऐसी है कि पलकों की कोरें नम हो जायें । कुछ ग़ज़लें भी बहुत जबरदस्‍त मिलीं हैं । दरअसल में इस बार का मिसरा हांट करने वाला मिसरा है । हम सबके, हम जो रचनाकार हैं हम सबके साथ ही ये होता है कि हमको ऐसा लगता है जैसे कोई हमें आवाज़ दे रहा है । कौन है हम भी नहीं जानते लेकिन आवाज़ सुनसान रातों में हम सुनते हैं । आवाज़ उस पार की, आवाज़ जो हमें खींचती है बुलाती है । ये ही आवाज़ कई बार रचनाकार के लिये पीड़ादायी हो जाती है । कभी कोई गुरुदत्‍त आत्‍महत्‍या कर लेता है तो कभी कोई मीनाकुमारी शराब में डूब जाती है तो कभी कोई मुकुल शिवपुत्र नैराश्‍य में समा जाता है । बच्‍चन जी की पत्‍नी का जब निधन हुआ तब वे भी उसी नैराश्‍य में थे और उसी नैराश्‍य को उन्‍होंने कविता में ढाल दिया । मुकुल शिवपुत्र जी की भी पत्‍नी का निधन असहज परिस्थितियों में हुआ और वे टूट गये । बात वही है कि कोई आवाज़ देता है उस पार से । मेरी हमेशा से इच्‍छा रही है कि मैं किसी ऐसे शहर में रहूं जहां नदी हो, तालाब हो और पहाड़ हों । लेकिन मेरे शहर में ये तीनों ही नहीं हैं । मगर फिर भी रात के सन्‍नाटे में यूं लगता है कि नदी आ गई है और उस पार से कोई पुकार रहा है । शायद साहिर लुधियानवी का शेर है प्‍यास जो मेरी बुझ गई होती, जिन्‍दगी फिर न जिन्‍दगी होती । तरही का आयोजन होने ही वाला है सो जल्‍द रचनायें भेजें । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बहरे मुजारे -&lt;/span&gt;  बहरे मुजारे के बारे में हमने पिछली बार कुछ बातें कीं थीं और मैंने कहा था कि ये जो बहरे हजज की लगभग जुड़वां बहन है ये हजज जैसी ही है । किन्‍तु बहरे हजज जहां मुफरद बहर है वहीं ये मुरक्‍कब है । इसे रमल और हजज के एक एक रुक्‍न से बनाया गया है । 1222-2122-1222-2122 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरे मुजारे की कई सारी उप बहरें हैं जिनमें एक है बहरे मुजारे मुसमन अखरब । ये भी गाई जाने वाली बहर है और इस पर काफी अच्‍छी ग़ज़लें कहीं गईं हैं । इसका वज़न होता है 221-2122-221-2122, बहर में चार रुक्‍न हैं इसलिये असका नाम होता है मुसमन और इसमें जो रुक्‍न है 221 जिसको कि हम मफऊलु कहते हैं वो होने के कारण इसके नाम में अखरब जुड़ गया है । बहर कव्‍वालियों में काफी  उपयोग में लाई जाती है । कववाली के बारे में आप ये जानते ही होंगें कि कव्‍वाली में भी ग़ज़लें ही पढ़ी जाती हैं किन्‍तु गा कर पढ़ी जाती है । एक जमाने में फिल्‍मों में ऐसी कव्‍वालियां बनीं जो आज तक लोगों के जेहन में हैं । खैर तो ये है बहरे मुजारे जिसका कि वज़न है मफऊलु-फाएलातुन-मफऊलु-फाएलातुन ।  एक उदाहरण देखें जाना न छोड़ के तू यूं राह में कभी भी । मिसरा भले ही बहर में हैं लेकिन कहन का दोष है । मगर हम चूंकि बहर की बात कर रहे हैं सो ये बहरे मुजारे मुसमन अखरब का एक उदाहरण है । आशा है आपको समझ में आ गया होगा । चलिये अब इस पर कुछ ग़ज़लें तलाशिये और तकतीई करके भेजिये । या हो सके तो इस बहर पर एकाध शेर लिख कर कमेंट बाक्‍स में लगाइये । अगले पाठ में हम बातें करेंगें मुजारे की अगली उपबहर की । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सूर्यग्रहण -&lt;/span&gt;  आने वाली 22 जुलाई को हमारे देश में पूर्ण सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है । ये पूर्ण सूर्य ग्रहण अपने तरह का अनोखा होगा । इस पूर्ण सूर्य ग्रहण की केन्‍द्रीय रेखा हमारे जिले से होकर जा रही है । हमारे जिले का ग्राम गूलरपुरा इस केन्‍द्रीय रेखा के ठीक नीचे आ रहा है ।यदि आप भी पूर्ण सूर्य ग्रहण का आनंद लेना चाहते हैं तो पधारें । हां मगर मानसून यदि मजा बिगाड़े तो हम कुछ नहीं कर पायेंगें । इस ग्रहण पर मैंने एक शोध पत्र तैयार किया है किसी खगोल विज्ञान की संस्‍था के लिये । जल्‍द ही उस शोध पत्र के कुछ हिस्‍से आपको भी पढ़वाता हूं  । 22 जुलाई को सुबह सूर्य उदय के साथ ही ये ग्रहण लगेगा और पूर्ण सूर्य ग्रहण लगभग तीन मिनिट अवधि का होगा । गूलरपुरा सीहोर से लगभग तीस किलोमीटर है । वैसे सीहोर शहर में भी पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देगा । किन्‍तु ग्रहण की केन्‍द्रीय रेखा ( सेण्‍ट्रल लाइन आफ इकलिप्‍स) गूलरपुरा पर से होकर गुजरेगी । मेरा प्रयास रहेगा कि उस दिन गूलरपुरा में रह कर वीडियो शूटिंग करूं पूरे ग्रहण की । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहली बरसात -&lt;/span&gt;  हमारे इलाके में मौसम की पहली बरसात हो गई है । रविवार को लगभग एक घंटे खूब बरसे बादल । नानी कहती हैं कि पहली बरसात में नहाने से घमोरियां मिट जाती हैं । सो हमने भी परी पंखुरी और मोहल्‍ले के बच्‍चों के साथ पूरे घंटे भर नहांने का आनंद लिया । जब तक छींकें नहीं आने लगीं । मुझे छत से गिरते पानी के नीचे खड़े होने में पहले भी मजा आता था और अब भी आता है । बरसात में नहाने का अपना ही आनंद होता है । संयोग ये था कि रविवार को बरसात हुई अगर किसी और दिन होती तो कौन नहा पाता । बच्‍चों को प्रकृति के पास रहना सिखाना चाहिये । उनको बरसात में भीगने का आनंद जरूर बताना चाहिये । बस यही सोच कर बरसात में एक बार जरूर आनंद लेता हूं बच्‍चों के साथ । पंकज उदास की गाई एक ग़ज़ल बहुत याद आती है । उसने मुझे ख़त लिक्‍खा होगा अश्‍कों से तनहाई में, आंख का काजल फैला होगा मौसम की पहली बारिश में । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सप्‍ताह का गीत -&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;  ये गीत वैसे तो फिल्‍म पुराना मंदिर में किसी और गायक ने गाया था लेकिन उसीको जग पाकिस्‍तानी गायक सज्‍जाद अली ने गाया तो रंग ही बदल गया । मूल गीत से जियादह अच्‍छा कवर वर्शन हो सकता है ये इस गीत को सुन कर पता लगता है । इस गीत के साथ मेरी कई कोमल भावनाएं जुड़ी हैं । ये गीत आज भी मेरी आंखें नम कर देता है । इस गीत के बोल मुझे बहुत पसंद हैं । सज्‍जाद अली की आवाज़ भी बहुत मीठी है । आप भी सुनें ये गीत  यहां &lt;br /&gt;&lt;embed type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true"  allowscriptaccess="always"  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किया है सो उसकी व्‍यस्‍तता बनी है । जो नया काम प्रारंभ किया है उसमें आप सबकी शुभकामनाएं चाहिये कि उसमें सफलता मिले । नये काम को लेकर कई दिनों से ऊहापोह की हालत थी । रविकांत और वीनस केसरी से मामले में चर्चा की इसलिये कि दोनों उसी इलाके के हैं । दोनों ने ही जब ग्रीन सिग्‍नल दिया तो काम प्रारंभ करने का हौसला आया । अपने कम्‍प्‍यूटर प्रशिक्षण संस्‍थान में हम लोग कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर, नेटवर्किंग तथा ग्राफिक्‍स आदि का काम करवाते हैं । किन्‍तु पिछले कुछ दिनों से लग रहा था कि कुछ कालेज स्‍तर का काम भी किया जाये । सो बस वही काम प्रारंभ किया है । अब देखें कि कहां तक पहुंचते हैं । तरही मुशायरा - इस बार के तरही को लेकर कई अच्‍छी रचनाएं मिल रही हैं । सुधा ओम ढींगरा जी ने उस मिसरे को लेकर एक बहुत ही सुंदर कविता लिख भेजी है । कविता ऐसी है कि पलकों की कोरें नम हो जायें । कुछ ग़ज़लें भी बहुत जबरदस्‍त मिलीं हैं । दरअसल में इस बार का मिसरा हांट करने वाला मिसरा है । हम सबके, हम जो रचनाकार हैं हम सबके साथ ही ये होता है कि हमको ऐसा लगता है जैसे कोई हमें आवाज़ दे रहा है । कौन है हम भी नहीं जानते लेकिन आवाज़ सुनसान रातों में हम सुनते हैं । आवाज़ उस पार की, आवाज़ जो हमें खींचती है बुलाती है । ये ही आवाज़ कई बार रचनाकार के लिये पीड़ादायी हो जाती है । कभी कोई गुरुदत्‍त आत्‍महत्‍या कर लेता है तो कभी कोई मीनाकुमारी शराब में डूब जाती है तो कभी कोई मुकुल शिवपुत्र नैराश्‍य में समा जाता है । बच्‍चन जी की पत्‍नी का जब निधन हुआ तब वे भी उसी नैराश्‍य में थे और उसी नैराश्‍य को उन्‍होंने कविता में ढाल दिया । मुकुल शिवपुत्र जी की भी पत्‍नी का निधन असहज परिस्थितियों में हुआ और वे टूट गये । बात वही है कि कोई आवाज़ देता है उस पार से । मेरी हमेशा से इच्‍छा रही है कि मैं किसी ऐसे शहर में रहूं जहां नदी हो, तालाब हो और पहाड़ हों । लेकिन मेरे शहर में ये तीनों ही नहीं हैं । मगर फिर भी रात के सन्‍नाटे में यूं लगता है कि नदी आ गई है और उस पार से कोई पुकार रहा है । शायद साहिर लुधियानवी का शेर है प्‍यास जो मेरी बुझ गई होती, जिन्‍दगी फिर न जिन्‍दगी होती । तरही का आयोजन होने ही वाला है सो जल्‍द रचनायें भेजें । बहरे मुजारे - बहरे मुजारे के बारे में हमने पिछली बार कुछ बातें कीं थीं और मैंने कहा था कि ये जो बहरे हजज की लगभग जुड़वां बहन है ये हजज जैसी ही है । किन्‍तु बहरे हजज जहां मुफरद बहर है वहीं ये मुरक्‍कब है । इसे रमल और हजज के एक एक रुक्‍न से बनाया गया है । 1222-2122-1222-2122 बहरे मुजारे की कई सारी उप बहरें हैं जिनमें एक है बहरे मुजारे मुसमन अखरब । ये भी गाई जाने वाली बहर है और इस पर काफी अच्‍छी ग़ज़लें कहीं गईं हैं । इसका वज़न होता है 221-2122-221-2122, बहर में चार रुक्‍न हैं इसलिये असका नाम होता है मुसमन और इसमें जो रुक्‍न है 221 जिसको कि हम मफऊलु कहते हैं वो होने के कारण इसके नाम में अखरब जुड़ गया है । बहर कव्‍वालियों में काफी उपयोग में लाई जाती है । कववाली के बारे में आप ये जानते ही होंगें कि कव्‍वाली में भी ग़ज़लें ही पढ़ी जाती हैं किन्‍तु गा कर पढ़ी जाती है । एक जमाने में फिल्‍मों में ऐसी कव्‍वालियां बनीं जो आज तक लोगों के जेहन में हैं । खैर तो ये है बहरे मुजारे जिसका कि वज़न है मफऊलु-फाएलातुन-मफऊलु-फाएलातुन । एक उदाहरण देखें जाना न छोड़ के तू यूं राह में कभी भी । मिसरा भले ही बहर में हैं लेकिन कहन का दोष है । मगर हम चूंकि बहर की बात कर रहे हैं सो ये बहरे मुजारे मुसमन अखरब का एक उदाहरण है । आशा है आपको समझ में आ गया होगा । चलिये अब इस पर कुछ ग़ज़लें तलाशिये और तकतीई करके भेजिये । या हो सके तो इस बहर पर एकाध शेर लिख कर कमेंट बाक्‍स में लगाइये । अगले पाठ में हम बातें करेंगें मुजारे की अगली उपबहर की । सूर्यग्रहण - आने वाली 22 जुलाई को हमारे देश में पूर्ण सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है । ये पूर्ण सूर्य ग्रहण अपने तरह का अनोखा होगा । इस पूर्ण सूर्य ग्रहण की केन्‍द्रीय रेखा हमारे जिले से होकर जा रही है । हमारे जिले का ग्राम गूलरपुरा इस केन्‍द्रीय रेखा के ठीक नीचे आ रहा है ।यदि आप भी पूर्ण सूर्य ग्रहण का आनंद लेना चाहते हैं तो पधारें । हां मगर मानसून यदि मजा बिगाड़े तो हम कुछ नहीं कर पायेंगें । इस ग्रहण पर मैंने एक शोध पत्र तैयार किया है किसी खगोल विज्ञान की संस्‍था के लिये । जल्‍द ही उस शोध पत्र के कुछ हिस्‍से आपको भी पढ़वाता हूं । 22 जुलाई को सुबह सूर्य उदय के साथ ही ये ग्रहण लगेगा और पूर्ण सूर्य ग्रहण लगभग तीन मिनिट अवधि का होगा । गूलरपुरा सीहोर से लगभग तीस किलोमीटर है । वैसे सीहोर शहर में भी पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देग</itunes:summary><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/06/blog-post_29.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/KxZYNvHbT6A/flowplayer.commercial-3.0.5.swf" length="94910" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>ओम व्‍यास जी को दिल्‍ली के अपोलो अस्‍पताल में ले जाया गया है, श्री अशोक चक्रधर जी के अनुसार मामूली सा सुधार भी दिख रहा है । आइये ओम जी के लिये प्रार्थना करें ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/V9JoDJsMbYU/blog-post_12.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Thu, 11 Jun 2009 22:49:13 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-665430939152282135</guid><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/SjHprD4sUyI/AAAAAAAAA7Y/9XSyzs1barE/s1600-h/Om_Vyas-carri-1.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 188px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346311158652228386" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/SjHprD4sUyI/AAAAAAAAA7Y/9XSyzs1barE/s320/Om_Vyas-carri-1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="TEXT-ALIGN: left" align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="TEXT-ALIGN: left" align="center"&gt;वैसे तो प्रारंभ से ही श्री अशोक चक्रधर जी ओम जी को दिल्‍ली ले जाने के पक्ष में थे लेकिन भोपाल के पीपुल्‍स हास्पिटल के डाक्‍टरों ने उसकी इजाज़त नहीं दी । कल इंदौर के ख्‍यात न्‍यूरोसर्जन ने भोपाल आकर श्री ओम जी को देखा और उसके बाद श्री ओम जी को दिल्‍ली ले जाने की इजाज़त दे दी । जैसा मैंने पहले बताया था कि ओम जी के मामले में मध्‍यप्रदेश सरकार पूरी गंभीरता बरत रही है । उसके पीछे एक कारण ये है कि मध्‍यप्रदेश के संस्‍कृति मंत्र श्री लक्ष्‍मीकांत शर्मा स्‍वयं भी काव्‍य प्रेमी हैं । वे पूरी रात मंच के सामने दरी पर बैठकर कविता का आनंद लेते हैं ।&lt;/p&gt;&lt;p style="TEXT-ALIGN: left" align="center"&gt;अशोक चक्रधर जी और ओम जी के प्रम का मैं स्‍वयं साक्षी एक दो बार रहा हूं । अशोक जी को ओम जी गुरूदेव कह कर बुलाते हैं । ग्‍वालियर के एक कवि सम्‍मेलन में जहां मैंने ओम जी के संचालन में पहली बार काव्‍य पाठ किया था वहां पर संचालन करना था श्री अशोक चक्रधर जी को किन्‍तु उन्‍होंने मंच पर आते ही कहा ओम चलो माइक संभालों । ओम जी ने उत्‍तर दिया गुरूदेव आपके होते हुए मैं कैसे कर सकता हूं । संचालन को लेकर दोनों के बीच प्रेम भरी काफी बहस हुई और अंत में अशोक जी के आदेश को मानते हुए ओम जी ने संचालन किया । ओम जी ने पूरे संचालन के दौरान अशोक जी से पूछ पूछ कर संचालन किया । किसी कवि को बुलाने से पहले वे कागज की पर्ची पर कवि का नाम लिखकर अशोक जी के पास भेजते और उनसे स्‍वीकृति लेकर ही उस कवि को माइक पर बुलाते । ये अद्भुत दृष्‍य देखकर मैं दंग था । एक दो बार अशोक जी ने कहा भी ओम आप अपने हिसब से क्रम दे दो लेकिन ओम जी नहीं माने । गुरू शिष्‍य की ये जुगलबंदी देखकर मैं दंग था । अन्‍यथा तो होता ये है कि संचालन को लेकर तो कवियों में बाकायदा झगड़ा होता है कि हम करेंगें । ओम जी की विनम्रता और अशोक जी की सज्‍जनता देखकर काफी कुछ सीखने मिला उस दिन ।&lt;/p&gt;&lt;p style="TEXT-ALIGN: left" align="center"&gt;अशोक चक्रधर जी से अभी बात हुई उन्‍होंने कहा पंकज ओम जी को अपोलो में ले आये हैं और यहां पर बहुत मामूली सा सुधार भी दिख रहा है । श्री चक्रधर जी उस समय अपोलो में ही थे और डाक्‍टरों के साथ ओम जी को लेकर चर्चा कर रहे थे । इसलिये मैंने भी अधिक बात करना मुनासिब नहीं समझा । किन्‍तु ये सुन कर तसल्‍ली मिली कि ओम जी की हालत में बहुत मामूली सा सुधार है । मामूली सा सुधार होने का मतलब है कि ईश्‍वर कुछ सुनवाई कर रहा है । कल अपोलो हास्पिटल की विशेष एयर एंबुलेंस ओम जी को लेने भोपाल आई थी और उनको लेकर भोपाल से दिल्‍ली रवाना हो गई । श्री ओम जी के इलाज का पूरा खर्च मध्‍यप्रदेश सरकार उठा रही है । श्री लक्ष्‍मीकांत शर्मा जी और मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्‍वयं इस पूरे मामले को अपनी निगरानी में देख रहे हैं । अशोक चक्रधर जी दुर्घटना वाले दिन ही इस बात पर जोर दे रहे थे कि ओम जी को अपोलो अस्‍पताल ले जाया जाये । वे उस दिन भी अपोलो के संपर्क में थे । किन्‍तु उस दिन ये संभव नहीं हो पाया । अशोक जी उसके बाद से ही प्रयास में थे के ओम जी को दिल्‍ली लाया जाये । वैसे तो प्रदेश सरकार ने कहा है कि ओम जी को अगर विदेश भी भेजना पड़ा तो उसका खर्च भी सरकार उठायेगी ।&lt;/p&gt;&lt;p style="TEXT-ALIGN: left" align="center"&gt;ग्‍वालियर के कवि सम्‍मेलन में सभी दिग्‍गज थे । ओम जी ने मुझे कमरे में बुला कर कहा पंकज सब बड़े नाम हैं इसलिये कवि सम्‍मेलन का प्रारंभ तुम से ही होगा । कवि सम्‍मेलन का प्रारंभ करना मुश्किल काम होता है । उन्‍होंने कहा कि चिंता मत कर मैं 20 मिनिट की भूमिका बांध के तुझे उतारूंगा । उस दिन ओम जी ने ग्‍वालियर में मेरी ससुराल को लेकर 20 मिनिट की ऐसी भूमिका मुझे लेकर बांधी की बाद में काव्‍य पाठ के दौरान मुझे खूब तालियां मिली । ऐसे हैं मेरे अग्रज ओम व्‍यास जी ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और अंत में ये फिल्‍म हरी दर्शन का लता जी का ये गीत ओम जी के लिये आप सब भी मेरे साथ मिलकर ओम जी के लिये प्रार्थना करें । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;embed type="application/x-shockwave-flash" width="350"  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src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-665430939152282135?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/V9JoDJsMbYU" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-12T11:19:13.070+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://4.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/SjHprD4sUyI/AAAAAAAAA7Y/9XSyzs1barE/s72-c/Om_Vyas-carri-1.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">32</thr:total><media:content url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/KxZYNvHbT6A/flowplayer.commercial-3.0.5.swf" fileSize="94910" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:subtitle> वैसे तो प्रारंभ से ही श्री अशोक चक्रधर जी ओम जी को दिल्‍ली ले जाने के पक्ष में थे लेकिन भोपाल के पीपुल्‍स हास्पिटल के डाक्‍टरों ने उसकी इजाज़त नहीं दी । कल इंदौर के ख्‍यात न्‍यूरोसर्जन ने भोपाल आकर श्री ओम जी को देखा और उसके बाद श्री ओम जी को दिल्‍ली ले </itunes:subtitle><itunes:author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</itunes:author><itunes:summary> वैसे तो प्रारंभ से ही श्री अशोक चक्रधर जी ओम जी को दिल्‍ली ले जाने के पक्ष में थे लेकिन भोपाल के पीपुल्‍स हास्पिटल के डाक्‍टरों ने उसकी इजाज़त नहीं दी । कल इंदौर के ख्‍यात न्‍यूरोसर्जन ने भोपाल आकर श्री ओम जी को देखा और उसके बाद श्री ओम जी को दिल्‍ली ले जाने की इजाज़त दे दी । जैसा मैंने पहले बताया था कि ओम जी के मामले में मध्‍यप्रदेश सरकार पूरी गंभीरता बरत रही है । उसके पीछे एक कारण ये है कि मध्‍यप्रदेश के संस्‍कृति मंत्र श्री लक्ष्‍मीकांत शर्मा स्‍वयं भी काव्‍य प्रेमी हैं । वे पूरी रात मंच के सामने दरी पर बैठकर कविता का आनंद लेते हैं ।अशोक चक्रधर जी और ओम जी के प्रम का मैं स्‍वयं साक्षी एक दो बार रहा हूं । अशोक जी को ओम जी गुरूदेव कह कर बुलाते हैं । ग्‍वालियर के एक कवि सम्‍मेलन में जहां मैंने ओम जी के संचालन में पहली बार काव्‍य पाठ किया था वहां पर संचालन करना था श्री अशोक चक्रधर जी को किन्‍तु उन्‍होंने मंच पर आते ही कहा ओम चलो माइक संभालों । ओम जी ने उत्‍तर दिया गुरूदेव आपके होते हुए मैं कैसे कर सकता हूं । संचालन को लेकर दोनों के बीच प्रेम भरी काफी बहस हुई और अंत में अशोक जी के आदेश को मानते हुए ओम जी ने संचालन किया । ओम जी ने पूरे संचालन के दौरान अशोक जी से पूछ पूछ कर संचालन किया । किसी कवि को बुलाने से पहले वे कागज की पर्ची पर कवि का नाम लिखकर अशोक जी के पास भेजते और उनसे स्‍वीकृति लेकर ही उस कवि को माइक पर बुलाते । ये अद्भुत दृष्‍य देखकर मैं दंग था । एक दो बार अशोक जी ने कहा भी ओम आप अपने हिसब से क्रम दे दो लेकिन ओम जी नहीं माने । गुरू शिष्‍य की ये जुगलबंदी देखकर मैं दंग था । अन्‍यथा तो होता ये है कि संचालन को लेकर तो कवियों में बाकायदा झगड़ा होता है कि हम करेंगें । ओम जी की विनम्रता और अशोक जी की सज्‍जनता देखकर काफी कुछ सीखने मिला उस दिन ।अशोक चक्रधर जी से अभी बात हुई उन्‍होंने कहा पंकज ओम जी को अपोलो में ले आये हैं और यहां पर बहुत मामूली सा सुधार भी दिख रहा है । श्री चक्रधर जी उस समय अपोलो में ही थे और डाक्‍टरों के साथ ओम जी को लेकर चर्चा कर रहे थे । इसलिये मैंने भी अधिक बात करना मुनासिब नहीं समझा । किन्‍तु ये सुन कर तसल्‍ली मिली कि ओम जी की हालत में बहुत मामूली सा सुधार है । मामूली सा सुधार होने का मतलब है कि ईश्‍वर कुछ सुनवाई कर रहा है । कल अपोलो हास्पिटल की विशेष एयर एंबुलेंस ओम जी को लेने भोपाल आई थी और उनको लेकर भोपाल से दिल्‍ली रवाना हो गई । श्री ओम जी के इलाज का पूरा खर्च मध्‍यप्रदेश सरकार उठा रही है । श्री लक्ष्‍मीकांत शर्मा जी और मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्‍वयं इस पूरे मामले को अपनी निगरानी में देख रहे हैं । अशोक चक्रधर जी दुर्घटना वाले दिन ही इस बात पर जोर दे रहे थे कि ओम जी को अपोलो अस्‍पताल ले जाया जाये । वे उस दिन भी अपोलो के संपर्क में थे । किन्‍तु उस दिन ये संभव नहीं हो पाया । अशोक जी उसके बाद से ही प्रयास में थे के ओम जी को दिल्‍ली लाया जाये । वैसे तो प्रदेश सरकार ने कहा है कि ओम जी को अगर विदेश भी भेजना पड़ा तो उसका खर्च भी सरकार उठायेगी ।ग्‍वालियर के कवि सम्‍मेलन में सभी दिग्‍गज थे । ओम जी ने मुझे कमरे में बुला कर कहा पंकज सब बड़े नाम हैं इसलिये कवि सम्‍मेलन का प्रारंभ तुम से ही होगा । कवि सम्‍मेलन का प्रारंभ करना मुश्किल काम होता है । उन्‍होंने कहा कि चिंता मत कर मैं 20 मिनिट की भूमिका बांध के तुझे उतारूंगा । उस दिन ओम जी ने ग्‍वालियर में मेरी ससुराल को लेकर 20 मिनिट की ऐसी भूमिका मुझे लेकर बांधी की बाद में काव्‍य पाठ के दौरान मुझे खूब तालियां मिली । ऐसे हैं मेरे अग्रज ओम व्‍यास जी । और अंत में ये फिल्‍म हरी दर्शन का लता जी का ये गीत ओम जी के लिये आप सब भी मेरे साथ मिलकर ओम जी के लिये प्रार्थना करें । </itunes:summary><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/06/blog-post_12.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~5/KxZYNvHbT6A/flowplayer.commercial-3.0.5.swf" length="94910" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.archive.org/flow/flowplayer.commercial-3.0.5.swf</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>और ये रहा तरही मुशायरे का हासिले मुशायरा शेर जिसका चयन किया है उस्‍ताद शायर और अरूज के विद्वान श्रद्धेय प्राण शर्मा जी ने । पढि़ये प्राण जी की एक पचास साल पुरानी ग़ज़ल ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/0UOkNlfRD-E/blog-post_10.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Tue, 09 Jun 2009 23:44:08 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-1883262776032847931</guid><description>&lt;p&gt;( अगर ये ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में एरर दे तो इसे मोजिला फायर फाक्‍स&amp;nbsp; या गूगल क्रोम में खोलें ।) &lt;/p&gt; &lt;p&gt;ओम व्‍यास जी की हालत अभी भी स्थिर है तथा डाक्‍टर अभी भी कुछ नहीं कह पा रहे हैं । सर पर, दोनों जबड़ों पर, आंख में तथा पैरों में घातक चोट होने के कारण वे अभी भी कोमा में हैं तथा वेंटीलेटर पर उनको रखा गया है । श्री ओम व्‍यास जी को देख कर लौट रहे वरिष्‍ठ कवि और प्रसिद्ध मंच संचालक श्री संदीप शर्मा कुछ देर के लिये मेरे पास रुके उनकी भाव भंगिमा ने बताया कि ईश्‍वर एक और अनर्थ करने के मूड में है । आइये ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि अब वो बस करे । जानी बैरागी को अब आइ सी यू से हटा लिया गया है ये राहत की बात है ।&amp;nbsp; संदीप जी आते ही गले मिले और आंसू भरी आंखों से बोले पंकज भाई ये बहुत कठिन समय है हम लोगों के लिये&amp;nbsp; । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;इस बार के तरही मुशायरे में बहर मुश्किल थी लेकिन फिर भी अच्‍छा काम उस पर हुआ । इस बार जज की कुर्सी पर उस्‍ताद शायर तथा इल्‍मे अरूज के विद्वान &lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;श्रद्धेय श्री प्राण शर्मा जी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; विराजमान थे तथा उन्‍होंने ही इस बार के हासिले मुशायरा शेर का चयन किया है । &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://sahityakunj.net/Pustak/Surahi/Surahi_main.htm"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="surahi_cover" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9Cz03QCUI/AAAAAAAAA54/eMtPnPa02z8/surahi_cover6.jpg" width="141" height="217"&gt; &lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="pran_sharma" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9C0jQJCcI/AAAAAAAAA58/cFltakBuGe4/pran_sharma_thumb1.jpg" width="183" height="217"&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9C2-HuBkI/AAAAAAAAA6A/y0JMT8VJyv0/pranbk1.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="pran-bk" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9C5nA72JI/AAAAAAAAA6E/8UguY7n5CvU/pranbk_thumb1.jpg" width="144" height="217"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;उस्‍ताद शायर तथा इल्‍मे अरू‍ज़ के विद्वान श्री प्राण शर्मा जी तथा उनकी चर्चित पुस्‍तकें &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;प्राण जी के बारे में कुछ कहना सूरज को चराग दिखाने के समान होगा । फिर भी बता दूं कि 13 जून 1937 को वज़ीराबाद (अब पकिस्तान में) जन्मे प्राण शर्मा 1955 से लेखन में सक्रिय हैं । आप हिन्दी ग़ज़लों और गीतों में शब्दों के विलक्षण प्रयोग के लिए जाने जाते हैं । यही नहीं आपके ग़ज़ल विषयक आलेख और पुस्तकें भी चर्चा में हैं । ग़ज़ल कहता हूँ (ग़ज़ल संग्रह) तथा सुराही (मुक्तक संग्रह) इनकी प्रसिद्ध तथा चर्चित किताबें हैं । विश्व भर की सभी प्रमुख हिन्दी पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं । साहित्‍य कुंज पर आपका मुक्‍तक संग्रह &lt;a href="http://sahityakunj.net/Pustak/Surahi/Surahi_main.htm"&gt;सुराही&lt;/a&gt; पढ़ा जा सकता है जिसमें अधिकाँश मुक्तक १९६० -१९६२ के बीच में लिखे हुए हैं ।उनकी कविताओं को &lt;a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=प्राण_शर्मा"&gt;यहां&lt;/a&gt; पढ़ा जा सकता है ।&amp;nbsp;&amp;nbsp; वे स्‍वयं अपने बारे में कहते हैं&lt;strong&gt; १९६५ में मैं uk में आया था । कई सालों तक मैं हिंदी&amp;nbsp; साहित्य से कटा रहा, धन कमाने के चक्कर में । मुझे याद आता है कि&amp;nbsp; १९६५ में में मैंने एक ग़ज़ल ( जो कादम्बिनी में छपी थी ) कही थी ।&lt;br&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; उसका मतला था--&lt;br&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;font color="#0000ff"&gt;&amp;nbsp; हरी धरती, खुले ,&amp;nbsp; नीले&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; गगन&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; को&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; छोड़&amp;nbsp; आया&amp;nbsp; हूँ &lt;br&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कि कुछ&amp;nbsp; सिक्कों&amp;nbsp; की खातिर&amp;nbsp; मैं वतन को छोड़ आया हूँ&lt;/font&gt; &lt;br&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुछ सालों से फिर से लिखने-लिखाने में सक्रिय&amp;nbsp; हुआ हूँ । ढलती उम्र है । चाहता हूँ कि कुछ अच्छा कह जाऊं.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;प्राण जी ने अपने निर्णय के साथ जो पत्र भेजा है उसमें वे लिखते हैं &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;"तरही&amp;nbsp; ग़ज़ल " का&amp;nbsp; आयोजन&amp;nbsp; मुझे&amp;nbsp; बहुत&amp;nbsp; जिआदा&amp;nbsp; पसंद&amp;nbsp; आया&amp;nbsp; है । इस&amp;nbsp; आयोजन&amp;nbsp; से&amp;nbsp; आप&amp;nbsp; जो&amp;nbsp; लड़कों&amp;nbsp; और लड़कियों&amp;nbsp; में&amp;nbsp; ग़ज़ल&amp;nbsp; कहने&amp;nbsp; के&amp;nbsp; बीज&amp;nbsp; रोप&amp;nbsp; रहे&amp;nbsp; हैं, वह&amp;nbsp; निस्संदेह&amp;nbsp; एक&amp;nbsp; ऐतिहासिक&amp;nbsp; कार्य&amp;nbsp; है । जनाब&amp;nbsp; गौतम राजरिशी, नीरज&amp;nbsp; गोस्वामी, समीर&amp;nbsp; लाल&amp;nbsp; समीर, प्रकाश&amp;nbsp; सिंह&amp;nbsp; अर्श, कंचन चौहान, अंकित सफर, रविकांत पांडे, दिगम्‍बर नासवा&amp;nbsp; जैसे गज़लकार&amp;nbsp; आपकी&amp;nbsp; ही देन&amp;nbsp; हैं । आपका&amp;nbsp; ये&amp;nbsp; "क्रांतिकारी "कदम&amp;nbsp; है । आपका&amp;nbsp; अनुसरण&amp;nbsp; अब&amp;nbsp; कई&amp;nbsp; कर&amp;nbsp; रहे&amp;nbsp; हैं&amp;nbsp; लेकिन&amp;nbsp; आपका&amp;nbsp; जो&amp;nbsp; प्रयास है&amp;nbsp; की&amp;nbsp;&amp;nbsp; हर&amp;nbsp; कोइ&amp;nbsp; ग़ज़ल&amp;nbsp; सीख&amp;nbsp; कर&amp;nbsp; ही&amp;nbsp; निकले&amp;nbsp; आपके&amp;nbsp; स्कूल&amp;nbsp; से , ये&amp;nbsp; बात&amp;nbsp; अलग&amp;nbsp; करती&amp;nbsp; है&amp;nbsp;&amp;nbsp; आपको&amp;nbsp; सबसे । कठिन&amp;nbsp; लेकिन सराहनीय&amp;nbsp; काम&amp;nbsp; है&amp;nbsp; आपका । मैं&amp;nbsp; आपके&amp;nbsp; इस&amp;nbsp; काम&amp;nbsp; से&amp;nbsp; बहुत&amp;nbsp; प्रसन्न&amp;nbsp; हूँ । मेरी&amp;nbsp; शुभ&amp;nbsp;&amp;nbsp; कामनाएं&amp;nbsp; आपके&amp;nbsp; साथ हैं । एक&amp;nbsp; काम&amp;nbsp; सौंपा&amp;nbsp; आपने&amp;nbsp; मुझे । मुश्किल&amp;nbsp; है&amp;nbsp; फिर&amp;nbsp; भी&amp;nbsp;&amp;nbsp; करना&amp;nbsp; ही&amp;nbsp; पड़ेगा&amp;nbsp; आपके&amp;nbsp; आदेश&amp;nbsp; से । सभी&amp;nbsp; शायरों&amp;nbsp; ने&amp;nbsp; वज़न&amp;nbsp; में&amp;nbsp; शेर&amp;nbsp; कहें&amp;nbsp; हैं । ये&amp;nbsp; प्रसन्नता&amp;nbsp; की&amp;nbsp; बात&amp;nbsp; है । शायरों&amp;nbsp; ने&amp;nbsp; कुछ&amp;nbsp; हट&amp;nbsp; कर&amp;nbsp; अपने अपने&amp;nbsp; अनोखे&amp;nbsp; अंदाज़&amp;nbsp; में&amp;nbsp; कहा&amp;nbsp; है ।&lt;/strong&gt;  &lt;p&gt;और सरताज शेर के बारे में श्री प्राण शर्मा जी लिखते हैं  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस&amp;nbsp; शेर&amp;nbsp; में&amp;nbsp; "खामोशी " और&amp;nbsp; "शोर " का तारतम्य&amp;nbsp; खूब&amp;nbsp; है । समर्पण&amp;nbsp; की&amp;nbsp; उद्दात&amp;nbsp; भावना&amp;nbsp; है । किसी बात&amp;nbsp; को&amp;nbsp; स्पष्ट&amp;nbsp; शब्दों&amp;nbsp; में व्यक्त&amp;nbsp; न&amp;nbsp; करके&amp;nbsp; "प्रतीकों " से&amp;nbsp; कहा&amp;nbsp; गया&amp;nbsp; है । बहुत&amp;nbsp; खूब ।&amp;nbsp; प्रिय सुबीर भाई,&amp;nbsp; कृपया शेर लिखने वाले को मेरी हार्दिक बधाई अवश्य दीजियेगा । चूँकि उसमें बहुत संभावनाएं हैं इसलिए उससे बहुत आशाएं भी हैं ।&lt;/strong&gt; ( प्राण जी ने शेर लिखने वाले इसलिये लिखा कि उनको भी नहीं पता था कि शेर किसका है । मैंने उनको बेनामी शेर भेजे थे चयन के लिये । शेरों के साथ ये नहीं लिखा था कि ये किसके शेर हैं । )  &lt;p&gt;तो कौन सा शेर है हासिले मुशायरा शेर अंदाजा लगायें । बिल्‍कुल सहीं पहचाना । &lt;a href="http://kanchanc.blogspot.com/"&gt;&lt;strong&gt;कंचन चौहान&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt; के शेर को प्राण जी ने हासिले मुशायरा शेर घोषित किया है । कंचन लखनऊ में रहती हैं और केन्‍द्र सरकार के कार्यालय में हिंदी अनुवादक के रूप में कार्यरत हैं । कंचन को शिवानी, अमृता प्रीतम और महादेवी वर्मा को पढ़ना भाता है । समूचे ब्‍लाग जगत की चहेती कंचन कभी कभी कोई ऐसी भी पोस्‍ट अपने ब्‍लाग पर लिख देती हैं जो सबको चौंका देती है । इस बार के मुशायरे का हासिले मुशायरा बनने वाला कंचन चौहान का&amp;nbsp; शेर है ।  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;पाके&amp;nbsp; शोर&amp;nbsp; करता&amp;nbsp; है, है&amp;nbsp; अजब&amp;nbsp;&amp;nbsp; ये&amp;nbsp; सागर&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भी&amp;nbsp; &lt;br&gt;देके&amp;nbsp; कुछ&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp; कहती है&amp;nbsp; लहर&amp;nbsp; की&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; खामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;बधाइयां हो बधाइयां कंचन को &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9C7Sk7SvI/AAAAAAAAA6I/mXxVcpXuuSQ/2413567067_4b88a14c513.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="2413567067_4b88a14c51" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9C8DzuWaI/AAAAAAAAA6M/IOMHp3tCSsk/2413567067_4b88a14c51_thumb1.jpg" width="213" height="250"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;जीत की खुशी । मार लिया मैदान ।&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9WHsW5SXI/AAAAAAAAA6Y/JippYqYxGzs/hasile%20mushaira%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="hasile mushaira" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9WJmhubkI/AAAAAAAAA6c/O1R-eeY2XLk/hasile%20mushaira_thumb%5B1%5D.jpg" width="215" height="305"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;प्राण साहब जैसे उस्‍ताद ने कंचन का चयन किया है खुश तो होना ही है । &lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;एक और शेर जो हासिले मुशायरा बनते बनते रहा गया तथा कुछ नंबरों से पीछे रहा है उसे भी प्राण जी ने नंबर दो पर रखा है । शेर है &lt;a href="http://jivanamrit.blogspot.com"&gt;रविकांत&lt;/a&gt; का &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;साथ -साथ&amp;nbsp; चलकर&amp;nbsp; भी&amp;nbsp; दूरियां&amp;nbsp;&amp;nbsp; न&amp;nbsp; मिट&amp;nbsp; पाईं &lt;br&gt;पीर&amp;nbsp; की&amp;nbsp; बनी&amp;nbsp; पोथी&amp;nbsp; हमसफर&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; की&amp;nbsp;&amp;nbsp; खामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9C9oMcMCI/AAAAAAAAA6Q/3Ui9sdt1R0o/P212061522.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="P21206152" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9C-VIlVAI/AAAAAAAAA6U/KeS_GzMtmpc/P21206152_thumb.jpg" width="159" height="244"&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;रविकांत को भी बधाइयां । दूसरे नंबर पर रहना, पहले नंबर पर आने का जुनून पैदा करता है ।&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&lt;strong&gt;आज के ये दोनों शेर ग़ज़ल की कक्षाओं की तरफ से ओमप्रकाश आदित्‍य जी, नीरज पुरी जी और लाड़ सिंह गुर्जर जी को श्रद्धांजलि स्‍वरूप समर्पित । वे जहां भी होंगें इन नये रचनाकारों के फन को देखकर संतुष्‍ट होंगें की साहित्‍य की परंपरा को उनके बाद भी कायम रखने वाले युवा सामने आ रहे हैं&amp;nbsp; । तीनों को हमारी श्रद्धांजलि । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;और अब विजेताओं के लिये आशीर्वाद स्‍वरूप आदरणीय प्राण जी ने अपने संग्रह से एक लगभग पचास साल पुरानी ग़ज़ल निकाल कर भेजी है आप सब इस ग़ज़ल का आनंद लें और मुझे आज्ञा दें । &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9WLqOs7OI/AAAAAAAAA6g/6Zqs_F-S8_M/valentine-paper-lines-th%5B3%5D.gif"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="valentine-paper-lines-th" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Si9WM9Q1vPI/AAAAAAAAA6k/mjZNjOzJsXo/valentine-paper-lines-th_thumb%5B1%5D.gif" width="92" height="111"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;दिल पे क्या-क्या लिखा नहीं जाता &lt;br&gt;पर&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ये&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पन्ना&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भरा&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता &lt;br&gt;आग पर तो चला हूँ&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैं&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भी&amp;nbsp;&amp;nbsp; पर &lt;br&gt;पानियों&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पर&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; चला&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता &lt;br&gt;अपने&amp;nbsp;&amp;nbsp; बच्चे&amp;nbsp; को कैसे माँ&amp;nbsp; दे दे &lt;br&gt;दिल&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; का&amp;nbsp;&amp;nbsp; टुकड़ा&amp;nbsp; दिया&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता &lt;br&gt;मांगते&amp;nbsp;&amp;nbsp; हो&amp;nbsp; तुम&amp;nbsp; अपना दिल&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मुझ से &lt;br&gt;दे&amp;nbsp; के&amp;nbsp; तोहफा&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; लिया&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता &lt;br&gt;यूँ&amp;nbsp; तो&amp;nbsp;&amp;nbsp; सुनता&amp;nbsp;&amp;nbsp; हूँ&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; शोर&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दुनिया&amp;nbsp; का &lt;br&gt;शोर&amp;nbsp; घर&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; का&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सुना&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता &lt;br&gt;हंसने&amp;nbsp;&amp;nbsp; को&amp;nbsp;&amp;nbsp; जी&amp;nbsp;&amp;nbsp; तो चाहता है&amp;nbsp;&amp;nbsp; पर &lt;br&gt;क्या&amp;nbsp; करूँ&amp;nbsp;&amp;nbsp; नित&amp;nbsp;&amp;nbsp; हंसा&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता &lt;br&gt;माफ़&amp;nbsp;&amp;nbsp; उसको&amp;nbsp; तो कर&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दिया&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैंने &lt;br&gt;दिल&amp;nbsp;&amp;nbsp; से&amp;nbsp;&amp;nbsp; लेकिन&amp;nbsp;&amp;nbsp; गिला&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता &lt;br&gt;दूर&amp;nbsp; कितनी&amp;nbsp; निकल&amp;nbsp; आये&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; हैं&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; हम &lt;br&gt;"प्राण"&amp;nbsp; अब तो&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मुड़ा&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जाता&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;इस गज़ल़ को सुनने के बाद अब कुछ और नहीं कहा जा सकता । प्राण साहब का आभार हमारे लिये समय निकालने के लिये और नये लिखने वालों को प्रोत्‍साहित करने के लिये । और हां ये कि इस बार के तरही का मिसरा है &lt;strong&gt;रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से । &lt;/strong&gt;मज़े की बात ये है कि इतना आसान लगा कि दो गज़लें तो आ ही चुकी हैं । &lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-1883262776032847931?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/0UOkNlfRD-E" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-10T12:14:08.948+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">21</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/06/blog-post_10.html</feedburner:origLink></item><item><title>ओमप्रकाश आदित्‍य जी, नीरज पुरी जी और लाड़सिंह गुर्जर जी को ब्‍लाग जगत के सभी कवियों की ओर से श्रद्धांजलि, ओम व्‍यास ओम जी और जानी बैरागी जी के लिये हम ईश्‍वर से प्रार्थनारत हैं ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/MprL5I04ehE/blog-post_08.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 08 Jun 2009 00:14:13 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-5552900845485886705</guid><description>&lt;p&gt;मध्‍यप्रदेश के संस्‍कृति विभाग के कवि सम्‍मेलन विदिशा से भोपाल लौटते समय जिस इनोवा गाड़ी में श्री ओमप्रकाश आदित्‍य जी, श्री नीरज पुरी जी, श्री लाड़सिंह गुर्जर जी, श्री ओम व्‍यास ओम जी और श्री जानी बैरागी जी सवार थे उसको किसी अज्ञात वाहन ने सुबह साढ़े पांच बजे टक्‍क्‍र मार दी और टक्‍कर इतनी भीषण थी कि देश के वरिष्‍ठतम कवि दादा ओमप्रकाश जी आदित्‍य, हास्‍य के कवि श्री नीरज पुरी जी और श्री लाड़सिंह गुर्जर जी की घटनास्‍थल पर ही मृत्‍यु हो गई और हास्‍य सम्राट ओमप्रकाश ओम इस समय भोपाल के पीपुल्‍स अस्‍पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं साथ ही धार के कवि श्री जानी बैरागी जी भी गंभीर अवस्‍था में भर्ती हैं । समूचे ब्‍लाग जगत के कवियों की ओर से&amp;nbsp; श्री आदित्‍य जी श्री पुरी जी और श्री गुर्जर जी को श्रद्धांजलि । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5ZNGz46I/AAAAAAAAA5Q/sToktgiYXXQ/2368096841_54ed4a6b72%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="2368096841_54ed4a6b72" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5bP43Y4I/AAAAAAAAA5U/yHhHhnxRpBg/2368096841_54ed4a6b72_thumb.jpg" width="244" height="220"&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;छंदों के बेताज बादशाह दादा ओमप्रकाश आदित्‍य जी को मेरा प्रणाम और श्रद्धांजलि । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5c4GsjrI/AAAAAAAAA5Y/R7eW7JhXuLg/niraj-puri%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="niraj-puri" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5e9aGdvI/AAAAAAAAA5c/nBkPUTtWzSs/niraj-puri_thumb%5B2%5D.jpg" width="245" height="235"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अपनी अनूठी शैली के हास्‍य कवि और एक अच्‍छे मित्र भाई नीरज जी को श्रद्धांजलि ।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5gEJXdgI/AAAAAAAAA5g/iw5xk8ZX2BE/gurjar%5B11%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="gurjar" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5iFVRLPI/AAAAAAAAA5k/ghVwFAqy91k/gurjar_thumb%5B5%5D.jpg" width="242" height="301"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अपने ही क्षेत्र के श्री लाड़सिंह गुर्जर को मेरी श्रद्धांजलि । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;मन बहुत दुखी है इन सबके लिये क्‍योंकि सबके साथ कभी न कभी मंच पर रहने का मौका मिला है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन के लिये&amp;nbsp; मन ईश्‍वर से दुआ कर रहा है कि कुछ चमत्‍कार कर इन दोनों के प्राणों की रक्षा कर दे । आइये आप भी मेरे साथ श्री ओम व्‍यास ओम जी तथा श्री जानी बैरागी जी के लिये ईश्‍वर से प्रार्थना करें । ओम जी से मेरे पारिवारिक संबंध हैं तथा उनसे आत्‍मीयता का एक रिश्‍ता है । मुझे याद पड़ता है कि जब भी उनके संचालन में मैंने कविता पढ़ी है तो उन्‍होंने पूरे समय मेरा हौसला बढ़ाया है । आज जब वे भोपाल के पीपुल्‍स अस्‍पताल में जीवन और मृत्‍यु के बीच संघर्षरत हैं तो शायद आपकी दुआएं ही चमत्‍कार कर सकती हैं । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5jkqHcgI/AAAAAAAAA5o/h6hwIOVJrog/om-vyas-om%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="om-vyas-om" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5lmBqxtI/AAAAAAAAA5s/ex23lez5lCc/om-vyas-om_thumb%5B2%5D.jpg" width="219" height="273"&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5nXhwr8I/AAAAAAAAA5w/9waqovby9mI/jani-varigii%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="jani-varigii" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Siy5pAt96uI/AAAAAAAAA50/dZ6JulvoJ3M/jani-varigii_thumb%5B1%5D.jpg" width="218" height="271"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;blockquote&gt; &lt;p&gt;श्री ओम व्‍यास ओम जी&lt;font face="Trebuchet MS"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; श्री जानी बैरागी जी । &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-5552900845485886705?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/MprL5I04ehE" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-08T12:44:13.116+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">35</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/06/blog-post_08.html</feedburner:origLink></item><item><title>मेरे कारोबार में सबने बड़ी इमदाद की, दाद लोगों की, गला मेरा, ग़ज़ल उस्‍ताद की</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/CnkhR2zZ7Mw/blog-post.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Tue, 02 Jun 2009 01:36:13 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-1157816522564352534</guid><description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;( सूचना: ये ब्‍लाग हो सकता है इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में न खुले, अत: मोजिला या क्रोम में खोलें ) &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;तरही मुशायरा ठीक से संपन्‍न हो गया है और अब चलिये आगे चलते हैं । ये बहुत अच्‍छी बात है कि इन दिनों ग़ज़ल की धूम मची हुई है । हर तरफ हर ब्‍लाग पर ग़ज़लों का चलन साफ दिखाई दे रहा है । और ये भी कि सीधे और सादे लहज़े में ग़ज़ल लिखने पर ज़ोर दिया जा रहा है । आज कुछ आगे बात करते हैं । आठ दस साल पहले जब मैं पूरी तरह से पत्रकार था तब मैं एक कालम लिखता था जिसमें बिंदुवार चर्चा होती थी आज कुछ वैसा ही करने की इच्‍छा है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मुजारे -&lt;/font&gt; &lt;/strong&gt;बहरे मुजारे दरअसल में एक मुरक्‍कब बहर है । मुरक्‍कब बहर वो होती है जिसका सालिम बहर में एक से ही रुक्‍न नहीं होते बल्कि अलग अलग रुक्‍नों का योग होता है । जैसे बहरे हजज एक मुफरद बहर है, मुफरद बहर वो होती है जिसकी सालिम एक ही रुक्‍न से बनती है । हजज का स्थिर रुक्‍न है मुफाईलुन, अत: सालिम में केवल मुफाईलुन ही होगा । मतलब ये कि मुफरद बहर वो बहर जिसके स्थिर रुक्‍न एक ही प्रकार के होंगें और मुरक्‍क्‍ब वो जिसके स्थिर रुक्‍न एक से अधिक प्रकार के हो सकते हैं । जैसे बहरे मुजारे की ही बात करें तो इसके रुक्‍न इस प्रकार हैं &lt;strong&gt;मुफाईलुन-फाएलातुन-मुफाईलुन-फाएलातुन &lt;/strong&gt;ये बहरे मुजारे की सालिम बहर है अर्थात दो प्रकार के रुक्‍नों से इसको बनाया गया है जिसमें से एक रुक्‍न है बहरे हजज स्थिर रुक्‍न और दूसरा है बहरे रमल का स्थिर रुक्‍न । एक और रोचक जानकारी ये है कि बहरे रमल और हजज ये सबसे लोकप्रिय बहरें हैं और बहुत सारा काम इन्‍हीं में हुआ है । अब जानें कि मुफरद और मुरक्‍कब बहरों में क्‍या फर्क है । फर्क दिखता है सालिम बहरों में &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;आइये तीनों बहरों की एक मुसमन सालिम बहर देखें &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;हजज़: मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;रमल: फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मुजारे: मुफाईलुन- फाएलातुन- मुफाईलुन- फाएलातुन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;इस प्रकार देखा जाये तो बहरे मुजारे वास्‍तव में बहरे हजज़ और बहरे रमल का वर्ण संकर है ।&amp;nbsp; बहरे मुजारे में जो रुक्‍न होते हैं वे भी लगभग वैसे ही होते हैं जो कि बहरे हजज़ में होते हैं । इनकी बात करते हैं अगले अंक में । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;तरही मुशायरा -&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;तरही मुशायरा हो गया है और अब उसकी समीक्षा शीघ्र ही की जायेगी साथ ही हासिले मुशायरा शेर भी चयन किया जायेगा । वैसे एक मुश्किल सी बहर पर काम करना था और जिसे सभी ने बहुत मेहनत करके पूरा किया है । कई सारे शेर तो बहुत ही उच्‍च कोटि के निकल कर आये हैं ।पूरे मुशायरे की समीक्षा जल्‍द ही करने का प्रयास किया जायेगा । अब बात करते हैं ये कि आगे क्‍या किया जायेगा । तो आगे के लिये ये सोचा है कि तरही तो होगी किन्‍तु उसमें मिसरा किसी बनी हुई ग़ज़ल का नहीं लिया जायेगा बल्कि यूं ही हवा में से लिया जायेगा । जैसे इस बार के लिये जो सोचा है वो ये है &lt;strong&gt;रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से &lt;/strong&gt;। ये यूं ही हवा से पकड़ी हुई पंक्ति है जो एक बार&amp;nbsp; जेहन में आई थी और अच्‍छी लगी थी । &lt;strong&gt;बहरे रमल मुसमन महजूफ &lt;/strong&gt;पर है ये और मेरे विचार से इसमें काफिया &lt;strong&gt;आर &lt;/strong&gt;है और रदीफ &lt;strong&gt;से &lt;/strong&gt;। वजन &lt;strong&gt;फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलुन&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; है । बहुत आसान बहर और बहुत ही आसान रदीफ काफिया है इस बार क्‍योंकि पिछली बार कुछ कठिन हो गया था । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;यूनुस भाई का आभार - &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://radiovani.blogspot.com/"&gt;रेडियो वाणी&lt;/a&gt; वाले यूनुस भाई से मैंने कुछ गीतों को सुनने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी । चार पांच गीत थे जिनको मैंने बरसों से नहीं सुना और कहीं मिलते भी नहीं है वे गीत । यूनुस भाई ने तुरंत ही इच्‍छा पूरी कर दी और बताया कि वे गीत उन्‍होंने 7 जून के छायागीत कार्यक्रम में शामिल किये हैं । छायागीत मेरा सबसे पसंदीदा कार्यक्रम है रेडियो का&amp;nbsp; जो रात 10 बजे आता है । अब उलझन ये है कि उन गीतों को रेडियो से कम्‍प्‍यूटर में रिकार्ड कैसे किया जाये । आपमें से कोई जानता हो तो बताये या मेरे लिये उन गीतों को आने वाली 7 जून को रात 10 बजे विविध भारती के छायागीत से रिकार्ड कर सकता हो मैं आभारी रहूंगा । मैं अगर करना भी चाहूं तो पता नहीं शिवराज सिंह चौहान ( बिजली) मुझे करने देंगे या नहीं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#804040"&gt;नीरज जी का लाल नीला -&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; वैसे तो नीरज जी का ब्‍लाग एक ऐसा मल्‍टीप्‍लैक्‍स है जिसमें जो भी फिल्‍म लगती है वो हिट हो जाती है । इस बार सोमवार को उन्‍होंने &lt;a href="http://ngoswami.blogspot.com/2009/06/blog-post.html"&gt;लाल नीला&lt;/a&gt; प्रयोग किया है । नीरज जी ने मुझसे पूछा कि यदि आप मिसरा उला लिखते तो कैसे लिखते । मैं आश्‍चर्य इस पर कर रहा हूं कि जब मैंने ग़ज़ल को देखा तो नीरज जी ने लगभग वही भाव रखे मिसरा उला में जो शायद मैं रखता । शब्‍दों का चयन हो सकता हो थोड़ा अलग होता या नहीं भी होता किन्‍तु मेरे विचार में भाव लगभग वही रहते जो नीरज जी ने रखे । हो सकता है मैं भी इस प्रकार की गिरह नहीं लगा पाता जैसी नीरज जी ने इस शेर में लगाई है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;गहरी उदासियों में आई यूं याद तेरी, जैसे कोई सितारा टूटा हो झिलमिलाकर &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;सप्‍ताह का शेर-&lt;/font&gt; &lt;/strong&gt;जनाब राहत इंदौरी साहब का ये शेर मुझे बहुत पसंद आता है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मेरे कारोबार में सबने बहुत इमदाद की, दाद लोगों की, गला मेरा, ग़ज़ल उस्‍ताद की&lt;/font&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;सप्‍ताह के चित्र -&lt;/font&gt; &lt;/strong&gt;आज सप्‍ताह के चित्र में दो चित्र ये खास हैं मेरे लिये । कुछ सालों पहले जब मुझे सीहोर के कालेज में प्रेमचंद जयंति पर व्‍याख्‍यान के लिये बुलाया गया तो एक अजीब सा एहसास हो रहा था । उसी कालेज में व्‍याख्‍यान जहां पढ़ा हूं । उस पर ये कि ठीक उसी कमरे में आयोजन जहां पर कालेज के ठीक पहले साल की कक्षाएं लगती थीं&amp;nbsp; । और ये भी कि ठीक सामने श्रोताओं में वे लोग बैठे थे जो उस समय मुझे पढ़ाया करते थे । वे वहां बैठे थे जहां मैं बैठता था और मैं वहां खड़ा होकर भाषण दे रहा था जहां वे होते थे । ये एक न भूलने वाला अनुभव था जो जीवन भर याद रहेगा । दूसरी पंक्ति मैं बैठी हैं उस समय मुझे केमेस्‍ट्री पढ़ाने वाली तथा मुझे सबसे जियादह स्‍नेह देने वाली मैडम सुनंदा ढोंक ( नीली साड़ी में ) । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SiTkRqj0jDI/AAAAAAAAA5A/nj3MIAWlmJg/P1010110%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="P1010110" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SiTkW2i-08I/AAAAAAAAA5E/BNSTG8EiL3Y/P1010110_thumb%5B1%5D.jpg" width="244" height="193"&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SiTkb-TKsJI/AAAAAAAAA5I/g8fAfvZvtfw/P1010104%5B7%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="P1010104" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SiTkeFFFAmI/AAAAAAAAA5M/PDkIQBe-ZHY/P1010104_thumb%5B3%5D.jpg" width="253" height="191"&gt;&lt;/a&gt;  &lt;/p&gt; &lt;p&gt;वैसे तो इच्‍छा है कि आपको हर सप्‍ताह एक सप्‍ताह का गीत भी सुनाऊं इस बार के लिये एक गीत भी छांट कर रखा था लेकिन उसको ठीक से होस्‍ट नहीं कर पा रहा हूं । पूर्व में जहां पर मैं होस्‍ट करता था वो सर्वर काम नहीं कर पा रहा । आप लोग कुछ सुझाएं कि आडियो होस्टिंग के लिये कहां पर प्रयास करूं । हो सके तो लिंक भेजें । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;img style="width: 0px; height: 0px; visibility: hidden" border="0" src="http://counters.gigya.com/wildfire/IMP/CXNID=2000002.0NXC/bT*xJmx*PTEyNDM5MjgzMTkyNjUmcHQ9MTI*MzkyODM5MDI1MCZwPTE2ODA2MSZkPSZnPTEmdD*mbz*yNTc*NjA2ZWI4NWM*MjNjYjM3ZDdhMDY1MGEwNDBjMiZvZj*w.gif" width="0" height="0"&gt;  &lt;div style="text-align: center"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-1157816522564352534?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/CnkhR2zZ7Mw" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-02T14:06:13.212+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/06/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>कुछ तो बता ही देगी, इस शहर की खामोशी : श्री समीर लाल समीर की ग़ज़ल के साथ तरही मुशायरे का समापन ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/ss7zf-6kOWE/blog-post_27.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Wed, 27 May 2009 23:36:26 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-9186937057306624422</guid><description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;( एक बार फिर से आग्रह है कि यदि ये ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में नहीं खुले तो इसको मोजिला या फिर गूगल क्रोम में खोलें क्‍योंकि कई सारे ब्‍लागर इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में नहीं खुल पा रहे हैं जिनमें ये ब्‍लाग भी शामिल है । )&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वैसे तो तरही मुशायरा पिछली बार ही समापन होना था लेकिन अंतिम समय में हांफते हांफते पहुंची उड़न तश्‍तरी ने कापी जमा की सो आज हम उड़नतश्‍तरी उर्फ समीर लाल जी की ग़ज़ल के साथ समापन करते हैं तरही मुशायरे का । तरही को लेकर पिछले दिनों से दिल कुछ खट्टा है । एक कारण तो रामपाल अर्शी जी का आपको बता चुका हूं । आइये आपको एक और कारण बताता हूं । विदिशा के शायर श्री आलोक श्रीवास्‍तव जी को मैं केवल उनकी एक ग़ज़ल के कारण पिछले दस बरसों से जानता हूं । वे उन दिनों रामकृष्‍ण प्रकाशन विदिशा में कार्य कर रहे थे । उन दिनों उनकी एक ग़ज़ल &lt;strong&gt;चिंतन दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नज़र पर छाई अम्‍मा, सारे घर का शोर शराबा सूनापन तनहाई अम्‍मा &lt;/strong&gt;बहुत प्रसिद्ध हुई थी । उसे तब मैंने दैनिक भास्‍कर के मधुरिमा में पढ़ा था&amp;nbsp; उसी ग़ज़ल के दो शेर मुझे बहुत पसंद आये थे । &lt;strong&gt;1 घर में झीने झीने रिश्‍ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे, चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्‍मा&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; और दूसरा शेर &lt;strong&gt;बाबूजी गुजरे आपस में सब चीज़ें तक़सीम हुईं तब, मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्‍से आई अम्‍मा । &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;ये दोनों ही शेर मैं जाने कितने स्‍थानों पर कोट कर चुका हूं ।&amp;nbsp; में ग्‍वालियर के एक बड़े अदबी मुशायरे में श्री आलोक ने ये ग़ज़ल दिग्‍गज शायरों के सामने पढ़ी और श्रोताओं ने इस ग़ज़ल को हाथों हाथ लिया । उस मुशायरे में देश के कई मशहूर शायर थे जिनमें श्री मुनव्‍वर राणा भी उपस्थित थे । उसके बाद वो ग़ज़ल तथा उसके दो शेर मानो आलोक जी की पहचान ही बन गये । शीर्ष साहित्‍यकार श्रद्धेय कन्‍हैयालाल नंदन जी ने अपने एक कालम में जो वो इंदौर से प्रकाशित होने वाले नईदुनिया में लिखते थे इस ग़ज़ल को शामिल किया । वे उस कालम के अंत में एक कविता मेरी पसंद नाम से रखते थे । उन्‍होंने उस ग़ज़ल को पूरा पूरा उस कालम में स्‍थान दिया । चंडीगढ़ से प्रकाशित होने वाले अमर उजाला में श्री आलोक पर एक लेख प्रकाशित हुआ था जियमें इस ग़ज़ल को बाक्‍स बना कर बीच में लगाया गया था । श्री मुनव्‍वर राणा की एक पुस्‍तक आती है &lt;strong&gt;मां &lt;/strong&gt;और उस पुस्‍तक में मुक्‍त शेरों के साथ एक शेर मिलता है &lt;strong&gt;किसी को घर मिला हिस्‍से में या कोई दुकां आई, मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्‍से में मां आई ।&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;मैं पहले बता चुका हूं कि ग्‍वालियर के जिस अदबी मुशायरे में श्री आलोक ने ये ग़ज़ल पढ़ी थी वहां श्री राना भी थे । पुस्‍तक में शेर को देख कर श्री आलोक ने तुरंत एक पत्र श्री राणा को लिखा जिसमें ग्‍वालियर के मुशायरे की याद भी दिलाई किन्‍तु पत्र का कोई जवाब नहीं आया ।&amp;nbsp; कई शायरों ने मंच पर जब श्री राणा को इस शेर पढ़ने पर टोका तो उनका जवाब था कि ग़ज़ल में तो ये चलता है कि किसी की जमीन पर कोई लिखे । मरे विचार में ये जमीन पर लिखना नहीं है ये सरासर ग़लत है । जैसे बहुत पहले के शायर जनाब गुलरेज अली का&amp;nbsp; ये&amp;nbsp; मिसरा सानी&lt;strong&gt;&amp;nbsp; शराफत नाक छिदवाती है धागा डाल देती है&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; और श्री राणा का आज का मिसरा&lt;strong&gt;&amp;nbsp; गरीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है। &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;प्रश्‍न ये उठता है कि क्‍या ये सही है । तरही मुशायरा वास्‍तव में नये शायरों को बहर का और कहन का ज्ञान कराने के लिये एक परंपरा है जिसमें नये शायरों को ही होना चाहिये । वरिष्‍ठ शायरों को न तो बहर सीखने की आवश्‍यकता है न कहन की । श्री आलोक जी और श्री राणा के मामले पर श्री नदीम अहमद नदीम ने नवभारत तथा युगपक्ष में एक अत्‍यंत ज्‍वलंत लेख लिख कर प्रश्‍न उठाये थे कि यदि वरिष्‍ठ शायर ऐसा करेंगें तो नये शायरों का साहित्‍य पर से विश्‍वास ही उठ जायेगा । वे लिखते हैं &lt;strong&gt;पुराने और कम चर्चित शायरों के खूबसूरत और मजबूत मिसरों पर रीमिक्‍स कर अपना शेर बनाने का कमाल कोई पुराना नहीं हैं । &lt;/strong&gt;आलोक जी के पक्ष में&amp;nbsp; दो बातें अगर नहीं होतीं वो ग्‍वालियर का मुशायरा तथा मीडिया में ग़ज़ल का चर्चित हो जाना तो शेर तो उनके हाथ से जा ही चुका था । क्‍योंकि छूरी और तरबूजे की हालत थी हर हालत में कटना तो तरबूज को ही था । कुल मिलाकर बात ये कि जब मीडिया में सक्रिय व्‍यक्ति के साथ ऐसा होता है तो बाकियों का क्‍या कहें । &lt;strong&gt;यही कारण है कि मैं अपनी ग़ज़लें कहीं ब्‍लाग पर नहीं देता इंतजार कर रहा हूं पुस्‍तक के प्रकाशन का क्‍योंकि उसके बाद सबूत तो होगा कि शेर मेरा है । &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;तो हम भी अब जो तरही करेंगें उसमें किसी भी शायर के मिसरे को नहीं लेंगें । बल्कि हवा से ही एक मिसरा पकड़ेंगें और उस पर ही काम करेंगें ।कुछ वर्कशाप जैसा करने की भी योजना है । जिसकी झलक श्री नीरज गोस्‍वामी जी की अगली पोस्‍ट में मिलेगी ।  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री समीर लाल जी :&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; तो अब तालियों के साथ स्‍वागत कीजिये समीर लाल जी का जो आ रहे हैं अपनी एन मौके की पांच मिनटि में लिखी ग़ज़ल के साथ । समीर लाल जी के बारे में जितना जानता हूं उससे ये कह सकता हूं कि वे बरसों हास्‍य में अपना समय व्‍यर्थ करते रहे जबकि उनके अंदर तो एक गहन संवेदनशील रचनाकार छिपा है । एक ऐसा रचनाकार जो ऐसी चीजों को पकड़ता है जो आम कवि नहीं पकड़ पाता । मेरी मां लुटेरी थी जैसी अद्भुत रचना लिखने वाले समीर जी को अब हास्‍य केवल गद्य में लिखना चाहिये क्‍योंकि पद्य में वे बहुत अच्‍छी संवेदनशील कविताएं लिख रहे हैं और लिख सकते हैं । इनका काव्‍य संग्रह बिखरे मोती ऐसी ही संवेदनशील कविताओं का संग्रह है&amp;nbsp; । तो आनंद लीजिये श्री समीर जी की ग़ज़ल का ।  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;उड़नतशतरी : सब लिख रहे हैं तो ५ मिनट में प्रथम भाव,,,,,पक्का बहर में तो हो नहीं सकते, अब आप बोलोगे कि कैसे ठीक हो..पुराना अनुपस्थित रहने का रिकार्ड यूँ ही थोड़े है :&lt;/strong&gt;&lt;br&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मरता है वो ही जाने, जहर की खामोशी&lt;br&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;खुद ही देख लेना ओ! साहिल के सितारों&lt;br&gt;कितनी खतरनाक है ये लहर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;तर्रनुम में कहना जो गज़ल लिख चले हो&lt;br&gt;खुद ही पता लगेगी, वो बहर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अंजाम-ए-हादसा तो आवाज़ ही ले उड़ा है&lt;br&gt;कुछ तो बता ही देगी, इस शहर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;दी है ये खबर किसने, आपस में लड़ रहे हैं&lt;br&gt;यूँ बदजुबां न होगी उस कहर की खामोशी.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;और अंत में ये फोटो वट सावित्री की पूजा के लिये हमारी माताजी और पत्‍नी जी ने नया तरीका अपनाया । हमारे द्वारा बनाये गये बरगद के बोन्‍साई की ही पूजा की । सही है 45 डिग्री तापमान में बरगद के पेड़ को ढूंढने कहां जायें । ये पेड़ 25 साल पुराना है । &lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/ShyrHx81-0I/AAAAAAAAA44/M5zTscNCzmg/DSC_1224%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="DSC_1224" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/ShyrNVOgmpI/AAAAAAAAA48/x31Lemc-yyM/DSC_1224_thumb%5B3%5D.jpg" width="398" height="266"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-9186937057306624422?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/ss7zf-6kOWE" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-28T12:06:26.550+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">21</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_27.html</feedburner:origLink></item><item><title>आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी : कंचन चौहान, काट लूँगा उम्र-भर मैं रह-गुज़र की खामोशी : दिगम्‍बर नासवा, थरथराते होंठों पर ये सिसकती  खामोशी : मीनाक्षी धनवंतरी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/uGA0RcRzUNI/blog-post_25.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Sun, 24 May 2009 19:48:14 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-150847226628398745</guid><description>&lt;p&gt;सबसे पहले तो ये कि मेरे विचार में कुछ ब्‍लाग ऐसे हैं जो कि इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर पर नहीं खुल पा रहे हैं शायद उनमें मेरा ब्‍लाग भी शामिल है । सो यदि आपके साथ भी ऐसा हो रहा हो तो एक काम करें कि इस ब्‍लाग को या तो मोजिला&amp;nbsp; पर खोलें या फिर गूगल क्रोम पर । क्‍योंकि जो ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर पर नहीं खुल पा रहे हैं वे इन दोनों पर खुल रहे हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;एक और अच्‍छी खबर है वो ये कि परम श्रद्धेय कुमार गंधर्व साहब के सुपुत्र श्री मुकुल शिवपुत्र जी के बारे में जो कुछ मैंने लिखा था कि वे फक्‍क्‍ड़ अवस्‍था में घूम रहे हैं तो वैसा होने के पीछे वही कारण था जो अक्‍सर कलाकारों में आ जाता है कि वे अचानक ही मोहभंग वाली स्थिति में आ जाते हैं और उनको ऐसा हो ही जाता है । वो कहते हैं ना &lt;strong&gt;जिंदगी को जो समझा जिंदगी पे रोता है &lt;/strong&gt;तो वैसा ही कुछ कलाकारों के साथ भी हो जाता है । एक और शेर है &lt;strong&gt;जिंदगी को क़रीब से देखो इसका चेहरा तुम्‍हें रुला देगा&amp;nbsp; ।&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; बस वही बात कलाकारों के साथ भी हो जाती है वे जिंदगी को इतना करीब से देख लेते हैं कि उनको जिंदगी से मोह खत्‍म हो जाता है । कबीर का फक्‍कड़पन हो या सूफी संतों का फक्‍कड़पन उसमें एक प्रकार का जिंदगी पर हंसने का भाव होता है । खैर अच्‍छी खबर ये है कि मध्‍यप्रदेश के संस्‍कृति मंत्री श्री लक्ष्‍मीकांत शर्मा&amp;nbsp; ने एक बहुत अच्‍छा काम किया है । वैसे श्री शर्मा एक अत्‍यंत साहित्‍य अनुरागी प्राणी हैं । वे कवि सम्‍मेलन में स्‍वयं मंच से नीचे श्रोताओं में बैठ कर पूरा कवि सम्‍मेलन सुनते हैं । खैर तो श्री शर्मा ने श्री शिवपुत्र को भोपाल में रहने पर राजी कर लिया है और अब संस्‍कृति विभाग भोपाल के संस्‍कृति  भवन में ही एक खयाल गायकी का प्रशिक्षण केन्‍द्र आज से प्रारंभ करने जा रहा है जहां पर श्री मुकुल शिवपुत्र नयी प्रतिभाओं को खयाल गायकी सिखाएंगें । आज शाम सात बजे उस केन्‍द्र का उद्घाटन है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;चलिये आज बात करते हैं अंतिम दौर के शायरों की जिनमें दो शायराएं भी हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;कंचन चौहान&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; ग़ज़ल की पाठशाला की सबसे पुरानी सदस्‍य हैं कहें तो पिछले दो सालों से कक्षा में हैं । इनकी एक और विशेषता ये है कि ये खूब मन लगाकर पढ़ती तो हैं लेकिन होमवर्क करने का नाम जान पर बनती है । जितना मैं जानता हूं उससे तो ये ही पता चलता है कि ये पूरे ब्‍लाग जगत की सबसे चहेती कवियित्री हैं हां ये अलग बात है कि अपने ब्‍लाग पर कविता कम करती हैं चटर पटर बातें ज्‍यादा करती हैं । तो सुनिये इनकी ग़ज़ल । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;कंचन चौहान - तरही मुशायरा शुरू भी हो गया और हम वादा फिर नही पूरा कर पाये। मगर तरही मुशायरा में तकीतई और चीरफाड़ ना होने का फायदा उठा कर, कल रात के २ बजे जो सामने आया, वो भेज रही हूँ, इस डर से कि हर बार गोल करने से कहीं गुरुकुल से मुझे ही ना गोल कर दिया जाये। मीटर पर नही बैठाया है, बस लय में आ रहा था, लिखती चली गई। &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;जान ले के जायेगी, ये कहर की खामोशी,&lt;br&gt;कब खुदारा टूटेगी, उस नज़र की खामोशी।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आँख भीग कर सारे भेद खोल जाती है,&lt;br&gt;हम छिपा न पाते हैं, दिल जिगर की खामोशी।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;पैर के निशाँ बेशक, ले गई लहर लेकिन,&lt;br&gt;मन में अब भी बैठी है, रेत पर की खामोशी।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रोज आप आते हैं, रोज सोचते हैं हम,&lt;br&gt;आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,&lt;br&gt;कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;पा के शोर करता है, है अजब ये सागर भी,&lt;br&gt;दे के कुछ नही कहती, है लहर की खामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;कंचन आपको लय छंद की जरूरत क्‍या है जो भी गा दो वो गीत हो जाये । &lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&lt;strong&gt;दिगम्‍बर नासवा &lt;/strong&gt;दिगम्‍बर नासवा की छंदमुक्‍त कविताओं का मैं जबरदस्‍त प्रशंसक हूं । विशेषकर प्रेम की कविताओं में वे जो बिम्‍ब लाते हैं वे अनोखे होते हैं । जहां तक ग़जल की बात है तो अभी बहुत लम्‍बा सफर तय करना है । किन्‍तु ये अच्‍छी बात है कि वे लिख रहे हैं और अब बहुत आत्‍म विश्‍वास के साथ लिख रहे हैं । और जो सबसे अच्‍छी बात है वो ये है कि उनके पास भाव हैं । जिसके पास भाव हैं उसे व्‍याकरण तो सिखाया जा सकता है लेकिन जिसके पास केवल व्‍याकरण हो उसे भाव कौन सिखायेगा । तो लीजिये ग़ज़ल &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;नफरतों से देखती तेरी नज़र की खामोशी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मार ना दे फिर मुझे तन्हा सफ़र की खामोशी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;धूप की गठरी सरों पर बूँद भर पानी नहीं &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;चाहता हूँ खोलना दिल की किताबें बारहा &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;बोलने देती नहीं है उम्रभर की खामोशी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;तू मेरी तन्हाई में चुपके से आ जाना कभी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;में कहाँ सह पाऊंगा खूने-जिगर की खामोशी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;तू जो मेरे साथ कर दे अपनी यादों के चिराग &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;काट लूँगा उम्र-भर मैं रह-गुज़र की खामोशी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;शाम होते ही बुझा देता हूँ मैं घर के चिराग &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;जुगनुओं से महकती है मेरे घर की खामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मीनाक्षी धनवंतरी जी&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; आप ग़ज़ल की कक्षाओं की सबसे पुरानी स्‍टूडेंट हैं लेकिन कुछ दिनों से गायब थीं और इस मुशायरे के लिये अचानक ही प्रकट हुईं हैं । बीच में माड़साब ने काफी अनुपस्‍थिति लगाई है रजिस्‍टर में । मीनाक्षी जी ने ई की मात्रा को काफिया बनाकर एक कविता निकाली है ।&amp;nbsp; बहुत दिनों बाद आयीं हैं अत: आज काफिया गलत पकड़ने पर कोई सजा नहीं । सुनिये ग़ज़ल&amp;nbsp; ।  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मेरे बेजुबाँ लफ़्ज़ों पर हँसती सी खामोशी&lt;br&gt;कहती मुझे, तोड़ तू भी अपनी खामोशी&lt;br&gt;खुश्क आँखों में ठहर गई वीरान सी खामोशी&lt;br&gt;थरथराते होंठों पर ये सिसकती&amp;nbsp; खामोशी&lt;br&gt;सूरज की मार से सहमी दिशाओं की खामोशी&lt;br&gt;तपते रेगिस्तान में ये&amp;nbsp; जलाती&amp;nbsp; खामोशी&lt;br&gt;कहती मुझे, तोड़ तू भी अपनी खामोशी&lt;br&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;तो चलिये आनंद लीजिये इन ग़ज़लों का और मुझे आज्ञा दीजिये । अगली कक्षा में मिलते हैं कुछ नयी जानकारियों के साथ ।  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-150847226628398745?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/uGA0RcRzUNI" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-25T08:18:14.544+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">15</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_25.html</feedburner:origLink></item><item><title>जाने किस सफ़र पर है मेरे घर की खामोशी : अभिनव शुक्‍ला, काफिया समझ ना आये ना बहर की खामोशी : प्रकाश अर्श</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/8lxqyceMMQw/blog-post_23.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Fri, 22 May 2009 23:21:20 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-2250232543423616380</guid><description>&lt;p&gt;पता नहीं क्‍या हो रहा है कि इन दिनों मेरा ब्‍लाग कई बार पेरशानी कर रहा है खुलते खुलते ही अचानक नहीं खोला जा सकता का पेज आ जाता है और डुम से बंद हो जात है । ऐसा केवल मेरे ब्‍लाग पर ही नहीं हो रहा है बल्कि कई सारे ब्‍लागों पर हो रहा है । किन्‍तु ये भी सही है कि ऐसा इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर पर ही हो रहा है गूगल क्रोम पर तो ठीक आ रहा है ब्‍लाग । उसी के कारण ये हुआ कि एक पोस्‍ट को लगा कर हटाना पड़ा और फिर दूसरे दिन फिर से लगाना पड़ा । तो अब यदि ये ब्‍लाग नहीं खुल पाये तो गूगल क्रोम में या फिर मोजिला में खोल कर देखें । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;तरही को लेकर जो मैंने कहा कि मैं अब इसके स्‍थान पर कुछ और करना चाहता हूं तो उसके पीछे भी कई कारण हैं जैसा कि मैंने पिछली पोस्‍ट में बताया था कि जनाब रामपाल अर्शी जो कि एक बड़े शायर हुए हैं उनकी एक ग़ज़ल का बहुत ही सुंदर मकता है &lt;strong&gt;कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी, न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये । &lt;/strong&gt;आप देखें तो दोनों मिसरों में ग़ज़ब का तारतम्‍य है । बरसों पहले इसी मकते के मिसरा सानी को किसी तरही मुशायरे में दिया गया और तब के एक युवा शायर ने उस पर गिरह कुछ इस प्रकार बांधी &lt;strong&gt;उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये ।&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; शेर अच्‍छा है किन्‍तु आप बहुत गौर से देखें तो दोनों मिसरों में कोई तारतम्‍य नहीं है । चूंकि जिंदगी की शाम हो जाने का सीधा अर्थ होता है मौत हो जाना । अत: रामपाल अर्शी साहब का शेर मुकम्‍म्‍ल था क्‍योंकि वहां पहले मिसरे में कफ़न था और दूसरे में मौत थी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । किन्‍तु बशीर बद्र साहब ने जो उपयोग किया है उसे जिंदगी की शाम के स्‍थान पर सफर में शाम की तरह किया है । अर्थात हम कह रहे हैं कि अपनी यादों के उजाले हमारे साथ रहने दो जाने कहां सफर में शाम हो जाये । ये तो ठीक है । किन्‍तु जिंदगी की शाम के साथ कहीं कोई तारतम्‍य नहीं हैं । किन्‍तु आज रामपाल अर्शी को कोई नहीं जानता सब ये ही जानते हैं कि ये शेर बशीर बद्र साहब का ही है । इसी प्रकार का एक दिलचस्‍प वाक़या श्री आलोक श्रीवास्‍तव जी का भी है वो कभी विस्‍तार से बताऊंगा । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आज बात करते हैं हम तीन युवा तुर्कों की । आज की ग़ज़लों में आपको बहर के दोष दिखाई दे सकते हैं । लेकिन चूंकि ये सीधा प्रसारण है इसलिये ऐसा ही होगा । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;सबसे पहले लेते हैं ग़ज़ल की पाठशाला के सबसे होनहार छात्र &lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अभिनव शुक्‍ला&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; को । किसी कारण से इन दिनों बहुत व्‍यस्‍त हैं तथा ब्‍लागिंग से भी दूर ही हैं । अभिनव बहुत अच्‍छे कवि हैं और गाते भी बहुत अच्‍छा हैं उनकी आवाज़ में कुछ कविताएं सुनने का मौका मुझे पिछले दिनों मिला । चलिये पहले तो सुनते हैं उनकी ग़ज़ल । ग़ज़ल पूरी तरह से बहर में भी है और कहन में भी है । &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रहगुज़र की खामोशी हमसफ़र की खामोशी&lt;br&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी,&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;हिंदी और उर्दू में सिर्फ़ फ़र्क इतना है,&lt;br&gt;ये नगर की खामोशी वो शहर की खामोशी,&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;और क्या कहूँगा मैं और क्या सुनोगे तुम,&lt;br&gt;सब तो बोल देती है इस नज़र की खामोशी,&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;हम करीब होकर भी दूर दूर रहते हैं,&lt;br&gt;जाने किस सफ़र पर है मेरे घर की खामोशी,&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;लखनऊ से गुज़रे हैं लोग तो बहुत से मगर,&lt;br&gt;साथ सिर्फ़ कुछ के है उस डगर की खामोशी.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;एक शेर मुझे खास पसंद आया है &lt;strong&gt;और क्‍या कहूंगा मैं&lt;/strong&gt; वाला । इसका मिसरा सानी बहुत मासूम है&amp;nbsp; ।  &lt;p&gt;चलिये अब बात करते हैं &lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;strong&gt;प्रकाश अर्श&lt;/strong&gt; &lt;/font&gt;की । प्रकाश का नाम इन दिनों नये रचनाकारों में तेजी से सामने आ रहा है । प्रकाश एक भावुक और कम बोलने वाले इंसान है । और मेरे विचार में ग़ज़ल की पाठशाला के एकमात्र छात्र हैं जिनसे मैं रूबरू भी मिल चुका हूं । । तो सुनिये ग़ज़ल ।  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;कौन घर ले आया है दर बदर की खामोशी &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी .&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;साथ उसका पाने को हम चले थे कांटो पे&lt;br&gt;वो समझ सका भी ना हम सफ़र की खामोशी ..&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;खुश है दूसरो का घर वो जला के लो कैसे&lt;br&gt;कल बताएगा वही अपने घर की खामोशी ...&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अब समझ गया हूँ मैं जिस्म लूटती है क्यूँ&lt;br&gt;आबरू बचाए कैसे यूँ शह्र की खामोशी ...&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;लाफ हम भी तो रक्खे है ज़ुबां पे अपनी पर&lt;br&gt;आज सुन रहा हूँ दीवारों दर की खामोशी...&lt;br&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अर्श ये ग़ज़ल कैसे पूरी होगी क्‍या जाने &lt;br&gt;काफिया समझ ना आये ना बहर की खामोशी ...&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;तो आनंद लीजिये इन दोनों का और अगले अंक में मिलिये दो शायराओं और एक शायर से । &lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-2250232543423616380?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/8lxqyceMMQw" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-23T11:51:20.716+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_23.html</feedburner:origLink></item><item><title>चीरती-सी जाती है अब ये घर की खामोशी : गौतम राजरिशी,  कह रही थी कल मुझसे रहगुजर की खामोशी : वीनस केसरी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/sI_tRJK-U50/blog-post_21.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Wed, 20 May 2009 19:11:23 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8991338918081001964</guid><description>&lt;p&gt;बशीर बद्र जी का मशहूर शेर 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये' ये शेर वास्‍तव में उन्‍होंने तरही में लिखा था । और मूल मिसरे न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये पर गिरह बांधी थी । मगर आज इस शेर को बशीर बद्र के नाम से ही जाना जाता है । मुझे भी पिछले कुछ दिनों से लग रहा है कि ये ठीक नहीं है । किसी भी शायर की जमीन पर काम करना । इसलिये आगे से हम तरही के स्‍थान पर समस्‍या पूर्ती का काम प्रारंभ करेंगें । इसको कविता की वर्क शाप भी&amp;nbsp; कहा जाता है । मिसरा किसी शायर का नहीं होगा । बस यूं ही हवा में से एक वाक्‍य पकड़ कर उसको मिसरा बना लेंगें और उस पर काम करेंगें । वैसे नीरज जी के पास भी एक दिलचस्‍प प्रयोग है जो शीघ्र ही वे अपने ब्‍लाग पर लगाने वाले हैं । वो एक बिल्‍कुल ही अलग तरह का प्रयोग है । यदि वो लोकप्रिय होता है तो हम उस पर भी काम कर सकते हैं ।  &lt;p&gt;चलिये आज हम दो शायरों को लेते हैं तरही मुशायरे में । ये दोनों ही शायर उर्जावान हैं और बहुत अच्‍छा लिख रहे हैं । जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि तरही में जस का तस प्रस्‍तुत करने का रिवाज है सो ये ग़ज़लें अपने मूल रूप में प्रस्‍तुत हैं ।  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;गौतम राजरिशी &lt;/strong&gt; &lt;p&gt; गौतम के बारे में मेरा ये मानना है कि वो एक भावुक मगर प्रेक्टिकल इन्‍सान है । ये एक नई परिभाषा है । वैसे होता ये है कि जो भावुक होता है वो प्रेक्टिकल नहीं होता । लेकिन गौतम ने एक नई प्रजाति मानव की ईजाद की है जो भावुक होने के साथ प्रेक्टिकल भी है । चूंकि कई जगहों पर व्‍यक्तित्‍व विकास और सकारात्‍मक सोच को लेकर व्‍यख्‍यान देने जाता हूं इसलिये लोगों पर नजर रखना एक आदत सी है । गौतम के बारे में जितना जाना है वो ये कि गौतम संवेदनशील इंसान है जो दिल से सोच कर दिमाग से अमल करता है । दरअसल में मानव की दो प्रकार की प्रजातियां होती हैं एक वो जो दिल से सोचती हैं ये भावुक प्रजाति होती है । दूसरी वो जो दिमाग से सोचती है ये यथार्थवादी प्रजाति होती है । पहली प्रजाति अब लुप्‍तप्राय है किन्‍तु गौतम ने उसी प्रजाति में दूसरी प्रजाति का डीएनए मिलाकर एक नयी प्रजाति बनाई है जो दिल से सोचती है तथा दिमागं से स्‍वीकृति लेकर अमल करती है । मोबाइल पर जितना जाना है उससे ये तो कह सकता हूं कि गौतम के जो भी मित्र होंगें वे बहुत खुशकिस्‍मत होंगें कि उनको बहुत अच्‍छा मित्र मिला है । ये ग़ज़ल गौतम ने उस माहौल में रची है जहां बारूद और धुंआ है । शायद इसीलिये कहते हैं कि प्रेम हर स्‍थान पर अपनी जगह तलाश लेता है ।  &lt;blockquote&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; और ये रही ग़ज़ल &lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;बस गयी रगों में दीवारो-दर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;चीरती-सी जाती है अब ये घर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;सुब्‍ह के निबटने पर और शाम ढ़लने तक &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;चल रही थी जब मेरे घर के जलने की तफ़्तीश &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;देखने के काबिल थी इस नगर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;काट ली हैं तुम ने तो टहनियाँ सभी लेकिन &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;सुन सको जो कहती है क्या शजर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;छोड़ दे ये चुप्पी, ये रूठना जरा अब तो &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;हो गयी है परबत-सी बित्‍ते भर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;देखना वो उन का चुपचाप दूर से हम को &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;दिल में शोर करती है उस नजर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;जब से दोस्तों के उतरे नकाब चेहरे से &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;क्यूं लगी है भाने अब दर-ब-दर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;पड़ गयी है आदत अब साथ तेरे चलने की &lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;बिन तेरे कटे कैसे ये सफर की खामोशी &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;p&gt;और अब दूसरे शायर की बात करें  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;वीनस केसरी&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; &lt;p&gt; वीनस को मैंने जितना जाना है उससे ये कह सकता हूं कि एक फिल्‍म आई थी जुदाई जिसमें कि परेश रावल के सर पर प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह हुआ करता था । क्‍योंकि परेश के पास काफी प्रश्‍न होते थे । मुझे यदि वीनस से मिलना हो तो मैं सबसे पहले एक प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह वीनस पर भी लगा दूं । बात हंसी की नहीं है लेकिन सच यही है कि प्रश्‍न होना आदमी के जिन्‍दा होने का सुबूत होता है । हमने प्रश्‍न ही तो बंद कर दिये हैं । हम नेताओं से नहीं पूछते कि ऐसा क्‍यों । हम अपने बच्‍चों से नहीं पूछते कि कल कहां थे । हम अफसरों से नहीं पूछते कि सड़कें और नहरें कहां गईं हैं । हम अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों से नहीं पूछते कि महोंदय जो वादे आपने किये थे उनका क्‍या । हम पत्रकारों से नहीं पूछते कि महोदय ये जो कल शहर का एक गुंडा जिला बदर हुआ है उसका समाचार पेपरों में क्‍यों नहीं छपा । हम किसी से कुछ नहीं पूछते, जबकि हकीकत ये है कि प्रश्‍नों से इन सबको डर लगता है । क्‍योंकि उनके पास उत्‍तर नहीं हैं । जिस दिन हम प्रश्‍न पूछना फिर से प्रारंभ कर देंगें उस दिन बदलाव आयेगा । खैर वीनस एक अच्‍छा हस्‍ताक्षर है । ये भी अमिताभ की तरह छोरा गंगा किनारे वाला है । इलाहाबाद निवास है । और पुस्‍तकों के बीच रहते हैं । उत्‍सुकता बहुत है वीनस में और शायद इसी कारण निराश भी जल्‍दी होते हैं । बहर की कक्षा को प्रारंभ करने के लिये माड़साब को सबसे जियादह मेल वीनस के ही मिलते हैं । और ये भी कि वीनस की ग़ज़लों में बहर के दोष लगभग नहीं के बराबर होते हैं ।  &lt;p&gt;चलिये सुनिये ग़ज़ल  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;देख लबकुशाई हैरां है मेरे घर की खामोशी&lt;br&gt;रंग लायेगी मेरे मोतबर के खामोशी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;कह रही थी कल मुझसे रहगुजर की खामोशी&lt;br&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;खुश खफा मोहब्बत गम नाज़ नखरे अपनापन&lt;br&gt;कितने हुनर समेटे है हमसफ़र की खामोशी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;इन निगाहों को पढ़ कर कुछ तो समझे होंगे वो&lt;br&gt;टूटती नहीं क्यों उनकी नजर के खामोशी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;तो आनंद लीजिये ग़ज़लों का ।&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-8991338918081001964?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/sI_tRJK-U50" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-21T07:41:23.067+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_21.html</feedburner:origLink></item><item><title>बधाई हो बधाई जनमदिन की तुमको । रविकांत के जन्‍मदिन पर रविकांत की ही ग़जल के साथ प्रारंभ करते हैं तरही मुशायरा ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/MLcSyIxJduw/blog-post_18.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 18 May 2009 00:31:24 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-4150154808717378211</guid><description>&lt;p&gt;इस बार के तरही मुशायरे को लेकर बार बार दिक्‍कत आ रही थी । पहली बार तो मिसरा ही बदलना पड़ा । और बाद में भी जो मिसरा दिया गया उसे लेकर भी कुछ उलझन में सब रहे और उसी कारण से उतनी सारी प्रविष्टियां नहीं मिल पाईं । इस बार का जो मिसरा था वो था । कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी, मध्‍यप्रदेश उर्दू अकादमी की सचिव तथा बहुत अच्‍छी शायरा नुसरत मेहदी जी की ग़ज़ल में से ये मिसरा लिया गया था । बहरे हजज मुसमन अशतर में है ये मिसरा जिसका कि वजन होता है 212-1222-212-1222, ये एक गाई जाने वाली बहर है जो कि बहुत सुंदर धुन पर गाई जाती है । तरही में कई सारे प्रयेग किये गये हैं । किन्‍तु आज हम केवल &lt;a href="http://jivanamrit.blogspot.com/"&gt;रविकांत&lt;/a&gt; की ही बात कर रहे हैं क्‍योंकि आज यानि 18 मई को &lt;a href="http://jivanamrit.blogspot.com/"&gt;रविकांत&lt;/a&gt; का जन्‍मदिन है । कुछ दिनों पहले ही उनकी शादी हुई है तथा पत्‍नी के साथ वे अपना पहला जन्‍मदिन आज मनाने जा रहे हैं । रविकांत पांडेय बहुत अच्‍छे शायर हैं लेकिन शादी के बाद से कुछ सुस्‍त हो रहे हैं खैर उसमें भी चिंता की कोई बात नहीं सभी होते हैं । तो आज सबसे पहले तो पूरे ब्‍लाग जगत की ओर से उनको जन्‍मदिन की शुभकामनाएं । जो लोग सीधे ही मोबाइल से देना चाहें तो वे 09889245656 पर दे सकते हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;खैर तो तरही मुशायरे की जो नियम हमने बना रखा है कि जैसा जो भी भेजेगा उसे बिना किसी परिवर्तन के प्रकाशित किया जायेगा । उसमें किसी प्रकार से भी बहर या कहन का सुधार पाठशाला में नहीं किया जायेगा । कठिन बहर थी इसलिये ये तो तय है कि दोष तो होंगें ही । लेकिन उन दोषों के साथ ही देने का आनंद ये है कि इससे लिखने वाले के विचार जस के तस सामने आ जाते हैं । तो पहले बर्थडे ब्‍वाय से मिलें ।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="Ravi-RPG" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/ShEOti1DnyI/AAAAAAAAA28/y1lXZCqA4vA/Ravi-RPG_thumb.jpg" width="244" height="184"&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;चित्र में दाहिनी और उनके एक मित्र हैं जिनका जन्‍मदिन 16 मई को होता है किन्‍तु दोनों मिलकर 18 को ही अपना जन्‍मदिन मनाते हैं । तो सारे ब्‍लाग जगत की ओर से रविकांत और उनके मित्र को जन्‍मदिन की बधाई । और हम सब की ओर से ये केक &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/ShEOvoYxtlI/AAAAAAAAA3A/7DgG-a6oQEc/cake%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="cake" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/ShEOxcQ4ZsI/AAAAAAAAA3E/l8D64mbju64/cake_thumb.jpg" width="154" height="145"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;क्या बताऊं फैली है किस कदर की खामोशी&lt;br&gt;काटती है रह-रह कर आज घर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;खो गईं कहां वो किलकारियां सवेरे की&lt;br&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;साथ-साथ चलकर भी दूरिया न मिट पाईं&lt;br&gt;पीर की बनी पोथी हमसफ़र की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;प्रातकाल चकवा-चकई मिले नदी तट पर&lt;br&gt;आंख से लगी बहने रात भर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;दुश्मनों को मेरे घर का दिया पता किसने&lt;br&gt;साफ कह रही मेरे मित्रवर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;प्यार, वार, धोखा, गुस्सा, करम, सितम, शोखी&lt;br&gt;कितने गुल खिलाती है इक नज़र की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;झूठ है कि मुश्किल थोड़ी भी राह पनघट की&lt;br&gt;है कठिन अगर कुछ तो उस डगर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;खा गई सभी रिश्ते सभ्यता नये युग की&lt;br&gt;चीख-चीख कहती चौपाल पर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;याद की बही गंगा आज देख ली जबसे&lt;br&gt;मेरे मन-भगीरथ ने तन-सगर की खामोशी&lt;br&gt;&lt;/p&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;खाक में मिलेगी ये जिंदगी इमारत सी&lt;br&gt;रात-दिन बताती है खंडहर की खामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;चलिये आनंद लीजिये रविकांत की इस ग़ज़ल का और बधाइयां दीजिये रवि को जन्‍मदिन की आखिर को ये रवि का पहला शादीशुदा जन्‍मदिन है । ( मेरे ज्ञान के अनुसार) । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-4150154808717378211?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/MLcSyIxJduw" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-18T13:01:24.358+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html</feedburner:origLink></item><item><title>भाषा लोक से आती है, जन से आती है और उसी को क्रमश: शब्‍दकोषों में, व्‍याकरणों में स्‍थान मिल जाता है । तो कौन तय करेगा कि क्‍या ठीक है, लोक या व्‍याकरणाचार्य ?</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/b_0djQ4mhkI/blog-post_14.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Fri, 15 May 2009 02:55:29 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-596005515163325673</guid><description>&lt;p&gt;मठों से और मठाधीशों से मुझे हमेशा से ही एक चिड़ सी रही है । रवायतों और परम्‍पराओं की दुहाई देने वालों से मेरी कभी नहीं निभती । मुझे हमेशा से ही ये लगता है कि जो कुछ भी बदले जाने योग्‍य है उसे बदला ही जाना चाहिये और जो कुछ बदले जाने योग्‍य नहीं है उसको नहीं बदला जाना चाहिये । वे सभी रवायतें और परम्‍पराएं जो कि समय के साथ असहज होती जा रही हैं और अपना आधार खोती जा रही हैं उनको बदला ही जाना चाहिये । किन्‍तु मठ और मठाधीशों की दुकाने तो उन परम्‍पराओं के कारण ही चलती हैं । अगर उनको ही बदल दिया गया तो ये दुकानें कैसे चलेंगी । एक सच सुनकर शायद कई लोगों को मुझ पर क्रोध आये और कई लोग हो सकता है मेरे बारे में मान्‍यता बदल लें लेकिन सच यहीं है कि मैं मंदिरों में नहीं जाता । ये भी सच है कि ईश्‍वर में अटूट आस्‍था है और उसको महसूस किया है लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मंदिर और कुछ नहीं है बस एक दुकान है और दुकानदार वहां का पंडा या पुजारी है । मैं हमेशा से ऐसा नहीं था लेकिन पिछले कुछ सालों से ऐसा हो गया हूं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आज का ये इन्‍ट्रोडक्‍शन क्‍यों ? दरअसल में उसके पीछे भी एक कारण है । भाषा को लेकर बड़ा द्वंद चलता है । और विशेषकर हिंदी बेल्‍ट में तो भाषा को लेकर काफी उठापटक रहती है । और ये उठापटक है भाषा के शब्‍दों और उनके उपयोग को लेकर । चूंकि कई सारे शब्‍द इधर उधर के हैं अत: ये हंगामा हमेशा रहता है कि ये शब्‍द तो इस प्रकार उच्‍चारित होता है । दुष्‍यंत को सारी उम्र रवायतों के हिमायतियों से सामना करना पड़ा, बाद में दुष्‍यंत की शायरी ने वो किया जो तथाकथित परम्‍परावादी जीवन भर नहीं कर पाये । एक शेर को बार बार मैं कोट करता हूं &lt;strong&gt;। &lt;a href="http://aajkeeghazal.blogspot.com/"&gt;सतपाल जी&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; ने बताया कि ये शेर अदम गोंडवी जी का है ।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;ग़ज़ल को ले चलो अब गांव&amp;nbsp; के&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दिलकश नज़ारों में &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मुसलसल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;( अदबी इदारा : साहित्यिक संस्‍था )&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;मुझे नहीं लगता के आगे कुछ कहने की ज़रूरत है । खैर तो बात ये कि कौन तय करेगा कि क्‍या ठीक है और किस आधार पर । यदि व्‍याकरणाचार्यों की सुनें तो दुष्‍यंत एक निम्‍न स्‍तर का शायर है और यदि लोक की सुनें, जन की सुनें तो दुष्‍यंत हिंदी का सबसे बड़ा शायर है । तो किसकी बात को सही माना जाये परम्‍परवादियों की, या उस जन की जो परम्‍पराओं से छुटकारा चाहती है । हिंदी में एक वाक्‍य है ' अब तो वहां जाकर के ही देखेंगें ' , या एक और वाक्‍य है ' पास आकर के देखो' । अब हम उदाहरण लेते हैं वाक्‍य 'पास आकर के देखो' का इसमें से 'के' को हटा दें तो वाक्‍य बनता है ' पास आकर देखो'&amp;nbsp; । अब कई बार उच्‍चारण करें दो वाक्‍यों का । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;पास आकर देखो &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;पास आकर के देखो &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;क्‍या दोनों वाक्‍यों की ध्‍वनियों में कोई परिवर्तन नहीं लग रहा है । दरअसल में ये विशुद्ध हिंदी की ध्‍वनियां हैं । हिंदी जो मेरे विचार में विश्‍व की सर्वश्रेष्‍ठ भाषा है । हिंदी विश्‍व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है । इसलिये कोई दूसरी भाषा का हिमायती ( भाषा का नाम लेना आवश्‍यक नहीं है ) यदि इन दोनों वाक्‍यों को पढ़ेगा तो उसे दूसरे वाक्‍य में जो &lt;strong&gt;के &lt;/strong&gt;शब्‍द आ रहा है वो अतिरिक्‍त लगेगा । किन्‍तु हिंदी का जानकार जब पढ़ेगा तो उसे पता होगा कि दूसरे वाक्‍य में जो &lt;strong&gt;के &lt;/strong&gt;आ रहा है वो भाषा के लालित्‍य, भाषा के सौंदर्य का एक प्रयोग है जो कि केवल हिंदी में ही होता है । अब ये जो &lt;strong&gt;के&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; है ये क्‍या कर रहा है इसको जानें । दरअसल में ये जो &lt;strong&gt;के&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; है ये कोई अतिरिक्‍त नहीं है ये तो एक प्रयोग हैं । यदि आप पहले वाक्‍य को देखेंगें तो उसमें प्रेम नहीं है, मनुहार नहीं है, बल्कि एक प्रकार का रूखापन है । या यूं कह सकते हैं कि उसमें एक प्रकार की धमकी जैसी दिखाई दे रही है । दूसरे में जो &lt;strong&gt;के&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; आया है उसने वाक्‍य का सौंदर्य बढ़ा दिया है । अब उसने उस वाक्‍य में सब कुछ भर दिया है, सौंदर्य भी, लालित्‍य भी, मनुहार भी और बहुत कुछ । लेकिन भाषा का लालित्‍य विश्‍व की केवल एक ही भाषा में होता है हिंदी में । इसलिये यदि भाषा के लालित्‍य का समझना है तो हिंदी में सोचना होगा । इस &lt;strong&gt;के&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को ग़ज़लों में अवांछित माना गया है और बिना इसके प्रयोग को देखे इसको &lt;strong&gt;भर्ती&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; का शब्‍द बता दिया जाता है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;भाषा लोक से जन्‍म लेती है । लोग जो कुछ बोलते हैं वही भाषा होती है । और भाषा के शब्‍द भाषा के नियम सब लोक से आते हैं । एक भाषा के नियम दूसरी पर भी चलते हों ये नहीं हो सकता । जैसे उर्दू में हिंदी के &lt;strong&gt;ब्राह्मण &lt;/strong&gt;को &lt;strong&gt;बिरहमन&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; कर दिया गया है हिंदी के &lt;strong&gt;पृथ्‍वी&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को &lt;strong&gt;पिरथवी&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; कर दिया गया । उसको लेकर हिंदी ने कभी आपत्‍ती नहीं उठाई के ये तो ग़लत उच्‍चारण है । तो फिर जब हिंदी में उर्दू के &lt;strong&gt;शह्र &lt;/strong&gt;को &lt;strong&gt;शहर &lt;/strong&gt;किया गया तो उस पर भी आपत्‍ती नहीं होनी चाहिये । दरअसल में लोग किसी शब्‍द को जब दूसरी भाषा से लेते हैं तो वे उसका उच्‍चारण भी कुछ परिवर्तित हो जाता है । और जब एक भाषा के शब्‍द दूसरी में जाते हैं तो उच्‍चारण बदल ही जाता है । ऐसे में यदि मूल भाषा के व्‍याकरणाचार्य आपत्‍ती उठायें कि नहीं ये तो ग़लत उच्‍चारण है तो भी जन या लोक उस उच्‍चारण को बदलते नहीं हैं । क्‍योंकि ये बचपन से जुबान, तालू, दांत और दिमाग में होता है कि किस अक्षर को कैसे कहना है । यदि आप ध्‍यान से सुनें तो &lt;strong&gt;सब&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; टीवी के धारावाहिक &lt;strong&gt;गनवाले दुल्‍‍हनिया ले जायेंगें&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; में एक लड़की जो &lt;strong&gt;टाइगर&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; की प्रेमिका बनी है वो &lt;strong&gt;स &lt;/strong&gt;को &lt;strong&gt;फ&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; उच्‍चारित करती है । क्‍योंकि बचपन से उसे ये ही अभ्‍यास में हैं । जैसे उर्दू में &lt;strong&gt;ज़ात&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; में &lt;strong&gt;ज&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; पर नुक्‍ता लगता है हिंदी में वो&lt;strong&gt;&amp;nbsp; जात &lt;/strong&gt;होती है । ( जात न पूछो साधु की ) ।&amp;nbsp; हमने अंग्रेजों को इसलिये नहीं भारत से भगाया कि वे &lt;strong&gt;ट,ठ,ड,ढ&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को ठीक प्रकार से उच्‍चारण नहीं कर पाते थे । उनको भगाने के पीछे दूसरे कारण थे । वे नहीं कर पाते थे क्‍योंकि उनका मुंह की आंतरिक संरचना तथा जुबान इन शब्‍दों पर ठीक प्रकार से कार्य नहीं करती थी । मैंने पूर्व में एक बार बताया है कि दो हजार साल पहले खाड़ी के देशों के लोग &lt;strong&gt;स&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को&lt;strong&gt;&amp;nbsp; ह&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; बोलते थे । इसी उच्‍चारण की गड़बड़ी से जन्‍मा है नाम &lt;strong&gt;हिंदू&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; तथा &lt;strong&gt;हिंदुस्‍तान &lt;/strong&gt;। क्‍योंकि सिंधू नदी से हमारी पहचान थी और उसी सिंधू को &lt;strong&gt;हिंदू&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; कहकर पुकारा जाता था । अरब की उन्‍हीं बंजारा जातियों के वंशज आज भी राजस्‍थान में हैं जो लोहापीटा बंजारे हैं ये भी आज तक &lt;strong&gt;सबेरे &lt;/strong&gt;को &lt;strong&gt;हबेरे&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; कहते हैं अर्थात वही &lt;strong&gt;स&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को &lt;strong&gt;ह &lt;/strong&gt;। यही &lt;strong&gt;ह &lt;/strong&gt;जब यूनान पहुंचा तो वहां इसे &lt;strong&gt;अ&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; मिला अर्थात&lt;strong&gt;&amp;nbsp; ह&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को &lt;strong&gt;अ&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; उच्‍चारण वहां होता था&amp;nbsp; । तो ये ही सिंधु जो कि अरब में हिंदू हुआ वहीं यूनान में &lt;strong&gt;ह &lt;/strong&gt;का उच्‍चारण &lt;strong&gt;इ &lt;/strong&gt;होने के कारण &lt;strong&gt;इंदू &lt;/strong&gt;हुआ जिससे फिर बना &lt;strong&gt;इंडिया &lt;/strong&gt;। ( आचार्य रामधारी सिंह दिनकर स्‍मृति स्‍मारिका 2008 में उस पर मेरा एक विस्‍्तृत आलेख है मिलें तो पढें ) । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://ngoswami.blogspot.com"&gt;अग्रज कवि श्री नीरज गोस्‍वामी&lt;/a&gt; &lt;/strong&gt;जी &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0RYFg_XTI/AAAAAAAAA2U/HPgg9UimeZI/neerajgoswami%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="neerajgoswami" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0RbuYD4QI/AAAAAAAAA2Y/KvJr0-jIZXY/neerajgoswami_thumb%5B1%5D.jpg" width="61" height="80"&gt;&lt;/a&gt; की दो &lt;a href="http://ngoswami.blogspot.com/2009/05/blog-post.html"&gt;ग़ज़लें&lt;/a&gt; मुझे बहुत आनंद देती हैं जिनमें मुंबइया भाषा का प्रयोग हुआ । आनंद क्‍यों ? क्‍योंकि इनमें जन की भाषा का प्रयोग है, लोक की भाषा का प्रयोग है । क्‍या वो जन इतना बुरा है कि उसकी भाषा में साहित्‍य ही न रचा जाये । क्‍या साहित्‍य केवल चंद एलीट या अदबी लोगों के लिये ही है । नहीं तुलसीदास ने जब संस्‍कृत को छोड़कर भाखा ( जन भाषा) में मानस की रचना की तो संस्‍कृत वालों ने खूब हंसी उड़ाई, किन्‍तु आज समय ने बताया कि तुलसी कहां हैं और दूसरे कवि कहां हैं । मुझे पसंद आती हैं&lt;strong&gt; &lt;a href="http://www.esnips.com/doc/d344a9a0-accf-48fc-8f7d-d072736c9b01/Gazhals-of-dwijendra-dwij"&gt;श्री द्विजेंद्र द्विज जी&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0Rcy2LXpI/AAAAAAAAA2c/yPCpTNdShro/images%5B11%5D%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="images[11]" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0Rd9IQFgI/AAAAAAAAA2g/AgLaO_TuYDE/images%5B11%5D_thumb%5B1%5D.jpg" width="70" height="62"&gt;&lt;/a&gt; की ग़ज़लें क्‍योंकि वो आम आदमी की भाषा में बात करती हैं जैसे &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन्‍हीं हाथों ने बेशक विश्‍व का इतिहास लिक्‍खा है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन्‍हीं&amp;nbsp;&amp;nbsp; पर&amp;nbsp;&amp;nbsp; चंद&amp;nbsp;&amp;nbsp; हाथों&amp;nbsp;&amp;nbsp; ने&amp;nbsp;&amp;nbsp; मगर&amp;nbsp;&amp;nbsp; संत्रास&amp;nbsp;&amp;nbsp; लिक्‍खा है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;या &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;जाने कितने ही उजालों का दहन होता है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;लोग&amp;nbsp;&amp;nbsp; कहते&amp;nbsp;&amp;nbsp; हैं&amp;nbsp;&amp;nbsp; यहां&amp;nbsp;&amp;nbsp; रोज हवन&amp;nbsp; होता है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;या फिर &lt;strong&gt;&lt;a href="http://deshkaal.com/Details.aspx?nid=125200972513272"&gt;श्री आलोक श्रीवास्‍तव जी&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; की &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0Rf6CKPMI/AAAAAAAAA2k/6SnaXOAAIG8/BK-032%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="BK-032" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0RhI-qC3I/AAAAAAAAA2o/qn8qEeUSSes/BK-032_thumb%5B1%5D.jpg" width="54" height="70"&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; ग़ज़लें जो बिना किसी ताम झाम के केवल जन की बात करती हैं ।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;घर में झीने झीने रिश्‍ते मैंने रोज उधड़ते देखे &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्‍मा &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;इस शेर पर हिंदी के शीर्ष &lt;a href="http://deshkaal.com/Details.aspx?nid=125200972513272"&gt;आलोचक नामवर सिंह जी&lt;/a&gt; ने &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0RkNf-xiI/AAAAAAAAA2s/Pkj20RZTtqY/125200972513272_m%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="125200972513272_m" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0Ru7USB1I/AAAAAAAAA2w/vTa5hYoOKv8/125200972513272_m_thumb%5B1%5D.jpg" width="58" height="58"&gt;&lt;/a&gt; कहा कि &lt;strong&gt;तुरपाई &lt;/strong&gt;शब्‍द संभवत: काव्‍य में पहली बार प्रयोग किया गया है और इतनी सुंदर जगह प्रयोग किया गया है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;मैं स्‍वयं पैदाइशी विद्रोही हूं, मेरा मानना है परम्‍पराएं कुछ नहीं होतीं, जो जन तय करता है वही परम्‍परा होती है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अंत में सबसे क्षमा चाहता हूं । मुझे लगा कि ये कहना आज जरूरी है सो कहा । तुलसी से लेकर दुष्‍यंत तक हमारे पास उदाहरण हैं कि जिसने विद्रोह किया रवायतों से परम्‍पराओं से वही अमर हुआ और कालजयी हुआ तो फिर भी हम कुछ सीखते क्‍यों नहीं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;खैर काफी लम्‍बा हो गया है सो विराम देता हूं । मिलिये आज मेरी दोनों बिटियाओं &lt;strong&gt;परी और पंखुरी&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; से । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0R1G5pnHI/AAAAAAAAA20/nNHesEexqqU/PICT0383%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="PICT0383" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sg0R51DmvPI/AAAAAAAAA24/EVuj4kSEFUk/PICT0383_thumb%5B2%5D.jpg" width="346" height="261"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-596005515163325673?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/b_0djQ4mhkI" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-15T15:25:29.276+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">28</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><item><title>सुनो छोटी सी प्रीति की लम्‍बी कहानी,  निम्‍न मध्‍यम वर्गीय श्रमिक की बेटी के आइ ए एस बनने की गाथा ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/RgToiuefOQA/blog-post_11.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 11 May 2009 23:31:46 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-5800437009011733884</guid><description>&lt;p&gt;प्रीति मध्‍यप्रदेश के सीहोर जिले से बनने वाली पहली आइएएस अधिकारी होगी । 92 वीं रैंक के साथ उसका सिलेक्‍शन हुआ है । मगर सबसे महत्‍वपूर्ण है उसके आइएएस बनने की कहानी एक साधारण या बल्कि कहें कि निम्‍न मध्‍यमवर्गीय परिवार से निकली ये लड़की आइएएस में चयनित हो गई है । अनारक्षित वर्ग से निकली ये लड़की संघर्ष और हौसलों की एक अनोखी कहानी है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;सोमवार का दिन एक गहरे अवसाद के साथ प्रारंभ हुआ मेरे लिये । और उस अवसाद का कारण था किसी जगह पर की गई मेरे बारे में एक बहुत ही अशालीन और दुखी कर देने वाली&amp;nbsp; टिप्‍पणी को पढ़कर । यूं तो पिछले कई दिनों से मुझे लग रहा था कि मुझे लेकर कई लोग असहज नहीं हैं । एक दो जगहों पर अप्रत्‍यक्ष रूप से मुझे नीचा दिखाने का प्रयास किया गया । किन्‍तु सोमवार को तो बस । ब्‍लागिंग समाप्‍त करने की पोस्‍ट अंतिम&amp;nbsp; लिख रहा था कि बिजली चली गई । अधूरी पोस्‍ट रह गई और उसी बीच आ गया &lt;a href="http://gautamrajrishi.blogspot.com/"&gt;गौतम&lt;/a&gt; का फोन जिसने अवसाद का हटा दिया । और फिर कुछ ही देर बाद आया &lt;a href="http://aalokshrivastav.itzmyblog.com/"&gt;श्री आलोक श्रीवास्‍तव&lt;/a&gt; जी का फोन । काफी लम्‍बे समय तक उनसे बात हुई । और कई बातें उन्‍होंने ऐसी कहीं कि अवसाद लगभग घुल गया । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;चलिये वो सब बातें छोड़ें जो बीत गई वो बात गई । आज तरही होना था लेकिन आज आपको प्रीति मैथिल की कहानी सुनाने की इच्‍छा है । प्रीति जो मेरे जिले की पहली आईएएस बनने जा रही है । कहानी सुनाना इसलिये जरूरी है कि उसकी कहानी में वो सब कुछ है जो एक विजेता की कहानी में होता है । प्रीति के पिता स्‍थानीय शुगर फैक्‍ट्री में श्रमिक थे । लगभग दस साल पहले अच्‍छी चलती हुई ये फैक्‍ट्री राजनैतिक महात्‍वाकांक्षा की भेंट चढ़ी और बंद कर दी गई । उसीके साथ हजारों लोगों के भविष्‍य पर भी ताला लग गया । कई आत्‍महत्‍याएं हुईं बहुत कुछ हुआ और एक आंदोलन भी प्रारंभ हुआ जो आज तक भूख हड़ताल के रूप में चल रहा है शायद ये इंतिहास की सबसे लम्‍बी हड़ताल है जो दस सालों से सीहोर के कलेक्‍ट्रेट के सामने चल रही है । जब मिल बंद हुई तो प्रीति का परिवार भी सड़क पर आ गया । और प्रारंभ हुआ संघर्ष का दौर । तब प्रीति 13 साल की थी और परिवार का संघर्ष उसने आंखों से देखा । पिता ने एक छोटे से जमीन के टुकड़े&amp;nbsp; पर किसानी प्रारंभ की&amp;nbsp; और परिवार को पाला । जमीन का टुकड़ा जो स्‍वयं का भी नहीं था और इतना भी नहीं था कि उससे एक परिवार का पालन हो । शुगर मिल के बंद होने में कलेक्‍टरों की भूमिका को देख कर सब आक्रोशित थे और यही आक्रोश था प्रीति के मन में भी । उसने घर की भीषण तंग स्थिति में भी निर्णय लिया कि मैं आईएएस बनूंगी । गरीब परिवार, पिछड़ा इलाका और अनारक्षित वर्ग की एक साधारण सी लड़की ने वो सोचा जो उन परिस्थितियों में कोई भी नहीं सोचता । मगर कहते हैं ने उड़ान पंखों से नहीं हौसलों से होती है । और उस छोटी सी गुडि़या ने वो सच कर दिखाया । पिछले दिनों आइएएस में उसका 92 वी रैंक के साथ चयन हुआ है । जब मैं इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के लिये उसके घर साक्षात्‍कार के लिये पहुंचा तो उसका घर देख कर मुझे लगा कि हां होते हैं लाल भी गुदड़ी में । मेरा सलाम प्रीति को । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;जब श्रमिकों की ओर से एक मंडल मुझसे लिने आया कि वे प्रीति का सम्‍मान करना चाह रहे हैं और मैं उस कार्यक्रम का संचालन करूं तो सबसे पहले तो अपनी कसम याद आई कि गैर साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन नहीं करना । खैर जब पता चला कि भवन निर्माण का&amp;nbsp; काम करने वाले मजदूर ये सम्‍मान चौराहे पर कर रहे हैं तो बिना कुछ सोचे हां कर दी । कार्यक्रम सुबह आठ बजे था जब मजदूर काम की तलाश में चौराहे पर आते हैं । फूलों का वर्षा के बीच प्रीति का सम्‍मान किया गया । कार्यक्रम के बाद मैं एक तरफ जाकर श्री रमेश हठीला के साथ खड़ा हो गया । चैनल वाले प्रीति का इंटरव्‍यू करने लगे&amp;nbsp; । प्रीति से मेरा कोई पूर्व परिचय नहीं था । अचानक वो मुझे ढूंढते हुए आई और बोली &lt;strong&gt;' मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूं आपकी सारी कहानियां मैंने पढ़ी हैं ''&lt;/strong&gt; । प्रीति की उस एक वाक्‍य ने सोमवार की सुबह का सारा अवसाद धो दिया । और मैं फिर ये तैयार हो गया । संन्‍यास का इरादा फिलहाल कैंसिल धन्‍यवाद गौतम, धन्‍यवाद आलोक जी , धन्‍यवाद प्रीति ।&amp;nbsp; ये कहानी इस उम्‍मीद के साथ कि इसको अपने बच्‍चों को जरूर पढ़ायें । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;और अब देखें कार्यक्रम के फोटो जो मेरे अग्रज छायाकार श्री राजेंद्र शर्मा जी ने लिये हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXXLXGz4I/AAAAAAAAA1U/tskboEfjCK8/DSC_0409%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0409" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXZYJopQI/AAAAAAAAA1Y/sKuOdFMRYl8/DSC_0409_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXbKavyiI/AAAAAAAAA1c/xFfiL-RTGZU/DSC_0431%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0431" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXc1NnQHI/AAAAAAAAA1g/IWtsB_lwsBo/DSC_0431_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt;  &lt;/p&gt; &lt;p&gt;पुष्‍प वर्षा से प्रीत‍ि का सम्‍मान और दूसरे चित्र में चौराहे पर सम्‍मान समारोह का संचालन &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXgDixG0I/AAAAAAAAA1k/JDqtMvfl6Io/DSC_0415%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0415" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXiQLwReI/AAAAAAAAA1o/kbuZfO2TRAo/DSC_0415_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXkZ79TNI/AAAAAAAAA1s/95CxxZIkXzw/DSC_0424%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0424" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXmD0HnmI/AAAAAAAAA1w/QZQ9-F3ZdvE/DSC_0424_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;मजदूर महिला द्वारा पुष्‍प हार प्रदान और प्रीति को सम्‍मान पत्र प्रदान किया जा रहा है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXobYnoWI/AAAAAAAAA10/NO76z-05nzc/DSC_0434%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0434" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXp3zTQAI/AAAAAAAAA14/9wkPa93svho/DSC_0434_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXrUL4UeI/AAAAAAAAA18/ZlgvXy603uI/DSC_0436%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0436" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXsnkAwjI/AAAAAAAAA2A/JaWVeM03q4U/DSC_0436_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;श्री रमेश हठीला जी भावुक हो गये कंधे पर हाथ रख कर और कल और आज एक साथ &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXuWz6B8I/AAAAAAAAA2E/MDwt1-CbOYo/DSC_0441%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0441" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXvwPMYpI/AAAAAAAAA2I/PTZC3C8rB7s/DSC_0441_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXxW-UZbI/AAAAAAAAA2M/qMgWUPjcBEE/DSC_0442%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="DSC_0442" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SgkXzTwDf_I/AAAAAAAAA2Q/vjX1Z9FRHj8/DSC_0442_thumb.jpg" width="244" height="163"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;'मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूं'' और दूसरे चित्र में मोटर साइकल पर जाती कल की कलेक्‍टर। &lt;/p&gt; &lt;p&gt;और अंत में इस अवसर पर हठीला जी का एक छंद जो उन्‍होंने दिया और मैंने पढ़ा । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;एक नया इतिहास रच दिया जिसने इस सीहोर का &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आओ हम सम्‍मान करें अब अपने उस सिरमोर का &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;नई उमंगें नई दिशा दीं जिसने हैं तरुणाई को &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आह्लादित कर दिया आज फिर गूंगी सी शहनाई को &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;वंदन है अभिनंदन है इस नई नवेली भोर का &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आओ हम सम्‍मान करें अब अपने उस सिरमोर का &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-5800437009011733884?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/RgToiuefOQA" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-12T12:01:46.080+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">21</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_11.html</feedburner:origLink></item><item><title>कुमार गंधर्व के सुपुत्र मुकुल शिवपुत्र भोपाल की सड़कों पर भीख मांग रहे हैं ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/BSjJqP0JKuQ/blog-post_07.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Thu, 07 May 2009 19:16:29 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8913289986889437723</guid><description>&lt;p&gt;मुझे नहीं पता कि ऐसा क्‍यों हो रहा है किन्‍तु जैसा पता चला है वो तो यही&amp;nbsp; है कि शास्‍त्रीय संगीत के शीर्ष पुरुष कुमार गंधर्व साहब के सुपुत्र मुकुल शिवपुत्र जो कि स्‍वयं भी एक सुप्रसिद्ध गायक हैं इन दिनों भोपाल की सड़कों पर दो दो रुपये के लिये भीख मांग रहे हैं । समाचार एकबारगी तो दहला देने वाला है और हमारे समाज की सच्‍चाई को सामने लाने वाला है । हम जो कुमार गंधर्व साहब और मुकुल शिवपुत्र के गायन की प्रशंसा करते नहीं अघाते हम उसी समाज के हैं जिसमें मुकुल शिवपुत्र को भीख मांगना पड़ रही है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;यद्यपि समाचार को लेकर अभी पुष्टि नहीं है किन्‍तु जब एक बड़ा समाचार पत्र समाचार को अपने मुखपृष्‍ठ की लीड स्‍टोरी बना कर छाप रहा है तो कुछ न कुछ तो अवश्‍य ही होगा । स्‍थानीय दैनिक भास्‍कर ने जो मुखपृष्‍ठ पर लीड स्‍टोरी लगाई है उसका शीर्षक है सड़कों पर भीख मांग रहा कुमार गंधर्व का बेटा । समाचार के अनुसार मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल के शास्‍त्री नगर का सांई बाबा मंदिर तथा जवाहर चौक की देशी शराब की दुकान ही इन दिनों मुकुल शिवपुत्र का स्‍थायी निवास है । वे मटमैली हो चुकी नीले सफेद चैक की हाफ शर्ट तथा नीले रंग की पैंट और चप्‍पल डाले मंदिर के बाहर पड़े रहते हैं तथा हर आने जाने वाले से सिर्फ दो रुपये मांगते हैं और जैसे ही जेब में दस बीस रुपये हो जाते हैं वे देशी शराब की दुकान का रुख कर लेते हैं । 1956 में जन्‍मे मुकुल शिवपुत्र को उनके पिता ने बचपन में ही शास्‍त्रीय संगीत में पारंगत कर दिया था । ध्रुपद धमार तथा कर्नाटक संगीत के विशेषज्ञ के रूप में मुकुल शिवपुत्र को जाना जाता है । खयाल गायकी में अपना मुकाम बनाने वाले शिवपुत्र को जब पत्रकारों ने भोजन कराने का प्रस्‍ताव दिया तो उन्‍होंने कहा कि नहीं मुझे नहीं खाना है कुछ भी मुझे तो सोना है मुझे कहीं सुला दो । उल्‍लेखनीय है कि इन्‍हीं मुकुल की गायकी को इंटरनेट पर कई वेब साइट एक परफारमेंस के 15 डालर के हिसाब से बेच रही हैं ये दावा करके कि ये पूरा पैसा कलाकार को दिया जायेगा । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आज की पोस्‍ट इतनी ही, बहुत बड़ी बड़ी और आदर्शवादी बातें करने का मन नहीं है । मन दुखी है बस । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-8913289986889437723?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/BSjJqP0JKuQ" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-08T07:46:29.647+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">27</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post_07.html</feedburner:origLink></item><item><title>जिस दिन मेरा था अभिनंदन, तुलसीदास सर कूट रहे थे, कालीदास करते थे क्रंदन, जिस दिन मेरा था अभिनंदन ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/dWdvJQEQQp8/blog-post.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 04 May 2009 20:01:18 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-6643283238255919019</guid><description>&lt;p&gt;पिछली पीढ़ी के संभवत: जबलपुर के किसी कवि की ये कविता है किसकी है ये तो याद नहीं आ रहा है किन्‍तु मेरी पसंदीदा पंक्तियां हैं ये । जब भी कहीं पर कोई मेरा सम्‍मान करने की बात करता है तो ये पंक्तियां याद आ जाती हैं । गये रविवार को हमारा भी अभिनंदन हुआ । सांसद तथा प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री श्री कैलाश जोशी&amp;nbsp; और हमारे क्षेत्र के विधायक श्री रमेश सक्‍सेना जी जो अपनी मूंछों की स्‍टाइल के लिये पूरी विधानसभा में चर्चित हैं । के हाथों हमारा अभिनंदन हुआ अब हम तो ये नहीं कहेंगें कि तुलसीदास सर कूट रहे थे कालीदास करते थे क्रंदन । खैर अवसर था परशुराम जयंति का और चूंकि हम भी ब्राह्मण हैं सो साहित्यिक उपलब्धियों के लिये हमारा सम्‍मान किया गया । अपने आदरणीय अग्रजों श्रद्धेय श्री प्रकाश व्‍यास जी तथा श्रद्धेय मदन मोहन जी शर्मा जी का आदेश टालना असंभव हो गया अत: सम्‍मान लेना ही पड़ा और अपने शहर में सम्‍मान नहीं लेने की कसम आखिर टूट ही गई । खैर अच्‍छा लगा और इसलिये और अच्‍छा लगा कि मंच पर मेरे बड़े भाई श्री अजय पुरोहित जो कि श्रीमदभागवत पर प्रवचन देते हैं ( वैसे मूलत: वे कम्‍प्‍यूटर इंजीनियर हैं ) विशिष्‍ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे । साथ ही प्रदेश के एक और बड़े भागवत प्रवचनकार श्री प्रभु नागर भी उपस्थित थे । अच्‍छा लगता है न कि मंच पर दोनों भाई उपस्थित हों । एक का सम्‍मान हो रहा हो और दूसरा सम्‍मान करने वाले अतिथियों में हो । आपको बता दूं कि हम दो ही भाई हैं बहन नहीं हैं । शहर के मुख्‍य सभा स्‍थल पर हजारों की भीड़ के सामने सम्‍मान प्रदान किया गया । सम्‍मान नहीं लेने की कसम टूटने का मलाल नहीं रहा । कार्यक्रम की चित्रमय झांकी आपके लिये प्रस्‍तुत हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-ro2ZwBPI/AAAAAAAAA0k/0tpS86b6HPc/DSC_9715%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="276" alt="DSC_9715" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-rq1Zgf7I/AAAAAAAAA0o/eReMlodx4TU/DSC_9715_thumb%5B2%5D.jpg" width="416" border="0"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;ये हैं मध्‍यप्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री तथा सांसद श्री कैलाश जी जोशी पीछे जो हाथ बांधे खड़े हैं वे मेरे अग्रज हैं ।&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-rs8UNU5I/AAAAAAAAA0s/twKtCl7e_Rg/DSC_9717%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="277" alt="DSC_9717" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-rvFtolEI/AAAAAAAAA0w/xznhchPmWLI/DSC_9717_thumb%5B4%5D.jpg" width="417" border="0"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;ये हैं हमारे क्षेत्र के विधायक श्री रमेश सक्‍सेना जी ( मूंछों वाले ) । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-ryYNissI/AAAAAAAAA00/W0ZfSTIX0_8/DSC_9718%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="280" alt="DSC_9718" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-r0RbxbCI/AAAAAAAAA04/Ob7-4afcBzY/DSC_9718_thumb%5B3%5D.jpg" width="421" border="0"&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री कैलाश जी जोशी शाल प्रदान कर रहे हैं और ठीक पीछे मेरे अग्रज खड़े हैं । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-r2DeVqEI/AAAAAAAAA08/Cuk0DNjVgUk/DSC_9720%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="281" alt="DSC_9720" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-r4OQNYVI/AAAAAAAAA1A/CM5tTtP6_s4/DSC_9720_thumb%5B3%5D.jpg" width="422" border="0"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;सांसद श्री कैलाश जोशी जी तथा विधायक श्री रमेश सक्‍सेना जी सम्‍मान प्रदान कर रहे हैं । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-r5rwSdQI/AAAAAAAAA1E/qS9FBGYmRkQ/DSC_9721%5B6%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="279" alt="DSC_9721" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-r7EPyuUI/AAAAAAAAA1I/hPyskmEyhV8/DSC_9721_thumb%5B4%5D.jpg" width="420" border="0"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक समूह चित्र जिसमें बांये से हैं श्री मदन मोहन जी शर्मा, श्री प्रभु जी नागर, श्री अजय पुरोहित, एक कोई महंत हैं, फिर भागवत प्रवचनकार पंडित प्रदीप मिश्रा जिनका भी सम्‍मान हुआ था, फिर ग़ज़ल प्रवचनकार पंकज सुबीर, सांसद कैलाश जोशी, माइक लिये हैं श्री प्रकाश व्‍यास जी , फिर विधायक श्री रमेश सक्‍सेना और अंत में खड़े हैं पूर्व विधायक श्री मदन लाल त्‍यागी । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;तो चलिये फोटो देखिये और मुझे इजाजत दीजिये । हां तरही के लिये जिन लोगों ने ग़ज़ल नहीं दी है&amp;nbsp; वे कृपा करके शीघ्र भेज दें क्‍योंकि हम अगले सप्‍ताह में उस आयोजन को करने जा रहे हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;एक ओपीनियन पोल में आप सबकी आवश्‍यकता है कुछ लोग मेरे पीछे लगें हैं कि मुझे हेयर ट्रांस्‍प्‍लांट करवाना चाहिये मेरा स्‍वयं का स्‍पष्‍ट मत है कि मुझे ज़रूरत नहीं है, मेरे इस मत के पक्ष में भी कई सारे लोग हैं । किन्‍तु ट्रांस्‍प्‍लांट का समर्थन करने वाले कुछ लोगों में मेरी पत्‍नी भी शामिल है । अत: आप बतायें कि आप क्‍या कहते हैं । मेरे जन्‍म दिन की ये तस्‍वीर देख कर पत्‍नी कहती है कि बस बाल की ही कमी है वरना तो तुम अभी तक स्‍मार्ट लगते हो ( 'अभी तक' पर गौर करें ) । इस चित्र में हम दोनों नजर आ रहे हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-r83ZWIrI/AAAAAAAAA1M/6ngSOJT4bLs/DSC_0160%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="388" alt="DSC_0160" src="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sf-r-3jEMMI/AAAAAAAAA1Q/VGVjtHHIkNw/DSC_0160_thumb%5B2%5D.jpg" width="348" border="0"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-6643283238255919019?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/dWdvJQEQQp8" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-05T08:31:18.272+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">18</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>राकेश खण्‍डेलवाल जी का एक गीत 'गीत बन कर के होठों से झर जायें हम' जो कहीं कहीं पर ग़ज़ल का आनंद भी देता है ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/z2XJeR6TkU8/blog-post_30.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Thu, 30 Apr 2009 22:30:40 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8302334114196586290</guid><description>&lt;p&gt;राकेश खण्‍डेलवाल जी के गीतों में एक अलग ही बात है उनमें वो सब कुछ है जो गीतों के स्‍वर्ण काल की याद दिलाता है वो समय जब दादा नीरज जी, सोम दादा, बालकवि बैरागी जी जैसे गीतकार हिंदी कवि सम्‍मेलन के मंचों पर अपनी आवाज़ और अपनी लेखनी का जादू बिखेरते थे । यद्यपि ये तीनों ही हिंदी के पुरोधा कवि आज भी यदा कदा मंचों पर दिखाई देते हैं किन्‍तु बात वही है कि वर्षाकाल में कोयल मौन साध लेती है क्‍योंकि तब मेंढकों के टर्रोने का समय होता है । राकेश खण्‍डेलवाल जी के गीतों में एक सुगंध है जो कुछ इस प्रकार से उठती है जैसे ग्रीष्‍म की तपती हुई धरती पर वर्षा की प्रथम बूंद गिरने पर सौंधी सी सुवास उठती है । राकेश जी के गीतों में अनोखे शब्‍द चित्र होते हैं । तो आप भी आनंद लीजिये राकेश जी के इस गीत का ।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;गीत बन कर के होठों से झर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SfpkMGcUyaI/AAAAAAAAA0U/atYx3QglwEY/2%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="296" alt="2" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SfpkPQvRBFI/AAAAAAAAA0Y/xeEcrabfNj0/2_thumb%5B2%5D.jpg" width="389" border="0"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;भाव हैं, शब्द का पर्श पा जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;गीत बन कर के होठों से झर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;तेरे हाथों की मेंहदी बनें ना बनें&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;बन अलक्तक पगों में संवर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रोशनी की किरन, जिसने देखी नहीं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;कुछ अधूरे अंधेरों की परछाईयाँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;राह भूले नहीं, आये जब लौट कर&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;एक दीपक जला कर के धर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;शाख पर झूलने की नसीहत तो दी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;पर हवा छीन मुस्कान को ले गई&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;हम न जूड़े में तेरे अगर सज सके&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;खुश्बुओं से तेरा पंथ भर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रात थी चुक गई बीनते बीनते&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;धज्जियाँ फट बिखरते हुए स्वप्न की&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;और दिन की कुपित रोशनी ने कहा&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अब भटकना नहीं, अपने घर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;तूने हर मोड़ पर हमको रुसवा किया&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;हर उठे प्रश्न पर मौन रख रह गई&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;फिर भी इतना तो बतला दे ए ज़िन्दगी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;अब तुझे छोड़ कर के किधर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;लफ़्ज़ हम, गीत से जो परे रह गये&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;और अक्षर न गज़लों ने थामा जिन्हें&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;फिर भी होठों ने तेरे अगर छू लिया&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;फ़र्क क्या फिर जियें चाहे मर जायें हम&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p align="left"&gt;आनंद लीजिये राकेश जी के इस गीत का । पिछले सप्‍ताह भर व्‍यस्‍तता रही जो अभी भी है । कुछ रिश्‍ते खून के रिश्‍तों से भी बढ़कर होते हैं । ऐसे ही एक बालक का विवाह 29 अप्रैल&amp;nbsp; को था । सोनू यूं तो मेरे कम्‍प्‍यूटर प्रशिक्षण संस्‍थान में मुख्‍य प्रशिक्षक है किन्‍तु मेरे लिये वो मेरे छोटे भाई के समान ही है । अत: उसके विवाह को लेकर पिछले सप्‍ताह भर व्‍यस्‍त था और अभी भी हूं किन्‍तु आज यहां पर केवल हाजिरी लगाने आया हूं ।  &lt;p align="left"&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मिलिये सोनू से&lt;/strong&gt;  &lt;p align="left"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SfpkT-pVRjI/AAAAAAAAA0c/ttYkqQZZy6s/PICT1044%5B4%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="415" alt="PICT1044" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SfpkV_A7E7I/AAAAAAAAA0g/4BQIqWWNYO4/PICT1044_thumb%5B2%5D.jpg" width="405" border="0"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-8302334114196586290?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/z2XJeR6TkU8" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-01T11:00:40.554+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/04/blog-post_30.html</feedburner:origLink></item><item><title>बहरे हजज का कारवां कुछ और आगे की बातें , और बहरों के नामकरण की तकनीक की जानकारी ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/lAftNFikKuE/blog-post_20.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 20 Apr 2009 20:19:33 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-5541526679670943350</guid><description>&lt;p&gt;अभी रविवार को ही बैठकर एक ग़ज़ल पर काम कर रहा था । जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि आजकल हिंदी की ग़ज़लें लिखने का काम कर रहा हूं । उस पर भी ऐसी ग़ज़लें जिनमें हुस्‍न इश्‍क, जामो मीना, जैसी बातें न आयें केवल वर्तमान हालात की बातें हों । लिखते लिखते ही उस ग़जल में ये शेर भी बन गया जो ऊपर शीर्षक में लगाया है &lt;strong&gt;मिला हो रक्‍त मानव का भले ही, मगर भोजन निरामिष है महोदय &lt;/strong&gt;एक और शेर उसमें कुछ ऐसा बना है &lt;strong&gt;समंदर ताल नदियां आप रख लो, हमारे पास बारिश है महोदय । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;खैर ये तो हुई अपनी बात अब चलिये विषय को आगे खिसकाते हैं । बात चल रही थी पिछली बार बहरे हजज़ की जिसके बारे में मैंने बताया था कि ये एक गाई जाने वाली बहर है । जिसमें कई सारी उप बहरें ऐसी हैं जिनको कि गाने के लिये ही उपयोग किया जाता है । आज के शीर्षक में जो शेर लगा है वो भी एक ऐसी ही बहर है जिसका नाम&amp;nbsp; है &lt;strong&gt;बहरे हजज़ मुसद्दस महज़ूफ &lt;/strong&gt;और इसके रुक्‍न हैं &lt;strong&gt;मुफाईलुन-मुफाईलुन-फऊलनु &lt;/strong&gt;। अब पिछले सबक को देखकर आप ये तो कह ही सकते हैं कि स्थिर रुक्‍न मुफाईलुन है सो ये हजज़ है । तीन रुक्‍न हैं सो ये मुसद्दस है । मगर ये महज़ूफ क्‍या बला है । आइये आज इसी के बारे में कुछ बातें करते हैं कि ये महज़ूफ क्‍या बला है । दरअस्‍ल में जब बहरों का नाम करण किया जाता है तो उसमें ये देखा जाता है कि बहर के सामिल रुक्‍न के अलावा परदेशी रुक्‍न कौन कौन से हैं । सालिम रुक्‍न का मतलब होता है कि उसे बहर का स्थिर रुक्‍न जैसे कि बहरे हजज़ का स्थिर रुक्‍न है &lt;strong&gt;मुफाईलुन । &lt;/strong&gt;तो सबसे पहले तो उन परदेशियों की पहचान की जाती है और फिर उनका नाम तलाश जाता है । नाम तलाशा जाता है से मतलब ये कि बहरे हजज़ में आने वाले रुक्‍नों की एक फेहरिस्‍त है उस फेहरिस्‍त में ये ढूंढा जाता है कि इस रुक्‍न का नाम क्‍या है । अब एक और सवाल ये आ गया कि बहरे हजज़ में आने वाले रुक्‍न से क्‍या अर्थ । दरअस्‍ल में बहरे हजज़ में कुछ निश्चित रुक्‍न ही आ सकते हैं । आप ऐसा नहीं कर सकते कि अपने मन से एक रुक्‍न को मुफाईलुन के साथ लगा दें और कह दें कि ये बहरे हजज़ हैं क्‍योंकि इसमें रुक्‍न है मुफाईलुन और साथ में एक परदेशी रुक्‍न है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;दरअस्‍ल में हजज़ में &lt;strong&gt;मुफाईलुन&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; जैसी ही ध्‍वनियों वाले रुक्‍न आ सकते हैं । जैसे मफऊलु 221, फऊलुन 122, मुफाईलु 1221, फाएलुन 212, मुफाएलुन 1212, मफऊलुन 222, ये सारे के सारे रुक्‍न जो हैं ये उसी प्रकार की ध्‍वनि के हैं जो कि मुफाईलुन की है । इसीलिये इनका उपयोग हजज़ में किया जाता है । अब ये जा परदेशी हैं उनके कुछ तय नाम हैं । ये याद रखें के ये नाम हजज़ में ही हैं मुफाएलुन रुक्‍न का नाम जो हजज़ बहर में है वो ज़रूरी नहीं कि उसका वही नाम बहरे रजज़ में भी हो । अर्थात हर रुक्‍न का नाम बहर में जाकर बदल जाता है । कभी कभी ये एक ही हो सकता है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अब जैसे &lt;strong&gt;मफऊलु&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; भाई साहब का नाम है &lt;strong&gt;अख़रब&lt;/strong&gt; भैया अब जिस भी हजज़ की बहर में ये अखरब भैया आ जाएंगें उस बहर में बहरे हजज़ के साथ एक नाम और लगेगा अख़रब । ये जो &lt;strong&gt;फऊलुन &lt;/strong&gt;भाई हैं इनको कहा जाता है &lt;strong&gt;महज़ूफ &lt;/strong&gt;भाई मतलब जिस भी बहर में ये आयेंगें उसके नाम में इनका नाम महज़ूफ भी लगेगा जो कि ऊपर शीर्षक&amp;nbsp; वाले शेर के नाम में लगाया गया है&amp;nbsp; । अब बात करते हैं &lt;strong&gt;फाएलुन &lt;/strong&gt;की ये जब भी बहरे हजज़ में पाये जायेंगें तो इनका नाम होगा &lt;strong&gt;अशतर&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; और ये नाम जुड़ जायेगा बहरे हजज़ के साथ भी । &lt;strong&gt;मुफाएलुन&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;का नाम है &lt;strong&gt;मकबूज़ &lt;/strong&gt;और &lt;strong&gt;मफऊलनु&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; का नाम है &lt;strong&gt;अख़रम, &lt;/strong&gt;मुफाईलु को कहीं कहीं &lt;strong&gt;मकसूर&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; कहा जाता है और कहीं &lt;strong&gt;मकफूफ ।&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; इस प्रकार से ये कुछ ऐसे ना म हैं जिनका उपयोग नामकरण के दौरान किया जाता है । अब वापस ऊपर वाले शेर की बात करें कि उसका नाम वही क्‍यों है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मिला हो रक्‍त मानव का भले ही, मगर भोजन निरामिष है महोदय &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;1222-1222-122&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 1222-1222-122 &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt; ऊपर से देखने में ये तो समझ में आ रहा है कि स्‍थाई रुक्‍न है मुफाईलुन सो ये हो गई बहरे हजज़ तीन रुक्‍न हैं सो ये हो गई मुसद्दस बहर परदेशी रुक्‍न उसमें आ रहा है फऊलुन जिसका नाम है महज़ूफ सो इस बहर का नाम हो गया &lt;strong&gt;बहरे हजज़ मुसद्दस महज़ूफ ।&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; यदि किसी बहर में दो या जियादह परदेशी रुक्‍न आ रहे हों तो उसके नाम में सभी परदेशीयों के नाम उनके आने के क्रम में शामिल कर लिये जाते हैं । चलिये अगली बार तक के लिये जय हो । कुछ लोगों ने जाना चाहा है मेरे बारे में सोचता हूं कि बता ही दूं ताकि लोगों का भरम तो टूटे । मगर किश्‍तों में बताना कैसा रहेगा तो चलिये आज अपने बारे में एक जानकारी देता हूं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक समय वो था जब में मुंबई में रहा था । लगभग एक साल तक वहां रहा था । अब ये पूछिये कि मैं वहां क्‍यों गया था । दरअस्‍ल में मैं वहां माडलिंग के लिये गया था । कुछ छोटे मोटे एसाइन्‍मेंट किये थे । एक दो छोटे मोटे सीरियल्‍स में भी काम किया था जो टेलिकास्‍ट ही नहीं हो पाये । मुम्‍बई में रहना मुझे सूट नहीं हुआ । दरअस्‍ल में वहां का भारी वातावरण जमता ही नहीं था । उस पर ये कि वहां रहकर जो काम छोटा मोटा कर रहा था उससे अपना ही खर्च नहीं निकल पा रहा था । बस इन सब कारणों के चलते लौट कर बुद्धू घर को आ गये । ये उस समय की बात है जब मेरे सिर पर बाल हुआ करते थे जो कि अब केवल मोहन जोदड़ो की तरह यत्र तत्र खुदाई में पाये जाते हैं । माडलिंग के काम से ही एक दो बार बैंगलोर भी गया था । उसके बाद जो लौटा तो फिर उस तरफ कभी देखा भी&amp;nbsp; नहीं । वहां के सारे फोटोग्राफ, पत्र, जो कुछ भी था वो सब जला दिया । तो आप ये कह सकते हैं कि ये वो जगह थी जहां से मैं असफल होकर लौटा । हो सका तो अगली पोस्‍ट में उस समय का एकाध फोटो दिखाने का प्रयास करूंगा । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;पिछले सप्‍ताह अपनी पसंद के गीत आवाज पर यहां लगाये &lt;a title="http://podcast.hindyugm.com/2009/04/rare-songs-of-film-ek-pal-bhupen.html" href="http://podcast.hindyugm.com/2009/04/rare-songs-of-film-ek-pal-bhupen.html"&gt;http://podcast.hindyugm.com/2009/04/rare-songs-of-film-ek-pal-bhupen.html&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;और नीरज जी ने अंतत: कोर्ट कचहरी की धमकी देकर एक ग़ज़ल बुलाकर यहां लगाई &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a title="http://ngoswami.blogspot.com/2009/04/blog-post_20.html" href="http://ngoswami.blogspot.com/2009/04/blog-post_20.html"&gt;http://ngoswami.blogspot.com/2009/04/blog-post_20.html&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;और यहां पर मेरे एक कमेंट के अर्थ का अनर्थ निकाला गया &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a title="http://aajkeeghazal.blogspot.com/2009/04/blog-post_12.html" href="http://aajkeeghazal.blogspot.com/2009/04/blog-post_12.html"&gt;http://aajkeeghazal.blogspot.com/2009/04/blog-post_12.html&lt;/a&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;तरही को लेकर अभी कुछ ही लोगों की ग़ज़लें आईं हैं । शीघ्र करें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-5541526679670943350?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/lAftNFikKuE" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-21T08:49:33.123+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/04/blog-post_20.html</feedburner:origLink></item><item><title>बहरे हजज़ के बारे में कई सारी बातें पिछली पोस्‍ट में की थीं, आज उसे कुछ आगे की बात करते हैं ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/JFwuK2pHiyQ/blog-post_12.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Sun, 12 Apr 2009 20:15:10 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-6569980625632889872</guid><description>&lt;p&gt;कई लोगों को ये शिकायत है कि काफी सारी दूसरी बातें तो हा रही हैं किन्‍तु वो नहीं हो रहा है जो कि होना चाहिये । अर्थात ग़ज़ल की कक्षाएं नहीं लग रहीं हैं । तो उन सभी की शिकायतों को दूर करने के लिये कुछ कुछ कभी कभी ये भी किया जायेगा । दरअस्‍ल में जीवन वैसा नहीं होता है जैसा कि उसे समझा जाता है । जीवन उस ट्रेक पर भी नहीं चलता जिस पर आप उसको चलाना चाहते हैं । मेरे साथ भी वैसा ही कुछ है जीवन मेरे लिये उतना आसान नहीं है जितना दिखाई देता है । एक परेशानी से उबरता हूं तो दूसरी सामने आ जाती है । किन्‍तु फिर याद आती है किसी की कही हुई वो बात कि ईश्‍वर जिसको जितना प्‍यार करता है उसको उतना ही परेशानियां देता है । और फिर नये सिरे से तैयार हो जाता हूं समर के लिये । कई सारे लोग मेरे बारे में जानना चाहते हैं । वे चाहते हैं कि मैं एक पोस्‍ट में अपने बारे में जानकारी उपलब्‍ध करवाऊं । वो पोस्‍ट भी कभी लगाऊंगा और उसका शीर्षक होगा एक असफल कहानी । खैर बस मैं ये बताना चाह रहा था कि मैं जो कभी कभी गुम हो जाता हूं वो अकारण नहीं होता । बस कोई न कोई परेशानी सामने आ जाती है और फिर एक नया युद्ध लड़ने निकल जाता हूं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;पिछली बार मैंने बात की थी बहरे हजज़ के बारे में और आज उसको ही थोड़ा बढ़ाने का काम किया जाये । बहरे हजज़ की बात करने के पहले कुछ पहले से बताये गये शब्‍दों के बारे में हम फिर से बात कर लेते हैं । जब हम बहरों की बात करते हैं&amp;nbsp; तो कुछ शब्‍द बार बार आते हैं । जैसे सबसे पहले बात करते हैं &lt;strong&gt;मुसमन, मुसद्दस, मुरब्‍बा&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; की । उनके बारे में पहले ही बात चुका हूं कि यदि हमारे मिसरे में चार रुक्‍न हैं तो हमारी बहर का नाम में &lt;strong&gt;मुसमन&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; शब्‍द लगाया जायेगा । ये इस बात का प्रतीक होगा कि आपकी ग़ज़ल में चार रुक्‍न वाले मिसरे हैं । उसी प्रकार यदि तीन रुक्‍न हैं तो उसको &lt;strong&gt;मुसद्दस &lt;/strong&gt;कहा जायेगा एवं दो रुक्‍न में &lt;strong&gt;मुरब्‍बा &lt;/strong&gt;&amp;nbsp; नाम होगा । अब बात करते हैं सालिम और मुजाहिफ नामों की । हर बहर के कुछ स्‍थाई रुक्‍न होते हैं । जैसे बहरे हजज़ का स्‍थाई रुक्‍न है &lt;strong&gt;1222 मुफाईलुन &lt;/strong&gt;। अब यदि कोई ग़ज़ल ऐसी है जिसमें कि सभी रुक्‍न 1222 ही हैं तो उसको हम कहेंगें सालिम बहर । यदि बहर &lt;strong&gt;1222-1222-1222-1222&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; है तो उसका नाम हो जायेगा &lt;strong&gt;बहरे हजज़ मुसमन सालिम ।&lt;/strong&gt; नाम को गौर से देखें तो आप पायेंगें कि चूंकि चार रुक्‍न हैं सो बहर &lt;strong&gt;मुसमन&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; है चारों रुक्‍न &lt;strong&gt;1222 &lt;/strong&gt;हैं तो ये सालिम बहर है तथा रुक्‍न &lt;strong&gt;मुफाईलुन&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; हैं अत: ये बहरे &lt;strong&gt;हजज़ &lt;/strong&gt;है। तो इस प्रकार नाम हुआ&lt;strong&gt;&amp;nbsp; बहरे हजज़ मुसमन सालिम &lt;/strong&gt;। यदि किसी ग़ज़ल में रुक्‍न &lt;strong&gt;1222-1222-1222&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; हैं तो उसका नाम होगा&lt;strong&gt;&amp;nbsp; बहरे हजज़ मुसद्दस सालिम&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; उसमें केवल मुसमन के स्‍थान पर मुसद्दस आ गया है वो इसलिये कि रुक्‍न अब चार के स्‍थान पर तीन ही हैं । यदि रुक्‍न &lt;strong&gt;1222-1222&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; हैं तो उस बहर का नाम होगा&lt;strong&gt;&amp;nbsp; बहरे हजज़ मुरब्‍बा सालिम&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; चूंकि दो ही रुक्‍न हैं इसलिये ये मुरब्‍बा हो गया । आइये अब एक ही बात को तीन प्रकार के मिसरों में ढाल कर देखते हैं कि तीन सालिम बहरें कैसी होती हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;नहीं जाना कहीं भी तुम हमें यूं छोड़कर देखो ( 1222-1222-1222-1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन) बहरे हजज़ मुसमन सालिम &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;नहीं जाओ हमें यूं छोड़कर साजन ( 1222-1222-1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन ) बहरे हजज़ मुसद्दस सालिम &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;नहीं जाना कहीं अब तुम ( 1222-1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन ) बहरे हजज़ मुरब्‍बा सालिम &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;तो ये आपने देखा उदाहरणों से कि किस प्रकार से तीन सालिम बहरें बनती हैं । ये बहरे हजज़ की तीन सालिम बहरें हैं । सालिम का अर्थ ये कि तीनों में ही स्‍थाई रुक्‍न &lt;strong&gt;मुफाईलनु&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; का ही दोहराव किया गया है इसके अलावा कोई भी दूसरा रुक्‍न नहीं है । यदि दूसरा रुक्‍न आ जाता है तो उसको फिर सालिम न कह कर कहा जायेगा मुजाहिफ बहर ।&amp;nbsp; बहरे हजज़ का स्‍थाई रुक्‍न चूंकि मुफाईलुन है इसलिये बहरे हजज़ में यदि कोई दूसरा रुक्‍न भी उपयोग किया जायेगा तो वो भी इसी प्रकार की ध्‍वनि का ही होगा । या हम ये कह सकते हैं कि &lt;strong&gt;मुफाईलुन&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; में ही कुछ कम बढ़ कर जो रुक्‍न बने और जो लगभग इसी प्रकार की ध्‍वनि उत्‍पन्‍न करे वो ही रुक्‍न यहां पर उपयोग में लाये जाते हैं । मगर उस स्थिति में बहर सालिम न रह कर मुजाहिफ हो जायेगी । अब ये समान ध्‍वनि वाले कितने रुक्‍न हो सकते हैं उनको भी देख लें । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;1&amp;nbsp; सबसे पहले तो हम ये देखते हैं कि मुफाईलुन&amp;nbsp; में से एक मात्रा कम करने पर क्‍या क्‍या समान ध्‍वनि वाले रुक्‍न आते हैं।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अ) &lt;strong&gt;प्रथम लघु को हटा देना 222 मफऊलुन &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब) अंतिम दीर्घ में से एक लघु को कम कर देना ताकि वो लघु रह जाये 1221 मुफाईलु &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;स) तीसरे दीर्घ में से एक लघु को कम कर देना ताकि वो लघु रह जाये 1212 मुफाएलुन &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;2 अब हम ये देखते हैं कि दो मात्राएं कम करके कितने समान ध्‍वनि के रुक्‍न बनाये जा सकते हैं ।&lt;/font&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;अ) अंतिम दीर्घ को पूरी तरह से हटा देना 122 फऊलुन &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब) एक मात्रा प्रारंभ की और एक तीसरे दीर्घ में से हटाना 212 फाएलुन &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;स) एक मात्रा प्रारंभ की और एक अंतिम दीर्घ में से हटाना 221 मफऊलु &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;तो ये होते हैं कुछ समान ध्‍वनि वाले रुक्‍न जो कि बहरे हजज़ में उपयोग किये जा सकते हैं इनके अलग अलग नाम हैं जिनकी चर्चा हम अगली पोस्‍ट में करेंगें । किन्‍तु इनके उपयोग करने की हालत में हमारी बहर सालिम न रह कर मुजाहिफ हो जायेगी । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अब हम ये सालिम और मुजाहिफ को और समझ ते हैं एक आसान उदाहरण से । जैसे सोना, चांदी, तांबा ये सारी धातुएं हैं शुद्ध धातुएं इनको सालिम धातुएं कहा जा सकता है क्‍योंकि उनके संगठन में एक ही तत्‍व है । किन्‍तु पीतल एक मिश्र धातु है जिसमें एक से अधिक तत्‍व हैं जिनको मिलाकर पीतल बनाया गया है । इसे कहा जायेगा मुजाहिफ धातु । एक और उदाहरण जब आप खाली कोक पी रहे हैं तो आप सलिम पी रहे है किन्‍तु यदि आपने स्‍वाद बदलने के लिये कोक में आरेंज कोला भी मिला कर काकटेल बना लिया तो आपने मुजाहिफ कर दिया । मिश्र करना अर्थात मुजाहिफ कर देना । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;चलिये आज के लिये इतना ही आज मन काफी उदास है किसी काम में मन नहीं लग रहा था सो शायद आज की पोस्‍ट कुछ बोझिल होगी । कुछ दिनों से मन यूं ही सा हो रहा है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;तरही मुशायरे के लिये अभी केचल एक ही ग़ज़ल मिली है आशा है जल्‍द ही सबका काम मिल जायेगा । मिसरा तो याद ही होगा । &lt;strong&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी । 212 -1222-212-1222 रदीफ है 'की खामोशी' तथा काफिया बनेगा 'अर' । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;इस अंधेरे में उदासी में भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कि सुकून दे जाती हैं । गुणीजनों की प्रशंसा राह की धूप में साया बन कर सर पर आ जाती है । &lt;a href="http://prosingh.blogspot.com/2009/03/blog-post_14.html"&gt;प्रकाश अर्श&lt;/a&gt; के ब्‍लाग पर &lt;a href="http://mahavirsharma.blogspot.com/"&gt;श्रद्धेय महावीर जी&lt;/a&gt; की अपने बारे में लिखी ये टिप्‍पणी मन को छू गई अभिभूत कर गई ये वो एहसास है जो हर उदासी हर अंधेरे पर भारी पड़ जाता है । &lt;a href="http://mahavirsharma.blogspot.com/"&gt;महावीर जी&lt;/a&gt; की उसी टिप्‍पणी के साथ आज का समापन । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;प्रकाश, एक बात पर आप से सहमत नहीं हूं जब यह कहा कि "जब गुरू जी को नवलेखन के लिए सभागार के सबसे अगली पंक्ति मे बैठने को कहा गया तो ...." मैं आप से पूछता हूं कि आपको इस बात में आश्चर्य क्यों हुआ? क्या आपको साहित्य-जगत के दिग्गजों की श्रेणी में सुबीर जी के स्थान में संशय था? मैं पहले भी अन्यत्र कह चुका हूं कि ज्ञान पीठ का जो सम्मान मिला है, वे उसमें संशय या विस्मय की बात नहीं है क्योंकि वे इसके योग्य हैं। भई, कोई अचंभे की बात नहीं है, उनका स्थान तो पहली पंक्ति में होना ही था।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-6569980625632889872?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/JFwuK2pHiyQ" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-13T08:45:10.799+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/04/blog-post_12.html</feedburner:origLink></item><item><title>समीर लाल जी का काव्‍य संग्रह बिखरे मोती प्राप्‍त करने हेतु ...................</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/KOoaeB0NeE0/blog-post_08.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Wed, 08 Apr 2009 01:55:38 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-3501343519467561898</guid><description>&lt;p&gt;कई सारे लोगों के मेल मुझे भी प्राप्‍त हुए हैं और समीर जी को भी प्राप्‍त हो रहे हैं । दरअसल में समीर लाल जी की लोकप्रियता जिस प्रकार ब्‍लाग जगत में है उसको देखते हुए ये तो होना ही था । पूर्व में श्री समीर लाल जी ने इसका विमोचन वहीं कनाडा में ही करने का निर्णय लिया था लेकिन फिर बाद में उसका एक अंतरिम विमोचन उन्‍होंने जबलपुर में संपन्‍न करने का विचारा और दो दिन पूर्व उसका अंतरिम विमोचन जबलपुर की ब्‍लागर्स मीट &lt;a title="http://sanjusandesha.blogspot.com/" href="http://sanjusandesha.blogspot.com/"&gt;http://sanjusandesha.blogspot.com/&lt;/a&gt; में सम्‍पन्‍न हुआ । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;समीर जी का ये काव्‍य संग्रह उनके एक नये रूप को सामने लाता है । एक ऐसा रूप जो कि गहन है गम्‍भीर है । जिसमें कहीं हास्‍य नहीं है । ये पुस्‍तक उनकी छंदमुक्‍त कविताओं, गीतों, ग़ज़लों, मुक्‍तकों और क्षणिकाओं का संचय है । पुस्‍तक की भूमिका लिखी है वरिष्‍ठ गीतकार त्रय सर्वश्री राकेश खण्‍डेलवाल जी, कुंअर बेचैन जी तथा रमेश हठीला जी ने । पुस्‍तक का आवरण डिजाइन किया है छ‍बी मीडिया के सर्वश्री संजय तथा पंकज जी बैंगाणी जी । ये तो बताने की आवश्‍यकता नहीं होनी चाहिये कि शिवना प्रकाशन द्वारा इसे प्रकाशित किया गया है । पुस्‍तक सजिल्‍द संस्‍करण में है । पुस्‍तक का मूल्‍य 200 रुपये भारतीय मूल्‍य तथा 15 यूएस डालर है । पुस्‍तक को श्री समीर लाल जी ने अपनी स्‍वर्गीय माताजी को समर्पित किया है । पुस्‍तक में श्री समीर लाल जी का जो रंग देखने को मिलता है वो एक क्षण को ये सोचने पर मजबूर करता है कि क्‍या ये वहीं समीर लाल जी हैं उड़नतश्‍तरी वाले । पुस्‍तक में शामिल ग़ज़लें तथा मुक्‍तक श्री समीर जी की सामयिक दृष्टि को बताते हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;बिखरे मोती का मूल्‍य 200 रुपये है तथा पोस्‍टल चार्जेस 25 रुपये भारत में कहीं भी के लिये हैं । इस प्रकार कुल 225 रुपये डाक द्वारा मंगवाने हेतु है । इस हेतु या तो भुगतान पंकज सुबीर के नाम से&amp;nbsp; पंकज सुबीर, पी सी लैब, सम्राट कॉम्‍प्‍लैक्‍स बेसमेंट, न्‍यू बस स्‍टेंड, सीहोर, मध्‍यप्रदेश 466001 मोबाइल 09977855399 पर भेजें अथवा यदि इंटरनेट बैंकिंग या कोर बैंकिंग से भेजना चाहें तो&amp;nbsp;&amp;nbsp; केवल एक मेल &lt;a href="mailto:subeerin@gmail.com"&gt;subeerin@gmail.com&lt;/a&gt; पर कर दें ताकि आपको खाता क्रमांक भेजा जा सके । पुस्‍तक कोरियर द्वारा भेजी जायेगी तथा मिलने में एक दो दिन का समय लगेगा । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-3501343519467561898?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/KOoaeB0NeE0" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-08T14:25:38.876+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/04/blog-post_08.html</feedburner:origLink></item><item><title>बिखरे मोती का अंतरिम विमोचन हुआ, और तरही मुशायरे का मिसरा बदला जा रहा है ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/aV7t7abr3u4/blog-post_06.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 06 Apr 2009 00:48:10 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8967528479949957564</guid><description>&lt;p&gt;समीर लाल जी के सामने दुविधा ये थी कि वे अगले सप्‍ताह वापस कनाडा लौट रहे हैं और वहीं पर बिखरे मोती का विमोचन होना है मई में । लंकिन समस्‍या ये आ रही थी कि जबलपुर  में सब पुस्‍तक लेना चाह रहे हैं । और एक बार समीर जी के जाने के बाद वहां कौन वितरित करेगा ये समस्‍या सामने थी । शिवना प्रकाशन के सामने भी ये समस्‍या आ रही थी कि विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में समीक्षा के लिये पुस्‍तक भेजनी होती है सो उसमें भी विलम्‍ब हो रहा था । उस पर ये कि कई लोग जो पुस्‍तक प्राप्‍त करना चाह रहे थे उनके भी मेल आ रहे थे । इन सभी समस्‍याओं का समाधान ये निकला कि जबलपुर में ही एक ब्‍लागर्स मीट में पुस्‍तक का अंतरिम विमोचन सम्‍पन्‍न किया गया । क्‍या हुआ कैसे हुआ ये तो समीर जी के ब्‍लाग पर आपको पूरी जानकारी मिल पायेगी मैं तो बस ये शुभ सूचना देना चाहता हूं कि समीर जी की पुस्‍तक बिखरे मोती का अंतरिम विमोचन हो चुका है । बधाये गाये जाएं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;तरही को लेकर ये तो मुझे पता था कि थोड़ा मुश्किल है इस बार का मिसरा । मुश्किल दो कारणों से था । आइये उन कारणों की चर्चा की जाये । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;मिसरा तो ये था ' आज महफिल में कोई शम्‍अ फरोजां होगी' &lt;/p&gt; &lt;p&gt;इसमें रदीफ था होगी और काफिया था आं । अब चर्चा करते हैं कि क्‍या समस्‍या थी इस काफिये में । दरअस्‍ल में पूरा काफिया था फरोजां&amp;nbsp; अर्थात 122 का मात्रा क्रम । इसका मतलब ये हुआ कि आसमां, बागबां, सायबां, जैसे कई सारे काफिये तो हट गये । अब बचे केवल गुरेजां, फरोजां, बयाबां जैसे काफिये जिनके साथ काम करना मुश्किल है । उस पर ये भी कि ये काफिये भर्ती के लग रहे थे । अब बात करते हैं दूसरी समस्‍या कि रदीफ महोदय हमारी दूसरी समस्‍या थे । और समस्‍या थी स्‍त्रीलिंग होने के कारण । स्‍त्रीलिंग होने के कारण परेशानी ये आ रही है कि हम जो भी कहते हैं उसे किसी स्‍त्रीलिंग के संदर्भ मे ही कहा जाना उचित होगा । क्‍योंकि आखिर में हमको तुक मिलानी है होगी के साथ। बाद में जब मैंने बहुत गौर किया तो पाया कि सचमुच ही कुछ मुश्किल है तो फिर मैंने मिसरा बदलने का निर्णय लिया दो कारणों से पहला तो ये कि मैं स्‍वयं ही ऐसे शब्‍दों का विरोधी हूं जिनका अर्थ नीचे देना पड़े और उसके चक्‍कर में ग़ज़ल का रसभंग ही हो जाये । इस काफिये के साथ हो रहा ये था कि आपको भर्ती के काफिये ही लेने पड़ते । तो काफी सोच समझ के मैंने तय किया कि आदरणीय दीदी नुसरत मेहदी का ही कोई दूसरा मिसरा दूं । तो उनकी ही एक ग़ज़ल का मिसरा यहां पर दे रहा हूं जिसको कि परिवर्तित मिसरे के तौर पर ले लिया जाये । पहले नुसरत मेहदी जी का परिचय दे दूं वे वर्तमान में मध्‍यप्रदेश उर्दू अकादमी की सचिव हैं तथा बहुत अच्‍छी शायरा हैं । बहुत अच्‍छी का अर्थ ये कि लिखती भी बहुत अच्‍छा हैं और गाती तो ऐसा हैं कि मंत्रमुग्‍घ कर देती हैं । मंच पर चल रही गंदगी से व्‍यथित रहती हैं तथा मंच को सुधारने के लिये प्रयत्‍नशील हैं । उर्दू अकादमी की सचिव के रूप में अपने कार्यकाल में उन्‍होंने इतने मुशायरों का आयोजन किया है कि साहित्यिक माहौल पूरे प्रदेश में बना दिया है । अभी कुछ दिनों पूर्व ही उनकी पुस्‍तक भी आई है जिसका विमोचन दुबई में हुआ था । बहुत जल्‍द उनकी मीठी आवाज से भी आपका परिचय करवाता हूं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sdmzi6S6HpI/AAAAAAAAAzs/CiP0yMLpTUc/nusrat%20mehadi%20ji%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="244" alt="nusrat mehadi ji" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/Sdmzl70nu6I/AAAAAAAAAzw/Tf7QiHRJnpI/nusrat%20mehadi%20ji_thumb.jpg" width="163" border="0"&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;नुसरत मेहदी जी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मिसरा &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;कितनी जानलेवा है दोपहर की ख़ामोशी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;( फाएलुन-मुफाईलुन-फाएलुन-मुफाईलुन ) बहरे हजज़ मुसमन अशतर 212-1222-212-1222&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;बहुत सुंदर और गायी जाने वाली बहर है ये शायरात अक्‍सर ही इस बहर में लिखती हैं इसकी धुन भी बहुत प्‍यारी होती है । रदीफ है&lt;strong&gt;&amp;nbsp; की खामोशी&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; और काफिया है स्‍वर&lt;strong&gt;&amp;nbsp; अर &lt;/strong&gt;का अर्थात नज़र, सफर जैसे काफिये । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;हजज़ के बारे में शायद मैं पहले ही कह चुका हूं कि ये सबसे लोकप्रिय बहर है ।&amp;nbsp; लो‍कप्रिय इसलिये की इसकी सालिम और मुजाहिब बहरों में कई कई ऐसी हैं जो कि गाने के लिये होती हैं । खींच कर पढ़ने वाले इन बहरों को बहुत पसंद करते हैं । हजज़ का सालिम रुक्‍न होता है &lt;strong&gt;मुफाईलुन 1222&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; इस बहर पर हमने कई सारी ग़ज़ले कहीं हैं । और हिंदी के कई सारे कवि भी बहरे हजज़ मुसमन सालिम पर कविताएं लिखते हैं । हजज़ की एक और मुजाहिफ बहर हैं बहरे मुसमन अख़रब मुकफूफ महजूफ जिसका वज़न होता है 221-1222-1222-122 ये नीरज गोस्‍वामी जी की पसंदीदा बहरों में से है । ये बहर सबसे संकट वाली बहर हैं क्‍योंकि इसकी कई सारी जुड़वीं बहने और भी मौजूद हैं जिनमें एक दो मात्राओं का ही अंतर होता है । मजे की बात ये है कि ये जो सारी जुड़वी हैं उनको गाने की धुन एक ही है सो वे लोग जो गाकर ग़ज़लें लिखते हैं वे मात खा जाते हैं । मुजारे की बहर है जिसमें 221-2121-1221-212 है अब देखा जाये तो मात्राएं तो वही हैं । केवल क्रम में अंतर है सो कई लोग एक ही ग़ज़ल में एक शेर मुजारे का रख देते हैं और दूसरा हजज़ का ।&amp;nbsp; हजज़ की एक और गाई जाने वाली मुजाहिफ बहर है मुसद्दस महजूफ अल आखिर &lt;strong&gt;मुफाईलुन-मुफाईलुन-फऊलुन 1222-1222-122 ।&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; बहरे हजज़ इस प्रकार से गाने वालों के लिये हमेश पसंदीदा बहर रही है । इस बार का जो मिसरा है वो भी बहरे हजज़ की सबसे ज्‍यादा गायी जाने वाली बहर का है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;अगले अंक में जानिये बहरे हजज़ के बारे में और जानकारियां । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आज का चित्र मेरी बिटिया पंखुरी का &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SdmzqZVEdLI/AAAAAAAAAz0/Gbi03pkPi8A/pankhuri%5B5%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="464" alt="pankhuri" src="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SdmztH1g1nI/AAAAAAAAAz4/QU_BCM0Zvi4/pankhuri_thumb%5B3%5D.jpg" width="292" border="0"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-8967528479949957564?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/aV7t7abr3u4" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-06T13:18:10.855+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/04/blog-post_06.html</feedburner:origLink></item><item><title>समीर लाल जी का काव्‍य संग्रह बिखरे मोती, उड़नतश्‍तरी का दूसरा रूप जो गहन और गम्‍भीर है । बिखरे मोती प्रकाशित अब विमोचन की प्रतीक्षा कीजिये ।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/OhzNRICOmps/blog-post.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Thu, 02 Apr 2009 01:12:35 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8284544019825910844</guid><description>&lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SdRzW8VK2UI/AAAAAAAAAyo/gi0Y-RxEqLw/salal13.jpg"&gt;&lt;img style="border-right-width: 0px; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" alt="salal1" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SdRzYVt_lLI/AAAAAAAAAyw/mrCn05ThmjY/salal1_thumb1.jpg" width="229" height="304"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;समीर लाल जी जब पिछली बार भारत आये थे तो उनसे पुस्‍तक के प्रकाशन के बारे में बात हुई थी किन्‍त्‍ु बात किसी निर्णायक स्थिति में आये उससे पहले ही वे पुन: कनाडा वापस चले गये थे । अब की बार वे जब वापस आये तो पुन: छूटा हुआ सिलसिला प्रारंभ हुआ और पुस्‍तक पे काम प्रारंभ हुआ । इस बीच राकेश जी की पुस्‍तक तथा पंच रत्‍नों की पुस्‍तक आ चुकी है । समीर जी की पुस्‍तक पे काम करना मुश्किल इसलिये था कि वे भी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । वे व्‍यंग्‍य भी लिखते हैं और हास्‍य भी, गीत भी लिखते हैं और ग़ज़ल भी, मुक्‍तक भी लिखते हैं और सोनेट भी । अर्थात उनकी ही हास्‍य की भाषा में कहा जाये तो उनके भी रावण की तरह दस सिर हैं । तिस पर ये भी कि कोई भी विधा में कमजोर नहीं हैं वे । जब पांडुलिपि को लेकर शिवना प्रकाशन के&amp;nbsp; श्री नारायण कासट जी, श्री रमेश हठीला जी, श्री हरिओम शर्मा जी के साथ बैठकर चर्चा हो रही थी तो सभी एकमत थे इस बात को लेकर कि संग्रह में कोई एक ही रंग जाना चाहिये क्‍योंकि अलग अलग विधाएं एक साथ देने पर किसी के साथ भी न्‍याय नहीं हो पाता है । और सभी को श्री समीर लाल जी की गम्‍भीर कविताएं अधिक पसंद आ रही थीं । उसके पीछे एक कारण ये भी है कि जब बात पढ़ने की आती है तो हास्‍य से जियादह गम्‍भीर विषय ही लोगों को पसंद आते हैं । खैर तो समीर जी से बात की गई और उन्‍होंने एक लाइन का मेल किया 'पंचों की राय सर आंखों पर' । तो निर्णय ये हुआ कि बिखरे मोती में समीर जी के गम्‍भीर रूप का ही दर्शन होगा । मेरे विचार में विश्‍व की महानतम फिल्‍म अगर कोई है तो वो है 'मेरा नाम जोकर' उस फिल्‍म का एक दोष बस ये ही था कि वो अपने समय से पहले आ गई और उसे बनाने वाला एक भारतीय था, अन्‍यथा तो आस्‍करों जैसे पुरुस्‍कारों से भी ऊपर थी वो फिल्‍म । यहां पर अचानक मेरा नाम जोकर की बात इसलिये कि उस फिल्‍म में भी यही बताया है कि किस प्रकार अंदर से रो रहा आदमी ऊपर से लोगों को हंसाने का प्रयास करता है । समीर जी के साथ भी वहीं है, उनकी बेर वाली माई की कविता में जो अंत में मीर की ग़ज़ल का उदाहरण आया है वो स्‍तम्भित करने वाला है । बिखरे मोती में समीर जी के गीत हैं, छंदमुक्‍त कविताएं हैं, ग़ज़लें हैं, मुक्‍तक हैं और क्षणिकाएं हैं । पुस्‍तक का अत्‍यंत सुंदर आवरण पृष्‍ठ छबी मीडिया के श्री पंकज बैंगाणी द्वारा किया गया है बानगी आप भी देखें &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SdRzaCNpHCI/AAAAAAAAAy0/MFbJBOuBcTw/sameer%20ji%2012%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; border-top: 0px; border-right: 0px" border="0" alt="sameer ji 12" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/SdRzbn7pqOI/AAAAAAAAAy4/jQpblC81DGw/sameer%20ji%2012_thumb%5B1%5D.jpg" width="313" height="456"&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt; &lt;p&gt;पुस्‍तक की भुमिका वरिष्‍ठ कवि श्रद्धेय श्री कुंवर बेचैन साहब ने लिखी है वे अपने समीक्षा में लिखते हैं समीर लाल मूलत: प्रेम के कवि हैं । पहले तो मैं ये पंक्तियां पढ़कर चकराया कि कुंवर साहब ऐसा क्‍यों लिख रहे हैं । फिर मुझे अपने उस्‍ताद की बात याद आई कि बड़े लोग यदि कुछ कह रहे हैं तो किसी न किसी कारण से ही कह रहे हैं । मैंने कुंवर जी की बात के संदर्भ में पुन: समीर जी की कविताएं देखीं तो मुझे हर कहीं प्रेम नजर आया । पूरी तरह से समर्पित प्रेम की एक बानगी देखिये &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मेरा वजूद एक सूखा दरख्‍़त &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;तू मेरा सहारा न ले,&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मेरे नसीब में तो &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक दिन गिर जाना है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मगर मैं &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;तुझको गिरते हुए नहीं देख सकता प्रिये &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;राकेश खण्‍डेलवाल जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि समीर लाल जी के दर्शन की गहराई समझने की कोशिश करता हुआ आम व्‍यक्ति भौंचक्‍का रहा जाता है । सच कहा है राकेश जी ने क्‍योंकि हास्‍य के परदे में छुपा कवि जब कहता है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;वो हँस कर &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;बस यह एहसास दिलाता है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;वो जिन्‍दा है अभी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;कौन न रहेगा भौंचक्‍का सा ऐसी कविता को पढ़कर या सुनकर । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;श्री रमेश हठीला जी ने लिखा है कि नेट भर जिस प्रकार उड़नतश्‍तरी लोकप्रिय हुई उसी प्रकार साहित्‍य में बिखरे मोती उसी कहानी को दोहराने जा रही है । बिखरे मोती के बारे में और जानकारी आप शिवना प्रकाशन के ब्‍लाग &lt;a href="http://shivnaprakashan.blogspot.com/"&gt;शिवना प्रकाशन&lt;/a&gt; पर देख सकते हैं । रही बात पुस्‍तक के विमोचन की तो अभी प्रतीक्षा कीजिये उसके लिये क्‍योंकि अभी ये तय नहीं है कि विमोचन भारत में होगा अथवा कनाडा में । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;कई लोगों का कहना है कि इस बार तरही मुशायरे के लिये कुछ मुश्किल मिसरा है । है तो सही लेकिन अब बच्‍चे बड़ी क्‍लासों में आ गये हैं क्‍या अब भी वही सीखते रहेंगें । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-8284544019825910844?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/OhzNRICOmps" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-02T13:42:35.138+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">29</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/04/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>मैं ठीक ठाक हूं । बस ये कि कम्‍प्‍यूटर कक्षाओं का सीजन शुरू हो रहा है सो कुछ व्‍यस्‍तता है वहां पर</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/subeerin/~3/3Zl8yJ_xrjg/blog-post_30.html</link><author>subeerin@gmail.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 30 Mar 2009 04:53:25 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8808731321705076807</guid><description>&lt;p&gt;दो दिन से धड़ा धड़ मैसेज और फोन आ रहे हैं कि कहां हो । दरअस्‍ल में इस बार कुछ लम्‍बी चुपपी हो गई है । उसके पीछे भी कारण ये है कि कम्‍प्‍यूटर कक्षाओं का सीजन अपैल में प्रारंभ होता है जो कि अब शुरू होने वाला है सो उसकी तैयारियों में व्‍यस्‍त था । उस पर काफी सारा काम इस्‍लाह के लिये रखा हुआ था सो पिछले सप्‍ताह भर से उसको पूरा करने में लगा था । इस्‍लाह के अपने तरीके के कारण मुझे समय जियादह लगता है । दरअस्‍ल में जब मैं सिखाड़ी था तो मैं भी इस्‍लाह&amp;nbsp; करवाता था और जब मेरे किसी शेर को आमूलचूल ही बदल दिया जाता था तो मुझे लगता था कि उसमें अब मेरा बचा ही क्‍या ये तो पूरा बच्‍चा उस्‍ताद&amp;nbsp; का ही हो गया । असल में जब भी कोई कवि कविता लिखता है तो वो एक मानसिक स्थिति में लिखता है । और उस समय में भाव ही उसकी कविता में आते हैं । जब उस्‍ताद उसकी इस्‍लाह करने बैठते हैं तो वे अपनी मनोदशा में होते हैं । और ऐसे में होता ये है कि वे पूरे शेर के मानी ही बदल के रख देते हैं । इसको हम ऐसे समझ सकते हैं कि आपको यदि किसी भवन के रिनोवेशन का काम मिला है तो आप उसके बीम कालम थोड़े ही उखाड़ के फिर से बिठओगे । आप को तो बस ये करना है कि जो ढा़चा तैयार है उसको ही कुछ इस प्रकार से बदलो के वो ठीक लगे । यही काम मैं इस्‍लाह में करता हूं इसीलिये मुझे समय अधिक लगता है । मैं प्रयास करता हूं कि शेरों में जो शब्‍द इस्‍तेमाल हुए हैं उनको भी नहीं बदलूं जब तक कि बहुत जियादह ही आवश्‍यक न हो । उन्‍हीं शब्‍दों से या उनके पर्यायवाची शब्‍दों से काम चला कर बहर में ले आऊं । नये सिरे से कुछ बनाना हो तो उसमें अधिक समय नहीं लगता किन्‍तु बने बनाये में सुधार करना मुश्किल होता है&amp;nbsp; । प्रयास होता है कि मैं लिखने वाले की भावनाओं के अनुरूप ही फेर बदल करूं । तिस पर ये भी कि बहर में भी आ जाये । एक और काम मैं करता हूं वो ये कि ऐसे दोष जो उर्दू में तो हैं पर हिंदी में जायज होते हैं उनको मैं इसलिये ले कर चलता हूं कि आज की ग़जलें हिंदी में ही हो रहीं हैं । जैसे एक काफिया का दोष है जिसे ईता का दोष कहा जाता है । दरअसल में काफिया में एक ध्‍वनि या हर्फ होता है जिसे हर्फे रवी कहते हैं, जब मतले के दोनों मिसरों में रवी का हर्फ एक ही मानी रखता हो तो ऐसे लफ्जों का लाना नाजायज माना जाता है । यद्यपि हिंदी के हिसाब से उसे सही माना जाता है । हिंदी में उसे दोष नहीं माना जाता है । अक्‍सर मात्राओं वाले काफिये में इस दोष को अधिक संभाव्‍य माना जाता है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;पिछले दिनों कुछ जगहों पर कुछ शेरों में काफी दोष नजर आये । जैसे ये &lt;/p&gt; &lt;p&gt;उठें‍गी चिलमनें अब हम यहां देखेंगें किस किस की &lt;br&gt;चलें खोलें किवाड़ें दब न जाये कोई भी सिसकी  &lt;p&gt;ये गौतम की उस ग़ज़ल का मतला है जो कहीं लगी हुई है । अब इसका मिसरा उला उस एब से भीषण तरीके से ग्रस्‍त है जिसकी चर्चा हमने पिछले किसी अंक में की थी और मैंने कहा था कि जब कोई मिसरा द्विअर्थी ध्‍वनि उत्‍पन्‍न कर रहा हो तो उसे दोष माना जाता है इस शेर का पहला मिसरा पूरी तरह से द्विअर्थी है बल्कि जैसा मैंने गौतम से कहा कि ये तो द्विअर्थी भी नहीं एक ही अर्थ वाला है । विश्‍लेषण नहीं करना चाहता क्‍योंकि आप सब समझदार हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;दिगम्‍बर नासवा जी का एक शेर था &lt;/p&gt; &lt;p&gt;सो गया फिर चैन से जब लौट कर आया यहाँ&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;p&gt;गाँव की मिट्टी बदल कर माँ का आँचल हो गया  &lt;p&gt;इसमें दोष ये हैं कि बात मिट्टी की बात कर रहे हैं जो पुल्लिंग नहीं होती और आगे&amp;nbsp; उसके लिये &lt;strong&gt;हो गया&lt;/strong&gt; लिखा है । आप भले सोच रहे हैं कि आपने हो गया तो मां के आंचल के लिये लिखा है किन्‍तु विन्‍यास को देखें तो क्‍या है मां का आंचल केवल उपमा है किन्‍तु जो हो गया है आपने लिखा है वो गांव की मिट्टी के लिये लिखा है । मिट्टी स्‍त्रील्रिग होती है दूसरा ये कि जो मिट्टी का प्रयोग किया है वो मां की गोद की उपमा के साथ चलेगा , आंचल के साथ नहीं ।  &lt;p&gt;तो ये छोटी छोटी बातें हैं जो याद रखनी हैं ।  &lt;p&gt;कई सारे लोग कह रहे हैं कि कक्षाएं पुन: प्रारंभ करने की । किन्‍तु जो लोग जुड़े हैं तथा जिनकी ग़ज़लें इस्‍लाह के लिये आ रही हैं वे जानते हैं कि कक्षाएं तो चल रही हैं ।  &lt;p&gt;समीर लाल जी की पुस्‍तक बिखरे मोती प्रकाशित होकर आ गई है शीघ्र ही उसका विमोचन कार्यक्रम संभवत: कनाडा में होगा । उसके बारे में विस्‍तृत जानकारी अगली रपट में ।  &lt;p&gt;तरही का मिसरा नहीं दिया सो दे देते हैं &lt;strong&gt;मेरी बड़ी बहन तथा म.प्र उर्दू आकदमी की सचिव सुप्रसिद्ध शायरा नुसरत मेहदी साहिबा की ग़ज़ल का मिसरा है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज महफिल में कोई शम्‍अ फरोज़ां होगी &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;आज महफिल 2122 फाएलातुन म कु ई शम्‍ 1122 फएलातुन अ फ रो जां 1122 फएलातुन हो गी 22 फालुन बहरे रमल मुसमन मखबून मुसक्‍कन रदीफ होगी काफिया आं&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7637784963342720274-8808731321705076807?l=subeerin.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/3Zl8yJ_xrjg" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-30T17:23:25.871+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2009/03/blog-post_30.html</feedburner:origLink></item><media:rating>nonadult</media:rating></channel></rss>
