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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" gd:etag="W/&quot;CE4DQn0zcSp7ImA9WhRUGEQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085</id><updated>2012-01-29T19:09:33.389-08:00</updated><category term="(hasya-vyang)" /><category term="one liner" /><category term="(jokes" /><category term="दिग्विजय सिंह" /><category term="(poem)" /><category term="(कविता/नज़्म)" /><category term="(व्यंग्य)" /><category term="JOKES)" /><category term="ONELINER" /><category term="(vyangya)" /><category term="(KALMADI" /><category term="कविता/नज़्म" /><category term="kalmadi)" /><category term="(हास्य-व्यंग्य)" /><category term="(hasya-vyangya)" /><category term="(हास्य-व्यंग्य" /><category term="लादेन)" /><title>व्यंजना</title><subtitle type="html" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>168</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/atom+xml" href="http://feeds.feedburner.com/vyanjana" /><feedburner:info xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" uri="vyanjana" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><feedburner:emailServiceId xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">vyanjana</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><entry gd:etag="W/&quot;C04AQXg6fyp7ImA9WhZWF04.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-5340197566491259563</id><published>2011-05-18T08:15:00.000-07:00</published><updated>2011-05-18T08:19:00.617-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-05-18T08:19:00.617-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>एक आध्यात्मिक घटना!</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-bHP-qfvszDM/TdPjW1Tda8I/AAAAAAAAAEc/xp_8m5s_MwU/s1600/girls.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 175px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-bHP-qfvszDM/TdPjW1Tda8I/AAAAAAAAAEc/xp_8m5s_MwU/s200/girls.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5608075942411725762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल परीक्षा परिणामों का सीज़न चल रहा है। रोज़ अख़बार में हवा में उछलती लड़कियों की तस्वीरें छपती हैं। नतीजों के ब्यौरे होते हैं, टॉपर्स के इंटरव्यू। तमाम तरह के सवाल पूछे जाते हैं। सफलता कैसे मिली, आगे की तैयारी क्या है और इस मौके पर आप राष्ट्र के नाम क्या संदेश देना चाहेंगे आदि-आदि। ये सब देख अक्सर मैं फ्लैशबैक में चला जाता हूं। याद आता है जब मेरा दसवीं का रिज़ल्ट आना था। अनिष्ट की आशंका में एक दिन पहले ही नाई से बदन की मालिश करवा ली थी। कान, शब्दकोश में न मिलने वाले शब्दों के प्रति खुद को तैयार कर चुके थे। तैंतीस फीसदी अंकों की मांग के साथ तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को सवा रूपये की घूस दी जा चुकी थी और पड़ौसी, मेरे सार्वजिनक जुलूस की मंगल बेला का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं फेल होने का डर बुरी तरह से तन-मन में समा चुका था और उससे भी ज़्यादा साथियों के पास होने का। मैं नहीं चाहता था कि ये ज़िल्लत मुझे अकेले झेलनी पड़े। उनका साथ मैं किसी कीमत पर नहीं खोना चाहता था। उनके पास होने की कीमत पर तो कतई नहीं। दोस्तों से अलग होने का डर तो था ही मगर उससे कहीं ज़्यादा उन लड़कियों से बिछड़ जाने का था जिन्हें इम्प्रैस करने में मैंने सैंकड़ों पढ़ाई घंटों का निवेश किया था। असंख्य पैंतरों और सैंकड़ों फिल्मी तरकीबें आज़माने के बाद ‘कुछ एक’ संकेत भी देने लगी थीं कि वो पट सकती हैं। ये सोच कर ही मेरी रूह कांप जाती थी कि फेल हो गया तो क्या होगा! मेरे भविष्य का नहीं, मेरे प्रेम का! या यूं कहें कि मेरे प्रेम के भविष्य का!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर पिताजी के हाथों मेरी हड्डियां और प्रेमिका के हाथों दिल टूटने से बचाने की सारी ज़िम्मेदारी अब माध्यमिक शिक्षा बोर्ड पर आ गयी थी। इस बीच नतीजे आए। पिताजी ने तंज किया कि फोर्थ डिविज़न से ढूंढना शुरू करो! गुस्सा पी मैंने थर्ड डिविज़न से शुरूआत की। रोल नम्बर नहीं मिला तो तय हो गया कि कोई अनहोनी नहीं होगी! (फर्स्ट या सैकिंड डिविज़न की तो उम्मीद ही नहीं थी) पिताजी ने पूछा कि यहीं पिटोगे या गली में.....इससे पहले की मैं ‘पसंद’ बताता...फोन की घंटी बजी...दूसरी तरफ मित्र ने बताया कि मैं पास हो गया...मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था....पिताजी भी खुश थे...आगे चलकर मेरा पास होना हमारे इलाके में बड़ी 'आध्यात्मिक घटना' माना गया....जो लोग ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे, वो करने लगे और जो करते थे, मेरे पास होने के बाद उनका ईश्वर से विश्वास उठ गया!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-5340197566491259563?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/5340197566491259563/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=5340197566491259563&amp;isPopup=true" title="15 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/5340197566491259563?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/5340197566491259563?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2011/05/blog-post_9423.html" title="एक आध्यात्मिक घटना!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-bHP-qfvszDM/TdPjW1Tda8I/AAAAAAAAAEc/xp_8m5s_MwU/s72-c/girls.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>15</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkIBSHo-fyp7ImA9WhZXF0k.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-5502137883286195273</id><published>2011-05-06T23:06:00.000-07:00</published><updated>2011-05-06T23:09:19.457-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-05-06T23:09:19.457-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दिग्विजय सिंह" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लादेन)" /><title>“मैंने ओसामा जी नहीं, ओसामा जीजा जी कहा था!”</title><content type="html">ओसामा बिन लादेन की मौत और उसके बाद आए दिग्विजय सिंह के बयान पर कुछ वनलाइनर लिखे हैं।  आप इन वनलाइनर्स को फेसबुक के फ़ेकिंग न्यूज़ पेज (facebook.com/hindifakingnews) पर भी पढ़ सकते हैं। झेलिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भले ही ओसामा बिन लादेन हमारे बीच नहीं रहे मगर हमें उनके अधूरे काम को पूरा करना है"-दिग्विजय सिंह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओसामा की पहचान के लिए अमेरिका अब उसका डीएनए टेस्ट करवाएगा मुझे डर है कि कहीं वो नारायण दत्त तिवारी का बेटा न निकले!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओबामा की मौत का स्वागत करते हुए मनमोहन सिंह ने एक बार फिर से सोनिया गांधी के कुशल नेतृत्व की तारीफ की है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका का कहना है कि ओसामा की मौत का क्रेडिट महेंद्र सिंह धोनी को जाता है क्योंकि उसी के 'हैलीकॉप्टर शॉट' से अमेरिकी सेना ने प्रेरणा ली थी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफसोस...ओसामा अपनी वसीयत 2001 में लिख गए अगर 2011 में लिखी होती तो ऐबटाबाद की हवेली दिग्विजय सिंह के नाम कर देते#Osama ji&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह का कहना है कि मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। मैंने ओसामा जी नहीं, ओसामा जीजा जी कहा था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान एक 'भाड़' प्रभावित देश है। अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति तक यहां हर चीज़ यहां भाड़ में जा रही है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान ने अपनी कुछ ज़मीन चीन को दे रखी है, कुछ तालिबान ने हथिया ली है और उसके मुताबिक कुछ पर इंडिया ने कब्ज़ा कर रखा है। जब उसे ये नहीं पता कि पाकिस्तान में पाकिस्तान कहां है.... तो ये कैसे पता होता कि ओसामा पाकिस्तान में है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकी सेना पर फेंकने के लिए दिग्विजय सिंह जल्द ही पाकिस्तानियों को अपनी अक्ल पर पड़ा पत्थर देंगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग कहते हैं कि हमें पाकिस्तान पर हमला कर उसे नष्ट कर देना चाहिए, वो उसे underestimate कर रहे हैं। मुझे पाकिस्तान की 'क्षमता' पर पूरा यकीन है। थोड़ा सब्र रखें... एक दिन वो खुद ही अपने आप को बर्बाद कर लेगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह का कहना है कि जब मुझ जैसा आदमी ज़िंदा घूम रहा है तो अफज़ल गुरू को फांसी क्यों दी जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान ठीक वैसे ही अमेरिका के साथ है जैसे वर्ल्ड कप में श्रीसंत इंडियन टीम के साथ थे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान करे भी तो क्या करे...तालिबान से उसका मन मिलता है और अमेरिका से उसे धन मिलता है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान का कहना है कि हमारी खुफिया एजेंसियां ओसामा को इसलिए नहीं पकड़ पाईं क्योकि उसे पकड़ने की ट्रेनिंग..... कामरान अकमल ने दी है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह की सेवाओं से प्रभावित हो कर कांग्रेस आलाकमान ने पिक-ड्रॉप के लिए उन्हें पवन हंस हैलीकॉप्टर देने का फैसला किया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओसामा बिन लादेन के डीएनए टेस्ट के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसी इस नतीजे पर पहुंची हैं कि वो दिग्विजय सिंह के बाप हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Pigvijay Singh का कहना है कि इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है। कांग्रेस में रहकर मैंने 'जी हुज़ूरी' ही सीखी है इसलिए ओसामा के आगे भी 'जी' लगा बैठा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS:मारी गयी औरत, जिसके बारे में पहले कहा जा रहा था कि वो ओसामा की बीवी है दरअसल वो अरूंधति राय निकली!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आप जानते हैं कि ओसामा का सबसे बड़ा बेटा ओसामा की सबसे छोटी बीवी से ग्यारह साल बड़ा था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकी अधिकारी-ख़बर लगी है कि सभी सरकारी इमारतों पर पाकिस्तानी झंडे आधे झुके हैं, क्या आप लोग ओसाम के मरने पर राजकीय शोक मना रहे हैं???? पाक अधिकारी-नहीं जनाब, हमने कुछ नहीं किया...शायद शर्मिंदगी में वो खुद-ब-खुद झुक गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह पाकिस्तान हर मामले में हिंदुस्तान पर इल्जा़म लगाता है। मुझे शक है कि कहीं वो ये न कह दे कि ओसामा पर हमला करने वाले हैलीकॉप्टर्स में से एक दोरजी खांडू का था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Pigvijay Singh भारत के सबसे भरोसेमंद नेता हैं... क्योंकि वो ISI मार्का हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिन लादेन और मनमोहन सिंह में एक समानता तो है। मुसीबत आने पर दोनों ही औरत के पीछे छिपने में यकीन रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह की भौंकने की प्रवृत्ति को देखते हुए जल्द ही उनका BARKO TEST करवाया जाएगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रूप में पाकिस्तान सरकार और मनमोहन सिंह एक जैसे हैं कि दोनों को आख़िर तक कुछ भी पता नहीं रहता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बार-बार ये न कहो कि ओसामा दुनिया का नम्बर एक आतंकवादी था, मेरा 'इगो' हर्ट होता है"-Pigvijay Singh&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़तरों का खिलाड़ी तो लादेन था ही, जब मारा गया तब भी दो बीवियों के साथ रह रहा था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह का कहना है कि ओसामा की मौत के लिए अन्ना हज़ारे ज़िम्मेदार हैं। अन्ना की नकल करते हुए ओसामा भी अमेरिका के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठा और मारा गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़तरनाक आतंकवादी ही नहीं, ओसामा दुनिया के इकलौते इंसान भी थे जिसकी अमर सिंह से ज़्यादा सीडी मार्केट में आई थी !&lt;br /&gt;प्रिंस चार्ल्स से ओबामा-आपकी बहू हमारे लिए बड़ी शुभ निकली!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है, अभी मैं ज़िंदा हूं"-दिग्विजय सिंह&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-5502137883286195273?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/5502137883286195273/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=5502137883286195273&amp;isPopup=true" title="14 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/5502137883286195273?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/5502137883286195273?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2011/05/blog-post.html" title="“मैंने ओसामा जी नहीं, ओसामा जीजा जी कहा था!”" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEEMRHs-fSp7ImA9WhZQEUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-3266739779031048138</id><published>2011-04-19T00:04:00.001-07:00</published><updated>2011-04-19T00:04:45.555-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-19T00:04:45.555-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>इस शहर में हम भी भेड़ें हैं!</title><content type="html">ब्लूलाइन में घुसते ही मेरी नज़र जिस शख़्स पर पड़ी है, बस में उसका डेज़ीग्नेशन कन्डक्टर का है। पहली नज़र में जान गया हूं कि सफाई से इसका विद्रोह है और नहाने के सामन्ती विचार में इसकी कोई आस्था नहीं । सुर्ख होंठ उसके तम्बाकू प्रेम की गवाही दे रहे हैं और बढ़े हुए नाखून भ्रम पैदा करते हैं कि शायद इसे ‘नेलकटर’ के अविष्कार की जानकारी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले कि मैं सीधा होऊं वो चिल्लाता है- टिकट। मुझे गुस्सा आता है। भइया, तमीज़ से तो बोलो। वो ऊखड़ता है, 'तमीज़ से ही तो बोल रहा हूं।' अब मुझे गुस्सा नहीं, तरस आता है। किसी ने तमीज़ के बारे में शायद उसे 'मिसइन्फार्म' किया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टिकिट ले बस में मैं अपने अक्षांश-देशांतर समझने की कोशिश कर ही रहा हूं कि वो फिर तमीज़ से चिल्लाता है-आगे चलो।  मैं हैरान हूं ये कौन सा 'आगे' है, जो मुझे दिखाई नहीं दे रहा। आगे तो एक जनाब की गर्दन नज़र आ रही है। इतने में पीछे से ज़ोर का धक्का लगता है। मैं आंख बंद कर खुद को धक्के के हवाले कर देता हूं। आंख खोलता हूं तो वही गर्दन मेरे सामने है। लेकिन मुझे यकीन है कि मैं आगे आ गया हूं क्योंकि कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज़ अब पीछे से आ रही है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ही पल में मैं जान जाता हूं कि सांस आती नहीं लेना पड़ती है....मैं सांस लेने की कोशिश कर रहा हूं मगर वो नहीं आ रही। शायद मुझे आक्सीज़न सिलेंडर घर से लाना चाहिये था। लेकिन यहां तो मेरे खड़े होने की जगह नहीं, सिलेंडर कहां रखता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं देखता हूं कि लेडीज़ सीटों पर कई जेन्ट्स बैठे हैं। महिलाएं कहती हैं कि भाईसाहब खड़े हो जाओ, मगर वो खड़े नहीं होते। उन्होंने जान लिया है कि बेशर्मी से जीने के कई फायदे हैं। वैसे भी 'भाईसाहब' कहने के बाद तो वो बिल्कुल खड़े नहीं होंगे। कुछ पुरुष महिलाओं से भी सटे खड़े हैं और मन ही मन 'भारी भीड़' को धन्यवाद दे रहे हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच ड्राइवर अचानक ब्रेक लगाता है। मेरा हाथ किसी के सिर पर लगता है। वो चिल्लाता है। ढंग से खड़े रहो। आशावाद की इस विकराल अपील से मैं सहम जाता हूं। पचास सीटों वाली बस में ढाई सौ लोग भरे हैं और ये जनाब मुझसे 'ढंग' की उम्मीद कर रहे हैं। मैं चिल्लाता हूं - जनाब आपको किसी ने गलत सूचना दी है। मैं सर्कस में रस्सी पर चलने का करतब नहीं दिखाता। वो चुप हो जाता है। बाकी के सफर में उसे इस बात की रीज़निंग करनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस की इस बेबसी में मेरे अंदर अध्यात्म जागने लगा है। सोच रहा हूं पुनर्जन्म की थ्योरी सही है। हो न हो पिछले जन्म के कुकर्मों की सज़ा इंसान को अगले जन्म में ज़रुर भुगतनी पड़ती है। लेकिन तभी लगता है कि इस धारणा का उजला पक्ष भी है। अगर मैं इस जन्म में भी पाप कर रहा हूं तो मुझे घबराना नहीं चाहिये.... ब्लूलाइन के सफर के बाद नर्क में मेरे लिए अब कोई सरप्राइज नहीं हो सकता !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल....स्टैण्ड देखने के लिए गर्दन झुकाकर बाहर देखता हूं। बाहर काफी ट्रैफिक है... कुछ समझ नहीं पा रहा कहां हूं। तभी मेरी नज़र भेड़ों से भरे एक ट्रक पर पड़ती है। एक साथ कई भेड़ें बड़ी उत्सुकता से बस देख रही हैं। एक पल के लिए लगा.... शायद मन ही मन वो सोच रही हैं.....भेड़ें तो हम हैं!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-3266739779031048138?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/3266739779031048138/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=3266739779031048138&amp;isPopup=true" title="7 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/3266739779031048138?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/3266739779031048138?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2011/04/blog-post.html" title="इस शहर में हम भी भेड़ें हैं!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEENSXc8eCp7ImA9Wx9bFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-7536850509428736449</id><published>2011-02-24T20:04:00.001-08:00</published><updated>2011-02-24T20:04:58.970-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-02-24T20:04:58.970-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>रेलवे स्टेशन का विहंगम दृश्य!</title><content type="html">मैं कश्मीरी गेट की तरफ से पुदिरे यानि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन में प्रवेश करता हूं। स्टेशन अपनी तमाम खूबसूरती लिए मेरे सामने हैं। एक नज़र में यक़ीन करना मुश्किल है कि स्टेशन ज़्यादा पुराना है या दिल्ली।  पटरियों में फंसे रंग-बिरंगे पॉलीथिन, ज़र्दे के खाली पाउच, प्लास्टिक की बोतलें, पत्थरों पर फाइन आर्ट बनाती पान की पीकें, पपड़ियों से सजी बेरंग दीवारें, अनजान कोनों से आती बदबू, खड़ी गाड़ियों और उखड़े लोगों के बहाए मल और न जाने ऐसी कितनी अदाएं जो अपनी सम्पूर्ण गंदगी के साथ स्टेशन की पुरातात्विकता को ज़िंदा रख रही हैं। ये समझ पाना मुश्किल है कि आख़िर किस ग़लती की सज़ा स्टेशन को दी जा रही है ? संसद में अटका वो कौन सा विधेयक है जिसके चलते यहां झाडू नहीं लग रही ? किस साजिश के तहत देश की विकास योजनाओं में इसे शामिल नहीं किया जा रहा? आखिर क्यों ये आज भी वैसा ही है जैसा कभी राणा सांगा के वक्त रहा होगा ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके मैं जवाब जानना चाहता हूं। मगर अभी तो ये जानना है कि जिस ट्रेन से जाना है वो किस प्लेटफॉर्म से चलेगी। जैसे तैसे पूछताछ खिड़की पहुंचता हूं। खिड़की पर कोई मौजूद नहीं है। अंदर एक फोन घंटिया बजा-बजा परेशान हो रहा है मगर उसे उठाना वाला कोई नहीं। मैं अंदर आवाज़ देता हूं। यहां वहां पूछता हूं मगर इनक्वायरी विंडों पर मौजूद शख्स का कोई पता नहीं। कैसी विडम्बना है कि मैं गया तो गाडी का पूछने था मगर लोगों से पूछता फिर रहा हूं कि इन्क्वायरी विंडों वाला किधर है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल ये है कि ये इन्क्वायरी विंडों वाला आखिर किधर गया ? क्या ये आज बिना किसको बताये आया ही नहीं, क्या ये ऊपर बने किसी कमरे में आराम फरमा रहा है? क्या ये किसी कोने में बैठा बीडी फूंक रहा है? क्या पिछले दो घंटे से ये 'दो मिनट' के किसी काम पर निकला था?  सोचता हूं कि स्टेशन पर गुमशुदा लोगों के जो इश्तेहार लगे हैं वहीं पूछताछ खिड़की के उस शख्स का भी एक इश्तेहार लगा दूं, किसी को दिखे तो बतायें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्लेटफॉर्म की तलाश में आगे बढ़ रहा हूं। इस बीच भूख लगने लगती है। गाडी चलने में समय है, सोचता हूं कुछ खा लूं। गर्दन घुमा कर देखता हूं। चारों तरफ सेहत के दुश्मन बैठे हैं। कोई भठूरा बेच रहा है तो कोई पकौडा, किसी के पास गंदे तेल में तला समोसा हैं तो किसी के पास पिलाने के लिए ऐसी शिकंजी जिसमें इस्तेमाल की गई बर्फ और पानी का रहस्य सिर्फ बेचना वाला ही जानता है। तमाम चीज़ों की हक़ीकत जानने के बावजूद खाने-पीने के भारतीय संस्कारों के हाथों मजबूर हैं। पहले शिकंज़ी पीता हूं, भठूरे भी खाता हूं, थोड़े पकौडे भी लेता हूं और आधी-कच्ची चाय का भी आनन्द लेता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाने पीने को लेकर दिल से उठाया गया ये कदम फौरन पेट पर भारी पड़ने लगता है। बाथरूम की तरफ लपकता हूं। दोस्तों, भारतीय रेलवे स्टेशन्स में शौचालय वो जगह होती है जहां सतत जनसहयोग और सफाई कर्मचारियों की अकर्मण्यता से ज़हरीली गैसों का निर्माण किया जाता है। उस पर ये भी लिखा रहता है-स्वच्छता का प्रतीक। ऐसा लगता है मानों....लोगों को चिढ़ाया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, सांस रोके जो करना है वो कर बाहर आता हूं। मुझे अब भी अपने प्लेटफॉर्म की ठीक ठीक जानकारी नहीं है।  फिर कोई ओवरब्रिज से दूसरे छोर पर जाने का इशारा करता है। सीढ़ियां बड़ी हैं, सांस छोटी, ऊपर पहुंचने तक हांफने लगता हूं। अभी आयी एक गाड़ी से छूटे लोग पुलिया पर धावा बोल देते हैं। धक्कों का मुफ्त लंगर लग जाता है और आवभगत ऐसी की पूछो मत! मना करने के बावजूद थोड़ा और, थोड़ा और कह पेट भर दिया जाता है। सामान थामे आंख बंद कर मैं किनारे लगता हूं। एक-एक कर तमाम कुकर्म फ्लैशबैक में आंखों से गुज़रने लगते हैं। मेरी लांघी दस हज़ार रेड लाइटें, ब्लूलाइन के बेटिकट सफर, ऑफिस में की सैंकड़ों घंटों की कामचोरी! नहीं प्रभु नहीं....तुम इतने बुरे न्यायाधीश नहीं हो सकते। मेरे मिनी भ्रष्टाचारों की इतनी बड़ी सज़ा! इन दरियाई घोड़ों को रोको प्रभु, रोको!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी भीड़ छंटती है, सांस आती है, गाड़ी पहुंचती है। एस-सैवन कोच में प्रवेश करता हूं। अंदर वही सब कुछ....मूंगफली के छिलके, पान की पीकें, बिखरी चाय, खाली बोतलें....लगता है निगम के कचरा ढ़ोने वाले ट्रक में बैठ गया हूं और पीछे तख़्ती टंगी है-रेलवे का मुनाफा 90 हज़ार करोड़!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-7536850509428736449?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/7536850509428736449/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=7536850509428736449&amp;isPopup=true" title="20 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/7536850509428736449?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/7536850509428736449?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2011/02/blog-post_24.html" title="रेलवे स्टेशन का विहंगम दृश्य!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CU4NSX84eyp7ImA9Wx9UEUk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-4506101239233907634</id><published>2011-02-07T21:45:00.000-08:00</published><updated>2011-02-07T21:46:38.133-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-02-07T21:46:38.133-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>द ग्रेट इंडियन वैडिंग तमाशा!</title><content type="html">ये मेरे मित्र की मति का शहादत दिवस है। आज वो शादी कर रहा है। मैं तय समय से एक घंटे बाद सीधे विवाह स्थल पहुंचता हूं, मगर लोग बताते हैं कि बारात आने में अभी आधा घंटा बाकी है। मैं समझ गया हूं कि शादी पूरी भारतीय परम्परा के मुताबिक हो रही है। तभी मेरी नज़र कन्या पक्ष की सुंदर और आंशिक सुंदर लड़कियों पर पड़ती है। सभी मेकअप और गलतफहमी के बोझ से लदी पड़ी हैं। इस इंतज़ार में कि कब बारात आए और वर पक्ष का एक-एक लड़का खाने से पहले,  उन्हें देख गश खाकर बेहोश हो जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी ध्वनि प्रदूषण के तमाम नियमों की धज्जियां उड़ाती हुई बारात पैलेस के मुख्य द्वार तक पहुंचती है। ये देख कि उनके स्वागत में दस-बारह लड़कियां मुख्य द्वार पर खड़ी हैं, नाच-नाच कर लगभग बेहोश हो चुके दोस्त, फिर उसी उत्साह से नाचने लगते हैं। किराए की शेरवानी में घोड़ी पर बैठा मित्र पुराने ज़माने का दरबारी कवि लग रहा है। उम्र को झुठलाती कुछ आंटियां सजावट में घोडी को सीधी टक्कर दे रही हैं और लगभग टुन्न हो चुके कुछ अंकल, जो पैरों पर चलने की स्थिति में नहीं हैं, धीरे-धीरे हवा के वेग से मैरिज हॉल में प्रवेश करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंदर आते ही बारात का एक बड़ा हिस्सा फूड स्टॉल्स पर धावा बोल देता है। मुख्य खाने से पहले ज़्यादातर लोग स्नैक्स की स्टॉल का रुख करते हैं। मगर पता चलता है कि वो तो बारात आने से पहले ही लड़की वालों ने निपटा दीं। ये सुन कुछ आंटियों की बांछे खिल जाती है। उन्हें अगले दो घंटे के लिए मसाला मिल गया। वो चुन-चुन कर व्यवस्था से कीड़े निकालने लगती है। एक को मैरिज हॉल नहीं पसंद आया तो दूसरी को लड़की का लहंगा। मगर मैं देख रहा हूं इन बुराईयों में एक सुकून भी है। ये निंदारस उन्हें उस आमरस से ज़्यादा आनंद दे रहा है, जिसका आने के बाद से वो चौथा गिलास पी रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच स्नैक्स न मिलने से मायूस लोग बिना वक्त गंवाए मुख्य खाने की तरफ लपकते हैं। एक प्लेट में सब्ज़ियां, एक में रोटी। फिर भी चेहरे पर अफसोस है कि ये प्लेट इतनी छोटी क्यों है? कुछ का बस चलता तो घर से परात ले आते। कुछ पेंट की जेब में डाल लेते।  खाते-खाते कुछ लोग बच्चों को लेकर परेशान हो रहे हैं। भीड़ की आक्रामकता देख उन्हें लगता है कि पंद्रह मिनट बाद यहां कुछ नहीं बचेगा। बच्चा कहीं दिखाई नहीं दे रहा। मगर उसे ढूंढने जाएं भी तो कैसे...कुर्सी छोड़ी तो कोई ले जाएगा। या तो बच्चा ढूंढ लें या कुर्सी बचा लें। इसी कशमकश में उन्हें डर सताता है कि वो शगुन के पैसे पूरे कर भी पाएंगे या नहीं। उनका नियम है हर बारात में सौ का शगुन डाल कर दो सौ का खाते हैं। मगर लगता है कि आज ये कसम टूट जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी वहां खलबली मचती है। कुछ लोग गेट की तरफ भागते हैं। पता चलता है कि लड़के के फूफा किसी बात पर नाराज़ हो गए हैं। दरअसल, उन्होंने वेटर को पानी लाने के लिए कहा था, मगर जब दस मिनट तक पानी नहीं आया तो वो बौखला गए। दोस्त के पापा, चाचा और बाकी रिश्तेदार फूफा के पीछे पानी ले कर गए हैं। पीछे से किसी रिश्तेदार की आवाज़ सुनाई पड़ती है...इनका तो हर शादी-ब्याह में यही नाटक होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झगड़े की ज़रूरी रस्म अदायगी के बाद समारोह आगे बढ़ता है। कुछ देर में फेरे शुरू हो जाते हैं। मंडप में पंडित जी इनडायरैक्ट स्पीच में बता रहे हैं कि कन्या पत्नी बनने से पहले तुमसे आठ वचन मांगती है। अगर मंज़ूर हो तो हर वचन के बाद तथास्तु कहो। जो वचन वो बात रहे हैं उसके मुताबिक लड़के को अपना सारा पैसा, अपनी सारी अक्ल, या कहूं सारा वजूद कन्या के हवाले करना होगा। फिर एक जगह कन्या कहती है अगर मैं कोई पाप करती हूं, तो उसका आधा हिस्सा तुम्हारे खाते में जायेगा, और तुम जो पुण्य कमाओगे उसमें आधा हिस्सा मुझे देना होगा....बोलो मंज़ूर है! मित्र आसपास नज़र दौड़ता है.. लगता है...वही दरवाज़ा ढूंढ रहा है जहां से कुछ देर पहले फूफा जी भागे थे!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-4506101239233907634?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/4506101239233907634/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=4506101239233907634&amp;isPopup=true" title="10 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/4506101239233907634?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/4506101239233907634?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2011/02/blog-post.html" title="द ग्रेट इंडियन वैडिंग तमाशा!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUQGRHo4eCp7ImA9Wx5UFEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-8664736780458477283</id><published>2010-10-18T07:45:00.000-07:00</published><updated>2010-10-18T07:48:45.430-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-10-18T07:48:45.430-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>तू ही तो मेरा हॉर्न है!</title><content type="html">दोस्तों, शौक ही नहीं इंसान जिज्ञासा भी कैपेसिटी के हिसाब से पालता है। आप उतने ही जिज्ञासु हो सकते हैं, जितना आपकी बुद्धि अफोर्ड करती है। यही जिज्ञासा आपको हर वक़्त बेचैन करती है। आप शोध-खोज में लग जाते हैं। मसलन, हॉकिंग्स लम्बे समय तक बेचैन रहे कि सृष्टि का निर्माण ईश्वर ने किया या भौतिकी ने। न्यूटन सेब को पेड़ से गिरता देख उसकी वजह जानने में लग गए। वैज्ञानिकों की पूरी टोली आज तक ये जानने में लगी है कि ब्लैक हॉल का निर्माण किन हालात में हुआ। मगर ये सब बड़े लोगों की जिज्ञासाएं हैं। 'मुफ्त धनिए’ के लिए बनिए से झगड़ने में ज़िंदगी गुज़ारने वाला आम आदमी ऐसी चुनौतियां मोल नहीं लेता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी ज़िंदगी और जिज्ञासाएं अलग होती हैं। अपनी ही बात करूं तो सालों से दिल्ली के ट्रैफिक में हिंदी और अंग्रेज़ी के सफर के बावजूद मैं नहीं जान पाया कि लोग हॉर्न क्यों बजाते हैं? वो कौनसे भूगर्भीय, समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक कारण हैं, जो आदमी को हॉर्न बजाने पर मजबूर करते हैं। इन्हीं बातों से परेशान हो मैंने हॉर्नवादकों पर शोध करने का फैसला किया। यहां-वहां भटकने के बजाय मैंने मशहूर हॉर्नवादक दिल्ली के दल्लूपुरा निवासी आहत लाल से मिलना बेहतर समझा। इससे पहले कि आहत से हुई बातचीत का ब्यौरा पेश करूं....बता दूं कि छात्र जीवन से ही आहत को हॉर्न बजाने का खूब शौक था। शुरू में ये सिर्फ शौकिया तौर पर हॉर्न बजाते थे मगर कालांतर में मिली अटेंशन के चलते इन्होंने इस शौक को गंभीरता से लिया। लोकप्रियता का आलम ये है कि आज आसपास के सैंकड़ों गांवों से इन्हें शादियों में हॉर्न बजाने के लिए बुलाया जाता है। पिछले तीन सालों में देश-विदेश में हॉर्नवादन के चार हज़ार से ज्यादा कार्यक्रम दे चुके हैं। उभरते नौजवानों के लिए हॉर्न वादन की वर्कशॉप चलाते हैं। इनसे सीखे छात्र दल्लूपुरा घराने के हॉर्नवादक कहलाते हैं। इन्होंने तो सरकार से मांग तक की थी कि वूवूज़ेला की तर्ज़ पर कॉमनवेल्थ खेलों में ट्रैक्टर-ट्राली के किसी हॉर्न को पारंपरिक वाद्य यंत्र के रूप में शामिल किया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, बिना वक़्त गंवाए मैं बातचीत पेश करता हूं। आहत बताइए, आपकी नज़र में हॉ़र्न बजाने का सबसे बड़ा फायदा क्या है। देखिए, आज देश में जैसे हालात हैं उसमें आम आदमी के हाथ में अगर कुछ है, तो सिर्फ हॉर्न। नौजवान पचास जगह अप्लाई करते हैं, उन्हें नौकरी नहीं मिलती, दस लड़कियों को प्रपोज़ करते हैं मगर कोई हां नहीं कहती। ऐसे में यही नौजवान जब सड़क पर निकलता है तो हॉर्न बजा अपनी फ्रस्ट्रेशन निकालता है। किसी भी लंबी काली गाड़ी को देख यही सोचता है कि जिन कम्पनियों में उसे नौकरी नहीं मिली, हो न हो उन्हीं में से किसी एक का सीईओ इसमें होगा। बाइक के पीछे बैठी लड़की देख उसे चिढ़ होती है कि तमाम टेढ़े-बांके लौंडे लड़कियां घुमा रहे हैं और एक वही अकेला घूम रहा है। इसी सब खुंदक में वो और हॉर्न बजाता है। उसका मन हल्का होता है। आप ही बताइए अब ये हॉर्न न हो तो वो बेचारा नौकरी और छोकरी की फ्रस्ट्रेशन में सुसाइड नहीं कर लेगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, ये बात तो ठीक है मगर आजकल मोटरसाइकिल में जो ट्रक वाला हॉर्न लगावने लगे हैं, उसके पीछे क्या दर्शन है? देखिए, जो जितना कुंठित होगा, उसकी अभिव्यक्ति उतनी ही कर्कश होगी। इसके अलावा ध्यानाकर्षण की इच्छा भी एक वजह हो सकती है। हो सकता है उस बेचारे की बचपन से ख़्वाहिश रही हो कि जहां कहीं से गुजरूं, लोग पलट-पलट कर देखें। मगर उसे इसका कोई जायज़ तरीका न मिल पा रहा हो। अब हर कोई तो सिंगिंग या डांसिंग रिएल्टी शो में जा नहीं सकता। ऐसे में सिर्फ गंदा हॉर्न बजाने भर से किसी को अटेंशन मिल रहा है, तो क्या प्रॉब्लम है। जिस दौर में लोग पब्लिसिटी के लिए अपनी शादी तक का तमाशा बना देते हैं, वहां हॉर्न बजाना कौनसा अपराध है! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा-ये तो बड़ी वजहें हो गईं... इसके अलावा...आहत लाल-इसके अलावा छोटे-मोटे तात्कालिक कारण तो हमेशा बने रहते हैं। घर में बीवी से झगड़ा हो गया तो हॉर्न को बीवी की गर्दन समझ ऑफिस तक दबाते जाइए, ऑफिस पहुंचते-पहुंचते सारा गुस्सा छू हो जाएगा। ये समझना होगा कि ज़िंदगी के जिस-जिस मोड़ पर आप मजबूर हैं, वहां-वहां हॉर्न आपके साथ है। ऑफिस में रुके इनक्रीमेंट से लेकर कई दिनों से घर में रुकी सास तक का गुस्सा हॉर्न के ज़रिए निकाल सकते हैं। ज़माने भर का दबाया आदमी भी, हॉर्न दबा अपनी भड़ास निकाल सकता है और ये चूं भी नहीं करता, बावजूद इसके कि ये हॉर्न है! कहने वाले कहते होंगे कि किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त हैं मगर इंसान तो यही कहता है...तू ही तो मेरा हॉर्न है! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(नवभारत टाइम्स 18,अक्टूबर, 2010)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-8664736780458477283?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/8664736780458477283/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=8664736780458477283&amp;isPopup=true" title="5 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8664736780458477283?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8664736780458477283?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/10/blog-post.html" title="तू ही तो मेरा हॉर्न है!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0QFSXwzeip7ImA9Wx5VEEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-8308901199656582570</id><published>2010-10-02T22:54:00.000-07:00</published><updated>2010-10-02T22:55:18.282-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-10-02T22:55:18.282-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="kalmadi)" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(jokes" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="one liner" /><title>सुरेश कलमाडी को मेरी श्रद्धांजलि (भाग-2)</title><content type="html">कलमाडी जैसे ही बापू की मूर्ति पर फूल चढ़ाने झुके...लाठी से धकेलते हुए आवाज़ आई...दूर हटो बेटा...वरना अहिंसा की कस्म टूट जाएगी!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुरा न बोलने की सीख देने वाला गांधी जी का बंदर भी कलमाडी के किस्से सुनकर पेशंस खोने लगा है!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी के करनामों से प्रभावित हो भारतीय डाक विभाग जल्द ही उन पर एक 'डाकू टिकट' जारी करने जा रहा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय शूटर निशाना लगा रहा था...तमाम भारतीय दर्शक सांसे थामें थे...दिल में बेचैनी..हथेलियों में पसीना...सभी के मन में एक ही दुआ...कुछ भी हो, जैसे भी हो, जो भी हो...बस...शूटर निशाना चूक जाए...वजह-निशाना उस सेब पर लगाना था, जो कलमाडी के सिर पर रखा गया था!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसीबत की घड़ी में सब कलमाडी का साथ छोड़ते जा रहे हैं...और क्या ये इत्तेफाक हैं कि खेल गांव में एक के बाद एक सांप निकल कर बाहर आ रहे हैं!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी की इस पेशकश के बाद कि मुझे राम के चरणों में दो गज भी ज़मीन मिल जाए तो मैं खुद को वहां दफन कर लूं...सुना है तीनों पक्षों ने अपनी पूरी ज़मीन छोड़ने का ऐलान कर दिया है!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ए. सी. नीलसन के ताज़ा सर्वे के मुताबिक चुटकुला बनने में कलमाडी ने संता को पीछे छोड़ दिया है...हद ये है कि लोग अब संता को भी कलमाडी के जोक्स SMS करने लगे हैं!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वन्य जीव संरक्षण कानून की धारा तीन 'बी' का हवाला देते हुए बीजेपी की वरिष्ठ नेता और गांधी परिवार की दूसरी बहु मेनका गांधी ने धमकी दी है कि कलमाडी को अब किसी ने कुछ कहा तो उसकी खैर नहीं!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकार-सर, अयोध्या पर आए फैसले से जुड़ी आपको सबसे अच्छी बात क्या लगी????कलमाडी-इसका छह दशक बाद आना...मुझे लगता है कि इतना वक़्त तो किसी भी फैसले में लगना ही चाहिए!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़बर-कलमाडी देख रहे हैं ओलंपिक करवाने का सपना...प्रतिक्रिया-वैसे तो सपना देखने का हक़, हर इंसान को है मगर दिक्कत ये है कि ये हक़ इंसान को है!!!!!!!!!!!!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाम गवाहों और सबूतों के देखने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि सुरेश कलमाडी को फांसी पर लटका दिया जाए और साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए विवादित ज़मीन पर उनका मकबरा बने!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने कलमाडी से पूछा....सर, कौन बनेगा करोड़पति...कलमाडी-मेरी बुआ का लड़का, खेलगांव की कैंटीन का ठेका उसी के पास है!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल्द आ रहा फर्जीवाडे पर हिंदुस्तान का पहला REALITY SHOW...कलमाडी होंगे होस्ट...नाम है...क्यों बने रहें करोड़पति!!!!!!!!!!!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...KALMADI'S POPULARITY HAS REACHED SUCH 'HEIGHTS' THAT EVEN ALIENS ARE NO LONGER ALIEN TO HIM!!!!.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिरौती के मकसद से डाकुओं के कलमाडी को अगवा कर लिया...तीन दिन काल कोठरी में रखा...चौथे दिन कलमाडी ने बाहर आकर पूछा-क्या हुआ अब तक पैसे नहीं मिले क्या????डाकू-पैसे दो डबल मिले हैं...मगर तुम्हें छोड़ने के नहीं...न छोड़ने के!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;JAI HO के बाद इंग्लिश डिक्शनरी में शामिल किया जाने वाला अगला शब्द है... SURESH KALMADI और वो भी ADJECTIVE के तौर पर...घटिया के पर्यायवाची के रूप में!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवराज पाटिल, मधु कोडा, राजा चौधरी, ललित मोदी, शिबु सोरेन, राहुल महाजन, संभावना सेठ, राखी सावंत और रामगोपाल वर्मा कल शाम छह बजे इंडिया गेट पर कलमाडी के समर्थन में कैंडिल मार्च निकालेंगे!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी-तुम जो मेरे पीछे हाथ धो कर पड़े हो...ये तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा...कलमाडी भक्त-सर, मैंने कौनसे आपके टॉयलेट सोप से हाथ धोए हैं...जो महंगा पड़ेगा!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर, लोगों ने आप पर इतने जोक मारे, आप भी उन पर कुछ जोक बनाइये...कलमाडी-बनाऊंगा, मगर थोड़ा रूककर...इतनी जल्दी मैं कुछ भी नहीं बनाता!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमिताभ के बाद कलमाडी के साथ डिनर के लिए भी छह लाख की बोली लगी है...फर्क इतना है कि अमिताभ के साथ डिनर के लिए आपको छह लाख देने पड़ेंगे जबकि कलमाडी के साथ डिनर के लिए आपको छह लाख दिए जाएंगे!!!&lt;br /&gt;खेल 'गांव' पर सैंकडों करोड़ फूंक, हमने उन देशों को मुंहतोड़ जवाब दिया है जो कहते थे कि भारत अपने 'गांवों' की तरफ ध्यान नहीं देता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अच्छी खबर है और एक बुरी...अच्छी ख़बर ये है कि कलमाडी को भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है...और बुरी ख़बर ये है कि उनकी जगह अब ललित मोदी लेंगे!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BEST ONE LINER ON KALMADI HAS BEEN TOLD BY KALMADI HIMSELF...N THAT IS...."I AM &lt;br /&gt;INNOCENT"!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकार-सुना है सर आपकी महेनत की वजह से ही जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम इतना खूबसूरत बन पाया....कलमाडी-कहा न...तमाम आरोपों का जवाब मैं 14 अक्टूबर के बाद दूंगा!!!!दोस्तों, बिना सवाल सुनें आजकल कलमाड़ी ऐसे ही जवाब देने के आदी हो गए हैं!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी आंखों को क्या हो गया है....KALINDI KUNJ भी पढ़ता हूं तो KALMADI KUNJ दिखाई देता है!&lt;br /&gt;लोगों ने भी हद कर दी है...कलमाडी सुबह पार्क में RUNNING कर रहे थे...पीछे से किसी ने आवाज दी...कब तक भागोगे!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस देश में सड़क बनाने के लिए गेम्स होने का इंतज़ार किया जाता है ....विदेशी पूछ सकते हैं....क्या वहां नहाने के लिए भी अपनी शादी का इंतज़ार किया जाता है????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाप 'पंचायत' का कहना है कि मामला चूंकि खेल 'गांव' से जुड़ी गड़बड़ियों का है इसलिए सज़ा भी OWNER KILLING होनी चाहिए!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी ने सुसाइड की छह कोशिशे की..सातवीं से पहले आकाशवाणी हुई...तुम्हें ऊपर बुला कर हमने माहौल नहीं ख़राब करना...एनर्जी वेस्ट मत करो!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हूपर का कहना है कि उन्हें भारत की इज्ज़त से कोई मतलब नहीं है...ये इकलौता ऐसा मामला है जिस पर हूपर और कलमाडी की सोच मिलती है!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;KALMADI'S BLOOD GROUP....I AM NEGATIVE!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉमनवेल्थ आयोजकों ने उन भारतीय खिलाड़ियों से माफी मांगी है जिन्हें विदेशी खिलाड़ियों के चलते साफ जगह पर रहना पड़ रहा है!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़े तमाम विवादों के बीच कलमाडी इकलौते आदमी है जिन पर कोई विवाद नहीं है, उनकी बेइज्ज़ती होनी चाहिए...इस पर सब सहमत हैं!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;LOCATION जानने के लिए कलमाडी ने मोबाइल का GPRS सिस्टम चैक किया...उसमें लिखा था...YOU ARE AT RECEIVING END!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Writer-Director Aatish Kapadia ने साफ किया है कि उनकी आने वाली फिल्म 'खिचड़ी' का कॉमनवेल्थ खेलों की अव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साल 20010...दो लड़के पार्क में बैठे बात कर रहे हैं...पहला- तुम रोज़ी-रोटी के लिए क्या करते हो...दूसरा-सुबह अख़बार बांटता हूं, फिर दस घंटे नौकरी करता हूं, शाम में ट्यूशन पढ़ाता हूं, रात में चौकीदारी करता हूं...मेरी छोड़ों, तुम अपनी बताओ, तुम्हें मैंने कभी कुछ करते देखा नहीं...पहला-यार, क्या बताऊं, आज से दो सौ पीढ़ी पहले... हमारे यहां एक 'सज्जन' हुए थे...वो इतना कमा गए कि हमें कुछ काम करने की ज़रूरत नहीं!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...कलमाडी को ऐसे बैंक में खाता खुलवाना है, जिसकी नर्क में भी BRANCH हो!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी के इस प्रस्ताव के बाद कि आप चाहें तो लंदन ओलंपिक में मेरे अनुभव का फायदा उठा सकते हैं, इंग्लैंड के राजकुमार ने सीधा प्रधानमंत्री को फोन लगाया और कहा...इसे समझा लो...वरना मेरा हाथ उठ जाएगा!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी का कहना है कि मैं चोदह तारीख के बाद जवाब दूंगा....कोई उन्हें समझाए... ये मौका जवाब देने का नहीं....जान देने का है!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने कलमाडी से पूछा...सुना है सर आप खेलों के बाद ईमानदारी का जीवन बिताएंगे....कलमाडी भन्नाते हुए...पता नहीं स्साला...कौन मेरे बारे में उल्टी-सीधी अफवाहें फैला रहा है!!!!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खंडहर हो चुकी इमारत की तरफ इशारा करते हुए एक विदेशी टूरिस्ट ने पूछा ये MONUMENT किसने बनवाया...गाइड-सर, ये MONUMENT नहीं कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़ी इकलौती इमारत है, जो वक़्त पर पूरी हो गयी थी!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BIRTHDAY PARTIES में जिस तरह बच्चे फंक्शन के बाद गुब्बारा घर ले जाने की ज़िद्द करते हैं उसी तरह कलमाडी की ज़िद्द है कि खेल ख़त्म होने के बाद 40 करोड़ का गुब्बारा उन्हें घर ले जाने दिया जाए!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी का कहना है कि सरकारी गोदामों में रखे गेंहूं की तरह अगर सरकारी खज़ाने में रखे पैसे को वो वक़्त पर न खाते तो वो भी सड़ने लगता!!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्यटक रूठे, पुल टूटे, उम्मीदें मरी, मगर मच्छरों के अलावा एक चीज़ जो आख़िर तक ज़िंदा रही ....वो है DEADLINE!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आय से अधिक सम्पत्ति...ज़रूरत से कम शर्म....यही है कलमाडी का मर्म!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(nirajbadhwar@gmail.com)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-8308901199656582570?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/8308901199656582570/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=8308901199656582570&amp;isPopup=true" title="5 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8308901199656582570?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8308901199656582570?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/10/2.html" title="सुरेश कलमाडी को मेरी श्रद्धांजलि (भाग-2)" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEEMQH84fCp7ImA9Wx5WFEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-2067428330143932850</id><published>2010-09-25T23:28:00.000-07:00</published><updated>2010-09-25T23:31:21.134-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-09-25T23:31:21.134-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ONELINER" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(KALMADI" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="JOKES)" /><title>सुरेश कलमाडी को मेरी श्रद्धांजलि!!!</title><content type="html">दोस्तों, कलमाडी ने भले ही फजीहत की ज़िम्मेदारी कल ली हो मगर इस देश ने उनकी फजीहत का ठेका बहुत पहले ही ले लिया था...हालांकि ये बात जब मैंने कलमाडी को बताई तो उनका कहना था कि किसने दिया तुम्हें ये ठेका...सारे ठेके तो मैंने खुद अपने रिश्तेदारों को दिए हैं!!!बहरहाल पिछले दिनों FACEBOOK पर कलमाडी पर कुछ ONE LINER और JOKE लिखे हैं...आप भी मुलाहिज़ा फरमाएं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट ख़राब होने की शिकायत ले कलमाडी डॉक्टर के पास पहुंचे...डॉक्टर-क्या आजकल बाहर से ज़्यादा खाना हो रहा है...कुछ देर सोचने के बाद कलमाडी....हां सर, घर से बाहर निकलते ही मुझे गालियां खानी पड़ती हैं!!!.................डॉक्टर...ओफ्फ फो....ये तो ऐसी प्रॉब्लम है...जिस पर मैं चाहकर भी आपको 'परहेज़' नहीं बता सकता!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी ने साधा इंग्लैंड पर निशाना....कहा अंग्रेज़ों ने अगर हमें वक़्त पर आज़ाद कर दिया होता तो आज इतने काम अधूरे नहीं पड़े होते!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी 'साहब' घर पहुंचे तो काफी भीग चुके थे...बीवी ने चौंक कर पूछा...इतना भीगकर कहां से आ रहे हैं...क्या बाहर बारिश हो रही है...कलमाड़ी-नहीं....तो फिर...कलमाड़ी-क्या बताऊं...जहां से भी गुज़र रहा हूं...लोग थू-थू कर रहेहैं!!!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी साहब ने अपना मेल बॉक्स चैक किया...जो मैसेज उसमें थे उसकी डिटेल नीचे दे रहा हूं&lt;br /&gt;1.ASIF ALI ZARDARI &amp; OSAMA BIN LADEN WANT TO BE YOUR FRIEND ON FACEBOOK 2.RAKHI SAWANT,RAHUL MAHAJAN &amp; RAJA CHAUDHARY ARE NOW FOLLOWING YOU ON TWITTER 3 LATE HARSHAD MEHTA &amp;VEERAPAN WANT TO BE YOUR PAL FROM HELL &amp; LAST BUT NOT THE LEA...ST...PAKISTAN CRICKET TEAM INVITES YOU TO BE THEIR BETTING COACH!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैधानिक चेतावनी:-गर्भवती महिलाएं और कमज़ोर दिल के लोग इसे न पढें....पीपली लाइव को ऑस्कर में भेजे जाने के बाद कलमाडी ने मांग की है कि कॉमनवेल्थ थीम सांग को भी ऑस्कर के लिए भेजा जाए...उसमें क्या बुराई है!!!!&lt;br /&gt;रहमान का कहना है कि उन्होंने पांच करोड़ थीम सॉंग कम्पोज़ करने के नहीं, खेलों से जुड़ अपनी छवि ख़राब करवाने के लिए है...गाना तो कलमाडी के ड्राईवर ने बनाया है!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...कलमाडी को 'लोकप्रियता' का अंदाज़ा मोबाइल कम्पनियों को भी हो गया है...उनका फोन BUSY जाने पर अब आवाज़ आती है...जिस ज़लील आदमी से आप बात करना चाह रहे हैं वो अभी व्यस्त है...पता नहीं स्साला क्या कर रहा है!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तय हुआ कि कलमाडी को सज़ा-ए-मौत दी जाए...मगर दिक्कत ये है कि उन्हें फांसी पर लटकाने के लिए जल्लाद कहां से लाया जाए...दुनिया के सबसे बड़े जल्लाद तो वो खुद हैं...सरकार खुद कसाब को फांसी पर लटकाने के लिए कलमाडी की मदद लेने वाली थी... रही बात ज़हर का इंजेक्शन देने की...अब बाहर से उन्हें ज़हर देकर मारने की बात तो बहुत बचकानी है!!! कलमाडी ने तो खुद एक्सिडेंट में घायल दो नेवलों को ज़हर की दो बोतल देकर उनकी जान बचाई है...आख़िर भाई ही भाई के काम आता है!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी अपने नाम में मौजूद'कल' की वजह से भी सारे काम 'कल' पर टालते रहे हैं...उनका नाम या तो आजमाडी या फिर अभीमाडी होना चाहिए था!!! मैं जानता हूं कि ये घटिया पैरेडी है मगर जिस आदमी पर की जा रही है...उसे भी तो देखो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी की 'IMAGE' इस हद तक ख़राब हो चुकी है कि किसी EDITING SOFTWARE में भी IMPROVE नहीं हो सकती!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेइज्ज़ती की इंतहा...कलमाडी के कुत्ते ने उन्हें देख पूंछ हिलाना बंद कर दिया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों, रात को जूतों की एक माला कलमाडी के पोस्टर पर डाली थी...सुबह उठ कर देखा रहा हूं तो उसमें से दो जूते गायब हैं!&lt;br /&gt;पेंटर-WHITEWASH करवाएंगे...कलमाडी-नहीं, अभी पिछले महीने ही घर में करवाया है...पेंटर-सर मैं घर की नहीं आपके मुंह की बात कर रहा हूं!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...कलमाडी की बढ़ती 'बदनामी' से प्रभावित हो कांग्रेस ने तय किया है कि नए-पुराने सभी पाप उन्हीं के सिर डाले जाएं...इसी कड़ी में पहला शिगुफा..........अर्जुन सिंह या राजीव गांधी नहीं...एंडरसन को भगाने के पीछे सुरेश कलमाडी का हाथ था!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधूरी तैयारियों से परेशान कलमाडी ने अपना सिर पीटा...कहा स्साला कोई भी अपना वादा नहीं निभाता...आतंकी कह गए थे...खेल नहीं होने देंगे...पता नहीं कहां रह गए???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...ख़बर है कि पिछले तीन दिनों में एक लाख लोगों ने नाम परिवर्तन की सूचना अखबारों में दी है....और क्या ये महज़ इत्तेफाक है कि इन सभी के नाम सुरेश हैं!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...साइक्लिंग इवेंट से इतने खिलाड़ियों ने नाम वापिस ले लिए हैं कि अब इस स्पर्धा में कांस्य पदक नहीं दिया जा सकता...वजह...सिर्फ दो खिलाडी़ ही भाग ले रहे हैं!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...इंग्लैंड ने कहा है कि जब तक खेल गांव की हालत नहीं सुधरती वे होटल में ही ठहरेंगे...ये सुन कलमाडी ने कल से ही इंग्लैंड के फ्लैट किराए पर चढ़ा दिए हैं!&lt;br /&gt;बाहरी लोगों के दिल्ली आने से परेशान शीला दीक्षित के लिए इससे बड़ी खुशख़बरी और क्या हो सकती है कि एक-के-बाद-एक विदेशी खिलाड़ी दिल्ली आने से मना कर रहे हैं!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;SWISS GOVERNMENT को शक़ है कि SWISS BANK ने कलमाडी के पास SAVING ACCOUNT खुलवा रखा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS....कलमाडी को काटने के लिए मच्छरों का कल एक एवेंट होना था...मगर...आख़िरी वक़्त पर ज्यादातर मच्छरों ने अपना नाम वापिस ले लिया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुकर्मों के लिए माफी मांगते हुए सुरेश कलमाडी भगवान की मूर्ति के सामने दंडवत हो गए...मन में माफी मांगी...आंख खोली तो देखा...भगवान खुद कलमाडी के सामने दंडवत थे...बोला...बच्चा...रहम करो...जाओ यहां से...&lt;br /&gt;किसी ने GOOGLE में 'SURESH KALMADI' टाइप किया...सामने से जवाब आया...बच्चा... दुनिया ने इस पर 'रिसर्च' कर ली और तुम अब तक इसे 'सर्च' करने में लगे हो!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...कलमाडी का कहना है कि उनके साथ धोखा हुआ है...पहले उन्हें बताया गया था कि खेल दो हज़ार दस में नहीं दस हज़ार दो में होने हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...भारत में हो रही कलमाडी की ज़लालत को देखते हुए एंजलिना जोली ने उन्हें ADOPT करने का फैसला किया है!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी ने हाथ दे कर रिक्शे वाले को रोका और पूछा...बस स्टैंड चलना है...कितने पैसे दोगे???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान ने प्रस्ताव दिया है कि अगर विदेशी खिलाड़ी भारत आने में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे तो COMMONWEALTH GAMES पाकिस्तान में करवा खेल गांव की गंदगी देखकर इंग्लैंड के कुछ अधिकारियों ने सवाल पूछा कि क्या स्लमडॉग मिलिनेयर की शूटिंग यहीं हुई थी???&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदत से मजबूर अधिकारियों ने अधूरे कामों को पूरा करने के लिए नई DEADLINE 31 अक्टूबर तय कर दी थी!!!&lt;br /&gt;NCERT ने कक्षा छह की किताब से 'चालाक लोमड़ी' का चैप्टर निकाल उसकी जगह 'चालाक कलमाडी' का नया चैप्टर जोड दिया है मगर....कुछ लोगों का सोचना है कि इतने छोटे बच्चों को ये सब पढ़ाना क्या ठीक रहेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BREAKING NEWS...कलमाडी को भारत रत्न दिए जाने की मांग के बीच पाक सरकार ने कलमाडी को निशान-ए-पाकिस्तान सम्मान से नवज़ाने का फैसला किया है...उसका मानना है कि भारत की जितनी बदनामी वो पिछले साठ सालों में नहीं कर पाए उससे ज्यादा इस शख्स ने पिछले छह दिनों में करवा दी है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने प्रस्तावों के बीच अयोध्या विवाद पर एक और प्रस्ताव...न मंदिर...न मस्जिद...कलमाडी का कहना है कि विवादित ज़मीन पर नया खेल गांव बनाया जाए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े सिपाही महात्मा गांधी के जन्मदिन के अगले दिन... गुलामी के सबसे बड़े प्रतीक कॉमनवेल्थ खेलों का जश्न शुरू हो रहा है...क्या इससे बड़ी शर्मिंदगी कुछ और हो सकती है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;HEART BREAKING NEWS.. अफ्रीकी देश TOKELAU ने भी कॉमनवेल्थ खेलों में न आने की धमकी दी है...अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता...जा रहा हूं...क्वींस बैटन से आत्मदाह करने...&lt;br /&gt;टूटती छतें, ढहते पुल, ऊफनती यमुना...BREAKING NEWS...विदेशी खिलाड़ियों के बाद विदेशी आतंकियों ने भी सुरक्षा कारणों से दिल्ली आने से मना कर दिया है!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉमनवेल्थ से जुड़ी तमाम बुरी ख़बरें देखकर दिल्ली शहर डूब मरना चाहता है और क्या ये महज़ इत्तेफाक है कि यमुना में कभी भी बाढ़ आ सकती है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली की सुरक्षा ख़ामी का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि सुरेश कलमाडी अब तक ज़िंदा घूम रहा है!&lt;br /&gt;सोमालियाई लूटेरों ने कलमाडी को CHIEF CONSULTANT नियुक्त किया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम पर सहमति न बन पाने के कारण कलमाडी साहब के हाथ से एक कुकरी शो का ऑफर निकल गया...चैनल शो का नाम 'खाना-खजाना' रखना चाहता था और कलमाडी इस ज़िद्द पर अड़े थे कि उसका नाम 'खाना खा जाना' रखा जाए!&lt;br /&gt;वेटर-साहब, क्या खाएंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी-स्साला, अब भी तुम्हें ये बताना पड़ेगा कि हम क्या खाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली की रिकॉर्डतोड़ बारिश से प्रभावित हो, प्रधानमंत्री ने मणिशंकर अय्यर को बद्दुआ मामलों का प्रभारी बना दिया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुकरी शो का ऑफर भले ही हाथ से निकल गया हो मगर कलमाडी साहब को FAIR &amp; LOVELY का विज्ञापन मिल गया है...पंचलाइन है...धूप ही नहीं, कर्मों से काले हुए मुंह भी करे साफ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉमनवेल्थ खेलों को भारत की शान बताने वाले अफसरों की ख्वाहिश है कि उनको मुखाग्नि भी क्वींस बेटन से दी जाए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी साहब दिल के बड़े नेक हैं...मैंने उनसे कहा सर, माफ कर दो... मैंने आप पर इतने जोक बनाए...वो बोले बेटा, मैंने कुछ 'नहीं बनाने' पर भी माफी नहीं मांगी और तुम 'बनाने' पर मांग रहे हो!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सुरेश कलमाडी एक ईमानदार, कुशल, मेहनती और देशभक्त आदमी है। उस जैसा सच्चा आदमी आज तक इस देश ने नहीं देखा...पूरे देश को उस पर नाज़ है" ....ऐसी ही फनी और मज़ेदार चुटकुलों के लिए SMS करें...5467 पर!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AND LAST BUT NOT THE LEAST…..कलमाडी की 'लोकप्रियता' का आलम ये है कि लोग दिल्ली के बाद मुन्नी की बदनामी के लिए भी उन्हें ही कसूरवार ठहरा रहे हैं!!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-2067428330143932850?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/2067428330143932850/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=2067428330143932850&amp;isPopup=true" title="7 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/2067428330143932850?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/2067428330143932850?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/09/blog-post_25.html" title="सुरेश कलमाडी को मेरी श्रद्धांजलि!!!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0UAR3c4fip7ImA9Wx5WEU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-8305535559862986391</id><published>2010-09-21T21:20:00.001-07:00</published><updated>2010-09-21T21:20:46.936-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-09-21T21:20:46.936-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>भरोसेमंद सुरक्षा!</title><content type="html">खेलों से पहले दिल्ली में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। किसी भी संभावित रासायनिक और आणविक हमले से बचाने के शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिसवाले ‘लाठियां’ लिए मौजूद हैं। सिर्फ लाठी के सहारे दुश्मन को ख़ाक कर देने के ख़ाकी वर्दी के कांफिडेंस पर मैंने एक पुलिसवाले से बात की। श्रीमान, रामलीला की तरह खेलों से पहले भी आप सिर्फ लाठी के सहारे हालात पर नज़र रखे हुए हैं...क्या वजह है? देखिए, मुझे नहीं लगता कि हमें इसके अलावा किसी और चीज़ के ज़रूरत है। जहां तक रिक्शे से हवा निकालने की बात है तो उसके लिए किसी एके-47 की ज़रूरत नहीं पड़ती, उसके लिए हमारे हाथ ही काफी है। रही बात ठेले वालों की... उन स्सालों ने अगर कोई बदमाशी की तो उनके लिए हमारे पास ये लठ है...तो आपको लगता है कि सुरक्षा के लिहाज़ से सबसे बड़ी चुनौती रिक्शे और ठेले वाले हैं। जी हां, बिल्कुल। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जितने बड़े बदमाश हैं, उनसे कैसे निपटेंगे? जनाब हम पुलिसवाले हैं...बदमाशों को हम आपसे ज़्यादा बेहतर समझते हैं। गुंडे-बदमाश तभी आक्रामक होते हैं, जब उन्हें  जायज़ हक़ नहीं मिलता, मुख्यधारा में उनके लिए कोई जगह नहीं होती। मगर प्रभु कृपा से हमारी व्यवस्था में ऐसी कोई असुरक्षा नहीं है। माल में हिस्सेदारी ले, हम उन्हें चोरियां करने देते हैं। अपराध के मुताबिक पैसा खा, मामला दबा दिया जाता है। सबूत इक्ट्ठा न कर, उन्हें ज़मानत दिलवा दी जाती है। अब जब इतनी फैसिलिटीज़ उन्हें दी जा रही हैं, तो क्या उनकी बुद्धि भ्रष्ट हुई है, जो वो हमारे लिए कोई सिर दर्द पैदा करेंगे। लेकिन सर, आपको क्या लगता है...अगर आतंकी आए... तो वो क्या लाठियां ला, आपके साथ डांडिया खेलने आएंगे...उनका क्या करेंगे आप। पुलिसवाला-ऐसा कुछ नहीं होगा..हमें पूरा भरोसा। मगर किस पर...उसी पर... जिसके भरोसे ये देश चल रहा है...कौन...भगवान!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-8305535559862986391?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/8305535559862986391/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=8305535559862986391&amp;isPopup=true" title="4 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8305535559862986391?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8305535559862986391?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/09/blog-post_21.html" title="भरोसेमंद सुरक्षा!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;Ak4EQ3Yyfip7ImA9Wx5XEk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-2835078803679641914</id><published>2010-09-11T05:40:00.000-07:00</published><updated>2010-09-11T05:41:42.896-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-09-11T05:41:42.896-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>भावनाओं को समझो!</title><content type="html">स्पॉट फिक्सिंग कांड के बाद पूरी दुनिया में पाक खिलाड़ियों पर थू-थू हो रही है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि पाकिस्तान के बाद इंग्लैंड में भी बाढ़ की नौबत आ गई है! खुद पाकिस्तान में जो इलाके बाढ़ से बच गए थे वो अब इस मामले की शर्मिंदगी से डूब गए हैं। तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। कुछ का कहना है कि बीसीसीआई ने 2015 तक का भारतीय टीम का कैलेंडर जारी कर रखा है तो वहीं पीसीबी ने 2015 तक के पाक टीम के नतीजे। और भी न जाने क्या कुछ....हर कोई नो बॉल के बदले नोट लेने की आलोचना कर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर मैं पूछता हूं कि इसमें ग़लत क्या है? दुनिया भर के गेंदबाज़ों को नो बॉल के बदले फ्री हिट देनी पड़ती है, अब इसी काम के लिए कोई उन्हें पैसा दे रहा है, तो क्या प्रॉब्लम है। आख़िर आदमी सब करता तो पेट की ख़ातिर ही है। वैसे भी पाकिस्तानी खिलाड़ियों को जब से आईपीएल में भी नहीं चुना गया, उनमें एक तिलमिलाहट थी...जैसे-तैसे खुद को बेच कर दिखाना था। सो वो बिक गए। मगर अफसोस दुनिया तो दूर, खुद पाकिस्तानी सरकार उनकी इस भावना को समझ नहीं रही। समझती तो फिक्सिंग कांड को भारत को ‘मुहंतोड़ जवाब’ के रूप में देखती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा ये कि अगर वो पैसे लेकर मैच हारे भी तो इसमें बुराई क्या है। ये समझना होगा कि किसी भी देश की कला-संस्कृति और खेल वगैरह को वहां की राजनीति का आईना होना चाहिए। ख़ासतौर पर किसी भी अराजक देश में तो हुक्मरानों को ख़ासतौर पर नज़र रखनी चाहिए कि कुछ भी अच्छा न होने पाए। फिल्में बनें तो दूसरे देश की नक़ल कर बनें। खिलाड़ी खेलें तो पैसा लेकर हारें। परमाणु वैज्ञानिक एक ठंडी बीयर के बदलें परमाणु तकनीक बेच दें। इससे होगा ये कि जब हर जगह गुड़-गोबर होगा तो लोग नेताओं पर अलग से गुस्सा नहीं होंगे। ये नहीं सोचेंगे कि हमारे यहां हर जगह काबिल लोग भरे हुए हैं, बस नेता ही भ्रष्ट है। उन्हें बैनिफिट ऑफ डाउट मिल जाएगा। उसी तरह जैसे शकूर राणा के वक़्त पाक बल्लेबाज़ों को अक्सर मिल जाया करता था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(दैनिक हिंदुस्तान 11, सितम्बर, 2010)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अंत में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलमाडी 'साहब' घर पहुंचे तो काफी भीग चुके थे...बीवी ने चौंक कर पूछा...इतना भीग कर कहां से आ रहे हैं...क्या बाहर बारिश हो रही है...कलमाड़ी-नहीं....तो फिर...कलमाड़ी-क्या बताऊं...जहां से भी गुज़र रहा हूं...लोग थू-थू कर रहे हैं!!!!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-2835078803679641914?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/2835078803679641914/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=2835078803679641914&amp;isPopup=true" title="4 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/2835078803679641914?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/2835078803679641914?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/09/blog-post_1802.html" title="भावनाओं को समझो!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D04DQ3w7fyp7ImA9Wx5XEUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-1086972166860815835</id><published>2010-09-10T03:52:00.001-07:00</published><updated>2010-09-10T03:52:52.207-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-09-10T03:52:52.207-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी चाहेगा!</title><content type="html">यह रविवार की एक औसत सुबह है। रिमोट को सारथी बना मैं टीवी पर कुछ सार्थक ढूंढ़ रहा हूं। पर ज़्यादातर टीवी कार्यक्रम मेरी सुबह से भी ज़्यादा औसत हैं। धार्मिक चैनलों पर बाबा महिलाओं को शांति और संयम का पाठ पढ़ा रहे हैं। न्यूज़ चैनल बता रहे हैं कि कैसे एक बाबा ने संयम का पाठ पढ़ने आई शिष्या को एक्सट्रा क्लास देने की कोशिश की। वहीं मनोरंजन चैनल्स पर सास-बहुएं एक-दूसरे को नीचा दिखाने के ऊंचे काम में लगी हैं, दूसरों का खून पी अपना हीमोग्लोबीन बढ़ा रही हैं। कल्पना के कैनवस पर हर क्षण षड्यंत्रों के दृश्य उकेर रही हैं। कभी-कभी हैरानी होती है कि धारावाहिकों में जिन परिवारों की कहानी देख हम अपना मनोरंजन करते हैं, खुद उन परिवारों में कितना तनाव है! आखिर क्या वजह है कि दूसरे का तनाव हमें आनन्द देता है। किसी का झगड़ा देख हम एंटरटेन होते हैं। क्या हम इतना गिर गए हैं...हमारे पास कुछ और काम नहीं बचा...इससे पहले कि मैं किसी महान् नतीजे पर पहुंचता, मुझे बाहर से झगड़ने की आवाज़ सुनाई देती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी बंद कर मैं बालकनी में आता हूं। सोसायटी के दूसरे छोर पर एक महिला ज़ोर-ज़ोर से चीख रही है। उसके सास-ससुर बालकनी में चिल्ला रहे हैं तो वो अपार्टमेंट के नीचे। झगड़े के सुर के साथ-साथ दर्शकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। शादी के निमंत्रण पत्र की तर्ज पर लोग ‘सपरिवार’ बालकनी में आ गए हैं। बीवी भी गैस बंद कर बाहर आ गई है। मैं कॉन्‍संट्रेट करता हूं मगर कुछ समझ नहीं पा रहा हूं। जो शब्द कान में पड़ रहे हैं, उनसे मेरी पहचान नहीं है। बीवी कहती है...साउथ इंडियन हैं... तमिल या तेलुगू में झगड़ रहे हैं। मुझे खीझ चढ़ती है। अपनी बेबसी पर रोना आता है। ऐसा लगता है कि बिना सबटाइटल के रजनीकांत की कोई एक्शन फिल्म देख रहा हूं। मैं आपा खोने लगता हूं। सोचता हूं कि नीचे जाकर उनसे इसी बात पर झगड़ूं। कहूं कि इतने लोग बीवी-बच्चों समेत तुम्हारा झगड़ा देख रहे हैं। खुद मेरी बीवी ने दो बार अपनी मां तक का फोन नहीं उठाया। बच्चा आधे घंटे से नाश्ते के लिए रो रहा है। हम लोग क्या पागल हैं जो तुम्हारे चक्कर में अपना संडे ख़राब कर रहे हैं। झगड़ना है तो हिंदी में झगड़ो। वरना अंदर जाकर लड़ो-मरो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर इससे पहले कि मैं नीचे जाने के लिए चप्पल खोजता, महिला गाड़ी स्टार्ट कर वहां से चली गई। ये देख पूरी सोसायटी में निराशा छा गई। मैं भी भारी अवसाद में था। अंदर आया। टीवी चलाया। वही सास-बहू के सीरियल वाले झगड़े। फिर वही ख़्याल...यार, ये लोग हमेशा झगड़ते क्यों रहते हैं...लोगों को इनका झगड़ा देखने में मज़ा भी क्या आता है मगर मन में यही बात फिर दोहराई तो शर्म आने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि सीरियल के न सही, पर असल झगड़े देखने में मुझे भी खूब आनन्द आता है। मगर गुस्सा तब आता है, जब ये झगड़े अंजाम तक नहीं पहुंचते। दिल्ली में ब्लू लाइन के सफर के दौरान मैंने सैंकड़ों झगड़े देखे। कंडक्टर ‘सवारी’ से टिकट लेने के लिए कहता। वो बाद में लेने की ज़िद्द करती। फिर लम्बी बहस होती। सामर्थ्य के मुताबिक सुर ऊंचा किया जाता। संस्कारों और सामान्य ज्ञान के आधार पर बेहिसाब गालियां दी जाती। ये देख रूटीन लाइफ से बोर हो चुकी ‘सवारियों’ की आंखों में चमक दौड़ जाती। सब को लगता कि अब झगड़ा होगा। कुछ एक्साइटिंग देखने को मिलेगा। दोस्त-यारों को सुनाने के लिए एक किस्सा मिलेगा। मगर अफसोस...तभी नई सवारियां चढ़ने के साथ बात आई-गई हो जाती। इन सालों में न जाने ऐसी कितनी ही बहसें, जिनमें झगड़ा बनने की पूरी संभावना थी, मेरी आंखों के सामने आई-गई हुई हैं। मगर मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। यह स्वीकारने में मुझे कोई शर्मिंदगी भी नहीं है। आख़िर इंसान मूलतः है तो जानवर ही जो सभ्य बनने की कोशिश कर रहा है। अब इस कोशिश से बोर हो, वो और उसके भीतर का जानवर कभी-कभार झगड़ा देख, मनोरंजन करना चाहें, तो क्या बुराई है! एंटरटेनमेंट के लिए जब कुछ भी करने में हर्ज नहीं, तो चाहने में क्या प्रॉब्लम है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(नवभारत टाइम्स 10,सितम्बर,2010)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-1086972166860815835?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/1086972166860815835/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=1086972166860815835&amp;isPopup=true" title="9 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/1086972166860815835?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/1086972166860815835?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/09/blog-post_10.html" title="एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी चाहेगा!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkANSHs6eip7ImA9Wx5QFEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-4682235830734923492</id><published>2010-09-02T01:05:00.000-07:00</published><updated>2010-09-02T01:06:39.512-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-09-02T01:06:39.512-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>मच्छर को बनाएं राष्ट्रीय कीट!</title><content type="html">भारत में हम जिस भी चीज को राष्ट्रीय महत्व से जोड़ते है,  कुछ समय बाद उसका अपने आप बेड़ा गर्क हो जाता है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है लेकिन देश में कुछ लोग सिर्फ इसलिए कत्ल किए जा रहे हैं कि वे हिंदी भाषी हैं। मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी है मगर आज हालत यह है कि सम्पूर्ण मोर बिरादरी जेड श्रेणी की सुरक्षा मांग रही है। हॉकी के एनकाउंटर के लिए हम भले ही के पी एस गिल को क्रेडिट दें या फिर हॉकी से जुड़ी तमाम संस्थाएं इसका श्रेय लें, मगर हॉकी की शहादत के पीछे असल वजह उसका राष्ट्रीय खेल होना ही है। वहीं खुद को राष्ट्रपिता का वारिस बताने वालों ने साठ साल से ' गांधी ' को तो पकड़ रखा है, लेकिन ' महात्मा ' को भूल बैठे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब पहले किसी भी चीज को सिर-आंखों पर बैठाओ, फिर सिगरेट के ठूंठ की तरह पैरों तले मसल दो। मेरा मानना है कि जब यह सिद्धांत इतना सीधा है तो क्यों न हम तमाम बड़ी समस्याओं को राष्ट्रीय महत्व से जोड़ दें, वे खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी। जैसे हाल-फिलहाल मच्छरों का भयंकर आतंक है। दिल्ली सरकार समझ नहीं पा रही कि कॉमनवेल्थ खेलों से पहले इनसे कैसे निपटा जाए। मेरा मानना है कि अगर हमें मच्छरों का हमेशा के लिए नामोनिशान मिटाना है तो उसे राष्ट्रीय कीट घोषित कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार घोषणा करे कि राष्ट्रीय कीट होने के नाते मच्छरों का संरक्षण किया जाए। उसे &lt;br /&gt;'गंदगी बढ़ाओ, मच्छर बचाओ ' टाइप कैम्पेन चलाने चाहिए। निगम कर्मचारियों को आदेश दिए जाएं कि वे अपनी अकर्मण्यता में सुधार लाएं। जिस गली में पहले हफ्ते में दो बार झाडू लगती थी, वहां महीने में एक बार से ज्यादा झाडू न लगे। गंदगी बढ़ाने के लिए पॉलिथीन के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया जाए ताकि अधूरी चौपट सीवर व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो पाए। गटर-नालियां जितने उफान पर होंगी, उतनी तेजी से मच्छर बिरादरी फल-फूल पाएगी। मच्छर को चीतल के समान दर्जा दिया जाए और प्रावधान किया जाए कि एक मच्छर मारने पर पांच साल का सश्रम कारावास और दो लाख का आर्थिक दण्ड दिया जाएगा। कानून का आम आदमी में खौफ पैदा करने के लिए ' एक मच्छर आदमी को जेल भिजवा सकता है ' टाइप थ्रेट कैम्पेन भी चलाए जाएं। इसके लिए किसी बड़े स्टार की सहायता ली जा सकती है।&lt;br /&gt;किसी सिलेब्रिटी को मच्छर अम्बेसडर घोषित किया जा सकता है। आप इसे कोरी बकवास न समझें। आपको जानकर हैरानी होगी कि जब इस योजना को मैंने सरकार के सामने रखा तो उसने फौरन देश के 156 जिलों में प्रायोगिक तौर पर इसे लागू भी कर दिया और जो नतीजे आए वे बेहद चौंकाने वाले थे।&lt;br /&gt;निगम कर्मचारियों तक जैसे ही सरकार का फरमान पहुंचा उनका खून खौल उठा। उन्होंने तय किया कि अब वे कभी अपनी झाडू पर धूल नहीं चढ़ने देंगे। जो कर्मचारी पहले सड़क पर झाडू नहीं लगाते थे, वो खुंदक में अपने घर पर भी सुबह-शाम झाडू लगाने लगे। वहीं पॉलिथीन का ज्यादा इस्तेमाल करने के सरकारी आदेश के बाद महिलाएं पति की पुरानी पैंट का थैला बनाकर बाजार से सामान लाने लगीं। शाही घरानों के़ लड़कों ने, जो पहले जंगल में शेर का शिकार करने जाते थे, अब जीपों का मुंह शहर के गटरों की तरफ कर दिया। अब वह बंदूक के बजाय शिकार पर बीवी की चप्पलें ले जाने लगे और उनसे चुन-चुनकर मच्छर मारने लगे। इस सबके बीच उन लोगों की मौज हो गई जो एक वक्त कमजोर डील-डौल के चलते मच्छर कहलाते थे, अब वो इसे कॉम्प्लीमेंट की तरह लेने लगे।&lt;br /&gt;खैर, नतीजा यह हुआ कि लागू करने के महज तीन महीने के भीतर ही योजना बुरी तरह फ्लॉप हो गई और सभी 156 जिले पूरी तरह मच्छरों से मुक्त करवा लिए गए। योजना की असफलता से उत्साहित कुछ लोगों ने प्रस्ताव रखा है कि इसी तर्ज पर भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय आचरण और दलबदल को राष्ट्रीय खेल घोषित किया जाए। इसी तरह 'अतिथि देवो भव' का स्लोगन बदलकर 'अतिथि छेड़ो भव' किया जाए। ऐसा करने पर ही इन समस्याओं से मुक्ति मिल पाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-4682235830734923492?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/4682235830734923492/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=4682235830734923492&amp;isPopup=true" title="5 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/4682235830734923492?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/4682235830734923492?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/09/blog-post.html" title="मच्छर को बनाएं राष्ट्रीय कीट!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUICQn8zfCp7ImA9Wx5QEUo.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-2868490835404666516</id><published>2010-08-30T06:05:00.000-07:00</published><updated>2010-08-30T06:06:03.184-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-08-30T06:06:03.184-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>हिंदी-चीनी, भाई-भाई!</title><content type="html">इसे इत्तेफाक कहूं या फिर देश के सभी दुकानदारों की साज़िश...मेरी बतायी रेंज़ पर सब यही कहते हैं कि ‘इतने में तो फिर लोकल आएगी’। दुकानदार को तीन सौ तक की रेंज बता मैं बढ़िया बैड शीट दिखाने के लिए कह रहा हूं और वो कहता है कि ‘इतने में तो फिर लोकल आएगी’। उसका कहना है कि अच्छी, सस्ती और टिकाऊ की मेरी विचित्र डिमांड एक साथ पूरी कर पाना बेहद मुश्किल है। जो अच्छी होगी वो सस्ती नहीं होगी और जो टिकाऊ होगी, वो थोड़ी महंगी होगी। मैं ज़िद्द नहीं छोड़ रहा और वो इतने में तो फिर लोकल…का राग! मैं पूछता हूं कि वो इंडिया सैटल कब हुआ और वो कहता है कि वो तो शुरू से इंडिया में ही रह रहा है। मैं हैरानी जताता हूं...अच्छा तो तुम लोकल हो! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों, ऐसा नहीं है कि एक रोज़ आसामान से ये मुहावरा टपका और पूरे देश ने उसे लपक लिया। ये हमारी सालों की आत्महीनता और ग्राहक को चूना लगाने की महान परम्परा ही है, जो आज हम लोकल को घटिया का पर्याय साबित कर चुके हैं। इसी लोकल से देश भर में लोगों की औकात मापी जा रही है। बताया जा रहा है कि जो चीज़ अच्छी है वो तुम्हारी औकात में नहीं है और जो तुम्हारी औकात में है वो लोकल है, उसी तरह जैसे तुम हो। मगर इधर मैं देख रहा हूं कि जो छवि भारतीय कम्पनियों ने इतने सालों में बनाई, वही रूतबा चीनी कम्पनियों ने कम समय में हासिल कर लिया है। जो दुकानदार कल तक सस्ता खरीदने की बात पर लोकल की सलाह दे ज़लील किया करते थे आज वही चाइनीज़ का विकल्प सुझा शर्मिंदा करने लगे हैं। इस हिदायत के साथ... मगर चाइनीज़ की कोई गारंटी नहीं है। कैसी त्रासदी है…जिन देशों को दुनिया आर्थिक महाशक्ति कहते नहीं थकती, उन्हीं शक्तियों की ताकत हिंदुस्तान के हर गली-ठेले-नुक्कड़ पर ‘लोकल’ और ‘चाइनीज़’ कह कर निचोड़ी जा रही है!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-2868490835404666516?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/2868490835404666516/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=2868490835404666516&amp;isPopup=true" title="3 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/2868490835404666516?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/2868490835404666516?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/08/blog-post_30.html" title="हिंदी-चीनी, भाई-भाई!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0UGRnkyeCp7ImA9Wx5RGEQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-7588043797924570879</id><published>2010-08-26T23:39:00.000-07:00</published><updated>2010-08-26T23:40:27.790-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-08-26T23:40:27.790-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>संदेसे आते हैं, हमें फुसलाते हैं!</title><content type="html">एक ज़माने में ईश्वर से जो चीज़ें मांगा करता था, आज वो सब मेरी चौखट पर लाइन लगाए खड़ी हैं। कभी मेल तो कभी एसएमएस से दिन में ऐसे सैंकड़ों सुहावने प्रस्ताव मिलते हैं। लगता है कि ईश्वर ने मेरा केस मोबाइल और इंटरनेट कम्पनियों को हैंडओवर कर दिया है। पैन कार्ड बनवाने से लेकर, मुफ्त पैन पिज़्ज़ा खाने तक के न जाने कितने ही ऑफर हर पल मेरे मोबाइल पर दस्तक देते हैं! इन कम्पनियों को दिन-रात बस यही चिंता खाए जाती है कि कैसे ‘नीरज बधवार’ का भला किया जाए? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले ही किन्हीं पीटर फूलन ने मेल से सूचित किया कि मेरा ईमेल आईडी दो लाख डॉलर के इनाम के लिए चुना गया है। हफ्ते भर में पैसा अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा। ‘सिर्फ’ दो हज़ार डॉलर की मामूली प्रोसेसिंग फीस जमा करवा मैं ये रक़म पा सकता हूं। ये जान मैं बेहद उत्साहित हो गया। कई दिनों से न नहाने के चलते बंद हो चुका मेरा रोम-रोम, इस मेल से खिल उठा। इलाके की सभी कोयलें कोरस में खुशी के गीत गाने लगीं, मोर बैले डांस करने लगे। मैं समझ गया कि मेरी हालत देख माता रानी ने स्टिमुलस पैकेज जारी किया है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली फुरसत में मैंने ये बात बीवी को बताई। मगर खुश होने के बजाए वो सिर पकड़कर बैठ गई। फिर बोली...मैं न कहती थी आपसे कि अब भी वक़्त है... संभल जाओ....मगर आप नहीं माने...अब तो आपकी मूर्खता को भुनाने की अंतर्राष्ट्रीय कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। मैंने वजह पूछी तो वो और भी नाराज़ हो गईं। कहने लगी कि आज के ज़माने में दुकानदार तक तो बिना मांगे आटे की थैली के साथ मिलने वाली मुफ्त साबुनदानी नहीं देता और आप कहते हैं कि किसी ने आपका ई-मेल आईडी सलेक्ट कर आपकी दो लाख डॉलर की लॉटरी निकाली है! हाय रे मेरा अंदाज़ा...आपकी जिस मासूमियत पर फिदा हो मैंने आपसे शादी की थी, मुझे क्या पता था कि वो नेकदिली से न उपज, आपकी मूर्खता से उपजी है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों, एक तरफ बीवी शादी करने का अफसोस जताती है तो दूसरी तरफ हर छठे सैकिंड मोबाइल पर शादी करने के प्रस्ताव आते हैं। बताया जाता है कि मेरे लिए सुंदर ब्राह्मण, कायस्थ, खत्री जैसी चाहिए, वैसी लड़की ढूंढ ली गई है। बंदी अच्छी दिखती है और उससे भी अच्छा कमाती है। सेल के आख़िरी दिनों की तरह चेताया जाता है कि देर न करूं। मगर मैं बिना देर किए मैसेज डिलीट कर देता हूं। ये सोच कर ही सहम जाता हूं कि बिना ये देखे कि मैसेज कहां से आया है, अगर बीवी ने उसे पढ़ लिया तो क्या होगा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जैसे ये संदेश अपनेआप में तलाक के लिए काफी न हों, अब तो सुंदर और सैक्सी लड़कियों के नाम और नम्बर सहित मैसेज भी आने लगे हैं। कहा जा रहा है कि मैं जिससे,जितनी और जैसी चाहूं, बात कर सकता हूं। बिना ये समझाए कि सुंदर और सैक्सी लड़की के लालच का भला फोन पर बात करने से क्या ताल्लुक है। साथ ही मुझे बिकनी मॉडल्स के वॉलपेपर मुफ्त में डाउनलोड करने का अभूतपूर्व मौका भी दिया जाता है। मानो, इस ब्रह्माण्ड में जितने और जैसे ज़रूरी काम बचे थे, वो सब मैंने कर लिए हैं, बस यही एक बाकी रह गया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों, ऐसा नहीं है कि ये लोग मेरा घर उजाड़ना चाहते हैं। इन बेचारों को तो मेरे घर बनाने की भी बहुत फिक्र है। नोएडा से लेकर गाज़ियाबाद और गुडगांव से लेकर मानेसर तक का हर बिल्डर मैसेज कर निवेदन कर कर रहा है कि सिर्फ मेरे लिए आख़िर कुछ फ्लैट बाकी हैं। ये सोच कभी-कभी खुशी होती है कि इतने बड़े शहर में आज इतनी इज्ज़त कमा ली है कि बड़े-बड़े बिल्डर पिछले एक साल से सिर्फ मेरे लिए आख़िर के कुछ फ्लैट खाली रखे हुए हैं। पिछली दिवाली पर शुरू किए ‘सीमित अवधि’ के डिस्काउंट को सिर्फ मेरे लिए खींचतान कर वो इस दिवाली तक ले आए हैं। उनके इस प्यार और आग्रह पर कभी-कभी आंखें भर आती हैं। मगर मकान भरी आंखों से नहीं, भरी जेब से खरीदा जाता है। मैं खाली जेब के हाथों मजबूर हूं और वो मेरा भला चाहने की अपनी आदत के हाथों। वो संदेश भेज रहे हैं और मैं अफसोस कर रहा हूं। मकान से लेकर ‘जैसी टीवी पर देखी, वैसी सोना बेल्ट’ खरीदने के एक-से-एक धमाकेदार ऑफर हर पल मिल रहे हैं। कभी-कभी सोचता हूं कि सतयुग में अच्छा संदेश सुन राजा अशर्फियां लुटाया करते थे, ख़ुदा न ख़ास्ता अगर उस ज़माने में वो मोबाइल यूज़ करते, तो उनका क्या हश्र होता!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-7588043797924570879?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/7588043797924570879/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=7588043797924570879&amp;isPopup=true" title="10 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/7588043797924570879?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/7588043797924570879?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/08/blog-post_26.html" title="संदेसे आते हैं, हमें फुसलाते हैं!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEMASHY-cCp7ImA9Wx5RFEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-5009591590652751112</id><published>2010-08-21T22:53:00.000-07:00</published><updated>2010-08-21T22:54:09.858-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-08-21T22:54:09.858-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>इज्ज़त बचाने का एक्शन प्लान!</title><content type="html">राष्ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले अधूरे और घटिया निर्माण की शिकायतों, बेहिसाब फर्जीवाड़ों  और आरोप-प्रत्यारोप के अंतहीन मैच के बीच आम आदमी ये सोच परेशान है कि कहीं ये खेल देश की बेइज्ज़ती का सबब न बन जाएं। जिन खेलों को हम अपनी ताकत दिखाने के लिए आयोजित कर रहे हैं, वो हमारी मक्कारी और नक्कारेपन को ज़ाहिर न कर दें। आम आदमी के नाते मैं भी इन सब बातों से बेहद परेशान हूं। मेरा मानना है कि आपस में तो हम कभी भी लड़-मर सकते हैं मगर अभी वक़्त ये सोचने का है कि काफी हद तक लुट चुकने के बावजूद, बची-खुची इज्ज़त को कैसे बचाया जाए। लिहाज़ा, आयोजन समिति और सरकार को मैं कुछ सुझाव देना चाहूंगा। उम्मीद है कि वो इन पर अमल करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1.सबसे पहला काम तो सरकार ये करे कि भ्रष्टाचार से जुड़ी तमाम शिकायतों को दबा दे। आयोजकों के खिलाफ की जा रही किसी भी जांच को फौरन से पेशतर रोक दिया जाए। जैसे-तैसे ये साबित किया जाए कि आयोजकों ने कहीं कोई पैसा नहीं खाया। जिस तरह एक कुशल गृहिणी दो सौ की चीज़ के लिए पति से तीन सौ रूपये लेती हैं और सौ रूपये मुसीबत के लिए बचाकर रखती है, कुछ ऐसा ही खेल आयोजकों ने भी किया है। दरअसल ये जानते थे कि राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन के बाद हम ओलंपिक भी आयोजित करेंगे। इसी को देखते हुए इन्होंने कॉमनवेल्थ की खरीदारी में ही इतना पैसा बचा लिया है कि वो उसी से ओलंपिक का खर्च भी निकाल सकते हैं। नाम न बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि हम लोगों ने इतना-इतना पैसा बचा लिया है कि हर वरिष्ठ अधिकारी एक निजी कॉमनवेल्थ खेल आयोजित कर सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिहाज़ा, इन्हें भ्रष्ट साबित करने के बजाए इनकी मैनेजमेंट स्किल को दुनिया के सामने लाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. कुछ लोगों का कहना है कि खेलों के दौरान खिलाड़ियों को साफ पानी पिलाने के लिए भले ही हमने अलग से वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगा दिया हो, दूसरे राज्यों से अतिरिक्त बिजली खरीद ली हो, सुंदर लो-फ्लोर बसें सड़कों पर उतार दी हों मगर तब क्या होगा जब यही खिलाड़ी खेलों के दौरान अख़बारों में दूषित पानी से बच्चों के बीमार पड़ने की ख़बर पढेंगे। तब इन्हें कैसा लगेगा जब बिजली कटौती से नाराज़ लोगों को सड़कों पर तोड़फोड़ करते देखेंगे, और तमाम बेहतरीन लो-फ्लोर बसों के बावजूद, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को लेकर वो क्या छवि बनाएंगे, जब वो पढ़ेंगे कि बस की छत पर सफर कर रहे यात्री हाई वोल्टेज तार की चपेट में आ गए!  अगर सरकार चाहती है कि खुद को विकसित और सभ्य दिखाने की उसकी कोशिशों पर पानी न फिरें और बच्चों के दूषित पानी से बीमार पड़ने की बात इन लोगों तक न पहुंचे तो उसे खेलों के दौरान ऐसी किसी भी नकारात्मक ख़बर के प्रकाशन-प्रसारण पर रोक लगा देनी चाहिए। तभी वो पानी-पानी होने से बच पाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.हाल-फिलहाल ये देखा गया है कि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी क्रिकेट टीमें जब भी भारत से कोई सीरीज़ हार कर जाती हैं तो व्यवस्था में खामिया निकालने लगती हैं। मसलन गर्मी बहुत थी, खाना अच्छा नहीं था, विकेट घटिया थे आदि-आदि। इसे देखते  सरकार को तमाम खिलाड़ियों को हिदायत देनी चाहिए कि वो किसी भी इवेंट में अच्छा प्रदर्शन करने की हिमाकत न करें। सभ्य मेज़बान का ये फर्ज़ है कि वो कुछ भी ऐसा न करें जिससे मेहमान नाराज़ हो जाएं। होगा ये कि हार का गुस्सा विदेशी खिलाड़ी यहां की व्यवस्था पर निकालने लगेंगे। अपने खिलाड़ियों का घटिया प्रदर्शन तो हम फिर भी बर्दाश्त कर लेंगे, और करते भी आएं हैं, मगर कोई हमारे इंतज़ाम को बुरा कहे, ये हमें बर्दाश्त नहीं। वैसे भी हमारे लिए स्पोर्ट्स सुपरपॉवर बनने का मतलब बड़ी प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाना है, न कि खिलाड़ियों का परफॉर्मेंस सुधारना!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. आख़िर में एक सलाह इमेरजंसी के लिए। आख़िरी दिनो में अगर हमें लगे कि स्टेडियम और बाकी निर्माण कार्य अब भी पूरे नहीं हुए हैं तो उस स्थिति में खेल नहीं हो पाएंगे, हुए भी तो भद्द पिटेगी... ऐसे में हमें खुद किसी खाली स्टेडियम में दो-चार सूतली बम फोड़ देने चाहिए। इसके बाद दुनिया भर में हल्ला होगा। तमाम जगह से खिलाड़ियों के नाम वापिस लेने की ख़बरें आने लगेंगी। कॉमनवेल्थ समिति सुरक्षा कारणों से भारत से मेज़बानी छीन लेगी। भारत की बजाए किसी और देश में खेल करवाए जाएंगे। वैसे भी सुरक्षा इतंज़ामों के चलते आयोजन न कर पाने की बदनामी, घटिया आयोजन कर भद्द पिटवाने से कहीं छोटी है!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-5009591590652751112?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/5009591590652751112/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=5009591590652751112&amp;isPopup=true" title="3 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/5009591590652751112?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/5009591590652751112?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html" title="इज्ज़त बचाने का एक्शन प्लान!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkAFRHs9fyp7ImA9Wx5TFUg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-1061972905718350538</id><published>2010-07-30T23:44:00.000-07:00</published><updated>2010-07-30T23:45:15.567-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-07-30T23:45:15.567-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>छिछोरेपन की मुश्किलें!</title><content type="html">जो ये कहते हैं, वो झूठ कहते हैं कि ज़िंदगी दूसरा मौका नहीं देती। मेरी तरह जवानी में लड़कियां छेड़ने की अगर आपकी भी हसरत अधूरी रह गई तो आप चाहें तो आगे चलकर लड़कियों की किसी टीम के कोच बन सकते हैं। आपके कोच बनने पर देश सोचेगा कि अब आप उसका गौरव बढ़ाएगा और आप सोचेंगे कि बरसों से जो न बन सकी, अब हम वो बात बनाएंगे। आप लड़कियों को कहना कि मुझसे घबराओ मत...मैं तुम्हारे बाप समान हूं और फिर उन्हें छेड़कर बताना कि ‘आपके यहां’ बाप कैसे होते हैं। आप बाप बन पाप करते जाना और टीम हारती जाएगी। देश सोचेगा कि आप सालों से खेल का शोषण कर रहे हैं और फिर एक रोज़ पता चलेगा कि आप खेल ही नहीं खिलाड़ियों का भी शोषण कर रहे थे। जिस कोच से ये उम्मीद की जाती थी कि विपक्षी खिलाड़ियों के खिलाफ रणनीति बनाएगा वो बाकायदा एक रणनीति के तहत अपनी ही खिलाड़ियों को पटाने में लगा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग छिछोरागिरी में स्पोर्टिंग करियर बनाने की सोच रहे हैं वो कुछ बातें अच्छे से समझ लें। अगर ब्लूलाइन बसों में सालों से लड़कियों को छेड़ ‘आनन्द’ लेने और कभी-कभार डांट खाने के आदी हैं, तो एक बात है मगर यही ‘करतब’ आप किसी बड़े मंच पर दिखाएंगे तो उसमें भारी रिस्क है।  हो सकता है कि जवानी में लड़कियों की साइकिलों का पीछा करते-करते बड़े हो कर आप किसी महिला साइकिल टीम के कोच बन जाएं मगर आप उन लड़कियों को आगे निकलना भला कैसे सीखाएंगे जबकि आप खुद हमेशा से साइकिलों का पीछा करने के आदी रहे हैं। उसी तरह जिस शख्स के मन में महिलाओं को लेकर कुंठाएं भरी हैं वो महिला भारतोलन टीम को वज़न उठाना सीखाएगा या अपनी कुंठाओं का वज़न कम करेगा ये बताना भी मुश्किल नहीं है। यही त्रासदी है। तभी तो ‘ड्रैग फ्लिक सीखाने’ वाले लोग अपने सम्बन्ध ‘क्लिक’ करवाने में लग जाते हैं। खिलाने की बजाए उनसे खेलने लग जाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-1061972905718350538?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/1061972905718350538/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=1061972905718350538&amp;isPopup=true" title="8 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/1061972905718350538?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/1061972905718350538?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html" title="छिछोरेपन की मुश्किलें!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUcESXY7eip7ImA9WxFaFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-8962352275929648711</id><published>2010-07-19T23:22:00.000-07:00</published><updated>2010-07-19T23:23:28.802-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-07-19T23:23:28.802-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(व्यंग्य)" /><title>भारत का विदेशी मूल!</title><content type="html">कम्पनियों के नतीजे भी अच्छे आ रहे हैं, नौकरियां भी बढ़ी हैं, औद्योगिक विकास दर में भी इज़ाफा हो रहा है, मानसून भी ठीक रहने की उम्मीद है और बाकी तमाम चीज़ें जिन्हें ‘स्थानीय कारण’ माना जाता है, ठीक हैं, बावजूद इसके शेयर बाज़ार ऊपर नहीं जा रहा। जानकार बताते हैं कि जब तक यूरोप में हालात नहीं सुधरते तब तक हमारे यहां भी स्थिति डांवाडोल रहेगी। ग्रीस की अर्थव्यवस्था को जब तक आर्थिक मदद की थोड़ी और ग्रीस नहीं लगाई जाती, भारत में भी हालात सुधरने वाले नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सब देख-सुन मैं सदमे में चला जाता हूं। देश की इस बेचारगी पर मुझे तरस आता है। हमारे किसी भी अच्छे या बुरे के पीछे कारण के रूप में हम ही पर्याप्त क्यों नहीं है? हर क्षेत्र में एक विदेशी हाथ या वजह का होना क्या ज़रूरी है। कहने को सरकार में एक विदेश मंत्रालय है और एक विदेश मंत्री भी। मगर विदेश नीति क्या होगी ये अमेरिका तय करेगा। साल में कितनी अच्छी फिल्में बनेंगी, ये इस बात पर निर्भर करता है कि नकल किए जा सकने लायक हॉलीवुड में कितनी नई फिल्में बनती हैं। हर खेल में सुधार का एक मात्र मूलमंत्र है-विदेशी कोच की तैनाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फैशन से भाषा तक हर शह विदेशी हो गई है। दारू के अलावा इस देश में देसी के नाम पर कुछ नहीं बचा है। देसी कट्टों से लेकर देसी बम तक सब आउटडेटिड हो गए हैं। टोंड दूध के ज़माने में आम आदमी को तो देसी घी तक मयस्सर नहीं है। देश को लूटने वाले नेता भी अपना पैसा विदेशी बैंकों में जमा करवाते हैं। अतीत के अलावा भारत पास कुछ भी भारतीय नहीं बचा है। कुछ लोगों को जैसे ये नहीं समझ आता कि ज़िंदगी का क्या किया जाए, भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है जो साठ साल में ये नहीं जान पाया कि आज़ादी का क्या किया जाए!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-8962352275929648711?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/8962352275929648711/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=8962352275929648711&amp;isPopup=true" title="5 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8962352275929648711?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8962352275929648711?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/07/blog-post_19.html" title="भारत का विदेशी मूल!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D08NQHg5fCp7ImA9WxFbEkg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-537200549414964301</id><published>2010-07-04T08:04:00.001-07:00</published><updated>2010-07-04T08:04:51.624-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-07-04T08:04:51.624-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>मानसून का भ्रष्टाचार!</title><content type="html">व्यवस्था का अगर इंसान पर असर पड़ता है तो चीज़ों पर भी पड़ता होगा। ये देखा गया है कि जिन दफ्तरों में लोग काम नहीं करते वहां कम्प्यूटर भी धीमे चलते हैं। जीमेल तक खुलने में इतना वक़्त लेता है कि आप चाहें तो जिसे मेल करना है, उसके घर जाकर चिट्ठी दे आएं। ठीक इसी तरह ये समझने की ज़रूरत है कि मानसून भी इस देश के सिस्टम में ढल गया है। उसे कोसने से पहले ये ध्यान रखना चाहिए कि जिस मुल्क  में स्टेशन पर गाडी, बुज़ुर्ग को पेंशन, पत्ते पर चिट्ठी, बुकिंग के बाद गैस और नौजवान को अक्ल... कभी वक़्त पर नहीं आती, वहां मानसून वक़्त पर आ जाए, ये उम्मीद करना, उम्मीद और मानसून दोनों के साथ ज़्यादती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि प्रधान देश में मानसून की ख़ासी अहमियत है। अपनी अहमियत जान जब सरकारी चपरासी तक भ्रष्ट हो सकता है तो मानसून क्यों नहीं। हो सकता है वो वक्त से ही निकलता हो मगर रास्ते में एसी या कूलर बनाने वाली कम्पनियां उसे रिश्वत देकर रोक लेती हों। उसे कहती हो कि तुम वक़्त पर चले गए तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा। ऐसा करो दो-चार करोड़ लेकर यहीं हमारे रेस्ट हाउस में रूक जाओ। दूसरी तरफ मौसम विभाग अपना सिर धुनता है कि मानसून तो फलां तारीख तक फलां जगह पहुंच जाना चाहिए मगर वो पहुंचा क्यों नहीं। तो एक संभावना ये है कि वो भ्रष्ट हो गया हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी संभावना ये कि जिस दौर में बाबाओं से लेकर नेताओं तक सभी चरित्रहीन हो रहे हैं, चरित्रहीनता राष्ट्रीय चरित्र बन गई है तो क्या पता मॉनसून का भी कोई एक्सट्रा मैरिटल अफेयर चल रहा हो। दिल्लगी के चक्कर में वो दिल्ली टाइम पर नहीं आ रहा। &lt;br /&gt;या फिर देरी से आकर मानसून ये बताना चाहता हो कि जिस तरह इंसान अपनी मर्ज़ी का मालिक हो कर नेचर का कबाड़ा कर सकता है। सोचों ज़रा! अगर नेचर भी मर्ज़ी की मालिक हो जाए तो क्या होगा!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-537200549414964301?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/537200549414964301/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=537200549414964301&amp;isPopup=true" title="2 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/537200549414964301?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/537200549414964301?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/07/blog-post.html" title="मानसून का भ्रष्टाचार!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEUDRHg9eip7ImA9WxFUFUk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-6394256462623108136</id><published>2010-06-26T01:50:00.000-07:00</published><updated>2010-06-26T01:51:15.662-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-06-26T01:51:15.662-07:00</app:edited><title>धूल चाटने  की हसरत!</title><content type="html">भारत उन चंद  गौरवशाली देशों में शामिल  है जो फुटबॉल विश्व कप में आज तक एक भी मैच नहीं हारा! ये बात अलग है कि ये गौरव उसने विश्व कप में एक मैच भी न खेल कर हासिल किया है! मगर सवाल यही है कि कब तक हम भारतीय रात दो-दो बजे तक जागकर मुशायरे में सिर्फ तालियां ही पीटते रहेंगे, ये सोच कर खुश होते रहेंगे कि टूर्नामेंट के फलां गाने में भारतीय ने संगीत दिया या उदघाटन समारोह में फलां सेबीब्रिटी ने भारतीय डिज़ाइनर की ड्रेस पहनी। लानत है ऐसी संतुष्टि पर। खेल फुटबॉल का है और हम दर्जियों के हुनर पर गौरवान्वित हो रहे हैं। ड्रेस की जगह फुटबॉल भी सिली होती तो बात और होती।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों, न तो हमें हार से परहेज़ है और न ही धूल से एलर्जी तो फिर कब तक हम क्रिकेट टीमों के हाथों क्रिकेट मैदानों की ही धूल चाटते रहेंगे। वो दिन कब आएगा जब हम भी ब्राज़ील के हाथों धूल चाटेंगे, अर्जेंटीना हमारी बख्खियां उधेड़ेगा और जर्मनी हमें रौंद डालेगा। कब तक हम सैफ खेलों में भूटान और मालदीव से हारते रहेंगे। कब तक नेपाल को हरा और बर्मा से हार हम खुश और दुखी होते रहेंगे। जितनी आबादी रोज़ाना डीटीसी की बसों में ‘खड़ी होकर’ सफर करती है; उससे भी कम आबादी वाले देश विश्व कप खेल रहे हैं और डीटीसी के डिपो जितने देश विश्व कप में धूम मचाए हुए हैं। और एक हम हैं कि विश्व कप के दौरान बिके रंगीन टीवी और खाली हुई बियर की बोतलें गिन कर ही खुश हो रहे हैं। टीम के कोच बॉब हॉटन दावा करते हैं कि हम भी 2018 के विश्व कप में क्वॉलिफाई कर जाएंगे मगर जैसे हालत अभी दिखते हैं, उसे देख लगता नहीं कि हम अठारह हज़ार दो तक भी क्वॉलिफाई कर पाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-6394256462623108136?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/6394256462623108136/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=6394256462623108136&amp;isPopup=true" title="6 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/6394256462623108136?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/6394256462623108136?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/06/blog-post_26.html" title="धूल चाटने  की हसरत!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEUAQ3k9fyp7ImA9WxFVGU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-7006352242832380447</id><published>2010-06-18T22:42:00.000-07:00</published><updated>2010-06-18T22:44:02.767-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-06-18T22:44:02.767-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(व्यंग्य)" /><title>हारा हुआ चिंतन! (व्यंग्य)</title><content type="html">औसत भारतीय ज़िंदगी में किस्मत, वक़्त और ईश्वर को कभी नहीं भूलता। किस्मत में हो तो अच्छी नौकरी मिल जाती है, वक़्त आने पर लड़की के लिए अच्छा रिश्ता मिल जाता है और ईश्वर चाहे तो इंसान का ‘नाम’ भी हो जाता है। अब ऐसे समाज में जब लोग इंसाफ की, कानून की बात करते हैं तो लगता है कि संस्कारों से बगावत हो रही है। मेरा मानना है कि दर्शन जब ज़िंदगी के हर पड़ाव पर सहारा बनता है तो फिर न्याय में भी बनता होगा। लिहाज़ा, जब लोग बात करते हैं कि हज़ारों लोगों की मौत के ज़िम्मेदार एंडरसन को भगा कर, उनके साथ अन्याय किया गया तो मुझे कोफ्त होती है। जब संसार में एक पत्ता भी ईश्वर की मर्ज़ी के बिना नहीं खड़कता तो ऐसे में एक शख्स की लापरवाही से हज़ारों लोगों की जान कैसे जा सकती है! लोग मरे... क्योंकि यही ईश्वर की मर्ज़ी थी और एंडरसन फरार हुआ क्योंकि उसमें ईश्वर की सहमति थी। अब ये कहना कि इसके लिए अर्जुन सिंह या राजीव गांधी दोषी हैं, सरासर ग़लत है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोषियों का क्या होगा...क्या नहीं होगा...इसकी चिंता हमें छोड़ देनी चाहिए। जब इंसान को उसके कर्मों का फल मिलना तय है और वो फल ईश्वर ने ही देना है और अर्जुन सिंह एंड कंपनी ने जो किया वो ईश्वर की मर्जी़ से ही किया तो फिर क्यों उन्हें बद्दुआएं दे हम अपना वक़्त बरबाद करें? ये लोग तो ईश्वरीय मर्ज़ी की पूर्ति के लिए माध्यम भर थे! जिसने जीवन दिया अगर उसी ने वापिस ले भी लिया तो क्या हर्ज़ है। क्या तुम्हारा था जो छिन गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद को मरने वाली मैं दुनिया की आख़िरी चीज़ मान भी लूं तो भी इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि भगवान भी आत्मचिंतन करता होगा। ग़लती का एहसास होने पर वो भी प्रायश्चित करता होगा...और अगर आत्मचिंतन ईश्वर के भी संस्कार का हिस्सा है तो यकीन मानिए वॉरन एंडरसन अगले जन्म में एक गरीब के रूप में भारत में ही जन्म लेगा! उसके लिए सज़ा की इससे बड़ी बद्दुआ और क्या हो सकती है!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-7006352242832380447?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/7006352242832380447/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=7006352242832380447&amp;isPopup=true" title="7 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/7006352242832380447?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/7006352242832380447?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/06/blog-post_18.html" title="हारा हुआ चिंतन! (व्यंग्य)" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUUERXw7fyp7ImA9WxFVEk4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-1709334353424789964</id><published>2010-06-10T23:19:00.000-07:00</published><updated>2010-06-10T23:20:04.207-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-06-10T23:20:04.207-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>पेशा बदलने का वक़्त! (हास्य-व्यंग्य)</title><content type="html">इस देश में कुछ हस्तियों को देखकर एहसास होता है कि उनका अपने काम में मन नहीं लग रहा। वक़्त आ गया है कि वो पेश बदल लें। इस सूची में पहला नाम है युवराज सिंह का। कहा जाता है कि बचपन में क्रिकेट उनका पहला प्यार नहीं था। पिता के दबाव में वो क्रिकेट खेलने लगें। हाल-फिलहाल उनका खेल देख यही लग रहा है कि पिता के दबाव का असर उन पर से जाने लगा है। जिस शिद्दत से वो हर उपलब्ध मौके पर नाचते हैं...उसे देखते हुए यही सलाह है कि उन्हें क्रिकेट छोड़, कोई ऑर्केस्ट्रा ग्रुप ज्वॉइन कर लेना चाहिए। और चाहें तो अपने नचनिया मित्र श्रीसंत को भी साथ ले लें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह फिल्मी दुनिया में राम गोपाल वर्मा की हर फिल्म देख यही लगता है कि वो प्रतिभा से नहीं, अपनी ज़िद्द से फिल्म निर्देशक रह गए हैं। एक बाल हठ है...कि मैं फिल्में बनाऊंगा। फिल्म में कहानी और थिएटर में दर्शकों का होना तो कोई शर्त है ही नहीं। उदय चोपड़ा को देख भी यही लगता है कि किसी भावुक क्षण में पिता से किए वादे को निभाने के चक्कर में आज भी एक्टिंग कर रहे हैं। वरना तो सम्पूर्ण राष्ट्र की यही मांग है...हमारे अभिनेता कैसा हो...जैसा भी हो..उदय चोपड़ा जैसा न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं शरद पवार साहब...आईसीसी के चीफ भी बनने वाले हैं। आईपीएल में टीम खरीदने के अरमान भी रखते हैं मगर एक जगह, जहां उनका दिल नहीं लगता, वो है कृषि मंत्रालय। उनका मानना है कि जिस देश में साठ फीसदी लोग कृषि पर निर्भर हैं, उस मंत्रालय को आज भी पॉर्ट टाइम जॉब की तरह लिया जा सकता है। ममता बैनर्जी भी उस कर्मचारी की तरह बेमन से काम कर रही हैं, जिसकी नयी नौकरी लगने वाली है और पुरानी में उसका दिल नहीं लग रहा। और मालिक भी जानता है कि वो नोटिस पीरियड पर है!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-1709334353424789964?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/1709334353424789964/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=1709334353424789964&amp;isPopup=true" title="5 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/1709334353424789964?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/1709334353424789964?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/06/blog-post_10.html" title="पेशा बदलने का वक़्त! (हास्य-व्यंग्य)" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEUERH84fyp7ImA9WxFVEEs.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-302342267792806877</id><published>2010-06-08T22:42:00.000-07:00</published><updated>2010-06-08T22:43:25.137-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-06-08T22:43:25.137-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>लेखक का ख़त!</title><content type="html">सम्पादक महोदय,&lt;br /&gt;नमस्कार!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक भले ही समाज में फैले भ्रष्टाचार, गिरते सामाजिक मूल्यों, स्वार्थपूर्ण राजनीति पर कितना ही क्यों न लिखे लेकिन उसकी असल चिंता यही होती है कि उसका भेजा लेख टाइम से छप जाए। मानवीय मूल्यों की गिरावट पर उसे दुख तो होता है लेकिन साथ ही इस बात की खुशी भी होती है, इस गिरावट पर जैसा वो लिख पाया वैसा किसी और ने नहीं लिखा। ये सही है कि ऐसा सोचना भी अपने आप में गिरावट है, मगर ये अलग बहस का विषय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक इसी तरह पिछले कुछ लेखों में मैंने भले ही नेताओं से लेकर, मीडिया और खेल पर जो लिखा हो मगर इस दौरान मेरी असली चिंता यही रही कि आपने व्यंग्य कॉलम काफी छोटा कर दिया है। माना कि बड़ा कॉलम होने पर लेखक विषय से भटक जाते हैं मगर आपने ये कैसे मान लिया कि कॉलम छोटा होने पर लेखक भटकना बदं कर देंगें। मुझ जैसे को तो आप चुटकुला छाप कर भी भटकने से नहीं रोक सकते। कविता, कहानी, उपन्यास से भटकते हुए तो हम व्यंग्यकार बने हैं, अब व्यंग्य में भी नहीं भटकेंगें तो कहां जाएंगें, आप ही बताईये!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले आप इस कॉलम को पेज के बीचों-बीच छापते थे, फिर इसे नीचे ले गए और अब साहित्य में व्यंग्यकार की तरह, आपने इसे पूरी तरह हाशिये पर डाल दिया है। उस पर शब्द सीमा भी घटा दी है। जितने शब्द पहले मैं विषय पर आने में लेता था उतने में तो लेख ही ख़त्म हो जाता है। इससे बड़ी तो आप पाठकों की चिट्ठियां छापते हैं। सोच रहा हूं... लेख छोड़ चिट्ठियां लिखनी शुरू कर दूं। मेरा अनुरोध है कि या तो कॉलम फिर से बड़ा कर दें या फिर रचना मेल के बजाए एसएमएस से लेना शुरू कर दें! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छपने की आशा में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिकायती लेखक!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-302342267792806877?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/302342267792806877/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=302342267792806877&amp;isPopup=true" title="7 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/302342267792806877?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/302342267792806877?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/06/blog-post.html" title="लेखक का ख़त!" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkQNQnY4eSp7ImA9WxFWEkQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-8130878467911654610</id><published>2010-05-31T00:13:00.000-07:00</published><updated>2010-05-31T00:19:53.831-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-31T00:19:53.831-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>सारी शामें उनमें डूबीं, सारी रातें उनमें खोयीं! (हास्य-व्यंग्य)</title><content type="html">कॉलेज का नया सत्र शुरू होने वाला है। आए दिन अख़बार-टीवी में फैशनेबल लड़कियों की तस्वीरें आती हैं, जिनमें अक्सर दिखाया जाता है कि एक बला की खूबसूरत लड़की अपनी सहेली से बात कर रही है और पीछे कोने में खड़े दो लड़के किसी ओर दिशा में मुंडी घुमाए हैं। मैं कभी नहीं समझ पाया कि ये बाप के बेटे, लड़कियां न देख दूसरी दिशा में आख़िर क्या देखते हैं। ऐसी कौन-सी अनहोनी है जो इनकी गर्दन को लड़कियां देखने के बजाए पैंतालीस डिग्री घूमने पर मजबूर करती है। सच...आधी बुद्धि इन लड़कियों को देख भ्रष्ट हो जाती है, और बाकी इन गधे लड़कों को देख।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों, ये ऐसा दर्द है जिसे वही समझ सकता है जो कभी को-एड में न पढ़ा हो। जिसके सम्पर्क क्षेत्र में दो ही महिलाएं रही हों, एक उसकी मां और दूसरी बहन। जो गर्ल्स कॉलेज के चौकीदार को भी जलन भरी निगाहों से देखता हो। जो बंद पड़े गर्ल्स कॉलेज की चारदीवारी में भी लड़की होने की उम्मीद में झांकता हो। जो साइकिल स्टैंड पर खड़ी लेडीज़ साइकिलों को भी हसरत भरी निगाहों से देखता हो। जिसके जीवन का एकमात्र मकसद ऐसी लड़कियों की तलाश हो जिनकी साइकिल की चैन उतर चुकी है। ऐसी चैनें चढ़ा कर ही इसे चैन मिलता है। किसी और को चैन चढ़ाता देख ये बेचैन हो जाता है, और तब तक चैन से नहीं बैठता जब तक दो-चार साइकिलों की चैन न चढ़ा ले। मित्रों, हिंदुस्तान की कस्बाई ज़िंदगी में थोक के भाव पाए जाने वाले ये वो बांकुरें हैं जो ज़्यादातर जीवन शहर के आउटस्कर्ट्स में गुज़ारते हैं और शहर आने पर कभी स्कर्ट्स के साथ एडजस्ट नहीं कर पाते!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया भर के वैज्ञानिक मंगल पर पानी की खोज में है तो ये सम्पूर्ण धरती पर लड़कियों की खोज में। बस में चढ़ते ही सैकिंड के सौवें हिस्से में पता लगा लेते हैं कि लड़की कहां बैठी है। फिर यथासम्भव कोण बना उसे एकटक ताड़ते हैं। सवारियां बस के बाहर के सौंदर्य का आनन्द उठाती हैं और ये बस के भीतर का। इनके लिए उस एक पल पूरी दुनिया डायनामाइट लगा उड़ा दी गई है। अगर कोई शह उस क्षण ज़िंदा है और देखने लायक तो वो लड़की जिसे वो पिछले सैंतीस मिनट से बिना सांस लिए, बिना पलक झपकाए, आंखें गढ़ाए देख रहे हैं। इन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि लड़की इनके बारे में क्या सोचेगी। इनकी नज़र में पूरी समस्या मात्र ‘शाब्दिक मतभेद’ है। लड़कियां जहां इस एकटक ताड़ने को ‘बेशर्मी’ मानती हैं तो ये ‘आंख सेंकना’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां प्यार में विचारों का मिलना नहीं, मौके का मिलना ज़रूरी होता है। अक्सर जिस लड़की से प्यार करते हैं उसे कानों-कान इसकी ख़बर नहीं लगती। दोस्तों में उसे ‘तुम्हारी भाभी’ कहते हैं। मगर उनकी भाभी को कभी नहीं बता पाते कि ये उसका पति बनना चाहते हैं। फिर एक रोज़ इसके दोस्त ही इसे खुशखबरी देते हैं कि-‘हमारी भाभी’ अब तुम्हारी भी भाभी बनने वाली है। उसके घर वालों ने उसका रिश्ता तय कर दिया है। ये सुन इस मासूम का दिल टूट जाता है। बिना कभी लड़की को प्रपोज़ किए, बिना अपने दिल का हाल बताए ये इस महान नतीजे पर पहुंचता है कि इसके साथ ‘धोखा’ हुआ है! ये जीवन भर ऐसे ही धोखे खाता है और इन्हीं मुगालतों में जीवन बनाने के मौके खोता है। आशिक के ऐसे ही हालात पर सरदार अली जाफरी ने कहा है... सारी शामें उनमें डूबीं, सारी रातें उनमें खोयीं, सारे सागर उनमें टूटे, सारी मय गर्क उन आंखों में है, देखती हैं वो मुझे लेकिन बहुत बेगानावार (जैसे जानती ही न हों)।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-8130878467911654610?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/8130878467911654610/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=8130878467911654610&amp;isPopup=true" title="5 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8130878467911654610?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/8130878467911654610?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html" title="सारी शामें उनमें डूबीं, सारी रातें उनमें खोयीं! (हास्य-व्यंग्य)" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUUARHo8fyp7ImA9WxFWEkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-4695760694080242722</id><published>2010-05-30T02:50:00.000-07:00</published><updated>2010-05-30T02:54:05.477-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-30T02:54:05.477-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>अपनी-अपनी पहचान! (व्यंग्य)</title><content type="html">दुनिया को एक बड़ा-सा क्लास रूम माना जाए और अलग-अलग देशों को स्टूडेन्ट्स तो बड़ी रोचक तस्वीर उभरती है। कक्षा में जहां जापान जैसे कुछ मेहनती बच्चे हैं, जिन्होंने सिर्फ पढ़ाई-लिखाई के दम पर पहचान बनाई है जो सिर्फ अपने काम से काम रखते हैं तो वहीं अमेरिका जैसी अमीर बाप की औलादें भी हैं, जिनका ध्यान पढ़ाई में कम और नेतागिरी में ज़्यादा है। जो ‘पैसा फेंक और पर्चा खरीद’ में माहिर हैं। एक इंग्लैंड है, जिसका ज़्यादातर वक़्त अमीर दोस्त अमेरिका की चमचागिरी में बीतता है तो वहीं यूरोपीय देशों के छात्रों का एक गुट भी है जो अमेरिकी दादागिरी से बचने के लिए साथ खाता-पढ़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सब बच्चे पहली दुनिया के देश कहलाते हैं जो या तो अपनी मेहनत के दम पर टिके हैं, पैसे के दम पर या फिर एक दूसरे के दम पर। वहीं इस क्लास में कुछ ऐसे बच्चे भी हैं, जो स्कूल क्यों जा रहे हैं, वो खुद नहीं जानते। उन्हें पता है कि दसवीं के बाद उन्हें गल्ले पर बैठ पिताजी की दुकान संभालनी है। मगर ये सब भी कुछ न कुछ करने में लगे हुए हैं। कक्षा में अगर किसी बच्चे के इम्पोर्टेंट नोट्स चोरी हो गए हैं और इसके एवज़ में कोई छात्र पैसे मांग रहा है तो मान लें कि ये सोमालिया होगा। क्लास में अगर चोरी छिपे जर्दे-तम्बाकू के पाउच आ गए हैं तो ये नाइजीरियाई छात्र की करतूत होगी। वहीं बड़े डौलों की धौंस दिखा, ड्रैगन छपी टी-शर्ट पहन, हर दूसरे छात्र को डराने वाला निश्चित तौर पर चीन ही होगा। अमेरिकी और यूरोपीय छात्रों को पीटने की अगर कहीं प्लानिंग चल रही है तो उसके पीछे पाकिस्तानी होगा और वहीं पूरी कक्षा में जिसका कोई दोस्त नहीं, जिसे सब से शिकायत है, साथी बैंच वालों से भी जिसका झगड़ा है, जिसकी हर कोई बेइज़्ज़ती कर जाता है, जो औसत होने के बावजूद दंभी है... जी हां, वो मेरा भारत महान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-4695760694080242722?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/4695760694080242722/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=4695760694080242722&amp;isPopup=true" title="4 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/4695760694080242722?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/4695760694080242722?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html" title="अपनी-अपनी पहचान! (व्यंग्य)" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUQBQ304fSp7ImA9WxFXGE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-6436633004265678085.post-9199060396444734320</id><published>2010-05-25T09:01:00.001-07:00</published><updated>2010-05-25T09:02:32.335-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-05-25T09:02:32.335-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="(हास्य-व्यंग्य)" /><title>एक आध्यात्मिक घटना! (हास्य-व्यंग्य)</title><content type="html">आजकल परीक्षा परिणामों का सीज़न चल रहा है। रोज़ अख़बार में हवा में उछलती लड़कियों की तस्वीरें छपती हैं। नतीजों के ब्यौरे होते हैं, टॉपर्स के इंटरव्यू। तमाम तरह के सवाल पूछे जाते हैं। सफलता कैसे मिली, आगे की तैयारी क्या है और इस मौके पर आप राष्ट्र के नाम क्या संदेश देना चाहेंगे आदि-आदि। ये सब देख अक्सर मैं फ्लैशबैक में चला जाता हूं। याद आता है जब मेरा दसवीं का रिज़ल्ट आना था। अनिष्ट की आशंका में एक दिन पहले ही नाई से बदन की मालिश करवा ली थी। कान, शब्दकोश में न मिलने वाले शब्दों के प्रति खुद को तैयार कर चुके थे। तैंतीस फीसदी अंकों की मांग के साथ तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को सवा रूपये की घूस दी जा चुकी थी और पड़ौसी, मेरे सार्वजिनक जुलूस की मंगल बेला का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं फेल होने का डर बुरी तरह से तन-मन में समा चुका था और उससे भी ज़्यादा साथियों के पास होने का। मैं नहीं चाहता था कि ये ज़िल्लत मुझे अकेले झेलनी पड़े। उनका साथ मैं किसी कीमत पर नहीं खोना चाहता था। उनके पास होने की कीमत पर तो कतई नहीं। दोस्तों से अलग होने का डर तो था ही मगर उससे कहीं ज़्यादा उन लड़कियों से बिछड़ जाने का था जिन्हें इम्प्रैस करने में मैंने सैंकड़ों पढ़ाई घंटों का निवेश किया था। असंख्य पैंतरों और सैंकड़ों फिल्मी तरकीबें आज़माने के बाद ‘कुछ एक’ संकेत भी देने लगी थीं कि वो पट सकती हैं। ये सोच कर ही मेरी रूह कांप जाती थी कि फेल हो गया तो क्या होगा! मेरे भविष्य का नहीं, मेरे प्रेम का! या यूं कहें कि मेरे प्रेम के भविष्य का!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर पिताजी के हाथों मेरी हड्डियां और प्रेमिका के हाथों दिल टूटने से बचाने की सारी ज़िम्मेदारी अब माध्यमिक शिक्षा बोर्ड पर आ गयी थी। इस बीच नतीजे आए। पिताजी ने तंज किया कि फोर्थ डिविज़न से ढूंढना शुरू करो! गुस्सा पी मैंने थर्ड डिविज़न से शुरूआत की। रोल नम्बर नहीं मिला तो तय हो गया कि कोई अनहोनी नहीं होगी! (फर्स्ट या सैकिंड डिविज़न की तो उम्मीद ही नहीं थी) पिताजी ने पूछा कि यहीं पिटोगे या गली में.....इससे पहले की मैं ‘पसंद’ बताता...फोन की घंटी बजी...दूसरी तरफ मित्र ने बताया कि मैं पास हो गया...मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था....पिताजी भी खुश थे...आगे चलकर मेरा पास होना हमारे इलाके में बड़ी 'आध्यात्मिक घटना' माना गया....जो लोग ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे, वो करने लगे और जो करते थे, मेरे पास होने के बाद उनका ईश्वर से विश्वास उठ गया!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6436633004265678085-9199060396444734320?l=vyanjana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://vyanjana.blogspot.com/feeds/9199060396444734320/comments/default" title="टिप्पणियाँ भेजें" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6436633004265678085&amp;postID=9199060396444734320&amp;isPopup=true" title="4 टिप्पणियाँ" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/9199060396444734320?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/6436633004265678085/posts/default/9199060396444734320?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://vyanjana.blogspot.com/2010/05/blog-post_25.html" title="एक आध्यात्मिक घटना! (हास्य-व्यंग्य)" /><author><name>नीरज बधवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15197054505521601188</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>4</thr:total></entry></feed>

