<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><rss xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>जंगल कथा</title><description>जंगल कथा- एक शपथ अपनी जैव-संपदा और इतिहास को संरक्षित करने की।</description><managingEditor>noreply@blogger.com (Krishna Kumar Mishra)</managingEditor><pubDate>Mon, 7 Apr 2025 20:31:45 +0530</pubDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">63</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">5</openSearch:itemsPerPage><link>http://krishnakumarmishra.blogspot.com/</link><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>जंगल कथा- एक शपथ अपनी जैव-संपदा और इतिहास को संरक्षित करने की।</itunes:subtitle><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><item><title>टमाटर जो साढ़े तीन सौ वर्ष पहले भारत आया</title><link>http://krishnakumarmishra.blogspot.com/2017/04/roma-tomato.html</link><category>Columbus</category><category>lakhimpur</category><category>Roma Tomato</category><category>spain</category><category>Tomato</category><category>Vegetable</category><author>noreply@blogger.com (Dudhwa Live)</author><pubDate>Thu, 20 Apr 2017 07:47:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414920369734943655.post-3748659780318444129</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;
&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgc7nzCHmgLpiB7i_wNlGVEZ0A2Ikr6mG5rUZEkYLCn0AO62PSVzVcRmFcLqrxKe81RMKT5HXNv0nOn6YI5i6vY4UXLy1XByzfqWI6q_yEPM1kha2m_c60xhswVuwPGAfV7yQ0z0Rqj3ZJn/s1600/roma_tomato_kkmishra.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgc7nzCHmgLpiB7i_wNlGVEZ0A2Ikr6mG5rUZEkYLCn0AO62PSVzVcRmFcLqrxKe81RMKT5HXNv0nOn6YI5i6vY4UXLy1XByzfqWI6q_yEPM1kha2m_c60xhswVuwPGAfV7yQ0z0Rqj3ZJn/s640/roma_tomato_kkmishra.jpg" width="480" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;टमाटर के किस्से के बहाने किसान की व्यथा कथा&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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आलू &amp;nbsp;की तरह&amp;nbsp;पुर्तगाली टमाटर को लेकर भारत आये, &amp;nbsp;टमाटर या जिसे स्पैनिश में टोमैटो कहते है, इसने स्पेन के उपनिवेशकाल में पूरे अमरीका में प्रसारित हुआ, और लोग इस फल से वाकिफ &amp;nbsp;हुए, बाद में पुर्तगालियों ने इसे अपने उपनिवेशों में पहुंचाया, जिसमे भारत भूमि भी है और भारतीय इस फल के स्वाद से परिचित हुए, यह तकरीबन 350 वर्ष पूर्व की बात रही होगी, वैसे जब यह टमाटर मैक्सिको की जमीन से उठकर योरोप लाया गया तब वहां के लोग इसके अद्भुत रंग रूप और स्वाद से हतप्रभ रह गए और इसे इटली में नाम दिया गया "सोने का सेब" आलू भी इटली पहले पहुंचा था,अब पूँछिए हर नई चीज इटली ही क्यों पहुँचती थी, नई दुनिया यानी अमरीका से, तो इसका खूबसूरत जवाब है, हमारा वेद वाक्य &amp;nbsp;चरैवेति चरैवेति जिसके हम अनुयायी नहीं हो पाए और पता नहीं किस किताब की बात मान समुन्द्र यात्रा को पाप समझ लिया, जी हाँ इटली या स्पेन आलू का सर्वप्रथम पहुंचना फिर पूरे योरोप में और सबसे बाद में भारत में, ऐसे ही यात्रा टमाटर की रही, इसकी वजह थी क्रिस्टोफर कोलम्बस, यही वह महान नाविक, और स्पेन सरकार के उपनिवेशों का व्यवस्थापक गवर्नर था जो अमरीका के विभिन्न भूभागों पर स्पेन के साम्राज्य को स्थापित और व्यवस्थित करता था, इस व्यक्ति ने दुनिया के &amp;nbsp;भौगोलिक क्षेत्रों की यात्रा की और नई दुनिया को खोज निकाला जाहिर था वहां उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों, जिनमे फल, सब्जियां और अन्न से भी वह परिचित हुआ और उनके बीज स्पेन ले आया, टमाटर से भी दुनिया को परिचित कराने का श्रेय कोलम्बस और उसके बाद के स्पेनिश उपनिवेशी अधिकारियों को जाता है, जब यह टमाटर अमरीका के मैक्सिको में नहुआ आदिवासियों के क्षेत्र में देखा गया तो वह बहुत छोटा, मिठास लिए हुए और खुशबूदार था, जिसे वह सम्प्रदाय उगाता था, टमाटर की जंगली प्रजातियां, मानव सभ्यता में उगाने के प्रमाण ढाई हज़ार वर्ष पूर्व के हैं, स्पेन के लोगों ने उस टमाटर को जब दुनिया में विभिन्न हिस्सों में लाये तब योरोप के वैज्ञानिकों ने तमाम किस्में विकसित कर डाली जिससे टमाटर का मूल रूप ख़त्म हो गया और यह बड़े आकार का बिना खुशबु और बिना ख़ास स्वाद के हो गया, इस आनुवंशिक छेड़छाड़ का नतीजा यह हुआ की टमाटर में तमाम बीमारियां लगने लगी और वह उस मूल स्वाद और खुशबु से भी जुड़ा नही रह गया जो मैक्सिको में नेहुआ लोगों द्वारा उगाये जाने वाले टमाटर में होता था, एक दिलचस्प बात यह है की टमाटर यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका में कानूनी विवाद का कारण भी बना, दरअसल टमाटर एक फल है नाकि सब्जी, यह अंडाशय से विकसित हुआ फल है, किन्तु इसका इस्तेमाल सब्जी के रूप में होता रहा, सो अमरीकी सरकार इस भरम में पड़ गई की इसके उत्पादन व् व्यापार पर सब्जी वाला टेक्स वसूला जाए या फल वाला, हालांकि बाद में कानून ने इसे सब्जी मान लिया, लेकिन यह वनस्पतिक विज्ञान के लिहाज़ से &amp;nbsp;फल है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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टमाटर को लीनियस जैसे महान वैज्ञानिक ने आलू वाले परिवार यानी सोलेनेसी के अंतर्गत ही रखा और इसकी प्रजाति का नाम दिया गया लाइकोपरसिकम, &amp;nbsp;यानी इसका पूरा नाम सोलेनम लाइकोपरसिकम पड़ा, यहाँ पर लाइकोपरसिकम नाम पड़ने का कारण जर्मन की डरावनी कहानियां है जिसमे भेड़िया मानव द्वारा खाया गया फल वुल्फ पीच, से समानता और कौतूहल पैदा करने वाले फल के कारण यह नाम पड़ा, टमाटर का रिस्ता इंका अमरीकी मैक्सकन से जोड़कर भुतहा फल बताया गया, बाद में इसके लाल रंग को फ्रांस की क्रान्ति से जोड़ा गया जिसमे पेरिस के लोग लाल टोपी लगाते थे, हालांकि टमाटर के मूल स्वरूप वाले पौधे और पत्तियों में अल्प मात्रा में जहर होता था जबकि फलों में कोई जहरीला गुण नहीं था, और उस पौधे के स्थानीय औषधीय प्रयोग भी होते थे, संकर प्रजातियों में ऐसा नहीं है, टमाटर एक बेल है और यह छह फ़ीट तक ऊंचाई में चढ़ सकती है यदि इसे सहारा दिया जाए, इन्ही कारणों से टमाटर की चेरी, रोमा और सैन मार्जानों किस्में बेलों की तरह हैं जिनमे अंगूर की तरह गुच्छों में टमाटर लगते हैं. टमाटर का रंग मूल स्वरूप में पीले अथवा सोने के रंग की तरह होता था बाद में संकर प्रजातियां विकसित हुई और यह गाढ़े लाल रंग, नारंगी रंगों में तब्दील हुआ, टमाटर एक चेरी है जो फल के बजाए सब्जी के रूप में मानव सभ्यता में प्रचलित हुई.&lt;/div&gt;
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टमाटर का &amp;nbsp;इस्तेमाल चटनी, सलाद, और हर तरह की तरकारी में होता है, इसका जूस भी &amp;nbsp;इस्तेमाल किया जाता है, पौष्टिक तत्वों की बात करें तो इसमें विटामिन बी6, विटामिन सी, विटामिन ए, आयरन, पोटेशियम&amp;nbsp;और अत्यधिक मात्रा में लायकोपीन होता है, लाइकोपीन टमाटर में रंग के लिए होता है, किन्तु यह जबरदस्त आक्सीडेंट है, जो कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने में मदद देता है.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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टमाटर की किस्मों में रोमा टमाटर जो एक बेल की तरह एक मीटर ऊंचाई तक जा सकता है रंगीन टमाटरों के अंडाकार शक्ल में गुच्छों में होता है, रोमा और सैन मार्जानों टमाटर में इतना फर्क ही की सैन मार्जानों नीचे की तरफ नुकीला होता है, चटनी में इन प्रजातियों का इस्तेमाल खूब होता है और इनका स्वाद भी सामान्य टमाटर से अलग व् उम्दा होता है, रोमा टमाटर मौजूदा समय में कई किस्मों में मिलता है, मीठा&amp;nbsp;लाल, पीला और नारंगी, यह पूरे वर्ष उपलब्ध होता है, यह किस्म अचानक &amp;nbsp;परिवर्तन से विकसित &amp;nbsp;हुई, &amp;nbsp;रोमा टमाटर के विकसित होने&amp;nbsp;में सन नाम का जीन जिम्मेदार है, क्योंकि 1642 में सन नाम की किस्म से यह रोमा टमाटर स्वत: विकसित हुआ&amp;nbsp;था, &amp;nbsp;और इसी सन नाम के जीन की वजह से टमाटर गोल&amp;nbsp;से अंडाकार हो गया, यह प्रजाति पूरी दुनिया में खूब प्रचलित हुई क्योंकि इसे दूर दराज़ इलाकों तक ले जाने में यह फूटता या खराब नहीं होता। सन&amp;nbsp; 1955 में रोमा की संकर किस्म&amp;nbsp;विकसित की गयी और यह जान-मानस में खूब पसंद किया गया.&lt;/div&gt;
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तो यह कहानी थी टमाटर &amp;nbsp;की, इनकी इन सुंदर व् लाभप्रद किस्मों को भारतीय किसान उगाए जिससे उसकी आर्थिक स्थिति में मजबूती आ सके, हालांकि अब दुनिया फलों, सब्जियों, और अनाज के मूल स्वरूप की तरफ लौटने को बेकरार है जो अब असंभव सा लगता है, क्योंकि संकर प्रजातियां देखने में रंग बिरंगी और खूबसूरत हो सकती हैं, किन्तु उनमे न तो रोगों से लड़ने की क्षमता होती है और न ही वह औषधीय गुणों व् उन पोषक तत्वों से युक्त होती हैं, जो उन प्रजातियों की मूल प्रजाति में मौजूद था, बढ़ती जनसख्या ने अत्यधिक उत्पादन के लिए&amp;nbsp;&amp;nbsp;हमारी धरती से मूल प्रजातियों को ख़त्म करने में कोइ कसर नहीं बाकी रखी, आज दुनिया के विकसित देश जंगलों, गाँवों और दूर दराज़ के इलाकों में भ्रमण कर देशी प्रजातियां इकट्ठा करते&amp;nbsp;हैं ताकि भविष्य के लिए मानव का पेट भरने के लिए वह यह प्राकृतिक सम्पदा अन्न व् फल&amp;nbsp;के बीज&amp;nbsp;सजों सकें, भारत के ग्रामीण अंचलों और शहरों से देशी&amp;nbsp;बीज नदारद है, बाजार इतना हावी है की फल, सब्जियों और अनाज के हाइब्रिड बीज ही किसानों को मुहैया कराती है &amp;nbsp;महंगे दामों पर ताकि प्रत्येक वर्ष किसान बाजार या उस कंपनी के द्वारा विकसित किए &amp;nbsp;संकर बीजों पर निर्भर रहे, किसान की की यह स्थिति उसे आत्मनिर्भर नहीं होने देगी कभी, और असुरक्षा भी, कम्पनियां अब उन एक लिंगी प्रजातियों के फलों जैसे पपीता आदि के संकर पौधे तैयार कर&amp;nbsp;जो बिना नर पौधे के फल दे सकें और नर पौधे या उनके बीज अपने पास सुरक्षित रखती है, किसान फौरी तौर पर अपने लाभ के लिए इस मकड़जाल में फंसता चला जा रहा है.&lt;/div&gt;
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टमाटर की भी यात्रा मैक्सिको से भारत तक जब हुई तब वह लगभग अपने मूल स्वरूप में आया आज भी वह बीज जंगलों में या गाँवों &amp;nbsp;कही मौजूद होंगे उन्हें इकट्ठा किया जा सकता है, ताकि हमारी &amp;nbsp;सम्पदा अक्ष्क्षुण रह सके, क्योंकि देशी बीजों में सूखे से, बाढ़ से,&amp;nbsp;बीमारियों से लड़ने की अद्भुत क्षमता होती है, &amp;nbsp;इन बाजारू&amp;nbsp;बीजों को लंगड़ा बनाकर हमें बेचा जाता है ताकि हम दूसरों पर निर्भर रहे, इनका&amp;nbsp;यह प्रभाव किसानों को ही नहीं भविष्य में&amp;nbsp;आम जान-मानस के लिए भी&amp;nbsp;ख़तरा है. किसान देशी प्रजातियों के फल, सब्जी, अनाज उगाने के साथ साथ संकर प्रजातियां भी उगाए लेकिन देशी मुहं मोड़ना भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;कृपया अपने महत्वपूर्ण सुझाव देने का कष्ट करे !&lt;/div&gt;</description><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgc7nzCHmgLpiB7i_wNlGVEZ0A2Ikr6mG5rUZEkYLCn0AO62PSVzVcRmFcLqrxKe81RMKT5HXNv0nOn6YI5i6vY4UXLy1XByzfqWI6q_yEPM1kha2m_c60xhswVuwPGAfV7yQ0z0Rqj3ZJn/s72-c/roma_tomato_kkmishra.jpg" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total></item><item><title>तालाब बाढ़ में भी खरे हैं..</title><link>http://krishnakumarmishra.blogspot.com/2016/07/dig-ponds-to-stop-flooding.html</link><category>biological diversity</category><category>birds</category><category>flood</category><category>Government of Uttar Pradesh</category><category>Inlands wetlands of India</category><category>lakes</category><category>ponds</category><category>water</category><category>wetlands</category><author>noreply@blogger.com (Dudhwa Live)</author><pubDate>Tue, 19 Jul 2016 19:03:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414920369734943655.post-9081937521191106966</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj020SwilTZ49k0dBgseGvPPj5R9_fo3ilQJqfKHxAR-RZFsjvTXsN6bj2hDM9zyPUqtHC_Ul7o5TDDSzJ1Xi4IExZYVj_5pDbFQAGdJHDSq_RM5sS6baT1xQ_oWGZL8BCDkn2VnyhVgtEQ/s1600/manhan_sarus10.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="424" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj020SwilTZ49k0dBgseGvPPj5R9_fo3ilQJqfKHxAR-RZFsjvTXsN6bj2hDM9zyPUqtHC_Ul7o5TDDSzJ1Xi4IExZYVj_5pDbFQAGdJHDSq_RM5sS6baT1xQ_oWGZL8BCDkn2VnyhVgtEQ/s640/manhan_sarus10.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;बाढ़ की त्रासदी से मुक्ति का साधन है ये तालाब-&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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धरती की पारिस्थितिकी और भूगर्भीय&amp;nbsp;घटनाओं &amp;nbsp;के कारण तालाब जैसी सरंचनाओं का जन्म हुआ, ग्लेशियर के पिघल जाने के बाद के स्थल,&amp;nbsp;नदियों के पानी के जलभराव स्थल, मिट्टी के अपरदन, उल्का पिंडों के गिरने से, इसके अतरिक्त तमाम भूगर्भीय &amp;nbsp;घटनाओं से&amp;nbsp;जो गड्ढे जैसी सरंचनाएं बनी, और उनमें बारिश का पानी या नदियों का पानी इकट्ठा हुआ, फिर तालाबों का&amp;nbsp;मुसलसल जैविक विकास के बाद&amp;nbsp;वे प्राक्रृतिक तालाब &amp;nbsp;या जलाशय कहलाए, और इस प्रक्रिया में लगे सैकड़ों वर्ष &amp;nbsp;और धरती के तमाम जीवों का प्रत्यक्ष व् प्रत्यक्ष सिलसिलेवार सहयोग इस जलीय सरंचना के विकास में निहित है, उदाहरण के तौर पर हम देखे की किसी कारण बस धरती में बन चुके गड्ढेनुमा सरंचना में पानी भर जाए, फिर धीरे धीरे चिड़ियों या अन्य जीवों द्वारा लाये गए बीजों से उस पानी में वनस्पतियों का उद्भव प्रारंभ होता है, वायरस,&amp;nbsp;बैक्टीरिया,कवक, शैवाल जैसे&amp;nbsp;सूक्ष्म जीव-वनस्पतियों के अतरिक्त तालाब में तैरने वाले सिघाड़े, जलकुम्भी जैसी वनस्पतियों का जीवन-क्रम&amp;nbsp;आरम्भ हो जाता है, किनारों पर आईपोमिया (बेहया), रीड, हाथी घास जैसी वनस्पतियाँ उगती है, और फिर तलाबों के छोर की समतल भूमियों पर विशाल वृक्षों की प्रजातियां, यह है एक प्राकृतिक तालाब- इसे यदि छेड़ा न जाय तो हज़ारों वर्षों में इसमें मृत&amp;nbsp;वनस्पतियों व् जीवों का कचड़ा व् &amp;nbsp;धूल इत्यादि इसकी तलहटी में जमा होने लगती है और एक वक्त ऐसा आता है जब तालाब की गहराई कम हो जाती है और यह स्थल दलदली भूमि में तब्दील हो जाता है, उसके बाद की स्थिति में जलस्तर और कम होने से यह छिछली नम भूमि में परिवर्तित हो जाता है, नतीजतन यहां घास के मैदान और जंगल उग आते हैं, यही है एक तालाब के उद्भव से अंत की कहानी जिसे पूरा होने में हज़ारों वर्ष लगते हैं, किन्तु मानवीय सभ्यता में तालाब अब यूं ही &amp;nbsp;नहीं उद्भित होते हैं और न ही उनका प्राकृतिक अंत होता है, तालाब या तो इंसानी जरूरतों के चलते मशीनों से खोद दिए जाते हैं और फिर वही इंसान उसे&amp;nbsp;&amp;nbsp;पाटकर वहां इमारत खड़ी कर देता है, सो अब तालाब न प्राकृतिक तौर पर&amp;nbsp;जन्मते है और न ही प्राकृतिक तौर पर नष्ट होते है, प्रकृति का सुन्दर खेल नहीं खेला जाता अब, सिर्फ इंसान खेलता है यह क्रूर व् आप्राकृतिक खेल अपनी जरुरत के मुताबिक़! क्योंकि अब कोइ चिड़िया बीजों का प्रकीर्णन&amp;nbsp;करती भी है तालाब&amp;nbsp;में, तो इंसान उस पानी&amp;nbsp;में गाँव या शहर या फिर खेतों का कीटनाशकों और डिटर्जेंट वाला जहरीला पानी बहा देता है, या फिर उस तालाब में हरियाली उगने से पहले उसे पाट&amp;nbsp;दिया जाता है, &amp;nbsp; जैसे नरेगा जैसी योजनाओं में श्रम&amp;nbsp;का बेजा इस्तेमाल-एक ही तालाब को प्रति&amp;nbsp;वर्ष खोद डालना, जाहिर है&amp;nbsp;तालाब की पारिस्थितिकी तंत्र को जो एक वर्ष में थोड़ा बहुत विकसित हुआ हो उसे दोबारा नष्ट कर देना, तालाब एनीमल किंगडम के तकरीबन&amp;nbsp;सभी वर्गों के सदस्यों की शरणस्थली है,&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgRYO5KSzoQRejJVJFoMk2wU_I99cmzq9saxAjyeRqm0Yk7cNb6HAB5ywZAjBdQfuQWGcJmaxJw9xUrxQWdIWajIu2LIVPsCM5tyo6yHCAYsrNfputVQBZyMX6I3xzVlcEtWH2hzQdB_yTG/s1600/DSCF6076.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="480" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgRYO5KSzoQRejJVJFoMk2wU_I99cmzq9saxAjyeRqm0Yk7cNb6HAB5ywZAjBdQfuQWGcJmaxJw9xUrxQWdIWajIu2LIVPsCM5tyo6yHCAYsrNfputVQBZyMX6I3xzVlcEtWH2hzQdB_yTG/s640/DSCF6076.JPG" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
एक आदर्श तालाब में पैरामीशियम जैसे प्रोटोजोआ से लेकर घेघा (पाइला&amp;nbsp;) मोलस्का, एम्फीबीयन जैसे मेढक, रेप्टाइल जैसे सर्प और मगरमच्छ तक जलाशयों में निवास करते है, यहां तक डीकम्पोजिंग बैक्टेरिया जो अपशिष्ट पदार्थों को गलाकर उन्हें मिट्टी में परिवर्तित कर देते हैं, तालाब के पानी को स्वच्छ बनाये रखते है, वनस्पतियों में जलकुंभी जैसी तमाम वनस्पति पानी में मौजूद हानिकारक रसायनों और पदार्थों जैसे लेड&amp;nbsp;इत्यादि को अवशोषित कर तालाब के पानी को सभी जीव जंतुओं के लिए सुरक्षित रखती हैं, किन्तु आदम सभ्यता के मौजूदा विकास ने तालाब ही क्या समूची धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को ही नष्ट कर दिया है, और अब न तो वनस्पतियों में ही इतनी&amp;nbsp;&amp;nbsp;कूबत है और न ही अपघटनकारी बैक्टीरिया में ताकत &amp;nbsp;कि बेइंतहा&amp;nbsp;इंसानी गन्दगी को साफ़ कर सके, नतीजा सामने है हमने नदियों की जलीय पारिस्थिकी और&amp;nbsp;तालाबों तक को अपनी जहरीली प्रवृत्तियों से ग्रसित कर दिया है यहां तक की हम समुन्दर को भी नहीं छोड़ रहे और फिर अखबार और टीवी में सब पढ़ते देखते है की आज समंदर में इतनी ह्वेल या शार्क मृत पायी गयी या किसी नदी &amp;nbsp;या तालाब&amp;nbsp;&amp;nbsp;में हज़ारो मछलियाँ और जीव मर गए, &amp;nbsp;शायद ही अफ़सोस होता हो क्योंकि हम जानते है की हमारी सभ्यता में हम स्वयं फैक्ट्रियों के प्रदूषित व् जहरीले कचरे की आहुति इन्ही नदियों और तालाबों में दे रहे है जो हमारे लिए&amp;nbsp;ही नहीं सारी कायनात के जीव-जंतुओं के जीवन की बुनियादी जरुरत है, खैर अनियोजित विकास की बलिबेदी पर चढ़ते ये तालाब, नदियां, जंगल यकीनन इंसान को भी अपनी गिरफ्त में ले चुके हैं, किन्तु जब तक लातूर और बुंदेलखंड के हालात हमारे घरों तक न पहुंचे तब तक हम नहीं चेतते&amp;nbsp;हमारी तात्कालिक&amp;nbsp;योजनाएं तब बनती&amp;nbsp;हैं जब अकाल, बाढ़ और सूखा हमारे सिरों पर चढ़कर हुंकार भर रहा होता है, और यह प्रवृत्ति इंसानी सभ्यता में पैठ चुकी है, अतीत में इंसान जंगलों से निकलकर जब नदिओं &amp;nbsp;के किनारे&amp;nbsp; बसा, जंगल काटे और कृषि का&amp;nbsp;&amp;nbsp;आविष्कार हुआ, सभ्यताओं का &amp;nbsp;जन्म भी,&amp;nbsp;और&amp;nbsp;अपनी जरूरतों के&amp;nbsp;मुताबिक़ प्रकृति से&amp;nbsp;लेना परम्परा बनी,&amp;nbsp;&amp;nbsp;उस वक्त के काफी&amp;nbsp;बाद&amp;nbsp;तक मनुष्य&amp;nbsp;को प्रकृति की व्यवस्था में विश्वास&amp;nbsp;और भय दोनों&amp;nbsp;मौजूद थे, जल की महिमा, जिसका वर्णन हर धर्म में मौजूद है, या यूँ कह ले की जल जीवन का, पवित्रता का पर्याववाची है, इसीलिए तो बैप्टिज्म से लेकर अमृत पीने , उजू करने, और हिन्दू संस्कृति में सारे&amp;nbsp;संस्कार जल से ही सम्पूर्ण होते है, लेकिन उस पवित्रता को शायद अब हम अंगीकार नहीं करते, &amp;nbsp;नदियों, तालाबों&amp;nbsp; में घरों और कारखानों का कचड़ा न बहाते, तालाब इंसानी जरूरतों को ही पूरा नहीं करते बल्कि न जाने कितने जीव-जंतुओं का घर हैं, एक भरी पूरी&amp;nbsp;&amp;nbsp;प्राकृतिक व्यवस्था, किन्तु अब वाटर रिचार्ज के नाम पर खोदे &amp;nbsp;गड्ढे जिनकी अथाह गहराई में न जलीय वनस्पति की विवधिता बरकरार रह सकती है और न ही किसी जानवर की&amp;nbsp;गड्ढे में पानी पीने &amp;nbsp;हिम्मत, साथ ही तालाब &amp;nbsp;के किनारों पर लगा दी गयी मिट्टी आस-पास के पानी को तालाब में जमा नहीं होने&amp;nbsp;देती, कुल मिलाकर आदर्श तालाबों के नाम धरती पर गड्ढे न तो इंसान के लिए&amp;nbsp;मुफीद है और न ही जानवरों &amp;nbsp;के लिए और वाटर रिचार्ज की कल्पना भी इन गड्ढों से करना भी बेमानी ही होगा, और हाँ कुछ तालाबों को इतनी &amp;nbsp;स्थानों पर&amp;nbsp;खोदा गया है की वहां आस-पास के पानी का एकत्रित होना असम्भव और हास्यापद है,.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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नम-भूमियों में,&amp;nbsp; तालाब, नदी, दलदली भूमियाँ आदि&amp;nbsp;सम्मलित है, के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए पूरी&amp;nbsp;दुनिया में सजगता उत्पन्न हो इस लिए दुनिया के १६९ देशों ने दो फरवरी १९७१ को रामसार ईरान में एक करार पर दस्तखत किए जिसमे तालाबों आदि के सरंक्षण और उसकी महत्वा को &amp;nbsp;पुरजोर सिफारिश की गयी, और इसी सिलसिले में १९९७ से प्रत्येक वर्ष&amp;nbsp;दो फरवरी अंतर्राष्ट्रीय नम-भूमि (तालाब&amp;nbsp;) दिवस के तौर पर मनाया जाता है, इस करार में धरती के उन विशाल जलाशयों और दलदली भूमियों को रामसार साइट के तौर पर दर्ज़ किया गया है जिनमे तमाम जीव-जंतु और वनस्पतियां अपना&amp;nbsp;जीवन&amp;nbsp;चक्र सुचारु तौर पर चलाती हों,&amp;nbsp;एक आदर्श जलीय&amp;nbsp;पारिस्थितिकी का&amp;nbsp;माहौल, इसके तहत सारी दुनिया में २२४१ रामसार साइट चिन्हित की गयी हैं, भारत में कुल रामसार साइट यानि आदर्श जलाशय या नम -भूमियाँ २६ हैं जिनका कुल-क्षेत्रफल ६८९,१३१ हेक्टेयर है, &amp;nbsp;उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारों में बृजघाट से नरौरा तक रामसार साइट घोषित की गयी, प्रदेश में यही एक एकलौती रामसार साइट है,&amp;nbsp;भारत इस करार में एक फरवरी सं १९८२&amp;nbsp;को शामिल हुआ,&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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यदि हम भारत सरकार की&amp;nbsp;अंतर्देशीय नमभूमियों की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो तमिलनाडु अपने देश के सबसे ज्यादा तालाबों (नम-भूमियों&amp;nbsp;) वाला प्रांत है और उसके उपरान्त उत्तर प्रदेश, भारत वर्ष के कुल भौगोलिक क्षेत्र में ४.६३ फीसदी नम-भूमियों के क्षेत्र मौजूद है, वही नदियों के प्रदेश उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा ५. १६ फीसदी, ७१ जनपदों में यानि २४०९२८ वर्ग किलोमीटर वाले प्रदेश के भूभाग पर १२४२५३० हेक्टेयर भूमि में तालाब, नदियां, व् नम भूमियाँ मौजूद है, औसतन इस आंकड़े के आधार पर हम तालाबों के धनी है, किन्तु तालाबों की दुर्दशा के चलते हालात बदतर हुए हैं,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँव में एक आदर्श तालाब की खासियत होती थी उसकी विशालता, ताकि उसके विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार की जलीय&amp;nbsp;वनस्पतियाँ &amp;nbsp;विकसित हो सकें, उसके छिछिले किनारों पर तमाम लम्बी टांगों वाले पक्षी अपना भोजन खोज सके, गहराई में &amp;nbsp;अन्य जीव जंतु पनप सके, कही गहराई में कंकरीली जमीन, तो तालाब के किसी भाग में बलुई तलहटी जहां मनुष्य स्नान आदि कर सके और उसके पाँव कीचड में भी न सने, कुछ स्थानों में कीचड वाली तलहटी जहां मवेशी जल-क्रीड़ा कर सके &amp;nbsp;और कहीं किनारों पर चिकनी मिट्टी वाली तलहटी जहां से मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोग वहां से मिट्टी निकाल सकें, और कही कहीं तो तालाब की तलहटी में सीपियों की कनकदीली फर्श सी बन जाती है तालाब में, तैरने वाले पौधों से लेकर तलहटी में धंसी जड़ों वाले पौधे पानी के ऊपर निकल कर खिलते हों, और हरियाली का जाल भी मौजूद हो तालाबों में तभी पानी की शुद्धता बरकार रह सकती है और एक आदर्श जलीय पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो पाएगा। .सुन्दर और रमणीक!&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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जीवन रस से भरपूर ये हरे भरे तालाब गर्मियों में हमें शीतलता और जल ही नहीं मुहैया कराते बल्कि हमारे घरों &amp;nbsp;के जल-यंत्रों में पानी के स्तर को भी व्यवस्थित रखते हैं, आस-पास के बाग़-बगीचों को भी हरा भरा बनाते हैं, और बरसात में हमारे गाँव और शहर के पानी को भी स्वयं में समाहित कर लेते हैं ताकि हमारी आबादी बाढ़ से बच सके, नदियों में पहुचने से पहले जो अतरिक्त पानी ये तालाब अपने आगोश में लेते हैं यकीनन बाढ़-नियंत्रण का सबसे बेहतरीन और कम लागत वाला तरीका है, तालाबों की खुदाई और उन्हें अपने प्राकृतिक स्वरूप में विकसित होने देना धरती पर मौजूद सारी प्रजातियों के लिए सुखद है ये बात हमें समझ लेनी चाहिए।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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थोड़ी सी बारिश से बाढ़ के हालात पैदा हो जाना हमारे अनियोजित विकास की देन है, गाँवों में गलियारों को मिट्टी से पाटकर ऊंचाकर देना और फिर उस पर पक्की&amp;nbsp;&amp;nbsp;सड़क बना देना, इस विकास ने तमाम फायदे जरूर दिए मानव-जाती के आवागमन में किन्तु कृषि-भूमि को ऊंची सड़कों की चौहद्दी से बाँध&amp;nbsp; दिया और नतीजा ये हुआ की अब पानी समतल जमीन पर बहकर इन ऊंची सड़कों से टकराकर ठहर जाता है, और तालाब या &amp;nbsp;नदी में नहीं पहुँच पाता&amp;nbsp;और जल-भराव की स्थिति उत्पन्न होती है, दूसरी वजह है नदियों के मुहानों पर &amp;nbsp;काबिज़ इंसान और उसकी इमारते, नदियों के मुहाने कभी किलोमीटरों चौड़े होते थे, जहां सिर्फ जानवरों के चराने का ही चलन था, और नदी का जल स्तर बढ़ने से पानी उसके मुहानों तक ही सीमित होता था या कभी कभार इंसानी आबादी में या कृषि क्षेत्र में आकर दो चार&amp;nbsp;रोज बाद उतर जाता था लेकिन अब&amp;nbsp;&amp;nbsp;उन मुहानों में कृषि क्षेत्र और गाँव बसे&amp;nbsp;हुए है, यहाँ तक सरकारी बिल्डिंग्स भी मौजूद है, ऐसे हालातों में नदी का उफनना घातक ही सिद्ध होगा, पानी को रोकने की प्रवृत्ति&amp;nbsp;ही बाढ़ का कारण है, तटबंध, बाँध, इत्यादि नदी के जल के वेग को बेतरतीब करते है और कटान स्वाभाविक है, नदियां रुख बदलती है और फिर छोड़ जाती है उपजाऊ जमीन और बहुत सारे तालाब जो मनुष्य ही नहीं सारी जैव-विवधिता का ये स्थल होते हैं, किन्तु अब नदियों के रास्तों पर हम तकनीक का पहरा बिठाए हैं और यही कारण है की&amp;nbsp;हम सफल कम असफल अधिक होते है, बाढ़ नियंत्रण में, बाढ़ के रूप में पानी का समतल भूमियों पर बिखर जाना और फिर वापस जाकर&amp;nbsp;नदी की सीमाओं में&amp;nbsp;&amp;nbsp;बहना &amp;nbsp;प्रकृति है और उसे जबरन रोकने के प्रयास ही तबाही का कारण बनते है, किन्तु अनियोजित विकास की बलिबेदी पर चढ़ती नदियां तालाब और जल-प्लावित क्षेत्र पूरी&amp;nbsp;इंसानियत के लिए ही नहीं धरती के सभी जीवों के लिए अभिशाप हैं, हम पानी को उसका वाजिब रास्ता दे दें यकीन मानिए वह हमारे गाँव और घरों में कभी दाखिल नहीं होगा। याद रहे की&amp;nbsp;नदियों के मुहानों पर पहरेदारी ने ही अब नदियों को प्राकृतिक&amp;nbsp;तालाब जन्मने के मौके से भी वंचित कर दिया है।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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इंसानी सभ्यता में&amp;nbsp;जमीन के सौदागरों का विकास तालाबों की मौत का कारण बना, हमारा बेवकूफी भरा मंसूबा की जमीन पर सिर्फ हमारा अख्तियार है ने धरती की जैव-विवधिता खासकर तालाबों की शामत बनकर आया, हम ये भूल जाते है किसी तालाब को ख़त्म करते वक्त की यह तालाब लाखों प्रजातियों का घर है और हम उन्हें चंद रुपयों या अपनी बेजा जरूरतों के चलते बेघर ही नहीं कर रहे बल्कि उन्हें मिट्टी में दबाकर क़त्ल कर रहे हैं, जैव-विवधिता के ये तालाब खजाने हैं, ज़रा सोचिए इनमे उगने वाले वनस्पति जानवरों के अतरिक्त इंसानों को भोजन, औषधि और रोजगार भी देती है, तालाबों का कब्ज़ा और उनके बाज़ारीकरण ने गाँवों के तमाम समुदायों को प्रभावित किया है जिनकी रोजी और रोटी इन तालाबों पर निर्भर थी, तालाबों के ठेके ने गाँव के उनलोगों को प्रभावित किया है जिनके घर में अगर भोजन नहीं है तो वे इन प्राकृतिक तालाबों से कुछ न कुछ खाद्य वस्तुएं इकट्ठा कर लेते थे, अब वह जरिया भी ख़त्म कर दिया &amp;nbsp;हमारी &amp;nbsp;व्यवस्था ने, &amp;nbsp;रही सही कमी प्रदुषण पूरी कर दी, ये तालाब, जंगल धरती सारी समष्टि की है सिर्फ इंसान की बपौती नहीं और इस बात को सरकारों को खूब समझना चाहिए और ऐसे निर्णय लेने चाहिए ताकि ये प्राकृतिक स्थल अपने स्वरूप में रह सके सदा के लिए और इससे हमारी आने वाली नस्ले भी लाभान्वित हो सकें बजाए अकाल, बीमारी और दुर्भिक्षता के.......&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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तो उम्मीद है की तालाबों में फिर से कमल खिलेंगे, कुमदनियाँ लहलहायेंगी, तालाबों में हरियाली होगी और आस-पास में तमाम वनस्पतियाँ, वृक्ष और लताएँ, जहां तमाम परिंदे अपनी भूख-प्यास मिटायेंगे और बारिश में दादुर इन तालाबों में गीत गायेंगे, पुष्पों पर तितलियाँ, भौरें और &amp;nbsp;रंग-बिरंगे जीव मडराएंगे,&amp;nbsp;हम&amp;nbsp;तीज त्योहारों पर इन तालाबों की पूजा अर्चना कर सकेंगे और कह सकेंगे&amp;nbsp;जल-परियों की कथाएं भी...... &amp;nbsp; क्योंकि तालाब पवित्र&amp;nbsp;रहेंगे तो हमारे&amp;nbsp;जल-&amp;nbsp;संस्कार भी पवित्र हो&amp;nbsp;सकेंगे।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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कृष्ण कुमार मिश्र&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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(लेखक वन्य-जीव विशेषज्ञ एवं दुधवालाइव जर्नल के संस्थापक सम्पादक हैं)&lt;/div&gt;
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krishna.manhan@gmail.com&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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www.dudhwalive.com&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;कृपया अपने महत्वपूर्ण सुझाव देने का कष्ट करे !&lt;/div&gt;</description><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj020SwilTZ49k0dBgseGvPPj5R9_fo3ilQJqfKHxAR-RZFsjvTXsN6bj2hDM9zyPUqtHC_Ul7o5TDDSzJ1Xi4IExZYVj_5pDbFQAGdJHDSq_RM5sS6baT1xQ_oWGZL8BCDkn2VnyhVgtEQ/s72-c/manhan_sarus10.jpg" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>महिला अर्थात जिसमें महान शक्तियां निहित हैं..</title><link>http://krishnakumarmishra.blogspot.com/2015/03/international-womens-day-make-it-happen.html</link><category>Germany</category><category>International Woman Day</category><category>kheri</category><category>krishna kumar mishra</category><category>lakhimpur</category><category>mitauli</category><category>Russia</category><category>UNO</category><category>Woman Empowerment</category><author>noreply@blogger.com (KK Mishra of Manhan)</author><pubDate>Mon, 9 Mar 2015 19:33:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414920369734943655.post-385231307745429964</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhRX4HrR_vQeBitwKr4VsMCcTdVkILUN1pxQOaJurJLpJ0R_qSsKbubjR-4fOtyucRGrtVLfxdvy77ajk8BmiU9AtB62n8X0CBNnHJgqmJ-pVoMQJgUT8R3x2Gla9TiapaJrO5LbWaDMVZ6/s1600/89710017.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhRX4HrR_vQeBitwKr4VsMCcTdVkILUN1pxQOaJurJLpJ0R_qSsKbubjR-4fOtyucRGrtVLfxdvy77ajk8BmiU9AtB62n8X0CBNnHJgqmJ-pVoMQJgUT8R3x2Gla9TiapaJrO5LbWaDMVZ6/s1600/89710017.JPG" height="424" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;
&lt;b&gt;एक दिन औरत के नाम-&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
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आदम की कहानी में स्त्री पुरुष का यह राजनैतिक, सामाजिक, एवं वैक्तिक भेद के अफसानों से पहले "दिन" की परिभाषा पर बात करना चाहूंगा, सूरज के निकलने और डूबने के मध्य का वक्त, तारीखों से पहले की बात है, जब आदमी को&amp;nbsp;दिन के अतरिक्त समय की कोइ गणित नहीं मालूम थी, जब तारीख नहीं थी तो तवारीखों की बात करना बेमानी होगा, और तब आज के साइबेरिया कहे जाने वाले जैसे किसी&amp;nbsp;इलाके में किसी जगह कोइ औरत हाथ में पत्थरों के औजार लेकर अपने अन्य स्त्री-पुरुष व् पुत्रों और पुत्रियों के साथ अपने कुटुंब की भूख मिटाने के लिए निकलती थी, उन बर्फीले पहाड़ों में, उसे यह नहीं पता होता था की इस शिकार यात्रा के बाद लौटते हुए उसमे से कितने अपने प्रवास स्थल पर वापस लौटेंगे, और उस नेतृत्व करने वाली औरत की पूरी जिन्दगी, जब तक उसकी हड्डियों में इतना बल रहता की वह जंगली जानवरों से लड़ सके, मौसम की मार को सहन कर सके तब तक वह अपने कुटुंब का भरण पोषण करती रहती और उसके बाद उसकी पुत्री इस नेतृत्व को आगे बढाती....पिता जैसी किसी परिभाषा ने अब तक जन्म ही नहीं लिया था...एक मातृ सत्ता के सरंक्षण में जीवन संघर्ष में रचा बसा आदमी...&lt;/div&gt;
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कहानी आगे बढ़ती है, स्त्री नेतृत्व में शिकार दल जब मांस के अतिरिक्त जंगलों से फल फूल लाता और अपनी गुफाओं के आस पास खाए जा चुके फलों के बीजों को फेक देता तो कुछ समय बाद वहां पौधे उगते दिखाई देते, और उनमे उन्ही फलों की तरह फल, जिन्हें वह जंगलों से खोज कर लाते थे, बस यही वक्त था कृषि के आविष्कार का, और शायद इस आविष्कार की जननी भी कोई नेतृत्व करने वाली स्त्री ही रही होगी,...वक्त गुजरने के साथ ही आदमी की संख्या भी बढ़ने लगी और शिकार के लिए आपसी संघर्ष भी,...इलाके बांटे जाने लगे समुदायों के...आवश्यकताओं ने जब अपना असर जोर किया तो आदमी खेती और पशु-पालन की जुगत में लग गया, फिर क्या था आदमी प्रवासी से निवासी बन गया, साथ ही जमीन और पशुओं पर मालिकाना हक़ भी...स्त्री अभी भी स्वन्त्रत थी किन्तु जमीन और पशुधन पर अधिकार के भावों का प्रादुर्भाव हो चुका था, अभी जो बाकी था वह, धातुओं की खोज और आदम समुदायों में उनकी बढ़ती मांगों ने पूरा कर दिया, अभी तक जो जमीन जंगल जानवर और जरूरी हथियार मानव के पास अपनी जीविका चलाने के लिए ही थे, वह अब संपत्ति के &amp;nbsp;रूप में तब्दील हो गए...आवश्यकता व्यापार में बदल गयी.....और धन का प्रादुर्भाव हो गया.....बस यही वह छड थे इतिहास में जब आदमी की स्वाभाविक स्वछंदता में भय उत्पन्न हुआ संपत्ति के सरंक्षण और अधिकार के खो जाने का.....जो मानव धरती पर प्रकृति की सत्ता में खुद को आनन्दित पाता था बिना तेरा-मेरा के, वही आदमी अब खुद स्वामी बनने&amp;nbsp;को आकुल हो उठा, यही पहला चरण था स्त्री के संपत्ति बनने&amp;nbsp;का...जमीन, पशुधन को तो आदमी पहले ही अपने अधिकार क्षेत्रों में ले चुका था, बस उसे इस संपत्ति का वारिस चाहिए था! और संपत्ति के &amp;nbsp;दाखिल खारिज के पश्चात उसका मालिक कौन हो? इस बात के लिए आदमी को अब स्त्री को भी अपने अधिकार क्षेत्र में लाने की कवायदे करनी थी....अंतत: हुआ भी ऐसा, जो स्त्री नेतृत्व करती थी अपने समुदाय के भरण पोषण के लिए, जो स्वछंद थी आदेशित करने के लिए वह अब एक पुरुष के संसर्ग में आने वाली थी जीवन पर्यंत के लिए...अतीत की इस घटना ने एक मौजूदा कहावत को चरितार्थ कर दिया था...जर जोरू और&amp;nbsp;जमीन..!&lt;/div&gt;
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स्त्री पुरुष के इन स्थाई? संबंधों ने सभ्यता को एक नया रूप दिया, पिता और बंधु-बांधवों&amp;nbsp;के रिश्तों&amp;nbsp;का प्रादुर्भाव हुआ,&amp;nbsp;घर बने, नगर विकसित हुए, व्यवसाय में क्रान्ति आई, और साथ ही संघर्ष बढ़ा आदमी और आदमी के बीच, जो आज भी अनवरत जारी है, इतिहास के कालखंडों में इसी जार जोरू जमीन के लिए बड़ी बड़ी क्रांतियाँ हुई जिन्हें महाभारत जैसे तमाम महा-काव्यों में पढ़ा जा सकता है, ...हालांकि इस मातृ सत्ता से पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के बीच के समय में सभ्यता में&amp;nbsp;बहुत से संक्रमण हुए....आदमी जंगलों अर्थात प्रकृति से दूर होता गया भौतिकता के पथ पर चलते चलते उसने कई कीर्तिमान गढ़े...तकनीक और विज्ञान के आज तक के सफ़र में ये वही सदियों पुराना मानव अब भी बिना पीछे मुड़ कर देखे हुए आगे बढ़ता जा रहा है, अब माता-पुत्र के संबंधों के बजाए &amp;nbsp;पिता-पुत्र के रिश्तों की सामाजिक पहचान होने लगी, समुदायों में, परिवारों में और सरकारों में, पिता के नाम से उसकी अगली पीढी जाने जानी लगी और दर्ज भी होने लगी, सरकारी तौर पर तो माता अप्रासंगिक ही हो गयी, गाँव का पटवारी व् जिले का कलेक्टर या अस्पताल का डाक्टर अपने दस्तावेजों में पुरुष का ही नाम दर्ज करता स्त्री की यदि बात आती तो कोइ भी नाम दर्ज कर दिया जाता, क्योंकि जर और जमीन पर स्त्री का कही कोइ अधिकार नहीं था, बस वह कथित गृह स्वामिनी और समाज में कथित तौर पर जानी पहचानी जाने वाली किसी की पत्नी या माता के रूप में स्थापित होती रही, यहाँ तक की मताधिकार के लिए मत सूचियों और परिवार रजिस्टरों में भी फर्जी नामों से जानी जाती रही ये स्त्रियाँ, यदि इन्हें मताधिकार प्रयोग करने के लिए जाना होता तो पति के नाम से ही इनकी पहचान होती...विडम्बना के क्षण थे ये और वजह थी संपत्ति में मालिकाना हक़ का न होना, पता नहीं इतिहास के उन कैसे क्षणों में स्त्री ने अपनी सत्ता को पुरुषों के हवाले किया और साथ ही अपने उन सारे हुनर भी हवाले कर दी पुरुषों के, स्त्री अब यदि कलाकार होती तो उसके उस हुनर को तमाशा मान लिया जाता, चाहे फिर वह नृत्य कला में पारंगत हो या गायन में या फिर घुड़सवारी में और या हथियारों के चलाने में, स्त्री की इन तमाम खूबियों को राज दरबारों से लेकर धर्म के गलियारों तक तमाशबीनों के मध्य तमाशा बनाया जाता रहा, पर कहानी के दूसरे पहलूँ में यह स्त्री बंधू बांधवों, पुत्र-पुत्रियों, नाते-रिश्तेदारों के मध्य सम्मानित व् गरिमामयी भी रही, इस घरेलू स्त्री के अपने कुछ विशेषाधिकार भी रहे.....कन्या के रूप में भी और देवी के रूप में भी यह तमाम सभ्यताओं में पूज्य रही...मानव प्रजाति के यह दो रूप विघटित कब से होने लगे यह जरूर शोध का विषय है, समाज की किन मनोदशाओं ने यह अलगाववादी मानसिकता को जन्म दिया? कब ये टकराव सामने आये, उस एक ही मानव में ...स्त्री पुरुष के अलाहिदा हक व् हुकूक के ....&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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कही न कही मताधिकार के प्रयोग से वंचित रखना, युद्ध व् खेल के मैदान में सिर्फ पुरुषों का होना, तथा लेखन आदि कलाओं में पुरुषों को ही महत्त्व मिलना, ये सब का कारण एक ही लगता है की व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी &amp;nbsp;पुरुष के हाथ में होना, प्रासंगिक भी वही होता है जिसके हाथ में जिम्मेदारिया होती है और जो&amp;nbsp;उन्हें पूरा करता है, जाहिर है की तमाम अच्छे बुरे दोनों हालातों से स्त्रियाँ वंचित रही जिनसे पुरुष को ही दो चार होना था..आज वक्त बदला रहा सामाजिक व्यवस्थाएं भंग हो रही है, और स्त्री पुरुष के मध्य क़ानून की रेखाएं भी खींची जा रही है, एक पूर्णतया सरकारी व्यवस्था का अंग हो रहा है यह स्त्री पुरुष, और अब जब स्त्री पुरुष के बराबर दुनियाबी सभी कामों में शिरकत कर रही है, तो उसे भी दो चार होना पड़ रहा है उन कठिनाइयों से, जिनसे अभी तक पुरुष ही सामना करता आ रहा था, फिर चाहे वह आफिस में किया जाने वाला बुरा बर्ताव या फिर जंग के मैदान में दुश्मन की गोली, अब जो स्त्रियाँ इन कार्य क्षेत्रों में है जहां सिर्फ पुरुष ही थे कभी तो उन्हें भी उन सबसे गुजरना पड़ रहा है, कुलमिलाकर व्यवस्था में स्त्री पुरुष के समावेश से दोनों को को अब वह लाभ और हानि उठाने पड़ रहे है जिन्हें अभी तक पुरुष ही भोगता और झेलता आया है, फिर यह हल्ला क्यों....जब एक सी जिम्मेदारियां होगी तो जाहिर है टकराव होगा, जिम्मेदारियां जब बांटी गयी थी तब ये टकराव नहीं थे फिर चाहे वह माता की सत्ता की व्यवस्था हो या पिता की, हाँ स्वीकार्यता थी यहाँ पर स्त्री और पुरुष दोनों की एक दूसरे की सत्ता की......&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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आदि मानव से चलकर आदमी का कारवां&amp;nbsp;जब देवत्व की अवधारणा तक पहुंचा, देव-भाषाएँ गढ़ी गयी और उनमे देवी देवताओं की महिमा का गुणगान भी, वहां भी देवी अर्थात स्त्री सर्व-पूज्य रही, इसी देव भाषा अर्थात संस्कृत का एक शब्द है "महिला" जिसका पर्याय होता है "जो तमाम शक्तियों से विभूषित हो" बिनोवा भावे ने अपनी पुस्तक&amp;nbsp;"स्त्री शक्ति" में इस ब्रह्मचारी ने प्रकृति में महिला तत्व की बहुत सुन्दर व्याख्या की...किन्तु यदि आज के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मनाये जा रहे दिवसों की तरफ दृष्टी डाले तो यह सिर्फ दुनिया का सारा जिम्मा अपने ऊपर लेने वाली कुछ संस्थाओं की एक राजनैतिक कवायद है, बहुत से फंड को खर्च कर विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा खुद की प्रासंगिकता&amp;nbsp;सिद्ध करना ज्यादा जाहिर होता है इनमे, हालांकि इसी बहाने कुछ लाभ अवश्य मिल जाता है उस विषय वस्तु को जिस पर यह कथित&amp;nbsp;दिन आधारित होते है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च मुख्यता योरोप में सन २००९ में महिलाओं द्वारा किये गए आन्दोलन जो कि कपड़ों के व्यवसाय में सलग्न कामगार महिलाओं ने किया था, की स्मृति में मनाया जाता है, यह आन्दोलन भी सोशियालिज्म से प्रभावित था, बाद में सन २०१४ में जर्मनी में मताधिआर के लिए महिलाओं ने आन्दोलन किए और रूस में भी तमाम कामगार महिलाओं ने आवाज बुलंद की, सच्चाई ये थी की ये आन्दोलन दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ थे और साम्यवाद के उद्भव की यह शुरूवात थी. बस २६ फरवरी और आठ मार्च के मध्य जो असमंजस है वह जूलियन कैलेण्डर व् &amp;nbsp;ग्रेगेरियन कैलेण्डर के बीच की गणनाओं की रस्सा-कसी का नतीजा है....अब भारत ने भी पिछले वर्ष से सरोजनी नायडू के जन्म दिवस पर राष्ट्रीय&amp;nbsp;महिला दिवस मनाना शुरू ए किया है ....भारत में ही नहीं दुनिया में तमाम जीव जंतुओं के लिए दिवस घोषित किए है, सयुक्त राष्ट्र में बड़ी बड़ी योजनाए और कार्यक्रम बनते है, किन्तु बाघ दिवस हाथी दिवस आदि दिवसों की जगह पर उनके दिवसों को लिंग के आधार पर  दिवस मनाने की परम्परा अभी नहीं शुरू हुई, यहाँ लिंग भेद नहीं है, प्रजाति पर फोकस है!...&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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फिर मौजूदा वक्त में ये दिवस उल्ल्हास का प्रतीक नहीं रहे, जिस भी जीव पर संकट मँडराता&amp;nbsp;है, उसके नाम से दिवस घोषित कर दिए&amp;nbsp;जाते है, यह दिवस प्रतीक है उस विषय के लिए जिसके लिए दिवस मनाया जा रहा है, तो फिर संस्कृत का यह शब्द क्या झूठा जिसमे स्त्री को महिला शब्द से चिन्हित किया गया, जो शक्तियों से विभूषित है, जिसकी सत्ता घर और समाज दोनों में है, नजरिया बदलने की आवश्यकता है समाज को संस्कार देने की भी, क्योंकि कोई&amp;nbsp;भी क़ानून किसी के अधिकार पूर्णतया नहीं दिला सकता जब तक उसकी सामाजिक मान्यता नहीं और न ही अपराधों को रोक सकता है, स्त्री या पुरुष दोनों की पहचान समाज में उसके कुल जाति&amp;nbsp;&amp;nbsp;धर्म से होती थी, अब सरकारी दस्तावेजों में सामान्य पिछड़ी और अनुसूचित जाति&amp;nbsp;&amp;nbsp;में होती है, बस हमने पुराना तानाबाना ख़त्म कर एक नई व्यवस्था लागू कर दी, किन्तु क्या इन सभी अगड़ों या पिछड़ी जातियों में एकता आ गयी ..एक जगह नाम दर्ज कर देने से ...खैर सरकारी अधिकार महिला पुरुष दोनों के बराबर हो यह जरूरी है किन्तु इनके बीच सरकारी लकीर न खींची जाए और न ही इन्हें सामाजिक व्यवस्था से अलाहिदा किया जाए....क्योंकि क़ानून समाज के बाद का मुद्दा होता है....और सामाजिक न्याय सरकारी न्याय से बड़ा ...&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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दिवसों के पीछे छुपी बेचारगी और आडम्बर&amp;nbsp;युक्त करुणा से दूर ही रहे तो अच्छा है, क्रान्तियाँ&amp;nbsp; हो पर मुद्दों पर फिर वो चाहे महिला के मताधिकार की हो यह उसके नौकरी या व्यवसाय से जुडी हो, तभी शायद मैंने कही लिखा था की "अब पुरुष दिवस कब मनाया जाएगा" उसके पीछे भी यही वजह थी ! एक व्यंग जिसके पीछे वो तथ्य है जो कमजोरी बयान करते है दिवसों को आक्षेपित करने वाले जीव या वस्तु की&amp;nbsp;!&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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प्रकृति को सब मालूम होता है तभी तो उसने विद्धुत ऊर्जा के आविष्कार से करोड़ो&amp;nbsp;वर्ष पहले पक्षियों के पंजों को रक्तहीन बनाया ताकि बिजली के तारों में दौड़ते करंट से वह बच सके, और एकलिंगी पुष्पों के अलावा द्विलिंगी&amp;nbsp;&amp;nbsp;पुष्प भी ताकि महिला पुरुष जैसे पुष्प अलाहिदा होने लगे कानून की किताबों से लेकर यथार्थ में भी तब भी प्रकृति की गति यूं ही चलती रहे....!!&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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शुभकामनाएं और महिलाओं से क्षमा यदि कुछ यथोचित न लगे मेरे लेखन में !&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhhd0XkwuTdk1y7f4K56uTLEU4VCQHTiC7qC7DSuRuuUQTBMnynmuGL_-PHw9yQ03KEFMWZR5duQdxINcR4aUhvdwL8aJ1FRztO617jaTcCTDQrCLYfrf7Jb38BObAL5-o1mqXiXfALTjNJ/s1600/kkk.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhhd0XkwuTdk1y7f4K56uTLEU4VCQHTiC7qC7DSuRuuUQTBMnynmuGL_-PHw9yQ03KEFMWZR5duQdxINcR4aUhvdwL8aJ1FRztO617jaTcCTDQrCLYfrf7Jb38BObAL5-o1mqXiXfALTjNJ/s1600/kkk.jpg" height="320" width="227" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;i&gt;कृष्ण कुमार मिश्र&amp;nbsp;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;i&gt;krishna.manhan@gmail.com&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;कृपया अपने महत्वपूर्ण सुझाव देने का कष्ट करे !&lt;/div&gt;</description><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhRX4HrR_vQeBitwKr4VsMCcTdVkILUN1pxQOaJurJLpJ0R_qSsKbubjR-4fOtyucRGrtVLfxdvy77ajk8BmiU9AtB62n8X0CBNnHJgqmJ-pVoMQJgUT8R3x2Gla9TiapaJrO5LbWaDMVZ6/s72-c/89710017.JPG" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>तितली वाला फूल.....</title><link>http://krishnakumarmishra.blogspot.com/2014/04/antimalarial-plant-of-north-india.html</link><category>agriculture</category><category>ayurveda</category><category>botany</category><category>drugs</category><category>flower</category><category>india</category><category>krishna kumar mishra</category><category>lakhimpur kheri</category><category>malaria</category><category>orgemon mexicana</category><category>Plasmodium falciparum</category><category>poison</category><category>sedative</category><category>soil conservation</category><category>spain</category><author>noreply@blogger.com (KK Mishra of Manhan)</author><pubDate>Wed, 2 Apr 2014 21:36:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414920369734943655.post-2736774529405036174</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_enXrJPc7Xv52zAfe2inaNuvTQKxNahnYt3q6B66FXqmq9-vs5UTb66udX8Xl7dnAqTv_fTY-nsh5bbhzeL_v-U-n9y8ZrlCTqFvUUN2ObMQaYVdCrqB7t0zEn6aakFCEAm5VPBmoBimT/s1600/orgemone_kkmishra160.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_enXrJPc7Xv52zAfe2inaNuvTQKxNahnYt3q6B66FXqmq9-vs5UTb66udX8Xl7dnAqTv_fTY-nsh5bbhzeL_v-U-n9y8ZrlCTqFvUUN2ObMQaYVdCrqB7t0zEn6aakFCEAm5VPBmoBimT/s1600/orgemone_kkmishra160.jpg" height="480" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;ऊँट-कटैया जो मलेरिया को कर सकती है ख़त्म&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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ये है&amp;nbsp;मैक्सिकन पॉपी, इसका वैज्ञानिक नाम है आर्जीमोन मेक्सिकाना, पेपवेरेसी कुल का यह पौधा भारत में कब आया यह तो सुनश्चित नहीं है, किन्तु आर्यवेद में इसके औषधीय महत्वों का वर्णन संकलित होने से यह बात तो पुख्ता हो जाती है, कि यह प्रजाति भारत में पुरानी है, आयुर्वेद में इसे स्वर्ण-क्षीरी कहते है, वजह यह कि इसके डंठलों व् पत्तियों को तोड़ने से इसमें पीले रंग का गाढ़ा द्रव निकलता है, और इस द्रव में वो जहरीले रसायन मौजूद है, जो तमाम रोगों के मूल-विनाश की खासियत रखते है, आर्जीमोन मेक्सिकाना का एक प्रचलित नाम और है सत्यानाशी, शायद इस पौधे की नुकीली कांटेदार पत्तियाँ, और इसके जहरीले द्रव के कारण ये नाम पड़ा हो, इसी जहरीले होने की&amp;nbsp;वजह से यह पौधा जानवरों से सुरक्षित रहता है, और यह किसी भी प्रकार की पारिस्थितिकी में अपनी जड़े जमा लेने की कूबत रखता है, खासकर सूखी व् रेतीली जमीनों पर यह प्रजाति अपने सुन्दर पीले फूलों को खिला लेती है, प्रत्येक दशा में, &amp;nbsp;मुर्दा जमीन में सूखे की स्तिथि में &amp;nbsp;रेगिस्तानी जमीन &amp;nbsp;में&amp;nbsp;भी इस प्रजाति का उग आना ही इसके ऊँट-कटैया नाम का कारण बना.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
आयुर्वेद में एक ही पौधे के तमाम हिस्सों का इस्तेमाल तमाम बीमारियों में औषधि के तौर पर किया जाता है, ऊँट-कटैया की पत्तियाँ, पुष्प और जड़ का भी अलग अलग इस्तेमाल है. यहाँ एक बात बता देना जरूरी है, कि आर्जीमोन मेक्सिकाना के फलों से प्राप्त होने वाले दानेदार बीज सरसों के बीजों से मिलते जुलते है, जिस कारण इन बीजों का इस्तेमाल मिलावट खोरो द्वारा&amp;nbsp;सरसो के बीजों के साथ कर दिया जाता है, यही वजह नहीं की भारत में बीसवीं सदी&amp;nbsp;के नवे&amp;nbsp;दशक में लोगों में ड्राप्सी की बीमारी ने महामारी का रूप धारण कर लिया था, इन जहरीले बीजों से निकाला हुआ तेल मनुष्य के शरीर में जहरीले प्रभाव छोड़ता है जिसमे सारे शरीर पर सूजन पैदा हो जाती है विशेषकर पैरों में.…।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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मैक्सिको के निवासी पारम्परिक तौर पर ऊँट-कटैया का इस्तेमाल किडनी से सम्बंधित बीमारियों में, प्लेसेंटा को&amp;nbsp;बाहर निकालने में, और जन्म के पश्चात बच्चे की साफ़ सफाई में करते आये है, इस पौधे&amp;nbsp;का&amp;nbsp;&amp;nbsp;इस्तेमाल मनुष्य और जानवरों दोनों पर होता है. स्पेन के लोगो द्वारा भी आर्जीमोन मेक्सिकाना का &amp;nbsp;बड़ा रोचक&amp;nbsp;इस्तेमाल किया गया, उन लोगों ने इस पौधे को सुखाकर उसका चूर्ण बनाकर नशे के लिए इस्तेमाल किया। महिलाओं के जननांगों से सम्बंधित समस्यायों&amp;nbsp;में इस ऊँट-कटैया की जड़ अतयधिक लाभदायक होती है.&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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माली में ऊँट-कटैया मलेरिया रोधी के तौर पर प्रयोग में लाई जाती है पारम्परिक तौर पर. प्लाज्मोडियम फैल्सीपैरम प्रोटोजोआ&amp;nbsp;जो की मलेरिआ का कारक है, और क्लोरोक्विन जैसी दवावों से प्रतिरोध हो गया है ऐसी स्तिथि में आर्जीमोन मेक्सिकाना के रस&amp;nbsp;&amp;nbsp;में पाये जाने वाले रसायन में&amp;nbsp;प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरस को नष्ट कर देने की क्षमता देखी गयी, यह प्रयोग स्विस ट्रापिकल इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए.&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&amp;nbsp;वैसे इस पौधे की एक बड़ी खासियत यह है कि इसके चूर्ण&amp;nbsp;व् धुए से दीमक और अन्य कीट समाप्त हो जाते है, इसलिए यह&amp;nbsp;&amp;nbsp;बेहतरीन बायो-पेस्टीसाइड के रूप में भी प्रयोग में लाया जा सकता है.&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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मुर्दा जमीनों में भी आर्जीमोन मेक्सिकाना के पौधों को सड़ाकर डालने से यह उर्वरक का कार्य करता है, और मृदा की क्षारीयता&amp;nbsp;को नष्ट कर देता है. इस प्रकार&amp;nbsp;भूमि सुधार में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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यहाँ एक गौरतलब बात यह है, कि तमाम देशी-विदेशी पंजीकृत अथवा अपंजीकृत कम्पनियां बेवसाइट बनाकर इन औषधीय वनस्पतियों से बने चूर्ण, अवलेह या पूरे सूखे हुए पौधों को बेंच&amp;nbsp;रही है, और बीमारियों के शर्तिया इलाज की घोषणा करते हुए ये आयुर्वेद की वैज्ञानिक पद्धितियों को धता बताते हुए लोगों को गुमराह कर रही है, सरकार को अवश्य इस सन्दर्भ में कानूनी प्रक्रियाएं अपनानी चाहिए ताकि देश की अमूल्य वनस्पतियों का दोहन रुक सके और आयुर्वेद की गुणवत्ता बरकरार रह सके.&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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प्रकृति सदैव सुन्दर होती है, धरती की यही खासियत है अगर उसमे कोइ घातक जीव उत्पन्न होता है तो निश्चित जान लीजिए की उसका एंटीडोट प्रकृति ने पहले से तैयार कर रखा है, बशर्ते आप की नज़ारे उसे खोज पाए, प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरस जैसा प्रोटोजोआ&amp;nbsp;अगर प्रकृति में उत्पन्न हुआ तो आर्जीमोन मेक्सिकाना भी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में यह प्रजाति खूब मौजूद है और इसका पारम्परिक इस्तेमाल भी, साथ इसके षष्ठ-पत्रों वाले&amp;nbsp;पीत&amp;nbsp; वर्ण के पुष्प बृहस्पति भगवान् अर्थात गुरू भगवान् की आराधना में भी प्रयुक्त किये जाते है जनमानस में.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;b&gt;चरक&lt;/b&gt; ने उद्धत किया है कि स्वर्ण क्षीरी या कनक क्षीरी को नारायण चूर्ण और क्षार गुटिका के साथ लेने से उदर के तमाम रोग दूर हो जाते है, साथ ही इसके पुष्प पत्रों को ल्यूकोडर्मा जैसे रोग में लाभदायक बताया है. परंपराओं में &amp;nbsp;स्वर्ण&amp;nbsp;क्षीरी की जड़ बाल धुलने में प्रयुक्त होती रही है इसमें मौजूद रसायन बालों के परजीवियों को नष्ट कर देने की क्षमता रखते है,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;सुश्रुत &lt;/b&gt;ने कनक क्षीरी को उदर में सूजन, आहार नाल के पक्षाघात में लाभप्रद बताया, साथ ही इसे त्वचा रोगों को दूर कर देने की अद्भुत क्षमता का गुणगान किया है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ एक बात महत्त्व पूर्ण है कि प्राचीन&amp;nbsp;आयुर्वेद में स्वर्ण क्षीरी या कनक क्षीरी आर्जीमोन मेक्सिकाना नहीं है, मूल वनस्पति के स्थान पर कालान्तर में वास्तविक कनक क्षीरी की अनुलपब्धता के कारण&amp;nbsp;आयुर्वेदाचार्यों ने आर्जीमोन मेक्सिकाना का प्रयोग वास्तविक कनक क्षीरी के स्थान पर करना शुरू कर दिया था, क्योंकि वास्तविक कनक क्षीरी के सभी गुण इस वनस्पति से मिलते जुलते थे.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्जीमोन मेक्सिकाना यानि ऊँट कटैया या कनक क्षीरी का विकल्प है, इसमें आईसक्युनोलिन अल्केलायडस मौजूद होता है जो ओपियम पॉपी (अफीम) में भी पाया जाता है, &amp;nbsp;इसका ताजा लैटेक्स यानी निकलने वाला गाढ़ा पीला द्रव प्रोटीन को पिघलाने की क्षमता होती है इस कारण ऊँट कटैया के द्रव को मस्से, गाँठ व् होंठों पर धब्बे आदि को गलाने में प्रयुक्त करते है, ये पूरा पौधा दर्द निवारण की क्षमता रखता है. इसके बीज अस्थमा में और पुष्प कफ जैसी व्याधियों में गुणकारी है, परन्तु ऊँट कटैया का प्रयोग बिना डाक्टर की अनुमति के न करे उसका परामर्श आवश्यक है, क्योंकि की ऊँट कटैया का विषाक्त लक्षण के कारण&amp;nbsp;सही से उपयोग न करने पर नुक्सान भी पहुंचा सकता है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लखीमपुर खीरी उत्तर भारत का तराई जनपद जहां ये ऊँट कटैया के पुष्पों की&amp;nbsp;पीतवर्ण आभा मेरे घर के आस&amp;nbsp;पास मौजूद है, मार्च में यहाँ इस प्रजाति में पुष्पं आरम्भ हो जाता है.&amp;nbsp;यह एक वर्षीय पौधा है, जो बीजों के परिपक्व होने के साथ ही सूख जाता है, फलों के फटने से बीजों&amp;nbsp;का प्रकीर्णन आरम्भ होता&amp;nbsp;है, हवा पानी और जीवों के द्वारा, धरती पर&amp;nbsp;दोबारा अपना जीवन चक्र शुरू करने के लिए. इसके पुष्प की चटक पीली&amp;nbsp;पंखुड़िया तितली के झीने पंखों की तरह होती है, इस लिए इन चमकीले व् पतले पुष्प पर्णों को देखकर बच्चो के मुख से बरबस निकल जाता है "तितली वाला फूल"....&lt;br /&gt;
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ऊँट -कटैया यानि आर्जीमोन मेक्सिकाना को मैक्सिको की धरती का पौधा माना जाता है, और दुनिया में कही और इसके पाये जाने पर इसे विदेशी मूल का होने का दर्जा दे दिया जाता है, क्या पता हमसे पहले जिन लोगों ने वनस्पतियों का अध्ययन किया हो तो उन्हों ने जिस प्रजाति को अपने आस पास देखा हो उसे अपने मूल का बता दिया, किन्तु यह जरूरी तो नहीं कि वह उसी धरती का पौधा हो, प्रकृति के अध्ययन में देशवाद को शामिल नहीं करना चाहिए नहीं तो सुन्दर व् गुणवान वनस्पति भी सुन्दर नहीं दिखेगी और हैम उनके गुणो से वांछित रह जायेगे। ।&lt;/div&gt;
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धरती पर जैव-विकास की प्रक्रियाओ के वक्त भूभागों के विघटन और जुड़ाव दोनों हुए कौन सी प्रजाति अचानक अलाहिदा हो गयी अपने समुदायों से और कब इसका अध्ययन हुआ होगा और हो भी रहा है, मनुष्य के द्वारा तमाम प्रजातियां एक भूभाग से दुसरे भूभाग ले जाईं गयी और उन वांछित प्रजातियों के साथ तमाम अवांछित प्रजातियां भी आ गयी। ।कह्ते है वनस्पतियों के साथ क्वारंटाइन जैसी स्थिति&amp;nbsp;नहीं होती, वे अपनी जमीन तलाश लेती है, और वो भी भूमंडलीकृत होकर। देशों की सीमाए उन्हें नहीं बाँध पाती। शायद इसलिए देशी विदेशी प्रजाति के मसले को मुद्दा न बनाकर वनस्पतियों के गुणों से रूबरू हो, जिस वनस्पति को आपकी जमीन ने अपना लिया उसके साथ आखिर&amp;nbsp;विदेशी मूल का मुद्दा क्यों?&lt;br /&gt;
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हमारी पीढ़ी के ग्रामीण बच्चों को जरूर याद होगा स्वर्ण क्षीरी यानि ऊँट कटैया के पीले पुष्पों की पंखुड़ियों से सीटी बजाना। …एक ग्रामीण खेल प्रकृति के खिलौनों के साथ ! जो अब नदारद है!&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;कृष्ण कुमार मिश्र&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;krishna.manhan@gmail.com&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;कृपया अपने महत्वपूर्ण सुझाव देने का कष्ट करे !&lt;/div&gt;</description><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_enXrJPc7Xv52zAfe2inaNuvTQKxNahnYt3q6B66FXqmq9-vs5UTb66udX8Xl7dnAqTv_fTY-nsh5bbhzeL_v-U-n9y8ZrlCTqFvUUN2ObMQaYVdCrqB7t0zEn6aakFCEAm5VPBmoBimT/s72-c/orgemone_kkmishra160.jpg" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total></item><item><title>कुछ नुकूश लाया हूं, इस कायनात से....कृष्ण</title><link>http://krishnakumarmishra.blogspot.com/2012/08/blog-post.html</link><category>apple</category><category>bhira</category><category>flood</category><category>forest</category><category>jungles</category><category>krishna kumar mishra</category><category>lakhimpur</category><category>lotus</category><category>palia</category><category>photography</category><category>sharda river</category><category>suheli</category><category>village</category><category>wild fruit</category><author>noreply@blogger.com (Dudhwa Live)</author><pubDate>Tue, 28 Aug 2012 03:35:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414920369734943655.post-8339464691363016946</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEieMZCLHC1FODRAok4epO9dQzRMb_Ra_RcaoUD18Kjn_iFo-kwnz6QGjW_wtV5KxpU_BPA_n2X1AX2l_6iX3DhlG9JkrRzyvLgpY2zZuxPyyyWlwgEiZIhHxzmjM5wJwMkpcqGspIf03cP-/s1600/DSCF7554.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="480" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEieMZCLHC1FODRAok4epO9dQzRMb_Ra_RcaoUD18Kjn_iFo-kwnz6QGjW_wtV5KxpU_BPA_n2X1AX2l_6iX3DhlG9JkrRzyvLgpY2zZuxPyyyWlwgEiZIhHxzmjM5wJwMkpcqGspIf03cP-/s640/DSCF7554.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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दुधवा नेशनल पार्क के बीच से गुजरती वह सड़क जो नेपाल देश को जाती है, उस पर बने सुहेली के पुल के समीप ये नज़ारा है, कमल के गहरे हरे पत्तों पर पड़ी बारिश की बूंदे, जो जहन को ....पाकीजगी का एहसास कराती है।--कृष्ण&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjohCgMTmyLWiK7BlQBnzD9iXBXjlcvIH9Isqz3hwaoNHJAiebZRTTHaCdXshp12dPSSC05ijQ6pAlzwrg5wNSnIQ1c8gHomrMs_S7TItmjAGRbtHnWoOFe-WVCcjbjQ2MxJawZXul14uBw/s1600/DSCF7548.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="480" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjohCgMTmyLWiK7BlQBnzD9iXBXjlcvIH9Isqz3hwaoNHJAiebZRTTHaCdXshp12dPSSC05ijQ6pAlzwrg5wNSnIQ1c8gHomrMs_S7TItmjAGRbtHnWoOFe-WVCcjbjQ2MxJawZXul14uBw/s640/DSCF7548.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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ये दुधवा राष्ट्रीय उद्यान के जंगल है, जहां सुहेली में सिल्ट की अधिकता की वजह से जल भराव तकरीबन पूरे वर्ष रहता है, नतीजा सामने है कि दरख्त अपनी&amp;nbsp; जिन्दगियां खो चुके है, और यह जगह एक विशाल जलाशय की जगह ले चुकी है, और इसमें उग&amp;nbsp; आयी है कई तरह की घासें और खूबसूरत कमल..&lt;b&gt;."जीवन तो अपनी जगह तलाश ही लेता है बस रूप बदल जाते हैं"&lt;/b&gt; --कृष्ण&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj48tGwkkzMPSeula9Y0WWegaxQeXgVIZbF964cAAXqIzirFevUs-KZOVgZJ43EmlFYkAXhRTSjoJ9nR_kS-L0VQQQq9s66HTUKuj7s-Hj2zFo6wfc4hQ7CQKZ6PGbWN5SN0ruuPWzwusoI/s1600/DSCF7608.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="480" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj48tGwkkzMPSeula9Y0WWegaxQeXgVIZbF964cAAXqIzirFevUs-KZOVgZJ43EmlFYkAXhRTSjoJ9nR_kS-L0VQQQq9s66HTUKuj7s-Hj2zFo6wfc4hQ7CQKZ6PGbWN5SN0ruuPWzwusoI/s640/DSCF7608.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhAEc-GOQzZKRNsPBfKQgBpHFbXdPaFlgGiOlenOesoeuNi8dGN8HQqe9LbF0TjaRoZQjtOvyaCAYMd32fyRkQideRsizYGi_I5YqZNf1fPoVXLWLMK4IRCsDN0rWL6WuJXZQnOXVo7A_D3/s1600/DSCF7607.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="480" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhAEc-GOQzZKRNsPBfKQgBpHFbXdPaFlgGiOlenOesoeuNi8dGN8HQqe9LbF0TjaRoZQjtOvyaCAYMd32fyRkQideRsizYGi_I5YqZNf1fPoVXLWLMK4IRCsDN0rWL6WuJXZQnOXVo7A_D3/s640/DSCF7607.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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जब बारिश का मौसम आता है, तो आसमान की खूबसूरती कुछ यूँ हो जाती है, कि हम नदियों के देश में रहने वालों को समन्दर सा एहसास होता है, इन बादलों को स्वच्छ नीले आसमान में उमड़ते घुमड़ते देखकर....कृष्ण&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiMmV1fE2VC9-qxWjNb7MsAQXNKknsRYSITRGxxonNM3024S0mIuNC77MFEoKyiPZM-gytiBNnbs7YKZIJDxsUK251n710LqN6WZItHo26goxlMRMhcdT8tSkSnE4IimhOG8uZVHs3IGUfU/s1600/DSCF7529.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="420" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiMmV1fE2VC9-qxWjNb7MsAQXNKknsRYSITRGxxonNM3024S0mIuNC77MFEoKyiPZM-gytiBNnbs7YKZIJDxsUK251n710LqN6WZItHo26goxlMRMhcdT8tSkSnE4IimhOG8uZVHs3IGUfU/s640/DSCF7529.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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क्या ऐसे सेब कभी देखे.....हां ये एक ऐसी वनस्पति है? जो दुधवा के जंगलों में मौजूद है और बारिश के दिनों में ही फ़लती हैं।....कृष्ण&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi9lTPPLoVbu68qzdwbDwBHgOKoSwLKFHf9O8Tl7MmoedYs9yEhQG5jaql-pFVJx6JUYRzudR06CIJcSbpjwtaHp6RmBbQhZQfJsKSeorkcDNSDFHtrC7zcjPfQljslb2dbw03H0IbXsuj6/s1600/DSCF7564.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi9lTPPLoVbu68qzdwbDwBHgOKoSwLKFHf9O8Tl7MmoedYs9yEhQG5jaql-pFVJx6JUYRzudR06CIJcSbpjwtaHp6RmBbQhZQfJsKSeorkcDNSDFHtrC7zcjPfQljslb2dbw03H0IbXsuj6/s640/DSCF7564.jpg" width="480" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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इस हरियाली में कौन दीवाना न हो जाए:&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgkxHLkOtUEeKWtmtbgP3yXeIN74eE8Gr0RQ8RueewdAge4lXwhffvo_kOHlDnjSZwwYvhZGCtfn3w6_-o9vwL3DLy7SHVOgWFo5Jf-74gIKb43DZDnd4PxXoDy_0yG_nf0dnk_zfA0E17j/s1600/DSCF7588.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="480" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgkxHLkOtUEeKWtmtbgP3yXeIN74eE8Gr0RQ8RueewdAge4lXwhffvo_kOHlDnjSZwwYvhZGCtfn3w6_-o9vwL3DLy7SHVOgWFo5Jf-74gIKb43DZDnd4PxXoDy_0yG_nf0dnk_zfA0E17j/s640/DSCF7588.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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इन माँ-बेटे को देखिए बड़ा उत्सुक है हमारी हरकतों में।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh23JheG24HmaoWwTFVvASeZz5iQLX56aFGJZee098-67hrd4Qf4lJQYDiuw4j6pqf2Nbgacjxyzw0EPCUHwMC6MLDap98FsLluQJfDNSwqz_iizhz6rzhhiyEeosJxrjYC-S_ohE90Jw2_/s1600/DSCF7451.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh23JheG24HmaoWwTFVvASeZz5iQLX56aFGJZee098-67hrd4Qf4lJQYDiuw4j6pqf2Nbgacjxyzw0EPCUHwMC6MLDap98FsLluQJfDNSwqz_iizhz6rzhhiyEeosJxrjYC-S_ohE90Jw2_/s640/DSCF7451.jpg" width="480" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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यह शायद एक तस्वीर है साधारण सी, जिसे कलात्मक बनाने की भी कोशिश की मैने...किन्तु इस तस्वीर के आखिरी छोर पर देखिए जो हरी मुड़ेर सी दिख रही है, वह किशनपुर वन्य जीव विहार है, और इस नाव पर रखी हुई घास जो इस जल के मध्य उस टापू की है जिस पर पानी दस्तक नही दे पाया इस बार अभी..जानते है ये टापू पर कभी एक गां बसता था बोझवा (भीरा के निकट जनपद -खीरी) लेकिन शारदा मैया के प्रकोप ने इस गांव को नष्ट कर दिया। अब गांव वाले भीरा पलिया सड़क पर झोपड़ियां बना कर बसर कर रहे हैं.....कृष्ण&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&amp;nbsp;बस आज इतना ही......&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;कृष्ण कुमार मिश्र&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;दूरभाष: 09451925997&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;कृपया अपने महत्वपूर्ण सुझाव देने का कष्ट करे !&lt;/div&gt;</description><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEieMZCLHC1FODRAok4epO9dQzRMb_Ra_RcaoUD18Kjn_iFo-kwnz6QGjW_wtV5KxpU_BPA_n2X1AX2l_6iX3DhlG9JkrRzyvLgpY2zZuxPyyyWlwgEiZIhHxzmjM5wJwMkpcqGspIf03cP-/s72-c/DSCF7554.jpg" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total></item></channel></rss>