<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274</atom:id><lastBuildDate>Thu, 19 Feb 2026 23:35:05 +0000</lastBuildDate><category>देवी</category><category>दस महाविधाएं</category><category>नवदुर्गा</category><category>कात्यायिनी</category><category>कालभैरव</category><category>कूष्मांडा</category><category>चंद्रघंटा</category><category>चित्रगुप्त</category><category>देवर्षि</category><category>देवी कमला</category><category>देवी कालरात्रि</category><category>देवी काली</category><category>देवी छिन्नमस्ता</category><category>देवी त्रिपुर भैरवी</category><category>देवी धूमावती</category><category>देवी बगलामुखी :</category><category>देवी भुवनेश्वरी</category><category>देवी ललिता</category><category>देवी षोडशी</category><category>नारद</category><category>ब्रह्मचारिण</category><category>महागौरी</category><category>मृत्यु के देवता</category><category>यमराज</category><category>शैलपुत्री</category><category>श्री कृष्ण</category><category>सिद्धिदात्री</category><category>स्कंदमाता</category><title>तत्व ज्ञान </title><description>गीता प्रसार २०१२ </description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Unknown)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>26</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-7890516544652558174</guid><pubDate>Mon, 23 May 2016 07:49:00 +0000</pubDate><atom:updated>2016-05-23T14:04:38.775+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवर्षि</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नारद</category><title>देवर्षि नारद </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
नारद मुनि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक है। उन्होने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारदजी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के २६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है - देवर्षीणाम्चनारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं। श्रीमद्भागवत महापुराणका कथन है, सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र (जिसे नारद-पाञ्चरात्र भी कहते हैं) का उपदेश दिया जिसमें सत्कर्मो के द्वारा भव-बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है।&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj60O5_ujTVc9YesfxUsC7q4s0JJ4OaUZBVCRbaxDvMGWjpePpyI9mzsdG8jkrDeiQP8EqplFTrfBCve-BdyO2XE9cwhGvtsPcDg-hRKW0tOUhUonYoyItofPIjLikUmAaDy8UGm2orUtv_/s1600/988684_541819569189631_1486447738_n.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;400&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj60O5_ujTVc9YesfxUsC7q4s0JJ4OaUZBVCRbaxDvMGWjpePpyI9mzsdG8jkrDeiQP8EqplFTrfBCve-BdyO2XE9cwhGvtsPcDg-hRKW0tOUhUonYoyItofPIjLikUmAaDy8UGm2orUtv_/s400/988684_541819569189631_1486447738_n.jpg&quot; width=&quot;247&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
वायुपुराण में देवर्षि के पद और लक्षण का वर्णन है- देवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करनेवाले ऋषिगण देवर्षिनाम से जाने जाते हैं। भूत, वर्तमान एवं भविष्य-तीनों कालों के ज्ञाता, सत्यभाषी, स्वयं का साक्षात्कार करके स्वयं में सम्बद्ध, कठोर तपस्या से लोकविख्यात, गर्भावस्था में ही अज्ञान रूपी अंधकार के नष्ट हो जाने से जिनमें ज्ञान का प्रकाश हो चुका है, ऐसे मंत्रवेत्तातथा अपने ऐश्वर्य (सिद्धियों) के बल से सब लोकों में सर्वत्र पहुँचने में सक्षम, मंत्रणा हेतु मनीषियोंसे घिरे हुए देवता, द्विज और नृपदेवर्षि कहे जाते हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इसी पुराण में आगे लिखा है कि धर्म, पुलस्त्य, क्रतु, पुलह, प्रत्यूष, प्रभास और कश्यप - इनके पुत्रों को देवर्षिका पद प्राप्त हुआ। धर्म के पुत्र नर एवं नारायण, क्रतु के पुत्र बालखिल्यगण, पुलहके पुत्र कर्दम, पुलस्त्यके पुत्र कुबेर, प्रत्यूषके पुत्र अचल, कश्यप के पुत्र नारद और पर्वत देवर्षि माने गए, किंतु जनसाधारण देवर्षिके रूप में केवल नारदजी को ही जानता है। उनकी जैसी प्रसिद्धि किसी और को नहीं मिली। वायुपुराण में बताए गए देवर्षि के सारे लक्षण नारदजी में पूर्णत:घटित होते हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
महाभारत के सभापर्व के पांचवें अध्याय में नारदजी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है - देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, न्याय एवं धर्म के तत्त्‍‌वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापण्डित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानोंकी शंकाओं का समाधान करने वाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के यथार्थ के ज्ञाता, योगबलसे समस्त लोकों के समाचार जान सकने में समर्थ, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को जानने वाले, देवताओं-दैत्यों को वैराग्य के उपदेशक, क‌र्त्तव्य-अक‌र्त्तव्य में भेद करने में दक्ष, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सद्गुणों के भण्डार, सदाचार के आधार, आनंद के सागर, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण, सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाले हैं। अट्ठारह महापुराणों में एक नारदोक्त पुराण; बृहन्नारदीय पुराण के नाम से प्रख्यात है। मत्स्यपुराण में वर्णित है कि श्री नारदजी ने बृहत्कल्प-प्रसंग में जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, २५,००० श्लोकों का वह महाग्रन्थ ही नारद महापुराण है। वर्तमान समय में उपलब्ध नारदपुराण २२,००० श्लोकों वाला है। ३,००० श्लोकों की न्यूनता प्राचीन पाण्डुलिपि का कुछ भाग नष्ट हो जाने के कारण हुई है। नारदपुराण में लगभग ७५० श्लोक ज्योतिषशास्त्र पर हैं। इनमें ज्योतिष के तीनों स्कन्ध-सिद्धांत, होरा और संहिता की सर्वागीण विवेचना की गई है। नारदसंहिता के नाम से उपलब्ध इनके एक अन्य ग्रन्थ में भी ज्योतिषशास्त्र के सभी विषयों का सुविस्तृत वर्णन मिलता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि देवर्षिनारद भक्ति के साथ-साथ ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। आजकल धार्मिक चलचित्रों और धारावाहिकों में नारदजी का जैसा चरित्र-चित्रण हो रहा है, वह देवर्षि की महानता के सामने एकदम बौना है। नारदजी के पात्र को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे आम आदमी में उनकी छवि लडा़ई-झगडा़ करवाने वाले व्यक्ति अथवा विदूषक की बन गई है। यह उनके प्रकाण्ड पांडित्य एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति सरासर अन्याय है। नारद जी का उपहास उडाने वाले श्रीहरि के इन अंशावतार की अवमानना के दोषी है। भगवान की अधिकांश लीलाओं में नारदजी उनके अनन्य सहयोगी बने हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारदजी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span style=&quot;color: #073763; font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;जन्म कथा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
देवर्षि नारद पहले गन्धर्व थे। एक बार ब्रह्मा जी की सभा में सभी देवता और गन्धर्व भगवन्नाम का संकीर्तन करने के लिए आए। नारद जी भी अपनी स्त्रियों के साथ उस सभा में गए। भगवान के संकीर्तन में विनोद करते हुए देखकर ब्रह्मा जी ने इन्हें शाप दे दिया। जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गई। इनकी माता दासी का कार्य करके इनका भरण-पोषण करने लगीं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
एक दिन गांव में कुछ महात्मा आए और चातुर्मास्य बिताने के लिए वहीं ठहर गए। नारद जी बचपन से ही अत्यंत सुशील थे। वह खेलकूद छोड़ कर उन साधुओं के पास ही बैठे रहते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा भी बड़े मन से करते थे। संत-सभा में जब भगवत्कथा होती थी तो यह तन्मय होकर सुना करते थे। संत लोग इन्हें अपना बचा हुआ भोजन खाने के लिए दे देते थे।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
साधुसेवा और सत्संग अमोघ फल प्रदान करने वाला होता है। उसके प्रभाव से नारद जी का हृदय पवित्र हो गया और इनके समस्त पाप धुल गए। जाते समय महात्माओं ने प्रसन्न होकर इन्हें भगवन्नाम का जप एवं भगवान के स्वरूप के ध्यान का उपदेश दिया।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
एक दिन सांप के काटने से उनकी माता जी भी इस संसार से चल बसीं। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गए। उस समय इनकी अवस्था मात्र पांच वर्ष की थी। माता के वियोग को भी भगवान का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथों के नाथ दीनानाथ का भजन करने के लिए चल पड़े। एक दिन जब नारद जी वन में बैठकर भगवान के स्वरूप का ध्यान कर रहे थे, अचानक इनके हृदय में भगवान प्रकट हो गए और थोड़ी देर तक अपने दिव्य स्वरूप की झलक दिखाकर अन्तर्धान हो गए।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भगवान का दोबारा दर्शन करने के लिए नारद जी के मन में परम व्याकुलता पैदा हो गई। वह बार-बार अपने मन को समेट कर भगवान के ध्यान का प्रयास करने लगे, किंतु सफल नहीं हुए। उसी समय आकाशावाणी हुई, ‘‘अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में मुझे पुन: प्राप्त करोगे।’’&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
समय आने पर नारद जी का पांच भौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अंत में वह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। यह भगवान की भक्ति और महात्म्य के विस्तार के लिए अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद् गुणों का गान करते हुए निरंतर विचरण किया करते हैं। इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इनके द्वारा प्रणीत भक्ति सूत्र में भक्ति की बड़ी ही सुंदर व्याख्या है। अब भी यह अप्रत्यक्ष रूप से भक्तों की सहायता करते रहते हैं। भक्त प्रह्लाद, भक्त अम्बरीष, ध्रुव आदि भक्तों को उपदेश  देकर इन्होंने ही उन्हें भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। इनकी समस्त लोकों में अबाधित गति है। इनका मंगलमय जीवन संसार के मंगल के लिए ही है। यह ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भंडार, आनंद के सागर तथा सब भूतों के अकारण प्रेमी और विश्व के सहज हितकारी हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अविरल भक्ति के प्रतीक और ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाने वाले देवर्षि नारद का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक भक्त की पुकार भगवान तक पहुंचाना है। वह विष्णु के महानतम भक्तों में माने जाते हैं और इन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त है। भगवान विष्णु की कृपा से यह सभी युगों और तीनों लोगों में कहीं भी प्रकट हो सकते हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #073763; font-size: large;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #073763; font-size: large;&quot;&gt;विभिन्न धर्मग्रन्थों में&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
नारद मुनि को देवर्षि कहा गया है। विभिन्न धर्मग्रन्थों में इनका उल्लेख आता है। कुछ उल्लेख निम्न हैं:&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;ul style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
&lt;li&gt;अथर्ववेद के अनुसार नारद नाम के एक ऋषि हुए हैं।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;ऐतरेय ब्राह्मण के कथन के अनुसार हरिशचंद्र के पुरोहित सोमक, साहदेव्य के शिक्षक तथा आग्वष्टय एवं युधाश्रौष्ठि को अभिशप्त करने वाले भी नारद थे।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;सामविधान ब्राह्मण में बृहस्पति के शिष्य के रूप में नारद का वर्णन मिलता है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;छान्दोग्यपनिषद् में नारद का नाम सनत्कुमारों के साथ लिखा गया है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;महाभारत में मोक्ष धर्म के नारायणी आख्यान में नारद की उत्तरदेशीय यात्रा का विवरण मिलता है। इसके अनुसार उन्होंने नर-नारायण ऋषियों की तपश्चर्या देखकर उनसे प्रश्न किया और बाद में उन्होंने नारद को पांचरात्र धर्म का श्रवण कराया।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;नारद पंचरात्र के नाम से एक प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थ भी है जिसमें दस महाविद्याओं की कथा विस्तार से कही गई है। इस कथा के अनुसार हरी का भजन ही मुक्ति का परम कारण माना गया है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;नारद पुराण के नाम से एक ग्रन्थ मिलता है। इस ग्रन्थ के पूर्वखंड में 125 अघ्याय और उत्तरखण्ड में 182 अघ्याय हैं।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;कुछ स्मृतिकारों ने नारद का नाम सर्वप्रथम स्मृतिकार के रूप में माना है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;नारद स्मृति में व्यवहार मातृका यानी अदालती कार्रवाई और सभा अर्थात न्यायालय सर्वोपरि माना गया है। इसके अलावा इस स्मृति में ऋणाधान ऋण वापस प्राप्त करना, उपनिधि यानी जमानत, संभुय, समुत्थान यानी सहकारिता, दत्ताप्रदानिक यानी करार करके भी उसे नहीं मानने, अभ्युपेत्य-असुश्रुषा यानी सेवा अनुबंध को तोड़ना है। वेतनस्य अनपाकर्म यानी काम करवाके भी वेतन का भुगतान नहीं करना शामिल है। नारद स्मृति में अस्वामी विक्रय यानी बिना स्वामित्व के किसी चीज का विक्रय कर देने को दंडनीय अपराध माना है। विक्रिया संप्रदान यानी बेच कर सामान न देना भी अपराध की कोटि में है। इसके अतिरिक्त क्रितानुशय यानी खरीदकर भी सामान न लेना, समस्यानपाकर्म यानी निगम श्रेणी आदि के नियमों का भंग करना, सीमाबंद यानी सीमा का विवाद और स्त्रीपुंश योग यानी वैवाहिक संबंध के बारे में भी नियम-कायदों की चर्चा मिलती है। नारद स्मृति में दायभाग यानी पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार और विभाजन की चर्चा भी मिलती है। इसमें साहस यानी बल प्रयोग द्वारा अपराधी को दंडित करने का विधान भी है। नारद स्मृति वाक्पारूष्य यानी मानहानि करने, गाली देने और दण्ड पारूष्य यानी चोट और क्षति पहुँचाने का वर्णन भी करती है। नारद स्मृति के प्रकीर्णक में विविध अपराधों और परिशिष्ट में चौर्य एवं दिव्य परिणाम का निरू पण किया गया है। नारद स्मृति की इन व्यवस्थाओं पर मनु स्मृति का पूर्ण प्रभाव दिखाई देता है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;श्रीमद्भागवत और वायुपुराण के अनुसार देवर्षि नारद का नाम दिव्य ऋषि के रू प में भी वर्णित है। ये ब्रह्मधा के मानस पुत्र थे। नारद का जन्म ब्रह्मधा की जंघा से हुआ था। इन्हें वेदों के संदेशवाहक के रू प में और देवताओं के संवाद वाहक के रू प में भी चित्रित किया गया है। नारद देवताओं और मनुष्यों में कलह के बीज बोने से कलिप्रिय अथवा कलहप्रिय कहलाते हैं। मान्यता के अनुसार वीणा का आविष्कार भी नारद ने ही किया था।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार मेरू के चारों ओर स्थित बीस पर्वतों में से एक का नाम नारद है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;मत्स्य पुराण के अनुसार वास्तुकला विशारद अठारह आचार्यो में से एक का नाम भी नारद है। चार शक्ति देवियों में से एक शक्ति देवी का नाम नारदा है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;रघुवंश के अनुसार लोहे के बाण को नाराच कहते हैं। जल के हाथी को भी नाराच कहा जाता है। स्वर्णकार की तराजू अथवा कसौटी का नाम नाराचिका अथवा नाराची है।&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;मनुस्मृति के अनुसार एक प्राचीन ऋषि का नाम नारायण है जो नर के साथी थे। नारायण ने ही अपनी जंघा से उर्वशी को उत्पन्न किया था। विष्णु के एक विशेषण के रू प में भी नारायण शब्द का प्रयोग किया जाता है।&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2016/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj60O5_ujTVc9YesfxUsC7q4s0JJ4OaUZBVCRbaxDvMGWjpePpyI9mzsdG8jkrDeiQP8EqplFTrfBCve-BdyO2XE9cwhGvtsPcDg-hRKW0tOUhUonYoyItofPIjLikUmAaDy8UGm2orUtv_/s72-c/988684_541819569189631_1486447738_n.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-1875842242062585448</guid><pubDate>Mon, 07 Oct 2013 16:35:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-07T22:05:20.681+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">शैलपुत्री</category><title>शैलपुत्री - नवदुर्गाओं में प्रथम स्वरुप </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। दुर्गाजी पहले स्वरूप में &#39;शैलपुत्री&#39; के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम &#39;शैलपुत्री&#39; पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को &#39;मूलाधार&#39; चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhhSZL2bGqBY6mL1o_JQwMktgR6ce7PiaSQC8ZNiD-Y6O9zQvIGnVc1s7ENzFKoSFkIgjir_ucB-4XPUhzFu2Tkl4yFuFcgFtHLMNpnz7NT7GV-Hkmw0yeKLaJTK6TrZUM0jk57JBBXR3Dy/s1600/A--shailputri_jpg-01.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhhSZL2bGqBY6mL1o_JQwMktgR6ce7PiaSQC8ZNiD-Y6O9zQvIGnVc1s7ENzFKoSFkIgjir_ucB-4XPUhzFu2Tkl4yFuFcgFtHLMNpnz7NT7GV-Hkmw0yeKLaJTK6TrZUM0jk57JBBXR3Dy/s200/A--shailputri_jpg-01.jpg&quot; width=&quot;158&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरुप&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
वृषभ-स्थिता इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम &#39;सती&#39; था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;कथा &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे &#39;शैलपुत्री&#39; नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&#39;शैलपुत्री&#39; देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;स्तुति&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌ । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥ &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_2064.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhhSZL2bGqBY6mL1o_JQwMktgR6ce7PiaSQC8ZNiD-Y6O9zQvIGnVc1s7ENzFKoSFkIgjir_ucB-4XPUhzFu2Tkl4yFuFcgFtHLMNpnz7NT7GV-Hkmw0yeKLaJTK6TrZUM0jk57JBBXR3Dy/s72-c/A--shailputri_jpg-01.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-742641051814825621</guid><pubDate>Mon, 07 Oct 2013 16:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-07T22:02:59.739+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">चंद्रघंटा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><title>चंद्रघंटा - नवदुर्गाओं में तृतीय स्वरूप </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन &#39;मणिपूर&#39; चक्र में प्रविष्ट होता है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं। असुरों के साथ युद्ध में देवी ने घंटे की टंकार से असुरों को चित्त कर दिया। यह नाद की देवी हैं। स्वर विज्ञान की देवी हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgUb0JhWxifddaQ5Jgs_U0lb9GrSbN59-BTcYCvXBTcuTXJ0E6R0CpS3qGwLJIwxbz5wHVtK5EwSFf-XZOWimj0X4lUrw6c__prjOm_go4LyTjHTmMq5kMC5qE3ZdutxlGF3_NKHQgrVwuD/s1600/C--Chandraghanta_jpg-03.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgUb0JhWxifddaQ5Jgs_U0lb9GrSbN59-BTcYCvXBTcuTXJ0E6R0CpS3qGwLJIwxbz5wHVtK5EwSFf-XZOWimj0X4lUrw6c__prjOm_go4LyTjHTmMq5kMC5qE3ZdutxlGF3_NKHQgrVwuD/s200/C--Chandraghanta_jpg-03.jpg&quot; width=&quot;157&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरूप&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;कृपा &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया असाधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;पूजन&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_5260.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgUb0JhWxifddaQ5Jgs_U0lb9GrSbN59-BTcYCvXBTcuTXJ0E6R0CpS3qGwLJIwxbz5wHVtK5EwSFf-XZOWimj0X4lUrw6c__prjOm_go4LyTjHTmMq5kMC5qE3ZdutxlGF3_NKHQgrVwuD/s72-c/C--Chandraghanta_jpg-03.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-6963182348615812976</guid><pubDate>Mon, 07 Oct 2013 16:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-07T22:02:34.739+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ब्रह्मचारिण</category><title>ब्रह्मचारिणी- नवदुर्गाओं में द्वितीय स्वरुप </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। ब्रह्म को अपने अंतस में धारण करने वाली देवी भगवती ब्रह्म को संचालित करती हैं। ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का महामंत्र ब्रह्मïचारिणी देवी ने ही प्रदान किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhoiNdOI7YtmAFEvpmM5Zwe4Yla4VCg2MLTTFKdCYqAOlIYFkNNTHwBOT_BMbGAnilGCKLzd0cGoRIBGlKseppB3JB5AdLGnFrgewWvHGrcW4n4xf-ncVhUe_Y6zRvvXmpZFZcl0_AXYMLy/s1600/B--Brahmacharini-Mata_jpg-0.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhoiNdOI7YtmAFEvpmM5Zwe4Yla4VCg2MLTTFKdCYqAOlIYFkNNTHwBOT_BMbGAnilGCKLzd0cGoRIBGlKseppB3JB5AdLGnFrgewWvHGrcW4n4xf-ncVhUe_Y6zRvvXmpZFZcl0_AXYMLy/s200/B--Brahmacharini-Mata_jpg-0.jpg&quot; width=&quot;126&quot; /&gt;&lt;/a&gt;इस दिन साधक कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए भी साधना करते हैं। जिससे उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरुप&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;फल&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&amp;nbsp;नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&amp;nbsp;अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;पूजन&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_8802.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhoiNdOI7YtmAFEvpmM5Zwe4Yla4VCg2MLTTFKdCYqAOlIYFkNNTHwBOT_BMbGAnilGCKLzd0cGoRIBGlKseppB3JB5AdLGnFrgewWvHGrcW4n4xf-ncVhUe_Y6zRvvXmpZFZcl0_AXYMLy/s72-c/B--Brahmacharini-Mata_jpg-0.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-5642385272845168292</guid><pubDate>Mon, 07 Oct 2013 16:30:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-07T22:00:22.772+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कूष्मांडा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><title>कूष्मांडा - नवदुर्गाओं में चतुर्थ स्वरुप </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन &#39;अदाहत&#39; चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है।&amp;nbsp;अपनी मंद, हल्की हँसी द्वारा अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के रूप में पूजा जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी माँ कूष्माण्डा कहलाती हैं। संसार में जितनी भी प्रकार की अभिलाषा है वह देवी कूष्मांडा की पूजा करने मात्र से प्राप्त हो जाती है। इन देवी को ही तृष्णा और तृप्ति का कारण माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgYqsjflbzCrgApSk3_SMcS17XaLtlKEkxycFcdsBrzmzEDJIjgeSD3fx1qUPXKG1w9HSXTKNxRYBNlAvxtrRscbZAy1zzX1wHSZHCsbBm-dm4Jz9yUzb_IYYTNumylnTKxRqzsbPnnCbfh/s1600/D--Maa-Kushmanda_jpg-04.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgYqsjflbzCrgApSk3_SMcS17XaLtlKEkxycFcdsBrzmzEDJIjgeSD3fx1qUPXKG1w9HSXTKNxRYBNlAvxtrRscbZAy1zzX1wHSZHCsbBm-dm4Jz9yUzb_IYYTNumylnTKxRqzsbPnnCbfh/s200/D--Maa-Kushmanda_jpg-04.jpg&quot; width=&quot;159&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;स्वरुप&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;महिमा&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है। विधि-विधान से माँ के भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरूप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
चतुर्थी के दिन माँ कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में चतुर्थ दिन इसका जाप करना चाहिए।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।&lt;br /&gt;नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;पूजन&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इस दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना श्रेयस्कर है। इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए। जिससे माताजी प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_7476.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgYqsjflbzCrgApSk3_SMcS17XaLtlKEkxycFcdsBrzmzEDJIjgeSD3fx1qUPXKG1w9HSXTKNxRYBNlAvxtrRscbZAy1zzX1wHSZHCsbBm-dm4Jz9yUzb_IYYTNumylnTKxRqzsbPnnCbfh/s72-c/D--Maa-Kushmanda_jpg-04.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-9023216574936976947</guid><pubDate>Mon, 07 Oct 2013 16:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-07T21:59:26.232+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">स्कंदमाता</category><title>स्कंदमाता - नवदुर्गाओं में पंचम स्वरूप</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।इस दिन साधक का मन &#39;विशुद्ध&#39; चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते है ।भगवान स्कंद &#39;कुमार कार्तिकेय&#39; नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। स्कंदकुमार को पुत्र के रूप में पैदा करने और तारकासुर का अंत करने में कारक सिद्ध होने के कारण वह जगतमाता कहलाईं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjtp8SQXt6_WYDoWAlreblEWnk14qBw5oqQaJVb0QbSBNGBUHMEuYG0nDZDFB5UK_-jQTG8YlhgQTUFKhxOxafkgzWNZEZgMm6uhYK_GeeHcdn2X-eqfnIuHZN8Rs8kkHTVuGXRnNs3aLSJ/s1600/E--Skanda-Mata_jpg-05.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjtp8SQXt6_WYDoWAlreblEWnk14qBw5oqQaJVb0QbSBNGBUHMEuYG0nDZDFB5UK_-jQTG8YlhgQTUFKhxOxafkgzWNZEZgMm6uhYK_GeeHcdn2X-eqfnIuHZN8Rs8kkHTVuGXRnNs3aLSJ/s200/E--Skanda-Mata_jpg-05.jpg&quot; width=&quot;170&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरुप&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;महत्व&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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नवरात्रि-पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। एक अलौकिक प्रभामंडल अदृश्य भाव से सदैव उसके चतुर्दिक्‌ परिव्याप्त रहता है। यह प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है। हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिए। इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है। &lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में पाँचवें दिन इसका जाप करना चाहिए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_3971.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjtp8SQXt6_WYDoWAlreblEWnk14qBw5oqQaJVb0QbSBNGBUHMEuYG0nDZDFB5UK_-jQTG8YlhgQTUFKhxOxafkgzWNZEZgMm6uhYK_GeeHcdn2X-eqfnIuHZN8Rs8kkHTVuGXRnNs3aLSJ/s72-c/E--Skanda-Mata_jpg-05.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-518124311812859011</guid><pubDate>Mon, 07 Oct 2013 16:28:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-07T21:58:13.599+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कात्यायिनी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><title>कात्यायिनी - नवदुर्गाओं में छठवाँ स्वरूप</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। उस दिन साधक का मन &#39;आज्ञा&#39; चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj8G28l-RkjKQxSXlHwfShfyHbleEbT8VAN6CQyykEQmWX9sC83BFyyVG_P8_8M9wwrmGT5ZARvwiyK84wZf-TIW8iGTW5bG1d_JNBbvR81eZF5dYUDUgthhQWivwERXmk3of5IkYwGSbHZ/s1600/F--katyayani_jpg-06.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj8G28l-RkjKQxSXlHwfShfyHbleEbT8VAN6CQyykEQmWX9sC83BFyyVG_P8_8M9wwrmGT5ZARvwiyK84wZf-TIW8iGTW5bG1d_JNBbvR81eZF5dYUDUgthhQWivwERXmk3of5IkYwGSbHZ/s200/F--katyayani_jpg-06.jpg&quot; width=&quot;159&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरुप&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;कथा&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।  कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो,उन्हे इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
विवाह के लिये कात्यायनी मन्त्र-&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:।।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_552.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj8G28l-RkjKQxSXlHwfShfyHbleEbT8VAN6CQyykEQmWX9sC83BFyyVG_P8_8M9wwrmGT5ZARvwiyK84wZf-TIW8iGTW5bG1d_JNBbvR81eZF5dYUDUgthhQWivwERXmk3of5IkYwGSbHZ/s72-c/F--katyayani_jpg-06.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-1133878947792958006</guid><pubDate>Mon, 07 Oct 2013 16:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-07T21:56:56.870+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी कालरात्रि</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><title>कालरात्रि- नवदुर्गाओं में सप्तम स्वरूप</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन &#39;सहस्रार&#39; चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। सहस्रार चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह भागी हो जाता है। उसके समस्त पापों-विघ्नों का नाश हो जाता है। उसे अक्षय पुण्य-लोकों की प्राप्ति होती है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgC_GSscXz57wJqtF4afuYdHD4l1-G-x25eSDpLFGZWta7vrmdrs13kku9oqphTv8Zk-SZdpnu408VR6HPzLJwlYUGkAXQp5VgUNfKzlic5dRAuitns4Ez4FN_Qn8BPNIA-OQmOECq7MnLx/s1600/G--kalratri_jpg-07.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgC_GSscXz57wJqtF4afuYdHD4l1-G-x25eSDpLFGZWta7vrmdrs13kku9oqphTv8Zk-SZdpnu408VR6HPzLJwlYUGkAXQp5VgUNfKzlic5dRAuitns4Ez4FN_Qn8BPNIA-OQmOECq7MnLx/s200/G--kalratri_jpg-07.jpg&quot; width=&quot;143&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरूप&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सदृश गोल हैं। इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं। माँ की नासिका के श्वास-प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभ (गदहा) है। ये ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग (कटार) है। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम &#39;शुभंकारी&#39; भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है। माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए। नवरात्रि दिवस== नवरात्रि की सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है, तेज बढ़ता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में सातवें दिन इसका जाप करना चाहिए।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान करें&amp;nbsp;। &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_7.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgC_GSscXz57wJqtF4afuYdHD4l1-G-x25eSDpLFGZWta7vrmdrs13kku9oqphTv8Zk-SZdpnu408VR6HPzLJwlYUGkAXQp5VgUNfKzlic5dRAuitns4Ez4FN_Qn8BPNIA-OQmOECq7MnLx/s72-c/G--kalratri_jpg-07.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-4771946877268506589</guid><pubDate>Sat, 05 Oct 2013 18:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-05T23:49:21.363+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">महागौरी</category><title>महागौरी - नवदुर्गाओं में अष्टम स्वरूप</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhFsKSRFiSvwTdf_OESjXZjB_J-3bmLNpkJfJoAg4DkHxZr84whGjmiSPFC-dreju9VCNxUEAo9U-1SrNMqt5JVPATRD-JM6AlTv0Btd8DmDZ0dNrOSxB47gpOUZotPo1OD7bPxGeQsXzW6/s1600/H--Maa_Mahagauri_jpg-08.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhFsKSRFiSvwTdf_OESjXZjB_J-3bmLNpkJfJoAg4DkHxZr84whGjmiSPFC-dreju9VCNxUEAo9U-1SrNMqt5JVPATRD-JM6AlTv0Btd8DmDZ0dNrOSxB47gpOUZotPo1OD7bPxGeQsXzW6/s200/H--Maa_Mahagauri_jpg-08.jpg&quot; width=&quot;150&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरूप&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- &#39;अष्टवर्षा भवेद् गौरी।&#39; इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;कथा &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अपने पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए बड़ी कठोर तपस्या की थी। इन्होंने भगवान शिव के वरण के लिए कठोर संकल्प लिया था ।&amp;nbsp;इनकी प्रतिज्ञा थी कि&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात्‌। (नारद पांचरात्र)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरऊँ संभु न त रहऊँ कुँआरी॥ (राम चरित मानस&amp;nbsp;)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इस कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर एकदम काला पड़ गया। इनकी तपस्या से प्रसन्न और संतुष्ट होकर जब भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान-गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य की वृत्तियों को सत्‌ की ओर प्रेरित करके असत्‌ का विनाश करती हैं। हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए। माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए। महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं। इनकी उपासना से आर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। अतः इनके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।&lt;br /&gt;नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।          &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post_5.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhFsKSRFiSvwTdf_OESjXZjB_J-3bmLNpkJfJoAg4DkHxZr84whGjmiSPFC-dreju9VCNxUEAo9U-1SrNMqt5JVPATRD-JM6AlTv0Btd8DmDZ0dNrOSxB47gpOUZotPo1OD7bPxGeQsXzW6/s72-c/H--Maa_Mahagauri_jpg-08.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-4415187873907532468</guid><pubDate>Sat, 05 Oct 2013 18:18:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-05T23:48:22.257+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नवदुर्गा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">सिद्धिदात्री</category><title>सिद्धिदात्री- नवदुर्गाओं में नवम स्वरुप </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhsuJ-nmd3OzcqGkderAFbqDtXOcAbzlxt0cv2JbaPPs111wy8jF09003WoAHSkygn8QcpaeJsePlEGvcD7jGrEJ3-rAb4hRIK5N80hujl60TTCWtbNrlNIS68A55N7xkUEOLgGEZszHX9F/s1600/I--Siddhidatri-Maa_jpg-09.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhsuJ-nmd3OzcqGkderAFbqDtXOcAbzlxt0cv2JbaPPs111wy8jF09003WoAHSkygn8QcpaeJsePlEGvcD7jGrEJ3-rAb4hRIK5N80hujl60TTCWtbNrlNIS68A55N7xkUEOLgGEZszHX9F/s200/I--Siddhidatri-Maa_jpg-09.jpg&quot; width=&quot;182&quot; /&gt;&lt;/a&gt;माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं।&amp;nbsp;नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं ।&amp;nbsp;ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।  माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में &#39;अर्द्धनारीश्वर&#39; नाम से प्रसिद्ध हुए।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्वरुप&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;उपासना&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। &lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ के चरणों का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा , लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;स्तुति&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&amp;nbsp;माँ सिद्धिदात्री&amp;nbsp;की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;&lt;b&gt;या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।&lt;br /&gt; नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अर्थ हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।    &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/10/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhsuJ-nmd3OzcqGkderAFbqDtXOcAbzlxt0cv2JbaPPs111wy8jF09003WoAHSkygn8QcpaeJsePlEGvcD7jGrEJ3-rAb4hRIK5N80hujl60TTCWtbNrlNIS68A55N7xkUEOLgGEZszHX9F/s72-c/I--Siddhidatri-Maa_jpg-09.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-8317910465057442741</guid><pubDate>Mon, 30 Sep 2013 09:06:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-09-30T14:36:26.125+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">श्री कृष्ण</category><title>परिचय - श्री कृष्ण ( श्रीमद भगवद गीता )</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;श्री कृष्ण - परिचय&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #0b5394;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;
&lt;span style=&quot;color: #0b5394;&quot;&gt;&lt;b&gt;(श्रीमद भगवद गीता में स्वयं श्री कृष्ण द्वारा दिया गया परिचय )&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh3LeQyEru6JJOD7FTrceiOMsRw7zDSY2UF0EMqtjnAsreNoqaBfNLjaTZKjvwHGh4Z2ZAGuEgOEFnVAcwoI08qoSzwWC6rWCnvMlaSPkv38KiXMuv2kx3d_fVFEZ3Din5jkg0yT2Ey1w0x/s400/krishna.bmp&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh3LeQyEru6JJOD7FTrceiOMsRw7zDSY2UF0EMqtjnAsreNoqaBfNLjaTZKjvwHGh4Z2ZAGuEgOEFnVAcwoI08qoSzwWC6rWCnvMlaSPkv38KiXMuv2kx3d_fVFEZ3Din5jkg0yT2Ey1w0x/s1600/krishna.bmp&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था, विवस्वान ने यह उपदेश अपने पुत्र मनुष्यों के जन्म-दाता मनु को दिया और मनु ने यह उपदेश अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को दिया।&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;background-color: white; color: #121212; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18px;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त इस विज्ञान सहित ज्ञान को राज-ऋषियों ने बिधि-पूर्वक समझा, किन्तु समय के प्रभाव से वह परम-श्रेष्ठ विज्ञान सहित ज्ञान इस संसार से प्राय: छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो गया। (२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग (आत्मा का परमात्मा से मिलन का विज्ञान) तुझसे कहा जा रहा है क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय मित्र भी है, अत: तू ही इस उत्तम रहस्य को समझ सकता है। (३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं किसी भी समय में नहीं था, या तू नहीं था अथवा ये समस्त राजा नहीं थे और न ऐसा ही होगा कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं, मुझे तो वह सभी जन्म याद है लेकिन तुझे कुछ भी याद नही है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
यधपि मैं अजन्मा और अविनाशी समस्त जीवात्माओं का परमेश्वर ( स्वामी )होते हुए भी अपनी अपरा-प्रकृति ( महा-माया ) को अधीन करके अपनी परा-प्रकृति ( योग-माया ) से प्रकट होता हूँ। (६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
बुद्धिहीन मनुष्य मुझ अप्रकट परमात्मा को मनुष्य की तरह जन्म लेने वाला समझते हैं इसलिय वह मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी स्वरूप के परम-प्रभाव को नही समझ पाते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी के लिये प्रकट नही हूँ क्योंकि में अपनी अन्तरंगा शक्ति योग-माया द्वारा आच्छादित रहता हूँ, इसलिए यह मूर्ख मनुष्य मुझ अजन्मा, अविनाशी परमात्मा को नहीं समझ पाते है। (२५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! मैं भूतकाल में, वर्तमान में और भविष्य में जन्म-मृत्यु को प्राप्त होने वाले सभी प्राणीयों को जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई नही जानता है। (२६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य मुझे जन्म-मृत्यु रहित, आदि-अंत रहित और सभी लोकों का महान ईश्वरीय रूप को जान जाता है, वह मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य मोह से मुक्त होकर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं, इस प्रकार जो कोई वास्तविक स्वरूप से मुझे जानता है, वह शरीर को त्याग कर इस संसार मे फ़िर से जन्म को प्राप्त नही होता है, बल्कि मुझे अर्थात मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
किन्तु तू अपनी इन आँखो की दृष्टि से मेरे इस रूप को देखने में निश्चित रूप से समर्थ नहीं है, इसलिये मैं तुझे अलौकिक दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मेरी इस ईश्वरीय योग-शक्ति को देख।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मैं सब भूतों के हृदय में स्तिथ सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य तथा अंत भी मैं ही हूँ&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विचार के द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय होते हैं और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेद ,वेदों का अंत कर्ता और वेदों को जानने वाला भी&amp;nbsp;मैं ही हूँ&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों को भोगने वाला, संपूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर, तथा संपूर्ण भूत प्राणियों का सुह्र्द अर्थात स्वार्थ रहित दयालु और प्रेमी ऐसा तत्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है |&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
श्री भगवान ने कहा - हे पृथापुत्र! अब उसको सुन जिससे तू योग का अभ्यास करते हुए मुझमें अनन्य भाव से मन को स्थित करके और मेरी शरण होकर सम्पूर्णता से मुझको बिना किसी संशय के जान सकेगा। (१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
अब मैं तेरे लिए उस परम-ज्ञान को अनुभव सहित कहूँगा, जिसको पूर्ण रूप से जानने के बाद भविष्य में इस संसार में तेरे लिये अन्य कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहेगा। (२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हजारों मनुष्यों में से कोई एक मेरी प्राप्ति रूपी सिद्धि की इच्छा करता है और इस प्रकार सिद्धि की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने वाले मनुष्यों में से भी कोई एक मुझको तत्व रूप से साक्षात्कार सहित जान पाता है। (३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - ऎसे यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो मेरी जड़ स्वरूप अपरा प्रकृति है। (४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे महाबाहु अर्जुन! परन्तु इस जड़ स्वरूप अपरा प्रकृति (माया) के अतिरिक्त अन्य चेतन दिव्य-स्वरूप परा प्रकृति (आत्मा) को जानने का प्रयत्न कर, जिसके द्वारा जीव रूप से संसार का भोग किया जाता है। (५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! तू मेरी इन जड़ तथा चेतन प्रकृतियों को ही सभी प्राणीयों के जन्म का कारण समझ, और मैं ही इस सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति तथा प्रलय का मूल कारण हूँ। (६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे धनंजय! मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, जिस प्रकार माला में मोती धागे पर आश्रित रहते हैं उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत मणियों के समान मुझ पर ही आश्रित है। (७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुन्तीपुत्र! मैं ही जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, समस्त वैदिक मन्त्रो में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ और मनुष्यों द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ भी मैं हूँ। (८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं पृथ्वी में पवित्र गंध हूँ, अग्नि में उष्मा हूँ, समस्त प्राणीयों में वायु रूप में प्राण हूँ और तपस्वियों में तप भी मैं हूँ। (९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र! तू मुझको ही सभी प्राणीयों का अनादि-अनन्त बीज समझ, मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वी मनुष्यों का तेज हूँ। (१०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! मैं बलवानों का कामना-रहित और आसक्ति-रहित बल हूँ, और सब प्राणीयों में धर्मानुसार (शास्त्रानुसार) विषयी जीवन हूँ। (११)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे अर्जुन! मैं ही वैदिक कर्मकाण्ड को करने वाला हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को दिये जाने वाला तर्पण हूँ, मैं ही जडी़-बूटी रूप में ओषधि हूँ, मैं ही मंत्र हूँ, मैं ही घृत हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं ही हवन मै दी जाने वाली आहूति हूँ। (१६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मैं ही पालन करने वाला पिता हूँ, मैं ही उत्पन्न करने वाली माता हूँ, मैं ही मूल स्रोत पितामहः हूँ, मैं ही इसे धारण करने वाला हूँ, मैं ही पवित्र करने वाला ओंकार शब्द से जानने योग्य हूँ, मैं ही ऋग्वेद (सम्पूर्ण प्रार्थना),&amp;nbsp;सामवेद (समत्व-भाव) और यजुर्वेद (यजन की विधि) हूँ। (१७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मै ही सभी प्राप्त होने वाला परम-लक्ष्य हूँ, मैं ही सभी का भरण-पोषण करने वाला हूँ, मैं ही सभी का स्वामी हूँ, मैं ही सभी के अच्छे-बुरे कर्मो को देखने वाला हूँ, मैं ही सभी का परम-धाम हूँ, मैं ही सभी की शरण-स्थली हूँ, मैं ही सभी से प्रेम करने वाला घनिष्ट-मित्र हूँ, मैं ही सृष्टि को उत्पन्न करने वाला हूँ, मैं ही सृष्टि का संहार करने वाला हूँ, मैं ही सभी का स्थिर आधार हूँ, मै ही सभी को आश्रय देने वाला हूँ, और मैं ही सभी का अविनाशी कारण हूँ। (१८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! मैं ही सूर्य रूप में तप कर जल को भाप रूप में रोक कर वर्षा रूप में उत्पन्न होता हूँ, मैं ही निश्चित रूप से अमर-तत्व हूँ, मैं ही मृत-तत्व हूँ, मै ही सत्य रूप में तत्व हूँ और मैं ही असत्य रूप में पदार्थ हूँ। (१९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
श्री भगवान ने कहा - हे कुरुश्रेष्ठ! हाँ अब मैं तेरे लिये अपने मुख्य अलौकिक ऎश्वर्यपूर्ण रूपों को कहूँगा, क्योंकि मेरे विस्तार की तो कोई सीमा नहीं है। (१९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे अर्जुन! मैं समस्त प्राणीयों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ और मैं ही सभी प्राणीयों की उत्पत्ति का, मैं ही सभी प्राणीयों के जीवन का और मैं ही सभी प्राणीयों की मृत्यु का कारण हूँ। (२०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी आदित्यों में विष्णु हूँ, मैं सभी ज्योतियों में प्रकाशमान सूर्य हूँ, मैं सभी मरुतों में मरीचि नामक वायु हूँ, और मैं ही सभी नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ। (२१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी वेदों में सामवेद हूँ, मैं सभी देवताओं में स्वर्ग का राजा इंद्र हूँ, सभी इंद्रियों में मन हूँ, और सभी प्राणियों में चेतना स्वरूप जीवन-शक्ति हूँ। (२२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी रुद्रों में शिव हूँ, मैं यक्षों तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ, मैं सभी वसुओं में अग्नि हूँ और मै ही सभी शिखरों में मेरु हूँ। (२३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पार्थ! सभी पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति मुझे ही समझ, मैं सभी सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ, और मैं ही सभी जलाशयों में समुद्र हूँ। (२४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं महर्षियों में भृगु हूँ, मैं सभी वाणी में एक अक्षर हूँ, मैं सभी प्रकार के यज्ञों में जप (कीर्तन) यज्ञ हूँ, और मैं ही सभी स्थिर (अचल) रहने वालों में हिमालय पर्वत हूँ। (२५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी वृक्षों में पीपल हूँ, मैं सभी देवर्षियों में नारद हूँ, मै सभी गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ और मै ही सभी सिद्ध पुरूषों में कपिल मुनि हूँ। (२६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
समस्त घोड़ों में समुद्र मंथन से अमृत के साथ उत्पन्न उच्चैःश्रवा घोड़ा मुझे ही समझ, मैं सभी हाथियों में ऐरावत हूँ, और मैं ही सभी मनुष्यों में राजा हूँ। (२७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी हथियारों में वज्र हूँ, मैं सभी गायों में सुरभि हूँ, मैं धर्मनुसार सन्तान उत्पत्ति का कारण रूप प्रेम का देवता कामदेव हूँ, और मै ही सभी सर्पों में वासुकि हूँ। (२८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी नागों (फ़न वाले सर्पों) में शेषनाग हूँ, मैं समस्त जलचरों में वरुणदेव हूँ, मैं सभी पितरों में अर्यमा हूँ, और मैं ही सभी नियमों को पालन करने वालों में यमराज हूँ। (२९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी असुरों में भक्त-प्रहलाद हूँ, मै सभी गिनती करने वालों में समय हूँ, मैं सभी पशुओं में सिंह हूँ, और मैं ही पक्षियों में गरुड़ हूँ। (३०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं समस्त पवित्र करने वालों में वायु हूँ, मैं सभी शस्त्र धारण करने वालों में राम हूँ, मैं सभी मछलियों में मगर हूँ, और मैं ही समस्त नदियों में गंगा हूँ। (३१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! मैं ही समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत हूँ, मैं सभी विद्याओं में ब्रह्मविद्या हूँ, और मैं ही सभी तर्क करने वालों में निर्णायक सत्य हूँ। (३२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सभी अक्षरों में ओंकार हूँ, मैं ही सभी समासों में द्वन्द्व हूँ, मैं कभी न समाप्त होने वाला समय हूँ, और मैं ही सभी को धारण करने वाला विराट स्वरूप हूँ। (३३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं ही सभी को नष्ट करने वाली मृत्यु हूँ, मैं ही भविष्य में सभी को उत्पन्न करने वाली सृष्टि हूँ, स्त्रीयों वाले गुणों में कीर्ति, सोन्दर्य, वाणी की मधुरता, स्मरण शक्ति, बुद्धि, धारणा और क्षमा भी मै ही हूँ। (३४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सामवेद की गाने वाली श्रुतियों में बृहत्साम हूँ, मैं छंदों में गायत्री छंद हूँ, मैं महीनों में मार्गशीर्ष और मैं ही ऋतुओं में वसंत हूँ। (३५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं छलने वालो का जुआ हूँ, मैं तेजस्वियों का तेज हूँ, मैं जीतने वालों की विजय हूँ, मैं व्यवसायियों का निश्चय हूँ और मैं ही सत्य बोलने वालों का सत्य हूँ। (३६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं वृष्णिवंशियों में वासुदेव हूँ, मैं ही पाण्डवों में अर्जुन हूँ, मैं मुनियों में वेदव्यास हूँ, और मैं ही कवियों में शुक्राचार्य हूँ। (३७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं दमन करने वालों का दंड हूँ, मैं विजय की कामना वालों की नीति हूँ, मैं रहस्य रखने वालों का मौन हूँ और मैं ही ज्ञानीयों का ज्ञान हूँ। (३८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! वह बीज भी मैं ही हूँ जिनके कारण सभी प्राणीयों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि संसार में कोई भी ऎसा चर (चलायमान) या अचर (स्थिर) प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना अलग रह सके। (३९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे परन्तप अर्जुन! मेरी लौकिक और अलौकिक ऎश्वर्यपुर्ण स्वरूपों का अंत नहीं है, मैंने अपने इन ऎश्वर्यों का वर्णन तो तेरे लिए संक्षिप्त रूप से कहा है। (४०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
श्री भगवान ने कहा - हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों अनेक प्रकार के अलौकिक रूपों को और अनेक प्रकार के रंगो वाली आकृतियों को भी देख। (५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तू मुझमें अदिति के बारह पुत्रों को, आठों वसुओं को, ग्यारह रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को, उनचासों मरुतगणों को और इसके पहले कभी किसी के द्वारा न देखे हुए उन अनेकों आश्चर्यजनक रूपों को भी देख। (६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! तू मेरे इस शरीर में एक स्थान में चर-अचर सृष्टि सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देख और अन्य कुछ भी तू देखना चाहता है उन्हे भी देख। (७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तुयें है, उन-उन को तू मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ समझ। (४१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
श्री भगवान्‌ ने कहा - हे महाबाहु अर्जुन! तू मेरे परम-प्रभावशाली वचनों को फ़िर से सुन, क्योंकि मैं तुझे अत्यन्त प्रिय मानता हूँ इसलिये तेरे हित के लिये कहता हूँ। (१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे ऎश्वर्य के प्रभाव को न तो कोई देवतागण जानते हैं और न ही कोई महान ऋषिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं ही सभी प्रकार से देवताओं और महर्षियों को उत्पन्न करने वाला हूँ। (२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य मुझे जन्म-मृत्यु रहित, आदि-अंत रहित और सभी लोकों का महान ईश्वरीय रूप को जान जाता है, वह मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य मोह से मुक्त होकर सभी पापों से मुक्त हो जाता है। (३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! समस्त ज्ञानों में भी सर्वश्रेष्ठ इस परम-ज्ञान को मैं तेरे लिये फिर से कहता हूँ, जिसे जानकर सभी संत-मुनियों ने इस संसार से मुक्त होकर परम-सिद्धि को प्राप्त किया हैं। (१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
इस ज्ञान में स्थिर होकर वह मनुष्य मेरे जैसे स्वभाव को ही प्राप्त होता है, वह जीव न तो सृष्टि के प्रारम्भ में फिर से उत्पन्न ही होता हैं और न ही प्रलय के समय कभी व्याकुल होता हैं। (२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे भरतवंशी! मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली योनि(माता) है और मैं ही ब्रह्म (आत्मा) रूप में चेतन-रूपी बीज को स्थापित करता हूँ,&amp;nbsp;इस जड़-चेतन के संयोग से ही सभी चर-अचर प्राणीयों का जन्म सम्भव होता है। (३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुन्तीपुत्र! समस्त योनियों जो भी शरीर धारण करने वाले प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सभी को धारण करने वाली ही जड़ प्रकृति ही माता है और मैं ही ब्रह्म(आत्मा) रूपी बीज को स्थापित करने वाला पिता हूँ। (४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जब कोई मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है और स्वयं को दृष्टा रूप से देखता है तब वह प्रकृति के तीनों गुणों से परे स्थित होकर मुझ परमात्मा को जानकर मेरे दिव्य स्वभाव को ही प्राप्त होता है। (१९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
उस अविनाशी ब्रह्म-पद का मैं ही अमृत स्वरूप, शाश्वत स्वरूप, धर्म स्वरूप और परम-आनन्द स्वरूप एक-मात्र आश्रय हूँ। (२७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! संसार में प्रत्येक शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो कि मन सहित छहों इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति के अधीन होकर कार्य करता है। (७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे अर्जुन! जो प्रकाश सूर्य में स्थित है जिससे समस्त संसार प्रकाशित होता है, जो प्रकाश चन्द्रमा में स्थित है और जो प्रकाश अग्नि में स्थित है, उस प्रकाश को तू मुझसे ही उत्पन्न समझ। (१२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं ही प्रत्येक लोक में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणीयों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा के रूप से वनस्पतियों में जीवन-रस बनकर समस्त प्राणीयों का पोषण करता हूँ। (१३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं ही पाचन-अग्नि के रूप में समस्त जीवों के शरीर में स्थित रहता हूँ, मैं ही प्राण वायु और अपान वायु को संतुलित रखते हुए चार प्रकार के (चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले) अन्नों को पचाता हूँ। (१४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मैं ही समस्त जीवों के हृदय में आत्मा रूप में स्थित हूँ, मेरे द्वारा ही जीव को वास्तविक स्वरूप की स्मृति, विस्मृति और ज्ञान होता है, मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मुझसे ही समस्त वेद उत्पन्न होते हैं और मैं ही समस्त वेदों&amp;nbsp;को जानने वाला हूँ। (१५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ। (१८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अथवा इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योग शक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ |&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
संशय को मिटाने वाली बुद्धि, मोह से मुक्ति दिलाने वाला ज्ञान, क्षमा का भाव, सत्य का आचरण, इंद्रियों का नियन्त्रण, मन की स्थिरता, सुख-दुःख की अनुभूति, जन्म-मृत्यु का कारण, भय-अभय की चिन्ता, अहिंसा का भाव, समानता का भाव,संतुष्ट होने का स्वभाव, तपस्या की शक्ति, दानशीलता का भाव और यश-अपयश की प्राप्ति में जो भी कारण होते हैं यह सभी मनुष्यों के अनेकों प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। (४-५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
सातों महान ऋषि और उनसे भी पहले उत्पन्न होने वाले चारों सनकादि कुमारों तथा स्वयंभू मनु आदि यह सभी मेरे मन की इच्छा-शक्ति से उत्पन्न हुए हैं, संसार के सभी लोकों के समस्त जीव इन्ही की ही सन्ताने है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य मेरी इस विशेष ऎश्वर्य-पूर्ण योग-शक्ति को तत्त्व सहित जानता है, वह स्थिर मन से मेरी भक्ति में स्थित हो जाता है इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है। (७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे पृथापुत्र! तीनों लोकों में मेरे लिये कोई भी कर्तव्य शेष नही है न ही किसी वस्तु का अभाव है न ही किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा है, फ़िर भी मैं कर्तव्य समझ कर कर्म करने में लगा रहता हूँ। &amp;nbsp;हे पार्थ! यदि मैं नियत-कर्मों को&amp;nbsp;सावधानी-पूर्वक न करूँ तो यह निश्चित है कि सभी मनुष्य मेरे ही मार्ग का ही अनुगमन करेंगे। इसलिए यदि मैं कर्तव्य समझ कर कर्म न करूँ तो ये सभी लोक भ्रष्ट हो जायेंगे तब मैं अवांछित-सृष्टि की उत्पत्ति का कारण हो जाऊँगा और&amp;nbsp;इस प्रकार समस्त प्राणीयों को नष्ट करने वाला बन जाऊँगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे भारत! जब भी और जहाँ भी धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं अपने स्वरूप को प्रकट करता हूँ। (७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तों का उद्धार करने के लिए, दुष्टों का सम्पूर्ण विनाश करने के लिए तथा धर्म की फ़िर से स्थापना करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ। (८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
अत: हे अर्जुन! अपने सभी प्रकार के कर्तव्य-कर्मों को मुझमें समर्पित करके पूर्ण आत्म-ज्ञान से युक्त होकर, आशा, ममता, और सन्ताप का पूर्ण रूप से त्याग करके युद्ध कर।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
श्री भगवान ने कहा - मैं इस सम्पूर्ण संसार का नष्ट करने वाला महाकाल हूँ, इस समय इन समस्त प्राणीयों का नाश करने के लिए लगा हुआ हूँ, यहाँ स्थित सभी विपक्षी पक्ष के योद्धा तेरे युद्ध न करने पर भी भविष्य में नही रहेंगे। (३२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे सव्यसाची! इसलिये तू यश को प्राप्त करने के लिये युद्ध करने के लिये खडा़ हो और शत्रुओं को जीतकर सुख सम्पन्न राज्य का भोग कर, यह सभी पहले ही मेरे ही द्वारा मारे जा चुके हैं, तू तो युद्ध में केवल निमित्त बना रहेगा। (३३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और भी अन्य अनेक मेरे द्वारा मारे हुए इन महान योद्धाओं से तू बिना किसी भय से विचलित हुए युद्ध कर, इस युद्ध में तू ही निश्चित रूप से शत्रुओं को जीतेगा। (३४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। (८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! यदि तू अपने मन को मुझमें स्थिर नही कर सकता है, तो भक्ति-योग के अभ्यास द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न कर। (९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
यदि तू भक्ति-योग का अभ्यास भी नही कर सकता है, तो केवल मेरे लिये कर्म करने का प्रयत्न कर, इस प्रकार तू मेरे लिये कर्मों को करता हुआ मेरी प्राप्ति रूपी परम-सिद्धि को ही प्राप्त करेगा। (१०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
यदि तू मेरे लिये कर्म भी नही कर सकता है तो मुझ पर आश्रित होकर सभी कर्मों के फलों का त्याग करके समर्पण के साथ आत्म-स्थित महापुरुष की शरण ग्रहण कर, उनकी प्रेरणा से कर्म स्वत: ही होने लगेगा। (११)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के प्रभाव से तुझे अपना दिव्य विश्वरूप दिखाया है, मेरे इस तेजोमय, अनन्त विश्वरूप को तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। (४७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुरुश्रेष्ठ! मेरे इस विश्वरूप को मनुष्य लोक में न तो यज्ञों के द्वारा, न वेदों के अध्ययन द्वारा, न दान के द्वारा, न पुण्य कर्मों के द्वारा और न कठिन तपस्या द्वारा ही देखा जाना संभव है, मेरे इस विश्वरूप को तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। (४८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे मेरे परम-भक्त! तू मेरे इस विकराल रूप को देखकर न तो अधिक विचलित हो, और न ही मोहग्रस्त हो, अब तू पुन: सभी चिन्ताओं से मुक्त होकर प्रसन्न-चित्त से मेरे इस चतुर्भुज रूप को देख। (४९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
श्री भगवान ने कहा - मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, उसे देख पाना अत्यन्त दुर्लभ है देवता भी इस शाश्वत रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं। (५२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे इस चतुर्भुज रूप को जिसको तेरे द्वारा देखा गया है इस रूप को न वेदों के अध्यन से, न तपस्या से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जाना संभव है। (५३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे परन्तप अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही मेरा साक्षात दर्शन किया जा सकता है, वास्तविक स्वरूप को जाना जा सकता है और इसी विधि से मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है। (५४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जो मनुष्य निरन्तर भक्ति-भाव में स्थिर रहकर सदैव प्रसन्न रहता है, दृढ़ निश्चय के साथ मन सहित इन्द्रियों को वश किये रहता है, और मन एवं बुद्धि को मुझे अर्पित किए हुए रहता है ऎसा भक्त मुझे प्रिय होता है। (१४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य न तो किसी के मन को विचलित करता है और न ही अन्य किसी के द्वारा विचलित होता है, जो हर्ष-संताप और भय-चिन्ताओं से मुक्त है ऎसा भक्त भी मुझे प्रिय होता है। (१५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य किसी भी प्रकार की इच्छा नही करता है, जो शुद्ध मन से मेरी आराधना में स्थित है, जो सभी कष्टों के प्रति उदासीन रहता है और जो सभी कर्मों को मुझे अर्पण करता है ऎसा भक्त मुझे प्रिय होता है। (१६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य न तो कभी हर्षित होता है, न ही कभी शोक करता है, न ही कभी पछताता है और न ही कामना करता है, जो शुभ और अशुभ सभी कर्म-फ़लों को मुझे अर्पित करता है ऎसी भक्ति में स्थित भक्त मुझे प्रिय होता है। (१७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य शत्रु और मित्र में, मान तथा अपमान में समान भाव में स्थित रहता है, जो सर्दी और गर्मी में, सुख तथा दुःख आदि द्वंद्वों में भी समान भाव में स्थित रहता है और जो दूषित संगति से मुक्त रहता है। (१८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो निंदा और स्तुति को समान समझता है, जिसकी मन सहित सभी इन्द्रियाँ शान्त है, जो हर प्रकार की परिस्थिति में सदैव संतुष्ट रहता है और जिसे अपने निवास स्थान में कोई आसक्ति नही होती है ऎसा स्थिर-बुद्धि के साथ भक्ति में&amp;nbsp;स्थित मनुष्य मुझे प्रिय होता है। (१९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु जो मनुष्य इस धर्म रूपी अमृत का ठीक उसी प्रकार से पालन करते हैं जैसा मेरे द्वारा कहा गया है और जो पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरी शरण ग्रहण किये रहते हैं, ऎसी भक्ति में स्थित भक्त मुझको अत्यधिक प्रिय होता हैं। (२०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
श्री भगवान ने कहा - हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर ही क्षेत्र (कर्म-क्षेत्र) कहलाता है और जो इस क्षेत्र को जानने वाला है, वह क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कहलाता है, ऎसा तत्व रूप से जानने वाले महापुरुषों द्वारा कहा गया हैं। (२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे भरतवंशी! तू इन सभी शरीर रूपी क्षेत्रों का ज्ञाता निश्चित रूप से मुझे ही समझ और इस शरीर तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ही ज्ञान कहलाता है, ऐसा मेरा विचार है। (३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
यह शरीर रूपी कर्म-क्षेत्र जैसा भी है एवं जिन विकारों वाला है और जिस कारण से उत्पन्न होता है तथा वह जो इस क्षेत्र को जानने वाला है और जिस प्रभाव वाला है उसके बारे में संक्षिप्त रूप से मुझसे सुन। (४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य इस प्रकार शरीर और शरीर के स्वामी के अन्तर को अपने ज्ञान नेत्रों से देखता है तो वह जीव प्रकृति से मुक्त होने की विधि को जानकर मेरे परम-धाम को प्राप्त होता हैं। (३५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है। (१९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है॥6॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्व &amp;nbsp;से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है॥55॥&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है॥56॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
आसक्ति, भय तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त होकर, अनन्य-भाव (शुद्द भक्ति-भाव) से मेरी शरणागत होकर बहुत से मनुष्य मेरे इस ज्ञान से पवित्र होकर तप द्वारा मुझे अपने-भाव से मेरे-भाव को प्राप्त कर चुके हैं। (१०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र! जो मनुष्य जिस भाव से मेरी शरण ग्रहण करता हैं, मैं भी उसी भाव के अनुरुप उनको फ़ल देता हूँ, प्रत्येक मनुष्य सभी प्रकार से मेरे ही पथ का अनुगमन करते हैं। (११)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकृति के तीन गुणों (सत, रज, तम) के आधार पर कर्म को चार विभागों(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में मेरे द्वारा रचा गया, इस प्रकार मानव समाज की कभी न बदलने वाली व्यवस्था का कर्ता होने पर भी तू मुझे अकर्ता ही समझ। (१३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
कर्म के फल में मेरी आसक्ति न होने के कारण कर्म मेरे लिये बन्धन उत्पन्न नहीं कर पाते हैं, इस प्रकार से जो मुझे जान लेता है, उस मनुष्य के कर्म भी उसके लिये कभी बन्धन उत्पन्न नही करते हैं। (१४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
ऎसा मुक्त पुरूष मुझे सभी यज्ञों और तपस्याओं को भोगने वाला, सभी लोकों और देवताओं का परमेश्वर तथा सम्पूर्ण जीवों पर उपकार करने वाला परम-दयालु एवं हितैषी जानकर परम-शान्ति को प्राप्त होता है। (५ - २९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जो मनुष्य सभी प्राणीयों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणीयों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है। (६ - ३०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणीयों के हृदय में मुझको स्थित देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है (६ - ३१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
सभी प्रकार के योगियों में से जो पूर्ण-श्रद्धा सहित, सम्पूर्ण रूप से मेरे आश्रित हुए अपने अन्त:करण से मुझको निरन्तर स्मरण (दिव्य प्रेमाभक्ति) करता है, ऎसा योगी मेरे द्वारा परम-योगी माना जाता है। (४७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
प्रकृति के तीन गुण - सत्व-गुण, रज-गुण और तम-गुण से उत्पन्न होने वाले भाव उन सबको तू मुझसे उत्पन्न होने वाले समझ, परन्तु प्रकृति के गुण मेरे अधीन रहते है, मैं उनके अधीन नही हूँ। (१२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकृति के इन तीनों गुणों से उत्पन्न भावों द्वारा संसार के सभी जीव मोहग्रस्त रहते हैं, इस कारण प्रकृति के गुणों से अतीत मुझ परम-अविनाशी को नहीं जान पाते हैं। (१३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
यह तीनों दिव्य गुणों से युक्त मेरी अपरा शक्ति स्वरुप माया को पार कर पाना असंभव है, परन्तु जो मनुष्य मेरे शरणागत हो जाते हैं, वह मेरी इस माया को आसानी से पार कर जाते हैं। (१४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्यों में अधर्मी और दुष्ट स्वभाव वाले मूर्ख लोग मेरी शरण ग्रहण नहीं करते है, ऐसे नास्तिक-स्वभाव धारण करने वालों का ज्ञान मेरी माया द्वारा हर लिया जाता है। (१५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! चार प्रकार के उत्तम कर्म करने वाले (१) आर्त - दुख से निवृत्ति चाहने वाले, (२) अर्थार्थी - धन-सम्पदा चाहने वाले (३) जिज्ञासु - केवल मुझे जानने की इच्छा वाले और (४) ज्ञानी - मुझे ज्ञान सहित जानने वाले, भक्त&amp;nbsp;मेरा स्मरण करते हैं। (१६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इनमें से वह ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ है जो सदैव अनन्य भाव से मेरी शुद्ध-भक्ति में स्थित रहता है क्योंकि ऎसे ज्ञानी भक्त को मैं अत्यन्त प्रिय होता हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय होता है। (१७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
यधपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार हृदय वाले हैं, परन्तु मेरे मत के अनुसार ज्ञानी-भक्त तो साक्षात्‌ मेरा ही स्वरूप होता है, क्योंकि वह स्थिर मन-बुद्धि वाला ज्ञानी-भक्त मुझे अपना सर्वोच्च लक्ष्य जानकर मुझमें ही स्थित रहता है। (१८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
अनेकों जन्मों के बाद अपने अन्तिम जन्म में ज्ञानी मेरी शरण ग्रहण करता है उसके लिये सभी के हृदय में स्थित सब कुछ मैं ही होता हूँ, ऎसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है। (१९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जैसे ही कोई भक्त जिन देवी-देवताओं के स्वरूप को श्रद्धा से पूजने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को उन्ही देवी-देवताओं के प्रति स्थिर कर देता हूँ। (२१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
वह भक्त सांसारिक सुख की कामनाओं से श्रद्धा से युक्त होकर उन देवी-देवताओं की पूजा-आराधना करता है और उसकी वह कामनायें पूर्ण भी होती है, किन्तु वास्तव में यह सभी इच्छाऎं मेरे द्वारा ही पूरी की जाती हैं। (२२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु उन अल्प-बुद्धि वालों को प्राप्त वह फल क्षणिक होता है और भोगने के बाद समाप्त हो जाता हैं, देवताओं को पूजने वाले देवलोक को प्राप्त होते हैं किन्तु मेरे भक्त अन्तत: मेरे परम-धाम को ही प्राप्त होते हैं। (२३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य मेरी शरण होकर वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने की इच्छा करता है, ऎसे मनुष्य उस ब्रह्म को, परमात्मा को और उसके सभी कर्मों को पूरी तरह से जानता हैं। (२९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य मुझे अधिभूत (सम्पूर्ण जगत का कर्ता), अधिदैव (सम्पूर्ण देवताओं का नियन्त्रक) तथा अधियज्ञ (सम्पूर्ण फ़लों का भोक्ता) सहित जानता हैं और जिसका मन निरन्तर मुझमें स्थित रहता है वह मनुष्य मृत्यु के समय में भी मुझे&amp;nbsp;जानता है। (३०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे शरीर धारियों मे श्रेष्ठ अर्जुन! मेरी अपरा प्रकृति जो कि निरन्तर परिवर्तनशील है अधिभूत कहलाती हैं, तथा मेरा वह विराट रूप जिसमें सूर्य, चन्द्रमा आदि सभी देवता स्थित है वह अधिदैव कहलाता है और मैं ही प्रत्येक शरीरधारी के हृदय&amp;nbsp;में अन्तर्यामी रूप स्थित अधियज्ञ (यज्ञ का भोक्ता) हूँ। (४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य जीवन के अंत समय में मेरा ही स्मरण करता हुआ शारीरिक बन्धन से मुक्त होता है, वह मेरे ही भाव को अर्थात मुझको ही प्राप्त होता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। (५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अंत समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उसी भाव को ही प्राप्त होता है, जिस भाव का जीवन में निरन्तर स्मरण किया है। (६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए हे अर्जुन! तू हर समय मेरा ही स्मरण कर और युद्ध भी कर, मन-बुद्धि से मेरे शरणागत होकर तू निश्चित रूप से मुझको ही प्राप्त होगा। (७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र! जो मनुष्य बिना विचलित हुए अपनी चेतना (आत्मा) से योग में स्थित होने का अभ्यास करता है, वह निरन्तर चिन्तन करता हुआ उस दिव्य परमात्मा को ही प्राप्त होता है। (८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य को उस परमात्मा के स्वरूप का स्मरण करना चाहिये जो कि सभी को जानने वाला है, पुरातन है, जगत का नियन्ता है, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है, सभी का पालनकर्ता है, अकल्पनीय-स्वरूप है, सूर्य के समान प्रकाशमान है और&amp;nbsp;अन्धकार से परे स्थित है। (९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जो मनुष्य मृत्यु के समय अचल मन से भक्ति मे लगा हुआ, योग-शक्ति के द्वारा प्राण को दोनों भौंहौं के मध्य में पूर्ण रूप से स्थापित कर लेता है, वह निश्चित रूप से परमात्मा के उस परम-धाम को ही प्राप्त होता है। (१०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इस प्रकार ॐकार रूपी एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करके मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मनुष्य मेरे परम-धाम को प्राप्त करता है। (१३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो मनुष्य मेरे अतिरिक्त अन्य किसी का मन से चिन्तन नहीं करता है और सदैव नियमित रूप से मेरा ही स्मरण करता है, उस नियमित रूप से मेरी भक्ति में स्थित भक्त के लिए मैं सरलता से प्राप्त हो जाता हूँ। (१४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे प्राप्त करके उस मनुष्य का इस दुख-रूपी अस्तित्व-रहित क्षणभंगुर संसार में पुनर्जन्म कभी नही होता है, बल्कि वह महात्मा परम-सिद्धि को प्राप्त करके मेरे परम-धाम को प्राप्त होता है। (१५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! इस ब्रह्माण्ड में निम्न-लोक से ब्रह्म-लोक तक के सभी लोकों में सभी जीव जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते रह्ते हैं, किन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मुझे प्राप्त करके मनुष्य का पुनर्जन्म कभी नहीं होता है। (१६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जिसे वेदों में अव्यक्त अविनाशी के नाम से कहा गया है, उसी को परम-गति कहा जाता हैं जिसको प्राप्त करके मनुष्य कभी वापस नहीं आता है, वही मेरा परम-धाम है। (२१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे पृथापुत्र! भक्ति में स्थित मेरा कोई भी भक्त इन सभी मार्गों को जानते हुए भी कभी मोहग्रस्त नहीं होता है, इसलिये हे अर्जुन! तू हर समय मेरी भक्ति में स्थिर हो। (२७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
योग में स्थित मनुष्य वेदों के अध्यन से, यज्ञ से, तप से और दान से प्राप्त सभी पुण्य-फलों को भोगता हुआ अन्त में निश्चित रूप से तत्व से जानकर मेरे परम-धाम को ही प्राप्त करता है, जो कि मेरा मूल निवास स्थान है। (२८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! अब मैं तुझ ईर्ष्या न करने वाले के लिये इस परम-गोपनीय ज्ञान को अनुभव सहित कहता हूँ, जिसको जानकर तू इस दुःख-रूपी संसार से मुक्त हो सकेगा। (१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
यह ज्ञान सभी विद्याओं का राजा, सभी गोपनीयों से भी अति गोपनीय, परम-पवित्र, परम-श्रेष्ठ है, यह ज्ञान धर्म के अनुसार सुख-पूर्वक कर्तव्य-कर्म के द्वारा अविनाशी परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव कराने वाला है। (२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे परन्तप! इस धर्म के प्रति श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे न प्राप्त होकर, जन्म-मृत्यु रूपी मार्ग से इस संसार में आते-जाते रहते हैं। (३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मेरे कारण ही यह सारा संसार दिखाई देता है और मैं ही इस सम्पूर्ण-जगत में अदृश्य शक्ति-रूप में सभी जगह स्थित हूँ, सभी प्राणी मुझमें ही स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। (४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! यह मेरी एश्वर्य-पूर्ण योग-शक्ति को देख, यह सम्पूर्ण सृष्टि मुझमें कभी स्थित नहीं रहती है, फ़िर भी मैं सभी प्राणीयों का पालन-पोषण करने वाला हूँ और सभी प्राणीयों मे शक्ति रूप में स्थित हूँ परन्तु मेरा आत्मा सभी प्राणीयों में&amp;nbsp;स्थित नहीं रहता है क्योंकि मैं ही सृष्टि का मूल कारण हूँ। (५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जिस प्रकार सभी जगह बहने वाली महान वायु सदैव आकाश में स्थित रहती है, उसी प्रकार सभी प्राणी मुझमें स्थित रहते हैं। (६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुन्तीपुत्र! कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी प्रकृति (इच्छा-शक्ति) में प्रवेश करके विलीन हो जाते हैं और अगले कल्प के आरम्भ में उनको अपनी इच्छा-शक्ति (प्रकृति) से फिर उत्पन्न करता हूँ। (७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
चौरासी लाख योनियाँ में सभी प्राणी अपनी इच्छा-शक्ति (प्रकृति) के कारण बार-बार मेरी इच्छा-शक्ति से विलीन और उत्पन्न होते रहते हैं, यह सभी पूर्ण-रूप से स्वत: ही मेरी इच्छा-शक्ति (प्रकृति) के अधीन होते है। (८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे धनन्जय! यह सभी कर्म मुझे बाँध नही पाते है क्योंकि मैं उन कार्यों में बिना किसी फ़ल की इच्छा से उदासीन भाव में स्थित रहता हूँ। (९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुन्तीपुत्र! मेरी अध्यक्षता (पूर्ण-अधीनता) में मेरी भौतिक-प्रकृति (अपरा-शक्ति) सभी चर (चलायमान) तथा अचर (स्थिर) जीव उत्पन्न और विनिष्ट करती रहती है, इसी कारण से यह संसार परिवर्तनशील है। (१०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मूर्ख मनुष्य मुझे अपने ही समान निकृष्ट शरीर आधार (भौतिक पदार्थ से निर्मित जन्म-मृत्यु को प्राप्त होने)वाला समझते हैं इसलिये वह सभी जीवात्माओं का परम-ईश्वर वाले मेरे स्वभाव को नहीं समझ पाते हैं। (११)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र! मोह से मुक्त हुए महापुरुष दैवीय स्वभाव को धारण करके मेरी शरण ग्रहण करते हैं, और मुझको सभी जीवात्माओं का उद्‍गम जानकर अनन्य-भाव से मुझ अविनाशी का स्मरण करते हैं। (१३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
ऎसे महापुरुष दृड़-संकल्प से प्रयत्न करके निरन्तर मेरे नाम और महिमा का गुणगान करते है, और सदैव मेरी भक्ति में स्थिर होकर मुझे बार-बार प्रणाम करते हुए मेरी पूजा करते हैं। (१४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ मनुष्य ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ करके, कुछ मनुष्य मुझे एक ही तत्व जानकर, कुछ मनुष्य अलग-अलग तत्व जानकर, अनेक विधियों से निश्चित रूप से मेरे विश्व स्वरूप की ही पूजा करते हैं। (१५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जो मनुष्य तीनों वेदों के अनुसार यज्ञों के द्वारा मेरी पूजा करके सभी पापों से पवित्र होकर सोम रस को पीने वालों के स्वर्ग-लोकों की प्राप्ति के लिये प्रार्थना करते हैं, वह मनुष्य अपने पुण्यों के फल स्वरूप इन्द्र-लोक में जन्म को प्राप्त होकर&amp;nbsp;स्वर्ग में दैवी-देवताओं वाले सुखों को भोगते हैं। (२०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
वह जीवात्मा उस विशाल स्वर्ग-लोक के सुखों का भोग करके पुण्य-फ़लो के समाप्त होने पर इस मृत्यु-लोक में पुन: जन्म को प्राप्त होते हैं, इस प्रकार तीनों वेदों के सिद्धान्तों का पालन करके सांसारिक सुख की कामना वाले(सकाम-कर्मी) मनुष्य&amp;nbsp;बार-बार जन्म और मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं। (२१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जो मनुष्य एक मात्र मुझे लक्ष्य मान कर अनन्य-भाव से मेरा ही स्मरण करते हुए कर्तव्य-कर्म द्वारा पूजा करते हैं, जो सदैव निरन्तर मेरी भक्ति में लीन रहता है उस मनुष्य की सभी आवश्यकताऎं और सुरक्षा की जिम्मेदारी मैं स्वयं निभाता हूँ। (२२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुन्तीपुत्र! जो भी मनुष्य श्रद्धा-पूर्वक भक्ति-भाव से अन्य देवी-देवताओं को पूजा करते है, वह भी निश्वित रूप से मेरी ही पूजा करते हैं, किन्तु उनका वह पूजा करना अज्ञानता-पूर्ण मेरी प्राप्ति की विधि से अलग त्रुटिपूर्ण होता है। (२३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
मैं ही निश्चित रूप से समस्त यज्ञों का भोग करने वाला हूँ, और मैं ही स्वामी हूँ, परन्तु वह मनुष्य मेरे वास्तविक स्वरूप को तत्व से नहीं जानते इसलिये वह कामनाओं के कारण पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं। (२४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं वह देवताओं को प्राप्त होते हैं, जो अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं वह पूर्वजों को प्राप्त होते हैं, जो भूतों (जीवित मनुष्यों) की पूजा करते हैं वह उन भूतों के कुल को प्राप्त होते है, परन्तु जो मनुष्य&amp;nbsp;मेरी पूजा करते हैं वह मुझे ही प्राप्त होते हैं। (२५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जो मनुष्य एक पत्ता, एक फ़ूल, एक फल, थोडा सा जल और कुछ भी निष्काम भक्ति-भाव से अर्पित करता है, उस शुद्ध-भक्त का निष्काम भक्ति-भाव से अर्पित किया हुआ सभी कुछ मैं स्वीकार करता हूँ। (२६)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे कुन्तीपुत्र! तू जो भी कर्म करता है, जो भी खाता है, जो भी हवन करता है, जो भी दान देता है और जो भी तपस्या करता है, उस सभी को मुझे समर्पित करते हुए कर। (२७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार तू समस्त अच्छे और बुरे कर्मों के फ़लों के बन्धन से मुक्त हो जाएगा और मन से सभी सांसारिक कर्मो को त्याग कर (सन्यास-योग के द्वारा) मन को परमात्मा में स्थिर करके विशेष रूप से मुक्त होकर मुझे ही प्राप्त होगा। (२८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मैं सभी प्राणीयों में समान रूप से स्थित हूँ, सृष्टि में न किसी से द्वेष रखता हूँ, और न ही कोई मेरा प्रिय है, परंतु जो मनुष्य शुद्ध भक्ति-भाव से मेरा स्मरण करता है, तब वह मुझमें स्थित रहता है और मैं भी निश्चित रूप से उसमें स्थित&amp;nbsp;रहता हूँ। (२९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
यदि कोई भी अत्यन्त दुराचारी मनुष्य अनन्य-भाव से मेरा निरन्तर स्मरण करता है, तो वह निश्चित रूप से साधु ही समझना चाहिये, क्योंकि वह सम्पूर्ण रूप से मेरी भक्ति में ही स्थित है। (३०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! वह शीघ्र ही मन से शुद्ध होकर धर्म का आचरण करता हुआ चिर स्थायी परम शान्ति को प्राप्त होता है, इसलिये तू निश्चिन्त होकर घोषित कर दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता है। (३१)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र! स्त्री, वैश्य, शूद्र अन्य किसी भी निम्न-योनि में उत्पन्न होने वाले मनुष्य हों, वह भी मेरी शरण-ग्रहण करके मेरे परम-धाम को ही प्राप्त होते हैं। (३२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
तो फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों, भक्तों और राजर्षि क्षत्रियों का तो कहना ही क्या है, इसलिए तू क्षण में नष्ट होने वाले दुख से भरे हुए इस जीवन में निरंतर मेरा ही स्मरण कर। (३३)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन ! तू मुझमें ही मन को स्थिर कर, मेरा ही भक्त बन, मेरी ही पूजा कर और मुझे ही प्रणाम कर, इस प्रकार अपने मन को मुझ परमात्मा में पूर्ण रूप से स्थिर करके मेरी शरण होकर तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा। (३४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मैं ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सम्पूर्ण जगत की क्रियाशीलता है, इस प्रकार मानकर विद्वान मनुष्य अत्यन्त भक्ति-भाव से मेरा ही निरंतर स्मरण करते हैं। (८)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जिन मनुष्यों के चित्त मुझमें स्थिर रहते हैं और जिन्होने अपना जीवन मुझको ही समर्पित कर दिया हैं, वह भक्तजन आपस में एक दूसरे को मेरा अनुभव कराते हैं, वह भक्त मेरा ही गुणगान करते हुए निरन्तर संतुष्ट रहकर मुझमें ही आनन्द&amp;nbsp;की प्राप्ति करते हैं। (९)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो सदैव अपने मन को मुझमें स्थित रखते हैं और प्रेम-पूर्वक निरन्तर मेरा स्मरण करते हैं, उन भक्तों को मैं वह बुद्धि प्रदान करता हूँ, जिससे वह मुझको ही प्राप्त होते हैं। (१०)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! उन भक्तों पर विशेष कृपा करने के लिये उनके हृदय में स्थित आत्मा के द्वारा उनके अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी दीपक के प्रकाश से दूर करता हूँ। (११)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
हे पाण्डुपुत्र! जो मनुष्य केवल मेरी शरण होकर मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करता है, मेरी भक्ति में स्थित रहता है, सभी कामनाओं से मुक्त रहता है और समस्त प्राणियों से मैत्रीभाव रखता है, वह मनुष्य निश्चित रूप से मुझे ही&amp;nbsp;प्राप्त करता है। (५५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
श्री भगवान कहा - हे अर्जुन! जो मनुष्य मुझमें अपने मन को स्थिर करके निरंतर मेरे सगुण-साकार रूप की पूजा में लगे रहते हैं, और अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरे दिव्य स्वरूप की आराधना करते हैं वह मेरे द्वारा योगियों में अधिक पूर्ण सिद्ध योगी&amp;nbsp;माने जाते हैं। (२)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
लेकिन जो मनुष्य मन-बुद्धि के चिन्तन से परे परमात्मा के अविनाशी, सर्वव्यापी, अकल्पनीय, निराकार, अचल स्थित स्वरूप की उपासना करते हैं, वह मनुष्य भी अपनी सभी इन्द्रियों को वश में करके, सभी परिस्थितियों में समान भाव से और&amp;nbsp;सभी प्राणीयों के हित में लगे रहकर मुझे ही प्राप्त होते हैं। (३,४)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अव्यक्त, निराकार स्वरूप के प्रति आसक्त मन वाले मनुष्यों को परमात्मा की प्राप्ति अत्यधिक कष्ट पूर्ण होती है क्योंकि जब तक शरीर द्वारा कर्तापन का भाव रहता है तब तक अव्यक्त परमात्मा की प्राप्ति दुखप्रद होती है। (५)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
से भ्रमित बुद्धि वाले मनुष्य शरीर के अन्दर स्थित जीवों के समूह और हृदय में स्थित मुझ परमात्मा को भी कष्ट देने वाले होते हैं, उन सभी अज्ञानियों को तू निश्चित रूप से असुर ही समझ। (६)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु हे अर्जुन! जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को मुझे अर्पित करके मेरी शरण होकर अनन्य भाव से भक्ति-योग में स्थित होकर निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी आराधना करते हैं। मुझमें स्थिर मन वाले उन मनुष्यों का मैं जन्म-मृत्यु रूपी&amp;nbsp;संसार-सागर से अति-शीघ्र ही उद्धार करने वाला होता हूँ। (६,७)&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो॥57॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा॥64॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है॥65॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥66॥&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम &#39;भक्ति&#39; है।)-रहित से और न बिना सुनने की&amp;nbsp;इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए॥67॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है॥68॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं॥69॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा- ऐसा मेरा मत है॥70॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा॥71॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
हे पार्थ! क्या इस गीताशास्त्र को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?॥72॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा॥58॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर॥63॥&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
|| हरि ओम तत् सत् ||&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh3LeQyEru6JJOD7FTrceiOMsRw7zDSY2UF0EMqtjnAsreNoqaBfNLjaTZKjvwHGh4Z2ZAGuEgOEFnVAcwoI08qoSzwWC6rWCnvMlaSPkv38KiXMuv2kx3d_fVFEZ3Din5jkg0yT2Ey1w0x/s72-c/krishna.bmp" height="72" width="72"/><thr:total>18</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-5062029951544712983</guid><pubDate>Tue, 16 Jul 2013 10:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:59:51.483+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी कमला</category><title>देवी कमला :</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&amp;nbsp;जिसके घर में दरिद्रता ने कब्जा कर लिया हो और घर में सुख-शांति न हो, आय का स्रोत न हो उनके लिए यह साधना सौभाग्य के द्वार खोलती है। कमला को लक्ष्मी और षोडशी भी कहा जाता है। वैसे तो शास्त्रों में हजारों प्रकार की साधनाएं दी गई हैं लेकिन उनमें से दस महत्वपूर्ण विद्याओं की साधनाओं को जीवन की पूर्णता के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। जो व्यक्ति दश महाविद्याओं की साधना को पूर्णता के साथ संपन्न कर लेता है। वह निश्चय ही जीवन में ऊंचा उठता है परंतु ध्यान रहे विधिवत् उपासना के लिए गुरु दीक्षा नितांत आवश्यक है। निष्काम भाव से भक्ति करने के लिए दश शक्तियों के नाम का उच्चारण करके भी इनका अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। शक्ति पीठों में शक्ति उपासना के अंतर्गत नवदुर्गा व दशमहाविद्या साधना करने से शीध्र सिद्धि होती है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/07/blog-post_3115.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-2093136203640696040</guid><pubDate>Tue, 16 Jul 2013 10:28:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:58:56.523+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><title>देवी मातंगी : </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;मातंग शिव का नाम और इनकी शक्ति मातंगी है। इनका श्याम वर्ण है और चंद्रमा को मस्तक पर धारण किए हुए हैं। इन्होंने अपनी चार भुजाओं में पाश, अंकुश, खेटक और खडग धारण किया है। उनके त्रिनेत्र सूर्य, सोम और अग्नि हैं। ये असुरों को मोहित करने वाली और भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली हैं। गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाने के लिए मातंगी की साधना श्रेयस्कर है।&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/07/blog-post_5209.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-8605108726555434835</guid><pubDate>Tue, 16 Jul 2013 10:28:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:58:19.294+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी बगलामुखी :</category><title> देवी बगलामुखी : </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह साधना शत्रु बाधा को समाप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साधना है। ये सुधा समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय मण्डप में रत्नमय सिंहासन पर विराजमान है। इस विद्या के द्वारा दैवी प्रकोप की शांति, धन-धान्य के लिए और इनकी उपासना भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धि के लिए की जाती है। इनकी उपासना में हरिद्र माला, पीत पुष्प एवं पीत वस्त्र का विधान हैं इनके हाथ में शत्रु की जिह्वा और दूसरे हाथ में मुद्रा है।&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/07/blog-post_9658.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-5695297399038830316</guid><pubDate>Tue, 16 Jul 2013 10:27:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:57:17.360+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी धूमावती</category><title> देवी धूमावती  </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
धूमावती देवी महाविद्याओं में सातवें स्थान पर विराजमान हैं। धूमावती महाशक्ति अकेली है तथा स्वयं नियंत्रिका है। इसका कोई स्वामी नहीं है। इसलिए इन्हें विधवा कहा गया है। धूमावती उपासना विपत्ति नाश, रोग निवारण, युद्ध जय आदि के लिए की जाती है। यह लक्ष्मी की ज्येष्ठा हैं, अतः ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न व्यक्ति जीवन भर दुख भोगता है। जो साधक अपने जीवन में निश्चिंत और निर्भीक रहना चाहते हैं उन्हें धूमावती साधना करनी चाहिए।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/07/blog-post_7125.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-5816102607428915695</guid><pubDate>Tue, 16 Jul 2013 10:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:56:35.129+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी छिन्नमस्ता</category><title>देवी छिन्नमस्ता </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
परिवर्तनशील जगत का अधिपति कबंध है और उसकी शक्ति छिन्नमस्ता है। छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत ही गोपनीय है। इनका सर कटा हुआ है और इनके कबंध से रक्त की तीन धाराएं प्रवाहित हो रही हैं जिसमें से दो धाराएं उनकी सहचरियां और एक धारा देवी स्वयं पान कर रही हैं इनकी तीन आंखें हैं और ये मदन और रति पर आसीन हैं। इनका स्वरूप ब्रह्मांड में सृजन और मृत्यु के सत्य को दर्शाता है। ऐसा विधान है कि चतुर्थ संध्याकाल में छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती सिद्धि हो जाती है। इस प्रकार की साधना के लिए दृढ़ संकल्प शक्ति की आवश्यकता होती है और जो साधक जीवन में निश्चय कर लेते हैं कि उन्हें साधनाओं में सफलता प्राप्त करनी है वे अपने गुरु के मार्गदर्शन से ही इन्हें संपन्न करते हैं।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/07/blog-post_2797.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-1851039794959503745</guid><pubDate>Tue, 16 Jul 2013 10:25:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:55:37.337+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी षोडशी</category><title> देवी षोडशी  </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
षोडशी माहेश्वरी शक्ति की सबसे मनोहर श्री विग्रह वाली सिद्ध देवी हैं। इनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं। ये शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर आसीन हैं। जो इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता। षोडशी को श्री विद्या भी माना गया है। इनके ललिता, राज-राजेश्वरी, महात्रिपुरसुंदरी, बालापञ्चदशी आदि अनेक नाम हैं, वास्तव में षोडशी साधना को राज-राजेश्वरी इसलिए भी कहा गया है क्योंकि यह अपनी कृपा से साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं। चारों दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पंचवक्रा कहा जाता है। इनमें षोडश कलाएं पूर्ण रूप से विकसित हैं। इसलिए ये षोडशी कहलाती है। इन्हें श्री विद्या भी माना गया है और इनकी उपासना श्री यंत्र या नव योनी चक्र के रूप में की जाती है। ये अपने उपासक को भक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती हैं। षोडशी उपासना में दीक्षा आवश्यक है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/07/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-1508887003192507569</guid><pubDate>Tue, 16 Jul 2013 10:24:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:54:38.574+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><title> देवी तारा </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भगवती काली को नीलरूपा और सर्वदा मोक्ष देने वाली और तारने वाली होने के कारण तारा कहा जाता है। भारत में सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने तारा की आराधना की थी। इसलिए तारा को वशिष्ठाराधिता तारा भी कहा जाता है। आर्थिक उन्नति एवं अन्य बाधाओं के निवारण हेतु तारा महाविद्या का स्थान महत्वपूर्ण है। इस साधना की सिद्धी होने पर साधक की आय के नित नये साधन खुलने लगते हैं और वह पूर्ण ऐश्वर्यशाली जीवन व्यतीत कर जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लेता है। इनका बीज मंत्र &#39;ह्रूं&#39; है। इन्हें नीलसरस्वती के नाम से भी जाना जाता है। अनायास ही विपत्ति नाश, शत्रुनाश, वाक्-शक्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए तारा की उपासना की जाती है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/07/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (गीता प्रसार)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-6797309429078078919</guid><pubDate>Tue, 18 Jun 2013 04:55:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-05T23:42:59.779+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी त्रिपुर भैरवी</category><title>देवी त्रिपुर भैरवी ( 17 दिसंबर 2013)</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;u&gt;देवी त्रिपुर भैरवी&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjzKT9xBdeW2bXDGxvGPodpvH_JOWuPmdNZMiLZiFkXB7JQK26t34Uihetw8xgYwYyNXo_4Yo5UiGOaVd-m0iRohOAiubh6Q1Z63U7b4KULA7YPazJ4Co1MSQq9wDriq2zJtohl-MpFyQE/s1600/Tripurebhairavi+Maa.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjzKT9xBdeW2bXDGxvGPodpvH_JOWuPmdNZMiLZiFkXB7JQK26t34Uihetw8xgYwYyNXo_4Yo5UiGOaVd-m0iRohOAiubh6Q1Z63U7b4KULA7YPazJ4Co1MSQq9wDriq2zJtohl-MpFyQE/s1600/Tripurebhairavi+Maa.jpg&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;u&gt;&lt;br /&gt;&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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त्रिपुर भैरवी की उपासना से सभी बंधन दूर हो जाते हैं. इनकी उपासना भव-बन्ध-मोचन कही जाती है. इस वर्ष त्रिपुर भैरवी 17 दिसंबर 2013 को मंगलवार के दिन मनाई जानी है. इनकी उपासना से व्यक्ति को सफलता एवं सर्वसंपदा की प्राप्ति होती है. शक्ति-साधना तथा भक्ति-मार्ग में किसी भी रुप में त्रिपुर भैरवी की उपासना फलदायक ही है, साधना द्वारा अहंकार का नाश होता है तब साधक में पूर्ण शिशुत्व का उदय हो जाता है और माता, साधक के समक्ष प्रकट होती है. भक्ति-भाव से मन्त्र-जप, पूजा, होम करने से भगवती त्रिपुर भैरवी प्रसन्न होती हैं. उनकी प्रसन्नता से साधक को सहज ही संपूर्ण अभीष्टों की प्राप्ति होती है.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
क्षीयमान विश्व के अधिष्ठान दक्षिणामूर्ति कालभैरव हैं।&amp;nbsp;उनकी शक्ति ही त्रिपुरभैरवी है ये ललिता या महात्रिपुरसुंदरी की रथवाहिनी हैं। ब्रह्मांडपुराण में इन्हें गुप्त योगिनियों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में चित्रित किया गया है। मत्स्यपुराण में इनके त्रिपुरभैरवी, रुद्रभैरवी, चैतन्यभैरवी तथा नित्या भैरवी आदि रूपों का वर्णन प्राप्त होता है। इंद्रियों पर विजय और सर्वत्र उत्कर्ष की प्राप्ति हेतु त्रिपुरभैरवी की उपासना का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। महाविद्याओं में इनका छठा स्थान है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इनके ध्यान का उल्लेख दुर्गासप्तशती के तीसरे अध्याय में महिषासुर वध के प्रसंग में हुआ है। इनका रंग लाल है। ये लाल वस्त्र पहनती हैं, गले में मुंडमाला धारण करती हैं और शरीर पर रक्त चंदन का लेप करती हैं। ये अपने हाथों में जपमाला, पुस्तक तथा वर और अभय मुद्रा धारण करती हैं। ये कमलासन पर विराजमान हैं। भगवती त्रिपुरभैरवी ने ही मधुपान करके महिषका हृदय विदीर्ण किया था। रुद्रयामल एवं भैरवी कुल सर्वस्व में इनकी उपासना करने का विधान है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
घोर कर्म के लिए काल की विशेष अवस्थाजनित विपत्तियों को शांत कर देने वाली शक्ति को ही त्रिपुरभैरवी कहा जाता है। इनका अरुणवर्ण विमर्श&amp;nbsp;का प्रतीक है। इनके गले में सुशोभित मुंडमाला ही वर्णमाला है। देवी के रक्तचंदन लिप्त पयोधर रजोगुणसंपन्न सृष्टि प्रक्रिया के प्रतीक हैं। अक्षमाला वर्णमाला की प्रतीक है। पुस्तक ब्रह्मविद्या है, त्रिनेत्र वेदत्रयी हैं तथा स्मिति हास करुणा है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
आगम ग्रंथों के अनुसार त्रिपुरभैरवी एकाक्षररूप प्रणव हैं। इनसे संपूर्ण भुवन प्रकाशित हो रहे हैं तथा अंत में इन्हीं में लय हो जाएंगे। अ से लेकर विसर्गतक सोलह वर्ण भैरव कहलाते हैं। तथा क से क्ष तक के वर्ण योनि अथवा भैरवी कहे जाते हैं। स्वच्छन्दोद्योत के प्रथम पटल में इस पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। यहां पर त्रिपुरभैरवी को योगीश्वरी रूप में उमा बतलाया गया है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने का दृढ़ निर्णय लिया था। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इनकी तपस्या को देखकर दंग रह गए। इससे सिद्ध होता है कि भगवान शंकर की उपासना में निरत उमा का दृ़ढ़निश्चयी स्वरूप ही त्रिपुरभैरवी का परिचालक है। त्रिपुरभैरवी की स्तुति में कहा गया है कि भैरवी सूक्ष्म वाक् तथा जगत में मूल कारण की अधिष्ठात्री हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
त्रिपुर भैरवी के विभिन्न रुप | Forms of Tripura Bhairavi&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भैरवी के नाना प्रकार के भेद बताए गए हैं जो इस प्रकार हैं त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, सिद्ध भैरवी,  भुवनेश्वर भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी तथा षटकुटा भैरवी आदि. त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता हैं. भागवत के अनुसार महाकाली के उग्र और सौम्य दो रुपों में अनेक रुप धारण करने वाली दस महा-विद्याएँ हुई हैं. भगवान शिव की यह महाविद्याएँ सिद्धियाँ प्रदान करने वाली होती हैं.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
त्रिपुर भैरवी अवतरण कथा | Tripura Bhairavi Katha&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
‘नारद-पाञ्चरात्र’ के अनुसार एक बार जब देवी काली के मन में आया कि वह पुनः अपना गौर वर्ण प्राप्त कर लें तो यह सोचकर देवी अन्तर्धान हो जाती हैं. भगवान शिव जब देवी को को अपने समक्ष नहीं पाते तो व्याकुल हो जाते हैं और उन्हें ढूंढने का प्रयास करते हैं. शिवजी, महर्षि नारदजी से देवी के विषय में पूछते हैं तब नारद जी उन्हें देवी का बोध कराते हैं वह कहते हैं कि शक्ति के दर्शन आपको सुमेरु के उत्तर में हो सकते हैं वहीं देवी की प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात संभव हो सकेगी. तब भोले शंकर की आज्ञानुसार नारदजी देवी को खोजने के लिए वहाँ जाते हैं. महर्षि नारद जी जब वहां पहुँचते हैं तो देवी से शिवजी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखते हैं यह प्रस्ताव सुनकर देवी क्रुद्ध हो जाती हैं. और उनकी देह से एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट होता है और इस प्रकार उससे छाया-विग्रह “त्रिपुर-भैरवी” का प्राकट्य होता है.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
त्रिपुर भैरवी मंत्र | Tripur Bhairavi Mantra&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
त्रिपुर भैरवी मंत्र के जाप एवं उच्चारण द्वारा साधक शक्ति का विस्तार करता है तथा भक्ति की संपूर्णता को पाता है “हंसै हसकरी हसै” और “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः” के जाप द्वारा सभी कष्ट एवं संकटों का नाश होता है.&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
त्रिपुर भैरवी जयंती महत्व | Tripura Bhairavi Jayanti Significance&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माँ का स्वरूप सृष्टि के निर्माण और संहार क्रम को जारी रखे हुए है. माँ त्रिपुर भैरवी तमोगुण एवं रजोगुण से परिपूर्ण हैं. माँ भैरवी के अन्य तेरह स्वरुप हैं इनका हर रुप अपने आप अन्यतम है. माता के किसी भी स्वरुप की साधना साधक को सार्थक कर देती है. माँ त्रिपुर भैरवी कंठ में मुंड माला धारण किये हुए हैं. माँ ने अपने हाथों में माला धारण कर रखी है. माँ स्वयं साधनामय हैं उन्होंने अभय और वर मुद्रा धारण कर रखी है जो भक्तों को सौभाग्य प्रदान करती है. माँ  ने लाल वस्त्र धारण  किया है, माँ के हाथ में  विद्या तत्व है. माँ त्रिपुर भैरवी की पूजा में लाल रंग का उपयोग किया जाना लाभदायक है.&amp;nbsp;शत्रु संहार एवं तीव्र तंत्र बाधा निवारण के लिए भगवती त्रिपुरभैरवी महाविद्या साधना अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस साधना की मुखय विशेषता ये भी है, कि व्यक्ति के सौंदर्य में निखार आने लगता है और वह अत्यंत सुंदर दिखने लगता है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/06/17-2013.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjzKT9xBdeW2bXDGxvGPodpvH_JOWuPmdNZMiLZiFkXB7JQK26t34Uihetw8xgYwYyNXo_4Yo5UiGOaVd-m0iRohOAiubh6Q1Z63U7b4KULA7YPazJ4Co1MSQq9wDriq2zJtohl-MpFyQE/s72-c/Tripurebhairavi+Maa.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-6079630296471159085</guid><pubDate>Tue, 18 Jun 2013 04:25:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-06-18T09:58:38.731+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी भुवनेश्वरी</category><title>देवी भुवनेश्वरी</title><description>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
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&lt;a href=&quot;http://www.myguru.in/profile_pictures/bhuvaneswari_devi.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.myguru.in/profile_pictures/bhuvaneswari_devi.jpg&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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देवी भागवत में वर्णित मणिद्वीप की अधिष्ठात्री देवी, हल्लेखा मंत्र की स्वरूपाशक्ति और सृष्टिक्रम में महालक्ष्मी स्वरूपा-आदिशक्ति भगवती भुवनेश्वरी भगवान शिव के समस्त लीला विलास की सहचरी हैं। जगदंबा भुवनेश्वरी स्वरूप सौम्य और अंगकांति अरुण है। भक्तों को अभय और समस्त सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। दशमहाविद्याओं में ये पांचवें स्थान पर परिवर्णित हैं। देवीपुराण के अनुसार मूल प्रकृति का दूसरा नाम ही भुवनेश्वरी है। ईश्वर रात्रि में जब ईश्वर जगदू्रप व्यवहार का लोप हो जाता है, उस समय केवल ब्रह्म अपनी अव्यक्त प्रकृति के साथ शेष रहता है, तब ईश्वर रात्रि की अधिष्ठात्री देवी भुवनेश्वरी कहलाती है। अंकुश और पाश इनके मुख्य आयुध हैं। अंकुश नियंत्रण का प्रतीक है और पाश राग अथवा आसक्ति का प्रतीक है। इस प्रकार सर्वरूपा मूल प्रकृति ही भुवनेश्वरी है, जो विश्व को वमन करने के कारण रौद्री कही जाती है। भगवान शिव का वाम भाग ही भुवनेश्वरी कहलाता है। भुवनेश्वरी संग से ही भुवनेश्वरी सदाशिव को सर्वेश होने की योग्यता प्राप्त होती है। महानिर्वाणतंत्र के अनुसार संपूर्ण महाविद्याएं भगवती भुवनेश्वरी सेवा में सदा संलग्न रहती हैं। सात करोड़ महामंत्र इनकी संपूर्ण  सदा आराधना करते हैं। दशमहाविद्याएं ही दस सोपान हैं। काली तत्त्व से निर्गत होकर कमला तत्त्व तक की दस स्थितियां हैं, जिनसे अव्यक्त भुवनेश्वरी व्यक्त होकर ब्रह्मांड का रूप धारण कर सकती हंै तथा प्रलय में कमला से अर्थात व्यक्त जगत से क्रमशः लय होकर काली रूप में मूल प्रकृति बन जाती हैं। इसलिए इन्हें काल की जन्मदात्री भी कहा जाता है। दुर्गासप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में मंगलाचरण में भी कहा गया है कि मैं भुवनेश्वरी देवी का ध्यान करता हूं उनके श्रीअंगों की शोभा प्रातः काल के सूर्यदेव के समान अरुणाभ है। उनके मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट है। तीन नेत्रों से युक्त देवी के मुख पर मुस्कान की छटा छाई रहती है उनके हाथों में पाश, अंकुश वरद एवं अभय मुद्रा शोभा पाते हैं। इस प्रकार बृहन्नीलतंत्र की यह धारणा पुराणों के विवरणों से भी पुष्टि होती है कि प्रकारांतर से काली और भुवनेश्वरी दोनों में अभेद है। प्रकृति भुुवनेश्वरी ही रक्तवर्णा काली हैं। देवी भागवत के अनुसार दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचार से संतप्त होकर देवताओं और ब्राह्मणों ने हिमालय पर सर्वकारण स्वरूपा भगवती भुवनेश्वरी की ही अराधना की थी। उनकी अराधना से प्रसन्न होकर भगवती भुवनेश्वरी तत्काल प्रकट हो गईं वे अपने हाथों में बाण, कमल पुष्प तथा शाक मूल लिए हुए थीं। उन्होंने अपने नेत्रों से अश्रु जल की सहस्त्रों धाराएं प्रकट कीं। इस से भूमंडल के सभी प्राणी तृप्त हो गए। समुद्रों तथा सरिताओं में अगाध जल भर गया। और समस्त औषधियां सिंच गईं। अपने हाथ में लिए गए शाकों और फल मूल से प्राणियों का पोषण करने के कारण भगवती भुवनेश्वरी ही शताक्षी तथा शाकंभरी नाम से विख्यात हुईं उसके बाद में भगवती भुवनेश्वरी का एक नाम दुर्गा प्रसिद्ध हुआ। भगवती भुवनेश्वरी उपासना पुत्र-प्राप्ति के लिए विशेष फलप्रदा है। रुद्रयामल में इनका कवच, नीलसरस्वती तंत्र में इनका हृदय तथा महातंत्रार्णव में इनका सहस्त्र नाम संकलित है।&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/06/blog-post_5544.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-8596971632540522179</guid><pubDate>Tue, 18 Jun 2013 04:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-10-05T23:43:34.302+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी ललिता</category><title> देवी ललिता</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
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</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/06/blog-post_18.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEigpJLEYe3fEcAJcoqTpsKt5us-hO5LmL1SIbUcdz03ZeCcv-hkEOMra1Rr7c5UYCV4R2DuYu_quiCW7Tsqiiark541gugytdXLaDb5WyQjMNlitB6spwwSz-quuZQDZ88hzMmwyZ07cXA/s72-c/Mata+lalita.PNG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-5875389625762631153</guid><pubDate>Mon, 17 Jun 2013 08:57:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-07-16T15:53:45.753+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दस महाविधाएं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी काली</category><title>देवी काली </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
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1. काली : दश महाविद्याओं में काली प्रथम है। महा भागवत के अनुसार महाकाली ही मुखय हैं। उन्हीं के उग्र और सौम्य दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दश महाविद्याएं हैं। कलियुग में कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फलदायी एवं साधक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने में सहायक हैं। शक्ति साधना के दो पीठों में काली की उपासना श्यामापीठ पर करने योग्य है। वैसे तो किसी भी रूप में उन महामाया की उपासना फल देने वाली है परंतु सिद्धि के लिए उनकी उपासना वीरभाव से की जाती है।
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&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh0yYfXTLScznYuzwOy4ByTKMfDI_GXjtYjBwyQRF5IYK8GtsSbt6DUBacEkak_dkkXJmVF4DRuoETy0hbCvZo4J5eo_NRdT7xiwKviBjLefbAgmcHu5EmZu3s88JNEaNjZ0s9g2K-aux4/s1600/2.PNG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh0yYfXTLScznYuzwOy4ByTKMfDI_GXjtYjBwyQRF5IYK8GtsSbt6DUBacEkak_dkkXJmVF4DRuoETy0hbCvZo4J5eo_NRdT7xiwKviBjLefbAgmcHu5EmZu3s88JNEaNjZ0s9g2K-aux4/s1600/2.PNG&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh0yYfXTLScznYuzwOy4ByTKMfDI_GXjtYjBwyQRF5IYK8GtsSbt6DUBacEkak_dkkXJmVF4DRuoETy0hbCvZo4J5eo_NRdT7xiwKviBjLefbAgmcHu5EmZu3s88JNEaNjZ0s9g2K-aux4/s72-c/2.PNG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-992389676786371279</guid><pubDate>Fri, 15 Feb 2013 04:49:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-02-15T10:19:17.834+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">देवी</category><title>देवी सरस्वती </title><description>&lt;br /&gt;
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&lt;a href=&quot;http://hi.brajdiscovery.org/images/thumb/3/34/Saraswati-Devi.jpg/200px-Saraswati-Devi.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;http://hi.brajdiscovery.org/images/thumb/3/34/Saraswati-Devi.jpg/200px-Saraswati-Devi.jpg&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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सरस्वती का जन्म ब्रह्मा के मुँह से हुआ था। वह वाणी की अधिष्ठात्री देवी है। ब्रह्मा अपनी पुत्री सरस्वती पर ही आसक्त हो गये। वे उसके पास गमन के लिए तत्पर हुए। सभी प्रजापतियों ने अपने पिता ब्रह्मा को न केवल समझाया, अपितु उनके विचार की हीनता की ओर भी संकेत किया। ब्रह्मा ने लज्जावश वह शरीर त्याग दिया, जो कुहरा अथवा अंधकार के रूप में दिशाओं में व्याप्त हो गया।&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;&lt;u&gt;ब्रह्मा द्वारा शाप&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
वेदज्ञ पुरूरवा ने ब्रह्मा के निकट हास करती हुई सरस्वती को देखा। उर्वशी के द्वारा उसने सरस्वती को अपने पास बुलाया। तदनंतर दोनों परस्पर मिलते रहे। सरस्वती ने ‘सरस्वान्’ नामक पुत्र को जन्म दिया। कालांतर में ब्रह्मा को पता चला तो उन्होंने सरस्वती को महानदी होने का शाप दिया। भयभीता सरस्वती गंगा माँ की शरण में जा पहुँची। गंगा के कहने पर ब्रह्मा ने सरस्वती को शाप-मुक्त कर दिया। शापवश ही वह मृत्युलोक में कहीं दृश्य और कहीं अदृश्य रूप में रहने लगी।&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;सोम तथा सरस्वती की कथा&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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सोम की प्राप्ति पहले गंधर्वों को हुई। देवताओं ने जाना तो सोम प्राप्त करने के उपाय सोचने लगे। सरस्वती ने कहा—“गंधर्व स्त्री-प्रेमी हैं, उनसे मेरे विनिमय में सोम ले लो। मैं फिर चतुराई से तुम्हारे पास आ जाऊँगी।’’ देवगिरि पर यज्ञ करके देवताओं ने वैसा ही किया। गंधर्वों के पास न तो सोम ही रहा, न सरस्वती।[2]&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;&lt;u&gt;&lt;br /&gt;&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;&lt;u&gt;सरस्वती पूजन&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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श्री कृष्ण ने भारतवर्ष में सर्वप्रथम सरस्वती की पूजा का प्रसार किया। सरस्वती ने राधा के जिव्ह्याग्र भाग से आविर्भूत होकर कामवश श्री कृष्ण को पति बनाना चाहा। कृष्ण ने सरस्वती से कहा—“मेरे अंश से उत्पन्न चतुर्भुज नारायण मेरे ही समान हैं’’-- वे नारी के ह्रदय की विलक्षण वासना से परिचित हैं, अत: तुम उनके पास वैकुंठ में जाओ। मैं सर्वशक्ति सम्पन्न होते हुए भी राधा के बिना कुछ नहीं हूँ। राधा के साथ-साथ तुम्हें रखना मेरे लिए संभव नहीं। नारायण लक्ष्मी के साथ तुम्हें भी रख पायेंगे। लक्ष्मी और तुम समान सुंदर तथा ईर्ष्या के भाव से मुक्त हो। माघ मास की शुक्ल पंचमी पर तुम्हारा पूजन चिरंतन काल तक होता रहेगा तथा वह विद्यारम्भ का दिवस माना जायेगा। वाल्मीकि, बृहस्पति, भृगु इत्यादि को क्रमश: नारायण, मरीचि तथा ब्रह्मा आदि ने सरस्वती-पूजन का बीजमन्त्र दिया था।&lt;/div&gt;
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&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #073763; font-size: large;&quot;&gt;&lt;u&gt;सरस्वती द्वारा दिया गया शाप&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा नारायण के निकट निवास करती थीं। एक बार गंगा ने नारायण के प्रति अनेक कटाक्ष किये। नारायण तो बाहर चले गये किन्तु इससे सरस्वती रुष्ट हो गयी। सरस्वती को लगता था कि नारायण गंगा और लक्ष्मी से अधिक प्रेम करते हैं। लक्ष्मी ने दोनों का बीच-बचाव करने का प्रयत्न किया। सरस्वती ने लक्ष्मी को निर्विकार जड़वत् मौन देखा तो जड़ वृक्ष अथवा सरिता होने का शाप दिया। सरस्वती को गंगा की निर्लज्जता तथा लक्ष्मी के मौन रहने पर क्रोध था। उसने गंगा को पापी जगत का पाप समेटने वाली नदी बनने का शाप दिया। गंगा ने भी सरस्वती को मृत्युलोक में नदी बनकर जनसमुदाय का पाप प्राक्षालन करने का शाप दिया। तभी नारायण भी वापस आ पहुँचे। उन्होंने सरस्वती का आर्लिगन कर उसे शांत किया तथा कहा—“एक पुरुष अनेक नारियों के साथ निर्वाह नहीं कर सकता। परस्पर शाप के कारण तीनों को अंश रूप में वृक्ष अथवा सरिता बनकर मृत्युलोक में प्रकट होना पड़ेगा। लक्ष्मी! तुम एक अंश से पृथ्वी पर धर्म-ध्वज राजा के घर अयोनिसंभवा कन्या का रूप धारण करोगी, भाग्य-दोष से तुम्हें वृक्षत्व की प्राप्ति होगी। मेरे अंश से जन्मे असुरेंद्र शंखचूड़ से तुम्हारा पाणिग्रहण होगा। भारत में तुम ‘तुलसी’ नामक पौधे तथा पदमावती नामक नदी के रूप में अवतरित होगी। किन्तु पुन: यहाँ आकर मेरी ही पत्नी रहोगी। गंगा, तुम सरस्वती के शाप से भारतवासियों का पाप नाश करने वाली नदी का रूप धारण करके अंश रूप से अवतरित होगी। तुम्हारे अवतरण के मूल में भागीरथ की तपस्या होगी, अत: तुम भागीरथी कहलाओगी। मेरे अंश से उत्पन्न राजा शांतनु तुम्हारे पति होंगे। अब तुम पूर्ण रूप से शिव के समीप जाओ। तुम उन्हीं की पत्नी होगी। सरस्वती, तुम भी पापनाशिनी सरिता के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होगी। तुम्हारा पूर्ण रूप ब्रह्मा की पत्नी के रूप में रहेगा। तुम उन्हीं के पास जाओ।’’ उन तीनों ने अपने कृत्य पर क्षोभ प्रकट करते हुए शाप की अवधि जाननी चाही। कृष्ण ने कहा—“कलि के दस हज़ार वर्ष बीतने के उपरान्त ही तुम सब शाप-मुक्त हो सकोगी।’’ सरस्वती ब्रह्मा की प्रिया होने के कारण ब्राह्मी नाम से विख्यात हुई।[3]&lt;/div&gt;
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&lt;u&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #073763; font-size: large;&quot;&gt;मत्स्य पुराण के अनुसार&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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ब्रह्मा ने लोक-रचना करने क्र निमित्त सावित्री का ध्यान कर तपस्या आरंभ की। ब्रह्मा का शरीर दो भागों में विभक्त हो गया—&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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आधा पुरुष-रूप (मनु) तथा,&amp;nbsp;आधा स्त्री-रूप (शतरूपा सरस्वती)।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
कालांतर में ब्रह्मा अपनी देहजा सरस्वती पर आसक्त हो गये। देवताओं के मना करने पर भी उनकी आसक्ति समाप्त नहीं हुई। सरस्वती ‘पिता’ को प्रमाण करके उनकी प्रदक्षिणा कर रही थी। ब्रह्मा के मुख के दाहिनी ओर दूसरा लज्जा से पीतवर्ण वाला मुख प्रादुर्भूत हुआ, फिर पीछे की ओर तीसरा और बायीं ओर चौथा मुख आविर्भूत हुआ। सरस्वती स्वर्ग की ओर जाने के लिए उद्यत हुई तो ब्रह्मा के सिर पर पांचवां मुख भी उत्पन्न हुआ जो कि जटाओं से ढका रहता है। ब्रह्मा ने मनु को सृष्टि-रचना के लिए पृथ्वी पर भेजकर शतरूपा (सरस्वती) से पाणि-ग्रहण किया, फिर समुद्र में विहार करते रहे। ब्रह्मा को इस कुकृत्य का दोष नहीं लगा, क्योंकि सरस्वती उनका अपना अंग थी। वेदों में ब्रह्मा और सरस्वती का अमूर्त निवास रहता है। दोनों की सर्वत्र अमूर्त उपस्थिति की अनिवार्यता पर ध्यान देकर तथा यह देखकर कि वह ब्रह्मा का अनिवार्य अंग है, ब्रह्मा को दोषी नहीं ठहराया गया।[4]&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
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श्वेत पद्म पर आसीना, शुभ्र हंसवाहिनी, तुषार धवल कान्ति, शुभ्रवसना, स्फटिक माला धारिणी, वीणा मण्डित करा, श्रुति हस्ता वे भगवती भारती प्रसन्न हों, जिनकी कृपा मनुष्य में कला, विद्या, ज्ञान तथा प्रतिभा का प्रकाश करती है। वही समस्त विद्याओं की अधिष्ठात्री हैं। यश उन्हीं की धवल अंग ज्योत्स्ना है। वे सत्त्वरूपा, श्रुतिरूपा, आनन्दरूपा हैं। विश्व में सुख, सौन्दर्य का वही सृजन करती हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
वे अनादि शक्ति भगवान ब्रह्मा के कार्य की सहयोगिनी हैं। उन्हीं की कृपा से प्राणी कार्य के लिये ज्ञान प्राप्त करता है। उनका कलात्मक स्पर्श कुरुप को परम सुन्दर कर देता है। वे हंसवाहिनी हैं। सदसद्विवेक ही उनका वास्तविक प्रसाद है। भारत में उनकी उपासना सदा होती आयी है। महाकवि कालिदास ने उन्हें प्रसन्न किया था। प्रत्येक कवि उनके पावन पदों का स्मरण करके ही अपना काव्यकर्म प्रारम्भ करता था, यह यहाँ की सनातन परम्परा थी।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
प्रतिभा की उन अधिष्ठात्री के चरित तो सर्वत्र प्रत्यक्ष हैं। समस्त वाड्मय, सम्पूर्ण कला और पूरा विज्ञान उन्हीं का वरदान है। मनुष्य उन जगन्माता की अहैतु की दया से प्राप्त शक्ति का दुरूपयोग करके अपना नाश कर लेता है और उनको भी दुखी करता है। ज्ञान-प्रतिमा भगवती सरस्वती के वरदान का सदुपयोग है अपने ज्ञान, प्रतिभा और विचार को भगवान में लगा देना। वह वरदान सफल हो जाता है। मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। भगवती प्रसन्न होती हैं।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&#39;भारतीय प्राचीन कला प्राय: मन्दिरों में व्यक्त हुई है।&#39; पाश्चात्य विद्वानों के ये आक्षेप ठीक ही हैं। भारत ने नश्वर मनुष्य और उसके नश्वर अर्थहीन कृत्यों को व्यर्थ स्थायी करने का प्रयत्न नहीं किया। भारत पर भगवती भारती की सदा समुज्ज्वल कृपा रही। मानव-अमृतपुत्र मानव को उन्होंने नित्य अमरत्व का मार्ग दिखाया। मानव ने अपनी क्रिया का आधार उस नित्यतत्त्व को बनाया, जहाँ क्रिया नष्ट होकर भी शाश्वत हो जाती है। कला उस चिरन्तन ज्योतिर्मय से एक होकर धन्य हो गयी। वह स्थूल जगत में भले नित्य न हो, अपने उद्गम को नित्य जगत में पहुँचाने में सफल हुई।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भगवती सरस्वती के दिव्य रूप को न समझकर उनके मंजु प्रकाश के क्षुद्रांश में भ्रान्त मनुष्य उस प्रकाश का दुरूपयोग करने लगा है। अन्धकार के गर्त में गिरता तो कदाचित कहीं अटकता भी; पर वह तो प्रकाश में कूद रहा है नीचे घोर अतल अन्धकार में।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भगवती शारदा के मन्दिर हैं, उपासना-पद्धति है, उनकी उपासना से सिद्ध महाकवि एवं विद्वानों के इतिहास में चारू चरित हैं। यह सब होकर भी उनकी कृपा और उपासना का फल केवल यश नहीं। यश तो उनकी कृपा का उच्छिष्ट है। फल तो है परमतत्त्व को प्राप्त कर लेना। इसी फल के लिये श्रुतियाँ उन वाग्देवी की स्तुति करती हैं।&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2013/02/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-5300382114776032469</guid><pubDate>Thu, 06 Dec 2012 07:49:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-12-06T13:36:40.821+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कालभैरव</category><title>श्री कालभैरव </title><description>&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgpezn6NQOEgM316rregDDigzxDHhmJkevUq3z2pcxelvKE2pvmys_rKSm5JmtCanuk6PqG_q0B33x58Wn9euMo6hMxt0V2pW3F8gMh0TQD4AuuHQ4VG6aUD2yF54GCPZ0Cgrr0OCllfrc/s1600/bhairava.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgpezn6NQOEgM316rregDDigzxDHhmJkevUq3z2pcxelvKE2pvmys_rKSm5JmtCanuk6PqG_q0B33x58Wn9euMo6hMxt0V2pW3F8gMh0TQD4AuuHQ4VG6aUD2yF54GCPZ0Cgrr0OCllfrc/s1600/bhairava.jpg&quot; width=&quot;266&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के दो स्वरूप बताए गए हैं। एक स्वरूप में महादेव अपने भक्तों को अभय देने वाले विश्वेश्वरस्वरूप हैं वहीं दूसरे स्वरूप में भगवान शिव दुष्टों को दंड देने वाले कालभैरव स्वरूप में विद्यमान हैं। शिवजी का विश्वेश्वरस्वरूप अत्यंत ही सौम्य और शांत हैं यह भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;वहीं भैरवस्वरूप रौद्र रूप वाले हैं, इनका रूप भयानक और विकराल होता है। इनकी पूजा करने वाले भक्तों को किसी भी प्रकार डर कभी परेशान नहीं करता। कलयुग में काल के भय से बचने के लिए कालभैरव की आराधना सबसे अच्छा उपाय है। कालभैरव को शिवजी का ही रूप माना गया है। कालभैरव की पूजा करने वाले व्यक्ति को किसी भी प्रकार का डर नहीं सताता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;भैरव शब्द का अर्थ ही होता है- भीषण, भयानक, डरावना। भैरव को शिव के द्वारा उत्पन्न हुआ या शिवपुत्र माना जाता है। भगवान शिव के आठ विभिन्न रूपों में से भैरव एक है। वह भगवान शिव का प्रमुख योद्धा है। भैरव के आठ स्वरूप पाए जाते हैं। जिनमे प्रमुखत: काला और गोरा भैरव अतिप्रसिद्ध हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;रुद्रमाला से सुशोभित, जिनकी आंखों में से आग की लपटें निकलती हैं, जिनके हाथ में कपाल है, जो अति उग्र हैं, ऐसे कालभैरव को मैं वंदन करता हूं।- भगवान कालभैरव की इस वंदनात्मक प्रार्थना से ही उनके भयंकर एवं उग्ररूप का परिचय हमें मिलता है। कालभैरव की उत्पत्ति की कथा शिवपुराण में इस तरह प्राप्त होती है-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;एक बार मेरु पर्वत के सुदूर शिखर पर ब्रह्मा विराजमान थे, तब सब देव और ऋषिगण उत्तम तत्व के बारे में जानने के लिए उनके पास गए। तब ब्रह्मा ने कहा वे स्वयं ही उत्तम तत्व हैं यानि कि सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च हैं। किंतु भगवान विष्णु इस बात से सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा कि वे ही समस्त सृष्टि से सर्जक और परमपुरुष परमात्मा हैं। तभी उनके बीच एक महान ज्योति प्रकट हुई। उस ज्योति के मंडल में उन्होंने पुरुष का एक आकार देखा।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;तब तीन नेत्र वाले महान पुरुष शिवस्वरूप में दिखाई दिए। उनके हाथ में त्रिशूल था, सर्प और चंद्र के अलंकार धारण किए हुए थे। तब ब्रह्मा ने अहंकार से कहा कि आप पहले मेरे ही ललाट से रुद्ररूप में प्रकट हुए हैं। उनके इस अनावश्यक अहंकार को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उस क्रोध से भैरव नामक पुरुष को उत्पन्न किया। यह भैरव बड़े तेज से प्रज्जवलित हो उठा और साक्षात काल की भांति दिखने लगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;इसलिए वह कालराज से प्रसिद्ध हुआ और भयंकर होने से भैरव कहलाने लगा। काल भी उनसे भयभीत होगा इसलिए वह कालभैरव कहलाने लगे। दुष्ट आत्माओं का नाश करने वाला यह आमर्दक भी कहा गया। काशी नगरी का अधिपति भी उन्हें बनाया गया। उनके इस भयंकर रूप को देखकर बह्मा और विष्णु शिव की आराधना करने लगे और गर्वरहित हो गए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
लौकिक और अलौकिक शक्तियों के द्वारा मानव जीवन में सफलता पायी जा सकती है, लेकिन शक्तियां जहां स्थिर रहती है, वहीं अलौकिक शक्तियां हर पल, हर क्षण मनुष्य के साथ-साथ रहती है। अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करने का श्रोत मात्र देवी देवताओं की साधना, उपासना शीघ्र फलदायी मानी गई है। कालभैरव भगवान शिव के पांचवें स्वरूप है तो विष्णु के अंश भी है। इनकी उपासना मात्र से ही सभी प्रकार के दैहिक, दैविक, मानसिक परेशानियों से शीघ्र मुक्ति मिलती है। कोई भी मानव इनकी पुजा, आराधना, उपासना से लाभ उठा सकता है। आज इस विषमता भरे युग में मानव को कदम-कदम पर बाधाओं, विपत्तियों और शत्रुओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मंत्र साधना ही इन सब समस्याओं पर विजय दिलाता है। शत्रुओं का सामना करने, सुख-शान्ति समृद्धि में यह साधना अति उत्तम है। शिव पुराण में वर्णित है--&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;भैरव: पूर्ण रूपोहि शंकर परात्मन: भूगेस्तेवैन जानंति मोहिता शिव भामया:।&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
देवताओं ने श्री कालभैरव की उपासना करते हुए बताया है कि काल की तरह रौद्र होने के कारण यह कालराज है। मृत्यु भी इनसे भयभीत रहती है। यह कालभैरव है इसलिए दुष्टों और शत्रुओं का नाश करने में सक्षम है। तंत्र शास्त्र के प्रव‌र्त्तक आचार्यो ने प्रत्येक उपासना कर्म की सिद्धि के लिए किए जाने वाले जप पाठ आदि कर्र्मो के आरंभ में भगवान भैरवनाथ की आज्ञा प्राप्त करने का निर्देश किया है।&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #cc0000;&quot;&gt;अतिक्रूर महाकाय, कल्पानत-दहनोपय,भैरवाय नमस्तुभ्यमेनुझां दातुमहसि।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
इससे स्पष्ट है कि सभी पुजा पाठों की आरंभिक प्रक्रिया में भैरवनाथ का स्मरण, पूजन, मंत्रजाप आवश्यक होते है। श्री काल भैरव का नाम सुनते ही बहुत से लोग भयभीत हो जाते है और कहते है कि ये उग्र देवता है। अत: इनकी साधना वाम मार्ग से होती है इसलिए यह हमारे लिए उपयोगी नहीं है। लेकिन यह मात्र उनका भ्रम है। प्रत्येक देवता सात्विक, राजस और तामस स्वरूप वाले होते है, किंतु ये स्वरूप उनके द्वारा भक्त के कार्र्यो की सिद्धि के लिए ही धरण किये जाते है। श्री कालभैरव इतने कृपालु एवं भक्तवत्सल है कि सामान्य स्मरण एवं स्तुति से ही प्रसन्न होकर भक्त के संकटों का तत्काल निवारण कर देते है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
तंत्राचार्यों का मानना है कि वेदों में जिस परम पुरुष का चित्रण रुद्र में हुआ, वह तंत्र शास्त्र के ग्रंथों में उस स्वरूप का वर्णन &#39;भैरव&#39; के नाम से किया गया, जिसके भय से सूर्य एवं अग्नि तपते हैं। इंद्र-वायु और मृत्यु देवता अपने-अपने कामों में तत्पर हैं, वे परम शक्तिमान &#39;भैरव&#39; ही हैं। भगवान शंकर के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती हैं। वामकेश्वर तंत्र की योगिनीहदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं- &#39;विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात्‌ सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः।&#39;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भ- से विश्व का भरण, र- से रमश, व- से वमन अर्थात सृष्टि को उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। तंत्रालोक की विवेक-टीका में भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
श्री तंत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&#39;भ&#39; अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है, भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिक सूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है। वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष, बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&#39;र&#39; अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं। उनके वस्त्र लाल हैं। सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग, खेट (मूसल), अंकुश, गदा, पाश, शूल, वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&#39;व&#39; अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक के सामान श्वेत हैं। वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है। विकसित कमल पुष्प उनका आसन है। वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल, वर एवं अभय धारण करती हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है। गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए, तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी &#39;काशी&#39; में आकर दोष मुक्त हुए।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव। लेकिन इसी पुराण के गणपति- खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है। तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगानालाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं। वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, ‍लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है।&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;शिव के अवतार श्री कालभैरव अपने भक्तों पर तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। साथ ही इनकी आराधना करने पर हमारे कई बुरे गुण स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। आदर्श और उच्च जीवन व्यतीत करने के लिए कालभैरव से भी शिक्षा ली जा सकती हैं। जीवन प्रबंधन से जुड़े कई संदेश श्री भैरव देते हैं-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; font-family: Bhaskar_WEB_Intro_Test, arial; font-size: 16px; line-height: 20px;&quot;&gt;भैरव को भगवान शंकर का पूर्ण रूप माना गया है। भगवान शंकर के इस अवतार से हमें अवगुणों को त्यागना सीखना चाहिए। भैरव के बारे में प्रचलित है कि ये अति क्रोधी, तामसिक गुणों वाले तथा मदिरा के सेवन करने वाले हैं। इस अवतार का मूल उद्देश्य है कि मनुष्य अपने सारे अवगुण जैसे- मदिरापान, तामसिक भोजन, क्रोधी स्वभाव आदि भैरव को समर्पित कर पूर्णत: धर्ममय आचरण करें। भैरव अवतार हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि हर कार्य सोच-विचार कर करना ही ठीक रहता है। बिना विचारे कार्य करने से पद व प्रतिष्ठा धूमिल होती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीभैरवनाथसाक्षात् रुद्र हैं। शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वेदों में जिस परमपुरुष का नाम रुद्र है, तंत्रशास्त्रमें उसी का भैरव के नाम से वर्णन हुआ है। तन्त्रालोक की विवेकटीका में भैरव शब्द की यह व्युत्पत्ति दी गई है- बिभíत धारयतिपुष्णातिरचयतीतिभैरव: अर्थात् जो देव सृष्टि की रचना, पालन और संहार में समर्थ है, वह भैरव है। शिवपुराणमें भैरव को भगवान शंकर का पूर्णरूप बतलाया गया है। तत्वज्ञानी भगवान शंकर और भैरवनाथमें कोई अंतर नहीं मानते हैं। वे इन दोनों में अभेद दृष्टि रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वामकेश्वर तन्त्र के एक भाग की टीका- योगिनीहृदयदीपिका में अमृतानन्दनाथका कथन है- विश्वस्य भरणाद्रमणाद्वमनात्सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवोभैरव:। भैरव शब्द के तीन अक्षरों भ-र-वमें ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उत्पत्ति-पालन-संहार की शक्तियां सन्निहित हैं। नित्यषोडशिकार्णव की सेतुबन्ध नामक टीका में भी भैरव को सर्वशक्तिमान बताया गया है-भैरव: सर्वशक्तिभरित:।शैवोंमें कापालिकसम्प्रदाय के प्रधान देवता भैरव ही हैं। ये भैरव वस्तुत:रुद्र-स्वरूप सदाशिवही हैं। शिव-शक्ति एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की उपासना कभी फलीभूत नहीं होती। यतिदण्डैश्वर्य-विधान में शक्ति के साधक के लिए शिव-स्वरूप भैरवजीकी आराधना अनिवार्य बताई गई है। रुद्रयामल में भी यही निर्देश है कि तन्त्रशास्त्रोक्तदस महाविद्याओंकी साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए उनके भैरव की भी अर्चना करें। उदाहरण के लिए कालिका महाविद्याके साधक को भगवती काली के साथ कालभैरवकी भी उपासना करनी होगी। इसी तरह प्रत्येक महाविद्या-शक्तिके साथ उनके शिव (भैरव) की आराधना का विधान है। दुर्गासप्तशतीके प्रत्येक अध्याय अथवा चरित्र में भैरव-नामावली का सम्पुट लगाकर पाठ करने से आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं, इससे असम्भव भी सम्भव हो जाता है। श्रीयंत्रके नौ आवरणों की पूजा में दीक्षाप्राप्तसाधक देवियों के साथ भैरव की भी अर्चना करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अष्टसिद्धि के प्रदाता भैरवनाथके मुख्यत:आठ स्वरूप ही सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं पूजित हैं। इनमें भी कालभैरव तथा बटुकभैरव की उपासना सबसे ज्यादा प्रचलित है। काशी के कोतवाल कालभैरवकी कृपा के बिना बाबा विश्वनाथ का सामीप्य नहीं मिलता है। वाराणसी में निíवघ्न जप-तप, निवास, अनुष्ठान की सफलता के लिए कालभैरवका दर्शन-पूजन अवश्य करें। इनकी हाजिरी दिए बिना काशी की तीर्थयात्रा पूर्ण नहीं होती। इसी तरह उज्जयिनीके कालभैरवकी बडी महिमा है। महाकालेश्वर की नगरी अवंतिकापुरी(उज्जैन) में स्थित कालभैरवके प्रत्यक्ष मद्य-पान को देखकर सभी चकित हो उठते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्मग्रन्थों के अनुशीलन से यह तथ्य विदित होता है कि भगवान शंकर के कालभैरव-स्वरूपका आविर्भाव मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषकाल-व्यापिनीअष्टमी में हुआ था, अत:यह तिथि कालभैरवाष्टमी के नाम से विख्यात हो गई। इस दिन भैरव-मंदिरों में विशेष पूजन और श्रृंगार बडे धूमधाम से होता है। भैरवनाथके भक्त कालभैरवाष्टमी के व्रत को अत्यन्त श्रद्धा के साथ रखते हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से प्रारम्भ करके प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रदोष-व्यापिनी अष्टमी के दिन कालभैरवकी पूजा, दर्शन तथा व्रत करने से भीषण संकट दूर होते हैं और कार्य-सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। पंचांगों में इस अष्टमी को कालाष्टमी के नाम से प्रकाशित किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्योतिषशास्त्र की बहुचíचत पुस्तक लाल किताब के अनुसार शनि के प्रकोप का शमन भैरव की आराधना से होता है। इस वर्ष शनिवार के दिन भैरवाष्टमीपडने से शनि की शान्ति का प्रभावशाली योग बन रहा है। शनिवार 1दिसम्बर को कालभैरवाष्टमी है। इस दिन भैरवनाथके व्रत एवं दर्शन-पूजन से शनि की पीडा का निवारण होगा। कालभैरवकी अनुकम्पा की कामना रखने वाले उनके भक्त तथा शनि की साढेसाती, ढैय्या अथवा शनि की अशुभ दशा से पीडित व्यक्ति इस कालभैरवाष्टमीसे प्रारम्भ करके वर्षपर्यन्तप्रत्येक कालाष्टमीको व्रत रखकर भैरवनाथकी उपासना करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कालाष्टमीमें दिन भर उपवास रखकर सायं सूर्यास्त के उपरान्त प्रदोषकालमें भैरवनाथकी पूजा करके प्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है। मन्त्रविद्याकी एक प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपि से महाकाल भैरव का यह मंत्र मिला है- ॐहंषंनंगंकंसं खंमहाकालभैरवायनम:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मंत्र का 21हजार बार जप करने से बडी से बडी विपत्ति दूर हो जाती है।। साधक भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ते) को नित्य कुछ खिलाने के बाद ही भोजन करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साम्बसदाशिवकी अष्टमूíतयोंमें रुद्र अग्नि तत्व के अधिष्ठाता हैं। जिस तरह अग्नि तत्त्‍‌व के सभी गुण रुद्र में समाहित हैं, उसी प्रकार भैरवनाथभी अग्नि के समान तेजस्वी हैं। भैरवजीकलियुग के जाग्रत देवता हैं। भक्ति-भाव से इनका स्मरण करने मात्र से समस्याएं दूर होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनका आश्रय ले लेने पर भक्त निर्भय हो जाता है। भैरवनाथअपने शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं।</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2012/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgpezn6NQOEgM316rregDDigzxDHhmJkevUq3z2pcxelvKE2pvmys_rKSm5JmtCanuk6PqG_q0B33x58Wn9euMo6hMxt0V2pW3F8gMh0TQD4AuuHQ4VG6aUD2yF54GCPZ0Cgrr0OCllfrc/s72-c/bhairava.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5389008527308982274.post-4996367611359839238</guid><pubDate>Thu, 15 Nov 2012 04:45:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-11-15T10:38:35.692+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मृत्यु के देवता</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">यमराज</category><title>मृत्यु के देवता -  यमराज</title><description>&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;background-color: white; color: #0b5394; font-size: x-large;&quot;&gt;मृत्यु के देवता - &amp;nbsp;यमराज&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यमराज या यम भारतीय पौराणिक कथाओं में मृत्यु के देवता को कहा गया है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से भगवान सूर्य के पुत्र यमराज, श्राद्धदेव मनु और पुत्री यमुना हुईं। यमराज परम भागवत, द्वादश भागवताचार्यों में हैं। यमराज जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। दक्षिण दिशा के इन लोकपाल की संयमनीपुरी समस्त प्राणियों के लिये, जो अशुभकर्मा है, बड़ी भयप्रद है। दीपावली से पूर्व दिन यमदीप देकर तथा दूसरे पर्वो पर यमराज की आराधना करके मनुष्य उनकी कृपा का सम्पादन करता है। ये निर्णेता हम से सदा शुभकर्म की आशा करते हैं। दण्ड के द्वारा जीव को शुद्ध करना ही इनके लोक का मुख्य कार्य&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;background-color: white; text-align: justify;&quot;&gt; है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;td align=&quot;center&quot; colspan=&quot;2 align=&quot;&gt;यमराज&lt;/td&gt;
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&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjNi30ePseTnc5nMst5aM8PWsrO7u5tclmBM0ZvKS9wCkbucgB3yys5_5FP-ceJUjKSwvzLn8_YzTfSNy5nkwSz6JBaHCsDTsjzWnKsK0e8m_KbLEVIe_gb73ifX9nFCpc797Pqa6Y49vE/s1600/558px-Yama.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjNi30ePseTnc5nMst5aM8PWsrO7u5tclmBM0ZvKS9wCkbucgB3yys5_5FP-ceJUjKSwvzLn8_YzTfSNy5nkwSz6JBaHCsDTsjzWnKsK0e8m_KbLEVIe_gb73ifX9nFCpc797Pqa6Y49vE/s1600/558px-Yama.jpg&quot; width=&quot;298&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;td&gt;विभाग&lt;/td&gt;
&lt;td&gt;मृत्यु&lt;/td&gt;
&lt;/tr&gt;
&lt;tr align=&quot;center&quot;&gt;
&lt;td&gt;आवास &lt;/td&gt;
&lt;td&gt;यमलोक &lt;/td&gt;
&lt;/tr&gt;
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&lt;td&gt;शस्त्र &lt;/td&gt;
&lt;td&gt;दण्ड&lt;/td&gt;
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&lt;td&gt;वाहन &lt;/td&gt;
&lt;td&gt;भैंस&lt;/td&gt;
&lt;/tr&gt;
&lt;tr align=&quot;center&quot;&gt;
&lt;td&gt;पत्नी &lt;/td&gt;
&lt;td&gt;यमी&lt;/td&gt;
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&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;वेदों में&amp;nbsp;पौराणिक संदर्भ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
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&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;
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वेदों ने उनका वर्णन मरने वाले पहले व्यक्ति के रूप में किया है, जिन्होंने नश्वरता के मार्ग को अंकित किया, जिस पर तब से सभी लोग चलते आ रहे हैं। वह दक्षिण दिशा (मृत्यु का क्षेत्र) के संरक्षक हैं तथा धरती के नीचे दक्षिण में स्थित मृतकों के विश्राम-स्थल के स्वामी हैं। वेदों में यम को दिवंगत पूर्वजों के प्रसन्नचित्त राजा के रूप में वर्णित किया गया है, न कि पापों का दंड देने वाले के रूप में।&lt;/div&gt;
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पौराणिक कथाओं में उन्हें धर्मराज के रूप से जाना जाने लगा, जो मृतक के अच्छे और बुरे कर्मों को तौलते हैं तथा उनके प्रतिफलों को निर्धारित करते हैं। उन्हें लाल वस्त्रों में सज्जित, हरे वर्ण और रक्ताभ आँखों वाले राजसी स्वरूप में वर्णित किया गया है। वह खोपड़ी से अलंकृत गदा और एक पाश धारण करते हैं तथा भैंसे पर सवारी करते हैं। चार आँखों वाले दो कुत्ते उनके यमलोक के प्रवेशद्वार की रक्षा करते हैं तथा कौए और कबूतर उनके संदेशवाहक हैं। तिब्बत, जापान और चीन की बौद्ध पौराणिक कथाओं में भी यम का वर्णन है। इनमें भी यम की इसी तरह मृतक लोक के संरक्षक की, लेकिन कम महत्त्वपूर्ण भूमिका है।&lt;/div&gt;
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चार द्वारों, सात तोरणों तथा पुष्पोदका, वैवस्वती आदि सुरम्य नदियों से पूर्ण अपनी पुरी में पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर के द्वार से प्रविष्ट होने वाले पुण्यात्मा पुरुषों को यमराज शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी, चतुर्भुज, नीलाभ भगवान विष्णु के रूप में अपने महाप्रासाद में रत्नासन पर दर्शन देते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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दक्षिण-द्वार से प्रवेश करने वाले पापियों को वह तप्त लौहद्वार तथा पूय, शोणित एवं क्रूर पशुओं से पूर्ण वैतरणी नदी पार करने पर प्राप्त होते हैं। द्वार से भीतर आने पर वे अत्यन्त विस्तीर्ण सरोवरों के समान नेत्रवाले, धूम्रवर्ण, प्रलय-मेघ के समान गर्जन करने वाले, ज्वालामय रोमधारी, बड़े तीक्ष्ण प्रज्वलित दन्तयुक्त, सँडसी-जैसे नखों वाले, चर्मवस्त्रधारी, कुटिल-भृकुटि भयंकरतम वेश में यमराज को देखते हैं। वहाँ मूर्तिमान व्याधियाँ, घोरतर पशु तथा यमदूत उपस्थित मिलते हैं।&lt;br /&gt;
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&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;अन्य नाम&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #0b5394; font-size: large;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;

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यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुभ्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त- इन चतुर्दश नामों से इन महिषवाहन दण्डधर की आराधना होती है। इन्हीं नामों से इनका तर्पण किया जाता है।&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</description><link>http://knowledgeofdivine.blogspot.com/2012/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjNi30ePseTnc5nMst5aM8PWsrO7u5tclmBM0ZvKS9wCkbucgB3yys5_5FP-ceJUjKSwvzLn8_YzTfSNy5nkwSz6JBaHCsDTsjzWnKsK0e8m_KbLEVIe_gb73ifX9nFCpc797Pqa6Y49vE/s72-c/558px-Yama.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item></channel></rss>