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<?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/rss2enclosuresfull.xsl" type="text/xsl" media="screen"?><?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css" type="text/css" media="screen"?><rss xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><title>सुबीर संवाद सेवा</title><link>http://subeerin.blogspot.com/</link><language>en</language><managingEditor>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</managingEditor><lastBuildDate>Sat, 26 Jul 2008 12:34:09 -0500</lastBuildDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">157</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><thespringbox:skin xmlns:thespringbox="http://www.thespringbox.com/dtds/thespringbox-1.0.dtd">http://feeds.feedburner.com/subeerin?format=skin</thespringbox:skin><description></description><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle></itunes:subtitle><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/subeerin" type="application/rss+xml" /><feedburner:emailServiceId>1037247</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://www.feedburner.com</feedburner:feedburnerHostname><item><title>माड़साब  भी कई दिनों के बाद लौट रहे हैं और अभिनव भी । अभिनव ने एक ग़ज़ल को पटल पर रखा है देखें कि क्‍या है वो</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/346336685/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Fri, 25 Jul 2008 23:41:01 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-3721940141667752910</guid><description>&lt;p&gt;ग़ज़ल की कक्षाएं कुछ दिनों से बंद सी हैं और माड़साब अगर शुरू करना भी चाहें तो मध्‍य प्रदेश की सर‍कार ने उसपे रोक लगा दी है । घबराइये नहीं दरअस्‍ल में ये रोक बिजली की कटौती के कारण लगी है । हमारे यहां पे आजकल बिजली जाती नहीं है आती है । हम ये नहीं कह पाते कि बिजली गई हम ये कहते हैं कि आ गई क्‍योंकि । जाती ज्‍यादा है । खैर अभिनव की ग़ज़ल की तखतीई करें और बताएं कि क्‍या हाल हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;सूचना आई फटा है आर्याव्रत में बम, &lt;br&gt;मुट्ठियाँ भींचे हुए बस देखते हैं हम, &lt;/p&gt; &lt;p&gt;नखलऊ, जैपूर, बंगलूरु, हईद्राबाद, &lt;/p&gt; &lt;p&gt;मुंबई, काशी, नै दिल्ली दम दमा दमदम,&lt;br&gt;बात ये पहुँची जब अपने हुक्मरानों तक,&lt;br&gt;हंस के बोले ग्लास में डालो ज़रा सी रम,&lt;br&gt;अब नियमित रूप से मौसम ख़बर के बाद,&lt;br&gt;बम की खबरें आ रही हैं देख लो प्रियतम,&lt;br&gt;आदमीयत हो रही है आदमी में कम,&lt;br&gt;पढ़ के लिख के बन गए हैं पूरे बेशरअम.&lt;br&gt;फर्क पड़ता ही नहीं कोई किसी को अब,&lt;br&gt;दुःख रहा फिर दिल हमारा आँख है क्यों नम,&lt;br&gt;हिंदू मुस्लिम लड़ मरें तो कौन खुश होगा,&lt;br&gt;सोच कर देखो मेरे भाई मेरे हमदम.&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/346336685" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/07/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>दिन जा रहे हैं के रातों के साये, अपनी सलीबें आप ही उठाए । आज सुनिये पंचम दा और गुलजार जी की अद्भुत जुगलबंदी का ये गीत</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/313492048/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 16 Jun 2008 22:16:42 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-1118155757315804525</guid><description>&lt;p&gt;पिछले गीत के बारे में मैंने कहा था कि ये गीत हवा के हल्‍के झौंकों का गीत है तो आज सुनिये एक ऐसा गीत जिसमें कि रातों के सन्‍नाटे भांय भांय करते हुए सुनाई देते हैं । वैसे एक बात तो है कि जब जब भी पंचम दा और गुलजार साहब का मेल हुआ तब तब ही कुछ ईश्‍वरीय रचनाएं हमें सुनने को मिली हैं । उस पर भी आंधी के गीत तो ऐसे हैं कि जिन पर कोई भी टिप्‍पणी ही नहीं की जा सकती है । कई सारी फिल्‍में हैं जिनमें पंचम दा और गुलजार साहब ने मिलकर प्रयोग किये हैं । मैं अपनी कहूं तो मुझे तो इसमें एक नाम और जोड़ने की इच्‍छा होती है । ये बिल्‍कुल मेरा ही व्‍यक्तिगत नजरिया है ( आजकल ये कहना जरूरी हो गया है ) और वो ये कि जब इस जुगलबंदी में लता जी की आवाज भी शामिल हो जाती है तो त्रिवेणी का ये संगम कुछ आकाशीय रच देता है । हालंकि बाद में पंचम दा ने आशा जी से ज्‍यादा गाने गवाए और लता जी के साथ कम ही काम किया । मगर फिर भी लता जी और पंचम दा के गीत सुनने वाले को दूसरी दुनिया की सैर करवा देते हैं । आज एक ऐसा ही मनपसंद गीत मैंने छांटा है जो उसी त्रिवेणी का है जिसमें लताजी हैं, गुलजार साहब हैं और आरडी बर्मन साहब (पंचम दा) भी हैं ।तीनों ने मिलकर एक अद्भुत गीत रचा है । गीत ज्‍यादा मकबूल नहीं हो पाया था । मगर मुझे इसके शब्‍द बहुत पसंद हैं । गीत को पुराने रिकार्ड प्‍लेयर से लिया गया है इसलिये एक दो जगह पर सुई उचक गई है । जो लोग रिकार्ड प्‍लेयर के शौकीन हैं उनको इसमें रिकार्ड प्‍लेयर की सुई के चलने की नास्‍टेल्जिया भी सुनाईदेगी । गीत 1974 में आई फिल्‍म दूसरी सीता का है आवाज है लता मंगेशकर जी की, गीत गुलजार साहब का और धुन आर डी बर्मन जी की सुनिये और आनंद लीजिये &lt;/p&gt; &lt;table cellspacing="0" cellpadding="0" bgcolor="#000000" unselectable="on"&gt; &lt;tbody&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt;&lt;embed pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" src="http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" width="328" height="94" type="application/x-shockwave-flash" flashvars="theTheme=blue&amp;amp;autoPlay=no&amp;amp;theFile=http://www.esnips.com//nsdoc/bdbf6d22-7272-4e9a-aead-660835881a6a&amp;amp;theName=din ja rahe-Lata Mangeshkar&amp;amp;thePlayerURL=http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/mp3WidgetPlayer.swf" bgcolor="#000" quality="high"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt; &lt;table style="padding-left: 2px; font-weight: bold; font-size: 10px; color: #ffffff; font-family: verdana, arial, helvetica, sans-serif; text-decoration: none" cellpadding="2" unselectable="on"&gt; &lt;tbody&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt;&lt;a style="color: #ffffff; text-decoration: none" href="http://www.esnips.com/CreateWidgetAction.ns?type=0&amp;amp;objectid=bdbf6d22-7272-4e9a-aead-660835881a6a"&gt;Get this widget &lt;/a&gt;&lt;/td&gt; &lt;td style="font-weight: normal; font-size: 7px"&gt;|&lt;/td&gt; &lt;td align="middle"&gt;&lt;a style="color: #ffffff; text-decoration: none" href="http://www.esnips.com/doc/bdbf6d22-7272-4e9a-aead-660835881a6a/din-ja-rahe-Lata-Mangeshkar/?widget=flash_player_esnips_blue" align="center"&gt;Track details &lt;/a&gt;&lt;/td&gt; &lt;td style="font-weight: normal; font-size: 7px"&gt;|&lt;/td&gt; &lt;td&gt;&lt;a style="color: #ff6600; text-decoration: none" href="http://www.esnips.com//adserver/?action=visit&amp;amp;cid=player_dna&amp;amp;url=/socialdna" align="center"&gt;eSnips Social DNA &lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/313492048" height="1" width="1"/&gt;</description><media:content url="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~5/304315678/esnips_player.swf" fileSize="15815" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:subtitle> पिछले गीत के बारे में मैंने कहा था कि ये गीत हवा के हल्‍के झौंकों का गीत है तो आज सुनिये एक ऐसा गीत जिसमें कि रातों के सन्‍नाटे भांय भांय करते हुए सुनाई देते हैं । वैसे एक बात तो है कि जब जब भी पंचम दा और गुलजार साहब का मेल हुआ तब तब ही कुछ ईश्‍वरीय रचना</itunes:subtitle><itunes:author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</itunes:author><itunes:summary> पिछले गीत के बारे में मैंने कहा था कि ये गीत हवा के हल्‍के झौंकों का गीत है तो आज सुनिये एक ऐसा गीत जिसमें कि रातों के सन्‍नाटे भांय भांय करते हुए सुनाई देते हैं । वैसे एक बात तो है कि जब जब भी पंचम दा और गुलजार साहब का मेल हुआ तब तब ही कुछ ईश्‍वरीय रचनाएं हमें सुनने को मिली हैं । उस पर भी आंधी के गीत तो ऐसे हैं कि जिन पर कोई भी टिप्‍पणी ही नहीं की जा सकती है । कई सारी फिल्‍में हैं जिनमें पंचम दा और गुलजार साहब ने मिलकर प्रयोग किये हैं । मैं अपनी कहूं तो मुझे तो इसमें एक नाम और जोड़ने की इच्‍छा होती है । ये बिल्‍कुल मेरा ही व्‍यक्तिगत नजरिया है ( आजकल ये कहना जरूरी हो गया है ) और वो ये कि जब इस जुगलबंदी में लता जी की आवाज भी शामिल हो जाती है तो त्रिवेणी का ये संगम कुछ आकाशीय रच देता है । हालंकि बाद में पंचम दा ने आशा जी से ज्‍यादा गाने गवाए और लता जी के साथ कम ही काम किया । मगर फिर भी लता जी और पंचम दा के गीत सुनने वाले को दूसरी दुनिया की सैर करवा देते हैं । आज एक ऐसा ही मनपसंद गीत मैंने छांटा है जो उसी त्रिवेणी का है जिसमें लताजी हैं, गुलजार साहब हैं और आरडी बर्मन साहब (पंचम दा) भी हैं ।तीनों ने मिलकर एक अद्भुत गीत रचा है । गीत ज्‍यादा मकबूल नहीं हो पाया था । मगर मुझे इसके शब्‍द बहुत पसंद हैं । गीत को पुराने रिकार्ड प्‍लेयर से लिया गया है इसलिये एक दो जगह पर सुई उचक गई है । जो लोग रिकार्ड प्‍लेयर के शौकीन हैं उनको इसमें रिकार्ड प्‍लेयर की सुई के चलने की नास्‍टेल्जिया भी सुनाईदेगी । गीत 1974 में आई फिल्‍म दूसरी सीता का है आवाज है लता मंगेशकर जी की, गीत गुलजार साहब का और धुन आर डी बर्मन जी की सुनिये और आनंद लीजिये Get this widget | Track details | eSnips Social DNA </itunes:summary><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/06/blog-post_16.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~5/304315678/esnips_player.swf" length="15815" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>आइये आज ये गीत सुनें जिसमें है हवा के हल्‍के हल्‍के झौंके और साथ में है पहली बारिश में उठने वाली मिट्टी की गंध</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/309366672/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 16 Jun 2008 22:01:59 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-2870697877028051738</guid><description>&lt;p&gt;संगीत अगर जीवन में नहीं हो तो जीवन कैसा होगा उसकी मैं तो कल्‍पना भी नहीं कर सकता और उस पर भी अगर लता जी की आवाज न हो तो संगीत कैसा होगा उसकी भी कल्‍पना नहीं की जा सकती है । इस मामले में मैं थोड़ा पक्षपात तो करूंगा कि हर सप्‍ताह में एक गीत जो आपको सुनाऊंगा उसमें लता जी के ही गाने होंगें । दरअस्‍ल में मेरे लिये संगीत शुरू ही होता है लता जी के साथ । उसमें भी मुझे लता जी के 1970 से लेकर 1990 तक के गीत बहुत पसंद हैं । मेरे पसंदीदा संगीतकारों में सबसे ऊपर &lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;मदन मोहन जी हैं, ख़य्याम साहब हैं, बर्मन दा हैं, जयदेव जी हैं, राजेश रोशन हैं, सलिल चौधरी&lt;/font&gt; &lt;/strong&gt;जी हैं । इन सभी संगीतकारों के गीत मुझे बहुत भाते हैं । &lt;strong&gt;मदन मोहन जी&lt;/strong&gt; मुझे पसंद हैं क्‍योंकि उन्‍होंने ग़ज़लों को फिल्‍मों में खूबसूरती के साथ उपयोग किया है । तो &lt;strong&gt;ख़य्याम साहब&lt;/strong&gt; के संगीत में एक सुगंध होती है, सुगंध लोबान की जो तन मन में समा जाती है और आप ठगे से रह जाते हैं जब गीत ख़त्‍म होता है । &lt;strong&gt;राजेश रोशन जी&lt;/strong&gt; मुझे पसंद हैं उनके प्रयोगों के कारण । मुझे ऐसा लगता है कि वे बड़े ही होनहार संगीतकार हैं । विशेषकर जूली का गीत &lt;strong&gt;ये रातें नई पुरानी &lt;/strong&gt;तो ..... उफ कुछ नहीं कह सकता उस गीत के बारे में । &lt;strong&gt;जयदेव जी&lt;/strong&gt; के बारे में क्‍या कहूं उनके बारे में कहना तो शायद सूरज को दीपक दिखाना है । &lt;strong&gt;तू चंदा मैं चांदनी&lt;/strong&gt; जैसा गीत रच कर उन्‍होंने शायद एक ऐसा काम कर दिया है जिसके पार जाना संभवत: अब नहीं हो सकता । क्‍या आपने सुना मुझे जीने दो का गीत &lt;strong&gt;रात भी है कुछ भीगी भीगी &lt;/strong&gt;। और &lt;strong&gt;सलिल दा&lt;/strong&gt; वो तो जादू करते हैं संगीत कहां रचते हैं । आखिर में बात &lt;strong&gt;बर्मन दा&lt;/strong&gt; की जिनका गीत मैंने पिछली बार आपको सुनाया था बर्मन दा को मैं पसंद इसलिये करता हूं कि उनकी फिल्‍म का कोई भी गीत कमजोर नहीं होता है, और जिस उम्र में उन्‍होंने &lt;strong&gt;रूप तेरा मस्‍ताना प्‍यार मेरा दीवाना &lt;/strong&gt;गीत रचा है वो तो वे ही कर सकते थे । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आज मैं सुना रहा हूं राजेश रोशन जी का एक गीत ( मैं यद‍ि ग़लत हो जाऊं तो अनुरोध है कि सुधार दें दरअसल में संगीत सुनने का शौक है पर संगीतकारों के नाम याद रखने में कच्‍चा हूं ) ये गीत कहीं स्‍मृतियों में ऐसा धंस गया है मानो बचपन से जवानी की तरफ जाते किसी किशोर के कलेजे में काजल से रची दो आंखें धंस गईं हों ।&amp;nbsp; मानो स्‍कूल जाती हुई किसी षोडशी बाला के&amp;nbsp;ह्रदय में साइकल पर जाते किसी किशोर की मुस्‍कुराहट धंस गई हो और दोनों याद कर&amp;nbsp;रहे हैं उन आंखों को और उस मुस्‍कुराहट को अब जीवन की सांध्‍य बेला में । गीत दरअसल में हमारे अवचेतन में होते हैं और जुड़े होते कुछ घटनाओं के साथ कि जब हम वहां मिले थे तब ये गाना पास की पान की दुकान पर रेडियो पर बज रहा था । हम दरअसल में पुराने गीतों को सुन कर अपने अतीत के गलियारे में टहलते हैं । ढूंढते हैं उन निशानों को जो मिट चुके हैं समय की लहर जिन पर पानी फेरती हुई कब की जा चुकी है । ढूंढते हैं किसी दो चोटियों वाली घबराई सी लड़की को कि शायद वो अब भी सहमी सी गुजरती होगी यहां से । गीत हमारे जीवन का हिस्‍सा होते हैं और इसीलिये वो हमारे साथ ही चलते हैं । इस गीत के साथ भी मेरी कुछ कोमल भावनाएं जुड़ी हैं &amp;nbsp;&amp;nbsp;फिल्‍म है &lt;strong&gt;स्वामी&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जिसमें &lt;strong&gt;का करूं सजनी&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;और&lt;strong&gt;&amp;nbsp; यादों में वो&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; जैसे गीत भी हैं । पर मेरा फेवरेट तो ये ही है&lt;strong&gt;&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;लता जी का&amp;nbsp;गाया हुआ &lt;strong&gt;पल भर में ये क्‍या हो गया वो मैं गई वो..... । &lt;/strong&gt;गाने के बारे में क्‍या कहूं बस सुनें और आनंद लें&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/309366672" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/06/blog-post_10.html</feedburner:origLink></item><item><title>ग़जल की पाठशाला एक नाजुक मसले पर उलझी है, उड़नतश्‍तरी ता करके भाग चुकी है अभिनव ने हिम्‍मत दिखाई है तो नीरज जी जूड़ी फैंक चुके हैं , अल्‍लाह जाने क्‍या होगा आगे</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/305012506/blog-post_04.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Wed, 04 Jun 2008 22:29:33 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-1175107663358311850</guid><description>&lt;p&gt;अच्‍छा होमवर्क हमको किसी भी उम्र में मिले उसको देख कर ही हमारे अंदर कुछ कुछ होने लग जाता है । होमवर्क आज भी हमें वैसा ही लगता है जैसे कि सौ किलो का बोझ हमारे सिर पर लाद दिया गया हो। परसों के होमवर्क को लेकर भी ये ही हुआ है कई सारे विद्यार्थियों ने तो कक्षा में झांकने की भी हिम्‍मत नहीं दिखाई ताकि कल को कह सकें कि माड़साब हम तो उस रोज आए भी नहीं थे जिस दिन आपने होमवर्क दिया था । उड़नतश्‍तरी ने होमवर्क तो ले लिया है पर उसे पूरा करके वापस भी किया जाता है ये शायद याद नहीं रहा है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;सबसे पहले बात की जाए अभिनव की&amp;nbsp; जिसने कि कुछ करने&amp;nbsp; का प्रयास किया है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/09575494150015396975"&gt;अभिनव&lt;/a&gt;&amp;nbsp;सर, होम वर्क: संभावित बाहर है, &lt;br&gt;मफऊलु-मुफाईलु-मुफाईलु-फऊलुन 221-1221-1221-122&lt;br&gt;बहर है :- हजज़ मुसमन अखरब मकफूफ महजूफ&lt;br&gt;इस दौर - में इंसान - क्युं बेहतर न - हीं मिलते&lt;br&gt;रेह्ज़न मि - लेंगे राह - में रहबर न - हीं मिलते  &lt;p&gt;अभिनव ने काफी हद तक जाने का प्रयास किया है और 90 प्रतिशत तक प्रयास सटीक भी रहा है लेकिन फिर भी कुछ कमियां जो रहा गईं हैं वो उच्‍चारण के कारण हैं । जैसे  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस 2, दौ 2, र 1, 221 ( सही निकाला है ) मफऊलु&lt;/strong&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;में 1, ( में गिर कर म रह गया है ), इन्‍ 2, सा 2, न 1&amp;nbsp;,&amp;nbsp; 1221 ( सही निकाला है ) मुफाईलु&lt;/strong&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;क्‍युं ( बाज लोग&amp;nbsp;क्‍यों को इतना गिरा के पढ़ते हैं कि वो लघु में गिना जाए लेकिन उस्‍तादों के हिसाब से वो ठीक नहीं है, फिर भी उसको लेकर विद्वानों की राय में एकमत नहीं है ) 1, बेह 2, तर 2, न 1,&amp;nbsp; 1221 मुफाईलु ( फिर भी क्‍युं के स्‍थान पर किसी अन्‍य शब्‍द का प्रयोग कर ग़ज़ल को दोषमुक्‍त &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;किया जा सकता है ) &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;हीं 1 ( यहां पर हीं गिर गया है और लघु में गिना जाएगा ) मिल 2, ते 2, 122 ( सही निकाला है ) फऊलुन &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;रह 2, जन 2,&amp;nbsp; मि 221&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;( सही निकाला है ) मफऊलु &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;अब जो &lt;strong&gt;क्‍युं&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; है उसको लेकर हम कभी परेशानी में पड़ सकते हैं । इसलिये ऐसा ठूंठ ही मत पालो जिस पर कल कहीं उल्‍लू बैठ जाए । तो हमें कुछ ऐसा करना होगा ये केवल उदाहरण है कि ऐसा कुछ किया जा सकता है ।  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस दौर में इन्‍सां कहीं बेहतर नहीं मिलते &lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस 2, दौ 2,&amp;nbsp;र 1&amp;nbsp; 221&lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;में 1 (गिरकर), इन्‍ 2, सां 2, क 1, 1221&lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;हिं 1 (गिरकर), बेह 2, तर 2, न 1, 1221&lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;हिं 1 (गिरकर) , मिल 2 , ते 2 , 122&lt;/strong&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब आइये दूसरे मिसरे की बात करें जहां पर कुछ संकट पैदा हो रहा है । हालंकि संकट केवल उच्‍चारण का है और कुछ नहीं मगर ये एक ऐसी समस्‍या है जो ठीक कर ली जानी चाहिये । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;रेहजन मिलेंगे राह में रहबर नहीं मिलते &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;रह 2, जन 2, मि 1, 221 मफऊलु ठीक है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;लेंगे &lt;/strong&gt;ये समस्‍या की जगह आ गई है अब इसमें समस्‍या क्‍या है कि अगर आप पढ़ते समय &lt;strong&gt;लें&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को खींच कर पढ़ेंगें तों वो दीर्घ हो जाएगा और गजल बहर से बाहर हो जाएगी । अगर आप &lt;strong&gt;लें&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को गिरा कर &lt;strong&gt;गे&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को खींचते हैं तो समस्‍या नहीं आएगी पर दिक्‍कत क्‍या है कि आप पढ़ते समय &lt;strong&gt;लें &lt;/strong&gt;को ही खींचेंगें क्‍योंकि वही ठीक ध्‍वनि आपको लगेंगी । यदि आप &lt;strong&gt;लें&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को खींचते हैं तो वो बहर दूसरी हो जाएगी । अगर आप लें को खींचते हैं तो जाहिर सी बात है कि आप &lt;strong&gt;गे&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; को गिराकर ही बोलेंगे और उस स्थिति में दूसरा रुक्‍न हो जाएगा 2121 फाएलातु जो कि बहरे मुजारे का रुक्‍न है । अर्थात आपका मिसरा बहर से बाहर हो जाएगा । अब इससे बचना है तो सीधी सी बात है कि आप &lt;strong&gt;मिलेंगे&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; शब्‍द को ही बदल दें ना रहेगा बांस और ना होगी पींपीं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;एक उदाहरण दे रहा हूं हालंकि ये केवल उदाहरण है इसे मैं मात्रा की दृष्टि से लिख रहा हूं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;रहजन ही यहां मिलते हैं रहबर नहीं मिलते &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;रह 2, जन 2, हि 1 ( गिरकर) 221&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;य 1, हां 2, मिल 2, ते 1( गिरकर) 1221 &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;हें 1 (गिरकर), रह 2, बर 2, न 1, 1221&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;हिं 1 (गिरकर) मिल 2, ते 2, 122&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज हमने केवल मतले का ही सुधारा है अगली कक्षा में हम आगे के शेरों को भी देखेंगें । हो सकता है तब तक उड़न तश्‍तरी पूरी ग़ज़ल को ही सुधार के दे दे कि लो माड़साब येल्‍लो पूरी की पूरी । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/305012506" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/06/blog-post_04.html</feedburner:origLink></item><item><title>ममता जी को देखकर मुझे भी गाना सुनाने की इच्‍छा हो रही है आज सुनिये मेरी पसंद का फिल्‍म उस पार का लता जी का गाना तुमने पिया दिया सब कुछ मोहे</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/304315677/blog-post_03.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Wed, 04 Jun 2008 01:31:39 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-1298699599919427403</guid><description>&lt;p&gt;ममता जी ने अपनी पसंद का गीत सुना दिया है और उनके कारण मुझे भी इच्‍छा हो रही है कि मैं भी अब अपनी पसंद के गीत सुनाना प्रारंभ करूं । घर में सबसे पहले रिकार्ड प्‍लेयर हुआ करता था जिसमें शायद नौ या दस साल की उम्र में संगीत का शौक लगा । फिर कैसेट आया तो सोलह बरस की उम्र में शौक दीवानगी बन गया और आज लगभग 800 कैसेटों का एक विशाल संग्रह है । फिर आया कम्‍प्‍यूटर तो एमपी3 का युग आ गया हालंकि मुझे आज भी कैसेट पर ही गाना सुनना पसंद आता है । संडे को कमरे में खिड़की खुली हो बाहर हल्‍की बारिश का मौसम हो गा हो और लता जी की आवाज कैसट में गूंज रही हो ''ओ सजना बरखा बहार आई '' तो उससे ज्‍यादा और क्‍या चाहिये । खैर आज तो आपको एक गीत सुनाने जा रहा हूं जो फिल्‍म्‍ उस पार का है फिलम में शायद मौसमी चटर्जी है क्‍योंकि गाना शुरू होने के पहले जो साउंड ट्रेक है वो मौसमी चटर्जी की ही आवाज है । बाकी गाने के संगीतकार और गीतकार की जानकारी मुझे नहीं है यूनुस भाई शायद बता सकें गाना सुनने के लिये नीचे लिंक है पहले आधा मिनट के डायलाग हैं और फिर गीत शुरू होता है । गाना आपने शायाद कम सुना हो पर मुझे बहुत पसंद है सुनें और बताएं कि कैसा लगा । &lt;/p&gt; &lt;table cellspacing="0" cellpadding="0" bgcolor="#000000" unselectable="on"&gt; &lt;tbody&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt;&lt;embed pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" src="http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" width="328" height="94" type="application/x-shockwave-flash" flashvars="theTheme=blue&amp;amp;autoPlay=no&amp;amp;theFile=http://www.esnips.com//nsdoc/eb1b4f37-fbea-4b68-a034-cdf4368be8e0&amp;amp;theName=TUMNE PIYA  US PAAR&amp;amp;thePlayerURL=http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/mp3WidgetPlayer.swf" bgcolor="#000" quality="high"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt; &lt;table style="padding-left: 2px; font-weight: bold; font-size: 10px; color: #ffffff; font-family: verdana, arial, helvetica, sans-serif; text-decoration: none" cellpadding="2" unselectable="on"&gt; &lt;tbody&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt;&lt;a style="color: #ffffff; text-decoration: none" href="http://www.esnips.com/CreateWidgetAction.ns?type=0&amp;amp;objectid=eb1b4f37-fbea-4b68-a034-cdf4368be8e0"&gt;Get this widget &lt;/a&gt;&lt;/td&gt; &lt;td style="font-weight: normal; font-size: 7px"&gt;|&lt;/td&gt; &lt;td align="middle"&gt;&lt;a style="color: #ffffff; text-decoration: none" href="http://www.esnips.com/doc/eb1b4f37-fbea-4b68-a034-cdf4368be8e0/TUMNE-PIYA--US-PAAR/?widget=flash_player_esnips_blue" align="center"&gt;Track details &lt;/a&gt;&lt;/td&gt; &lt;td style="font-weight: normal; font-size: 7px"&gt;|&lt;/td&gt; &lt;td&gt;&lt;a style="color: #ff6600; text-decoration: none" href="http://www.esnips.com//adserver/?action=visit&amp;amp;cid=player_dna&amp;amp;url=/socialdna" align="center"&gt;eSnips Social DNA &lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/304315677" height="1" width="1"/&gt;</description><media:content url="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~5/304315678/esnips_player.swf" fileSize="15481" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:subtitle> ममता जी ने अपनी पसंद का गीत सुना दिया है और उनके कारण मुझे भी इच्‍छा हो रही है कि मैं भी अब अपनी पसंद के गीत सुनाना प्रारंभ करूं । घर में सबसे पहले रिकार्ड प्‍लेयर हुआ करता था जिसमें शायद नौ या दस साल की उम्र में संगीत का शौक लगा । फिर कैसेट आया तो सोलह </itunes:subtitle><itunes:author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</itunes:author><itunes:summary> ममता जी ने अपनी पसंद का गीत सुना दिया है और उनके कारण मुझे भी इच्‍छा हो रही है कि मैं भी अब अपनी पसंद के गीत सुनाना प्रारंभ करूं । घर में सबसे पहले रिकार्ड प्‍लेयर हुआ करता था जिसमें शायद नौ या दस साल की उम्र में संगीत का शौक लगा । फिर कैसेट आया तो सोलह बरस की उम्र में शौक दीवानगी बन गया और आज लगभग 800 कैसेटों का एक विशाल संग्रह है । फिर आया कम्‍प्‍यूटर तो एमपी3 का युग आ गया हालंकि मुझे आज भी कैसेट पर ही गाना सुनना पसंद आता है । संडे को कमरे में खिड़की खुली हो बाहर हल्‍की बारिश का मौसम हो गा हो और लता जी की आवाज कैसट में गूंज रही हो ''ओ सजना बरखा बहार आई '' तो उससे ज्‍यादा और क्‍या चाहिये । खैर आज तो आपको एक गीत सुनाने जा रहा हूं जो फिल्‍म्‍ उस पार का है फिलम में शायद मौसमी चटर्जी है क्‍योंकि गाना शुरू होने के पहले जो साउंड ट्रेक है वो मौसमी चटर्जी की ही आवाज है । बाकी गाने के संगीतकार और गीतकार की जानकारी मुझे नहीं है यूनुस भाई शायद बता सकें गाना सुनने के लिये नीचे लिंक है पहले आधा मिनट के डायलाग हैं और फिर गीत शुरू होता है । गाना आपने शायाद कम सुना हो पर मुझे बहुत पसंद है सुनें और बताएं कि कैसा लगा । Get this widget | Track details | eSnips Social DNA </itunes:summary><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/06/blog-post_03.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~5/304315678/esnips_player.swf" length="15481" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग, सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है । और बहर की एक उलझन जिसने रविवार को उलझा दिया और ग़ज़ल की कक्षाओं की शुरूआत  ।</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/302688472/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Sun, 01 Jun 2008 22:12:56 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-7596865518199358357</guid><description>&lt;p&gt;बहर को लेकर जो बात कही जाती है वो ये है कि आप यदि किसी ग़ज़ल पर काम कर रहे है और उसकी बहर निकाल रहे हैं तो सावधानी से तकतीई करके ही निकाले क्‍योंकि बहर वो चीज़ है जो इतने छलावे देती है कि बस । आज कक्षाओं का प्रारंभ मैं एक ऐसी ही समस्‍या के साथ करना चाहता हूं । जब नीरज जी ने मुझे ये ग़ज़ल भेजी तो मैंने उसे वहीं कम्‍प्‍यूटर पर ही तकतीई कर के वापस भेज दी । तकतीई करने का उसूल है कि काग़ज पर उतार कर ध्‍यान पूर्वक तकतीई करना है । पर कहते हैं ना कि आदमी को घमंड आ जाए तो जिंदगी उसका घमंड तोड़ने में सबसे पहले लग जाती है । तो माड़साब को भी शायद घमंड आ गया था कि अब हमें कागज पर उतारने की ज़रूरत ही क्‍या है हम तो कम्‍प्‍यूटर पर ही वहीं के वहीं काम कर सकते हैं । और इसी ग़लत फहमी में चूक हो गई । नीरज जी ने जो ग़ज़ल भेजी थी वो ये थी &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;इस दौर में इंसान क्यों बेहतर नहीं मिलते &lt;br&gt;रेह्ज़न मिलेंगे राह में रहबर नहीं मिलते &lt;br&gt;घबरा गये हो देख कर ये घाव क्यों यारों &lt;br&gt;सच बोलने पर किस जगह पत्थर नहीं मिलते&lt;br&gt;सहमें हुए हैं देखिये चारों तरफ़ बच्चे&lt;br&gt;किलकारियाँ गूजें जहाँ वो घर नहीं मिलते&lt;br&gt;गिनती बढ़ाने के लिए लाखों मिलेंगे पर&lt;br&gt;खातिर अना के जो कटें वो सर नहीं मिलते&lt;br&gt;अंदाज़ ही तुमको नहीं तकलीफ का जिनके&lt;br&gt;है जोश तो दिल में मगर अवसर नहीं मिलते&lt;br&gt;माँ की दुआओं में छिपे बैठे मिलें मुझे&lt;br&gt;दैरो हरम में रब कभी जा कर नहीं मिलते&lt;br&gt;घर से चलो तो याद ये दिल में रहे नीरज&lt;br&gt;दिलकश हमेशा राह में मंज़र नहीं मिलते&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;p&gt;अब इसको माड़साब ने क्‍या किया कि वहीं के वहीं तकतीई किया और वापस भेज दिया कि जल्‍दी का काम हो जाए मगर कहावत तो हैं ना कि जल्‍दी का काम शैतान का काम होता है । माड़साब ने एक बहर निकाल के दे दी उस ही बहर पर काम करते हुए नीरज जी ने जब कुछ शेरों में संशोधन करके भेजा तो माड़साब का भेजा ही घूम गया क्‍योंकि सौलह सौ के हजार हो चुके थे और हुए माड़साब की ही ग़लती से थे नीरज जी की कोई ग़लती ही नहीं थी । उन्‍होंने तो उसी बहर पे काम किया जो माड़साब ने निकाल के दी थी । माड़साब को समझ में आ गया कि सरस्‍वती ने सपाटा मारा है कि बेटा इतना मत उड़ । माड़साब ने ग़ज़ल को लेकर पूरे रविवार को काम किया और वो भी इसलिये कि एक ग़लती को सुधारना तो था ही और फिर गल़ती को मानना ही था ।  &lt;p&gt;दरअसल में ये एक बहुत ही ज्‍यादा गाई जाने वाली बहर है जिसको आप मुशायरों में अमूमन सुनते ही होंगें । जो गाई जाने वाली चंद बहरें हैं उनमें इसकी लोकप्रियता काफी ज्‍यादा है । आज की पोस्‍ट के शीर्षक में भी ये ही लगी है जो दाग साहब का एक मशहूर शेर है । अब उसमें ये मत उलझियेगा कि शेर के मिसरा ऊला में तो आखिर में &lt;strong&gt;दाग&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; आ रहा है और सानी में&amp;nbsp;&lt;strong&gt;की  है । &lt;/strong&gt;दरअसल में ये भी एक प्रकार की सुविधा है जो ग़ज़ल लिखने वालों ने बनाई है जिसमें &lt;strong&gt;दाग, आम,हाय &lt;/strong&gt;जैसे शब्‍द यदि आखिर में आ रहे हैं तो कुछ खास बहरों में इनको &lt;strong&gt;21 &lt;/strong&gt;न करके केवल &lt;strong&gt;2&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; ही माना जाता है । ये एक अलग विषय है जो हम आगे देखेंगें । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;ये दो बहरों का मामला है जो कि लगभग जुड़वीं हैं । जुड़वीं का मतलब जैसे ज़ुड़वां भई बहनों में जो बारीक सा अंतर होता है वो ही इन दोनों में है । मात्राओं का योग तो वहीं है पर मात्राओं का स्‍थान थोड़ा सा अलटी पलटी टाइप का है । उदाहरण देखें &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;1) पहला उदाहरण &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;गालिब साहब का शेर है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;कलकत्‍ते का जो जिक्र किया तूने हमनशीं &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इक तीर मेरे सीने पे मारा के हाय हाय &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;( यहां पर हाय का य गायब हो जाएगा जैसा मैंने ऊपर बताया था । )&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;वज्‍न है &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मफऊलु-फाएलातु-मुफाईलु-फाएलुन 221-2121-1221-212&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;बहर है :- मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ महजूफ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;1)&amp;nbsp;दूसरा उदाहरण &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;इकबाल भी इकबाल से आगाह नहीं है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुछ इसमें तमसखुर नहीं वल्‍लाह नहीं है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;वज्‍न है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मफऊलु-मुफाईलु-मुफाईलु-फऊलुन 221-1221-1221-122&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;बहर है :- हजज़ मुसमन अखरब मकफूफ महजूफ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;दोनों को ध्‍यान से देखें केवल दो स्‍थानों पर ही परिवर्तन आ रहा है बाकी सब समान है यहां तक कि दोनों की गाए जाते समय धुन भी एक ही होती है । रुक्‍न क्रमांक दो में पहले उदाहरण में 2121 है तो दूसरे उदाहरण में 1221 है मतलब एक मात्रा ने स्‍थान बदला है 21 से 12 हो गई है । पहला और तीसरा रुक्‍न तो समान ही है पर चौथे में फिर से एक मात्रा ने अपना स्‍थान बदला है और वो 212 से 122 हो गई है । दोनों बहरों को देखें तो दोनों में आठ दीर्घ और छ: लघु मात्राएं हैं । दोनों को आप जब गाके देखेंगें तो धुन भी एक सी ही आएगी पर बात वही है कि कागज पर लेंगें तो फर्क समझ में आ जाएगा । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;होमवर्क : पता लगाएं कि नीरज जी की ग़ज़ल दोनों में से किस पर आधारित है । और कहां कहां ऐसा हुआ है कि दूसरी बहर के शेर घुस आए हैं । कल तक अपनी कापियां जमा करवा दें । &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/302688472" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/06/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>विनम्र व्‍यक्ति के चाहने वाले तो सचमुच ही बहुत होते हैं नीरज जी ने ये सिद्ध कर दिया अगले जिन कवि की बात मैं करूंगा वे भी इतने ही विनम्र हैं । नीरज जी पर जो टिप्‍पणियां मिली है उन पर कुछ बातें आज की जाएं ।</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/300274379/blog-post_28.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Wed, 28 May 2008 22:16:46 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8115768467828558600</guid><description>&lt;p&gt;गज़ल की कक्षाएं प्रारंभ करने से पहले मैं मूड बना रहा हूं छात्र छात्राओं का कि वे गर्मी की छुट्टी का मूड त्‍याग दें और पढ़ने के मेड में आ जाएं । मेरी फेवरिट सूची में नीरज जी की बात मैं ने कल की थी उस पर काफी लोगों ने सकारात्‍मक प्रतिक्रिया दी है । नीरज जी ने सिद्ध कर दिया है कि अजातशत्रु होना आज भी असंभव नही है । देखिये कुछ टिप्‍पणियां और उन पर माड़साब का जवाब । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/18245891263227015744"&gt;बाल किशन&lt;/a&gt; कई बार आपकी क्लास मे आया पर फ़िर कड़ी पढ़ाई देखकर भाग खड़ा हुआ. फ़िर ऐसे ही इन सब के बारे मे नीरज भइया से बात हुई तो बहुत हौसला मिला. उनका कहा था कि " अच्छा लिखते रहने की कोशिश करते रहो और अच्छा लिखते रहो तो फ़िर ये व्याकरण और बहर वगेरह अपने आप ठीक हो सकती है."&lt;br&gt;ऐसे ही है हमरे नीरज भइया उर्फ़ "वड्डे वाप्पाजी" &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;बालकिशन जी पढ़ाई तो सोचने से ही कड़ी और आसान होती हे । आप आएं कक्षाएं पुन- प्रारंभ हो रहीं हैं और ये वड्डे पाप्‍पाजी तो वड्डा ही मजेदार नाम हेगा ।  &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/12391291933380719702"&gt;कंचन सिंह चौहान&lt;/a&gt; neeraj ji ke is gun ki mai bhi murid hu.n jo mujhame nahi hai  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;कंचन आप चिन्‍ता न करें कक्षाएं प्रारंभ करने से पूर्व में सभी छात्रों के बारे में एक एक पोस्‍ट लगाऊंगा और हर किसी में कुछ न कुछ गुण तो होता ही है और ये अंग्रेजी में काहे बात कर रहीं हैं ।  &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/07783169049273015154"&gt;नीरज गोस्वामी&lt;/a&gt; ग़ज़ल की कक्षाएं प्रारम्भ करने का शुक्रिया...इसका बहुत दिनों से इंतज़ार था. आप ने अपनी पहली ही क्लास में मुझे जो सम्मान दिया है उसका शायद मैं अधिकारी नहीं. मैं अपने मन की बात सीधे साधे शब्दों में कहने की कोशिश करता हूँ और आप या प्राण साहेब से प्रेरणा लेता हूँ. ये आप जैसे दक्ष लोगों की संगत का प्रताप है की मुझसे सही सही ग़ज़ल कहलवा देती है. आप से क्या छुपा है...मेरी कमजोरियों से भी आप बखूबी वाकिफ हैं..और आप ने समय समय पर मेरी ग़ज़लों को जो निखारा है उसके बारे में शब्दों में कुछ कहा नहीं जा सकता. आप ने मेरी जिस विनम्रता का जिक्र किया है दरअसल वो मेरी सच्चाई है...जो मुझे नहीं आता उसे मान ने में में मुझे कोई शर्म महसूस नहीं होती क्यों की जब तक आप अपने आप को शिष्य ही समझते रहेंगे तब तक आप सीखते रहेंगे, ऐसा मेरा मानना है. मुझे इस विधा की बदौलत आप जैसे बहुत सारे प्यारे लोगों के सम्पर्क में आने का अवसर मिला है जिसकी कभी कल्पना भी मैंने नहीं की थी. इसे मैं अपने लेखन की एकमात्र उपलब्धि मानता हूँ. आप सब का स्नेह मुझपर ऐसे ही बना रहे ये ही कामना है.&lt;br&gt;नीरज &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;नीरज जी बात सम्‍मान की नहीं हैं बात तो ये है कि इस दौर में जो कि साहित्‍य के लिये सबसे कठिन दौर है । उसमें कोई यदि कुछ कर रहा है तो उसे मानना होगा कि वो वास्‍तव में डीजे के सामने बैठ कर बांसुरी बजा रहा है और अभी भले ही डीजे के शोर में उसकी बांसुरी कोई नहीं सुन रहा हो पर हमें तो उसकी हौसला अफजाई इसलिये करनी है ताकि वो बांसुरी बजाता रहे थके नहीं । कल लोग जब शेार से थकेंगें तो डीजे को दोड़ कर वापस बांसुरी की ओर मुड़ेंगे तब तब हमें साहित्‍य को जिंदा रखना है नहीं रख पाए तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/03020723394840747195"&gt;Kavi Kulwant&lt;/a&gt; बहुत अच्छा लगा आप के ब्लाग पर आकर और नीरज झि के बारे में पढ़ कर और साथ ही आप को जानकर...और आपके गज़ल महारत देखकर ..कभी समय मिले तो आपकी नजर चाहूंगा मेरी गजल पर..ताकि मै अपने आप को सुधार सकूं... &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;ज़रूर कुलवंत जी । मैं अपने को विशेषज्ञ तो नहीं मानता लेकिन ये मानता हूं कि जितना आता है उसकेा जब तक दुसरों के साथ नहीं बांटूंगा तब तक मां सरस्‍वती मुझे और नहीं देंगीं । और नीरज जी जैसे लोग ही तो हैं जो मेरे काम को सार्थक कर रहे हैं। &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/05417015864879214280"&gt;Shiv Kumar Mishra&lt;/a&gt; आपने बिल्कुल सही कहा. विनम्रता ही है जो नीरज भैया को महान बनती है. इतनी अच्छी गजलें लगातार लिख लेना बहुत कठिन बात है. लेकिन लगता है जैसे नीरज भैया बड़ी आसानी से लिख लेते होंगे.&lt;br&gt;नीरज भैया को जानना मैं अपनी एक उपलब्धि मानता हूँ. &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;सही है शिव जी नीरज जी जैसे लोगों को हम भले ही अब विलुप्‍त श्रेणी में रखते हो कि ऐसे विनम्र लोग अब ईश्‍वर ने बनाने बंद कर दिये पर सच ये ही है अब भी ऐसे लोग हैं । और कहा ये ही जाता है कि इन लोगों के कारण ही अभी लोगों का एक दूसरे पर विश्‍वास बना हुआ है । &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/06057252073193171933"&gt;Udan Tashtari&lt;/a&gt; नीरज जी से एक कुछ देर की मुलाकात हुई बम्बई में एक कवि सम्मेलन में. बहुत बेहतरीन और उम्दा इन्सान लगे. उनकी लेखनी के तो हम शुरु से ही कायल है. व्याकरण का तो पता नहीं किन्तु भाव बहुत भाते हैं. अब तो व्याकरण पर भी आपकी मोहर लग गई है यानि मुझे भी अंदर ही अंदर व्याकरण पहचानना आता होगा , कम से कम दूसरों की गजल में. :) हा हा क्या कहना है आपका माडस्साब. कुछ उम्मीद सी बँधती दिख रही है कि शायद कभी प्रतिभा निखर आये. &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;समीर जी हम भारतीय लोगों की विशेषता है कि अचार हमें दूसरों के घर का ही पसंद आता है । आप के साथ भी ये ही है कि आप दूसरों की ग़ज़लें तो देख लेते हैं पर अपनी बिना देखे ही प्रकाशित कर देंते हैं ।  &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/09575494150015396975"&gt;अभिनव&lt;/a&gt; Yes Sir. I am in complete agreement with your observation.  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;काहे भैया अभिनव ये अंग्रेजी में काहे बतियाय रहे हो हमें अंग्रेजी फंग्रेजी नहीं ना आती है । और आप हैं कहां भाई इतरा दिन से कौनो खोज खबर ही नहीं ना ली । अभीन तो कक्षाएं शुरु होबे का रहीस उका पेहरे हम अपने फेवरिट की सूची बनाय रहे तो आपका भी लम्‍बर आवे का है फिकिर नाहीं ना करो । और हाजिरी तो कक्षा में लगाओ भैया गर्मी की छुट्टी है तो क्‍या । &lt;p&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/00859697755955147456"&gt;महावीर&lt;/a&gt;पंकज भाई, इस सर्व-प्रिय ब्लॉग पर नीरज जी के विषय में आप की क़लम से कुछ अनमोल शब्दों को पढ़ कर बहुत ख़ुशी हुई। मेरा नीरज जी से कभी&lt;br&gt;साक्षात या फ़ोन द्वारा तो बात नहीं हुई लेकिन समय समय पर ई-मेल द्वारा संपर्क होता रहा है - ग़ज़ब का इन्सान है। आप कुछ ही कह लें मगर उनकी विनम्रता की थाह को आंकना आसान नहीं है। दूसरे, चाहे कितनी ही अच्छी ग़ज़ल लिखी हो, उसमें कमी ना रहे और परिपूर्णता लाने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। पंकज जी जैसे उस्ताद और दीगर उस्तादों से राब्ता कायम रखते हैं। अगर देखें तो दिन ब दिन उनकी ग़ज़ल में जो निखार आ रहा है,इसमें शक की गुंजाईश ना के बराबर है।&lt;br&gt;पंकज जी ने ऊपर उनके 'रमल' और 'रजज़' की ग़ज़लों के मक़तों का ज़िक्र किया है, वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ हैं।&lt;br&gt;हां, पंकज जी यह पाठशाला का कार्य-भार जो आपने उठाया है, यह हिन्दी भाषियों के लिए नायाब है। ख़ास कर बह'र सिखाने पर आप को उबूर है।&lt;br&gt;उर्दू में तो ख़ास कर बहर और दीगर बारीकियों के बारे में कुछ अच्छे साईट हैं, लेकिन हिन्दी में 'महरिष' जी और 'प्राण शर्मा' जीके अलावा कुछ नज़र नहीं आया। लेकिन 'बहर' के मुआमले में बहुत ज़्यादा नहीं मिला। 'मतले' के क़ाफ़ियों के बारे में 'महरिष' का लेख अनमोल है। क्षमा करना कि दूसरों लोगों का इश्तहार आपकी दीवार पर लगा रहा हूं। शुभकामनाओं सहित महावीर शर्मा &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font color="#ff0000"&gt;माड़साब&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;महावीर जी इश्‍तेहार जैसी तो कोई बात ही नहीं है हम सब ही साहित्‍य नाम की जिस नाव पर सवार हैं वो डूब जाने के अंदेशे में है ऐसे में चाहें महर्षि जी हो ये प्राण जी हों हम सब ही तो उस नाव को बचाने में जुटे हैं तो ऐसे मैं किसी को किसी से कुछ भी अलगाव नहीं रखना चाहिये हम सब एक ही हैा और रही बात नीरज जी की तो उनकी विनम्रता तो सचमुच अथाह है । &lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/300274379" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/05/blog-post_28.html</feedburner:origLink></item><item><title>उठे सैलाब यादों का अगर मन में कभी तेरे दबाना मत कि उसका आँख से झरना ज़रूरी है : कुछ बातें नीरज गोस्‍वामी जी के बारे में</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/299549527/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Tue, 27 May 2008 22:39:37 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-3368182771015133992</guid><description>&lt;p&gt;कक्षाएं प्रारंभ होने को हैं और उसके पहले मैं चाह रहा हूं कि &lt;strong&gt;&lt;a href="http://ngoswami.blogspot.com/" target="_blank"&gt;नीरज गोस्‍वामी जी&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp; के बारे में कुछ बात करूं बात करने के पीछे कारण ये है कि पिछले दिनों उनकी कई सारी ग़ज़लें मुझे देखने का मौका मिला और हालंकि जैसा वे कहते हैं कि वे बहर के बारे में कुछ नहीं जानते लेकिन मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगता कि ये ग़ज़लें किसी ऐसे शख्‍य ने लिखीं हैं जो कि बहरों के बारे में कुछ भी नहीं जानता है । हालंकि पिछले दिनों में कई सारे लोगों की ग़ज़लों को देखा किन्‍तु किसी न किसी शेर में कहीं न कहीं कोई कमी दिख ही जाती है । ऐसा नीरज जी के साथ ही मु झे देखने को मिला कि ग़ज़ल बहर के लिहाज से पूरी तरह से मुकम्‍मल होती है । वे कहते हैं कि वे तो केवल अपने अंदर की धुन पर ही ग़ज़ल लिखते हैं । लेकिन देखने में एसा लगता है कि ग़ज़ल बाकायदा मीटर पर कस के लिखी गई है । और उस कारण पूरी तरह से दोष रहित है । अब जैसे उनकी एक ताजा ग़ज़ल का ये मकता देखें &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;घर से चलो तो याद ये दिल में रहे नीरज&lt;br&gt;दिलकश हमेशा राह में मंज़र नहीं मिलते &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;2212 2212 2212 22 मुसतफएलुन-मुसतफएलुन-मुसतफएलुन-फएलुन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;एक मुश्किल बहर पर ग़ज़ल लिखी है और सबसे बड़ी बात तो ये है कि विचारों में कहीं कमी नहीं आ रही है । जैसा कि कुछ छात्र कहते हैं कि जब वे व्‍याकरण को पकड़ते हैं तो विचार निकल भागते हैं और जब विचारों को पकड़ते हैं तो व्‍याकरण में सोलह सौ के हज़ार हो जाते हैं । अब ये तो नीरज जी से मैंने नहीं पूछा कि वे किस प्रकार लिखते हैं पर ये तो तय है कि उनकी ग़ज़लों में विचारों का और व्‍याकरण का संतुलन होता है । ये नहीं होता&amp;nbsp; कि बहर साधने के चक्‍कर में शब्‍दों ने अर्थ खो दिया हो । कुछ बहुत बड़े बहर के जानकारों की भी आप ग़ज़लें सुनेंगें तो वहां पर आपको आनंद नहीं आएगा । उसके पीछे कारण ये है कि बहर को साधने के चक्‍कर में मोटे मोटे शब्‍द उठाकर रखे गए हैं और जिनके कारण व्‍याकरण तो सध गई है लेकिन ग़ज़ल नहीं सध पाई है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;नीरज जी की एक विशेषता ये है कि उनका मकता हमेशा ही जानदार होता है जैसे ये &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;काश "नीरज" हो हमारा भी जिगर इतना बड़ा&lt;br&gt;जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;2122 2122 2122 212 फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलनु &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;दरअसल में यही एक बात है जो किसी को भी मुकम्‍म्‍ल बनाती है पहले तो ये कि आपकी ग़ज़ल में विचारों की समृद्धता हो और फिर ये भी ज़रूरी है कि व्‍याकरण को लेकर अशुद्धियां न हों । एक शेर और देखें &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;उठे सैलाब यादों का अगर मन में कभी तेरे&lt;br&gt;दबाना मत कि उसका आँख से झरना ज़रूरी है &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;1222 1222 1222 1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;1222 1222 1222 1222 मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&amp;nbsp;मैंने ये उदाहरण इसलिये लिये क्‍योंकि ये सब अलग अलग बहरों पर हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;एक बात जो नीरज जी को लिखने की ताकत दे रही है वो है विनम्रता क्‍योंकि सरस्‍वती मां का तो कहना है कि मैं फल उन्‍हीं पेड़ों पर दूंगी जिनको झुकने का गुण आता हो । विनम्रता किसी भी साहित्‍यकार का सबसे बड़ा गुण होना चाहिये और नीरज जी&amp;nbsp; के मेल इतने विनम्रता से भरे होते हैं कि कभी कभी अपने आप पर ही संकोच होने लगता है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;खैर कल बातें अपने एक और पसंदीदा कवि के बारे में । &lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/299549527" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html</feedburner:origLink></item><item><title>प्‍यार है इक निशान क़दमों का जो मुसाफि़र के बाद रहता है, भूल जाते हैं लोग सब लेकिन कुछ न कुछ फिर भी याद रहता है</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/298102095/blog-post_25.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Sun, 25 May 2008 22:16:42 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-5180962230798991808</guid><description>&lt;p&gt;नफरत और प्रेम का सि‍लसिला सदियों से ही चला आ रहा है और उसके साथ ही चला आ रहा है युद्ध और शांति का चलन । हम किसी से अचानक ही नफरत करने लगते हैं और फिर अचानक ही हक किसी को प्रेम करने लगते हैं । मैं पहले तो काफी हैरत में रहता था कि आखिर क्‍या है जो किसी को किसी से जोड़ देता है और किसी को किसी से तोड़ देता है । क्‍यों ऐसा होता है कि किसी को देखे बिना आपका दिन ही पूरा नहीं होता है और किसी को देख कर आपका दिन ही खराब हो जाता है । व्‍यक्ति तो वही है जो आपके लिये ऐसा है कि आप उसको देख कर ही दिन सार्थक मानते हैं और वो ही किसी और के लिये ऐसा हो सकता है कि उसे देख कर उसका दिन खराब हो जाए । जिन महात्‍मा गांधी को कई लोग भगवान मानते थे उन्‍हीं से कोई व्‍यक्ति इतना चिढ़ता था कि उनकी हत्‍या ही कर डाली । तो ये कौन सी बात है और कौन सी मनोस्थिति है जो हमें ऐसा करने पर मजबूर कर देती है । तो बात वही है कि प्रेम ही वो स्थिति है जो हमें किसी से जोड़ देती है और प्रेम का ना होना ही वो स्थिति है जो हमें किसी से अलग करती है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;ग़ज़ल ने हमेशा ही प्रेम की बात की हे और हमेशा ही ये कहा है कि प्रेम हमेशा ही नफरतों पर भारी पड़ता है । ग़ज़ल एक नाज़ुक सा ऐहसास है ग़ज़ल&amp;nbsp; फूलों की पंखुरी है जो कि आत्‍मा को छूती हुई गुज़र जाती है । और इसीलिये ही ऐसा होता है कि आप ग़ज़ल के शेरों को लम्‍बे समय तक याद रखते हैं क्‍योंकि वो आपकी आत्‍मा में बस जाते हैं । आपको लग रहा होगा कि मैं आज ये कहां कि बात लेकर बैठ गया । दरअस्‍ल में इन दिनों ग़ज़ल में जो शब्‍द आ रहे हैं वे ग़ज़ल के सौंदर्य को खत्‍म कर रहे हैं । हालंक‍ि मैं ये नहीं कहता कि ग़ज़ल के कोई अलग से शब्‍द हैं जो कि ग़ज़ल में उपयोग किये जाते हैं और उनके अलावा नहीं आने चाहिये । मगर बात ये है कि आपकी ग़ज़ल हमेशा समकालीन बनी रहे तो ही तो बात है । साहित्‍य तो वही होता है जो कि हमेशा ही समकालीन रहता है । अगर आपको बताना पड़े कि ये कविता को लिखने के लिये उस समय परिस्थितियां क्‍या थीं तो आपकी कविता समकालीन कविता नहीं है । जैसे एक कविता है ''हम कौन थे क्‍या हो गए हैं और क्‍या होंगें अभी '' ये कविता हर दौर में समकालीन ही रहेगी क्‍योंकि ये बात हर&amp;nbsp; दौर में सही होगी कि हम कौन थे क्‍या हो गए हैं और कया होंगें अभी ।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;हम जो भी लिखें वो इस तरह का हो कि उसमें अपने समय की गूंज हो और साथ ही वो आने वाले समय में भी अपनी सार्थकता को नहीं खो पाए । ग़ज़ल आज&amp;nbsp;की सबसे लोकप्रिय विधा है और उसके पीछे कारण ये है कि ये विधा सवतंत्रता देती है विचारों को व्‍यक्‍त करने की । हिन्‍दी का छंद शास्‍त्र जो आज कुछ कम लोकप्रिय है तो उसके पीछे भी कारण्‍ा यही है कि उसमें विचारों से ज्‍यादा व्‍याकरण पर&amp;nbsp; जोर होता है । फिर भी राकेश खंडेलवाल जी जैसे लोग हैं जो छंद शास्‍त्र के संकट के दौर में भी छंद का परचम पूरी मजबूती के साथ उठाए हुए हैं और उसको आसमान में लहरा भी रहे हैं । मैं काफी दिनों से अनुपस्थित चल रहा था और लौटने की मानसिकता नहीं बना पा रहा था । अब साहस करके लौट रहा हूं ।साहस करके इसलिये कह रहा हूं क‍ि साहस सचमुच ही करना पड़ रहा है । और एक बात और भी है वो ये है कि जिस समय पर मैं ब्‍लागिंग के लिये बैठता हू वो समय बिजली कटौती की भेंट था अब कुछ दिनों से उस समय पर लाइट नहीं जा रही है सो आशा है कि अब नियमित रूप से हम मिलेंगें । आमीन &lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/298102095" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/05/blog-post_25.html</feedburner:origLink></item><item><title>कोई कोना भी हो सुनसान बुरा लगता है, अब बिना पेड़ के दालान बुरा लगता है , ये मिरी सोच मुझे आज कहां ले आई, घर में आया हुआ मेहमान बुरा लगता है</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/289137669/blog-post_9217.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 12 May 2008 22:05:22 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-4640790855266005554</guid><description>&lt;p&gt;माड़साब वापस आ गए हैं काफी दुचे पिटें से आ रहे हैं काफी दिनों से काफी कुछ झेलने के बाद अब माड़साब की वापसी हो रही है । इस बीच कई सारे दिन बीत गए हैं और काफी कुछ गुजर चुका है । उड़नतश्‍तरी की वापसी हो चुकी है अभिनव भी कुछ दिनों के लिये भारत आकर वापस हो चुके हैं और राकेश जी भी एक दुखद प्रसंग में आकर जा चुके हैं । मतलब ये कि इस बीच हमारे शहर के सूखी नदी में काफी कुछ बह चुका है पानी को छोड़कर । पानी इसलिये नहीं क्‍योंकि पानी तो अब बातल में मिलता है । हमारे दादा कहा करते थे कि बेटा कभी भारत में दूध की नदियां कहा करती थीं । हम अपने पोतों से कहा करेंगें कि बेटा हमारे जमाने में तो पानी की नदियां कहा करतीं थीं । और वे उत्‍सुकता के साथ कहेंगें सच दादाजी पानी की नदियां और वो भी साफ पानी की नदियां । खैर तो अब तो काफी कुछ हो चुका है । माड़साब की छुट्टी के पीदे एक कारण ये भी था कि माड़साब की कक्षाओं के समय पर बिजली गुल हो जाती है और उसके कारण ये होता था कि कक्षाएं नहीं लग पाती थीं । अब तो कुछ कटौती का समय बदला है । और हमारे प्‍यारे मध्‍य प्रदेश में अब कटौती का शेड्यूल कुछ उस प्रकार है । सुब्‍ह 7 बजे से 10 बजे तक घोषित कटौती और उसके बाद फिर 10:30 से लेकर दोपहर 2 बजे तक अघौषित कटौती फिर 2:30 से लेकर शाम 6 बजे तक पुन: घोषित कटौती और उसके बाद 7 बजे से लेकर रात 12 तक अघोषित कटौती । और उसके बाच जो आधे आधे घंटे की बिजली मिल रही है उसके बारे में भी वही बात कि अगर&amp;nbsp; उस बीच कहीं लोड शेडिंग हो गई तो वो भी गई । खैर हमने पांच साल पहले एक सरकार को हटा कर दूसरी को बिठाया था क्‍योंकि वो सरकार बिजली नहीं दे पारही थी और अब शायद पांच महीने बाद इसको भी हटा देंगें कारण वही बिजली नहीं&amp;nbsp; दे पा रही है । आज माड़साब काफी बतौलेबाजी करके केवल कक्षाओं का माहौल बना रहे हैं और वो भी इसलिये क्‍योंकि हमको काफी समय हो गया है कक्षाओं में आए तो कम से कम आज से विद्यार्थियों को ये तो पता चल ही जाए कि माड़साब वापस आ गए हैं और अब कक्षाएं शुरू होने वाली हैं । हमने कक्षाओं को बहर के प्रारंभ पर छोड़ा था और हम वहीं से पुन: उठा कर शुरू करेंगें&amp;nbsp; और एकदम प्रारंभ से ही उठाएंगें । बहरों के बारे में जो कुछ भी हमने देखा था उसको फिर से देखना होगा क्‍योंकि काफी दिन हो चुके हैं और उसके बाद काफी कुछ हो चुका है । कहीं पर आपके माड़साब को ये भी कहा गया कि वे तो मूर्ख हैं और ये भी कहा गया कि वे अहंकार लेकर स्‍तंभ लिखते हैं । उसके बाद एक आत्‍मावलोकन माड़साब ने किया कि क्‍या माड़साब सचमुच ऐसे हैं । और आत्‍मावलोकन का परिणाम अभी कुछ मिला नहीं हैं । खैर माड़साब कक्षाएं प्रारंभ कर रहे हैं ऐ बात हर आमो खास को बता दी जाए । और हां एक बात और माड़साब ने भूतनाथ देखी और सच बोलें तो माड़साब को भोत मजा आया । काफी मजेदार है फिल्‍म । तो आज आप भूतनाथ देखें और कल कक्षा में आऐं जहां माड़साब आपको भूत बनाने वाले हैं । ( आज शीर्षक में जनाब इसहाक असर साहब के कुछ&amp;nbsp;शेर लगे हैं )&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/289137669" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/05/blog-post_9217.html</feedburner:origLink></item><item><title>एक साक्षात्‍कार मृत्‍यु के साथ जब ऐसा लगा था कि अब सब कुछ ख़त्‍म ही होने वाला है और एक दर्शन मानवीयता का</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/288513400/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Mon, 12 May 2008 02:16:03 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8683680667707196246</guid><description>&lt;p&gt;ऐसा लगता है कि मेरी परेशानियों के दिन अभी और लम्‍बे समय तक चलना चाह रहे हैं । पिछले कुछ समय से परेशानियों ने कुछ इस तरह से घेरा हुआ है कि बस उस पर शनिवार की घटना ने तो पूरे दिन और रविवार को भी मन को विचलित किये रखा ऐसा लगा कि अब बस सब कुछ खत्‍म ही होने वाला है पर जाने किसकी दुआओं के असर से बच गया । दोपहर का समय था लगभग चार बजे के आसपास मैं भोपाल सै लौट रहा था अपनी मारुती वैन लेकर के । रास्‍ते में हाईवे बनाने वालों ने सड़क को तो ऊंचा कर दिया पर किनारों को नहीं भरा जिससे के सड़क और ज़मीन के बीच में करीब डेढ़ फुट का फासला है और वो भी एकदम सीधा । मतलब कहीं आपने ग़लती से भी गाड़ी को सड़क नीचे उतारा तो सीधी सी बात है कि आपकी गाड़ी का पलटना तय है । गाड़ी धड़ से नीचे गिरेगी और अगर गति में है तो पलटना तो तय है । मैं चला जा रहा था कि अचानक एक गाय जो कि उस तरफ मुंह करके खड़ी थी जाने किस वजह से उलट कर भागी और उसके बचाने के चक्‍कर में मैं भूल ही गया कि सड़क और जमीन में डेढ़ फुट का अंतर है और बात की बात में गाड़ी सड़क को छोड़कर जमीन पर आकर धड़ाक से गिरी । गिरते ही संतुलन चला गया और दूसरा तीसरा और चौथा पहिया भी जमीन पर आ गिरा और उसके बाद गाड़ी स्‍पीड में लहराती हुई एक पुलिया की ओर बढ़ चली कुछ देर तक तो मैंने उसको नियंत्रण में लेने का प्रयास किया मगर जब बात नहीं बनी तो हार कर सोच लिया कि अब तो पुलिया से टकराना है और उसके बाद जो होना है वो होगा ही । अचानक पुलिया के कुछ दूर पर गाड़ी&amp;nbsp; जोर का झटका खाकर रुक गई । हाथ में थोड़ी सी चोट लगी और कुछ नहीं । मैं हैरत में भरा गाड़ी से उतरा तो ज्ञात हुआ कि एक मिट्टी का टीला रास्‍ते में आ गया था जिससे टकरा कर गाड़ी रुक गई थी । और उसमें फंस गई थी । मिट्टी होने के कारण गाड़ी को ज़रा सा भी नुकसान नहीं हुआ और ना ही मुझे । कुछ देर तक तो मैं हैरान सा खड़ा सोचता रहा कि क्‍या है ये सब । ये किसकी दुआओं का फल है&amp;nbsp;जो मिट्टी के टीले के रूप में सामने आ गया है । &amp;nbsp;&amp;nbsp;समय का एक पल ही तो बीच में बाकी रहा गया था जब गाड़ी को उस पुलिया से टकराना था । और उसी पल में वो टीला जीवन और मृत्‍यु के बीच आकर खड़ा हो गया कि नहीं अभी नहीं अभी तो बहुत काम बाकी हैं । एक और ऐसा सच देखने को मिला जिसके जिक्र के बगैर ये बात अधूरी ही रहा जाएगी । थोड़ी ही दूर पर कुछ मजदूर और ड्रायवर खड़े थे जब उन्‍होंने देखा तो दौड़ते हुए आए और कुशलक्षेम पूछने लगे । मैंने कहा कि कोई चोट नहीं है बस गाड़ी फंस गई है तो उनमें से एक ड्रायविंग सीट पर बैठ गया और बाकियों ने धकेलते हुए बात की बात में गाड़ी को लाकर सड़क पर खड़ा कर दिया । जब मैंने पैसे देने चाहे तो सबने हाथ जोड़ दिये कहने लगे कि बाबूजी आपको ईश्‍वर ने बचा लिया वही हमारे लिये बहुत है । और जो हमने किया वो तो करना ही था । मैं अभिभूत रहा गया आज भी ऐसी मानवता बाकी है । नानी सच कहती हैं कि कुछ अच्‍छे लोगों के कारण ही पृथ्‍वी टिकी है अन्‍यथा तो कभी भी खत्‍म हो जाएगी । खैर दुर्घटना की मानसिकता को मानवीयता ने दूर कर दिया और मैं उनको सलाम करता हुआ वापस आ गया । &lt;/p&gt; &lt;p&gt;आज से ग़ज़ल की कक्षाएं प्रारंभ होनी थीं पर शनिवार का अनुभव आप लोगों के साथ बांटना था । उसके पीछे क्‍या कारण है वो अब बताता हूं । दरअस्‍ल में जब रविवार को मैंने सोचा की वो मिट्टी का टीला वास्‍तव में क्‍या था तो मुझे पता चला कि वो वास्‍तव में माता पिता और परिवार की दुआएं थीं और आप सब मित्रों की शुभकामनाएं थीं जो मुझे मृत्‍यु के मुख से खींच लाईं । धन्‍यवाद देकर आपके स्‍नेह को छोटा नहीं कर सकता । पर हां बात वही है कि आप सब का प्रेम है जो मुझे संकट के इस दौर में संबल दे रहा है । &lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/288513400" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/05/blog-post_12.html</feedburner:origLink></item><item><title>ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात - मैं वापस आ रहा हूं अपनी ग़ज़ल की कक्षाओं के साथ</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/283641914/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Sun, 04 May 2008 21:44:22 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-4175102444872131937</guid><description>&lt;p&gt;दादाजी कहा करते थे कि ईश्‍वर जिनको प्रेम करता है उनको खूब कष्‍ट देता है । उनको कभी भी सुकून से नहीं रहने देता है । अगर दादाजी की भाषा में बात करूं तो शायद ईश्‍वर मुझसे कुछ ज्‍़यादा ही प्रेम करता है । और शायद इसीलिये ...... ख़ैर मगर मुझे इस बात में इस बात की खुशी तो है ही कि जब भी ईश्‍वर मुझे कष्‍ट देता है तो कई सारे लोगों को भी भेजता है जो आकर कहते हैं कि हम तुम्‍हारे साथ हैं । मेरी पिछली पोस्‍ट पर कई सारे लोगों के संदेश प्राप्‍त हुए और कई सारे फोन भी । ऐसा लगा कि मेरा दुख तो बंट गया है कई सारे लोगों ने उस पीर को बांट लिया है । अभिनव को फोन मिला और जो बात अभिनव ने कही उससे मैं अभिभूत हो गया मैं नहीं जानता कि कैसे कोई किसी के इतना नजदीक हो जाता है । और वो भी संबंधों के ठंडेपन वाले इस दौर में । अभिनव ने जो कुछ कहा वो सीधे जाकर ह्रदय को छू गया । अपनेपन का एक झौंका सा आप लोगों की ओर से आया और जीवन की तपन को कम करके चला गया । संकट के दिन भले ही ना टले हों पर ये तो विश्‍वास है कि मेरे साथ कई लोग हैं जो कि संकट के दिनों में मेरे साथ खड़े हैं । एक पुराना गीत है '' पास बैठो तबीयत बहल जाएगी मौत भी आ गई हो तो टल जाएगी''&amp;nbsp;&amp;nbsp; बस वैसा ही कुछ लगा मुझे भी भले ही आप सब मेरे साथ भौतिक रूप से नहीं हैं पर आत्‍मीय रूप से तो सब मेरे साथ हैं और वही साथ होना खास होता है । जो भौतिक रूप से साथ होते हैं वो कितना साथ होते हैं ये हम सब जानते हैं । राकेश जी के यहां पर भी दुखों का सिलसिला थम नहीं रहा है । पहले एक भ्राता का बिछोह और अब दूसरे का भी । ईश्‍वर का ये न्‍याय कभी कभी अच्‍छा नहीं लगता कि अच्‍छे लोगों को ज्‍यादा दुख दिये जाएं । उस सब के बाद भी राकेश जी का फोन प्राप्‍त हुआ तो ऐसा लगा कि कहीं दूर बैठा कोई बड़ा भाई सांत्‍वना दे रहा है कि छोटे दुखी मत होना मैं तेरे साथ हूं । कंचन और सुनीता जी का फोन वैसे ही मिला जैसे परदेस में बसी कोई बहन भाई पर किसी संकट के दौरान अकुला के फोन करती है कि भैया के पास जा तो नहीं सकते पर मन तो वहीं है । मैं नहीं जानता था कि मेरा परिवार इतना बड़ा हो गया है कि उसमें इतने सारे भाई बहन हो गए हैं । समीर जी का स्‍नेह उनका प्रेम ये सब बातें भला भूल जाने वाली हैं । अभिनव का जब फोन आया तो ऐसा लगा कि परवाह के साथ को छोटा भाई कह रहा है कि मैं हूं ना । मैं नहीं जानता कि मेरे किन अच्‍छे कार्यों के कारण ईश्‍वर ने मुझे ये परिवार दिया है । खैर अब मैं वापस आ रहा हूं । एक लम्‍बी नज्‍़म लिख रहा हूं अपनी मिष्‍टी (मीठी) पर और उसके साथ ही संभवत: अपनी दूसरी पारी का प्रारंभ करूंगा । अंग्रेजी में कहावत है शो मस्‍ट गो ऑन । समीर जी आपने काफी पहले एक सलाह दी थी मैंने उसे नहीं माना तो एक दुख कहीं से और भी मिला जिसका जि़क्र यहां नहीं कर सकता पर ये ज़रूर कहूंगा कि अब मैं दोस्‍तों की सलाह को इग्‍नोर नहीं करूंगा । जाने क्‍यों वो ग़लती कर बैठा और अपमानित हो गया । खैर तुलसी बाबा ने कहा है यश अपयश जीवन मरण सब विधना के हाथ । यश की कामना हो तो अपयश के लिये भी अपने आपको तैयार रखना चाहिये । चलिये जल्‍दी ही हम मिलते हैं अपनी ग़ज़ल की कक्षाओं के दूसरे खंड के साथ । अभी तो बस ये &lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;एहसान मेरे दिल पे तुम्‍हारा है दोस्‍तों, ये दिल तुम्‍हारे प्‍यार का मारा है दोस्‍तों &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/283641914" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/05/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>विदा प्रिय बिटिया तुम्‍हारा और मेरा साथ शायद इतना ही था, जाओ सितारों के देश में जाकर बसो</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/276657154/blog-post_23.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Thu, 24 Apr 2008 00:14:25 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-8796318217592914081</guid><description>&lt;p&gt;रिश्‍ते ख़ून के होते हैं तो अपने साथ जाने कैसा बंधन रखते हैं कि उनसे मन जुड़ ही जाता है । और बिछोह पर एक टीस एक दर्द सा दे जाता है । एक माह से ब्‍लागिंग से दूर रहने के पीछे कारण था कि घर में एक नए मेहमान के स्‍वागत की तैयारियां चल रहीं थीं । और उसीको लेकर कुछ परेशानियां थीं ।सप्‍ताह भर पहले&amp;nbsp;वो अपनी मां के पेट से मुझे पैर मार मार कर कह रही थी कि पापा तैयार रहो मैं आने वाली हूं ।  दो दिन पहले उस नए मेहमान का आगमन भी हुआ । एक नन्‍हीं सी प्‍यारी सी बिटिया के रूप में । मगर शायद उसका और हमारा साथ विधाता ने बहुत ज्‍यादा नहीं लिख कर भेजा था । जन्‍म के साथ ही कुछ परेशानियां उसे थीं और जनम के घंटा भर बीतते न बीतते तो उसे लेकर भोपाल भागना पड़ा किन्‍तु रास्‍ते में ही उसने कह दिया प्‍यारे पापा इस जनम में बस इतना ही साथ फिर कभी मिलेंगें । और वो विदा ले गई । सुंदर सी उस बिटिया को हाथों में थामे मैं लौट आया । जाने क्‍यों या किस बात पर रूठ गई वो मुझसे जो आते ही केवल एक घंटे में ही मुझे और अपनी मम्‍मी को छोड़ कर चली गई । जाने क्‍या अपराध था हम दोनों का जो उसने हमारे साथ रहना ही पंसद नहीं किया । कुछ देर पूर्व जो मां के गर्भ में खेल रही थी अब पृथ्‍वी माता के गर्भ में है । बस रह रह कर एक ही बात मुझे साल रही है जो लिखने के लिये आज मैंने यहां ब्‍लाग पर आने का निर्णय लिया कि क्‍या अपराध था मेरा जो वो इस तरह से रूठ कर चली गई । सब कह रहे हैं कि बहुत सुंदर थी वो और ज्‍यादा सुंदर होने के कारण ही नहीं रुकी क्‍योंकि उसे तो वहां जाना था जहां पर सुंदर लोग रहते हैं । जो भी हो प्रिय बिटिया भले ही तुम मुझसे और अपनी मम्‍मी से नाराज होकर चली गईं मगर हम तुम्‍हें याद कर रहे हैं । विदा प्रिय बिटिया सितारों में जाकर बसो । मीठी ( यही नाम सोचा था मैंने उसके लिये ) शायद मैं और तुम्‍हारी मम्‍मी तुम्‍हारे लायक नहीं थे । विदा मीठी विदा । तुम्‍हारा पापा &lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~4/276657154" height="1" width="1"/&gt;</description><feedburner:origLink>http://subeerin.blogspot.com/2008/04/blog-post_23.html</feedburner:origLink></item><item><title>देखिये हास्‍य व्‍यंग्‍य से भरपूर टेपा सम्‍मेलन की चित्रमय झांकी</title><link>http://feeds.feedburner.com/~r/subeerin/~3/264386737/blog-post_04.html</link><author>noreply@blogger.com (पंकज सुबीर)</author><pubDate>Fri, 04 Apr 2008 23:32:25 -0500</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7637784963342720274.post-2784677899432289132</guid><description>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b70J9GpmI/AAAAAAAAASw/Y9IrNJMmqOs/s1600-h/DSC_0107.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608894407681634" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b70J9GpmI/AAAAAAAAASw/Y9IrNJMmqOs/s320/DSC_0107.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जज का मेकअप तो करना ही होगा तभी तो वो जज लगेंगें । टेपा जज ओम मोदी का मेकअप विक्‍की के द्वारा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b70J9GpnI/AAAAAAAAAS4/gLCebEmJ1Tk/s1600-h/DSC_0115.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608894407681650" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b70J9GpnI/AAAAAAAAAS4/gLCebEmJ1Tk/s320/DSC_0115.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भई जज ने सजा सुनाई है कि नाचो तो नाचना तो होगा ही । पूर्व विधायक और आंचलिक पत्रकार संघ के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष श्री शंकर लाल साबू का नृत्‍य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b70p9GpoI/AAAAAAAAATA/kfun0FQsrkk/s1600-h/DSC_0116.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608902997616258" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b70p9GpoI/AAAAAAAAATA/kfun0FQsrkk/s320/DSC_0116.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उफ नाचने में श्री शंकरलाल साबू का पेटीकोट ही खिसक गया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7059GppI/AAAAAAAAATI/UpMInKzEO3M/s1600-h/DSC_0117.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608907292583570" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7059GppI/AAAAAAAAATI/UpMInKzEO3M/s320/DSC_0117.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाचना तो पड़ा भाजपा के जिला उपाध्‍यक्ष श्री राजकुमार जी गुप्‍ता को भी भई सजा तो सजा ही है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b71J9GpqI/AAAAAAAAATQ/TVwwyhknsdU/s1600-h/DSC_0124.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608911587550882" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b71J9GpqI/AAAAAAAAATQ/TVwwyhknsdU/s320/DSC_0124.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;और ये सजा कि कांग्रेस के पूर्व विधायक श्री शंकरलाल साबू और भाजपा के पूर्व विधायक श्री मदन लाल त्‍यागी जी साथ ही नाचें ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7hp9GphI/AAAAAAAAASI/gKUky130ius/s1600-h/DSC_0068.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608576580101650" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7hp9GphI/AAAAAAAAASI/gKUky130ius/s320/DSC_0068.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे भाई पेटीकोट पहनना भी नहीं आता । व्‍यवसायी श्री कैलाश अग्रवाल को पेटीकोट धारण करवाते श्री कमल झंवर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7hp9GpiI/AAAAAAAAASQ/DtWgQ1HAW-8/s1600-h/DSC_0069.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608576580101666" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7hp9GpiI/AAAAAAAAASQ/DtWgQ1HAW-8/s320/DSC_0069.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फंस गया ना फंसना तो था ही तोंद जा बढ़ा रखी है इतनी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7hp9GpjI/AAAAAAAAASY/CtXKJ5DAAG8/s1600-h/DSC_0082.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608576580101682" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7hp9GpjI/AAAAAAAAASY/CtXKJ5DAAG8/s320/DSC_0082.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप पहले तो ये सड़ी सब्जियों से बना गुलदस्‍ता ग्रहण करें लायनेस अध्‍यक्ष रीता दुबे जी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7h59GpkI/AAAAAAAAASg/0d7QMxMBLvo/s1600-h/DSC_0086.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608580875068994" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7h59GpkI/AAAAAAAAASg/0d7QMxMBLvo/s320/DSC_0086.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही आप ब्‍यूटी पार्लर चलाती हों पर हम तो केमल के रंगों से ही करेंगें मेकअप ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7h59GplI/AAAAAAAAASo/7gV72lCL5FE/s1600-h/DSC_0105.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608580875069010" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7h59GplI/AAAAAAAAASo/7gV72lCL5FE/s320/DSC_0105.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जज साहब ओम मोदी तैयार हैं अपनी झाड़ू के साथ अदालत के लिये ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7L59GpcI/AAAAAAAAARg/p0bCUrpeenE/s1600-h/DSC_0036.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608202917946818" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7L59GpcI/AAAAAAAAARg/p0bCUrpeenE/s320/DSC_0036.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ा मेकअप करवा लीजिये राजकुमार गुप्‍ता जी यही कह रहे हैं पास खड़े कालेज के प्राचार्य श्री भगचंद जी जैन जी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MJ9GpdI/AAAAAAAAARo/k1TPZuKmxJ8/s1600-h/DSC_0042.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608207212914130" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MJ9GpdI/AAAAAAAAARo/k1TPZuKmxJ8/s320/DSC_0042.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप तो पेटीकोट इस तरह से ही पहन लो ऊपर से फस जाता है । पूर्व विधायक श्री साबू को धारण करवाते पत्रकार श्री पुरुषोत्‍तम कुइया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MJ9GpeI/AAAAAAAAARw/gK3ujwmJZW4/s1600-h/DSC_0055.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608207212914146" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MJ9GpeI/AAAAAAAAARw/gK3ujwmJZW4/s320/DSC_0055.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा आपका मेकअप कर दूं शायर महोदय । डॉ कैलाश गुरू स्‍वामी का मेकअप करते प्रमोद जोशी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MZ9GpfI/AAAAAAAAAR4/R_d4S49WBqg/s1600-h/DSC_0057.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608211507881458" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MZ9GpfI/AAAAAAAAAR4/R_d4S49WBqg/s320/DSC_0057.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जम रहे हो शायर साहब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MZ9GpgI/AAAAAAAAASA/hOKZOJ0fzE4/s1600-h/DSC_0061.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185608211507881474" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b7MZ9GpgI/AAAAAAAAASA/hOKZOJ0fzE4/s320/DSC_0061.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी लंबाई ज्‍यादा है पेटीकोट छोटा पड़ जाएगा यही कह रहे हैं पूर्व विधायक मदन लाल त्‍यागी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b6b59GpXI/AAAAAAAAAQ4/d9JOdF7-euI/s1600-h/DSC_0006.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185607378284225906" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b6b59GpXI/AAAAAAAAAQ4/d9JOdF7-euI/s320/DSC_0006.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्व पार्षद किन्‍नर पायल जान के चित्र के सम्‍मुख चिमनी जला रहे हैं । चिर कुआरे नागरिक बैंक के अध्‍यक्ष श्री प्रेमबंधू शर्मा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b6cJ9GpZI/AAAAAAAAARI/UaEnTFv6GUk/s1600-h/DSC_0012.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5185607382579193234" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_XQyeaYRtFiI/R_b6cJ9GpZI/AAAAAAAAARI/UaEnTFv6GUk/s320/DSC_0012.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सूत्रधार पंकज सुबीर गले में सीटी बांधे और बिना कांच का च