<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479</id><updated>2024-09-05T05:01:24.655+05:30</updated><title type='text'>सुन लो जरा</title><subtitle type='html'>----खेल और खिलाड़ियों की बातें</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>67</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-4843302538555240301</id><published>2012-11-30T23:44:00.001+05:30</published><updated>2012-11-30T23:45:35.307+05:30</updated><title type='text'>सचिन तो बूढ़े हो गए, जवानों को क्या हुआ?</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
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सचिन तेंडुलकर अच्छा खेलें तो खबर, बुरा खेलें तो खबर। शतक बनाए तो सनसनी, शतक से चूके तो सनसनी। पिछले दो साल से उन्होंने अच्छा नहीं खेला तो जााहिर है इसकी चर्चा सभी क्रिकेट प्रेमियों की जबान पर होगी, होनी भी चाहिए। हालांकि, इस बार सबसे बड़ी समस्या यह आ रही है कि उनकी विफलता की ओट में टीम इंडिया के कई अन्य सितारों की नाकामयाबी छिप रही है। सचिन के बारे में कहा जा रहा है कि वे 40 साल के होने वाले हैं क्रिकेट के लिहाज से बूढ़े हो गए। सही बात है। लेकिन हमारे युवाओं का क्या? वे क्यों नहीं परफॉर्म नहीं कर रहे? उनके प्रदर्शन पर टिप्पणियां क्यों नहीं हो रही?

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सबसे पहले बात सबसे पहले बल्लेबाजी करने क्रीज पर आने वाले गौतम गंभीर की। सचिन ने अपना पिछला टेस्ट शतक दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जनवरी 2011 में जमाया था। वहीं गंभीर ने टेस्ट क्रिकेट में आखिरी शतकीय पारी जनवरी 2010 में खेली थी। वो सचिन से भी एक साल पहले से आउट ऑफ ऑर्म चल रहे हैं। जाहिर है उनकी उम्र संन्यास की नहीं है लेकिन उन्हें ड्रॉप तो किया ही जा सकता है। यही हाल वीरेंद्र सहवाग का भी है। इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में उन्होंने जरूर अच्छी पारी खेली लेकिन इससे पहले वे भी पिछले दो साल से कुछ खास कमाल नहीं कर पाए थे। टेस्ट क्रिकेट में मध्यक्रम की सफलता काफी हद तक शीर्ष क्रम पर भी निर्भर होती है। सचिन की विफलता के रहस्य में कहीं न कहीं ओपनरों की नाकामयाबी भी शामिल है।

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अब बात टीम के युवा सितारे विराट कोहली की। वनडे क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करने वाले कोहली ने ऑस्ट्रेलिया दौरे पर एडीलेड और पर्थ में दो अच्छी पारियां खेलने के अलावा टेस्ट क्रिकेट में कुछ खास नहीं किया है। बाकी बल्लेबाज फॉर्म में होते तो वे भी टेस्ट टीम में जगह के हकदार नहीं हो पाते। इसके बाद युवराज सिंह। मेरे विचार से टेस्ट टीम में युवी का चयन परफॉर्मेंस बेस्ड न होकर इमोशन बेस्ड था। युवराज को पहले भी टेस्ट टीम में जगह मिली लेकिन वे इसे पक्की करने में हमेशा नाकाम रहे। युवी के विकल्प हैं सुरेश रैना। लेकिन तय मानिए रैना के पास भी टेस्ट क्रिकेट के लायक जरूरी तकनीक नहीं है।
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अब अपने कप्तान महेंद्र सिंह धौनी। पिछली 15 पारियों में सिर्फ तीन शतक। क्या इसी को लीडिंग फ्रॉम द फ्रंट कहेंगे। बल्लेबाजी ही नहीं कप्तानी में भी धौनी की धार लगातार कुंद होती जा रही है। अब वे प्रयोगवादी कप्तान की जगह जिद्दी कप्तान बनने लगे हैं। उनकी जिद, यह चाहे टीम चयन को लेकर हो यह पिच की पसंद को लेकर हो टीम को नुकसान पहुंचा रही है।
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अब गेंदबाजों की बात। सबसे पहले धौनी के सबसे पसंदीदा स्पिनर रविचंद्रन अश्विन की चर्चा। उन्होंने 10 टेस्ट मैचों में 55 विकेट लिए हैं। लेकिन इनमें से 40 विकेट वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले कुल पांच टेस्ट में लिए। ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी टीमों के खिलाफ खेले कुल पांच मैचों में महज 15 विकेट। यही हाल तेज गेंदबाज जहीर खान का है। वे लंबे समय से न तो पूरी तरह फिट हैं और न ही फॉर्म में हैं। कुल मिलाकर अभी बल्लेबाज में चेतेश्वर पुजारा और गेंदबाज में प्रज्ञान ओझा ही ऐसे हैं जो लय में हैं।
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जाहिर जिस टीम के आठ-नौ खिलाड़ी ऑउट ऑफ फॉर्म हों उसकी किस्मत एक खिलाड़ी के संन्यास लेने से नहीं बदलने वाली। सचिन को संन्यास लेना चाहिए या नहीं यह अपनी जगह चर्चा का बेहद माकूल विषय है। लेकिन इसके साथ ही बाकी खिलाडिय़ों पर गौर फरमाना बहुत जरूरी है।
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/4843302538555240301/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/4843302538555240301' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4843302538555240301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4843302538555240301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2012/11/blog-post.html' title='सचिन तो बूढ़े हो गए, जवानों को क्या हुआ?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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कर पाया और उसकी उम्र टीम में सबसे ज्यादा है। जी हां राहुल द्रविड़। उम्र अगर कारण होती तो द्रविड़ सबसे बड़े फ्लॉप साबित होते। वैसे भी आठ महीने पहले ही इन्हीं उम्रदराज खिलाड़ियों ने दक्षिण अफ्रीका में शानदार प्रदर्शन किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो हार का कारण क्या है? सबसे बड़ा कारण है वर्ल्ड कप की जीत। जी हां। याद कीजिए इंग्लैंड की 2005 एशेज जीत को। और यह भी याद कीजिए कि उसके बाद क्या हुआ था। इंग्लैंड 1986 के बाद एशेज नहीं जीत पाया था और जब 19 साल बाद कामयाबी हाथ लगी तो लगा सब कुछ पा लिया। कुछ पाने को और बचा ही नहीं। अगले कुछ महीने इंग्लैंड की टीम खूब हारी। ऐसा ही हुआ है भारत के साथ। 28 साल बाद विश्व कप जीता है। लगा कि जीतने के लिए कुछ बचा ही नहीं। बतौर टीम भारत ने सर्वोच्च लक्ष्य हासिल कर लिया। बहुत लंबा इंतजार समाप्त हो गया। इसके बाद कुछ अच्छा करने की प्रेरणा खत्म हो गई। गनीमत है कि वेस्टइंडीज की टीम काफी कमजोर है। अगर उसमें थोड़ा भी दम होता तो हकीकत वहीं नजर आ जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ल्ड कप जीत के बाद इंग्लैंड में हार का दूसरा सबसे बड़ा कारण है इंग्लैंड को कम आंकना। तभी तो इस सीरीज से पहले कई खिलाड़ी ब्रेक पर थे। सचिन विम्बलडन देख रहे थे तो धौनी भी छुट्टी पर थे। सहवाग और गंभीर चोटिल थे कुछ खास नहीं कर सकते थे। किसी की तैयारी मुकम्मल नहीं थी। आधी-अधूरी तैयारी के बल पर इस इंग्लैंड टीम से मुकाबला तो नहीं ही किया जा सकता था। साथ ही सीरीज शुरू होने से पहले अभ्यास मैच भी सिर्फ एक मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक आईपीएल का सवाल है तो उसे उतना ही जरूरी मानिए जितना अखबार में विज्ञापन। पत्रकार इसे अब कटु सत्य मानकर काम करते हैं। वहीं क्रिकेटर आईपीएल को शहद जैसा सच मानकर खेलते हैं। आईपीएल को गाली देने से कुछ नहीं मिलने वाला। यह जारी रहने वाला है। चाहे कितनी भी सीरीज हारें।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/703905856418840311/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/703905856418840311' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/703905856418840311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/703905856418840311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='इस हार का दोष ढलती उम्र को मत दीजिए'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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फुटबाल की औकात क्या है। सर्वे में भाग लेने वाले 14 प्रतिशत हिन्द निवासियों के मुताबिक आस्ट्रेलिया विश्व कप जीतने का सबसे प्रबल दावेदार था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की तारीख में आस्ट्रेलिया विश्व कप से बाहर हो चुका है और विश्व कप शुरू होने से पहले भी कोई भी आस्ट्रेलियाई 10 केन बीयर गटक लेने के बाद भी अपनी टीम को खिताब का दावेदार नहीं बताता। तो आस्ट्रेलिया भारतीयों की नजर में दावेदार कैसे हो गया? सीधा सा जवाब है क्रिकेट की वजह से। हम भारतीय क्रिकेट के दीवाने हैं और आस्ट्रेलिया क्रिकेट में बेहद मजबूत टीम है। पिछले तीन वनडे क्रिकेट विश्व कप और दो चैम्पियंस ट्रॉफी में हमने आस्ट्रेलिया को ही चैम्पियन बनते देखा तो सोचा आस्ट्रेलिया फुटबाल विश्व कप भी जीत जाएगा। मतलब साफ है फुटबाल के बारे में आम भारतीयों की जानकारी या तो न के बराबर है या काफी सीमित है। यहां फुटबाल की सुध सिर्फ फुटबाल विश्व कप के समय ली जाती है और बाकी चार साल इसे ताक पर रख दिया जाता है। इसलिए जानकारी का दायरा वर्ल्ड कप से वर्ल्ड कप चलता है। बीच में क्या हुआ कुछ पता नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें उनकी गलती भी नहीं है। आखिर उन्हें पता चले भी कैसे। जानकारी के लिए वे जिन माध्यमों (समाचार पत्र और न्यूज चैलन) पर निर्भर हैं वे भी वर्ल्ड कप टू वर्ल्ड कप नजरिया रखते हैं। (एक बात स्पष्ट करता चलूं कि मैं यहां बात हिन्दी भाषी खेल प्रेमियों और हिन्दी अखबार या चैनल देखने वाले फुटबाल प्रेमियों की कर रहा हूं। अंग्रेजी में हालात तो फिर भी दुरुस्त हैं। पश्चिम बंगाल, केरल, गोवा और उत्तर-पूर्व में फुटबाल नंबर एक खेल है और यहां के भाषायी अखबार फुटबाल की खबरें नियमित तौर पर छापते हैं चार वर्ष के अंतराल पर नहीं।) अब ये हिन्दी अखबार (इनमें से एक में मैं भी कार्यरत हूं) विश्व कप को रोज एक पन्ना समर्पित कर रहे हैं और ये हिन्दी चैनल दिन भर में कई बार फुटबाल अपडेट भी दिखा रहे हैं। लेकिन सच बात यह है कि पाठक और दर्शक इनके साथ लय नहीं बिठा पा रहे। मैसी, रोनाल्डो, काका या रूनी से अति लोकप्रिय नाम तो उन्हें पता है लेकिन इनके अलावा अन्य नामों को पढ़ने या सुनने में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा रहा है। 11 जुलाई तक (फाइनल के दिन तक) या इससे एक-दो दिन और आगे तक ये चार साली फुटबाल जुनून जारी रहेगा और उसके बाद फिर इसे ब्राजील में होने वाले 2013 विश्व कप तक कब्र में दफन कर दिया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले साल एशियन कप फुटबाल टूर्नामेंट का आयोजन होना है और भारत ने लम्बे अर्से बाद इस टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई किया है। लेकिन मुझे शक है कि इस टूर्नामेंट में मौजूदा विश्व कप की तुलना में 10 प्रतिशत कवरेज भी मिले। इंग्लिश प्रीमियर लीग, स्पेनिश ला लीगा, इतालवी सीरी-ए, जर्मन बुंदसलीगा, यूएफा चैम्पियंस लीग, यूएफा कप के साथ-साथ भारत की आई लीग, संतोष ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंट पहले की तरह आगे भी हर साल होंगे लेकिन हिन्दी समाचार माध्यमों में इनकी कवरेज नहीं होगी, होगी भी तो खाली जगह को पूरा करने के लिए। इसके बावजूद 2014 में ऐसे ही या इससे भी बड़े पैमाने पर हिन्दी अखबार और न्यूज चैनल 20वें फीफा विश्व कप की कवरेज लेकर आएंगे और यह उम्मीद करेंगे सुधी पाठक या दर्शक बीते सालों में अपने दम पर फुटबाल को लेकर अपडेट हो चुके होंगे और हमारी कवरेज का मजा लेंगे।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1055145184531791066/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/1055145184531791066' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1055145184531791066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1055145184531791066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='चार साल में एक महीने के लिए छाने वाला जुनून'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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खिलाडिय़ों में से सिर्फ 14 नीलाम हुए और पाकिस्तान के अलावा कुछ ऐसे भी देश थे जिनके खिलाडिय़ों पर बोली नहीं लगी। लेकिन सच्चाई यही है कि उन देशों के खिलाडिय़ों और पाकिस्तान के खिलाडिय़ों में बड़ा अंतर था। आस्ट्रेलिया की मौजूदा टीम के खिलाडिय़ों पर इसलिए बोली नहीं लगी क्योंकि वे आपीएल थ्री के शुरुआती तीन सप्ताह तक उपलब्ध नहीं रहते। हॉलैण्ड और बांग्लादेश के खिलाड़ी उतने स्तरीय थे नहीं। पाकिस्तानी खिलाडिय़ों के साथ इन दोनों में से कोई समस्या नहीं थी। उनके खिलाड़ी पूरे आईपीएल टूर्नामेंट के दौरान उपलब्ध रहते। जहां तक उनके स्तर का सवाल है तो वे टी 20 के विश्व चैम्पियन टीम का हिस्सा हैं। यही बात उनके स्तर के बारे में बताने के लिए काफी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तीसरा तर्क यह है कि फ्रेंचाइजियों ने पाक खिलाडिय़ों पर बोली इसलिए नहीं लगाई क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें अहम मौके पर वीजा की समस्या भी आ सकती थी। अगर फ्रेंचाइजियों की यह समस्या थी तो उन्हें आईपीएल के कर्ताधर्ताओं को यह बात पहले बतानी चाहिए कि वे अब पाक खिलाडिय़ों पर बोली लगाने को इच्छुक नहीं हैं। सभी टीमों की गतिविधियों से अच्छी तरह वाकिफ रहने वाले आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के लिए क्या यह बात मुमकिन प्रतीत होती है कि उन्हें फ्रेंचाइजियों के इस रुख का आभास न रहा हो? मुझे तो नहीं लगता। अच्छा होता यदि आईपीएल पहले ही पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को यह बता देता कि कोई फ्रेंचाइजी वहां के क्रिकेटरों में दिलचस्पी नहीं ले रहा है और पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को नीलामी की सूची से ही बाहर कर दिया जाता।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/7374243761415383694/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/7374243761415383694' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7374243761415383694'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7374243761415383694'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html' title='कुछ हद तक जायज है पाक का विरोध'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-4999681313330386206</id><published>2010-01-13T23:38:00.002+05:30</published><updated>2010-01-13T23:45:03.746+05:30</updated><title type='text'>हाउजैट.....हाउ वाज दैट..... आआआआ</title><content type='html'>आपने श्रीलंका के कप्तान कुमार संगकारा को अपील करते समय ध्यान से देखा या सुना है? आम तौर पर अपील करते समय गेंदबाज, विकेटकीपर या विकेट के नजदीक के फील्डर &#39;हाउजैट&#39; या &#39;हाउ वाज दैट&#39; की आवाज निकालते हैं और अम्पायर इसके जवाब में कहते हैं दैट्स आउट या दैट्स नॉट आउट। लेकिन श्रीलंकाई कप्तान इन दोनों में कुछ भी नहीं कहते वे बस चिल्लाते हैं &#39;आआआआआआआआ&#39;। विकेट के पीछे खड़े संगकारा बल्लेबाज के पैड पर गेंद लगते ही ऐसे उछलने लगते हैं जैसे मानो मई की गरमी में तीन घंटे तक तप चुकी सीमेंटेड फर्श पर नंगे पांव खड़े हो गए हों। जबर्दस्त उत्साह। खैर अम्पायर इसके जवाब में &#39;ईईईईईईईईई&#39; नहीं करते। वे उन्हें भी दैट्स आउट या दैट्स नॉट आउट ही कहते हैं। कोई-कोई अम्पायर हां या न में मुंडी हिलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर जो बात मैं कहना चाह रहा था वह यह है कि संगकारा के अपील के स्टाइल से मुझे अपने स्कूली दिनों की क्रिकेट याद गई। हमें यह मालूम था कि अपील के वक्त चिल्लाना होता है। हाउजैट या हाउ वाज दैट हमें नहीं पता था। जब गेंद बल्लेबाज के पैर में लगती थी या बल्लेबाज के चूकने पर विकेटकीपर कोई गेंद पकड़ता था तो हम भी चिल्लाते थे &#39;आआआआआआ&#39;। हमारी क्रिकेट में अम्पायर बल्लेबाजी करने वाली टीम का ही होता था और 100 में से 95 बार उसका जवाब होता था &#39;अरे आउट नहीं काहे चिल्ला रहा है।&#39; राधोपुर के लखी चंद साहू स्कूल का मैदान हो या मधुबनी के वाटसन हाई स्कूल का मैदान या पटना साइंस कॉलेज का मैदान हर जगह यही हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक गेंद विकेट न उखाड़ दे, या फील्डर सीधा-सीधा कैच न पकड़े या बल्लेबाज रन लेते वक्त विकेट पर थ्रो लगते समय क्रीज से तीन चार फुट दूर न हो आउट होने का सवाल ही नहीं। हम अपनी क्रिकेट में विवादास्पद एलबीडब्ल्यू के नियम को भी शामिल करते थे लेकिन अगर अम्पायर का यदि बल्लेबाज से झगड़ा न हुआ हो एलबीडब्ल्यू मिलना तो असंभव से कम नहीं था। गजब के अम्पायर थे सब। मैं भी करता था अम्पायरिंग बाकियों की तरह। फील्डिंग करने वाली टीम अम्पायर को पाकिस्तानी अम्पायर की संज्ञा देते थे। उन दिनों हम सुनते थे कि पाकिस्तानी अम्पायर बहुत बेईमान होते हैं। हालांकि अशद रउफ और अलीम दार को देख कर अब ऐसा नहीं लगता। भारतीय अम्पायरों में बंसल की बहुल चर्चा होती थी। बंसल साहब का भी अजीब रिकार्ड रहा। उन्होंने भारत के जितने टेस्ट मैचों में अम्पायरिंग की उनमें भारत कभी हारा नहीं। बड़ा खास रिकार्ड है। कुछ वैसा ही जैसे जावेद मियांदाद अपने टेस्ट करियर में पाकिस्तान में कभी एलबीडब्ल्यू आउट नहीं हुए। मैं भी अपनी दूसरी क्लास की क्रिकेट से लेकर बीएससी तक की क्रिकेट में कभी एलबीडब्ल्यू आउट नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वो अपील, वो अम्पायर, वो मैदान बहुत याद आते हैं। शाम को खेलने के समय ऑफिस में होता हूं। रात 2-3 बजे सोता हूं तो सुबह की क्रिकेट भी नहीं खेल सकता। चलो कोई बात नहीं मेरी जगह संगकारा तो है वह तो कहता ही रहेगा &#39;आआआआआआआआ&#39;।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/4999681313330386206/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/4999681313330386206' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4999681313330386206'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4999681313330386206'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='हाउजैट.....हाउ वाज दैट..... आआआआ'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-840051629851174813</id><published>2009-10-23T15:44:00.002+05:30</published><updated>2009-10-23T15:48:13.412+05:30</updated><title type='text'>700 करोड़ रुपये कम तो नहीं होते</title><content type='html'>20 अक्टूबर को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने अप्रैल 2010 से मार्च 2014 तक के लिए भारत में होने वाले अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मैचों (विश्व कप 2011, आईपीएल और चैम्पियंस लीग शामिल नहीं) के टेलिविजन प्रसारण अधिकार निम्बस के चैनल नियो क्रिकेट को 2000 करोड़ रुपये में बेचे। पिछली बार इसी निम्बस ने इसी बीसीसीआई के साथ यही करार 2700 करोड़ रुपये से ज्यादा में किए थे। तो आखिर क्या बात है कि क्रिकेट मार्केटिंग में दुनिया को नए तरीके सिखाने वाली बीसीसीआई की मार्केटिंग कमेटी ने इस बार इतना बड़ा घाटा सहा। इसी कमेटी ने चैम्पियंस लीग टी 20 टूर्नामेंट के अगले 10 साल के प्रसारण अधिकार 4500 करोड़ से भी अधिक में बेचे। भले ही यह 10 साल का करार है लेकिन चैम्पियंस लीग साल में 15-20 दिन ही होंगे।&lt;br /&gt;इसका सीधा मतलब तो यही निकलता है कि भारतीय क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं ने यह मान लिया है कि टेस्ट और वनडे क्रिकेट पहले ही तरह बिकाऊ नहीं है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है। इसी बीसीसीआई का कहना है कि वह भारत-आस्ट्रेलिया वनडे सीरीज के हर मैच से जितनी कमाई करेगा उतना पैसा उसे आईसीसी पूरे 2011 विश्व कप के लिए नहीं देगी। वनडे तो अब भी बिकाऊ हैं। खास कर वो वनडे जिसमें भारत हिस्सा ले रहा हो। टैम के आंकड़ें गवाह है कि दक्षिण अफ्रीका में हुए चैम्पियंस ट्रॉफी के उन मैचों को जिनमें भारत खेला चैम्पियंस लीग के मैचों से अधिक टीवी दर्शक मिले। मेरे पास तो बोर्ड की मार्केटिंग कमेटी के किसी सदस्य का नम्बर नहीं है लेकिन जिनके पास है क्या वो उनसे पूछ के बताएंगे कि हमारे बोर्ड ने इतना बड़ा घाटा क्यों सहा।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/840051629851174813/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/840051629851174813' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/840051629851174813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/840051629851174813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/10/700.html' title='700 करोड़ रुपये कम तो नहीं होते'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1983512655245359996</id><published>2009-08-29T20:57:00.000+05:30</published><updated>2009-08-29T20:58:38.069+05:30</updated><title type='text'>टेस्ट चैम्पियनशिप का आयोजन इतना आसान नहीं</title><content type='html'>वेस्टइण्डीज क्रिकेट बोर्ड (डब्ल्यूआईसीबी) के अध्यक्ष जुलियन हंट ने खुलासा किया कि बीसीसीआई ने आईसीसी द्वारा प्रस्तावित टेस्ट चैम्पियनशिप की योजना को ठुकरा दिया था। हंट का कहना है आईसीसी ने मौजूदा समय में काम में आ रहे भविष्य दौरा कार्यक्रम के स्थान पर चार साल तक चलने वाली टेस्ट चैम्पियनशिप शुरू करने की योजना बनाई थी लेकिन यह बीसीसीआई के इनकार के कारण खटाई में पड़ गया। बीसीसीआई ने जिस किसी भी कारण से इस चैम्पियनशिप के लिए मना किया हो सच्चाई यही है कि अभी इस तरह की कोई चैम्पियनशिप शुरू नहीं की जा सकती और शुरू हुई भी तो सफल नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके पीछे कई कारण है। पहला तो यह कि 10 टेस्ट टीमों के बीच कोई ऐसी चैम्पियनशिप के लिए चार वर्ष में सभी टीमों को इस एक-दूसरे के खिलाफ अपने देश में और सामने वाली टीम के देश में बराबर बराबर मैच खेलने होंगे। ऐसी स्थिति में भारत को बांग्लादेश के खिलाफ भी उतने ही टेस्ट मैच खेलने होंगे जितना वह आस्ट्रेलिया के खिलाफ खेले। इस स्थिति में आस्ट्रेलिया और इंग्लैण्ड के बीच हर दो साल में होने वाली एशेज सीरीज में भी पांच मैच खेले जाने की गुंजाइश नहीं बचेगी। क्योंकि टेस्ट चैम्पियनशिप में सभी टीमों को एक दूसरे के खिलाफ बराबर मैच खेलने होंगे और ऐसे में हर टीम किसी दूसरी टीम के साथ चार साल के अंदर पांच मैच घर में और पांच मैच सामने वाली टीम के घर में नहीं खेल सकती। ऐसा हुआ तो एक टीम को चाल साल में कुल 90 मैच खेलने होंगे। यानी एक साल में 22-23 मैच। यह नामुमकिन है। अगर दो-तीन टेस्ट मैचों की सीरीज रखी गई तब तो यह और भी बुरा होगा। इस हालात में ऐशेज और आस्ट्रेलिया-बांग्लादेश सीरीज में क्या अंतर रह जाएगा। सबसे बड़ी बात बांग्लादेश जैसी कमजोर टीम अगर चार साल में इतने टेस्ट मैच खेलेगी तो इसे देखेगा कौन? इस प्रारूप से टेस्ट लोकप्रिय होने के बजाय और भी अलोकप्रिय हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे बचने के लिए टीयर सिस्टम की वकालत की जा रही है। टीयर एक में चोटी की छह टीमें और टीयर दो में चार अन्य। हर चार साल में टीयर एक की फिसड्डी टीम दूसरे टीयर में और दूसरे टीयर की अव्वल टीम टीयर एक में आएगी।&lt;br /&gt;देखने-सुनने में यह अच्छा लगता है लेकिन क्या प्रायोगिक स्तर पर यह मुमकिन है? मान लीजिए कि किसी चैम्पियनशिप में भारत टीयर एक में आखिरी स्थान पर रहता है तो क्या वह इसके बाद अगले चार साल तक फिसड्डी टीमों के खिलाफ खेलता रहे। यही स्थिति किसी भी अच्छी टीम के साथ हो सकती है क्योंकि छह में से कोई न कोई तो आखिरी स्थान पर रहेगा। मान लीजिए कि कभी आस्ट्रेलिया या इंग्लैण्ड दो टीयर में बंट जाएं। तो क्या अगले चार साल एशेज सीरीज ही न हो? अगर टीयर सिस्टम से रेलीगेशन का सिस्टम हटा भी दें तब भी यह कामयाब नहीं होगा। निचले टीयर वाली टीमें हमेशा यह दावा करेगी कि अब उसका स्तर सुधर गया है और वह शीर्ष टीमों को टक्कर दे सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेस्ट चैम्पियनशिप वनडे या ट्वंटी 20 विश्व कप की तरह किसी एक देश में एक बार में नहीं निबटाया जा सकता। इसके लिए काफी लम्बे समय की आवश्यकता होगी और लोग लगातार इतना टेस्ट क्रिकेट देख-झेल नहीं सकते।&lt;br /&gt;इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि टेस्ट क्रिकेट की खूबसूरती द्विपक्षीय शृंखलाओं और परंपरागत प्रतिद्वंद्विता में ही बसी है। इसमें छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता। एशेज सीरीज, भारत-पाकिस्तान सीरीज, फ्रैंक वारेल सीरीज, बॉर्डर गावस्कर सीरीज से ही टेस्ट क्रिकेट का भला होगा। इन सीरीजों को लोकप्रिय बनाने की, इनके बेहतर प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। जो टीमें कमजोर हो रही हैं उसे फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की जाए। दर्शकों को मैदान तक लाने के लिए योजनाएं बनाई जाएं। जिस तरह एशेज शृंखला 100 साल से भी ज्यादा समय से नियमित अंतराल पर खेली जा रही है उसी तरह अन्य शृंखलाएं भी नियमित अंतराल पर हो ताकि उसके आयोजन से पहले अपने आप माहौल बने। भारत और पाकिस्तान या भारत और श्रीलंका आपस में कभी-कभी लगातार खेलते रहते हैं तो कभी लम्बे समय तक इनके बीच मैच ही नहीं होता। इस स्थिति को सुधारने की जरूरत है।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1983512655245359996/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/1983512655245359996' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1983512655245359996'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1983512655245359996'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post_29.html' title='टेस्ट चैम्पियनशिप का आयोजन इतना आसान नहीं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3191929468240964744</id><published>2009-08-28T10:54:00.001+05:30</published><updated>2009-08-28T10:57:45.565+05:30</updated><title type='text'>आधे फिट नडाल रोक पाएंगे फेडरर को?</title><content type='html'>आजकल टेनिस का कोई भी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट हो पुरुष एकल में रोजर फेडरर ही सबसे प्रबल दावेदार होते हैं। सोमवार से शुरू हो रहा अमरीकी ओपन तो इस स्विस स्टार के लिए और भी खास है। करियर के चरम पर पहुंचने के बाद यही एक ऐसा टूर्नामेंट है जिसमें फेडरर अब तक अपराजेय हैं। वर्ष 2004 से वह फ्लसिंग मीडोज के बादशाह हैं। यहां उन्होंने उस समय भी जीत दर्ज की जब उनके सबसे नजदीकी प्रतिद्वंद्वी स्पेनिश खिलाड़ी राफेल नडाल उन्हें दुनिया के अन्य हर कोने में पीट रहे थे। नडाल इस बार भी अपनी चुनौती के साथ मौजूद रहेंगे लेकिन वह हाल ही में चोट से उबरे हैं और उन्हें भी इस टूर्नामेंट से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटेन के एंडी मरे, सर्बिया के नोवाक जोकोविच, अर्जेन्टीना के जुआन मार्टन डेल पोट्रो और अमरीका के एंडी रोडिक कुछ ऐसे नाम हैं जो फेडरर के अभियान को थामने का माद्दा रखते हैं लेकिन फेडरर इन दिनों जैसी फॉर्म में हैं उससे तो यही लगता है कि विश्व नंबर एक के लिए 16वां ग्रैंड स्लैम खिताब अब महज दो सप्ताह से कुछ ज्यादा दिन ही दूर है। हां अगर आधे-अधूरे फिट नडाल कहीं स्विस स्टार के सामने आने में सफल रहे तो नजारा बदल सकता है। लेकिन इसके लिए नडाल को फाइनल तक का सफर तय करना पड़ेगा जो मैच प्रैक्टिस के अभाव में इस समय उनके लिए मुश्किल लग रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ड्रॉ पर नजर दौड़ाएं को फेडरर का सेमीफाइनल तक का सफल बहुत ही आसान दिख रहा है। हालांकि अंतिम 16 के मुकाबले में उन्हें आस्ट्रेलिया के लेटन हेविट और क्वार्टर फाइनल में रूस के निकोल देवीदेंको से खेलना पड़ेगा लेकिन फेडरर अपने बुरे दिनों में भी इन खिलाड़ियों को हराने का माद्दा रखते हैं। अंतिम चार में फेडरर के सामने जोकोविच होंगे। जोकोविच वर्ष 2008 के आस्ट्रेलियन ओपन के सेमीफाइनल सहित फेडरर को कुल चार बार हरा चुके हैं। हालांकि उन्हें आठ मुकाबलों में हार का सामना भी करना पड़ा है। लेकिन खास बात यह है कि इन दोनों के बीच हुए पिछले आठ मुकाबलों में दोनों को चार-चार जीत मिली है।&lt;br /&gt;वहीं फाइनल में एंडी मरे या नडाल जो भी पहुंचे आंकड़ों के लिहाज से अब तक फेडरर पर भारी साबित हुए हैं। नडाल ने फेडरर के खिलाफ 20 में से 13 मैचों में जीत दर्ज की है तो मरे ने नौ मुकाबलों में छह बार फेडरर को मात दी है। लेकिन यह अमरीकी ओपन है और यहां फेडरर किसी भी आंकड़े को झुठला सकते हैं।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3191929468240964744/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/3191929468240964744' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3191929468240964744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3191929468240964744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post_28.html' title='आधे फिट नडाल रोक पाएंगे फेडरर को?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1102410778692200422</id><published>2009-08-26T01:30:00.002+05:30</published><updated>2009-08-26T01:34:03.964+05:30</updated><title type='text'>बोल्ट जैसे एथलीट किसी &#39;सिस्टम&#39; की देन नहीं हैं</title><content type='html'>वैसे तो ज्यादातर खेलों में उन देशों का परिणाम अच्छा रहता है जहां खेलों के लिए आधारभूत ढ़ाचा बेहतर हो। क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस, हॉकी, बेसबॉल, बैडमिंटन, तैराकी, शतरंज, गोल्फ तमाम ऐसे खेल हैं जो इस कैटगरी में फिट बैठते है। लेकिन एक खेल ऐसा है जो 90 फीसदी खिलाड़ी के स्तर पर निर्भर करता है और 10 प्रतिशत सिस्टम पर। चाहे उस देश का सिस्टम कितना भी मजबूत क्यों न हो अगर खिलाड़ी अच्छे नहीं होंगे तो खास अच्छा परिणाम नहीं मिलेगा। वह खेल है एथलेटिक्स (ट्रैक एंड फील्ड दोनों)। सभी खेलों में यह एक मात्र ऐसा खेल है जिसमें जब-तब नए चैम्पियन सामने नहीं आते। इस खेल में मानव के शारीरिक सामर्थ की जितनी आवश्यकता है किसी अन्य खेल में नहीं। तभी तो माइकल जॉनसन, सर्गेई बुबका या ताजा सनसनी यूसेन बोल्ट रोज-रोज पैदा नहीं होते। तभी तो एथलेटिक्स के कई ऐसे विश्व रिकार्ड हैं जो सालों से नहीं टूटे। और वो तभी टूटेंगे जब उसे बनाने वाले पुराने एथलीट से बेहतर कोई नया एथलीट पैदा हो। ये एथलीट किसी सिस्टम से तैयार नहीं किए जा सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नजर उन रिकार्डों पर जो 10 साल से ज्यादा से टूटने की वाट जोह रहे हैं। इनमें से कुछ तो 20 या उससे भी ज्यादा समय से कायम हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- 400 मीटर दौड़ का मौजूदा विश्व रिकार्ड 1999 में माइकल जॉनसन ने बनाया था। &lt;br /&gt;- 800 मीटर दौ़ड़ का मौजूदा विश्व रिकार्ड डेनमार्क के विल्सन किपकेटर ने 1997 में बनाया था।&lt;br /&gt;-1000 मीटर दौड़ का विश्व रिकार्ड केन्या के नोह गेनी ने 1999 में बनाया था।&lt;br /&gt;-मोरक्को के हिचाम अल गुरोज ने 10 साल पहले 1500 मीटर एक मील और 2000 मीटर का विश्व रिकार्ड बनाया था।&lt;br /&gt;-3000 मीटर का विश्व रिकार्ड केन्या के डेनियल कोमेन ने 1996 में बनाया था&lt;br /&gt;-25 किलोमीटर पैदल चाल का विश्व रिकार्ड जापान के तोसीहिको सेको ने 1981 में बनाया था&lt;br /&gt;-400 मीटर बाधा दौड़ का विश्व रिकार्ड अमरीका के केविन यंग ने 1992 में बनाया था&lt;br /&gt;-ऊंची कूद का विश्व रिकार्ड क्यूबा के जेवियर सोटोमायोर ने 1993 में बनाया था&lt;br /&gt;-पोल वाल्ट का विश्व रिकार्ड यूक्रेन के सर्गेई बुबका ने 1994 में बनाया था&lt;br /&gt;-लम्बी कूद का विश्व रिकार्ड अमरीका के माइक पावेल ने 1991 में बनाया था&lt;br /&gt;-ट्रिपल जंप का विश्व रिकार्ड ब्रिटेन के जोनाथन एडवर्ड्स ने 1995 में बनाया था&lt;br /&gt;-गोला फेंक का विश्व रिकार्ड अमरीका के रेंडी बर्नेस ने 1990 में बनाया था&lt;br /&gt;-चक्का फेंक का विश्व रिकार्ड जर्मनी (तत्कालीन पूर्वी जर्मनी) के जर्गेन शल्ट ने 1986 में बनाया था।&lt;br /&gt;-हैमर थ्रो का विश्व रिकार्ड स्लोवेनिया के यूरीव सेदिक ने 1986 में बनाया था&lt;br /&gt;-जेवलिन थ्रो का विश्व रिकार्ड चेक गणराज्य के जान जेलेन्जी ने 1996 में बनाया था&lt;br /&gt;-4 गुणा 400 मीटर रिले का विश्व रिकार्ड अमरीकी टीम ने 1993 में बनाया था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी रिकार्ड पुरुष वर्ग के हैं। महिला वर्ग में भी यही हाल है</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1102410778692200422/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/1102410778692200422' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1102410778692200422'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1102410778692200422'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post_26.html' title='बोल्ट जैसे एथलीट किसी &#39;सिस्टम&#39; की देन नहीं हैं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-8675929421405114205</id><published>2009-08-15T13:15:00.000+05:30</published><updated>2009-08-15T13:16:34.993+05:30</updated><title type='text'>हर तरफ हार ही हार</title><content type='html'>15 अगस्त की पूर्व संध्या पर सायना नेहवाल से बड़ी उम्मीदें थी। सोच रहा था कि भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी दूसरी वरीयता प्राप्त चीनी खिलाड़ी लिन वांग से क्वार्टर फाइनल मैच जीत जाएगी तो पांच-छह कॉलम में सजा-धजा कर इस मैच की लीड खबर बनाऊंगा ताकि स्वतंत्रता दिवस पर जब पाठक खेल का पन्ना देखे तो उनका हर्षोउल्लास दोगुना हो जाए।  लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इससे पहले मिश्रित युगल में वी दीजू और ज्वाला गुट्टा की जोड़ी भी हार कर टूनार्मेंट से बाहर हो चुकी थी। इस तरह हैदराबाद में चल रही विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में भारत की चुनौती समाप्त हो गई और इसके साथ ही इस टूर्नामेंट से स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर किसी सकारात्मक खबर मिलने की उम्मीद भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद सोचा किसी और खेल में कोई अच्छी खबर हाथ लग जाए ताकि आजादी का जश्न मनाने वाले अपने पाठकों की खुशी में इजाफा कर सकूं। लेकिन बाकी खेलों में भी निराशाजनक परिणाम ही हाथ लगे। शतरंज में तानिया सचदेव बांग्लादेशी खिलाड़ी से हार गईं तो टेनिस में प्रकाश अमृतराज एकल से बाहर हो गए। हालांकि प्रकाश .युगल में जीते। वह भी पाकिस्तान के ऐसाम उल हक कुरैशी के साथ। लेकिन आजादी के पावन मौके पर भारत-पाक संयुक्त कामयाबी की खबर का कनसेप्ट कुछ लगों को कुछ जमा नहीं। वैसे भी प्रकाश की जोड़ी सेमीफाइनल में ही पहुंची कोई खिताब थोड़े ही जीत लिया था (वैसे सायना भी जीतती तो सेमीफाइनल में ही पहुंचती)। गोल्फ के मैदान से भी अच्छी खबर नहीं आई। भारतीय गोल्फर जीव मिल्खा सिंह निराशाजनक प्रदर्शन के साथ संयुक्त 67वें स्थान पर ही रहे। टेबल टेनिस में भी भारतीय टीम की हार की खबर थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन बड़ा दुखी हुआ कि आजादी दिवस पर भारतीयों की हार की खबरों से परिपूर्ण पन्ना देखकर हमारे पाठकों पर क्या बीतेगी। शिक्षा भी ऐसी ही मिली है कि ऐसे दिनों पर सकारात्मक खबरों को तरजीह दो। लेकिन कोई सकारात्मक खबर हो तब न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम खत्म करने के बाद बुझे मन के साथ घर लौटा और इस बात पर बार-बार कोफ्त होता रहा कि एक भी सुखद खबर नहीं लगा पाया। घर पर अपने 15 वर्षीय साले (ब्रदर इन लॉ) को यह बात बताई। नींद से परेशान साले ने बात को आगे न बढ़ाने के मूड में एक बात कही कि इन खेलों में हम जीतते ही कब थे जो आज जीत जाते। यह कह कर वह तो सो गया लेकिन उसकी बात बहुत हद तक सच्ची भी है। इन खेलों क्या कुल मिलाकर सभी खेलों में हम जीतते ही कब थे जो आज जीत जाते। इक्का-दुक्का जीत कुछ इक्का दुक्का खेलों में मिलती रही है लेकिन अपने यहां तो खेल के मैदान में सफलता इस कदर कम है कि कांस्य विजेता (तीसरा स्थान पाने वाले) भी हीरो से कम नहीं। और जब तक ये कांस्य विजेता नहीं थे तब तक चौथा स्थान हासिल करने वाले भी हीरो थे। कृप्या मुझे यह याद न दिलाएं कि एक स्वर्ण भी मिला था। लेकिन हम खेल में तब कामयाब होंगे जब हमारे पास इतने स्वर्ण विजेता हों कि कईयों के नाम याद न आए। वाकई खेलों की दुनिया में अभिनव है भारत। बिना मजबूत तर्क और वजह के आश्चर्यजनक रूप से नाकामयाब।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/8675929421405114205/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/8675929421405114205' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8675929421405114205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8675929421405114205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='हर तरफ हार ही हार'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6708265121722004243</id><published>2009-07-18T04:12:00.002+05:30</published><updated>2009-07-18T04:17:41.425+05:30</updated><title type='text'>सचिन अगर आस्ट्रेलियाई होते तो टेस्ट में अब तक 55 शतक जमा चुके होते</title><content type='html'>पोंटिंग ने इंग्लैण्ड के खिलाफ वर्तमान एशेज सीरीज के पहले टेस्ट मैच में शतक जमाकर अपने शतकों की संख्या 38 तक पहुंचा दी है। क्रिकेटिया हलकों में इस बात पर बहस भी छिड़ गई है कि कहीं पोंटिंग सचिन तेंदुलकर से भी महान बल्लेबाज तो नहीं। मैं ऐसा नहीं मानता। क्योंकि सिर्फ आंकड़े किसी बल्लेबाज के महानता की असली तस्वीर बयां नहीं करते। लेकिन अगर आंकड़ेबाजी पर ही चलें तो मैं यहां कुछ ऐसे आंकड़े दे रहा हूं जो वास्तविक तो मुमकिन नहीं हो सकते है लेकिन इन पर विचार कर सचिन और पोंटिंग के बीच के अंतर को समझा जा सकता है। सिर्फ इतना सोचें कि अगर सचिन एक आस्ट्रेलियाई क्रिकेट होते और पोंटिंग भारतीय तो दोनों का रिकार्ड कैसा रहता। तब सचिन पोंटिंग से इतने आगे होते कि उनके रिकार्ड को चुनौती मिलना असंभव होता। इस विश्लेषण में मैंने दोनों खिलाड़ियों की काबिलियत का आंकलन नहीं किया है। बस देश बदलने की स्थिति में मिले मौकों के आधार पर कौन कहां खड़ा होता यह जानने की कोशिश की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थित एक-सचिन अगर आस्ट्रेलियाई होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन के पहले टेस्ट मैच के बाद से &lt;br /&gt;आज तक भारत के कुल टेस्ट मैच&lt;strong&gt;-   173&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दिनों में सचिन के कुल टेस्ट मैच&lt;strong&gt;-  159&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन की प्रतिशत अनुपस्थिति&lt;strong&gt;-   8.09&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दरम्यान आस्ट्रेलिया के कुल टेस्ट&lt;strong&gt;-  226&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर सचिन आस्ट्रेलियाई होते तो &lt;br /&gt;8.09 प्रतिशत अनुपस्थिति दर के हिसाब&lt;br /&gt;से उनके कुल टेस्ट मैचों की संख्या होती&lt;strong&gt;-  207&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन ने भारत के लिए 159 टेस्ट मैचों में &lt;br /&gt;261 पारी खेली है यानी प्रति टेस्ट उनके&lt;br /&gt;पारियों की संख्या हुई&lt;strong&gt;-    1.64&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस हिसाब से सचिन अगर आस्ट्रेलियाई&lt;br /&gt;होते तो उनके पारियों की संख्या होती&lt;strong&gt;-  339&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के लिए खेली 261 पारियों में सचिन&lt;br /&gt;27 बार नाबाद रहे हैं। यानी प्रति पारी उनके&lt;br /&gt;नाबाद रहने की दर है&lt;strong&gt;-    0.10&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लिहाज से 339 पारियों में वह नाबाद रहते &lt;strong&gt;-       34&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन ने भारत के लिए 261 पारियों में 27 बार &lt;br /&gt;नाबाद रहते हुए 54.59 की औसत से 12773 रन&lt;br /&gt;बनाए हैं। इस लिहाज अगर वह आस्ट्रेलियाई रहते&lt;br /&gt;तो 339 पारियों में 34 बार नाबाद रहते हुए&lt;br /&gt;54.59 की औसत से रन बनाते &lt;strong&gt;-  16649&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन ने 261 पारियों में 42 शतक बनाए हैं।&lt;br /&gt;यानी हर 6.21 पारी में एक शतक इस&lt;br /&gt;लिहाज से अगर वह आस्ट्रेलियाई होते तो &lt;br /&gt;339 पारियों में उनके शतकों की संख्या होती&lt;strong&gt;-         55&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह उनके अद्धर्शतकों की संख्या होती&lt;strong&gt;-  69&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखते हैं कि पोंटिंग अगर भारतीय होते तो क्या होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोंटिंग के पहले टेस्ट मैच से अब तक&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के कुल टेस्ट मैच&lt;strong&gt;-   155&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दिनों में पोंटिंग के कुल मैच&lt;strong&gt;-   132&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोंटिंग की प्रतिशत अनुपस्थिति&lt;strong&gt;-   14.84&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दिनों में भारत ने टेस्ट खेले&lt;strong&gt;-   135&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर पोंटिंग भारतीय होते तो अपनी&lt;br /&gt;अनुपस्थिति दर के हिसाब से टेस्ट खेले होते&lt;strong&gt;-  115&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के लिए प्रति टेस्ट पोंटिंग के &lt;br /&gt;पारियों की संख्या हुई&lt;strong&gt;-    1.66&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अगर वह भारतीय होते तो 115 टेस्ट में&lt;br /&gt;उनके पारियों की संख्या हुई होती &lt;strong&gt;-  190&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के लिए वह 222 पारियों में 26&lt;br /&gt;बार नाबाद रहे हैं। इस लिहाज से अगर वह&lt;br /&gt;भारतीय होते तो उनकी नाबाद पारियों की&lt;br /&gt;संख्या होती  &lt;strong&gt;-   21&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के लिए पोंटिंग ने 56.68 की&lt;br /&gt;औसत से रन बनाए हैं। अगर वह भारतीय होते&lt;br /&gt;तो उपरोक्त निष्कर्षों के आधार पर इसी औसत&lt;br /&gt;से उनके रन होते  &lt;strong&gt;-  9578&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोटिंग ने आस्ट्रेलिया के लिए 222 पारियों में&lt;br /&gt;38 शतक लगाए है। अगर वह भारतीय होते तो&lt;br /&gt;इसी दर से 190 पारियों में उनके शतकों की&lt;br /&gt;संख्या होती &lt;strong&gt;-    32&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह उनके अद्धर्शतकों की संख्या होती &lt;strong&gt;- 39&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो देखा आपने कि इस स्थित में सचिन कितने आगे पहुंच गए होते। तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि भारतीय पोंटिंग आस्ट्रेलियाई सचिन का रिकार्ड भी तोड़ पाएगा। लेकिन हमारे भारतीय सचिन ने कम मौकों के बावजूद ऐसे मुकाम तय किए हैं जहां पहुंचने में ज्यादा मौके पाने वाले आस्ट्रेलियाई पोंटिंग को अभी भी बहुत मेहनत करनी होगी।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6708265121722004243/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/6708265121722004243' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6708265121722004243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6708265121722004243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/07/55.html' title='सचिन अगर आस्ट्रेलियाई होते तो टेस्ट में अब तक 55 शतक जमा चुके होते'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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या उसके भैया और दोस्तों के जैसे हैं जो भारत के मैचों के दौरान तमाम किस्म के टोटके करते हैं। कभी-कभी तो इसक खुमार मैच खत्म होने के दो-तीन दिन बाद तक भी रहता है। भारत मैच हारा और अगले दिन परचून की दुकान जाते वक्त पड़ोसी मिल जाता है और कहता क्यों भाई साहब हरवा ही दिया आपने इंडिया को। इस पर जवाब होता है अरे भाई साबह मैंने नहीं गोलू (भोलू, संदीप, रमेश, सुरेश भी हो सकते हैं जिम्मेदार) ने हरवा दिया। युवराज बैटिंग कर रहा था और वह बाथरूम जाने की जिद करने लगा। आप तो जानते ही हैं वह बाथरूम जाता है तो क्या होता है। वह लौटा नहीं कि युवी स्टंप आउठ होकर पैवेलियन लौट चुका था। वह क्रीज पर थोड़ी देर और टिक जाता तो मैच का नक्शा बदल जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य की बात है कि इस तरह के टोटकों में यकीन रखने वाले कोई अनपढ़ या गंवार नहीं होते। वह पत्रकार, बैंकर, आईएएस अफसर से लेकर मल्टीनेशनल कम्पनियों का कोई कर्मचारी भी हो सकता है। जिस पर रौब जमा उससे तो टोटके करवा लिए और नहीं जमा तो मन में सैकड़ों गालियां दे डाली। साला जाता भी नहीं---- पूरा मैच देखेगा और इंडिया की वाट लगा के ही दम लेगा। हालांकि मजा तब आता है जब ऐसे लोग खुद किसी दूसरे के टोटके का पात्र बन जाते हैं। तब इन्हें बड़ा अजीब लगता है। सोचते हैं कि मैं तो मैच जिताऊ प्लेयर हूं कोई बाहरी (आस्ट्रेलियाई ग्रेग चैपल की तरह) मुझे क्या नसीहत देगा। ऐसा लगता है कि धोनी, युवराज, इरफान जहीर की मेहनत तो बस यूं ही है मैच तो यही जिताते हैं तीन घंटे एक ही कुर्सी पर बैठ कर, पेशाब दबा कर, पानी न पीकर या बहुत पानी पी कर। ताज्जुब है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं ये टोटके सिर्फ आम जन ही करते हैं। ये क्रिकेटर भी कम नहीं भाई साहब। कोई बाएं पैर में पहले पैड बांधता है तो कोई लाल रुमाल लेकर क्रीज पर जाता है, कोई ग्लव्स में स्क्वैश की गेंद रखता है तो कोई मैच के दौरान टी-शर्ट बदलता है। कितनी जायज है ये टोटकेबाजी या किसी के ऊपर शुभ-अशुभ का ठप्पा लगा देना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट मैच तो हल्की-फुल्की बात है लेकिन ये आदत जिन्दगी के गम्भीर क्षणों में भी पीछा नहीं छोड़ती। वो ऑफिस में आया इसलिए मेरी नौकरी गई। सवेरे उसका चेहरा देख लिया तो दिन खराब हो गया। फलां साला है ही मनहूस--- आदि-आदि। ये कोई हंसी-मजाक नहीं। क्या ऐसी सोच को क्रिकेट में जायज और गम्भीर मसलों पर नाजायज है। गलत तो गलत ही है चाहे किसी भी अवसर पर क्यों न हो। आपका क्या कहना है?</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3462691068629639138/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/3462691068629639138' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3462691068629639138'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3462691068629639138'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html' title='तो गोलू के बाथरूम जाने से हार गया भारत'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3846373850558613363</id><published>2009-06-15T21:45:00.001+05:30</published><updated>2009-06-15T21:47:56.040+05:30</updated><title type='text'>उफ्फ ये क्रिकेट की अनिश्चितताएं</title><content type='html'>क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है---- इसका इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि मौजूदा ट्वंटी विश्व कप में अब तक एक भी मैच नहीं हारने वाली श्रीलंका की टीम अगर मंगलवार को न्यूजीलैण्ड से एक रन से भी हारती है तो वह टूर्नामेंट से बाहर हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीलंका ने ग्रुप ऑफ डेथ माने जाने वाले ग्रुप सी में अपने दोनों मैच जीते (आस्ट्रेलिया और वेस्टइण्डीज के खिलाफ)। इसके बाद सुपर एट में ग्रुप एफ में उसने पाकिस्तान और आयरलैण्ड को भी हराया। लेकिन अब स्थितियां ऐसी बन गई कि न्यूजीलैण्ड के खिलाफ होने वाला उसका मैच अचानक ही करो या मरो वाला हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप एफ में पाकिस्तान ने सोमवार को आयरलैण्ड पर बड़ी जीत दर्ज की। इससे पहले वह श्रीलंका से हार गया था जबकि न्यूजीलैण्ड से जीता था। आयरलैण्ड से मैच के बाद पाक टीम का नेट रन रेट 1.185 हो गया जो कि श्रीलंका (0.700) और न्यूजीलैण्ड (0.093) दोनों से बेहतर है। फिलहाल पाकिस्तान और श्रीलंका के सुपर एट में दो-दो जीत से चार अंक हैं जबकि न्यूजीलैण्ड के पास एक जीत (आयरलैण्ड के खिलाफ) से दो अंक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी न्यूजीलैण्ड का नेट रन रेट श्रीलंका से बेहतर है। अगर वह श्रीलंका के खिलाफ मैच जीत जाता है तो ग्रुप एफ से पाकिस्तान, श्रीलंका और आयरलैण्ड तीनों के चार-चार अंक हो जाएंगे। ऐसे में नेट रन रेट से पहली दो टीमों का फैसला होगा और पाकिस्तान और न्यूजीलैण्ड सेमीफाइनल में पहुंच जाएं। बेचारा श्रीलंका जो अब तक चार में चार में से चारों मैच में जीत दर्ज की टूर्नामेंट से बाहर हो जाएगा। मैं नहीं चाहता ऐसा हो क्योंकि प्रदर्शन के लिहाज से श्रीलंकाई टीम ज्यादा डीजर्विंग है लेकिन ट्वंटी 20 में कुछ भी अनुमान लगाना असंभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले ट्वंटी 20 विश्व कप में दक्षिण अफ्रीका के साथ भी ऐसा ही हुआ था जिसने अपने पहले चार मैच जीते लेकिन भारत के खिलाफ एक मैच हारने के बाद वह टूर्नामेंट से बाहर हो गया। वह रन रेट के आधार पर भारत और न्यूजीलैण्ड से पिछड़ गया।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3846373850558613363/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/3846373850558613363' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3846373850558613363'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3846373850558613363'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_402.html' title='उफ्फ ये क्रिकेट की अनिश्चितताएं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-8271016647165638216</id><published>2009-06-15T03:21:00.000+05:30</published><updated>2009-06-15T03:22:42.440+05:30</updated><title type='text'>गनीमत है ये क्रिकेट नहीं चलाते</title><content type='html'>हमारी क्रिकेट टीम ट्वंटी 20 विश्व कप के सेमीफाइनल की होड़ से बाहर हो गई। क्या इससे रातों-रात टीम इण्डिया गई गुजरी हो गई? क्या धोनी चतुर कप्तान से फिसड्डी कप्तान हो गए? क्या गौतम गम्भीर, रोहित शर्मा, जहीर खान, हरभजन सिंह जैसे क्रिकेटर अब क्रिकेटर न हो कर कबाड़ हो गए? क्या अब भारतीय टीम को वापस देश लाने के बजाय प्रशांत महासागर में डूबो देना चाहिए (करीब 15 साल पहले विशन सिंह बेदी शारजाह में भारतीय टीम की हार पर ऐसा कहा था) ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त लिखे किसी जवाल का जवाब हां नहीं है। और गनीमत है कि जो इनका जवाब हां में देते हैं वो इस देश की क्रिकेट नहीं चलाते। भारतीय टीम हारी जाहिर है खराब खेली इसलिए हारी लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टीम ही खराब हो गई। क्रिकेट फॉर्म का खेल है और दुर्भाग्य है हमारे कई खिलाड़ी एक साथ आउट ऑफ फॉर्म हो गए। गम्भीर टच में नहीं थे, सहवाग के अचानक लौटने से रोहित को ओपनिंग करनी पड़ गई। रैना पहली बार इंग्लैण्ड गए थे। जहीर-ईशांत अपनी लय में नहीं थे (याद रखे कुछ ही दिन पहले इन्हें दुनिया की सबसे खतरनाक तेज गेंदबाज जोड़ी कहा जा रहा था)। धोनी की कप्तानी पहले जैसे ही रही हां वह बल्लेबाजी में जरूर खराब साबित हुए। उन्होंने इन दिनों शॉट खेलने की क्षमता खो दी है। लेकिन यह वापस आ सकती है। पिछले विश्व कप में उन्होंने जिस बल्लेबाज को क्रीज पर भेजा उसने रन बनाए, जिस गेंदबाज के हाथ में गेंद दी उसने विकेट लिए। इस बार ऐसा नहीं हुआ। होता है ऐसा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम भी ऑफिस में रोज एक जैसा काम नहीं करते। कभी यहां कभी वहा गलती होती रहती है जिसे हम ठीक करते रहते हैं। क्रिकेट में इतनी सी गलती से बल्लेबाज आउट हो जाते हैं और वह हमारी तरह इसे बदल नहीं सकते। &lt;br /&gt;मुमकिन है कल धोनी के घर कुछ बेवकूफ क्रिकेट प्रशंसक पत्थरबाजी कर दे। कहीं जहीर का पुतला फूंका जाए तो कहीं रोहित शर्मा के नाम की हाय-हाय हो। लेकिन यह कितना जायज है। धोनी को बदल कर किसे कप्तान बना देंगे। है कोई विकल्प। गम्भीर से बेहतर ओपनर कौन है हमारे पास। क्या कोई अन्य भारतीय ट्वंटी 20 क्रिकेट में रोहित शर्मा से बेहतर यूटीलिटी प्लेयर है। समय है इस हार को पचाने का। ज्यादा शोर-शराबे से कुछ होगा नहीं। नाहक ही टीम पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। और यह कोई वह विश्व कप नहीं जो चार साल में एक बार होता है। अगला ट्वंटी 20 विश्व कप अगले ही साल होना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद भारत को वेस्टइण्डीज जाना है चार वनडे की सीरीज खेलने। सितंबर में चैम्पियंस ट्रॉफी भी होगी। अक्टूबर में आस्ट्रेलियाई टीम भारत आ रही है सात वनडे खेलने। और भी कई मैच हैं। हमें टीम का मनोबल सिर्फ इस हार की वजह से गिरने नहीं देना चाहिए।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/8271016647165638216/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/8271016647165638216' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8271016647165638216'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8271016647165638216'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html' title='गनीमत है ये क्रिकेट नहीं चलाते'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2261850122934653130</id><published>2009-06-14T13:56:00.001+05:30</published><updated>2009-06-14T13:56:46.776+05:30</updated><title type='text'>न्यूजीलैण्ड टीम का साइकोलॉजिकल बैरियर</title><content type='html'>अगर आपने 1986 में शारजाह में हुए आस्ट्रेलेशिया कप का फाइनल देखा नहीं होगा तो इसके बारे में सुना जरूर होगा। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस मैच के आखिरी ओवर की आखिरी गेंद पर पाकिस्तान को जीत के लिए चार रन की दरकार थी। भारतीय गेंदबाज चेतन शर्मा ने फुलटॉस गेंद डाली और जावेद मियांदाद ने इसपर छक्का जड़ दिया। इस मैच के बाद भारतीयों का दिल ऐसा टूटा कि आने वाले कुछ सालों तक भारतीय टीम पाकिस्तान के खिलाफ नजदीकी मैच जीत ही नहीं पाती थी। यानी भारतीय टीम पाकिस्तान के खिलाफ एक साइकोलोजिकल बैरियर से ग्रस्त हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही साइकोलोजिकल बैरियर पाकिस्तान टीम को भारत के खिलाफ विश्व कप मैचों में है। किसी भी क्रिकेट विश्व कप में दोनों टीमों की तैयारी या फॉर्म कैसी भी क्यों न हो आपसी मुकाबले में जीत भारत की ही होती है। यह सिलसिला 1992 वनडे विश्व कप से शुरू हुआ और दक्षिण अफ्रीका में हुए पिछले ट्वंटी 20 विश्व कप तक जारी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह के एक मनोवैज्ञानिक अवरोध से न्यूजीलैण्ड की टीम भी ग्रस्त है। आज की तारीख में वह पाकिस्तान से अच्छी और बेहतर फॉर्म वाली ट्वंटी 20 टीम थी लेकिन 13 जून को हुए मैच में उसे पाकिस्तान ने आसानी से मात दे दी। पाकिस्तान के खिलाफ हथियार डाल देने का कीवी टीम का सिलसिला 1992 विश्व कप के सेमीफाइनल के बाद शुरू हुआ। इस विश्व कप में मार्टन क्रो की कप्तानी में न्यूजीलैण्ड की टीम बेहतरीन प्रदर्शन कर रही थी। उसने लगातार सात लीग मैच जीते। आठवें और आखिरी लीग मैच में न्यूजीलैण्ड का सामना पाकिस्तान से था। कहा जाता है कि न्यूजीलैण्ड यह मैच जानबूझ कर हार गया। अगर वह यह मैच जीतता तो सेमीफाइनल में उसका सामना आस्ट्रेलिया से आस्ट्रेलिया में होता और हार की स्थिति में उसे अपने देश में पाकिस्तान से ही भिड़ना था। पाकिस्तान की टीम उस विश्व कप में तब तक अच्छा खेल पाने में असफल रही थी औऱ क्रो भरोसा था कि वह इमरान की टीम को सेमीफाइनल में आसानी से हरा देगी। सेमीफाइनल में न्यूजीलैण्ड ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 262 रन का सम्मानजनक स्कोर बनाया। उस समय 250 से ऊपर का स्कोर मैच जिताऊ माना जाता था। जवाब में पाकिस्तान की टीम 140 रन पर चार विकेट गंवाकर काफी दबाव में थी क्योंकि तब तक ओवर भी काफी निकल गए थे। यहीं से इंजमाम उल हक ने ऐसी पारी खेली जिसे उनके प्रशंसक आज भी याद रखे हुए हैं। उन्होंने 37 गेंदों पर 60 रन ठोक डाले और पाकिस्तान को जीत दिला न्यूजीलैण्ड का सपना चकनाचूर कर दिया। &lt;br /&gt;इस हार के बाद कीवी टीम कभी भी विश्व कप में पाकिस्तान के खिलाफ मैच नहीं जीत पाई है। उसे 1996 और 1999 वन विश्व कप में पाक ने बुरी तरह हराया। 2003 और 2007 विश्व कप में इन दोनों का सामना नहीं हुआ। पिछले ट्वंटी 20 विश्व में और इस ट्वंटी 20 विश्व कप में पाकिस्तान न्यूजीलैण्ड के खिलाफ भारी पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट में किसी टीम या या कुछ खिलाड़ियों के और भी ऐसे साइकोलॉजिकल बैरियर रहे हैं। कुछ ने इससे पार पा लिया तो कुछ अभी भी इससे जूझ रहे हैं। जैसे शेन वार्न अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर में सचिन तेंदुलकर के सामने सफल नहीं हुए। पाकिस्तानी बल्लेबाजों को वेंकटेश प्रसाद से हमेशा दिक्कत हुई। ट्वंटी 20 में भारत न्यूजीलैण्ड से नहीं जीत पाता है। मिस्बाह उल हक पाकस्तानी टीम को जीत के करीब ले जाकर आउट हो जाते हैं खास कर भारत के खिलाफ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो इंग्लैण्ड की टीम भी इन दिनों भारत के खिलाफ कोई बड़ा मैच नहीं जीत सकी है। यह सिलसिला 1999 वन-डे विश्व कप से शुरू हुआ था। देखने वाली बात है कि लॉर्ड्स में आज क्या होगा। याद रखिए भारत आज हारा तो बाहर। फिर सब मिलकर फीफा कनफेडरेशन कप फुटबाल देखेंगे। ब्राजील और इटली के जलवे।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2261850122934653130/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/2261850122934653130' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2261850122934653130'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2261850122934653130'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.html' title='न्यूजीलैण्ड टीम का साइकोलॉजिकल बैरियर'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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कि वह अब तक हुए मैचों में पांच विशेषज्ञ गेंदबाजों के साथ उतरे। इससे भारत के बल्लेबाजी क्रम की गहराई कम हुई और बल्लेबाजों के ऊपर विकेट बचाने का अतिरिक्त दबाव भी आया। सबसे ज्यादा दबाव में तो खुद कप्तान ही दिखे जिन्होंने कैरेबियाई टीम के खिलाफ 23 गेंदें झेल कर सिर्फ 11 रन बनाए। उनके अलावा गौतम गंभीर भी वह तेजी नहीं दिखा सके जिसके लिए वह जाने जाते हैं। ट्वंटी 20 मूलत: बल्लेबाजों का खेल है और यहां उन्हें खुलकर खेलने की आजादी मिलनी ही चाहिए। अगल विकेट बचाने का दबाव आया तो जाहिर है रन रेट कम होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भारत को फिर से सात बल्लेबाजों की थ्योरी अपनानी होगी। इसके लिए हरभजन या प्रज्ञान ओझा में से एक को अंतिम एकादश से बाहर कर दिनेश कार्तिक को टीम में शामिल करना होगा। यह मुश्किल फैसला हो सकता है लेकिन टीम के हित में ऐसा करना बेहद जरूरी हो गया है। साथ ही ईशांत शर्मा के स्थान पर प्रवीण कुमार को मौका दिया जाना चाहिए। प्रवीण आईपीएल में बेहद सफल रहे थे और वह जरूरत पडऩे पर कुछ रन भी बना सकते हैं। सुरेश रैना, युवराज सिंह, रोहित शर्मा और यूसुफ पठान मिलकर चार ओवर तो डाल ही सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके आलावा धोनी एक और बड़ी गलती जो कर रहे हैं वह है उनका बल्लेबाजी क्रम में ऊपर आना। पहले बांग्लादेश के खिलाफ हुए ग्रुप मैच में और फिर वेस्टइण्डीज के खिलाफ मैच में धोनी ने जरूरत से ज्यादा गेंदें व्यर्थ की। वनडे मैचों में संकट के समय उनकी ऐसी बल्लेबाजी तो जायज है लेकिन ट्वंटी 20 क्रिकेट में ऐसे प्रदर्शन से टीम को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। धोनी पिछले करीब दो साल निचले मध्यक्रम में बल्लेबाजी के लिए आते हैं और सिंगल, डबल के सहारे अपनी पारी को आगे बढ़ाते हैं। अब वह भले ही ऊपर बल्लेबाजी के लिए आ रहे हों लेकिन सिंगल-डबल वाली उनकी आदत गई नहीं। खुद नीचे आने के साथ-साथ उन्हें बल्लेबाजी क्रम में भी बदलाव करने चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंभीर के साथ ओपनिंग जिम्मेदारी यूसुफ पठान को सौंपी जाए। क्योंकि गंभीर अभी तक पुरानी रंगत में नहीं लौटे हैं ऐसे में यूसुफ के साथ रहने से टीम का रन रेट अच्छा रहेगा। तीसरे नंबर पर रैना और चौथे नंबर पर युवराज बल्लेबाजी करें। पांचवें नंबर पर रोहित शर्मा को मौका मिले। छठे नंबर पर कार्तिक और सातवें नंबर पर धोनी आएं। अगर धोनी यूसुफ को मध्य क्रम में इस्तेमाल करना चाहते हैं तो इरफान पठान से ओपनिंग कराई जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीम में सात बल्लेबाज होने से भारत को किसी बड़े स्कोर का पीछा करने में भी ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी। आश्चर्य की बात तो यह है कि जब भारत पिछले विश्व कप समेत तमाम टूर्नामेंट में इस फॉर्मूले के साथ कामयाब हुआ तो यहां इसमें बदलाव की क्या जरूरत थी। पांच गेंदबाजों की थ्योरी उस टीम के लिए अच्छी है जिसके पास क्वालिटी ऑलराउंडर हों लेकिन भारत के साथ ऐसा नहीं है। यहां तक ऑलराउंडरों से भरपूर दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड ने भी सात बल्लेबाजों के साथ उतरने पर ही भरोसा किया।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1763894804445366749/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/1763894804445366749' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1763894804445366749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1763894804445366749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_13.html' title='क्या इंग्लैण्ड के खिलाफ योजना बदलेंगे धोनी?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-4017704779831572006</id><published>2009-06-11T13:46:00.002+05:30</published><updated>2009-06-11T18:31:21.245+05:30</updated><title type='text'>धोनी और सहवाग में मनमुटाव नई बात नहीं</title><content type='html'>इस ट्वंटी 20 विश्व कप में भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और उप कप्तान वीरेन्द्र सहवाग के बीच मनमुटाव की अटकलों ने भारतीय टीम के शुरुआती प्रदर्शन से भी ज्यादा सुर्खियां बटोरी। अंततः चोटिल सहवाग वापस स्वदेश लौट गए और उनके स्थान पर दिनेश कार्तिक टीम इंडिया से जुड़ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी ने सहवाग के मुद्दे पर संवाददाता सम्मेलनों में जिस तरह जवाब दिया उससे मीडिया का इन दोनों के संबंध में खटास का अनुमान लगाना बिल्कुल जायज था। धोनी को इस पर गुस्सा होने की बजाय स्थिति साफ करनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हां उन्होंने अगले प्रेस कांफ्रेंस में पूरी टीम की यूनिटी परेड कराकर ड्रामेबाजी जरूर की। &lt;br /&gt;अब मुद्दे की बात की जाए। जिन लोगों को धोनी और सहवाग के बीच अनबन की खबर से अचरज हो रहा हो तो उन्हें पता होना चाहिए कि इन दोनों के संबंध कभी बहुत मधुर नहीं रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले ट्वंटी 20 विश्व कप को ही याद कीजिए। जिस फाइनल मुकाबले में भारत ने पाकिस्तान को हराकर खिताब जीता था उस मैच में धोनी ने सौ फीसदी फिट सहवाग को अंतिम एकादश में शामिल नहीं किया था। इसके अलावा भी उन्होंने इस टूनार्मेंट के एक और मैच में भी सहवाग को टीम में नहीं लिया था। इसके बाद भी धोनी ने आगे हुए कई मैचों में सहवाग को टीम में शामिल नहीं किया। इस बीच सहवाग ने भारतीय टेस्ट टीम में भी अपनी जगह गंवा दी। हालांकि तब धोनी टेस्ट टीम के कप्तान नहीं थे। भारतीय टीम के 2007-08 के आस्ट्रेलियाई दौरे पर तत्कालीन कप्तान अनिल कुम्बले सहवाग की टेस्ट टीम में वापसी कराई। पर्थ के ऐतिहासिक टेस्ट में दो छोटी लेकिन अच्छी पारियां खेलने के बाद सहवाग ने एडीलेड टेस्ट में शानदार शतक जड़ा और वह इसके बाद त्रिकोणीय वनडे सीरीज में भी टीम में लौट गए। लेकिन तब तक भी धोनी का सहवाग पर पूरा भरोसा नहीं जमा था और उन्होंने कुछ मैचों में उन्हें अंतिम एकादश में नहीं रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी का सहवाग पर अविश्वास करने की जो प्रमुख कारण हैं उनमें एक सहवाग का फिटनेस पर पूरा ध्यान नहीं देना भी है। साथ ही वह बल्लेबाजी के वक्त कई बार गैर जिम्मेदार भी हो जाते हैं। लेकिन यही सबसे बड़ी वजह नहीं जान पड़ती है। यह ऐसा बहाना लगता है जिसे धोनी सहवाग के खिलाफ इस्तेमाल करने की ताक में रहते हैं। नहीं तो धोनी उस आर.पी.सिंह के पक्ष में कप्तानी से इस्तीफा देने की धमकी कैसे दे दते जिनकी फिटनेस और फील्डिंग टीम में सबसे खराब है (यह वाकया कुछ दिनों पहले ही हुआ था जब चयनकर्ताओं ने आरपी के स्थान पर इरफान पठान को टीम में रखा था और धोनी नाराज हो गए थे)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहवाग-धोनी के अनबन के पीछे सबसे बड़ा कारण सहवाग का उपकप्तान होना है। अगर धोनी काफी लोकप्रिय हैं तो सहवाग उनसे पीछे नहीं। धोनी अगर चतुर कप्तान माने जाते हैं तो यह खूबी सहवाग में भी है (हालांकि पिछले एक-दो अवसरों पर मिले मौकों को नहीं भुना सके)। सहवाग से पहले धोनी के परम मित्र युवराज सिंह टीम के उप कप्तान थे। लेकिन एक समय उन्होंने टीम पर ध्यान देने से ज्यादा अन्य बातों को तरजीह देना शुरू कर दिया था लिहाजा चयनकर्ताओं ने उनकी उपकप्तानी छीन ली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा यह भी जा रहा है कि सहवाग ने अपनी चोट छिपाई लेकिन इस तर्क में दम नजर नहीं आ रहा है। सहवाग आईपीएल टूर्नामेंट से ही चोटिल हैं और यह बात तह उन्होंने छिपाई नहीं थी। वह इस चोट के कारण दिल्ली डेयर डेविल्स के लिए कई मैच नहीं खेल पाए थे। यह भले हो सकता है कि भारतीय टीम के फीजियो ने सहवाग की चोट का गलत आकलन किया हो। उन्हें लगा कि सहवाग जल्द ठीक हो जाएंगे लेकिन वह नहीं हुए। ऐसा तो होता रहता है। जहीर खान के साथ भी ऐसा ही हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामला यह भी है कि सहवाग आजकल सलामी बल्लेबाजी नहीं करना चाहते हैं और यह बात धोनी को पसंद नहीं। सहवाग की इच्छा नंबर तीन पर बल्लेबाजी करने थी लेकिन धोनी ने खुद नंबर तीन पर आना शुरू कर दिया। यह बात अलग है कि आईपीएल में उन्होंने अपनी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के लिए सुरेश रैना को नंबर तीन का जिम्मा सौंपा था जिसमें वह काफी सफल भी रहे थे। यही रैना इस विश्व कप में अब तक ठीक से अभ्यास भी नहीं कर पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी निंसदेंह अच्छे कप्तान रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने गलत कदम उठा दिया है। सहवाग मुद्दे को वह काफी व्यक्तिगत स्तर पर ले जा रहे हैं जिससे आगे चलकर उनका और टीम का ही नुकसान होने वाला है।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/4017704779831572006/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/4017704779831572006' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4017704779831572006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4017704779831572006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_11.html' title='धोनी और सहवाग में मनमुटाव नई बात नहीं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6676523209741618362</id><published>2009-06-07T14:05:00.003+05:30</published><updated>2009-06-07T19:08:29.566+05:30</updated><title type='text'>देश के नाम पर</title><content type='html'>खेल की दुनिया में ‘प्रोफेसनल अप्रोच’ का बड़ा महत्व है। यानी आप चाहे देश के लिए खेलें या किसी क्लब के लिए अपना शत प्रतिशत योगदान दें। विश्व में विभिन्न खेलों के कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो इस ‘प्रोफेसनल अप्रोच’ वाले मंत्र को गहरे आत्मसात किए होते हैं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो देश के लिए कमतर और क्लब के लिए बेहतर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन भारत के कुछ खिलाड़ी ऐसे हैं जिनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तभी सामने आता है जब वे देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हों। टेनिस में लिएंडर पेस और क्रिकेट में सौरव गांगुली कुछ ऐसे ही नाम हैं। मौजूदा समय में युवराज सिंह और वीरेन्द्र सहवाग भी ऐसे ही क्रिकेटर हैं जिनका असली रंग तभी निखरता है जब हो तिरंगे के नीचे खेल रहे हों न कि किंग्स इलेवन पंजाब या दिल्ली डेयर डेविल्स के झंडे तले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही संपन्न इंडियन प्रीमियर लीग के दूसरे संस्करण में यह दोनों बल्लेबाज कुछ खास नहीं कर पाए। लेकिन ट्वंटी 20 विश्व कप में भारत के पहले ही मैच में युवराज फॉर्म में लौट आए। उनके 18 गेंदों पर चार छक्कों की मदद से बनाए 41 रन ने बांग्लादेश के उटलफेर की सारी मंशाओं पर पानी फेर दिया। सहवाग चोटिल होने के कारण इस मैच में नहीं खेल सके लेकिन इतना तय है कि मौका मिलने पर वह भी आईपीएल के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के नाम पर अच्छा खेलने की इन खिलाड़ियों की इस खासियत से चयनकर्ता भी परिचित हैं। तभी तो घरेलू क्रिकेट में इनके औसत प्रदर्शन के बावजूद इन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जौहर दिखाने का मौका मिलता रहता है। याद कीजिए भारत के पिछले आस्ट्रेलियाई दौरे के लिए सहवाग की वापसी को। उस समय सहवाग भारतीय टीम से बाहर थे और उन्होंने उन दिनों में घरेलू क्रिकेट में भी कोई कमाल नहीं दिखाया था। लेकिन तात्कालीन कप्चान अनिल कुम्बले की मांग पर सहवाग टीम में वापस आए। इसके बाद जो हुआ वह अपने आप में इतिहास है। युवराज के साथ भी ऐसा ही है। पंजाब की रणजी टीम या किंग्स इलेवन पंजाब के लिए उन्होंने अब तक कोई ऐसी पारी नहीं खेली है जिसे दर्शक लम्बे समय तक याद रखें। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्होंने कई कभी न भूलने वाली पारियां खेली हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण नजर आता है वह यह है कि भारत और भारतीयों को  अच्छा करने की प्रेरणा प्रोफेशनल कारणों से नहीं बल्कि इमोशनल कारणों से मिलती है। जाहिर है जो भावनात्मक उबाल देश के नाम पर आ सकता है वह क्लब या राज्य के नाम पर नहीं आ सकता है।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6676523209741618362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/6676523209741618362' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6676523209741618362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6676523209741618362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='देश के नाम पर'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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बल्लेबाजों की मजबूती जग जाहिर है लेकिन न्यूजीलैण्ड के कप्तान डेनियल विटोरी जो खुद भी एक उम्दा लेफ्ट आर्म स्पिनर हैं भारतीयों के खिलाफ उसी के हथियार के इस्तेमाल की रणनीति अपना रहे हैं। भारतीय टीम जब न्यूजीलैण्ड रवाना हुई तब उसे सबसे ज्यादा डर वहां की उछाल और स्विंग की मददगार पिचों से था। स्पिन की चुनौती की उम्मीद तो उसे बिल्कुल भी नहीं रही होगी। लेकिन जब रफ्तार की योजना फेल हो गई तो कीवियों के कप्तान ने भारतीयों को फिरकी के जाल में फांसने की योजना बनाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीम इंडिया के बल्लेबाजों को यह बात टेस्ट मैच शुरू होते ही समझ जानी चाहिए थी क्योंकि न्यूजीलैण्ड इस मैच में दो स्पिनरों (विटोरी और जीतन पटेल) के साथ उतरा था। वहीं भारतीय थिंक टैंक ने सिर्फ एक स्पिनर (हरभजन सिंह) को खिलाने का फैसला किया। अब विटोरी का यह फैसला रंग लाता दिख रहा है। इसे कम से कम शुरुआती सफलता तो मिल ही गई। वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर दोनों ही स्पिन के खिलाफ धाकड़ खिलाड़ी माने जाते हैं लेकिन ये दोनों खुद को विटोरी के बुने जाल में फंसने से नहीं रोक सके। सहवाग विटोरी को लगातार दूसरा छक्का जडऩे के प्रयास में विकेटकीपर ब्रैंडन मैकुलम को कैच थमा बैठे तो गंभीर इन फील्ड के ऊपर से शॉट खेलने के प्रयास में पटेल का शिकार बन गए। नाइट वाचमैन ईशांत शर्मा ने कुछ देर तो हौसला दिखाया लेकिन शाम ढलते-ढलते विटोरी ने उन्हें भी पैवेलियन में हवा खाने भेज दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब स्पिन के खिलाफ भारतीयों की प्रतिष्ठा दाव पर है। सचिन और राहुल द्रविड़ क्रीज पर हैं जबकि अगला नंबर वीवीएस लक्ष्मण का है। ये सभी स्पिन के खिलाफ धुरंधर बल्लेबाज हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि वे भारत को संकट से उबार ले जाएंगे। लेकिन भारत अभी भी कीवी टीम से पहली पारी के आधार पर 500 से ज्यादा रनों से पीछे है और इसका दबाव इन बल्लेबाजों पर भी पड़ सकता है। मैच के तीसरे दिन भारतीय किस तरह इस चुनौती का सामना करते हैं यह देखने वाली बात होगी।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/935812138701552017/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/935812138701552017' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/935812138701552017'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/935812138701552017'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='टीम इंडिया पर उसी के हथियार से हमला'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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इंडिया शीर्ष पर पहुचेगी लेकिन मौजूदा हालत में यह गद्दी दक्षिण अफ्रीका को मिलने वाली है. यह भले ही हो सकता है कि भारत नंबर २ पर बना रहे और ऑस्ट्रेलिया नए साल में तीसरे या चौथे पायदान पर खिसक जाए. भारत टेस्ट में वर्ष २००९ में नंबर एक नही बनने वाला. इसके पीछे २ कारण हैं. पहला इस साल भारत महज सात टेस्ट मैच खेलेगा. इनमे से दो न्यूजीलैंड के साथ, तीन श्रीलंका के साथ और दो बांग्लादेश के साथ. ये तीन टीम आईसीसी रैंकिंग में इतना पीछे है कि भारत को इन्हे हरा कर भी ज्यादा अंक नही मिलने वाला. अगर दक्षिण अफ्रीका ऑस्ट्रेलिया को हरा कर नंबर एक बनता है तो उस समय उसके और भारत के बीच करीब १४ अंक का फासला होगा. इस फासले को कम करने के लिए हमारे पास अगले साल ज्यादा मौके नही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीँ दक्षिण अफ्रीका भी अगले साल केवल आठ टेस्ट मैच ही खेलेगा लेकिन ये मैच वह ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी अच्छी रैंकिंग वाली टीमों के खिलाफ खेलेगा. अफ्रीकी टीम अगर जीत जाती है तो वह भारत से अपना अन्तर और बढ़ा लेगी. यदि वह हार जाती है तो उसे हराने वाली टीम (ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड) भारत के बराबर या आगे निकल जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही माजरा सचिन तेंदुलकर के सर्वाधिक टेस्ट शतक के रिकॉर्ड के साथ भी दिख रहा है. वह अभी तक ४१ शतक जमा चुके हैं. दूसरे स्थान पर कायम पोंटिंग ने ३७ शतक ठोके हैं. वहीँ ऑस्ट्रेलिया को २००९ में कम से कम १२ टेस्ट खेलने हैं. अगर वो पाकिस्तान के खिलाफ खेलती है उसके टेस्ट मैचों कि संख्या १५ हो जायेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑस्ट्रेलिया को दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ उछालभरी पिचों पर खेलना है. इन प्रतिद्वंदियों और इन पिचों पर पोंटिंग को बल्लेबाजी करना पोंटिंग को खूब रास आता है. इसका उदहारण हमने अभी चल रहे मेलबर्न टेस्ट में भी देखा. आउट ऑफ़ फॉर्म चल रहे पोंटिंग ने अफ्रीकी टीम के ख़िलाफ़ पहली पारी में शतक ठोका तो दूसरी पारी में वह सिर्फ़ एक रन से शतक चूक गए. अफ्रीका के ख़िलाफ़ वह पहले भी एक टेस्ट में दो शतक ज़माने का कारनामा कर चुके है. तो कोई ताज्जुब न हो अगर अगले साल पोंटिंग टेस्ट शतकों के मामले में सचिन से आगे निकल जाए. पोंटिंग टेस्ट रनों के मामले में भी सचिन से करीब १८०० रन पीछे हैं अगले साल यह अन्तर भी कम हो जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर रिकॉर्ड बनते ही टूटने के लिए हैं लेकिन जिस तरह हमारा बोर्ड टेस्ट क्रिकेट पर कम ध्यान देता है वह चिंता का कारण है. सचिन १९८९ से खेल रहे हैं और उन्होंने तब से अब तक १५५ टेस्ट खेले. जबकि पोंटिंग १९९५-१९९९६ से खेलने के बावजूद १२९ टेस्ट खेल चुके हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ अगले साल भारत को एक दिवसीय मैचों कि कमी नही होने वाली. हम बांग्लादेश से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक सबसे भिडेंगे और करीब ४० मैच खेलेंगे. जहाँ तक २०-२० कि बात है तो इसका दूसरा विश्व कप २००९ के मई में इंग्लैंड में होगा ही. आईपीएल के मजे तो मिलेंगे ही.</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6940733051892705192/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/6940733051892705192' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6940733051892705192'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6940733051892705192'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/12/blog-post_29.html' title='भारत और सचिन के पास मौके कम हैं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2762614775518250895</id><published>2008-12-28T17:02:00.003+05:30</published><updated>2008-12-28T17:36:22.018+05:30</updated><title type='text'>आने वाले दिनों में यह नाम बहुत सुनाई देगा, &#39;जीन पॉल डुमनी&#39;</title><content type='html'>दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम को वर्षों से एक ऐसे बल्लेबाज़ की तलाश थी जो संकट के समय अच्छी पारी खेल सके. जो उस दबाव को झेल सके जिसके आगे दक्षिण अफ्रीकी टीम और दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज़ घुटने टेक देते हैं. एक ऐसा खिलाड़ी जो ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ अच्छा खेल दिखा सके और टीम को न सिर्फ़ जीत के करीब ले जाए बल्कि जीत दिला भी दे. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मौजूदा सीरीज के पहले दो मैचों को देखने से लगता है जीन पॉल डुमनी नाम के बाएं हाथ के बल्लेबाज़ ने क्रिकेट जगत में चोकर माने जाने वाली अफ्रीकी टीम की तलाश को पूरा कर दिया है.  &lt;br /&gt;पर्थ में अफ्रीका की ऐतिहासिक जीत में डुमनी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने अपने टीम की दूसरी पारी में न सिर्फ़ अर्धशतक जमाया बल्कि डिविलियर्स के साथ नाबाद शतकीय शाझेदारी भी निभाई. मेलबर्न टेस्ट में भी उन्होंने दक्षिण अफ्रीका को पहले फोलोऑन के खतरे से बाहर निकाला फिर आखिरी तीन बल्लेबाजों के साथ मिलकर २७५ रन जोर डाले. उन्होंने ख़ुद १६६ रनों के शानदार पारी खेली. अपने दूसरे ही टेस्ट में ऐसा प्रदर्शन कबीले तारीफ है.&lt;br /&gt;वैसे तो दक्षिण अफ्रीका के बहुत से बल्लेबाज अच्छे हैं लेकिन उनमे दबाव के क्षणों में खासकर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ संकट के पलों में टूट जाने प्रवृति होती होती है. इस पैमाने पर डुमनी बिल्कुल जुदा हैं. &lt;br /&gt;डुमनी की बल्लेबाजी शैली भी ऐसी है जो उन्हें सभी टीमों के ख़िलाफ़ और सभी तरह की परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन करने में मदद देगी. उनका फुटवर्क बेहतरीन हैं और वो क्रीज का पूरा इस्तेमाल करते हैं. इससे उन्हें स्पिन और तेज दोनों तरह के गेंदबाजों को खेलने में सहूलियत होती है.&lt;br /&gt;डुमनी की सबसे बड़ी खासियत उनका शानदार टेम्परामेंट है. उनको खेलते देख लगता ही नही है कोई बात उन्हें विचलित कर सकती है. वो ऐसे बल्लेबाज लगते हैं जिन्हें अपनी योग्यता पर पूरा विश्वास है और वो कभी भी भ्रम की स्थिति में में नही दिखते. &lt;br /&gt;उम्र भी डुमनी के साथ है. २४ साल के डुमनी लंबे समय तक दक्षिण अफ्रीका की सेवा कर सकते हैं. साथ ही अब जब की पिछली पीढी के ज्यादातर बल्लेबाज सन्यास ले चुके हैं या लेने वाले हैं ऐसे में भारत के गौतम गंभीर की ही तरह आप डुमनी का नाम लंबे समय तक सुनेंगे.</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2762614775518250895/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/2762614775518250895' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2762614775518250895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2762614775518250895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/12/blog-post_28.html' title='आने वाले दिनों में यह नाम बहुत सुनाई देगा, &#39;जीन पॉल डुमनी&#39;'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2641880138322599589</id><published>2008-12-25T16:34:00.002+05:30</published><updated>2008-12-26T16:02:09.945+05:30</updated><title type='text'>टीम इंडिया सबसे अच्छी टीम नही, अच्छी टीमों में से एक है</title><content type='html'>ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ घरेलू टेस्ट सीरीज में मिली जीत के बाद इस बात की चर्चा काफ़ी तेज हो गई कि भारत टेस्ट क्रिकेट में दुनिया कि सबसे अच्छी टीम है. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मिली जीत ने इस धारणा को और भी बल दिया. लेकिन क्या असल में ऐसा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ष २००८ को भारतीय क्रिकेट के सबसे अच्छे सालों में गिना जा रहा है. लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इस वर्ष हमने पाँच टेस्ट सीरीज़ खेली जिसमे २ में जीते २ में हारे और एक बराबरी पर छूटी. जो २ सीरीज़ हमने जीती वह अपने घर में जीती. ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका में हमें हार ही मिली. दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ घरेरू सीरीज हम जीत नही पाए. यह १-१ से बराबर रही. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हमने टेस्ट क्रिकेट में वैसा ही प्रदर्शन किया जैसा पहले करते आ रहे थे. घर में जीते और बाहर हारे. हाँ अब हम विदेशी जमीनों पर पहले कि तुलना में ज्यादा अच्छा खेल दिखा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत लोगों का तर्क हो सकता है कि जो २ सीरीज हमने गवाई उसमे महेंद्र सिंह धोनी कप्तान नही थे. लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ के अगर इंग्लैंड के खिलाफ मोहाली कुंबले में कप्तान होते और वो मैच अनिर्णीत होता तो सब यही कहते कि अगर धोनी होता तो वह जीत के लिए खेलता. लेकिन धोनी ने भी मैच बचने को प्राथमिकता दी न कि २-० से जीत को. इसमे गलती धोनी कि नही. इसमे दोष उस भारतीय क्रिकेट परम्परा कि है जो आक्रमण से ज्यादा रक्षा में यकीन करता है. मेरे कहने का यही मतलब है कि श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया में अगर कप्तान कोई दूसरा भी होता तो परिणाम यही आते.&lt;br /&gt;आज ऑस्ट्रेलिया कमजोर हो गई है तो इसलिए कि उसे मक्ग्राथ और वार्ने का विकल्प नही मिला. ये दोनों टेस्ट क्रिकेट में उसके सबसे बड़े मैच विनर थे. भारत का सबसे बड़ा मैच विनर कुंबले सन्यास ले चुका है और राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर भी जल्दी ही जा सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग फिर कह सकते हैं कि कुंबले के संन्यास और द्रविड़ के ख़राब फॉर्म के बावजूद हमने मैच जीते. लेकिन सनद रहे कि हमने यह मैच भारत में जीते. भारत कि पिचों पर हरभजन सिंह, अमित मिश्रा भी विकेट लेते हैं और यहाँ धोनी और युवराज भी रन बनाते हैं. लेकिन ये गेंदबाज और ये बल्लेबाज विदेशी पिचों पर टेस्ट क्रिकेट में अब तक कोई कमाल नही दिखा सके हैं.&lt;br /&gt;इस साल भारत में मिली जीतों के अलावा हमें २ और जीत मिली एक पर्थ में और एक श्रीलंका में. इन दोनों जगहों पर मिली सफलता में एक फैक्टर कॉमन रहा वह है वीरेंदर सहवाग. सहवाग ने पर्थ में ज्यादा रन तो नही बनाये लेकिन अच्छी शुरुआत दी. और ३ कीमती विक्केट भी झटके. श्रीलंका में भी उनके दोहरे शतक ने हमारी नैया पार लगाई. निसंदेह सहवाग एइसे खिलारी हैं जो अगर चल गए (अक्सर वो चलते भी हैं) तो वह दुनिया के किसी आक्रमण की दुनिया कि किसी भी पिच पर बखिया उधेर सकते हैं और आपके लिए मैच जीत सकते हैं. लेकिन सिर्फ़ सहवाग के बल पर आप नंबर एक नही हो सकते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है आप भारतीय क्रिकेट टीम के बहुत बारे प्रशंसक हों और आप कहें की हमारे पास गौतम गंभीर, ज़हीर खान, इशांत शर्मा जैसे शानदार खिलाड़ी भी हैं. बिल्कुल ये शानदार और विश्वस्तरीय खिलारी हैं. लेकिन क्या ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और श्रीलंका के पास ऐसे ही शानदार खिलाड़ी नही हैं? बिल्कुल हैं. और यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया कि बादशाहत ख़त्म होने के बाद कोई भी टीम यह दावा नही कर सकती वो नंबर १ है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्रिकेट में सत्ता बहुकेंद्रित हो गई है. और अलग-अलग कंडिशन्स में अलग-अलग टीमें नंबर एक प्रतीत होगी. इसमे हमारी टीम भी बहुत अच्छी है और वह दुनिया कि ३-४ बेहतरीन टीमों में से एक है.</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2641880138322599589/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/2641880138322599589' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2641880138322599589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2641880138322599589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='टीम इंडिया सबसे अच्छी टीम नही, अच्छी टीमों में से एक है'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-671477113972066190</id><published>2008-07-07T16:44:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:18.958+05:30</updated><title type='text'>चींटी, मोहम्मद गौरी और अब राफेल नडाल</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEilmCR_ZenR8D7eXQ-GxoztfAq25QJ4PXUjD08sZKVXeuEo93LFIYDOh5UzqhxqA59GV0XDvALzueBw72A5Ajw7QtGtX0u4NW760m_IbnIdiz5oR47WQa29d1Fm9Be9_xWOiTjY-1eMaLnx/s1600-h/nadal1.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEilmCR_ZenR8D7eXQ-GxoztfAq25QJ4PXUjD08sZKVXeuEo93LFIYDOh5UzqhxqA59GV0XDvALzueBw72A5Ajw7QtGtX0u4NW760m_IbnIdiz5oR47WQa29d1Fm9Be9_xWOiTjY-1eMaLnx/s200/nadal1.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5220230321615394642&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि मोहम्मद गौरी जब पृथ्वीराज चौहान से युद्ध में बुरी तरह पराजित होने के बाद मायूस होकर बैठा था तो उसने देखा कि एक चींटी बार-बार दीवार पर चढ़ने का प्रयास कर रही है। कई बार चींटी ने अपनी चढ़ाई लगभग पूरी कर ली लेकिन वह फतह करने से पहले फिसल कर गिर जाती थी। लेकिन इससे चींटी का हौसला नहीं टूटा और वह आखिरकार दीवार पर चढ़ ही गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चींटी के इस हौसले ने गौरी की हिम्मत बढ़ाई और वह भी आखिरकार पृथ्वीराज को हराने में कामयाब रहा। उस चींटी और मोहम्मद गौरी की ही तरह अथक प्रयास के बाद कामयाबी की एक और दास्तान स्पेन के टेनिस खिलाड़ी राफेल नडाल ने भी लिखी है। वर्ष 2006 और 2007 में भी वह टेनिस के सबसे प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट विंबलडन की पुरुष एकल स्पर्धा के फाइनल में पहुंचे थे लेकिन दोनों ही बार उन्हें ग्रास कोर्ट के बादशाह रोजर फेडरर ने टिकने नहीं दिया। कोई और खिलाड़ी होता तो शायद हौसला हार चुका होता लेकिन नडाल भी उस चींटी और गौरी की तरह जिद पर अड़ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार को उन्होंने विंबलडन इतिहास के सबसे लंबे फाइनल मुकाबले में सरताज फेडरर को बेताज कर ही दिया। इस मैच में भी ऐसे मौके आए जब लगने लगा कि शायद फेडरर फिर बाजी मार जाएं लेकिन नडाल अपने प्रतिद्वंदी की आभा के सामने फीके नहीं पड़े। जिस तरह गौरी ने पृथ्वीराज की कमजोरी पर हमला किया उसी तरह नडाल ने भी फेडरर की कमजोरी यानी बैकहैंड को निशाना बनाया। यह सबको मालूम है कि फेडरर के फॉरहैंड को झेलना आसान नहीं है इसलिए नडाल ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि स्विट्जरलैंड का यह चमत्कारी खिलाड़ी ज्यादा से ज्यादा बैकहैंड खेलने पर मजबूर हो जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैच के दौरान बारिश भी हुई। विंबलडन में पिछले पांच साल का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि अगर फेडरर अच्छा न खेल पा रहे हों और बारिश हो जाए यह उनके लिए फायदे का सौदा साबित होता है। चार साल पहले इसी विंबलडन के फाइनल में फेडरर के सामने अमेरिका के एंडी रोडिक थे। रोडिक ने पहला सेट जीत लिया और दूसरे में भी वह आगे थे कि तभी बारिश शुरू हो गई। बारिश के बाद जब मैच शुरू हुआ तो फेडरर बिल्कुल बदले हुए नजर आए। उन्होंने फिर अमेरिकी खिलाड़ी को दूसरा मौका नहीं दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास को खुद को दोहराने की बड़ी जिद होती है और कल भी बारिश के बाद जब खेल शुरू हुआ तो लगा कि इतिहास एक बार फिर अपनी यह जिद पूरी कर लेगा। बारिश से पहले नडाल दो सेट जीत चुके थे लेकिन बारिश के बाद के खेल में फेडरर ने लगातार दो सेट जीतकर मैच में जबरदस्त वापसी कर ली। खैर अंत में नडाल की खिताब जीतने की जिद इतिहास की जिद पर भारी पड़ी और विंबलडन के छह साल बाद नया चैंपियन मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही फेडरर की यह हार उनके लिए और उनके प्रशंसकों के लिए काफी दुखदायी रही हो लेकिन टेनिस के लिए यह बहुत अच्छा हुआ। पिछले दो साल से फेडरर जिस तरह का प्रदर्शन कर रहे थे उससे कोर्ट पर एक खिलाड़ी की मोनोपोली बनती जा रही थी। हालांकि नडाल फ्रेंच ओपन जरूर जीत रहे थे लेकिन बाकी जगहों पर सिर्फ फेडरर और फेडरर ही थे। खास तौर पर ग्रास कोर्ट पर होने वाले टूर्नामेंटों में तो ऐसा लगता था कि बाकी खिलाड़ी महज औपचारिकता पूरी करने आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जब घास पर फेडरर की बादशाहत छिन चुकी है तो अगले वर्ष क्ले पर नडाल को भी फेडरर से और कड़ी चुनौती मिलेगी। फेडरर फ्रेंच ओपन (जिसे नडाल का गढ़ माना जाता है) जीतकर हिसाब बराबर करने की कोशिश करेंगे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि नडाल की यह जीत टेनिस में प्रतिद्वंदिता को और बढ़ाएगी। वैसे यह प्रतिद्वंदिता सिर्फ फेडरर और नडाल के बीच तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। सर्बिया के नोवाक जोकोविच पिछले एक-डेढ़ साल से इन दोनों की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। साथ ही रूस के मरात साफिन भी लय में लौटने लगे हैं। जब साफिन रौ में होते हैं तो उन्हें रोक पाना अच्छे अच्छों के बस के बाहर की बात होती है।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/671477113972066190/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/671477113972066190' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/671477113972066190'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/671477113972066190'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='चींटी, मोहम्मद गौरी और अब राफेल नडाल'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEilmCR_ZenR8D7eXQ-GxoztfAq25QJ4PXUjD08sZKVXeuEo93LFIYDOh5UzqhxqA59GV0XDvALzueBw72A5Ajw7QtGtX0u4NW760m_IbnIdiz5oR47WQa29d1Fm9Be9_xWOiTjY-1eMaLnx/s72-c/nadal1.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1520535613178432042</id><published>2008-06-27T18:39:00.001+05:30</published><updated>2008-06-27T18:44:09.131+05:30</updated><title type='text'>एक देश जहां क्रिकेट खात्मे के कगार पर है</title><content type='html'>1983 विश्व कप शुरू होने से पहले जिन देशों से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी उसमें आश्चर्यजनक रूप से एक नाम जिम्बाब्वे का भी था। जिम्बाब्वे ने वाकई उस विश्व कप में अच्छा खेल दिखाया। हालांकि यह टीम सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सकी लेकिन उसने लीग मैचों में आस्ट्रेलिया को जरूर मात दे दी। इसका सीधा फायदा भारत को मिला और आगे जो हुआ वह भारतीय क्रिकेट के इतिहास में सबसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह 1999 में विश्व कप में इसी जिम्बाब्वे ने भारत को हराकर उसकी उम्मीदों पर तुषारापात किया था। 2003 विश्व कप में जिम्बाब्वे की टीम सुपर स्किस में पहुंची थी। 1993 में टेस्ट दर्जा पाने वाली जिम्बाब्वे ने क्रिकेट के इस पारंपरिक स्वरूप में भी अच्छी सफलता प्राप्त की। भारत के खिलाफ हुए अपने पहले टेस्ट को ड्रा करा जिम्बाब्वे उन चुनिंदा टीमों में शामिल हो गई जिसने अपना मैच गंवाया न हो। बाद में जिम्बाब्वे ने भारत और पाकिस्तान जैसी टेस्ट टीमों को मात भी दी। यह एक ऐसी उपलब्धि है जो बांग्लादेश इतने मैच खेलकर भी हासिल नहीं कर पाया है। इतना ही नहीं यहां का एक बल्लेबाज एंडी फ्लावर जिसके नाम से आप अच्छी तरह परिचित होंगे एक समय आईसीसी टेस्ट बल्लेबाजों की सूची में शीर्ष पर कायम था। इसके पूर्व कप्तान हीथ स्ट्रीक की गिनती दुनिया के चुनिंदा ऑलराउंडरों में होती थो पॉल स्ट्रांग को अब तक क्रिकेट खेल चुके 10 बेहतरीन लेग स्पिनरों में से एक माना जाता था। इसी जिम्बाब्वे ने डेविड हाटन और अली शाह जैसे उम्दा बल्लेबाज भी दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अफसोस कभी क्रिकेट जगत में मजबूत पहचान बनाने का माद्दा रखना रखने वाला जिम्बाब्वे क्रिकेट आज खात्मे की कगार पर है। राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे की नस्लभेदी नीतियों की वजह कई प्रतिभाशाली क्रिकेटर वहां से पलायन कर गए। टीम बेहद कमजोर हुई और आईसीसी ने उसे टेस्ट खेलने से प्रतिबंधित कर दिया। हालांकि जिम्बाब्वे आईसीसी का पूर्णकालिक सदस्य बना रहा और उसे आईसीसी टूर्नामेंटों के जरिए मोटी रकम का मिलना भी जारी रहा। वेस्टइंडीज में हुए पिछले विश्व कप में बेहद घटिया प्रदर्शन के बावजूद जिम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड को करीब 50 करोड़ रुपये का लाभ हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आईसीसी के सदस्य देशों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि जिम्बाब्वे की पूर्णकालिक सदस्यता खत्म की जाए। कई सदस्य देशों का आरोप है कि जिम्बाब्वे आईसीसी से मिलने वाली रकम का सही इस्तेमाल नहीं कर रहा है और उसकी टीम इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने लायक नहीं रही। इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तो काफी समय से जिम्बाब्वे की राजनीतिक स्थिति बदतर होने के कारण उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। कभी जिम्बाब्वे का कट्टर समर्थक माने जाने वाले दक्षिण अफ्रीका ने भी अपने इस पड़ोसी देश के साथ सभी प्रकार के क्रिकेट संबंध खत्म करने की बात कही है। इंग्लैंड ने भी 2009 में प्रस्तावित अपना जिम्बाब्वे दौरा रद कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि जिम्बाब्वे को अभी भी दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई से समर्थन मिलना जारी है। बीसीसीआई का कहना है कि क्रिकेट और राजनीति को आपस में नहीं मिलाना चाहिए। उम्मीद है कि अगले आईसीसी बैठक में भारत फिर जिम्बाब्वे का समर्थन करे। जिम्बाब्वे को समर्थन देने के पीछे बीसीसीआई की वोट बैंक पालिसी भी बहुत हद तक जिम्मेवार है। याद कीजिए 1996 का विश्व कप जो भारत-पाकिस्तान-श्रीलंका में आयोजित हुआ था। इस विश्व की मेजबानी को लेकर इन एशियाई देशों को इंग्लैंड से कड़ी चुनौती मिल रही थी। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और वेस्टइंडीज भी इंग्लैंड का समर्थन कर रहे थे। लेकिन तब जिम्बाब्वे ने दक्षिण अफ्रीका के साथ एशियाई देशों को अपना समर्थन दिया और यह विश्व कप भारत-पाकिस्तान-श्रीलंका में हो सका। इसी तरह 2011 विश्व कप की मेजबानी के लिए भी जिम्बाब्वे ने भारत का समर्थन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सवाल यह उठता है कि वोट बैंक पालिसी के कारण क्या बीसीसीआई को जिम्बाब्वे के बुरे हालातों को नजरअंदाज कर देना चाहिए। रंगभेद तो रंगभेद है चाहे गोरों के खिलाफ हो या कालों के खिलाफ उसका विरोध होना चाहिए। रंगभेद ही नहीं जिम्बाब्वे क्रिकेट में भ्रष्टाचार का भी बोलबाला है। साथ ही वहां की टीम भारत की किसी रणजी टीम को भी हरा पाने का माद्दा नहीं रखती। अगर बीसीसीआई जिम्बाब्वे का समर्थन करती है तो इससे वहां की क्रिकेट बेहतर होने की बजाए और बदतर होगी। अगर किसी को गलती का अहसास न कराया जाए तो वह सुधरेगा कैसे। अब बीसीसीआई का फर्ज है कि वह जिम्बाब्वे क्रिकेट की बेहतरी में कदम उठाए और अगर आईसीसी में जिम्बाब्वे की पूर्णकालिक सदस्यता खत्म करने के लिए वोटिंग होती है तो इस वोटिंग के पक्ष में मतदान करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे क्या होगा? जिम्बाब्वे आईसीसी का पूर्णकालिक सदस्य होने की बजाय फिर से एक एसोसिएट देश रह जाएगा। उसे अपनी गलतियों का अहसास होगा और वह फिर से अपनी जड़े मजबूत करने की कोशिश करेगा। इन सब से आखिर में क्रिकेट का ही भला होगा और दर्शक एकतरफा मुकाबला देखने से बच जाएंगे।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1520535613178432042/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/1520535613178432042' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1520535613178432042'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1520535613178432042'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_27.html' title='एक देश जहां क्रिकेट खात्मे के कगार पर है'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgXYs4LCAeGl3QsNpNsALV-_Wjvaq5MBY0cUSRca4KA7jBiGmjnBsUZtP1XlzWuwJzOqI-j1IZ5T0Z0w60yvmXkjly_xnTJWmekH-nm3XvDxssHiKXQpokbk_IpkrqbJQ/s220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6941667209383911738</id><published>2008-06-26T16:32:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:19.144+05:30</updated><title type='text'>कहां गई कोलिंगवुड की खेल भावना</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgGP0JqedyRUMGDpINICoFGj52FFLA3rEsqr6z_AqoTIJk6Zu32OojzDhxzRWScCjozjtcAtUyYihKDjmBrb2n-XeiBdeqXARxCfmZeW2gjjI9p6Dk1Cxyim8TUOKX-ZAYgf1TvOLEXjBYw/s1600-h/collision.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; 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इलियट बीच पिच पर गिर गए। फील्डर इयान बेल ने गेंद थ्रो की और यह जानने के बावजूद कि इलयिट उनके गेंदबाज साइडबाटम से टकराने की वजह से क्रीज पर गिरे हैं केविन पीटरसन ने उन्हें रन आउट कर दिया। अंपायर मार्क बेंसन ने स्थिति की नजाकत को भांपते हुए इंग्लिश कप्तान पॉल कोलिंगवुड को अपील वापस ले लेने की सलाह दी लेकिन जीत दर्ज करने के नशे में चूर कोलिंगवुड ने अंपयार की यह सलाह नहीं मानी। हालांकि मिल्स ने कोलिंगवुड का सपना पूरा नहीं होने दिया और अपनी टीम को एक विकेट से जीत दिला दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना ने यह तो साबित कर ही दिया है अक्सर खेल भावना पर लंबी-लंबी स्पीच देने वाले इंग्लैंड के खिलाड़ी समय आने पर खुद इससे कन्नी काट जाते हैं। वह अक्सर एशियाई खिलाडि़यों पर इल्जाम लगाते हैं कि वे खेल भावना का ख्याल नहीं रखते। इंग्लैंड वाले अपने खेलने के तरीके और अपने दर्शकों के सभ्य व्यवहार पर हमेशा गर्व करते हैं। लेकिन यहां तो न ही उनके कप्तान ने सभ्यता दिखाई और न ही उनके दर्शकों ने। लाचार हालात में रन आउट होकर इलियट पवेलियन लौट रहे थे और इंग्लिश दर्शक खुशी में झूम रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वही कोलिंगवुड हैं जिन्होंने पिछले वर्ष हुई भारत-इंग्लैंड सीरीज के दौरान भारतीय खिलाडि़यों पर खेल भावना के साथ न खेलने का आरोप लगाया था। सात वनडे मैचों की उस सीरीज के पांचवें मैच में कोलिंगवुड खुद रन आउट हुए थे। भारतीयों ने अपील की लेकिन अंपयार थर्ड अंपायर से मदद लेने के लिए तैयार नहीं दिख रहे थे। तभी जाइंट स्क्रीन पर रिप्ले उभरी जिसमें साफ था कि कोलिंगवुड रन आउट हैं। तब भारतीयों द्वारा एक बार फिर अपील करने के बाद अंपायर ने कोलिंगवुड को आउट दिया। उस घटना ने कोलिंगवुड खासे नाराज थे। उनका कहना था कि भारतीयों ने अंपायर पर दबाव बनाया और फील्ड अंपायर को रिप्ले देखकर आउट नहीं देना चाहिए था।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6941667209383911738/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/5689238198011800479/6941667209383911738' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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