<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633</id><updated>2024-12-18T19:18:08.141-08:00</updated><category term="खेल"/><category term="क्रिकेट"/><category term="राजनीति"/><category term="आतंकवाद"/><category term="मीडिया"/><category term="विश्वकप"/><category term="ग्वालियर"/><category term="महमान"/><category term="समस्या"/><category term="पत्रिका"/><category term="प्रधानमंत्री"/><category term="फिल्म"/><category term="मोबाइल"/><category term="व्यंग"/><category term="व्यंग्य"/><category term="व्यवस्था"/><category term="समाज"/><category term="सानिया"/><category term="सुरक्षा"/><category term="हालात"/><category term="अपनी बात"/><category term="अफसाने"/><category term="अमर सिंह"/><category term="अलविदा"/><category term="आतंक"/><category term="आरक्षण"/><category term="इंटरनेट"/><category term="इडियट"/><category term="इतिहास"/><category term="इवीएम"/><category term="कविता"/><category term="कश्मीर"/><category term="कसाब"/><category term="कहानी"/><category term="काइट्स"/><category term="काम. सिंकारा."/><category term="गांधी"/><category term="गाउन"/><category term="ग्लेमर"/><category term="चुनाव"/><category term="झारखंड"/><category term="तकनीक"/><category term="तुम्हारा"/><category term="थरूर"/><category term="दर्द"/><category term="धोनी"/><category term="न्यायालय"/><category term="पत्रकार"/><category term="पर्यावरण"/><category term="पर्यावरण."/><category term="प्रतिबन्ध"/><category term="प्रेम"/><category term="फैसला"/><category term="बड़वान"/><category term="ब्लॉग"/><category term="ब्लोगवाणी"/><category term="भारत बंद"/><category term="भाषा"/><category term="भ्रष्टाचार"/><category term="महिला"/><category term="मुंबई"/><category term="मेहमान लेखक"/><category term="मैकाले"/><category term="यंगिस्तान"/><category term="रहमान"/><category term="राज्य"/><category term="राहुल"/><category term="लोकतंत्र"/><category term="विजिटर्स"/><category term="वेलेंटाइन डे"/><category term="शशि"/><category term="शादी"/><category term="शिक्षा"/><category term="सचिन"/><category term="सन्यास"/><category term="सरकार"/><category term="सहवाग"/><category term="सहूर"/><category term="साइकिल"/><category term="सामयिक"/><category term="सिनेमा"/><category term="सीरीज सार"/><category term="सेना"/><category term="सोशल नेटवर्किंग साइट्स"/><category term="हाकी"/><category term="हिन्दी"/><title type='text'>उदभावना</title><subtitle type='html'>मेरे आपके और सबके उदगारों का एक साझा मंच</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>78</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-2753503906733643155</id><published>2017-07-04T23:25:00.000-07:00</published><updated>2017-07-04T23:25:02.321-07:00</updated><title type='text'>क्यों लिखे, पढ़े और बनाए जा रहे ब्लाग </title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;http://why%20blogs%20are%20written%2C%20read%20and%20created/&quot;&gt;क्यों लिखे, पढ़े और बनाए जा रहे ब्लाग &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
‘ब्लाग’। शब्द, बहुत पुरान नहीं तो नवीन भी नहीं। एक दौर था, जब यह खूब लिखा और पढ़ा जाता था। यह फेसबुक के आने का शुरुआती वक्त हुआ करता था। हां, वाट्सअप तो था ही नहीं और ट्विटर की चिड़िया कुछ खास लोगों तक ही समिति हुआ करती थी। बहुत बने, बहुत सजे और बहुत पढ़े भी गए, ब्लाग। लेकिन फिर धीरे धीरे कुछ अलग होता चला गया। सवाल यह है कि ब्लाक आखिर क्यों बनाए और लिखे जा रहे हैं। हम जैसे पत्रकार तो ब्लाग इसलिए बनाते और लिखते हैं कि जो बातें या चीजें अखबार या टीवी के माध्यम से नहीं लिख सकते, उन्हें लिखने का यह एक स्वतंत्र मंच मिल जाता है। ‘पत्रकारिता जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य ही तो होता है।’ &amp;nbsp;लेकिन अगर तसल्ली से लिखा जाए तो वही साहित्य की श्रेणी आकर खड़ा हो जाता है। अखबार में हम खबरें लिख सकते हैं। टीवी में हर स्टोरी दिखा सकते हैं। लेकिन जरूरी तो नहीं कि हम सिर्फ यही तक सीमित रहते हों। कविता, कहानी, व्यंग्य आदि कहां लिखे जाएं। इसके लिए एक रास्ता मिल गया वह है ‘ब्लाग’ का। जो पत्रकार नहीं वे कुछ नहीं लिख सकते क्या? क्यों नहीं लिख सकते। अगर लिखा है तो कोई पढ़े, यह भी मन में रहता ही है, तो कैसे पढ़ा जाए? ब्लाग के ही माध्यम से पढ़ा जाए। इसलिए गैर पत्रकार भी ब्लाग लिखने लगे। ‘बड़े लोग’ मसलन महानायक टाइप या टीवी के जाने माने एंकर और पत्रकार भी ब्लाग लिखते हैं। वे कुछ भी लिखें, हिट मिल ही जाते हैं। वे अपने घर की कहानी लिखें तो भी और टीवी में पढ़ी गई अपनी स्क्रिप्ट ही क्यों न लिख दें, उन्हें पढ़ा तो जाएगा ही। नाम ही इतना बड़ा है।&lt;br /&gt;
लेकिन, इधर जब से फेसबुक और वाट्सअप ने जोरदार तरीके से धमक दी है, ब्लाग कुछ कम हो गए हैं। हां ब्लाग की जगह लोग ब्लाक को ज्यादा जानने और समझने लगे हैं। ज्ञान की गंगा बहाने के लिए इससे अच्छी जगह भला और क्या मिलेगी। सो जो नहीं वही हो जाता है शुरू। लेकिन जब कुछ अर्थपूर्ण लिखना हो, तो ब्लाग ही वह जगह होती है, जहां लिखा और पढ़ा जाना चाहिए। इसलिए लंबे अर्से बाद एक बार फिर से ब्लागिंग की शुरुआत, आज की इसी पोस्ट के साथ....&lt;br /&gt;
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</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/2753503906733643155/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/2753503906733643155' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/2753503906733643155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/2753503906733643155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2017/07/blog-post.html' title='क्यों लिखे, पढ़े और बनाए जा रहे ब्लाग '/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-7668176411459731595</id><published>2016-10-13T08:13:00.001-07:00</published><updated>2016-10-13T08:13:56.398-07:00</updated><title type='text'>दशहरा, रावण, शरीफ, मोदी और पुतला</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
कुछ बातों अजीबो गरीब होती हैं... कुछ सिर्फ अजीब होती हैं... लेकिन केवल गरीब नहीं होती। हां, उनको करने वाले लोग जरूर गरीब होते हैं। गरीब से तात्पर्य आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति से है। खैर, एक अजीब बात जो इस बार दशहरे पर देखने को मिली, वह थी दशहरे पर रावण के रूप में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और कुछ इंडियाज मोस्ट वांटेड आतंकियों का पुतला दहन करना। अगर हम रावण के साथ इनका पुतला दहन करते हैं तो माना जा सकता है कि हम दोनों को एक समान मान और समझ रहे हैं। रावण माना राक्षस था... अहंकारी था... लेकिन क्या हम उसके गुणों से बाकिफ नहीं हैं। वह प्रकांड विद्वान था। जिसके वध के बाद भगवान राम स्वयं अपने भाई लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजते हों, उसकी विद्वता पर हम- आप क्या शक करने की स्थिति में होते हैं। राम होना को नामुमकिन है, लेकिन आज के दौर में रावण होना भी इससे कमतर नहीं है। यह और बात है कि जिसे भगवान ने मारा, उसे हम बिल्कुल गया गुजरा समझ ले रहे हैं। क्या हम नवाज और मोस्ट वांटेड आतंकियों को रावण के समकक्ष नहीं बनाए दे रहे हैं। यह किसी एक प्रदेश में, एक जिले में, एक समाज ने नहीं किया। देशभर में सैकड़ों जगह यही कारनामा अंजाम दिया गया। हद तो तब हो गई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी रावण बनाकर पुतला दहन किया गया। उनके साथ तमाम और नेता शामिल कर लिए गए।&lt;br /&gt;
विरोध दर्ज कराने के लिए पुतला दहन की परम्परा नई नहीं है। अक्सर लोग इसका सहारा लेते हैं, लेकिन कम से कम यह तो समझ लें कि हम किसका रूप बनाकर किसे जलाने का प्रयास कर रहे हैं।&lt;br /&gt;
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</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/7668176411459731595/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/7668176411459731595' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/7668176411459731595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/7668176411459731595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2016/10/blog-post.html' title='दशहरा, रावण, शरीफ, मोदी और पुतला'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-504849645990984024</id><published>2013-11-13T07:09:00.004-08:00</published><updated>2013-11-13T07:09:38.979-08:00</updated><title type='text'>अभावशाली मैं</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;span class=&quot;userContent&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;K&amp;quot;}&quot;&gt;&lt;br /&gt;
 अपना मुन्नू सबसे प्रभावशाली है। भले सरदारों में सही। असरदार न सही, 
प्रभावशाली ही सही। लेकिन मैं क्या हूं. .... .... । मुझे भी तो कुछ न कुछ 
होना चाहिए। वैसे मैं हूं तो बहुत कुछ। मैं ब्राह्मण हूं, पत्रकारिता करता 
हूं। कामचलाऊ साहित्य भी रच देता हूं। दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री है 
तो चिंतक भी कहा जा सकता है। वैसे बालों के गिर जाने के कारण यह तथ्य और भी
 पुष्ट होता है कि मैं चिंतक हूं। &lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;और भी 
बहुत कुछ हूं। अगर सबका जिक्र करूंगा तो सूची लम्बी हो जाएगी। लेकिन यहां 
तो प्रभाव का ही सर्वथा अभाव है। जिन लोगों में प्रभाव का अभाव नहीं उनका 
भी जवाब नहीं। अपने हिसाब से नए-नए तरीके से सूची बनवाते हैं और उसमें अपना
 नाम डलवा लेते हैं। मजे की बात यह है कि इस सूची में मुन्नू के साथ साथ 
उनकी पत्नी का नाम भी है। अब सवाल घूम फिरकर वही आता है। पहले तो अपन के 
पास पत्नी है ही नहीं और अगर हो भी तो क्या फायदा ऐसी पत्नी का जो 
प्रभावशाली न हो। अपन न सही पत्नी ही प्रभावशाली हो तो काम बन सकता है। 
लेकिन यहां तो न तो नौ मन तेल है और न ही राधा के नाचने की कोई उम्मीद।  
दरअसल मेरा प्रभावशाली न होना और जीवन में किसी प्रभावशालिनी का न होना, एक
 ही सिक्के के दो पहलू हैं। मैं प्रभावशाली नहीं हूं, इसलिए कोई संगिनी 
नहीं है। और दीगर यह भी है कि संगिनी नहीं है, इसलिए प्रभावशाली नहीं हूं। 
इतना जरूर है कि सरदारों की सूची में भले अपना मुन्नू नम्बर वन हो, लेकिन 
असरदारों की सूची में मेरा नम्बर ही वन होगा। जब मैं यहां मेरा कहता हूं तो
 मेरा मतलब सिर्फ स्वयं से नहीं है। मेरा मतलब देश के हर आमआदमी से है, जो 
प्रभावशालियों की किसी सूची में नहीं है, लेकिन शक्तिशाली बहुत। वह स्वयं 
के लिए कोई सूची नहीं बनवा सकता, वह अभाव में जीता है। दरअसल हम यानी आम 
आदमी यह समझ नहीं पा रहा है कि वह कितना प्रभावशाली है। जिस दिन उसके ज्ञान
 चक्षु खुल जाएंगे वह डेढ़ हजार मुन्नुओं और उनकी पत्नियों से बहुत ज्यादा 
प्रभावशाली हो जाएगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/504849645990984024/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/504849645990984024' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/504849645990984024'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/504849645990984024'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2013/11/blog-post.html' title='अभावशाली मैं'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-9105688086261256117</id><published>2013-07-03T12:22:00.002-07:00</published><updated>2013-07-03T12:22:57.968-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><title type='text'>सालगिरह</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;आज तो जरूर घर में डांट पड़ेगी ही। कोई मुझे बचा नहीं पाएगा। यह सोचता हुआ मैं नियमित समय से करीब एक घंटे देरी से आफिस बाहर निकला। गाड़ी स्टार्ट की तो याद आया कि मोबाइल तो आफिस में ही छोड़ आया हूं। मेरे साथ अक्सर यही होता है, जब भी जल्दी में कोई काम करता हूं तो जल्दी की बजाय देर ही हो जाती है। खैर वापस जाकर मोबाइल लेकर गाड़ी स्टार्ट की और आगे बढ़ चला। गाड़ी की रफ्तार तेज और तेज होती जा रही थी। इसके साथ-साथ विचारों की शृंखला भी दू्रत गति से अनवरत जारी थी। कभी सोचता कि अभी क्या और कैसे करना है तो दूसरी ओर नौकरी को गाली देता जा रहा था। मन में आता था कि या तो करी या फिर&amp;nbsp; न करी। तनख्वाह तो एक दिन आती है, लेकिन उससे पहले ही तन-खा जाती है। ऐसी तनख्वाह से क्या फायदा। धीरे-धीरे खतम हुए जा रहा हूं। बचने का कोई रास्ता फिलवक्त दिख ही नहीं रहा। फिर विचार आया। आज जो कुछ भी कर पा रहा हूं, जो कुछ भी हूं। वह इस नौकरी की वजह से ही तो हूं। इसी से रोजी-रोटी चल रही है। और अगर नौकरी इतनी ही परेशान कर रही है तो क्यों नहीं इसे छोड़ देता। किसी ने पकड़ के तो रखा नहीं है। ये तो मेरी मजबूरी ही है न कि नौकरी किए जा रहा हूं। इसलिए आज तय कर लिया कि नौकरी के लिए कभी भला बुरा नहीं कहूंगा। खैर समय पर तय कर लिया। विचारों की तारतम्यता टूटी, खिड़की से बाहर देखा तो गाड़ी अपने आप वहीं आकर रुक गई थी जहां जाना था। फूलों की दुकान सामने थी। जैसे ही उतरा गीता को फोन आ गया। बोली, कहां हो? इससे पहले कि मैं कुछ जवाब दे पाता बोली, प्लीज झूठ मत बोलना क्योंकि वो आपको बोलना नहीं आता। मैंने कहा, फूल ले रहा हूं आता हूं। गीता बोली, ओह!!! अच्छा लगा यह जानकर कि आपको कम से कम यह याद तो है। अभी कितनी देर और लगेगी? बताया न रास्ते में हूं, जल्दी पहुंच जाउंगा। मैंने इतनी बात की और फोन काट दिया। ज्याद कुछ सुनने के मूड में मैं था नहीं। दुकान पर फूलों का जो सबसे बड़ा गुलदस्ता था वो लिया और आगे बढ़ गया। लेकिन, ये क्या। कुछ देर बाद गाड़ी के ब्रेक अपने आप दब गए। फिर से बाहर देखा तो याद आया कि अच्छा अभी केक भी तो लेना है। बेकरी में गया और आर्डर कर चुका केक जल्दी से पैक करवाया और गाड़ी में लेकर घर की ओर तेजी से गाड़ी बढ़ा दी। खाली सड़कों पर गाड़ी सरपट दौड़ी चली जा रही थी। घर अभी भी कुछ दूर ही है। इसी बीच मन में फिर से विचार कौंधा। शायद कुछ भूल रहा हूं। याद आया गीता के लिए तो कुछ लिया ही नहीं। फिर सोचा, जो लिया है वो उसी के लिए ही तो है। निर्णय लिया कुछ तो ले लेना चाहिए। पास ही एक जनरल स्टोर दिखा तो जाकर एक चाकलेट ले ली। अभी दुकान से बाहर निकल भी नहीं पाया था कि फोन की घंटी फिर बजी। समझ गया कि फोन किसका है। डांट के डर से ये भी नहीं देखा कि मेरी समझ सही है या कि नहीं। गाड़ी आगे बढ़ा दी। सड़कों पर सन्नाटा पसरा होना मेरे लिए फायदेमंद साबित हो रहा था। बस कुछ ही क्षणों में आखिर घर पहुंच ही गया। इससे पहले कि दरवाजे पर घंटी बजाता, गीता ने दरवाजा खोल दिया। उम्मीद के विपरीत, उसने मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत किया। उसके बाद मेरे सीने से लग गई। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा और कमरे की ओर बढ़ गया। अंदर देखा तो पता चला गीता ने पूरे कमरे का लेआउट ही बदल दिया है। कुछ नया करने की आदत के चलते वो अक्सर ऐसा करती रहती है। मैंने पूछा, मैं अपना सामान कहां रखूंगा तो बोली, यहां आप कुछ नहीं रखेंगे, बैडरूम में मैंने अलग जगह बना दी है। अपना जरूरी सामान आज से आप वहीं रखेंगे। मैं सिर हिलाता हुआ बैडरूम की ओर चला गया। वहां पहुंचकर मैं दंग रह गया। उसे भी शानदार ढंग से सजाया गया था। मैंने बाहर आकर पूछा, यह सब क्या किया। वे सिर्फ मुस्कुराकर रह गई और चाभी लेकर गाड़ी से सामान लेने चली गई। जब तक मैं रिलेक्स हुआ वे फूल और केक लेकर आ गई। फूलों को गले से लगाकर उसने मुझे थैंक्यू बोला। अब उसने केक को डिब्बे से निकालकर मेज पर सजा दिया। फूल भी मेज पर सजे रखे थे। उसने मुझे बुलाया और कहा, केक काटिए। मैंने चाकू से केक पर पहला बार किया वैसे ही वह बोली, हैप्पी मैरिज एनीवर्सिरी डियर पापा, शादी की सालगिरह मुबारक हो पापा। खुशी के इस मौके पर बरबस ही मेरे आंसू निकल पड़े। मैंने गीता को गले से लगा लिया। मैंने उसे और उसने मुझे भीगी पलकों से ही केक खिलाया। वहां रखे फूल भी उसने मेरे आंचल में भर दिए। मैंने लाई हुई चाकलेट उसे दी और कहा, बेटा गीता ये तुम्हारे लिए। चाकलेट हाथ में लेकर बोली, आज मेरे कुछ नहीं पापा। आज सब कुछ मम्मी के लिए ही होगा। मेरे लिए कल कुछ लेते आइएगा। बैडरूम में अपनी मां की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई, जैसे कोई भगवान के आगे खड़ा होता है। एक मिनट आंख बंद किए खड़ी रही फिर चाकलेट वहीं रखकर चली आई। मैंने पूछा, तुमने ये सब क्यों किया बेटा? तो बोली, पापा मैंने आपको हमेशा मम्मी और मेरे लिए सब कुछ करते देखा तो क्या मम्मी के बिना आई शादी की पहली सालगिरह मैं ऐसे ही जाने देती। आप और मम्मी हर साल इस दिन को सेलीबे्रट करते थे। मम्मी के जाने के बाद मेरी यह जिम्मेदारी थी कि मैं आपको आज खुशी दूं। मम्मी नहीं हैं तो क्या हुआ, मैं तो हूं। मेरी आंखों से फिर से आंसू बह निकले। सीता की तस्वीर देखकर उसे इतनी अच्छी बेटी देने के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं थे। बस मन गदगद हुआ जा रहा था। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/9105688086261256117/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/9105688086261256117' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/9105688086261256117'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/9105688086261256117'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2013/07/blog-post.html' title='सालगिरह'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-8729048352049683358</id><published>2013-06-16T14:19:00.002-07:00</published><updated>2013-06-16T14:19:54.523-07:00</updated><title type='text'>लोहा दे दो लोहा</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
उन्हें लोहा चाहिए। किसलिए??? लोहा काटने के लिए???? लेकिन वे तो किसी का लोहा मानते ही नहीं। वे खुद को पुरुष नहीं, महापुरुष भी नहीं बल्कि लोहा पुरुष कहलाने में ज्यादा भरोसा रखते हैं। लोहे को काटने के लिए लोहे की ही जरूरत पड़ती है। उन्हें लोहा किस लोहे को काटने के लिए चाहिए। एक लोहा थे, उन्हीं के दल में। उन्हें तो ऐसा काटा कि अब वे मोम भी नहीं रह गए। न तो कोई देख रहा है और न ही पूछ रहा है। वे तो लग गए ठिकाने। अब दूसरा किसे काटने की तैयारी वे कर रहे हैं, यह सवाल खड़ा है। &lt;br /&gt;खैर, लोहा देने वाला भी तैयार हैं। जगह-जगह से आवाज आ रही है कि हमसे लोहा ले लो हमसे। इस ध्वनि का शोर इतना है कि रोज सुबह लोहा-टीन बेचो की आवाज लगाने वाले भी परेशान हैं कि पूरे देश का लोहा जब यही ले लेंगे, तो हमारे लिए क्या बचेगा। रद्दी, अखबार और टीन खरीदकर ही काम चलाना पड़ेगा। लेकिन उससे क्या होगा। जितना मुनाफा लोहे में है, उतना और किसी में नहीं। रोजी-रोटी पर भी संकट आ सकता है। एक स्वर में आवाज उठ रही है, यह आदमी हमारे धंधे की वाट लगाने पर तुला है। अपना काम तो ठीक से करता नहीं। हम रोज कमाने और रोज खाने वालों के लिए सिरदर्दी पैदा कर दी है। यह तय हो गया है कि अगर&amp;nbsp; फिर से इस आदमी ने लोहे की बात भी जुबान से निकाली तो फिर देखो। हम कैसे लोहा लेते हैं। घर-घर जाकर लोहा लेना हमारा तो पुश्तैनी काम है। ये तो अभी बस शुरू ही करने वाले हैं। ये कल का छोरा और अन्य कामों में&amp;nbsp; चाहे जितना माहिर हो, लेकिन लोहा!!!!!!! वो हमसे बेहतर कोई नहीं ले सकता। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/8729048352049683358/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/8729048352049683358' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8729048352049683358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8729048352049683358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2013/06/blog-post_16.html' title='लोहा दे दो लोहा'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-1268255005617766738</id><published>2013-06-13T11:17:00.003-07:00</published><updated>2013-06-13T11:17:19.913-07:00</updated><title type='text'>राजनीति के सौरभ गांगुली</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
उनसे कहा जा रहा है कि कप्तान होते हुए भी वे टीम से बाहर बैठें। टीम में उनकी कोई जरूरत नहीं, लेकिन कप्तान बने रहें। अगर कभी भूले भटके टीम में शामिल हो भी गए तो नॉनस्ट्राइकिंग एंड पर खड़े होकर सिर्फ मैच का मजा लें। लेकिन वे हैं कि मानते ही नहीं। दिल है कि मानता ही नहीं की तरह। उनका कहना है कि टीम इंडिया को बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदाना है। दरअसल टीम इंडिया उन्हीं का दिया हुआ नाम है। इससे&amp;nbsp; पहले भारतीय क्रिकेट टीम बोली जाती थी। उन्हीं ने टीम में वह जोश और जुनून भरा जोकि अब टीम लगातार जीत रही है। इसका के्रडिट कोई और कैसे ले सकता है। उनको याद दिलाया गया 2003 जब टीम फाइनल में पहुंचकर भी विश्वकप नहीं जीत पाई थी। उनका जवाब होता है कि यह क्या कोई कम बात है। कपिल देव के अलावा क्या कोई और कप्तान देश को फाइनल तक में पहुंचा पाया है। समय दीजिए, मौका आने दीजिए जीत कर भी दिखा देंगे। उनका से कहा जा रहा है कि देश के युवाओं को आगे आने दीजिए। तुरंत उनका जवाब आता है, युवाओं का जितना सहयोग मैंने किया है। उतना किसी ने नहीं किया। उदाहरण के लिए वे कुछ नाम भी गिना देते हैं। हरभजन सिंह, युवराज सिंह, वीरेंदे्र सहवाग आदि आदि। उन्हें एक और ऑफर दिया गया। कहा गया कि ठीक है आप टीम के सलाहकार बन जाइए। लेकिन नहीं। वे इसके लिए भी तैयार नहीं। सलाहकार क्या होता है????? जब तक जान में जान है, कप्तान ही रहेंगे। मानेंगे नहीं। ताज्जुब की बात यह है कि जिन डालमियां ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया वही डालमियां अब उनकी कारगुजारियों से परेशान हो गए हैं। उन्होंने भी सोच लिया है, आओ बेटा कर लो जो कुछ करना है, मौका मिला तो ऐसा घपचेटूंगा कि जमाना याद करेगा। &lt;br /&gt;खैर, इसी का नतीजा रहा कि उन्हें बेइज्जत होकर टीम से बाहर होना पड़ा। अब घर-घर इस्तीफा लिए घूम रहे हैं, उसे भी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। सब मना कर रहे हैं। जब उनकी इज्जत नहीं तो इस्तीफे की कौन करे। अंतत: जनता की बेहद मांग पर धौनी को कप्तान बना दिया गया और वे मुंह टापते रह गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/1268255005617766738/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/1268255005617766738' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1268255005617766738'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1268255005617766738'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2013/06/blog-post_13.html' title='राजनीति के सौरभ गांगुली'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-8502671228452673826</id><published>2013-06-13T02:34:00.000-07:00</published><updated>2013-06-13T02:34:12.538-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अपनी बात"/><title type='text'>अपनी बात</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ब्लाग बनाना अपने आप में बड़ा काम है। अगर बना भी लिया तो लिखना बड़ा काम है। और अगर लिख&amp;nbsp; भी लिया तो उसे लगातार लिखना तो बाकई बहुत बड़ा काम है। आप लगातर लिखते रहिए। लेकिन, कहीं एक बार ऐसा हुआ कि आपसे लिखना छूटा तो फिर आप देखेंगे कि फिर से लिखना आप महीनों नहीं सालों बाद भी नहीं कर पाएंगे। कई बार आप इसलिए लिखना छोड़ देते हैं कि आपके पास समय नहीं होता। या फिर कई बार लिखने के लिए भी कुछ नहीं होता। लेकिन कुछ ही दिन बाद आप देखते हैं कि आपके पास ज्यादा नहीं तो कम से कम इतना समय तो है ही कि कुछ लिख सकें। कई बार मौका और दस्तूर देखकर विचार भी आते हैं। कई बार आइडिया भी अच्छा आता है। लेकिन आप लिख नहीं सकते। क्यों??? क्योंकि आप लिखना छोड़ जो चुके हैं। &lt;br /&gt;फेसबुक क्या आया सब तितर-बितर हो गया। मैं अकेला ही ऐसा नहीं&amp;nbsp; हूं जो ब्लाग लिखना छोड़ चुका था। मेरे जैसे न जानें कितने ऐसे लोग हैं। कुछ दिन तो ऐसे भी कटे जबकि लिखता भले नहीं था, लेकिन पढ़ता जरूर था। लेकिन कुछ ही समय बीता था कि अन्य लिखने वाले भी कम हो गए। कम क्या हो गए। शिफ्ट हो गए। बड़ी संख्या में लोग फेसबुक पर चले गए। फेसबुक के फायदे जो अनेक थे। एक बड़ा फायदा तो यह था कि जो व्यक्ति आपसे जुड़ा है उसे आपका लिखा हुआ जरूर दिखेगा। अगर कोई आपके लिखे की तारीफ करना चाहता है और लिखना नहीं चाहता तो लाइक का बटन चटका सकता है। आपको पता चल जाएगा कि उसे आपकी बात अच्छी लगी। ब्लाग के आगमन पर जैसे तमाम रचनाकर पैदा हो गए थे वैसे ही फेसबुक ने भी कई रचनाकार जन्मा दिए। सच्चाई तो यह है कि मैं भी कहीं न कहीं उसी की उपज हूं। मैं किसी अखबार का सम्पादक तो हूं नहीं कि जो बात ब्लाग पर लिखूं वह अपने अखबार के सम्पादकीय में चिपका लूं। और न ही किसी टीवी चैनल का प्राइम टाइम एंकर कि एक घंटे बहस करे। कुछ पत्रकार बिठा ले, कुछ पार्टी के नेताओं और प्रवक्ताओं को बिठा लूं और लगूं ज्ञान बांचने। उसमें से जो भी लब्बोलुआब निकले वह कहीं छपने&amp;nbsp; के लिए भेज दूं।&lt;br /&gt;हम पत्रकारों के साथ बड़ा संकट पहचान का होता है। प्रिंट मीडिया में यह संकट और भी गहरा जाता है। टीवी पर शाम को आपका चेहरा किसी अच्छे चैनल पर दो बार दिखा नहीं कि आप बड़े पत्रकार हो जाते हैं। जनता मान लेती है कि&amp;nbsp;&amp;nbsp; आप बहुत बड़े ज्ञानी हैं। प्रधानमंत्री वहीं करता है जो आप कहते हैं। भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान आपके टीवी प्रोग्राम को देखकर ही यह तय करता है कि अंतिम ग्याहर कौन हों, आदि, आदि। हम डेस्क वालों का संकट सबसे विचित्र है।&amp;nbsp; रिपोर्टर का नाम भी किसी अखबार में चार-छह बार छप जाए तो एक क्षेत्र विशेष के लोग जरूर आपको जानने लगते हैं। चेहरे से सही नाम ही काफी है। लेकिन डेस्क वाले को शायद ही कोई जानता हो। कम ही लोग जानते हैं कि जो कुछ भी अखबार में सुबह छपता है वह आपने कितनी मेहतन से बनाया, सजाया और संवारा है। नाम भले ही रिपोर्टर का छप रहा है, लेकिन उसमें बड़ा योगदान आपका भी है। आप बाहर बताते रहिए कि साहब मैं फलां अखबार में हूं। कोई नहीं मानता। कई बार तो स्थितियां ऐसी भी आईं कि कहीं गया और बताया कि मैं फलां जगह हूं। तो सामने वाले ने मुझसे जूनियर रिपोर्टर को फोन करके तस्दीक की कि मैं सही हूं या नहीं। &lt;br /&gt;तो कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि ब्लाग और फेसबुक ने इस संकट को काफी हद तक दूर किया था। लेकिन इसमें भी शर्त यह है कि&amp;nbsp; आप लगातार लिख रहे हैं कि नहीं। आप लाख अच्छा लिखते हों। आपकी शैली में कितना भी फ्लो हो। आपने लिखना छोड़ा नहीं कि&amp;nbsp; आप गए। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे इस बारे में यूं ही बात की और कहा कि तुम्हारा ब्लाग काफी रिच हो गया है उसे लिखना क्यों नहीं जारी रखते। लिखने की बात तो बहुत दिन से सोच रहा था लेकिन बात वही कि मुहूर्त नहीं निकल पा रहा था। उन्होंने कहा था कि अब और कुछ करने का समय तो निकल चुका है, जो कुछ लिख दोगे वही बचेगा। उनकी बात मानते हुए आज फिर से ब्लाग का श्रीगणेश कर रहा हूं। कोशिश यही करूंगा कि हर चार-छह दिन पर कुछ न कुछ लिखता रहूं। आपको पसंद आए या फिर न आए। वैसे भी ऐसा कुछ लिखने में तो समय लगेगा जो सबको पसंद आए, फिर भी कोशिश जारी रहेगी। आज ज्यादा कुछ न लिखते हुए सिर्फ अपनी बात लिख रहा हूं। देखते हैं कितने लोग इस पसंद करते हैं. . . . . . . &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/8502671228452673826/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/8502671228452673826' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8502671228452673826'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8502671228452673826'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2013/06/blog-post.html' title='अपनी बात'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-3892854310847336816</id><published>2011-06-07T11:57:00.001-07:00</published><updated>2011-06-07T11:59:44.090-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग्य"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज"/><title type='text'>बाबा के बहाने...</title><content type='html'>भई कमाल हो गया...  क्या कहूं? और क्या लिखूं? बात से चली थी और कहां पहुंच गई? जिसने चलाई थी उसे भी नहीं पता। चार-पांच जून की रात में बाबा और सरकार के बीच ऐसा कुछ हुआ कि क्या से क्या हो गया। कभी बाबा और बाबा के लोग बोलते हैं तो कभी सरकार और सरकारी लोग। इसके अलावा लगता है देश के लोगों ने बोलने का अधिकार खो दिया है। वह बोल नहीं सकता वह बस सुन सकता है। वह भी चुपचाप।&lt;br /&gt;वैसे देखा जाए तो अच्छा ही हुआ। देश के पास बहुत दिनों से कुछ था भी नहीं। कुछ होना भी तो चाहिए न... कुछ न होना बहुत दु:ख देता है। और कुछ हो जाना खुशी दे जाता है। सरकार की लाठियां भले बाबा और बाबा के भक्तों पर पड़ीं हों लेकिन इससे बहुत सारे लोग खुश हो गए। नेताओं को बोलने का मौका मिल गया। लोगों को बेवकूफ बनाने का एक और अवसर उन्हें बस बैठे बिठाए ही मिल गया। चुंकि मैं राजनीति पर नहीं लिखता और यह राजनीतिक ब्लॉग भी नहीं है इसलिए इस विषय को विस्तार नहीं दूंगा यही पर फुलस्टाप।&lt;br /&gt;साल महीने में कुछ ही ऐसे मौके आते हैं जब सबकी जुबां और कलम पर एक ही विषय हो... ये उन्हीं में से एक है। अखबारों में सर्वज्ञ पत्रकार लेख लिखकर अपनी ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। इसी बहाने लोगों को पता चलेगा कि वह अपनी सक्रिया हैं, शांत नहीं हुए। संपादकीय लिखे जा रहे हैं। वैसे तो संपादकीय निष्पक्ष होना चाहिए लेकिन बाबा के मामले में ऐसा नहीं है। दो तरह के संपादकीय लिखे जा रहे हैं। यह बताने की जरूरत नहीं कि वे दो प्रकार कौन से हैं। इधर देख रहा हूं कि ब्लॉगों पर भी हर व्यक्ति अपनी अपनी तरह से अपना दृष्टिकोण रख रहा है। बहुत से मृतप्राय: पड़े ब्लॉगर भी जाग उठे हैं, आखिर इससे बेहतर मौका और कौन सा मिलेगा की-बोर्ड को तकलीफ देने के लिए। इसी बहाने उसकी धूल भी कुछ साफ हो जाएगी और ब्लॉग एक बार फिर जिंदा हो जाएगा। पूरा देश दो धड़ों में बंटा हुआ है, एक बाबा के साथ है तो दूसरा उनके विरोध में है। बहुत से लोग बाबा का पुलता जला रहे हैं उनमें मैंने ऐसे लोग भी देख जो अक्सर बाबा के दवाखाने पर दिख जाते थे। अब वही बाबा का पुतला जला रहे हैं।&lt;br /&gt;खैर.. भला हो बाबा का जो उन्होंने एक मुद्दा तो दे ही दिया, अब करो बहस। चाय की दुकान हो या अखबार का स्टॉल। हर जगह बस एक ही बात। अखबारों का प्रसार भी बढ़ गया है, टीवी पर दिनभर एक ही खबर देखने के बाद भी लोगों का मन वही बात अखबार में फिर से पढऩे का होता है। मुझसे क्या??? बाबा के बहाने मुझे भी एक मौका मिल गया सो ब्लॉग अपडेट हो गया। शुकिया बाबा।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/3892854310847336816/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/3892854310847336816' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/3892854310847336816'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/3892854310847336816'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2011/06/blog-post_07.html' title='बाबा के बहाने...'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-8740775335547304305</id><published>2011-05-25T12:38:00.000-07:00</published><updated>2011-05-26T06:09:42.464-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग्य"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज"/><title type='text'>मैं भी जेल चला जाऊं</title><content type='html'>इन दिनों दिमाग बड़ा विचार मंथन कर रहा है। कभी कुछ सोचता है तो कभी कुछ। आखिर उसका काम ही यही है, सो करेगा ही। वैसे इन दिनों पूरा देश और दुनिया किसी न किसी बात को लेकर विचार मग्न है। हो भी क्यों न आखिर हो भी तो ऐसा ही कुछ रहा है।&lt;br /&gt;आईपीएल अपने अंतिम दौर में है और अब कुछ गिनी चुनी टीमें ही रह गई हैं। इन्हीं में से कोई टीम विजेता बनेगी। टीवी के खेल पत्रकार और उसमें आने वाले तथाकथित विशेषज्ञ अपने-अपने हिसाब से बता रहे हैं कि कौन जीतेगा और क्यों। एक बहुत बड़े ज्योतिषी ने दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणी कर दी। तारीख निकल गई लेकिन दुनिया जस की तस है और दुनियादारी चल रही है। दुनिया खत्म हो जाती तो कोई पूछने वाला ही नहीं रहता लेकिन वाह री दुनिया खत्म ही नहीं हुई। अब तो लोग पूछेंगे ही। सवाल करेंगे ही। कुछ तो लोग कहेंंगे...., सो कहे जा रहे हैं। ज्योतिषी साहब भी कहां पीछे रहने वाले हैं, एक और तारीख बता दी। करो तब तक इंतजार। देखते हैं क्या होता है। ज्योतिषी और वैज्ञानिक इसी चक्कर में अपने दिमाग पर जोर दे दे कर थके जा रहे हैं। ओसामा बिन लादेन मर गया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गया सवालों का अंबार। लोग तरह-तरह के सवाल कर रहे हैं और विशेषज्ञ उसके जवाब भी दे रहे हैं। इसी बीच मुल्ला उमर के मारे जाने की खबर आई। कोई कह रहा है वह मारा गया, कोई कह रहा  है वह जिंदा है। इस पर भी लोग मगजमारी कर रहे हैं। पता कर लो तो जानें।&lt;br /&gt;भारत में इन दिनों एक और मामले पर दिमाग पर जोर डाला जा रहा है। भ्रष्टाचार के आरोपी जेल जा रहे हैं। कई बड़े लोग जेल में है और कई बाहर। टीवी पर विशेष कार्यक्रम आ रहे हैं और अखबारों में खास रपटें और टिप्पणी लिखीं जा रही हैं कि अंदर वाला कब तक अंदर रहेगा और बाहर वाला कब अंदर जाएगा। बाहर वाले लोग यह सोच-सोचकर दिन काट रहे हैं पता नहीं कब भीतर जाना पड़े।&lt;br /&gt;मेरे विचार मंथन का कारण इसमें से कोई नहीं है। मेरा कारण यह है कि क्यों न मैं भी जेल चला जाऊं। दरअसल इन दिनों दिल्ली की तिहाड़ जेल में इतने बड़े-बड़े लोग हैं कि दिल है कि मानता ही नहीं....। जब से कनिमोझी उर्फ कनिमोई उर्फ कनिमोणी जेल गई हैं तब से मैं विचलित सा हुआ जा रहा हूं। मुझ जैसा साधारण आदमी खुली हवा में तो ऐसे बड़े लोगों से मिल पाने में समर्थ है नहीं। वहीं एक मौका बन सकता है। क्यों न उसे लपका जाए। हूं तो पेशे से पत्रकार ऐसे में कहा जा सकता है कि पत्रकारों के लिए ऐसे लोगों से मिलने मेें भला क्या समस्या। लेकिन समस्या है, साहब...। जब नीरा राडिया जैसी हस्तियां माध्यम (मीडियम) का रोल निभाने लगती हैं तो मेरी संभावना और भी नगण्य हो जाती है।&lt;br /&gt;भला आप ही बताइए, क्या सेक्स रैकेट चलाने वाली देश की नामी कॉल गर्ल ने कभी सोचा होगा कि करुणानिधि की पुत्री उनके साथ रात गुजारेंगी। यही नहीं ऐसा भी मौका आएगा जब वह खुद अपने हाथों से कनिमोई के आंसू पोछेगी। मुझे तो नहीं लगता। राजा हों या कलमाड़ी। लोग उन्हें पूरे मन से गालियां दे रहे हैं। लेकिन मैं नहीं देता। मैं तो उनकी मुस्कुराहट पर फिदा हूं। जब भी टीवी पर उनकी तस्वीर दिखाई जाती है दिल खुश हो जाता है। वही मुस्कुराता हुआ, दिल खिलाता हुआ मेरा यार...। लगता है जिंदगी कैसे जी जाती है कोई इनसे सीखे। कोई कहे कहता रहे कितना भी इन्हें भ्रष्टाचारी, इन लोगों की ठोकर में है ये जमाना....। मैं चाहता हूं कि कोर्ट कुछ और दिन इनकी जमानत की अर्जी स्वीकार न करे साथ ही कुछ और लोगों को भी तिहाड़ पहुंचाने की जुगाड़ करे। तब तक मैं कोई न कोई ऐसा काम कर ही दूंगा कि उनके पास तक पहुंच जाऊं। और फिर कौन सा जीवनभर जेल में ही रहना है। कुछ दिन की ही तो बात है। बाहर आकर फिर सब ठीक ही हो जाएगा। फिर पत्रकारिता भी धड़ल्ले से चलेगी और राजनीति भी। अब यह सोच रहा हूं कि कौन सा ऐसा काम करूं जो तिहाड़ में जगह मिल &lt;span&gt;जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनश्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां... अगर तिहाड़ में जगह न मिले तो मुंबई की येरवडा जेल में भेज दिया जाए। सुना है वहां अतिथि देवो भव का भाव बहुत है। हो सकता है कुछ दिन वहां रहकर कुछ सेहत ही ठीक हो जाए। और एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की शख्सियत से मिलने का मौका भी तो मिलेगा। फिर मैं भी अंतरराष्ट्रीय हो जाऊंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/8740775335547304305/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/8740775335547304305' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8740775335547304305'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8740775335547304305'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2011/05/blog-post_25.html' title='मैं भी जेल चला जाऊं'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-7704739575232905751</id><published>2011-05-09T11:55:00.000-07:00</published><updated>2011-05-09T11:58:37.559-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खेल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग"/><title type='text'>इंडियन पल्टन लीग और अपने चंडीदास</title><content type='html'>मेरे मोहल्ले में इन दिनों सब पर क्रिकेट का जुनून सवार है। विश्व कप जीतने के बाद तो ऐसा लग रहा है मानो हर कोई अपने बच्चे को क्रिकेटर ही बना कर छोड़ेगा। बहुत संभव है कि आने वाले कुछ साल बाद देश में डॉक्टर, इंजीनियर, पुलिस अधिकारी और सेना के जवान कम पड़ जाएं। जब सभी बच्चे क्रिकेटर बन जाएंगे तो अन्य काम कौन करेगा। बड़ा सवाल है। वैसे अन्य पेशों की तरह पत्रकारों की जमात भी कम हो जाएगी। इससे मुझे प्रत्यक्ष रूप से फायदा होगा। जब नए लोग नहीं आएंगे तो मीडिया संस्थानों को पुराने पत्रकारों से ही काम चलाना पड़ेगा। मेरी अपनी नौकरी पर खतरा नहीं रहेगा यह एक अच्छी खबर है।&lt;br /&gt;खैर इन सब बातों से दूर चलते हैं अपने मोहल्ले के क्रिकेट पर। तो मैं कह रहा था कि मेरे मोहल्ले में इन दिनों सब कोई क्रिकेट के रंग से सराबोर हुुआ जा रहा है। मोहल्ले में पिछले चार साल से क्रिकेट की एक प्रतियोगिता होती है। तीन साल तक इसमें आठ टीम हुआ करती थीं। इस साल दस टीम इसमें हिस्सा ले रही हैं। नाम रखा गया है, आईपीएल। नहीं... नहीं... आप गलत समझे..इसका मतलब है, इंडियन पल्टन लीग। इस प्रतियोगिता की खास बात यह है कि इसमें मोहल्ला या अन्य किसी प्रकार का गतिरोध नहीं होता। किसी भी मोहल्ले का व्यक्ति किसी भी मोहल्ले की टीम से खेल सकता है। उसे पैसा मिलेगा और शोहरत भी। इसलिए इसे नाम दिया गया इंडियन पल्टन लीग। इस बार टूर्नामेंट की  खास बात यह है कि पिछले तीन साल से एक टीम के कप्तान रहे चंडीदास को इस बार किसी ने अपनी टीम में भर्ती नहीं किया। टूर्नामेंट जब आधे से अधिक हो गया तो चंडीदास के एक पुराने मित्र ने किसी तरह उन्हें टीम में शामिल कराया। चंडीदास की पत्नी मोना का कहना है कि पहले चंडी के साथ खेलते रहे रमेश जब अभी तक खेल सकते हैं और एक टीम की कप्तानी कर सकते हैं तो चंडी क्यों नहीं खेल सकते। बड़ी बात यह है कि चंडी के मित्र ने चंडीदास को टीम में शामिल तो करा लिया लेकिन मैदान पर नहीं उतार सके। चंडीदास के टीम में शामिल होने के बाद पिछले दिनों जब उनकी टीम मैदान में उतरी को चंडीदास टीम की जर्सी पहनकर बजाय रन या विकेट लेने के तालियां बजा रहे थे। लोग यह समझ पाने में अपने आप को असमर्थ पा रहे थे कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो चंडीदास मैदान पर नहीं उतरे। टूर्नामेंट अब उस दौर में पहुंच जबकि चंडीदास की टीम कभी भी टूर्नांमेंट से बाहर हो सकती है। चंडीदास पहले भी जिस टीम के कप्तान थे वह भी लगातार हार रही थी। इस बार वही टीम अच्छा प्रदर्शन कर रही है। अब चंडीदास खेलकर क्या दिखाना चाह रहे हैं। यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है।&lt;br /&gt;वैसे एक बात तो हैं चंडीदास के फैन बहुत हैं। मैं भी उनमें से एक हूं, लेकिन अब सवाल यही है कि अगर चंडीदास न ही खेलते तो ही ठीक था। खेलकर कहीं अपने पुराने प्रशांसकों को चंडीदास खो न दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनश्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास और चुनौती स्वीकार करने की आदत कब उसकी हठ और घमंडी स्वभाव को दर्शने लगता है। यह अच्छी तरह अब मेरी समझ में आ रहा है।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/7704739575232905751/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/7704739575232905751' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/7704739575232905751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/7704739575232905751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2011/05/blog-post_09.html' title='इंडियन पल्टन लीग और अपने चंडीदास'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-1634416881714369113</id><published>2011-05-04T11:55:00.000-07:00</published><updated>2011-05-04T11:57:35.101-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आतंक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यंग"/><title type='text'>बेगाने की शादी और अब्दुल्ला की दीवानगी</title><content type='html'>पता नहीं अब्दुल्ला कौन था और वह बेगाना कौन था जिसकी शादी होने पर वह दीवाना सा घूम रहा था। यह किस युग की बात है यह भी मैं नहीं जानता। लेकिन पिछले तीन चार दिन से अब्दुल्ला टाइप कुछ शख्स मेरे मोहल्ले में दिख रहे हैं।&lt;br /&gt;दरअसल हुआ कुछ यूं है कि मेरे घर से कुछ दूरी पर रहने वाले एक शक्तिशाली युवक की भैंस पिछली गली में रहने वाले एक युवक ने खोल ली थी। इससे पूरा मोहल्ला दंग और हतप्रभ रह गया। किसी ने इस प्रकार की कल्पना तक नहीं की थी कि ऐसी भी कोई घटना हो जाएगी। लेकिन हो गई तो हो गई। खास बात यह रही कि जिसने भैंस खोली थी वह कोई हल्का पुल्का शख्स नहीं था। दूर-दूर तक उसकी ख्याति थी। कई लोगों से उसके अच्छे संबंध थे। बड़ी बात यह कि भैंस खोल लो और किसी को पता भी न चले यह विद्या उसे उसी ने सिखाई थी जिसकी भैंस इस बार खोली गई है। अब चेला ही गुरु को मात दे दे यह कोई भला कैसे बर्दाश्त करेगा। तो साहब इनको भी नहीं हुआ। उसी दिन कसम खाई कि बदला तो लेकर रहूंगा चाहे जितना वक्त लग जाए। भैंस का मालिक बदल गया लेकिन बदला लेने की भावना अभी बाकी रही। भैंस खोलने वाला तो भैंस खोलने के बाद ग्यारह-बारह-तेरह (नौ दो ग्यारह से आगे बढ़कर) हो गया लेकिन बेचार पीडि़त जगह जगह उसकी तलाश करता रहा। कई बेकसूरों को भी उसने अपनी शक्ति का शिकार बना डाला। लेकिन आरोपी नहीं मिला। इस बीच कई लोगों को शक हुआ कि अब्दुल्ला का पड़ोसी कहीं आरोपी को शरण तो नहीं दे रहा है। उसका घर भी पीडि़त से काफी दूर है, इसलिए शक और गहरा गया। लेकिन पड़ोसी डंके की चोट पर कह रहा था कि उन्होंने किसी प्रकार अपराध के आरोपी को अपने यहां शरण नहीं दी है। हालांकि अब्दुल्ला कई बार यह कह चुका था कि हमारे पास सबूत तो नहीं हैं लेकिन लगता यह है कि इसी अपराध का आरोपी नहीं बल्कि उसके यहां जो बकरियां चोरी हुईं थी उसके आरोपी भी यहीं रह रहे हैं। हालांकि इस बीच अब्दुल्ला रेडियो पर क्रिकेट की कॉमेंट्री सुनाने के लिए पड़ोसी को जरूर बुलाता था। इसका कारण यह भी था उसे पूरे मोहल्ले में दिखाना था कि वह अपने पड़ोसी से अच्छे संबंध रखना चाहता है वह तो पड़ोसी ही है जब नहीं तब बकरियां और मेमने चुरा ले जाता है। अब्दुल्ला के घर की खूबसूरत बगिया के एक पेड़ पर भी पड़ोसी ने कब्जा कर लिया था, लेकिन अब्दुल्ला अपमान का घूंट पीकर रह गया लेकिन कुछ नहीं कहा और न ही किया। अब्दुल्ला अक्सर उस भैंस चोरी के पीडि़त से जरूर कहा था कि वह उसके पड़ोसी पर नकेल कसे। उसके इरादे ठीक नहीं लग रहे। अब भला उसे क्या पड़ी की वह तुम्हारी बकरियां और मेमनों के लिए किस से पंगा ले। सो उसने नहीं किया।&lt;br /&gt;घटना में उस समय बड़ा परिवर्तन आया जब पीडि़त को पता चला कि भैंस चोरी के आरोपी अब्दुल्ला के पड़ोस में ही रह रहा है। फिर क्या था आब देखा न ताब और खबर पक्की करके उसने अपनों नौकरों से कह दिया कि चढ़ाई कर दो अब्दुल्ला के पड़ोसी पर। लेकिन पड़ोसी को न तो खबर हो और न ही कोई नुकसान। बस हो गया काम। भैंस चोरी करने के आरोपी वहीं मिल गए और पकड़ कर कर दिया उनका काम तमाम। जब अब्दुल्ला को यह पता चला कि फलां व्यक्ति ने उसके पड़ोस में छापा मार कर अपनी भैंस चुराने वालों से बदला ले लिया तब से वह नाच रहा है। वह कहता फिर रहा है कि हम कहते थे न कि  भैंस चोरी के आरोपी यही रहते हैं। वह पटाखे छुड़ा रहा है, जश्न मना रहा है। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि उस भैंस चोरी के आरोपी ने कभी भी अब्दुल्ला को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया। यह बात अलग है कि उस आरोपी के नक्शे कदम पर चलने वालों ने भले अब्दुल्ला की बकरियां, भेंडें और मेमने खोल लिए थे। अब अब्दुल्ला कह रहा है कि हमारे यहां चोरी करने के आरोपी भी यहीं रहते हैं उन्हें भी पकड़ो, लेकिन किसी को क्या पड़ी। अब्दुल्ला के बच्चे दूसरों से पूछ रहे हैं कि क्या कभी अब्दुल्ला भी इतनी हिम्मत कर पाएगा कि पड़ोसी के घर में घुसकर अपने घर में अपराध करने वालों को पकड़ सके या मार सके। कुछ भी हो अब्दुल्ला के घर में जो भी टीवी चैनल चल रहा है उसमें खुशी का ही इजहार है। ऐसा लग रहा है जैसे अब्दुल्ला के घर इन तीन चार दिनों में कुछ हुआ ही नहीं। अखबार में भी इसी बात का जिक्र है।&lt;br /&gt;अब बताइए भला। इस पूरे घटनाक्रम से अब्दुल्ला को क्या मिला। क्यों खुशी से पगलाया जा रहा है वह। मुझे तो समझ नहीं आ रहा। पता नहीं अब्दुल्ला कब अपने बकरियों और मेमनों को चोरी करने के आरोपी अपने पड़ोसी पर हमला करता है... करता भी है या नहीं..</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/1634416881714369113/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/1634416881714369113' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1634416881714369113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1634416881714369113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='बेगाने की शादी और अब्दुल्ला की दीवानगी'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-8271394270541032053</id><published>2011-02-22T11:23:00.000-08:00</published><updated>2011-02-22T11:25:15.995-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खेल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विश्वकप"/><title type='text'>खेल के लिए शुभसंकेत</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg1PcphyphenhyphenyillB1soQOB06ER7janKbNWiyIlLIWYi3j4nNX6W_rSE6ifXeox0S1LRM8HP1MMD1MJFEHSjqK87_0rSD3C__LuYCFvUGKhftVThBKrEiDOmgZnOOhuapATMHwzlasPrKXnC7vC/s1600/world_cup_logos.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 320px; height: 320px;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg1PcphyphenhyphenyillB1soQOB06ER7janKbNWiyIlLIWYi3j4nNX6W_rSE6ifXeox0S1LRM8HP1MMD1MJFEHSjqK87_0rSD3C__LuYCFvUGKhftVThBKrEiDOmgZnOOhuapATMHwzlasPrKXnC7vC/s320/world_cup_logos.jpg&quot; alt=&quot;&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5576596821071756354&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार इंग्लैंड ने नीदरलैंड को हरा दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जीत जीत है। कहने को कहा जा सकता है कि जीत आखिर जीत होती है चाहे जैसे प्राप्त की जाए। यह सही भी है। अंत में येन केन प्रकारेण हासिल की गई जीत ही मायने रखती है।&lt;br /&gt;अब जरा इस जीत और हार का विश्लेषण कर लिया जाए। नीदरलैंड हार भले ही गया हो पर यह सच है कि उसने सबका मन मोह लिया और 100 ओवर के मैच में कई बार ऐसा लगा कि वह मैच जीत भी सकता है। दीगर है कि क्रिकेट का कम अनुभव और अक्सर इस तरह की स्थिति न आने के कारण ही नीदरलैंड को इस हार का सामना करना पड़ा। लेकिन इस बीच यह तय हो गया है कि नीदरलैंड आने वाले मैचों में अन्य टीमों को कड़ा मुकाबला देगी और इतनी आसानी से किसी को जीतने नहीं देगी जितना आसान शिकार उसे अब तक समझा जा रहा था।&lt;br /&gt;एक दिन पहले ही हुए एक और मैच ने क्रिकेट के लिए आशाएं जगाने का काम किया है। यह मैच जिम्बाब्बे और आस्ट्रेलिया के बीच खेला गया। इसमें जिम्बाब्बे ने आस्ट्रेलिया की नाक में दम कर दिया था। लग ही नहीं रहा था एक दोयम दर्जे की टीम विश्वविजेता के खिलाफ खेल रही है। न सिर्फ विश्वविजेता बल्कि तीन बार की विश्वविजेता। जिस अंदाज में आस्टे्रलियाई कप्तान रिकी पोटिंग को चाल्र्स कोवेंट्री ने सीमा रेखा से गेंद फेंक कर रनआउट किया वह लम्बे समय तक याद रखा जाएगा। सबसे बड़ी बात जो इस बार अभी तक के मुकाबलों में छोटी टीमों की ओर से देखने को मिल रही है वह यह है कि वे जीतने के लिए खेल रही हैं। चाहे बांग्लादेश को या जिम्बाब्बे और नीदरलैंड का तो कहना ही क्या। यह बात अलग है कि कनाडा न्यूजीलैंड का आसान शिकार रहा। लेकिन यह तय है कि अगर कनाडा कि खिलाड़ी सजग और सचेत रहे तो वे भले कोई मैच न जीतें पर इस टूर्नांमेंट से बहुत कुछ लेकर जाने वाले हैं। कई क्रिकेट विश्लेषक टीवी पर कहते और अखबार में लिखते मिल जा रहे हैं, जो कह रहे हैं कि छोटी और दोयम दर्जे की टीमों को विश्वकप में नहीं खिलाना चाहिए। लेकिन मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पहले की क्रिकेट बहुत कम देशों के बीच खेला जाता है और उसमें भी अगर कुछ कमजोर टीमों को आप खेलने से बंचित कर देंगे तो कैसा विश्वकप। कुछ गिनी चुनी टीमें ही रह जाएंगी। फिर क्रिकेट अंतरराष्ट्रीय स्तर का खेल कैसे बन पाएगा। मुझे लगता है यह विचारणीय पहलू है। यही नहीं जब तक छोटी टीमें बड़ी टीमों से बड़े मुकाबले नहीं खेलेेंगी तब तक जीत के बारे में कैसे सोचेंगी। क्रिकेट जहां भी खेल और देखा जाता है वहां दीवानगी हद से ज्यादा लोग इसे प्यार करते हैं, लेकिन यह आलम बहुत कम देशों तक ही हैं। क्योंकि इसका उतना विस्तार नहीं हो सका जितना अन्य का हुआ है। इसलिए मुझे लगता है कि छोटी टीमों को भी बड़े मुकाबले खेलने चाहिए और अपनी प्रतिभा मुजायरा करना चाहिए।&lt;br /&gt;अब तक हुए मैचों में जो तस्वीर निकलकर सामने आ रही है वह संतोषजनक है और उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे भी कुछ ऐसे मुकाबले देखने को मिलेंगे जिसमें छोटी टीमें बड़ी टीमों की नाक में दम कर देंगी। और सबसे ज्यादा मजा तो उस वक्त आएगा जब कोई बड़ा उलटफेर होगा। न जाने किस दिन किसी छोटी टीम का हो और वह ऐसा कर जाए कि किसी ने सोचा ही न हो। उसके बाद विश्वकप की दिशा और दशा दोनों में तत्काल बदलाव आ जाएगा। फिर आएगा खेल देखने का मजा...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/8271394270541032053/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/8271394270541032053' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8271394270541032053'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/8271394270541032053'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2011/02/blog-post_22.html' title='खेल के लिए शुभसंकेत'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg1PcphyphenhyphenyillB1soQOB06ER7janKbNWiyIlLIWYi3j4nNX6W_rSE6ifXeox0S1LRM8HP1MMD1MJFEHSjqK87_0rSD3C__LuYCFvUGKhftVThBKrEiDOmgZnOOhuapATMHwzlasPrKXnC7vC/s72-c/world_cup_logos.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-3875965742649659693</id><published>2011-02-19T11:16:00.000-08:00</published><updated>2011-02-19T11:19:21.908-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खेल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विश्वकप"/><title type='text'>आगाज, चौका, छक्का और जीत</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh1yafI2xyFWzk-IVzUjLBj2z7gZQt2Tz1h1Vfd7-IWxM_nHwV3zCJWOeDwvQDd9vqoY_Vl3NRo9_trprzYgENz1PKc8z7g0NERGynbVti__rqJVGM54RNcuQUEWrNaGJAysHUPuYPlkSqx/s1600/sahvag.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 320px; height: 248px;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh1yafI2xyFWzk-IVzUjLBj2z7gZQt2Tz1h1Vfd7-IWxM_nHwV3zCJWOeDwvQDd9vqoY_Vl3NRo9_trprzYgENz1PKc8z7g0NERGynbVti__rqJVGM54RNcuQUEWrNaGJAysHUPuYPlkSqx/s320/sahvag.jpg&quot; alt=&quot;&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5575481687087390706&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वकप का पहला मैच भारत ने जीत लिया। इस जीत में कई नई और अनोखी चीजें देखने को मिलीं। भारत की पारी जब ३७० रन पर खत्म हुई तो भारत की जीत पक्की हो गई थी, लेकिन जब बांग्लादेश के शेर मैदान पर उतरे तो लगा कि कहीं पांसा पलट न जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मैच भारत ही जीता।&lt;br /&gt;इस मैच की खास बात यह रही कि भारत के वीरेंद्र सहवाग ने पहली गेंद का सामना किया और उस पर चौका जड़कर अपने विजयी अभियान की शुरुआत की। यही नहीं वीरेंद्र सहवाग ने ही इस विश्वकप का छक्का लगाया। सहवाग की वह बल्लेबाज रहे जिन्होंने इस विश्वकप का पहला शतक लगाया। हालांकि इसके बाद विराट कोहली ने भी शतक लगाया। इस मायने में आगे रहे कि उन्होंने विश्वकप के अपने पहले ही मैच में शतक लगा दिया। जो अपने आप में अनोखी बात है।&lt;br /&gt;इस मैच में एक खास मंजर उस समय देखने को मिला जब सहवाग आंशिक रूप से घायल हो गए और गंभीर उनके रनर के रूप में मैदान पर आए। उस समय बांग्लादेश के मीरपुर के मैदान पर दिल्ली के तीन खिलाड़ी दिखाई दिए। इस दौरान तीनों हिन्दी वाली हिन्दी में बात करते भी सुने गए। ऐसा मौका कम ही आता है जब एक ही शहर के तीन खिलाड़ी मैदान पर दिखें।&lt;br /&gt;सहवाग ने विश्वकप शुरू होने से पहले ही यह बता दिया था कि वे पूरे ५० ओवर मैदान पर टिकना चाहते हैं और इस बार उन्होंने इसके लिए प्रयास भी खूब किए। यह बात दीगर रही कि वे ४८वें ओवर में ही आउट हो गए। लेकिन इससे यह बात साफ हो गई है कि सहवाग अपने कहे पर अमल कर रहे हैं और यह विश्वकप उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है। उनकी चाहत है कि इस विश्वकप में वे अपने गुरु सचिन को तोहफा दें। जब सचिन रन आउट हुए तभी से लगा कि उन्होंने सचिन की जिम्मेदार अपने ऊपर ओढ़ ली है। पता ही नहीं चला कि सचिन आउट  हो गए हैं। कई विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि अगर सहवाग पूरे पचास ओवर मैदान पर टिकेंगे तो अपना स्वाभाविक खेल नहीं खेल पाएंगे सहवाग ने इस पारी से दिखा दिया कि ऐसा नहीं है। जब तक वे क्रीज पर रहेंगे रन आते रहेंगे और तेजी से आते रहेंगे। अब मुझे लगाता है ऐसे लोगों शान्त हो जाना चाहिए।&lt;br /&gt;अब बात जीत और हार की। एक बात गौर करें तो पाएंगे कि बांग्लादेश भले हार गया हो लेकिन उन्होंने यह दर्शा दिया है कि आगे जिन टीमों से उनका मुकाबला होगा वे सचेत हो जाएं। अगर कोई बांग्लादेश को हल्के में ले रहा है तो वह किसी मुगालते में न रहे। हालांकि इस बीच एक और बात सामने आई कि भारत को यहां गेंदबाजी में सुधार की जरूरत है।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/3875965742649659693/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/3875965742649659693' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/3875965742649659693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/3875965742649659693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2011/02/blog-post_19.html' title='आगाज, चौका, छक्का और जीत'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh1yafI2xyFWzk-IVzUjLBj2z7gZQt2Tz1h1Vfd7-IWxM_nHwV3zCJWOeDwvQDd9vqoY_Vl3NRo9_trprzYgENz1PKc8z7g0NERGynbVti__rqJVGM54RNcuQUEWrNaGJAysHUPuYPlkSqx/s72-c/sahvag.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-6223563003599423052</id><published>2011-02-18T03:26:00.000-08:00</published><updated>2011-02-18T10:58:22.079-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विश्वकप"/><title type='text'>लो! शुरू हो गया खेल</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg_rjunKxU84d6J0djetc6mVT741pC2YAw0Sd9puf2bHp7nj694jcXVORkOx6FNk_4lyyzKcL6GiQIFzhfN1rj4drvqRY-DxUh6Nn8t6rad0t-SguyaayhXe_uwZD_haKXjqQaOA7VXJw-K/s1600/ICC-Cricket-World-Cup-2011-Opening-Ceremony-LIVE-and-HIGHLIGHTS-17-2-2011-at-Dhaka-1-300x220.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 315px; height: 229px;&quot; 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या फिर अक्सर आते हैं फिर भी उन सीमित लोगो से ही मैं माफी चाहता हूं और अब यह आशान्वित कराना चाहता हूं कि अब विश्वकप क्रिकेट ही हर खबर इस ब्लॉग के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा।&lt;br /&gt;अब बात क्रिकेट की। विश्वकप क्रिकेट की। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में शानदार कार्यक्रम हुआ। भारतीय उपमहाद्वीप में इससे पहले भी विश्वकप हुए लेकिन बांग्लादेश हर बार इससे महरूम रहा। इस बार उसे विश्वकप की मेजबानी का मौका मिला। इससे बड़ी बात और कोई नहीं हो सकती। भले बांग्लादेश में क्रिकेट का सबसे बड़ा महाकुंभ  अब शुरू होने जा रहा हो लेकिन बांग्लादेश की टीम ने क्रिकेट में अपनी अलग पहचान बनाई है। बांग्लादेश की वह टीम थी, जिससे हार के कारण पिछले साल भारतीय टीम को पहले ही राउंड में टूर्नांमेंट से बाहर होना पड़ा। यही नहीं समय समय पर बांग्लादेश ने कई ऐसे मैच जीते जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। शायद इस बार भी बांग्लादेश कोई ऐसे मैच जीते, जिसके बारे में अभी सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे हैं।&lt;br /&gt;पहला मैच भारत और बांग्लादेश के बीच खेला जाएगा। भारत की कोशिश होगी की वह अपना विजयी अभियान यही से शुरू करे वहीं बांग्लादेश पिछली बार की सफलताओं को फिर से दोहराना चाहेगा। अभ्यास मैचों में टीमों ने अपना जलवा दिखाया। भारत ने अपने दोनों मैच जीते और दिखाया कि वह विजेता बनने की प्रबल दावेदार है। हालांकि आस्ट्रलिया अपने दोनों मैच हार गया लेकिन उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। आस्ट्रेलिया शुरू अपने माइंड गेम के लिए हमेशा से जाना जाता रहा है, हो न हो यह उसी का एक हिस्सा हो। और सबसे बड़ी बात हमें यह नहीं भूलन चाहिए कि आस्टे्रलिया अभी विश्वविजेता है और विश्व की नम्बर एक टीम भी।&lt;br /&gt;भारत को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा है, इसमें कोई बड़ी बात नहीं। 1983 में जब भारत ने विश्वकप जीता था तब से लेकर अब तक वह प्रबल दावेदार रहा है और इस बार भी है। यह बात अलग है कि वह इस कारनामें को फिर कभी दोहरा नहीं पाया। लेकिन क्या पता इस बार वह हो जाए जो 1983 के बाद नहीं हो सका। पाकिस्तान की बात करें तो उसे भी कप का दावेदार माना जा रहा है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट हो रहा है लेकिन पाकिस्तान इससे इस बार महरूम हैं इसका असर उस पर दिख रहा है। पाकिस्तान के पक्ष में जो एक बात जा रही है वह यह है कि शाहिद आफरीदी इस टीम के कप्तान हैं। शुएब अख्तर वापसी कर चुके हैं। आफरीदी  एक आक्रामक खिलाड़ी तो हैं ही इस बार उन्हें साबित करना होगा कि वह आक्रामक कप्तान भी हैैं। अगर शुरू के दो और इधर तीन विश्वकपों की बात छोड़ दी जाए तो कप उसी टीम ने जीता है जिसके बारे में बहुत कम चर्चा की जा रही थी। तो हो न हो इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिले। इंग्लैंड क्रिकेट का जनक है लेकिन क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता का वह कभी विजेता नहीं बन पाया। इस बात का मलााल हर इंग्लैंडवासी को हमेशा रहा है। इस बार इंग्लिश टीम की कोशिश होगी कि वह खिताब पर पहली बार कब्जा कर ले।&lt;br /&gt;खैर यह तो सब कयासों की बात है। खेल शुरू होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है और धीरे-धीरे सारी स्थिति साफ होती जाएगी। मैं एक बार फिर आपको बता दूं कि क्रिकेट विश्वकप की अधिकांश खबरें आपके पास तक पहुंचाने की कोशिश इस ब्लॉग के माध्यम से मैं करूंगा और प्रयास करूंगा कि वह खबरें आप तक पहुंचे जो किसी टीवी चैनल, अखबार या वेबसाइट पर नहीं होती। अगर आप मेरा मार्गदर्शन करेंगे तो अच्छा रहेगा। आप क्या चाहते हैं बताएंगे तो मजा आएगा।&lt;br /&gt;फिलवक्त के लिए इतना ही बाकी अगली पोस्ट में। लो! शुरू हो गया खेल</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/6223563003599423052/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/6223563003599423052' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/6223563003599423052'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/6223563003599423052'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='लो! शुरू हो गया खेल'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg_rjunKxU84d6J0djetc6mVT741pC2YAw0Sd9puf2bHp7nj694jcXVORkOx6FNk_4lyyzKcL6GiQIFzhfN1rj4drvqRY-DxUh6Nn8t6rad0t-SguyaayhXe_uwZD_haKXjqQaOA7VXJw-K/s72-c/ICC-Cricket-World-Cup-2011-Opening-Ceremony-LIVE-and-HIGHLIGHTS-17-2-2011-at-Dhaka-1-300x220.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-5360994554765975459</id><published>2010-11-28T03:48:00.000-08:00</published><updated>2010-11-28T03:51:38.887-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खेल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मीडिया"/><title type='text'>बस! बहुत हो गया क्रिकेट क्रिकेट</title><content type='html'>राष्ट्रमंडल खेलों के बाद अब एशियाड भी समाप्त हो गया। भारत को इस बार छठा स्थान प्राप्त हुआ। इस बार भी कई ऐसे खिलाडिय़ों ने भारत को गौरवांवित कराया, जिन्हें देश तो क्या उनके मोहल्ले के लोग ही नहीं जानते थे। अब साबित हो गया है कि राष्ट्रमंडल खेलों में मिली सफलता कोई तुक्का नहीं थी और न ही यह इसलिए मिली कि खिलाड़ी अपनी जमीन पर खेल रहे थे। कुल मिलाकर उन्होंने कड़ी मेहनत की और अच्छा प्रदर्शन किया जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सफलता मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्टमंडल खेलों की समाप्ति पर कई विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जाहिर कर रहे थे कि क्या इतनी जल्दी हमारे खिलाड़ी फिर से अपने आप को तैयार करके वैसा ही प्रदर्शन दोहरा पाएंगे जैसा उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में किया। खिलाडिय़ों ने हाल के दिनों में अपने आप को मिले दो मौकों पर साबित कर दिया है और आगे भी अगर मौका मिलेगा तो वे किसी से पीछे नहीं रहेंगे और साबित कर देंगे। अब सरकार की बारी है कि वह इन नये सितारों को दिश दे जिससे यह और ऊंचाईयों को छू सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है अब क्रिकेट क्रिकेट का शोर बंद होना चाहिए। क्रिकेट के अलावा और भी खेल हैं। खास बात यह है कि ये खेल क्रिकेट जितना समय भी नहीं लेते और खिलाड़ी जीतकर भी दिखाते हैं। अब क्रिकेट के लिए पूरा दिन बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। हमें चीन की ओर देखना चाहिए, जो दो सौ स्वर्ण जीतने के करीब था। वह क्रिकेट नहीं खेलता। हम क्रिकेट में विश्व विजेता रहे लेकिन अन्य खेलों में कुछ नहीं कर पाए। अब जबकि नई पीढ़ी क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में रुचि ले रही है तो हमें उनका उत्साहवद्र्धन करना चाहिए। अगले कुछ समय में जनसंख्या के मामले में हम चीन को पीछे छोड़ देंगे। क्या यही एक क्षेत्र है जिसमें हम चीन को पछाड़ सकते हैं। हमारे युवा खिलाडिय़ों ने साबित कर दिया है कि बिना किसी खास टे्रनिंग के भी वे पदक जीत सकते हैं अगर उन्हें थोड़ा सा संबल मिल जाए तो वे और भी कमाल कर सकते हैं। हालांकि, हम लोग दिल्ली और दोहा को पीछे छोड़कर खुश हैं पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी तो यह आगाज है अब भारत सबकी निगाहों में आ गया है और अब असल परीक्षा शुरू होगी। शिखर पर पहुंचना आसान है लेकिन उसे कायम रखना मुश्किल होता है। अब यही मुश्किल काम हमें करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया को भी इसमें अहम रोल अदा करना है। राष्ट्रमंडल खेल चूंकि दिल्ली में ही हो रहे थे, सो पदक जीतते ही मीडिया उन्हें अपने स्टूडियो में बुला रहा था। एक बारगी तो ऐसा लगा कि हर चैनल में होड़ सी है कि कौन सा चैनल पहले विजेताओं से बात करे। अब जबकि एशियन गेम्स के चैम्पियन आएंगे तो उनका स्वागत कैसे होता है। कौन चैनल विजेता के घर तक की स्थिति का जायजा लेता है। यह देखना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर क्रिकेट के अलावा किसी खेल में जीत के बाद कुछ देर तो हम उसे याद रखते हैं और फिर देखने लगते हैं क्रिकेट। अब इसमें बदलाव आना चाहिए। 1983 का विश्वकप जीतने के बाद देश में क्रिकेट क्रांति आई थी। हर बच्चा क्रिकेटर बनना चाहता था। उसी का परिणाम है कि आज क्रिकेट में हम नम्बर वन हैं। अब जबकि जिमनास्टिक में भी देश का नाम रोशन हो चुका है  तो बच्चों और युवाओं के साथ-साथ उनके अभिभावकों को भी सोचना चाहिए कि उनका बच्चा क्रिकेट में 13 खिलाड़ी बन कर रहे या रेस में सबसे आगे आए। अब उन क्रिकेटरों से दूरी जरूरी है जो आराम करने के लिए समय तब मांगते हैं जब न्यूजीलैंड जैसी टीम हमारे घर में ही खेल रही है। उन्हें तब आराम की दरकार नहीं होती जब आईपीएल चल रहा होता है। आईपीएल में आराम न करने की वजह सब जानते हैं। अगर कोई क्रिकेटर वाकई देश के लिए खेलता है तो फिर आईपीएल से आराम ले ना कि किसी एक दिवसीय या टेस्ट शृंखला में। यह बदलाव का दौर है और मुझे यकीन है कि बदलाव खेल में भी आएगा...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/5360994554765975459/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/5360994554765975459' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/5360994554765975459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/5360994554765975459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/11/blog-post_28.html' title='बस! बहुत हो गया क्रिकेट क्रिकेट'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-2947778475768226505</id><published>2010-11-19T09:37:00.000-08:00</published><updated>2010-11-19T09:39:53.313-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पत्रकार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भ्रष्टाचार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति"/><title type='text'>यह संक्रमण काल है!</title><content type='html'>बहुत मुश्किल है। समझ नहीं आ रहा है कि क्या करूं। इधर कई बार कुछ लिखने की कोशिश की लेकिन जब तक एक विषय पर लिखने का मन बनाया तब तक कोई दूसरी घटना हो जाती, जो पहली से बड़ी लगती। जब तक उस पर सोचा तब तक उससे बड़ी बात हो जाती। यही करते-करते एक माह से अधिक बीत गया। अब लगने लगा है कि  जिस तरह खबरों का सिलसिला लगातार जारी रहता है और एंकर बाद में कह जाता है कि आप देखते रहिए उसी तरह आप देश को और उसकी हालात को देखते रहिए। आपके टीवी बंद कर देने से यह क्रम टूटेगा नहीं।&lt;br /&gt;इस देश की क्या हालत हो गई है। किस पर भरोसा करूं। देश भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुका है। अभी बहुत समय नहीं बीता जब राजनीति बहुत नेक पेशा माना जाता था। बल्कि इसे तो पेशा माना ही नहीं जाता था। यह तो समाज सेवा का एक माध्यम था। इसमें भी बहुत समय नहीं बीता जब हर तरह के भ्रष्टाचार में, घपलों में, घोटालों में किसी न किसी नेता की ही संलिप्तता पाई जाने लगी। इसके बाद नेता का मतलब बहुत ही तुच्छ व्यक्ति हो गया। लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे। जब भी किसी बड़ी परीक्षा के परिणाम आते और उनमें विजयी हुए प्रतिभागियों से पूछा जाता, तो वे सब कुछ बनना चाहते हैं, लेकिन नेता नहीं। नेता शब्द कितना बदनाम हो चुका है इस उदाहरण से यह आसानी से समझा जा सकता है। अब सवाल यह है कि किस-किस से घृणा कीजिएगा, क्या-क्या नहीं बनिएगा। सब तो एक ही जैसे हैं। जीवन में कुछ करना है तो कुछ तो करना ही पड़ेगा। &lt;br /&gt;गौर करें तो पाएंगे कि बोफोर्स को छोड़ दें तो मुझे याद नहीं पड़ता कि इतने बड़े घोटाले में किसी प्रधानमंत्री का नाम सामने आया हो। मंत्री ही अपने स्तर पर इससे निपट लेते थे। लेकिन, अब एक बार फिर प्रधानमंत्री जैसा पद दागदार हो गया है। भले वे पाक साफ हों पर उनकी साफ सुथरी पोशाक पर &#39;कीचड़Ó के छीटे तो पड़ ही गए हैं। बाद में क्या होता है। यह बाद की बात है। अभी तक चाल, चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाले भाजपाई हालांकि समय समय पर अपना असली चेहरा उजागर करते आए हैं, लेकिन जब आप किसी पर अंगुली उठा रहे हो कम से कम उस समय तो आप पर कोई ऐसा आरोप न लगे, जिसके लिए आप दूसरे को घेर रहे हों। भाजपा कुछ-कुछ उसी तरह के घोटाले के लिए महाराष्ट्र में कांग्रेस को घेर रही थी, जैसा उनके मुख्यमंत्री ने कर्नाटक में कथित रूप से किया है। बड़ी हैरानी होती है।&lt;br /&gt;अगर यह ढूंढऩे निकला जाए कि कौन से पेशे से जुड़ा व्यक्ति सही है तो मुझे नहीं लगता कि आपको किसी पेशे से जुड़ा व्यक्ति मिल पाएगा। हालांकि, यह बात सही है कि किसी एक व्यक्ति के भ्रष्ट हो जाने से कोई पेशा कलंकित नहीं हो जाता। लेकिन, कहीं न कहीं यह तो लगता ही है कि इस पेशे से जुड़ा व्यक्ति गलत काम में संलिप्त है। हमारी भारतीय संस्कृति में बाबा को बहुत मान और सम्मान दिया जाता है। दरअसल उन्हें भगवान का ही दूसरा रूप माना जाता है। लेकिन, बड़े-बड़े और नामी बाबाओं ने कैसे हमारी भक्ति और उम्मीदों पर तुषारापात किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। मैं यहां किसी बाबा का नाम नहीं लूंगा। क्योंकि, एक तो इससे उनके भक्तों को आघात लगेगा और दूसरा यह सूची बहुत लम्बी हो जाएगी। हमारे देश की पुलिस तो रिश्वत लेने , फर्जी एनकाउंटर करने और अन्य कई तरहों की हरकतों के कारण बहुत बदनाम हो चुकी है, लेकिन सेना को तो बहुत पूज्य माना जाता है। उन्हें हम अपना रक्षक मानते हैं। लेकिन, जब उन्हीं रक्षकों का सेनापति ही किसी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाया जाता है तो क्या कह कर अपने मन को समझाइएगा। बात किस सेना प्रमुख की हो रही है और उन महाशय ने क्या किया है, मुझे नहीं लगता कि यह बताने और समझाने की जरूरत है।&lt;br /&gt;बहुत दिनों तक यह मानता रहा कि कम से कम कोई पत्रकार किसी भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं पाया जाता। इसके कई कारण रहे। एक तो यह कि उसके ऊपर पहले से ही समाज के समाने सबकी कलई खोलने की जिम्मेदारी होती है वही अगर कुछ गलत करेगा तो किस मुंह से किसी को गलत कहेगा। मैं खुद इस पेशे में आया इसका अन्य कारणों के साथ-साथ शायद एक बड़ा कारण यह भी था। लेकिन, अभी हाल ही में देश के दो पत्रकारों ने कथित रूप से दलाली में शामिल होकर मेरी इस धारणा को भी चूर-चूर कर दिया। बड़ी बात यह रही कि ये दो वे नाम हैं, जिनका नाम बहुत सलीके और सम्मान के साथ लिया जाता है। बहुत से युवा पत्रकार उनसे मिलने, बात करने और उनके जैसा बनने का ही सपना संजाते रहते हैं। लेकिन, मुझे नहीं लगता कि अब कोई भी उनके जैसा बनने की सोचेगा भी। कम से कम जब तक वे पाक-साफ नहीं हो जाते तब तक तो कतई नहीं।&lt;br /&gt;हालांकि, अंत में यह कह देना भी जरूरी है कि मैं बहुत आशवादी व्यक्ति हूं और यह मानता हूं कि परिवर्तन ही संसार का नियम है और जो आज है वह कल नहीं रहेगा। यह भी बदल जाएगा।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/2947778475768226505/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/2947778475768226505' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/2947778475768226505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/2947778475768226505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='यह संक्रमण काल है!'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-6186705772466092623</id><published>2010-10-17T10:27:00.000-07:00</published><updated>2010-10-17T10:30:17.090-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खेल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति"/><title type='text'>भारत और इंडिया के फर्क को समझिए</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgmXIwyu81xTO8EljYbRW5AWbJuhCLzMTHnfAAAAxZ8u1PMYGWu2BYTnZ3B-wp3TYYn7b6o2fu67hVCphQn0qeqWHO73M6omUAUdNKaMCll4MrMrS_BgWx__bRvn7Mbdl2TX4JFSTnYnkOU/s1600/commen+wealth.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 240px; height: 217px;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgmXIwyu81xTO8EljYbRW5AWbJuhCLzMTHnfAAAAxZ8u1PMYGWu2BYTnZ3B-wp3TYYn7b6o2fu67hVCphQn0qeqWHO73M6omUAUdNKaMCll4MrMrS_BgWx__bRvn7Mbdl2TX4JFSTnYnkOU/s320/commen+wealth.jpg&quot; alt=&quot;&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5529068071588300754&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक महिला ने दूसरी से कहा, तुम्हें पता है भारत और इंडिया में लड़ाई हो गई है? दूसरी ने कहा, इससे हमें क्या, हम तो हिन्दुस्तान में रहते हैं ना।&lt;br /&gt;यह एक चुटकुला है, लेकिन कहीं न कहीं यह सच्चाई भी बयां करता है। इस पर जरा सोच कर देखिए। क्या भारत और इंडिया अलग-अलग हैं? क्या इन दोनों में अक्सर लड़ाई होती रहती है? दोनों के जवाब हां में ही हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स या फिर राष्ट्रमंडल खेलों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि हम वाकई ऐसी जगह रहते हैं, जहां दो देश बसते हैं। गौर कीजिएगा तो साफ पता चल ही जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में हमारे यहां विश्वस्तरीय खेल हुए। खेल मात्र दस दिन हुए, लेकिन इसकी तैयारियां सालों से हो रही थी। होनी भी चाहिए आखिर देश की प्रतिष्ठा का सवाल है। भाजपानीत राजग के शासनकाल में इन खेलों की मेजबानी की अनुमति मिली तो कांग्रेसनीत संप्रग शासनकाल में ये खेल सम्पन्न हुए। यानी दो धुर विरोधी दलों ने खेल के लिए एक मंच पर आकर बिना राजनीति के एक दूसरे का सहयोग किया। खेल का मामला ऐसा होता है कि जहां अक्सर कहा जाता है कि इसे राजनीति से अलग रखा जाए, लेकिन रखा नहीं जाता। राजनीति में अक्सर खेल होता रहता है और खेल में राजनीति। खैर यह बहस और चर्चा का दूसर विषय हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेलों के दौरान देश के दो चेहरे देखने को मिले। एक चेहरा वह जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स कराए और दूसरा वह जो राष्ट्रमंडल खेलों में भागीदारी कर रहे थे। जिन लोगों ने कॉमनवेल्थ गेम्स कराए उसने देश के कॉमन लोगों की वेल्थ पर जमकर डाका डाला। अनुमानित खर्च कितना था और कितना खर्च किया गया यह सभी को पता है, जो खर्च ज्यादा किया गया वह खर्च करने वालों ने अपनी जेब से नहीं किया, बल्कि आम आदमी की जेब से ही किया है। तैयारियां वर्षों से हो रही थीं, लेकिन खेल के ऐन वक्त तक काम जारी रहा। काम में विलम्ब इसलिए किया गया ताकि अंतिम समय पर अनाप-शनाप पैसा खर्च किया जाए और इसे देश की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाए। इस पर कोई बोलेगा नहीं। जो बोलेगा वह राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेलों के दौरान दूसरा चेहरा उन लोगों का देखने को मिला, जो राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रहे थे। उन्होंने राष्ट्र के लिए कितने पद जीते और देश को किस मुकाम तक पहुंचाया। यह जगजाहिर है। जहां कॉमनवेल्थ के आयोजक वेल्थ बनाते रहे, वहीं राष्ट्रमंडल के प्रतिभागी राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाते रहे। यानी एक तो हिन्दी के खेल हुए दूसरे अंग्रेजी का खेल। पदक जीतने वालों में ज्यादातर खिलाड़ी भारत के थे बजाए इंडिया के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक खेल खत्म तो दूसर शुरू हो गया है। अब खेल हो रहा है खेलों के आयोजन की प्रशंसा पाने का। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक विजेताओं से मिल रहे हैं। क्या ये लोग कभी उन अखाड़ों में गए हैं, जहां से ये पदक विजेता निकले हैं। राहुल गांधी को लगता है कि दलित के घर जाकर उसकी खटिया पर बैठकर चार बातें कर लेने और उसकी रोटी खा लेने से ही उन्होंने असली भारत को देख लिया। क्या इन लोगों को उन लोगों की पीठ नहीं थपथपानी चाहिए जो मात्र कुछ अंतर से ही पदक जीतने से रह गए। उनमें नया जोश नई स्फूर्ति कौन भरेगा। क्या जीतने वालों को ही टीवी पर दिखने का हक है? उन लोगों के बारे में कौन सोचेगा जो हार गए। मीडिया भी उन्हीं के गुण गा रही है, जो जीते हैं। हारे हुए लोगों को फिर से नए सिरे से खड़ा करने का जिम्मा कौन उठाएगा? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगले ही महीने एशियाड होने हैं और अगर से विजेता किन्हीं कारणों से फिर से यही कारनामा नहीं दोहरा पाए तो जो कुछ अंतर से हारे हैं उन्हीं पर जीतने का दारोमदार होगा। अगर उन्हें अभी से तैयार नहीं किया गया तो क्या होगा? इंडिया की जयजयकार छोड़कर भारत की भी परवाह कीजिए नहीं तो...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/6186705772466092623/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/6186705772466092623' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/6186705772466092623'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/6186705772466092623'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/10/blog-post_17.html' title='भारत और इंडिया के फर्क को समझिए'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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कोई फर्क दिखाई नहीं देता। उन्हें चमचागिरि और चापलूसी करने वाले लोग भी कतई पसंद नहीं। वे कहते हैं कि हर मर्ज की सिर्फ एक ही दवा है और वह है राजनीति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने मध्य प्रदेश के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने कई बातें कहीं।  कुछ ऐसी जो कहनी चाहिए थी और कुछ ऐसी जो मेरे ख्याल से नहीं कहनी चाहिए। राहुल ने कहा कि उन्हें चाटुकार और चमचे पसंद नहीं हैं। मुझे नहीं पता कि ये राहुल के निजी विचार हैं या फिर पारिवारिक। राहुल को भले चाटुकार पसंद न हों पर उनकी मां को चाटुकार और चमचे ही पसंद हैं। अगर नहीं होते तो प्रतिभादेवी सिंह पाटिल आज देश की राष्ट्रपति नहीं होतीं। हो सकता है कि मेरी इस बात की जमकर आलोचना की जाए पर मैं जानना चाहता हूं कि प्रतिभादेवी सिंह पाटिल में ऐसी कौन सी खूबी है जो वह राष्ट्रपति के उम्मीदवार हो गईं। अगर महिला होने की वजह से उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया तो प्रधानमंत्री पद क्यों किसी पुरुष के सुपुर्द कर दिया गया। क्या पार्टी में कोई ऐसी योग्य महिला नहीं जो प्रधानमंत्री बन सके? या फिर ऐसी महिला नहीं जो सोनिया गांधी की बात को आंख पर पट्टी बांध कर मान ले। खुद के प्रधानमंत्री न बन पाने के बाद क्यों उन्होंने कठपुतली मनमोहन सिंह का चयन किया। क्या कांग्रेस में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो अपने दम पर लोकसभा चुनाव जीत सके और प्रधानमंत्री बन सके। दरअसल सोनिया अच्छी तरह जानती हैं कि जो नेता लोकसभा का चुनाव जीत सकता है उसका अपना अच्छा खासा जनाधार होता है। मनमोहन सिंह चूंकि लोकसभा से संसद में प्रवेश नहीं करते सो उनका जनाधार भी नहीं होगा। सोनिया सिर्फ उन्हीं लोगों को पद बख्श रहीं हैं जो उनके कहे पर चलें। वे कहेंं दिन तो दिन और कहें रात तो रात। ऐसे नामों में केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि कई नाम हैं। अगले लोकसभा चुनाव में जब राहुल प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे उससे पहले ही मनमोहन सिंह को राष्ट्रपित भवन भेजने की पूरी तैयारी अभी से की जा रही है। राहुल को पहले अपने घर से चमचागिरि खत्म करनी होगी तब वे कार्यकर्ताओं को चमचागिरी न करने का पाठ पढ़ाएं तो ज्यादा अच्छा होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल कहते हैं कि देश की हर समस्या की खात्मा तभी होगा जब युवा राजनीति में आएंगे। यानी हर मर्ज की एक ही दवा। राजनीति और सिर्फ राजनीति। कोई कम अक्ल का व्यक्ति भी यह बता सकता है कि कभी भी हर मर्ज की एक ही दवा नहीं हुआ करती। अगर देश का हर व्यक्ति राजनीति करने लगेगा तो बाकी के काम कौन करेगा, यह भी राहुल को तय करना होगा। केवल राजनीति से देश नहीं चला करता। राजनीति पेट नहीं भरती। वे युवाओं को देश की राजनीति में लाना चाहते हैं। पहले उन्हें अपनी पार्टी में युवाओं को स्थान देना होगा। पहले वे अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपनी मां को हटाकर किसी युवा नेता को इसकी जिम्मेदारी सौंपे और फिर किसी युवा को ही प्रधानमंत्री बनने की घोषणा करें। केवल युवा कांग्रेस को बदलकर देश की राजनीति नहीं बदली जा सकती। राहुल को यह बात भी समझनी होगी कि कहने और करने में बहुत फर्क होता है। देशभर में घूमने से, दलित के घर जाकर रोटी खाने से और उसके घर सोने से दलित को अच्छा तो लग सकता है, लेकिन इससे उसके पेट की भूख कम नहीं हो सकती। देश भूख है, कराह रहा है। इसके लिए राहुल के पास क्या दवा है? राजनीति। देश घूमकर उसकी समस्याओं को समझना एक बात है और उसकी समस्याओं का निराकरण करना दूसरी बात।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते। राहुल को चाहिए कि वे पहले अपनी पार्टी के उन नेताओं को यह कहने से मना करें, जो उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं। राहुल को यह पता है कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर उनकी पार्टी को बहुमत मिला तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार वही होंगे सो अभी से ढोल-ताशे क्यों पीटे जाएं। हालांकि भीतर ही भीतर इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। योजना तैयार की जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजे की बात यह रही कि राहुल यहीं तक नहीं रुके। बुधवार को तो उन्होंने गजब ही कर दिया। उन्होंने कह दिया कि राष्ट्रीय  स्वयं सेवक संघ और सिमी में उन्हें कोई फर्क नजर नहीं आता। सवाल यह है कि क्या राहुल ने कभी निष्पक्ष भाव से दोनों में कोई फर्क देखने की चेष्टा की है। नहीं की होगी, क्योंकि उनकी आंखों पर एक तरह का चश्मा लगा है और उन्हें जो कुछ भी दिखता है। उस चश्मे से ही दिखता है। अगर निष्पक्ष भाव से देखते तो उन्हें पता चल जाता कि संघ और सिमी में क्या फर्क है। सिमी जहां एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है, वहीं संघ भारत भूमि की आत्मा से जुड़ा हुआ संगठन है। राहुल को अगर देशप्रेमी और देशद्रोही संगठनों में कोई फर्क नजर नहीं आता तो कोई क्या कर सकता है। बस उनकी बुद्धि पर मुस्कराया ही जा सकता है। वे जिस देश की राजनीति में युवाओं को लाने की बात कह रहे हैं क्या वे उस देश को समझ पा रहे हैं। इतने दिनों से देश भ्रमण के बाद भी अगर राहुल ऐसी बातें करते हैं तो लगता है कि लोग उन्हें यूं ही बच्चा नहीं समझते। वे वास्तव में अभी बड़े हो ही नहीं पाए हैं। बिना सोचे समझे बोलना उनकी आदत सी हो गई है। अंगे्रजी में पले बढ़े राहुल ने क्या थिंक बिफोर यू स्पीक की युक्ति नहीं सुनी होगी। सुनी होगी पर शायद उस पर अमल नहीं करना चाहते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल राहुल की दिक्कत यही है कि वे अपने आप को बहुत बड़ा और विद्धान समझते हैं, वहीं अन्य लोग उन्हें बच्चा समझते हैं। राहुल को यह तक नहीं पता कि किसी के यहां जाते हैं तो कैसे पेश आते हैं। मध्यप्रदेश आगमन से एक दिन पहले ही यहां की सरकार ने उन्हें प्रदेश का अतिथि घोषित कर दिया था, लेकिन राहुल को शायद अतिथि भाव पसंद नहीं आया। उन्हें तो मायावती जैसे लोग ही पसंद आते हैं, जो उनके आने पर कोई व्यवस्था नहीं करती बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गाली ही देती हैं। राहुल की हर गलती को बच्चा समझकर माफ कर दिया जाता है, लेकिन कब तक? बच्चा जब कोई गलती करता है तो पहले उस पर हंसी आती है और जब बड़ा होकर भी वह ऐसा ही करता है तो सजा दी जाती है। राहुल को चाहिए कि वे ऐसी नौबत न आने दें और कोई भी बात बोलने से पहले सोचें।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/2682885744504619345/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/2682885744504619345' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/2682885744504619345'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/2682885744504619345'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/10/blog-post_06.html' title='थिंक बिफोर यू स्पीक'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-1427971252639096059</id><published>2010-10-02T04:23:00.000-07:00</published><updated>2010-10-02T04:26:08.082-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गांधी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मीडिया"/><title type='text'>वाह इंडिया, शाबाश मीडिया</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj0GCKH6QlAl21_2OPnxPWe-ioHCi_FxpO4dMkydzuJJP0JjPJRSVeW5OElSy9ULCYZJVnKXMj_Jm7zipfhS6YAtOpyJtJisKuAgFAbIAZ25kJF7M587FqG3QVm7IxJ492S3XhoGOVvlGIm/s1600/Mahatma-Gandhi.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 320px; height: 296px;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj0GCKH6QlAl21_2OPnxPWe-ioHCi_FxpO4dMkydzuJJP0JjPJRSVeW5OElSy9ULCYZJVnKXMj_Jm7zipfhS6YAtOpyJtJisKuAgFAbIAZ25kJF7M587FqG3QVm7IxJ492S3XhoGOVvlGIm/s320/Mahatma-Gandhi.jpg&quot; alt=&quot;&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5523407905844968882&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे इत्तेफाक ही कहें कि जिस मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने पूरे जीवन हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया उनकी जयंती से दो दिन पूर्व ही एक ऐसे मामले का निर्णय आया जो लम्बे समय से लटका था। खास बात यह भी की मुद्दा तब ही गरमाया जब गांधी को सिधारे कुछ ही साल बीते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुखद बात यह रही कि आजादी के इतने वर्षों बाद पहली बार लगा कि भारत गांधी, कबीर और बुद्ध का देश है। अगर 30 सितंबर को कहीं पत्ता भी खड़कता तो यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता और दुनिया भर में भारत की जो फजीहत होती वह अलग से। पूरे देश ने एक बार फिर साबित किया कि वह अब किसी नेता और धार्मिक रंग में रंगने वाले नहीं हैं, अब वह अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल करेंगे। ऐसा नहीं है कि अब देश में कट्टरवादियों की कमी हो गई है। वे अब भी हैं और रहेंगे भी, लेकिन उनकी संख्या अब बहुत कम रह गई है और आम जनता अब उनके बहकावे में नहीं आने वाली। कट्टरवादी हिन्दुओं में भी हैं और मुसलमानों में भी। सच कहा जाए तो गांधी की मौत के बाद इस बार पहली बार लगा कि हमने सच माएने में उन्हें श्रद्धांजलि दी है। गांधी ने भी शायद ऐसे ही भारत का सपना देखा था, जो अब साकार होता दिख रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जन्म से ही तमाम अवसरों पर कई तरह की आलोचनाओं का सामना कर रहे मीडिया ने भी इस बार एक नई इबारत लिख दी। अगर देश में कुछ नहीं हुआ तो इसके पीछे लोगों की समझदारी तो थी ही, लेकिन इसमें मीडिया की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। फैसला जब 24  सितम्बर को आना था तब भी मीडिया ने पूरा संयम बरता और जब पता लगा कि फैसला टल गया है तब भी पूरी ईमानदारी से काम जारी रखा। यह एक ऐसा मुद्दा था, जिस पर देश के अरबों लोगों की ही नहीं, बल्कि विदेशियों की भी निगाहें थीं। वे भी जानना चाह रहे थे कि भारत में 1992  की अपेक्षा कुछ परिवर्तन और परिवक्वता आई है कि नहीं। ऐसे में कोई भी चैनल टीआरपी में आगे जा सकती थी, लेकिन किसी चैनल ने ऐसा नहीं किया। सबने यही कहा कि टीआरपी आती रहेगी, अगर देश का अमन-चैन गया तो वह वापस नहीं आएगा। चैनलों पर हिन्दू-मुस्लिम एकता का अद्भुत सामन्जस्य भी देखने को मिला। लगभग हर छोटे-बड़े चैनल पर दो एंकर बिठाए गए और उनमें एक हिन्दू और एक मुसलमान रहा। फैसला आने के बाद किसी एंकर के चेहरे पर खुशी या दुख का भाव देखने को नहीं मिला। यह स्थिति फैसला आने के दिन ही नहीं उसके दो दिन बाद तक जारी रही। दो दिन बाद तक किसी ऐसे चेहरे को टीवी पर नहीं दिखाया गया जो अतिवादी हो या फिर कुछ उल्टा-सीधा कह जाए। अगर वह आया भी तो अमन और शांति की अपील करता हुआ ही दिखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात पिं्रट मीडिया यानी अखबारों की। किसी भी अखबार ने अपने संपादकीय में या फिर अपने किसी लेख में ऐसा प्रदर्शित नहीं किया वह किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष के लगाव रखता है। 1992  में कई अखबारों में यह आरोप लगा था कि वे किसी पार्टी विशेष के अखबार हैं, इस बार ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। फैसले के अगले दिन मुख्य हेडिंग में भी किसी अखबार ने ऐसी हेडिंग नहीं दी जिससे लगे कि किसी की जीत और किसी की हार हुई है। हेडिंग में वही कहा गया जो एक लाइन मेें कुछ शब्दों के इस्तेमाल से लिखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहूं तो मुझे खुद को बहुत दिन बाद गौरवान्वित महसूस करने का मौका मिला है। मैं आज शान से कह सकता हूं कि मैं भारत में रहता हूं और एक मीडियाकर्मी हूं। शुक्रिया इंडिया...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/1427971252639096059/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/1427971252639096059' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1427971252639096059'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1427971252639096059'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='वाह इंडिया, शाबाश मीडिया'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj0GCKH6QlAl21_2OPnxPWe-ioHCi_FxpO4dMkydzuJJP0JjPJRSVeW5OElSy9ULCYZJVnKXMj_Jm7zipfhS6YAtOpyJtJisKuAgFAbIAZ25kJF7M587FqG3QVm7IxJ492S3XhoGOVvlGIm/s72-c/Mahatma-Gandhi.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-6258730805014162327</id><published>2010-09-30T10:27:00.000-07:00</published><updated>2010-09-30T10:31:42.612-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="न्यायालय"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फैसला"/><title type='text'>अब फिर बदलेगा परिदृश्य</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;/span&gt;अयोध्या विवाद पर न्यायालय का फैसला आ गया है। पहली नजर में फैसला हिन्दुओं के पक्ष में जाता दिख रहा है, हालांकि यह भी सही है कि फैसला बहुत ज्यादा बड़ा है और उसे पढऩे, समझने और उसके मायने निकालने में समय लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बात पहले से ही जाहिर थी कि मामला यही खत्म नहीं होगा और जो भी पक्ष यहां मुंह की खाएगा वह उच्च अदालत की शरण में जरूर जाएगा। होने भी यही जा रहा है, जल्द से जल्द वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। फैसला सही है या गलत यह दूसरा मुद्दा हो सकता है, लेकिन अहम सवाल जो अब उभर कर सामने आ रहा है वह यह है कि क्या अब हमारे समाज में बदला हुआ परिदृश्य नजर आएगा। 30 सितम्बर2010  से पहले और  30 &lt;span&gt;सितम्बर&lt;/span&gt; 2010 के बाद के माहौल और स्थिति में कुछ परिवर्तन आएगा क्या ? या सब कुछ पहले की ही तरह चलता रहेगा। पहली नजर में तो यही लगता है कि स्थितियों में निश्चित रूप से परिवर्तन ही नहीं बल्कि भारी परिवर्तन आने जा रहा है। यह बात अलग है कि यह परिवर्तन कब से आएगा। कुछ दिन बाद, कुछ महीने बाद या फिर कुछ साल बाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह से 6 दिसम्बर1992  इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है, उससे बड़ी तारीख 30 सितम्बर2010  है। इस तारीख को60  साल बाद ऐसा फैसला सुनाया गया जिस पर करोड़ों नहीं बल्कि अरबों नजरें थीं। यह बात अलग है कि 6 दिसम्बर एक काला अध्याय था और 30  सितम्बर एक सफेद सच।6  दिसम्बर को मैं काला अध्याय इसलिए नहीं कह रहा कि उस दिन मस्जिद तोड़ी गई थी बल्कि इसलिए कह रहा हूं जो भी काम उस दिन किया गया वह गैर-कानूनी रूप से किया गया था और 30  सितम्बर को जो फैसला आया वह न्याय पालिका का फैसला है और यह बात सच है कि न्याय पालिका किसी धर्म, किसी मान्यता और किसी भावना को नहीं समझती उसे तो बस तर्क और सबूत चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, यह अलग मुद्दा हो सकता है। बात हो रही थी आने वाले समय के  परिदृश्य में परिवर्तन की। जिस तरह 6 दिसम्बर की घटना के बाद देश की राजनीति और सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया उसी तरह अब भी आएगा। अगर मेरे कहे को अन्यथा न लें तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि देश इस समय जिस सबसे बड़ी समस्याओं में से एक से लड़ रहा है वह और बढ़ेगी और उसे रोकना अब और भी मुश्किल हो जाएगा। बात हो रही है आतंक की। जिस तरह से 6 दिसम्बर1992  की घटना के बाद देश में आतंकी घटनाओं में एकदम से बाढ़ आ गई थी कहीं न कहीं वही स्थिति फिर आने वाली है। आज अगर हर आतंकी घटना के पीछे किसी मुस्लिम नवयुवक का नाम आता है तो मैं दृढ़ता के साथ कहना चाहता हूूं कि उसके पीछे कहीं न कहीं 6  दिसम्बर 1992  भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल देश के दुश्मनों को इसी तरह के मौकों की तलाश रहती है। और हम उन्हें जाने अनजाने इस तरह के मौके देते भी रहते हैं। देश विरोधी ताकतों को युवाओं को बरगलाने के लिए इसी तरह की घटनाओं का इंतजार रहता है। अब देश के दुश्मन युवाओं खासकर मुस्लिम युवाओं को इस बात का ज्ञान देंगी कि देखो जिस देश को तुम अपना कहते हो वह तुम्हारा है ही नहीं। वहां की कार्यपालिका और विधायिका तो तुम्हें अपना पहले से ही नहीं मानती थी अब एक ऐसा निर्णय सुनाया गया है जिससे यह साबित होता है कि न्यायपालिका भी ऐसा ही सोचती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे आंकड़ों की जानकारी तो नहीं है, लेकिन याददाश्त के आधार पर इतना जरूर कह सकता हूं कि 6  दिसम्बर 1992  के 18  साल पहले कितने आतंकी हमले देश के ऊपर हुए और उसमें कितने देशवासी शहीद हुए और 6 दिसम्बर 1992  के बाद कितने आतंकी हमले हुए और कितने निर्दोष मौत के मुंह में असमय ही समा गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां कहना चाहता हूं कि जब मैंने पिछले दिनों सावधान आगे खतरा है हेडिंग से लेख लिखा था तो कई साथियों की टिप्पणी आई कि आप एक पत्रकार हैं पत्रकार ही रहिए ज्योतिषी मत बनिए। उनकी राय बिल्कुल सही है। मैं ज्योतिषी बनना भी नहीं चाहता पर जो चीज लगती है उसे यहां लिख देता हूं। यह भी सच है कि मेरी वह बात सच भी साबित हुई और दिल्ली में जामा मस्जिद के पास विदेशियों पर फायरिंग हुई। इतने संवेदनशील समय में भी पुलिस और अन्य विभाग अभी तक यह पता नहीं लगा पाए है कि आखिर वे हमलावर कौन थे? वे अभी भी देश में ही होंगे और भारत की ही रोटी खाकर पल रहे होंगे, लेकिन किसी को पता नहीं कि वे कहां हैं।&lt;br /&gt;अंत में इतना ही और कि मैं न तो फैसला को अच्छा कह रहा हूं और न ही गलत, क्योंकि अदालत ने जो फैसला किया उसके लिए 60  साल का समय लिया और न जाने कितने लोगों की बात सुनी होगी, तब जाकर यह फैसला आया है, ऐसे में एक शब्द में इसका अर्थ निकालना मेरे ख्याल से बेवकूफी ही होगी। मेरा काम आगाह करना था सो कर दिया बाकी आपकी मर्जी.....</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/6258730805014162327/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/6258730805014162327' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/6258730805014162327'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/6258730805014162327'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/09/blog-post_30.html' title='अब फिर बदलेगा परिदृश्य'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-9142744668548142311</id><published>2010-09-25T11:28:00.000-07:00</published><updated>2010-09-25T11:31:16.473-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आतंकवाद"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समस्या"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हालात"/><title type='text'>ऐसे नहीं रुकेगा आतंक</title><content type='html'>क्या आपको लगता है कि आतंकवाद खत्म किया जा सकता है? क्या आपको लगता है कि भारत में कभी अमेरिका या ब्रिटेन जैसी स्थिति बन पाएगी, कि कोई आतंकी संगठन वहां वारदात करने से पहले कई बार सोचे? क्या हम और आने वाली पीढ़ी कभी डर के साए से बाहर निकल पाएंगे? सवाल और भी हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय इन सवालों का जवाब हां में दे पाएगा। क्या हम आगे भी इसी तरह जीते रहेंगे जैसे आज जी रहे हैं? या फिर इसमें कोई बदलाव की स्थिति निकट भविष्य में दीखती है। खैर, मुझे तो नहीं दिखती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जो मानते हैं कि भारत में आतंकवाद का कारण पाकिस्तान है और पाकिस्तान चूंकि कश्मीर को पाना चाहता है इसलिए कश्मीर सहित पूरे देश में आतंक का माहौल बनाना चाहता है, ताकि थक-हारकर भारत कश्मीर पर समझौता करने पर तैयार हो जाए। बहुत से लोग मानते हैं कि अगर कश्मीर की समस्या का हल हो जाए तो आतंकवाद पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। पहली बात तो यह है कि कश्मीर की समस्या हल नहीं होगी और अगर मान लीजिए किसी तरह हो भी जाएगी तो क्या आतंक कम हो जाएगा? साहब आतंक तब भी कम नहीं होगा। हर व्यक्ति सजग और सतर्क हो जाए और उसे जरा भी लगे कि फलां व्यक्ति किसी गलत काम में या आतंकी गतिविधि में लिप्त है तो पुलिस को सूचित कर दे तो भी क्या आतंकी घटनाओं को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तो जनाब मुझे ऐसा नहीं लगता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक लाइन में कहूं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब तक न्यायालय द्वारा आतंककारी घोषित किए जा चुके लोगों को निर्धारित सजा नहीं मिल जाती, तब तक कोई खास उम्मीद रखना निरा बेमानी ही होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों दिल्ली में जामा मस्जिद के पास हुआ हमला कुछ नए संकेत कर रहा है। अब आतंकी खुद को नष्ट करके हमें खत्म नहीं करना चाहते बल्कि वे चाहते हैं कि वे सुरक्षित रहें और हमें खत्म करें। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आतंकियों के निशाने पर अब भारतीय नहीं बल्कि भारत आने वाले विदेशी हैं ताकि दुनियाभर में भारत की भद्द पिटे।&lt;br /&gt;्र&lt;br /&gt;किसी आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल भागने वालों को पकडऩा कितना मुश्किल काम होता है यह सब जानते हैं। न जाने कितनी मुसीबत और मेहनत के बाद पुलिस और अन्य फोर्सेस उन्हें पकड़ पाते हैं। उसके बाद अदालत में मुकदमा चलता है। चूंकि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला करती है इसलिए यह साबित करना कि यह व्यक्ति आतंकी है बड़ा टेढ़ा काम होता है। कड़ी मशक्कत के बाद अदालत में यह साबित भी हो जाता है कि फलां आदमी आतंकी है तब कहीं जाकर न्यायालय फैसला सुनाती है। खास बात यह भी कि इसमें कुछ दिन या महीनों का समय नहीं बल्कि अक्सर कई साल लग जाते हैं। अदालत से अपराधी घोषित व्यक्ति को सजा मिल जाती है, लेकिन अदालत के निर्णय का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। बड़ी दिक्कत यही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक अदालत से दोषी करार दिए गए व्यक्ति को सजा नहीं मिलती यह सोचना कि देश से आतंक कम हो जाएगा बिल्कुल दिन में सपने देखने जैसा ही है। सबसे पहले आतंकियों को सजा दी जानी चाहिए, ताकि जो लोग भविष्य में ऐसा कुछ करने के बारे में विचार कर रहे हैं वे ऐसा करने से बचें। बाकी तो ख्याली पुलाव हैं आप भी पकाइए मैं भी पकाऊं...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/9142744668548142311/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/9142744668548142311' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/9142744668548142311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/9142744668548142311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/09/blog-post_25.html' title='ऐसे नहीं रुकेगा आतंक'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-827593446456662235</id><published>2010-09-14T09:19:00.000-07:00</published><updated>2010-09-14T09:28:17.965-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भाषा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिन्दी"/><title type='text'>राष्ट्र अभी तक गूंगा है!</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgu1WPv04DYjPOG9AvI5MAF8GuAEYzGZXV-k7N0doEahIqrw9SYkSk6aVv_L4P1qNSyJ2EfRQ-4OWVbrEacijG_JljuZaXxN7uUi03Cspy0X7KD-GXt9FTwJUBMIeTU42WERKgoT4uWStRr/s1600/hindi_title_red.gif&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 320px; height: 205px;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgu1WPv04DYjPOG9AvI5MAF8GuAEYzGZXV-k7N0doEahIqrw9SYkSk6aVv_L4P1qNSyJ2EfRQ-4OWVbrEacijG_JljuZaXxN7uUi03Cspy0X7KD-GXt9FTwJUBMIeTU42WERKgoT4uWStRr/s320/hindi_title_red.gif&quot; alt=&quot;&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5516806513275691874&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहनदास करमचंद गांधी। यानी महात्मा गांधी। उनको लेकर हर व्यक्ति की अपनी- अपनी राय हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक &lt;span&gt;लिहाज&lt;/span&gt;  से बहुदा लोगों की राय को ही हम मानते हैं। अंगुली हर किसी पर उठती है।  राम, कृष्ण, मोहम्मद साहब, गुरुनानक और जीसस पर भी उठी तो गांधी तो  हाड़-मांस के एक इंसान भर थे। उनका कहना था कि कोई भी राष्ट्र्र, राष्ट्र  भाषा के बगैर गूंगा है। आज हिंदी दिवस है और हिन्दी हमारी राजभाषा है,  राष्ट्रभाषा नहीं। यानी आजाद भारत की कोई भी भाषा ही नहीं है। बगैर भाषा के  ही हम अब तक गुजर कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी तो बात कमाल की लगती है। जो देश तकनीकी लिहाज से समृद्ध राष्ट्रों  की श्रेणी में आ गया हो, जो देश राष्ट्रमंडल जैसे खेलों आयोजन कर रहा हो।  जिस देश का लोहा अमेरिका के राष्ट्रपति तक मानते हों, जो देश अपनी सभ्यता  और संस्कृति पर नाज करता हो, उसकी कोई भाषा ही नहीं है। और मजे की बात तो  यह भी कि इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास भी नहीं किए जा रहे, सिर्फ  खानापूर्ति और कुछ नहीं।&lt;br /&gt;दरअसल, हिंदी की राह में रोड़े तो तभी डाल दिए गए थे, जब इसे राजभाषा का  दर्ज दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिन्दी को राजभाषा  का स्थान दिया गया। लेकिन इसके साथ ही राजभाषा अधिनियम 1963 (संशोधित  अधिनियम 1967)  के अनुसार संघ की राजभाषा के रूप में अंग्रेजी को हमारे ऊपर  अनिश्चितकाल के लिए थोप दिया गया। शायद संसद को भी उस समय पता नहीं था कि  यह क्या अधिनियम है और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। इसमें कहा गया था  कि जब तक देश के सभी राज्यों की विधानसभाएं अंग्रेजी छोड़कर हिन्दी अपनाने  का प्रस्ताव पारित नहीं कर देतीं तब तक अंग्रेजी का ही प्रयोग यूं ही होता  रहेगा। एक बात और जो यहां महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद  343 (2) के अनुसार संघ  की राजभाषा हिन्दी को 15 वर्ष बाद वही मान-सम्मान मिलना था, जो हमारे  राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय ध्वज को प्राप्त है, लेकिन यह विडम्बना ही कही  जाएगी कि 25 जनवरी 1964 में 15 वर्ष की अवधि पूरी करने से पहले ही राजभाषा  अधिनियम 1963 के जरिए हिन्दी के पर इस तरह काट दिए गए कि वह कहीं की न रहे।  सवाल यह भी उठाया जा सकता है कि यह क्यों हुआ? दरअसल यह सब दबाव और आपसी  कुचक्रों के कारण ही हुआ। हालांकि यह सही है कि कई लोगों ने इसका विरोध  किया पर वे सफल नहीं हो सके। इस प्रकार हिन्दी को जो सम्मान मिलना चाहिए  था, उस कहानी का वहीं दुखद अंत हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौर करें तो पाएंगे कि शायद अंग्रेज हमसे ज्याद दूरदृष्टा थे। यही कारण था  कि वे जब समझ गए कि भारत पर राज करना अब आसान नहीं है, तो उन्होंने यहां से  निकलने में ही भलाई समझी। लेकिन जाते जाते वे अपनी आदत और दूरदृष्टि से  ऐसा कर गए कि भारत कभी चैन से न बैठ पाए। इसीलिए पाकिस्तान के रूप में भारत  का एक महत्वपूर्ण अंग अलग हो गया। आज सब जानते हैं कि अपने उसी हिस्से के  कारण भारत को नित नई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तान का तो  जैसे एक सूत्रीय लक्ष्य है कि भारत के बढ़ते कदमों को रोकना। उसे इससे कोई  फर्क नहीं पड़ता ही वह खुद कहां है और क्या करेगा। भारत की बढ़त को रोका  जाए उनके हुकमरानों की यही चाहत रहती है। यह बंटवारा यूं ही नहीं हुआ। इसके  पीछे सोची समझी रणनीति और चाल थी जो शायद आज हमारी समझ में आ रही है। यह  भी दीगर है कि बहुतों को अभी भी यह समझ नहीं आ रही है। अगर ऐसा न होता तो  हिन्दी की हालत आज यह नहीं होती जो है। कहा गया है कि अगर देश के सभी  राज्यों की विधानसभा इस बात पर मोहर लगा दें कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का  दर्जा मिलना चाहिए तो कौन है जो इसे रोक सकता है।&lt;br /&gt;भारत अनेकताओं में एकता वाला देश है। यह बात कहने और सुनने में तो बहुत  अच्छी लगती है पर धरातल पर सोचें तो यही अनेकता कभी-कभी देश की &lt;span&gt;दुश्मन&lt;/span&gt;  भी बन जाती है। ब्रिटिश शासक शायद जानते थे कि देश के सभी राज्यों की  विधानसभा हिन्दी को राष्ट्रभाषा की बात पर सहमत नहीं होंगी, इसीलिए वे ऐसा  अनुच्छेद बना गए और हम हैं कि उसी लकीर के फकीर बने हुए हैं। कभी हम मराठी  बन जाते हैं तो कभी पंजाबी। कभी बंगाली बन जाते हैं तो कभी बिहारी। इसीलिए  एकजुटता के साथ हिन्दी को मान-सम्मान दिलाने का प्रयास नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14 सितम्बर आने पर हमें हिन्दी की याद आती है। अखबारों में लेख छप जाते हैं  और ब्लॉग पर पोस्ट लिख दी जाती है। हिन्दी पखवाड़ा आयाजित किया जाता है और  फिर साल भर के लिए हिन्दी को भुला दिया जाता है। हम भी अगले वर्ष फिर  हिन्दी &lt;span&gt;की &lt;/span&gt;बात करेंगे...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/827593446456662235/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/827593446456662235' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/827593446456662235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/827593446456662235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='राष्ट्र अभी तक गूंगा है!'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgu1WPv04DYjPOG9AvI5MAF8GuAEYzGZXV-k7N0doEahIqrw9SYkSk6aVv_L4P1qNSyJ2EfRQ-4OWVbrEacijG_JljuZaXxN7uUi03Cspy0X7KD-GXt9FTwJUBMIeTU42WERKgoT4uWStRr/s72-c/hindi_title_red.gif" height="72" width="72"/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-4238793343366415219</id><published>2010-08-22T04:06:00.000-07:00</published><updated>2010-08-22T04:20:48.157-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आतंकवाद"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यवस्था"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समस्या"/><title type='text'>सावधान ! आगे खतरा है</title><content type='html'>सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि मैं जो कुछ भी यहां लिखने जा रहा हूं मैं चाहता हूं कि वह गलत निकले। क्योंकि अगर मेरी कही हुई बात गलत निकली तो ही ठीक है। लेकिन फिर भी आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं।&lt;br /&gt;15 अगस्त शांति से निपट गया है। जम्मू-कश्मीर की घटना छोड़ दें तो बाकी सभी जगह सब ठीक ठाक रहा। अगस्त का महीना समाप्त होते ही ऐसा कुछ होने वाला हैै कि कुछ भी हो सकता है। सबसे पहले इस बात की संभावना है कि अयोध्या विवाद का फैसला सितम्बर में आ जाए। फैसला आएगा तो यह तय कि कुछ न कुछ जरूर होगा। अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में जाएगा तो हिन्दूवादी संगठन चुप नहीं बैठेंगे और कुछ न कुछ जरूर करेंगे, इसके लिए अंदरखाते योजना बननी भी शुरू हो गई है। फैसला आते ही कुछ न कुछ होगा। अगर फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया तो मुसलमान भी चुप बैठेंगे यह मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। हालांकि यह सही है कि मुस्लिम संगठनों ने अभी कुछ आक्रामक तेवर नहीं दिखाए हैं लेकिन फैसला आने के बाद क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। चुंकि यह धार्मिक मुद्दा है लोगों की भावनाओं का मुद्दा है, इसलिए यह कुछ सीमित स्थानों पर ही सीमित रहेगा यह भी नहीं कहा जा सकता। अगर जरा सी भी आग लगी तो पूरे देश में फैलेगी और न जाने कितनों को जला कर राख कर देगी। शायद इसीलिए यूपी की मुख्यमंत्री ने दूरदृष्टि का परिचय देते हुए पुलिस अधिकारियों की छुट्टी रद्द कर दी है। ताकि अगर हालात खराब हों तो स्थिति पर तत्काल नियंत्रण पाया जा सके।&lt;br /&gt;मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो, लेकिन बहुत हद तक आशंका है कि कुछ न कुछ होगा जरूर।&lt;br /&gt;दूसरी स्थित बनेगी अक्टूबर में। इस माह में कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेल होंगे। हमारे देश के नेताओं को जो कुछ भी करना है वे कर चुके हैं और अंदरखाते कर भी रहे होंगे जिनका खुलासा शायद बाद में हो। लेकिन बाहर के लोगों का क्या कहिएगा। जी, हां मैं बात कर रहा हूं भाड़े के आतंककारियों की। क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान और तालिबान यह चाहेंगे कि भारत में राष्ट्रमंडल खेल शांति से हो पाएं? मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी भारत में पिछले बहुत दिन से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। पाकिस्तान के हालात खराब चल रहे हैं। बाढ़ से पूरा देश त्रस्त हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। सेना राष्ट्रपति जरदारी हो हटाने के लिए पूरे प्रयास कर रही है। कुछ दिनों में ही वहां कुछ बड़ा परिवर्तन दिखे तो अचरज नहीं होना चाहिए। बहुत संभव है कि भारत पर कुछ दिन से इसलिए हमला न हुआ हो कि राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। ऐसे मौके पर कुछ किया जाए तो कहने ही क्या। तय है कि निश्चित रूप से बड़ी संख्या में विदेशी भी मारे जाएंगे और भारत की भद्द पिटेगी वह अलग से। वैसे भी आतंककारी अब चाहते हैं कि भारतीयों के साथ साथ विदेशी भी मारे जाएं, इसीलिए होटल ताज पर हमला किया गया था। दिल्ली सुरक्षा इंतजामात को लेकर वैसे भी संतुष्ट नहीं है। भले कोई बड़ी वारदात न हो लेकिन आतंककारी माहौल बिगाडऩे का प्रयास नहीं करेंगे यह मानने वाली बात नहीं है।&lt;br /&gt;तीसरी बात, पेंटागन से खबर आई है कि चीन ने भारत की सीमा पर परमाणु मिसाइल तैनात कर दी है। हालांकि चीन ने इसका खंडन किया और बकवास करार दिया है लेकिन फिर भी चौकन्ना तो रहना ही होगा। यह सही है कि चीन ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा, जिससे उसे कोई परेशानी हो, लेकिन वह भारत पर अतिरिक्त दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। वह सीमा तक अपने सड़क मार्ग को दुरुस्त कर रहा है। यह सही है कि हाल-फिलहाल इस मामले में कोई संकट नहीं आने वाला लेकिन भविष्य किसने देखा है? चीन जिस स्तर की तैयारियां कर रहा है वह निश्चित रूप से चौंकाने वाली और सतर्क करने वाली है। अगर चीन के इरादे नेक हैं तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर जरा भी शंका हुई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल की तैयारियों में लगा रहे और चीन सिर पर आकर बैठ जाए तो क्या कहिएगा।&lt;br /&gt;खतरे और भी हैं, जो बिना बताए आ सकते हैं। सतर्क सबसे रहने की जरूरत है। मैं एक बार फिर कह दूं कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा कुछ हो। मंदिर-मस्जिद मामले का कोई ऐसा हल निकले जो दोनों पक्ष मान लें और देश में सौहार्द का माहौल बना रहे। राष्ट्रमंडल खेलों में अभी तक जो हुआ सो हुआ अब सब सही हो जाए। आतंककारी अपने झंझावातों में फंसे रहे और इधर न आ पाएं। आएं भी तो उनका कोई मंसूबा पूरा न होने दिया जाए, उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया जाए। चीन अपने देश में जो कुछ भी कर रहा है वह अपने विकास के लिए कर रहा हो, उसका इरादा भारत को नुकसान पहुंचाने का न हो। चाहता तो यही हूं, लेकिन कौन जाने कब क्या हो जाए।&lt;br /&gt;जाने क्या होगा रामा रे...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/4238793343366415219/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/4238793343366415219' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/4238793343366415219'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/4238793343366415219'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/08/blog-post_22.html' title='सावधान ! आगे खतरा है'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-40229134103640159</id><published>2010-08-19T04:01:00.000-07:00</published><updated>2010-08-19T04:07:21.953-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खेल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सहवाग"/><title type='text'>हंगाम है क्यों बरपा...</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjXx_Dv7ayZw-MVbGafFRA4RRzygcsmrCF6vpndXKclhzpBzCOI-VXlgybaYiPk0-tND4yLMGAOaEsBDOdjXPJ3JNYBieOPqy_9n7v3rF4NZ9vbqUmPPRIxvEhA6NvSJl_zg6f6RKxm7Xae/s1600/virender_sehwag-420x0.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 358px; height: 240px;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjXx_Dv7ayZw-MVbGafFRA4RRzygcsmrCF6vpndXKclhzpBzCOI-VXlgybaYiPk0-tND4yLMGAOaEsBDOdjXPJ3JNYBieOPqy_9n7v3rF4NZ9vbqUmPPRIxvEhA6NvSJl_zg6f6RKxm7Xae/s320/virender_sehwag-420x0.jpg&quot; alt=&quot;&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5507074661445097250&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीरेंद्र सहवाग। एक विस्फोटक बल्लेबाज। दुनिय भर के गेंदबाज उनके नाम से कांप जाते हैं। बहुत से लोग उनमें सचिन का अक्स देखते हैं। अब तक भारत के लिए 225  एक दिनी मैच खेल चुके हैं। सात हजार से अधिक रन बना चुके हैं। उन्होंने 12 शतक और 36 अद्र्धशतक लगाए हैं। टेस्ट क्रिकेट में तो उनका रिकॉड और भी अच्छा है। माना जाता है कि जब सहवाग बल्लेबाजी करते हैं तो भारतीय टीम के लिए खेलते हैं। उन्हें शतक और अद्र्धशतक की चिंता नहीं रहती। जब वह अपनी रौ में हों तो तभी आउट होते हैं जब वे खुद कोई गलती करें। शतक और अद्र्धशतक क्या दोहरे शतक के नजदीक होने पर भी वे दबाव में नहीं आते और तब भी छक्का लगा सकते हैं। ऐसा यूं ही नहीं कहा जाता। कई बार वे ऐसा करके दिखा भी चुके हैं।&lt;br /&gt;लेकिन, यह क्या। सारी बातें धरी की धरी रह गईं। सहवाग शतक नहीं बना पाए तो यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। क्यों भई? क्या सहवाग जैसा बल्लेबाज शतक के लिए इतना परेशान हो सकता है? मेरा व्यक्तिगत मानना है कि सहवाग जब चाहते हैं शतक लगा सकते हैं। दिक्कत ये है कि वे शतक की परवाह नहीं करते। एक दिनी और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में बहुत कम देखने को मिलता है कि उन्हेंने जितने रन बनाए हो उससे ज्यादा गेंद खेली हों। लेकिन अब मेरी राय कुछ हद तक बदलने सी लगी है।&lt;br /&gt;सचिन तेंदुलकर निर्विवाद रूप से देश के ही नहीं वरन् दुनिया के महान बल्लेबाज हैं। लेकिन उन पर अक्सर यह आरोप लगता रहता है कि वह टीम के लिए नहीं, रिकॉर्ड के लिए खेलते हैं। यह बात अलग है कि सचिन अब रिकॉर्ड के मोहताज नहीं बल्कि रिकॉर्ड उनके मोहताज हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि देसी या विदेशी किसी ने भी कभी भी सहवाग पर मजाक में ही सही यह आरोप लगाया हो।&lt;br /&gt;मजे की बात तो यह है कि मैच के बाद सहवाग ने कहा कि श्रीलंकाई गेंदबाज ने हार से डर से उन्हें नो बॉल डाल दी। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इतने बड़े और विस्फोटक बल्लेबाज से इस तरह के बयान की उम्मीद कैसे की जा सकती है। क्या रंदीव के नो बाल डालने से श्रीलंका की हार टल गई। क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है कि लेकिन उस समय मैच की जो स्थिति थी, श्रीलंका के जीतने की संभावना कहीं से भी नहीं थी। फिर हार के डर से रंदीव नो बॉल कैसे फेंक सकते हैं।&lt;br /&gt;सहवाग अभी लम्बे समय तक क्रिकेट खेलेंगे और शतक ही नहीं दोहरा शतक तक बनाने के अनेक मौके उनके पास आएंगे। उन्हें उस ओर ध्यान देना चाहिए। और अच्छा प्रदर्शन कर खुद के रिकॉर्ड की फिक्र किए बगैर भारत को जिताने पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि देश के लिए खेलने का मौका हर किसी को नहीं मिलता। उन्हें मौका मिला है तो अपने रिकॉड के लिए इतनी तुच्छ बात नहीं करनी चाहिए।&lt;br /&gt;अब एक और महत्वपूर्ण बात, जो इस पूरे लेख को अपूर्ण करती है। मेरे यह सब लिखने का मतलब यह कतई नहीं निकला जाना चाहिए कि श्रीलंका ने जो किया वह ठीक किया। क्रिकेट को शायद इसलिए इतनी प्रसिद्धि  मिली कि उसे भद्र जनों का खेल कहा जाता है। और श्रीलंका ने जो हरकत की वह निश्चित रूप से भद्र जनों वाली नहीं है। खेल को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए। और यह बात श्रीलंका को ही नहीं भारत को भी ध्यान में रखना चाहिए। मेरा कहना और मानना सिर्फ इतना है कि पूरे मामले को इतना तूल नहीं दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;पूरे मामले में रंदीव को सजा मिल चुकी है उन्हें एक मैच के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। दिलशान का भी इसमें हाथ पाया गया इसलिए उन पर भी बैन लगाया गया है। संगकारा को भी चेतावनी दी गई है। यह सही है कि इन सब के बाद भी सहवाग की सेंचुरी वापस नहीं आ सकती पर सहवाग अगर अच्छा खेलेंगे तो फिर से शतक लगा सकते हैं।&lt;br /&gt;अंत में बस इतना ही कहूंगा खेल का खेल ही रहने दो कोई नाम न दो....</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/40229134103640159/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/40229134103640159' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/40229134103640159'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/40229134103640159'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/08/blog-post_19.html' title='हंगाम है क्यों बरपा...'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_w35BWL86Yog/So2RKrQo1lI/AAAAAAAAANw/ma7rruRX46U/S220/Untitled-1+copy.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjXx_Dv7ayZw-MVbGafFRA4RRzygcsmrCF6vpndXKclhzpBzCOI-VXlgybaYiPk0-tND4yLMGAOaEsBDOdjXPJ3JNYBieOPqy_9n7v3rF4NZ9vbqUmPPRIxvEhA6NvSJl_zg6f6RKxm7Xae/s72-c/virender_sehwag-420x0.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-683258541123003633.post-1927224052019603778</id><published>2010-08-07T11:28:00.000-07:00</published><updated>2010-08-08T08:28:00.582-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खेल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सीरीज सार"/><title type='text'>सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका</title><content type='html'>&lt;a onblur=&quot;try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}&quot; href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhBs904Fv-ZtEK0CkKd2rrbvppBsY5ekX5kwXdwJw1EJD90mVS_1WcR_hhwcpuEmWaAk2_DR-4IK08T5Z_8C9HU0mnfCUSp_tORb3du6ZUskEB8KOfwLc_Jk8WI3HBwMx2JS8aK43IdiwAC/s1600/India-Vs-Sri-Lanka.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 370px; height: 173px;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhBs904Fv-ZtEK0CkKd2rrbvppBsY5ekX5kwXdwJw1EJD90mVS_1WcR_hhwcpuEmWaAk2_DR-4IK08T5Z_8C9HU0mnfCUSp_tORb3du6ZUskEB8KOfwLc_Jk8WI3HBwMx2JS8aK43IdiwAC/s320/India-Vs-Sri-Lanka.jpg&quot; alt=&quot;&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5502736875128743138&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत ने श्रीलंका के साथ खेली जा रही तीन टेस्ट मैचों की सीरीज ड्रा कराने में कामयाबी हासिल कर ली है। बड़ी बात यह कि इस जीत के साथ ही भारत की नम्बर एक की पदवी भी बरकरार रही। अब सीरीज समाप्त हो गई है लिहाजा जरूरी है कि इस दौरान क्या क्या हुआ इस पर विचार किया जाए।&lt;br /&gt;पहली बात तो यह हुई कि धौनी की किस्मत एक बार फिर उनके साथ रही। धौनी ने अब तक अपनी कप्तानी में कोई भी सीरीज नहीं गंवाई है। इस बार भी यह रिकॉर्ड कायम रहा। मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि धौनी किस्मत के धनी हैं, इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ। दूसरी बड़ी बात टेस्ट क्रिकेट से मुरलीधरन जैसे दिग्गज का जाना रहा। उन्होंने दूसरे टेस्ट के बाद संन्यास ले लिया। इतने बड़े और खुशमिजाज स्पिनर की ऐसी की खूबसूरत विदाई होनी थी जैसी की हुई है। श्रीलंकाई टीम पर उनका जाना कितना असर करेगा यह बाद में पता चलेगा। फिलहाल क्रिकेट के चाहने वालों को उनकी कमी खलती रहेगी।&lt;br /&gt;अब बात भारतीय बल्लेबाजों के प्रदर्शन की। इसमें मैं सचिन का प्रदर्शन शामिल नहीं करूंगा, क्योंकि वह निर्विवाद रूप से महान बल्लेबाज हैं और उन पर मैं कोई टिप्पणी करके खतरा मोल लेना नहीं चाहता। बात सुरेश रैना से करते हैं। उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया। उन्होंने पहले की टेस्ट में शतक लगाया और इसके साथ ही वे मोहम्मद अजहरुद्दीन, सौरभ गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे दिग्गजों के क्लब में शामिल हो गए। वे बाएं हाथ के बल्लेबाज हैं। उनमें कहीं न कहीं सौरभ गांगुली की झलक मिलती है। सौरभ जैसा जुझारूपन उनमें है कि नहीं यह वक्त और जरूरत के मुताबिक ही पता चलेगा, लेकिन फिलवक्त उन्होंने उज्ज्वल भविष्य की आशा तो जगा ही दी है। अब बात वीवीएस लक्ष्मण की। एकदिनी क्रिकेट में भले वे असफल करार दे दिए गए हों पर टेस्ट क्रिकट में उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि उनका कोई जवाब नहीं। अक्सर लोग सचिन और उनके प्रदर्शन की बात करते हैं पर लक्ष्मण को बिसरा दिया जाता है। लक्ष्मण की उम्र 37 के आसपास है और उनकी कलाइयों का इस्तेमाल अब भी देखते ही बनता है। तीसरे टेस्ट के चौथे दिन भारत को जीत के लिए 257 रन का लक्ष्य मिला। भारत ने दिन का खेल खत्म होने तक 53 रन पर तीन अहम विकेट गवां दिए तो लगा कि भारत यह मैच बचा पाएगा कि नहीं, लेकिन ऐसे समय में अक्सर संकटमोचन बन कर आने वाले लक्ष्मण ने फिर अपनी अहम भूमिका निभाई और भारत को जीत के दरवाजे तक पहुंचाया। लक्ष्मण के साथ दिक्कत यह है कि वे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी लाइम लाइट में नहीं आ पाते। शायद उन्हें इसका हुनर भी नहीं मालूम। वह अब तक सचिन, सौरभ और यहां तक की धौनी आदि की तरह युवाओं के लिए आइडियल नहीं बन पाए। जबकि यह भी सही है कि लक्ष्मण की बैटिंग स्टाइल से युवाओं को बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। टीम के भीतर जितना मान सम्मान लक्ष्मण को मिलता है उतना बाहर नहीं मिला पाता। खैर, यह युवाओं का मामला है वे किसे माने और किसे नहीं।&lt;br /&gt;अब बात राहुल द्रविण की। दीवार के उपनाम से पहचाने जाने वाले इस बल्लेबाज ने इस बार निराश किया। मुझे पता है कुछ ही दिन में उनको लेकर तरह-तरह की अटकलें लगनी शुरू हो जाएंगी। कहा जाएगा कि दीवार ढह गई है, दीवार टूटने लगी है। पूरी सीरीज की बात करें तो राहुल तीन टेस्ट मैचों की छह पारियों में मिलाकर भी शतक नहीं लगा पाए। वे 19 की मामूली सी औसत से कुल 95 रन ही बना सके। इससे पहले दक्षिण अफ्रीका के दौरे में भी राहुल कुछ खास नहीं कर पाए। पहले राहुल को आउट करने के लिए गेंदबाजों में शर्त लगती थी लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब कुछ रन बनाने के बाद उन्हें भी साधारण तरीके से आउट कर दिया जाता है। ऐसे समय में जबकि बहुत से युवा अच्छा प्रदर्शन कर टीम में शामिल होने की दावेदारी पेश कर रहे हैं बहुत संभव है कि टेस्ट क्रिकेट से उनकी जल्द विदाई कर दी जाए। हालांकि मैं खुद नहीं चाहता कि ऐसा हो। भारत को अभी उनकी जरूरत है। राहुल की सौरभ गांगुली की तरह भले जुझारूपन की मिसाल नहीं दी जाती हो पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि वे भी बहुत जुझारू हैं और आने वाले दिनों में कोई शानदार पारी खेलकर सबका मुंह बंद कर दें तो कोई बड़ी बात नहीं। याद करिए वह दौर जब भारत के पास कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जो अच्छी कीपिंग के साथ-साथ टीम के लिए रन भी जोड़ सके। ऐसे में राहुल ने यह भूमिका बखूबी निभाई। राहुल टीम में बाहर जाते हैं या वे अच्छा प्रदर्शन कर फिर टीम का अहम हिस्सा बन जाएंगे यह समय पर ही पता चलेगा।&lt;br /&gt;भारत की बात यहीं तक अब बात श्रीलंका की। श्रीलंका में सिर्फ एक ही खिलाड़ी बात करूंगा और वह है सूरज रांदिव। वह ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते हैं और युवा हैं। दिग्गज मुरली के बाद श्रीलंका को एक ऐसे स्पिन की जरूरत है, जिससे विरोधी टीम के बल्लेबाज खौफ खाएं। हालांकि अजंता मेंडिस अच्छी गेंदबाजी कर रहे हैं पर बल्लेबाजों में उनका खौफ नहीं दिखता। रांदिव ने अभी दो ही टेस्ट खेले हैं और दूसरे टेस्ट में ही उन्होंने पांच विकेट झटक लिए। खास बात यह कि इसमें सचिन तेंदुलकर का विकेट भी शामिल है। श्रीलंका के लिए जहां यह शुभ संकेत हो सकता है वहीं विरोधी टीमों के लिए खतरे की घंटी। संभव है कि अपने नाम की तरह सूरज सबसे बड़ा सितारा बन जाएं।&lt;br /&gt;भारत को अब श्रीलंका में ही 10 से त्रिकोणीय सीरीज खेलनी है। इसमें तीसरी टीम न्यूजीलैंड की होगी। बहुत से खिलाड़ी भारत वापस लौट आएंगे वहीं कुछ को टीम का हिस्सा बनने श्रीलंका जाना है। तो अब टेस्ट के पांच के दिन के खेल से मुक्ति और अब लीजिए एकदिनी क्रिकेट का &lt;span&gt;मजा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये पोस्ट यहां भी प्रकाशित &lt;span&gt;हुई।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;a href=&quot;http://www.aajkikhabar.com/blog/829823244.html&quot;&gt;सीरीज सार : भारत बनाम &lt;span&gt;श्रीलंका&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href=&quot;http://mediamanch.com/Mediamanch/Site/LCatevar.php?Nid=84&quot;&gt;&lt;b&gt;भारत -श्रीलंका सीरिज़, क्या खोया -क्या पाया  -पंकज  मिश्र &lt;/b&gt;&lt;/a&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://udbhavna.blogspot.com/feeds/1927224052019603778/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/683258541123003633/1927224052019603778' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1927224052019603778'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/683258541123003633/posts/default/1927224052019603778'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://udbhavna.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='सीरीज सार : भारत बनाम श्रीलंका'/><author><name>पंकज मिश्रा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05619749578471029423</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' 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