दूर कहीं किसीके रेडियो से गाने की आवाज़ सन्नाटे से संघर्ष करके आती प्रतीत हो रही है । नहीं जी, मैं बहरा नहीं हूँ,गाने का प्रतीत होना एक अलग तरह का एहसास है । गाना गाया जारहा है, यह निर्विवादित होता है, धुन भी चिरपरिचित लग रही है, किंतु स्पष्टता के अभाव में, आप गाने के बोल नहीं पकड़ पा रहें हैं, तो इसे क्या कहेंगे ? मन को अशांत कर देने वाली छटपटाहट ! साइडरूम से कुछ खाना खा कर लौटा, तो अनमने ढंग से टी०वी० खोल कर बैठ गया, जरा देखा जाये कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है ? वैसे टी०वी० में मेरी आस्था न के बराबर रह गयी है, पर कोई और चारा भी नहीं है । ब्लगियाऊँगा तो शायद रात ही न बीत जाये । छोड़ो, सुबह लौटना भी है, अपनी प्रैक्टिस के दिहाड़ी पर !
कल रात से हम तोता-मैना यहाँ प्रवास कर रहे हैं , रायबरेली से तीस किलोमीटर पर डलमऊ स्थित नहर विभाग के अतिथिगृह में । गंगा के ठीक किनारे एक ऊँचे टीले पर टिका यह गेस्टहाउस बड़ी शांति देता है, किंतु यह गाना मुझे क्यों अशांत कर रहा है ? दरअसल इसकी धुन व लयबद्धता से यह तो पक्का है कि लता जी का स्वर है, किंतु मुझे उनका कोई ऎसा गाना याद नहीं आता, "
हम हिंदूस्तान में रहने वालों को..ओऽ ..ऽ, चैन कहाँऽ हाये ए एऽ आराम कहाँ, हम.. हिंन्दस्ताँ में रहने वालों को ओ ओ ओऽ
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मैं शर्त लगा सकता हूँ कि ऎसा कोई गाना ही नहीं है, लेकिन इसके धुन से मेरे दिमाग में तो यही बज रहा है, क्या करें ? मेरी बालीवुड एनसाइक्लोपेडिया पंडिताइन मेरी मदद अवश्य करती किंतु वह तो खाना खाकर लौटते ही ध्यानस्थ हो गयी । इस समय वह निद्रायोग में परमब्रह्म से एकाकार होती सी लग रहीं हैं, चलो यह वरदान तो बिरलों को ही नसीब है । मैं यहाँ आ गया था कि एक दिन में लगकर अपने सभी ब्लाग्स को रिस्ट्रक्चर कर लूँगा, पंडिताइन का एक शनिवार चुरा लिया था, वह भी उनको लौटा दूँगा । आज सोनिया गाँधी रायबरेली आ रहीं हैं, सो शहर में बड़ी अफ़रा तफ़री रहेगी । यहाँ तो अर्ज़ुन सिंहों की भरमार है, एक ढूँढो तो दस हज़ार मिलेंगे । हर उम्र जाति वर्ण और ओहदे के अर्ज़ुन सिंह, हर गली गली में देखो । वैसे भी फ़िज़िक्स के नियम के अनुसार सोनियाजी के आने पर मैं निष्क्रिय होकर अवक्षेपित हो जाता हूँ, एक किनारे को !
हाँ, याद आया कि दिमाग में 'चैन कहाँ-आराम कहाँ
' क्यों हो रहा है । टी०वी० पर बाहरी दुनिया का हाल देखने की नौबत ही नहीं आयी । यहाँ तो अपने ही घर में धूम-धड़ाम चल रहा है, जयपुर में धमाकों को लेकर । चैनलों की सक्रियता एवं धाक के मुताबिक इनकी गिनती 6 से 8 के दरम्यान डोलती फिर रही थी । एक ज़नाब तो रस्सी पकड़े पकड़े इतनी देर से साँप साँप चिल्ला रहे थे कि साला टीवीए बंद कर देना पड़ा । एकठो निष्क्रिय किया हुआ बम पा गये थे । उसी को उधेड़ उधेड़ पूरे देश को दिखा रहे थे , 65 उजड़े परिवारों की बाइट से आह्लादित एवं बिछोह की वेदना से बिलखती महिला को कैमरे
में कैद कर लेने की सफलता से परम उत्साहित । ऎसा अवसर दुबारा नहीं आयेगा, न तो उनके लिये और न उस बेचारी महिला के लिये । कुछ बरबादियाँ अपने को कभी रिपीट नहीं करतीं, न ही मौत दुबारा दस्तक देने आती है । दे आर जस्ट वन टाइम डील !
हटाओ यार, अपना मन ख़राब मत करो । यह असहमति की स्थिति मेरे आसपास ही निरंतर क्यों मँडराया करती है ? यह क्या वस्तुस्थिति का अस्वीकार नहीं कहलायगा ? संभालो अपने को, यही सब अपने मन को समझाता मैं गंगा पर बनते पुल को नीम अँधेरे में अनमना निहारता रहा। लौटा कि टीवी बंद न करूँ तो आवाज़ ही कम कर दूँ ,वरना पंडिताइन अपने खर्राटा तप में विघ्न पड़ने से जग गयीं तो इस निशाचर की ख़ैर नहीं
लेटा लेटा चलते हुये कैप्शन देखता हुआ निन्दियाने का प्रयास कर रहा था कि ज़बरन मेरे दिमाग के साथ एक हादसा होगया । सामने स्क्रीन पर स्क्राल कर रहा है, " राष्ट्रपति ने धमाकों की निन्दा की...प्रधानमंत्री ने घटना की निन्दा की... सोनिया ने भी निन्दा की... वामपक्ष ने निन्दा की... विपक्ष ने निन्दा की... इसने निन्दा की.. उसने निन्दा की.. सबने निन्दा की.. बिन्दा ने निन्दा की.. स्वयं निन्दा ने निन्दा की !" हद है भाई !
अब इतनी निन्दा भी ठीक नहीं कि बेचारे हूज़ी फ़ूज़ी के लड़के शर्म से पानी पानी हो जायें । चलिये मान लेते हैं कि बाहर से आये हैं, देन दे मस्ट बी ट्रीटेट लाइक ' देवो भवः '। भर्त्सना करते तो भी गनीमत, उनको छोड़ अपनी ही आधी जनसंख्या इसके मानी न समझ पाती । और यहाँ हर छोटा बड़ा निन्दा पर उतारू ! अब इतनी निन्दा अच्छी बात नहीं है, ' ज़ंग तो नहीं छेड़ाऽ..आऽऽ, दस्तक ही तो दी हैऽऽ ..ऽ, हंगामा है क्यूँ बरपाऽ.. आऽऽ ऽ , बम ही तो फोड़ी है ' इन्हीं उल्टे पुल्टे विचारों के साथ निन्दिया से बोझिल होती आँखों से यह पोस्ट लिख रहा हूँ कि बाहर के सन्नाटे को भंग करती आवाज़ें आने लगीं.., ' हुँआ हों हों हुँआ हुँआ..हुँआहुँआहुँआ हुँआ हुँआ होंहुँआ ' फिर सहस्त्रों हुँआ हुँआ से रात थर्राने लगी । बहुत दिनों के बाद असली सियार या फिर गीदड़ की आवाज़ सुनी है । शायद वह भी निन्दा कर रहे हैं, या मुझे ललकार रहे हैं, ललकारेंगे क्या भला ? इनकी तो गीदड़भभकी ही सुहाती है । रात के सन्नाटे में या समझो इस समय पूरे देश में पसरे सन्नाटे में यह इनका समवेत क्रंदन है । कहीं मुझे तो नहीं न्योत रहे हैं कि भाई बिरादर तुमने तो निन्दा की ही नहीं सो ' आओ सखे जरा निन्दिया लें ' । उन उजड़े सुहागों और घायलों के तीमारदारों को छोड़ सभी सो चुके हैं । मैं भी जा रहा हूँ लंबी तानने, तुम धिक्कारते रहो या निन्दियाते रहो, नो वन केयर्स यू ब्लडी इंडियन गीदड़्स ! आप सब को भी नाचीज़ की शुभ जैसी तैसी रात्रि !























2 की सुगबुगाहट:
अब उठ भी जाओ जी।
इन संवेदनशील विषयों पर इतनी सहजता-वाकई, इनकी आवृति देख लगता है, यही सही है या ऐसा ही होगा. चलो, अनूप जी की बात मानो, जागो और देखो!!! ऐसे वक्त सोना ठीक नहीं. कुछ तो करना होगा. हमेशा से सो ही तो रहे हैं हम सब!
जाग जाओ.
आप भी कुछ तो कहेंगे ही...
आपकी सहृदयता का आभार
मेरी पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का ख़ैरम कदम
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥
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