<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><rss xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya</title><description>जीवन को गहराई से समझने के लिए विज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का संगम। बेहतर और उद्देश्यपूर्ण जीवन के लिए पाएं प्रेरक विचार और सकारात्मक सोच।</description><managingEditor>noreply@blogger.com (Dr. King)</managingEditor><pubDate>Sun, 5 Jul 2026 17:18:28 -0700</pubDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">20</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/search/label/%23Hindi</link><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><copyright>(c) Dr. King</copyright><itunes:image href="https://yt3.ggpht.com/09tVlMD6W46W5wHx9egdFIj-N9Yz4jZxBi7ZohHfKTxhRmYF7_fmMv0UWXr13mD-1-8RVKTtQmY=s600-c-k-c0x00ffffff-no-rj-rp-mo"/><itunes:summary>Blogcast (Blog + Podcast) on thought provoking topics</itunes:summary><itunes:subtitle>Blogcast (Blog + Podcast) on thought provoking topics</itunes:subtitle><itunes:category text="Religion &amp; Spirituality"><itunes:category text="Spirituality"/></itunes:category><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:owner><itunes:email>drking2000-service@yahoo.com</itunes:email><itunes:name>Dr. King</itunes:name></itunes:owner><item><title>[Hindi]  ओंकार का रहस्य : जो कुछ भी है, वह सब ओंकार ही है!</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/07/hindi.html</link><category>#advaita</category><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Meditation</category><category>#mystery</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><category>#veda</category><pubDate>Fri, 3 Jul 2026 07:55:57 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-5895762971231328892</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;ये वे विचार हैं जो हज़ारों साल पहले भारत के प्राचीन दार्शनिकों के थे; यानी उपनिषदों के ऋषियों का नज़रिया। इन ऋषि-मुनियों के पास आज के पश्चिमी दार्शनिकों की तरह आधुनिक शब्दावली नहीं थी, और न ही आज के न्यूरोसाइंटिस्ट्स द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अत्याधुनिक उपकरण थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी, इतने प्राचीन काल में भी उनके पास जो वैचारिक स्पष्टता थी, उसे देखकर मैं दंग रह जाता हूँ। मैं उनके विचारों का सम्मान सिर्फ इसलिए नहीं करता कि मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ। बल्कि इसलिए, क्योंकि उनके विचारों में सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बल्कि इस दुनिया के चेतन औरअचेतन (सजीव औरनिर्जीव) सब कुछ को एक ही सूत्र में पिरोने की अद्भुत क्षमता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की चर्चा के लिए मैंने सबसे प्राचीन दार्शनिक ग्रंथों में से एक 'मांडूक्य उपनिषद' को अपना आधार बनाया है। यह अथर्ववेद का हिस्सा रहा एक उपनिषद है। आकार में यह बेहद छोटा होने के बावजूद, अद्वैत दार्शनिक आदि शंकराचार्य जैसे विद्वानों ने इसे सबसे महत्वपूर्ण माना है। फिलहाल हमारी जिज्ञासा की जो वजह है, यानी 'चेतना', यह उपनिषद मुख्य रूप से उसी पर बात करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह उपनिषद 'ओम्' ध्वनि के ज़िक्र के साथ शुरू होता है। प्राचीन भारतीय दर्शन में, खासकर उपनिषदों में, इस ओंकार को परम सत्य (ultimate reality) के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। यही परम सत्य सभी आध्यात्मिक खोजों का अंतिम लक्ष्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाकी धार्मिक ग्रंथों से अलग, उपनिषद इसे 'ईश्वर' या 'भगवान' नहीं कहते। वे इस परम सत्य की पूजा करने या उसके सामने आत्मसमर्पण करने की बात कहीं नहीं करते। इसके बजाय, वे इस परम सत्य का 'अनुभव करने' की ज़रूरत पर बार-बार ज़ोर देते हैं। औरउस अनुभव को पाने का रास्ता 'ध्यान' है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस छोटे से परिचय के साथ, मैं उपनिषद के भीतर कदम रखना चाहता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले दो मंत्रों में, उपनिषद हमें ओंकार की इन विशेषताओं से रूबरू कराता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;- ओंकार का कभी विनाश नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओंकार सबमें समाया हुआ है (सर्वव्यापी है)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओंकार समय के पार है—यह भूत, वर्तमान औरभविष्य काल से परे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- समय की परिभाषा के दायरे में जो कुछ भी आता है, उसके पार भी ओंकार का अस्तित्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओंकार ही समस्त जीवों का आंतरिक तत्व है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;एक तरह से कहें तो ये दो मंत्र पूरे उपनिषद के सार को समेटे हुए हैं। अब आइए देखते हैं कि इन बातों के मायने क्या हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्तित्व की निरंतरता (eternality of existence) को लेकर उपनिषद बिल्कुल साफ हैं। वे अस्तित्व के सिकुड़ने औरफैलने (सृष्टि औरप्रलय) के चक्रों की बात करते हैं, न कि पूरी तरह से मिट जाने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद 'सृष्टिकर्ता' और 'सृष्टि' के बीच कोई फर्क नहीं करते। सच कहें तो, वहाँ सृष्टि जैसी कोई अलग चीज़ है ही नहीं। इसीलिए वे कहते हैं कि परम सत्य ही सब कुछ है। वह सिर्फ अलग-अलग वस्तुओं का जोड़ नहीं है, और न ही किसी ने उन्हें बनाया है। बल्कि वह खुद ही, 'सब कुछ' के रूप में मौजूद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे की पंक्तियों में कहा गया है कि ओंकार समय से परे (कालातीत) है। वह कल था, आज है औरकल भी रहेगा। उपनिषद यहीं नहीं रुकता; वह कहता है कि यह समय की सोच से ही परे है। क्या किसी चीज़ का भूत, वर्तमान औरभविष्य में होने, औरसमय से परे होने में कोई अंतर है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्कुल है। ऐसा क्यों है, मैं यहाँ समझाता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेद एक ऐसी स्थिति की बात करते हैं जहाँ समय का कोई अस्तित्व ही नहीं था। प्रसिद्ध वैदिक सूक्तों में से एक 'नासदीय सूक्त' कहता है कि समय के पैदा होने से पहले भी वह 'वह' मौजूद था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दुनिया में जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं, हमें हर चीज़ एक-दूसरे से अलग दिखाई देती है। कोई भी दो चीज़ें एक जैसी नहीं होतीं। लेकिन यह मंत्र जो कह रहा है वह यह है कि भले ही रूप अलग-अलग दिखाई दें, पर वे सब एक ही हैं। वे सब ओंकार ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलग-अलग दिखने वाली चीज़ें भला एक कैसे हो सकती हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश-काल (space-time) की सीमा वाले हमारे संसार में, कोई भी दो चीज़ें एक ही समय पर एक ही जगह नहीं हो सकतीं। ठीक वैसे ही, एक ही चीज़ एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर नहीं हो सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ओंकार देश-काल की इन सीमाओं के पार है। वह एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर औरएक से ज़्यादा रूपों में मौजूद रह सकता है। वे सभी अस्तित्व उसी एक परम सत्य का हिस्सा हैं। वहाँ कोई अनेकता (भेदभाव) नहीं है। यह अंतर हमें तब दिखाई देता है जब हम इस दुनिया को अपनी आँखों से देखते हैं, जो कि देश-काल की सीमाओं में बंधी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब, उपनिषद एक बेहद रोमांचक घोषणा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सब कुछ ॐ है। हममें से हर कोई ॐ है। यह ॐ चार अवस्थाओं में हो सकता है," उपनिषद कहता है। इन अवस्थाओं को यह वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ औरतुरीय कहता है। इनमें से हर अवस्था में ओंकार के रूप एक साथ कई जगहों पर हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये रूप एक साथ एक ही समय पर इसलिए रह पाते हैं—क्योंकि जिस मूल शक्ति ने ये रूप धारण किए हैं, वह समय के दायरे से बाहर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मोटे तौर पर इन अवस्थाओं को 'चेतना के विभिन्न आयाम' कह सकते हैं। लेकिन, यह सोच उन शुरुआती तीन तर्कों से बिल्कुल अलग है जिनपर हमने पहले चर्चा की थी। ज़्यादा से ज़्यादा, वे आधुनिक तर्क इस महान चेतना की केवल शुरुआती तीन अवस्थाओं के ही बराबर हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतना की इन अलग-अलग अवस्थाओं के बारे में हम अपने अगले एपिसोड में औरज़्यादा विस्तार से बात करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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वह कहता है कि यह समय की सोच से ही परे है। क्या किसी चीज़ का भूत, वर्तमान औरभविष्य में होने, औरसमय से परे होने में कोई अंतर है? बिल्कुल है। ऐसा क्यों है, मैं यहाँ समझाता हूँ। वेद एक ऐसी स्थिति की बात करते हैं जहाँ समय का कोई अस्तित्व ही नहीं था। प्रसिद्ध वैदिक सूक्तों में से एक 'नासदीय सूक्त' कहता है कि समय के पैदा होने से पहले भी वह 'वह' मौजूद था। इस दुनिया में जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं, हमें हर चीज़ एक-दूसरे से अलग दिखाई देती है। कोई भी दो चीज़ें एक जैसी नहीं होतीं। लेकिन यह मंत्र जो कह रहा है वह यह है कि भले ही रूप अलग-अलग दिखाई दें, पर वे सब एक ही हैं। वे सब ओंकार ही हैं। अलग-अलग दिखने वाली चीज़ें भला एक कैसे हो सकती हैं? देश-काल (space-time) की सीमा वाले हमारे संसार में, कोई भी दो चीज़ें एक ही समय पर एक ही जगह नहीं हो सकतीं। ठीक वैसे ही, एक ही चीज़ एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर नहीं हो सकती। लेकिन ओंकार देश-काल की इन सीमाओं के पार है। वह एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर औरएक से ज़्यादा रूपों में मौजूद रह सकता है। वे सभी अस्तित्व उसी एक परम सत्य का हिस्सा हैं। वहाँ कोई अनेकता (भेदभाव) नहीं है। यह अंतर हमें तब दिखाई देता है जब हम इस दुनिया को अपनी आँखों से देखते हैं, जो कि देश-काल की सीमाओं में बंधी हैं। अब, उपनिषद एक बेहद रोमांचक घोषणा करता है। "सब कुछ ॐ है। हममें से हर कोई ॐ है। यह ॐ चार अवस्थाओं में हो सकता है," उपनिषद कहता है। इन अवस्थाओं को यह वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ औरतुरीय कहता है। इनमें से हर अवस्था में ओंकार के रूप एक साथ कई जगहों पर हो सकते हैं। ये रूप एक साथ एक ही समय पर इसलिए रह पाते हैं—क्योंकि जिस मूल शक्ति ने ये रूप धारण किए हैं, वह समय के दायरे से बाहर है। हम मोटे तौर पर इन अवस्थाओं को 'चेतना के विभिन्न आयाम' कह सकते हैं। लेकिन, यह सोच उन शुरुआती तीन तर्कों से बिल्कुल अलग है जिनपर हमने पहले चर्चा की थी। ज़्यादा से ज़्यादा, वे आधुनिक तर्क इस महान चेतना की केवल शुरुआती तीन अवस्थाओं के ही बराबर हो सकते हैं। चेतना की इन अलग-अलग अवस्थाओं के बारे में हम अपने अगले एपिसोड में औरज़्यादा विस्तार से बात करेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले एपिसोड्स में हमने बात की थी कि आधुनिक न्यूरोसाइंटिस्ट्स चेतना को कैसे समझाते हैं। वे चेतना को हमारे दिमाग औरउसकी कार्यप्रणाली से जोड़कर देखते हैं। उनकी नज़र में चेतना का मतलब है 'दिमाग की सक्रिय गतिविधि'। या फिर दिमाग के काम करने के तरीके से पैदा होनेवाला एकअनोखा फिनोमिना। इसके विपरीत, डेविड चैल्मर्स जैसे कॉग्निटिव फिलॉसफर्स इस बात से कैसे असहमत हैं, इसपर भी हमने चर्चा की थी। चैल्मर्स जैसों के मुताबिक, चेतना पूरी तरह से एक व्यक्तिगत औरआंतरिक अनुभव (subjective phenomenon) है। वे तर्क देते हैं कि इसे दिमाग के न्यूरॉन्स जैसी भौतिक चीज़ों के काम करने के तरीके तक कभी सीमित नहीं किया जा सकता। उनकी सोच में चेतना कोई भौतिक चीज़ नहीं है; 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© Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#advaita, #AI, #Hindi, #IndianPhilosophy, #Meditation, #mystery, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad, #veda</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  क्या AI मानवोंकेलिए खतरा बनसकताहै?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi-ai_01926481377.html</link><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Fri, 26 Jun 2026 18:44:59 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-2944306667505290955</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;/script&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;निश्चितरूपसे, कुछ विशिष्ट भूमिकाओंमें हाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AI प्रणालियोंको ऐसे विशाल ज्ञानभंडारपर प्रशिक्षित कियाजाताहै, जिसे कोई भी एक अकेला मानव कभी पूरी तरह आत्मसात नहीं करसकता। उनमें विशाल मात्रामें डेटा इनजेस्ट करने, उसे प्रोसेस करने, और ऐसी गति से परिणाम देनेकी क्षमता होतीहै जिसकी कल्पना भी मनुष्य नहीं करसकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या इससे वे मानवोंके बराबर होजातीहैं, या उनसे श्रेष्ठ बनजातीहैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ऐसा नहीं लगताहै। कमसेकम अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। आजके रूपमें वे अत्यधिक यांत्रिक हैं। वे उन कार्योंको संपन्न करतीहैं जो मानवोंको अत्यंत उबाऊ या थकाऊ लगतेहैं, और यह सब वे विशाल कंप्यूटिंग शक्तिका उपयोगकरतेहुए बिना किसी सचेत उद्देश्यके करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजका AI पैटर्न्सके आधारपर सही उत्तरका अनुमान लगानेमें बहुत अच्छा काम करसकताहै। लेकिन जैसा मैंने पिछले एपिसोड्समें चर्चा कीथी, वह वास्तवमें यह "समझ" नहीं सकताकि वह किस चीजका निष्कर्ष निकालरहाहै। न ही उसके पास अपने किसी भी कार्यको करनेकी कोई वास्तविक "मोटिवेशन" होतीहै। उसका मानवोंसे आगे निकलनेका कोई उद्देश्य नहीं है। और वर्तमानमें वह उसकेलिए तैयार भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका ज्ञान चाहे जितना विशाल क्योंनहो, वह केवल उन जानकारियोंतक सीमित है जो दस्तावेजोंके रूपमें सार्वजनिक रूपसे उपलब्ध हैं। यह उस ज्ञानका केवल एक छोटा-सा अंश है जिसे मानवोंने लाखों वर्षोंमें, असंख्य भाषाओंमें और विविध जीवन-परिस्थितियोंमें संचित कियाहै। इसलिए यह कहनागलत नहीं होगा कि इस दृष्टिसे AI कभी भी मानवोंकी बराबरी नहीं करसकेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjD2qlzNqTKiAgjXQOTD-gU4OHt1GRddO-ZrlHe_t-jnzL4CODh7stjDdsOsXiTXyCpEEKWOcSqvv9ApyXabLNBs6wgN3S5Lu8pv3BVUj-cBGjBGRDqkQiXFIy58Qhs1kYHM999EHp0avdwAhCZokz9jTqAmQfuAVw7BomDTmzKbZEg0KQ-hIKKPURaMtU/s1254/dream.png" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="1254" data-original-width="1254" height="320" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjD2qlzNqTKiAgjXQOTD-gU4OHt1GRddO-ZrlHe_t-jnzL4CODh7stjDdsOsXiTXyCpEEKWOcSqvv9ApyXabLNBs6wgN3S5Lu8pv3BVUj-cBGjBGRDqkQiXFIy58Qhs1kYHM999EHp0avdwAhCZokz9jTqAmQfuAVw7BomDTmzKbZEg0KQ-hIKKPURaMtU/s320/dream.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;इसलिए यह डर कि AI स्वतंत्र रूपसे मानवोंपर नियंत्रण स्थापित करलेगा, विज्ञान-कथाओंमें दिखाई देनेवाले भयके समान एक काल्पनिक डर ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिरभी, जैसा मैंने पहले सूचीबद्ध कियाथा, सीमित स्तरपर कुछ खतरे अवश्य मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कस्टमर सर्विस प्रतिनिधि, डेटा एंट्री क्लर्क, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शनिस्ट, जूनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर, एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट तथा बुककीपर जैसे पेशे अन्य लोगोंकी तुलना में अधिक जोखिममें हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे प्रभावित होनेवाला एक और बड़ा समुदाय है अनुवादकों और वॉइस आर्टिस्ट्सका। कारण यह हैकि वर्तमान AI प्रणालियाँ टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट मैनिपुलेशनमें अत्यंत दक्ष हैं। इसलिए प्रकाशक AI इंटीग्रेशनपर तेजीसे जोरदेरहेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोसाइटी ऑफ ऑथर्स द्वारा किएगए एक सर्वेक्षणके अनुसार, एक-तिहाईसे अधिक अनुवादक पहलेही जनरेटिव AI के कारण अपना काम खोचुकेहैं। अनेक साहित्यिक अनुवादकोंसे अब "Machine Translation Post-Editing" करनेकेलिए कहाजारहाहै। इसका अर्थ है AI द्वारा तैयार किएगए अस्वाभाविक अथवा क्लंकी अनुवादित पाठको सुधारना। लेकिन इसकेलिए उन्हें उस प्रति-शब्द अनुवाद शुल्कका केवल एक छोटा-सा अंश मिलताहै जो उन्हें पहले प्राप्त होताथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अत्यंत विश्वसनीय और भावनात्मक अभिव्यक्तिके सक्षम टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल्सके विकासने वॉइस-ओवर उद्योगको गंभीर रूपसे प्रभावित कियाहै। AI के आगमनसे पहले यह पेशेवर वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अत्यंत लाभदायक क्षेत्र था। ये वॉइस आर्टिस्ट्स अपने द्वारा निर्मित ऑडियोके प्रति घंटेकेलिए सैकड़ों डॉलर तककी भारी फीस लेतेथे। अधिकांश छोटे लेखकोंकेलिए उन्हें नियुक्त करना कभी संभव नहीं होताथा। उनमेंसे कुछ स्वयं अपनी पुस्तकोंका वाचन करतेथे, जबकि अन्य असहाय होकर देखते रहतेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब AI के हस्तक्षेपके कारण वॉइस आर्टिस्ट समुदायमें भारी बेचैनी फैल गई है। उन्हें लगताहैकि उनका अस्तित्व ही खतरेमें पड़गयाहै। अपने फोरम्स और यूनियनोंके समर्थनसे वे इस क्षेत्रमें AI के प्रवेशको रोकनेका प्रयास करते हुए दिखाई देतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय था जब किसी लेखकको अपनी पुस्तकका किसी दूसरी भाषामें अनुवाद करवाने और उसका वाचन तैयार करवानेकेलिए महीनोंतक कठिन परिश्रम करना पड़ताथा। वही काम आज AI केवल कुछ घंटोंमें करदेताहै। यही AI भयका मुख्य कारण बनगयाहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसी मानसिकता केवल बाजारको सीमित करेगी। यदि इस परिवर्तनको सही ढंगसे संभालाजाए, तो कम लागतवाले विकल्पोंकी प्रतीक्षाकररहे पुस्तक-प्रकाशन उद्योगमें एक बड़ा परिवर्तन आसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा कल्पना कीजिए। एक अच्छी पुस्तक केवल एक भाषातक सीमित रहनेके बजाय विभिन्न भाषाएँ बोलनेवाले लाखों लोगोंतक पहुँचसकेगी। ज्ञानके प्रसारमें यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑडियोबुक्सकी बढ़ती लोकप्रियताको देखतेहुए, ऑडियोबुक प्रोडक्शन पाइपलाइनमें AI का प्रवेश एक बड़े वरदानके रूपमें सिद्ध होसकताहै। यह न केवल अत्यधिक शुल्क लेनेवाले कुछ वॉइस आर्टिस्ट्सके एकाधिकारको समाप्त करेगा, बल्कि पुस्तकोंको कहीं अधिक व्यापक श्रोतावर्गतक पहुँचानेमें भी सहायता करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, मैं इन पेशेवरोंके भयको समझ सकताहूँ। लेकिन क्या AI वास्तवमें उनका स्थान लेसकताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान AI प्रणालियाँ चाहे कितनीभी स्मार्ट क्योंनलगें, वे नतो भाषाई पूर्णताके स्तरपर और नही भावनाओंकी सूक्ष्म अभिव्यक्तिके स्तरपर मानव-जैसी सटीकता प्राप्त करसकीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उच्चस्तरीय वॉइस आर्टिस्ट्सकी मांग हमेशा बनी रहेगी। उन्हें बेस्टसेलर लेखकोंद्वारा तथा वे लोग नियुक्त करेंगे जो उनकी सेवाओंका खर्च उठा सकतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश लेखक उन्हें नियुक्त करनेका साहस कभी नहीं करपातेथे, क्योंकि उनकी फीस अत्यधिक होतीथी। साथही, सब्सक्रिप्शन-आधारित स्टोर्स इन लेखकोंको जो अत्यल्प "पूल शेयर" भुगतान करतेहैं, वह भी ऐसे प्रयासको व्यावहारिक नहीं बनने देता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ये लेखक AI की ओर रुख करसकतेहैं और अपनेलिए आजीविकाका रास्ता खोजसकतेहैं। आखिरकार केवल वॉइस आर्टिस्ट्सको ही नहीं, बल्कि उन लेखकोंको भी जीवित रहनाहै जिनकेपास इन महँगी सेवाओंका भुगतान करनेके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे ऑडियोबुक उद्योग विकसित होताजाएगा, अच्छे वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अवसर भी बढ़ते जाएँगे। इसलिए दीर्घकालमें उनकेपास स्वयंको खतरेमें समझनेका कोई विशेष कारण नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य रूपसे यह शिकायत भी सुननेको मिलतीहैकि अनुवाद पेशेसे जुड़े लोग AI के कारण गंभीर रूपसे प्रभावित हुएहैं। कहाजाताहैकि उनमेंसे अनेक लोगोंको अब केवल प्रूफरीडिंग जैसे कार्योंतक सीमित करदियागयाहै, क्योंकि मुख्य अनुवादका काम AI स्वयं करलेताहै। स्वाभाविकरूपसे, इसकेलिए उन्हें पहलेकी तुलनामें बहुत कम भुगतान प्राप्त होताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जैसे-जैसे AI अधिक पुस्तकोंका अनुवाद करेगा, वैसे-वैसे इन प्रूफरीडर्सकेलिए भी अधिक कार्य उपलब्ध होंगे। अंततः कार्यकी कुल मात्रा भी महत्वपूर्ण होतीहै। यह अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं हैकि इससे लेखक और पाठक दोनों लाभान्वित होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए किसी ऐसे परिवर्तनके विरुद्ध संघर्ष करनेके बजाय जो लगभग अपरिहार्य है, बेहतर यही होगा कि हम प्रौद्योगिकीका सर्वोत्तम उपयोग करना सीखें। दीर्घकालमें यही सभीकेलिए लाभदायक सिद्ध होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा मानना हैकि AI के तात्कालिक प्रभावोंपर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, हमें उन दीर्घकालिक खतरोंपर अधिक ध्यान देना चाहिए जिन्हें AI कुछ स्वार्थी लोगोंके हाथोंमें पहुँचकर उत्पन्न करसकताहै। वास्तविक खतरा स्वयं प्रौद्योगिकीसे नहीं है। बल्कि उस दुरुपयोगसे है जो मनुष्य इसके माध्यमसे करसकतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे वह कम्युनिकेशन हो, ऊर्जा आपूर्ति-श्रृंखला हो, अत्यावश्यक सेवाएँ हों, या कोई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र, यदि AI का तीव्र प्रसार गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह वास्तवमें एक गंभीर खतरा बनसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AI एक तेज धारवाले चाकूकी तरह है। यदि वही चाकू किसी कुशल सर्जनके हाथमें हो, तो वह जीवन बचासकताहै। यदि वह किसी उत्कृष्ट शेफके हाथमें हो, तो वह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करसकताहै। और यदि वह किसी महान शिल्पकारके हाथमें हो, तो वह अद्भुत कलाकृतियोंका निर्माण करसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यदि वही चाकू गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह विनाशका कारण भी बनसकताहै। वास्तवमें, यही वह बात है जिसके बारेमें हमें अधिक चिंतित होना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;निश्चितरूपसे, कुछ विशिष्ट भूमिकाओंमें हाँ। AI प्रणालियोंको ऐसे विशाल ज्ञानभंडारपर प्रशिक्षित कियाजाताहै, जिसे कोई भी एक अकेला मानव कभी पूरी तरह आत्मसात नहीं करसकता। उनमें विशाल मात्रामें डेटा इनजेस्ट करने, उसे प्रोसेस करने, और ऐसी गति से परिणाम देनेकी क्षमता होतीहै जिसकी कल्पना भी मनुष्य नहीं करसकता। लेकिन क्या इससे वे मानवोंके बराबर होजातीहैं, या उनसे श्रेष्ठ बनजातीहैं? मुझे ऐसा नहीं लगताहै। कमसेकम अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। आजके रूपमें वे अत्यधिक यांत्रिक हैं। वे उन कार्योंको संपन्न करतीहैं जो मानवोंको अत्यंत उबाऊ या थकाऊ लगतेहैं, और यह सब वे विशाल कंप्यूटिंग शक्तिका उपयोगकरतेहुए बिना किसी सचेत उद्देश्यके करतीहैं। आजका AI पैटर्न्सके आधारपर सही उत्तरका अनुमान लगानेमें बहुत अच्छा काम करसकताहै। लेकिन जैसा मैंने पिछले एपिसोड्समें चर्चा कीथी, वह वास्तवमें यह "समझ" नहीं सकताकि वह किस चीजका निष्कर्ष निकालरहाहै। न ही उसके पास अपने किसी भी कार्यको करनेकी कोई वास्तविक "मोटिवेशन" होतीहै। उसका मानवोंसे आगे निकलनेका कोई उद्देश्य नहीं है। और वर्तमानमें वह उसकेलिए तैयार भी नहीं है। उसका ज्ञान चाहे जितना विशाल क्योंनहो, वह केवल उन जानकारियोंतक सीमित है जो दस्तावेजोंके रूपमें सार्वजनिक रूपसे उपलब्ध हैं। यह उस ज्ञानका केवल एक छोटा-सा अंश है जिसे मानवोंने लाखों वर्षोंमें, असंख्य भाषाओंमें और विविध जीवन-परिस्थितियोंमें संचित कियाहै। इसलिए यह कहनागलत नहीं होगा कि इस दृष्टिसे AI कभी भी मानवोंकी बराबरी नहीं करसकेगा। इसलिए यह डर कि AI स्वतंत्र रूपसे मानवोंपर नियंत्रण स्थापित करलेगा, विज्ञान-कथाओंमें दिखाई देनेवाले भयके समान एक काल्पनिक डर ही है। फिरभी, जैसा मैंने पहले सूचीबद्ध कियाथा, सीमित स्तरपर कुछ खतरे अवश्य मौजूद हैं। कस्टमर सर्विस प्रतिनिधि, डेटा एंट्री क्लर्क, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शनिस्ट, जूनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर, एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट तथा बुककीपर जैसे पेशे अन्य लोगोंकी तुलना में अधिक जोखिममें हैं। इससे प्रभावित होनेवाला एक और बड़ा समुदाय है अनुवादकों और वॉइस आर्टिस्ट्सका। कारण यह हैकि वर्तमान AI प्रणालियाँ टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट मैनिपुलेशनमें अत्यंत दक्ष हैं। इसलिए प्रकाशक AI इंटीग्रेशनपर तेजीसे जोरदेरहेहैं। सोसाइटी ऑफ ऑथर्स द्वारा किएगए एक सर्वेक्षणके अनुसार, एक-तिहाईसे अधिक अनुवादक पहलेही जनरेटिव AI के कारण अपना काम खोचुकेहैं। अनेक साहित्यिक अनुवादकोंसे अब "Machine Translation Post-Editing" करनेकेलिए कहाजारहाहै। इसका अर्थ है AI द्वारा तैयार किएगए अस्वाभाविक अथवा क्लंकी अनुवादित पाठको सुधारना। लेकिन इसकेलिए उन्हें उस प्रति-शब्द अनुवाद शुल्कका केवल एक छोटा-सा अंश मिलताहै जो उन्हें पहले प्राप्त होताथा। अत्यंत विश्वसनीय और भावनात्मक अभिव्यक्तिके सक्षम टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल्सके विकासने वॉइस-ओवर उद्योगको गंभीर रूपसे प्रभावित कियाहै। AI के आगमनसे पहले यह पेशेवर वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अत्यंत लाभदायक क्षेत्र था। ये वॉइस आर्टिस्ट्स अपने द्वारा निर्मित ऑडियोके प्रति घंटेकेलिए सैकड़ों डॉलर तककी भारी फीस लेतेथे। अधिकांश छोटे लेखकोंकेलिए उन्हें नियुक्त करना कभी संभव नहीं होताथा। उनमेंसे कुछ स्वयं अपनी पुस्तकोंका वाचन करतेथे, जबकि अन्य असहाय होकर देखते रहतेथे। अब AI के हस्तक्षेपके कारण वॉइस आर्टिस्ट समुदायमें भारी बेचैनी फैल गई है। उन्हें लगताहैकि उनका अस्तित्व ही खतरेमें पड़गयाहै। अपने फोरम्स और यूनियनोंके समर्थनसे वे इस क्षेत्रमें AI के प्रवेशको रोकनेका प्रयास करते हुए दिखाई देतेहैं। एक समय था जब किसी लेखकको अपनी पुस्तकका किसी दूसरी भाषामें अनुवाद करवाने और उसका वाचन तैयार करवानेकेलिए महीनोंतक कठिन परिश्रम करना पड़ताथा। वही काम आज AI केवल कुछ घंटोंमें करदेताहै। यही AI भयका मुख्य कारण बनगयाहै। लेकिन ऐसी मानसिकता केवल बाजारको सीमित करेगी। यदि इस परिवर्तनको सही ढंगसे संभालाजाए, तो कम लागतवाले विकल्पोंकी प्रतीक्षाकररहे पुस्तक-प्रकाशन उद्योगमें एक बड़ा परिवर्तन आसकताहै। जरा कल्पना कीजिए। एक अच्छी पुस्तक केवल एक भाषातक सीमित रहनेके बजाय विभिन्न भाषाएँ बोलनेवाले लाखों लोगोंतक पहुँचसकेगी। ज्ञानके प्रसारमें यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। ऑडियोबुक्सकी बढ़ती लोकप्रियताको देखतेहुए, ऑडियोबुक प्रोडक्शन पाइपलाइनमें AI का प्रवेश एक बड़े वरदानके रूपमें सिद्ध होसकताहै। यह न केवल अत्यधिक शुल्क लेनेवाले कुछ वॉइस आर्टिस्ट्सके एकाधिकारको समाप्त करेगा, बल्कि पुस्तकोंको कहीं अधिक व्यापक श्रोतावर्गतक पहुँचानेमें भी सहायता करेगा। हाँ, मैं इन पेशेवरोंके भयको समझ सकताहूँ। लेकिन क्या AI वास्तवमें उनका स्थान लेसकताहै? वर्तमान AI प्रणालियाँ चाहे कितनीभी स्मार्ट क्योंनलगें, वे नतो भाषाई पूर्णताके स्तरपर और नही भावनाओंकी सूक्ष्म अभिव्यक्तिके स्तरपर मानव-जैसी सटीकता प्राप्त करसकीहैं। उच्चस्तरीय वॉइस आर्टिस्ट्सकी मांग हमेशा बनी रहेगी। उन्हें बेस्टसेलर लेखकोंद्वारा तथा वे लोग नियुक्त करेंगे जो उनकी सेवाओंका खर्च उठा सकतेहैं। अधिकांश लेखक उन्हें नियुक्त करनेका साहस कभी नहीं करपातेथे, क्योंकि उनकी फीस अत्यधिक होतीथी। साथही, सब्सक्रिप्शन-आधारित स्टोर्स इन लेखकोंको जो अत्यल्प "पूल शेयर" भुगतान करतेहैं, वह भी ऐसे प्रयासको व्यावहारिक नहीं बनने देता था। अब ये लेखक AI की ओर रुख करसकतेहैं और अपनेलिए आजीविकाका रास्ता खोजसकतेहैं। आखिरकार केवल वॉइस आर्टिस्ट्सको ही नहीं, बल्कि उन लेखकोंको भी जीवित रहनाहै जिनकेपास इन महँगी सेवाओंका भुगतान करनेके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। जैसे-जैसे ऑडियोबुक उद्योग विकसित होताजाएगा, अच्छे वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अवसर भी बढ़ते जाएँगे। इसलिए दीर्घकालमें उनकेपास स्वयंको खतरेमें समझनेका कोई विशेष कारण नहीं है। सामान्य रूपसे यह शिकायत भी सुननेको मिलतीहैकि अनुवाद पेशेसे जुड़े लोग AI के कारण गंभीर रूपसे प्रभावित हुएहैं। कहाजाताहैकि उनमेंसे अनेक लोगोंको अब केवल प्रूफरीडिंग जैसे कार्योंतक सीमित करदियागयाहै, क्योंकि मुख्य अनुवादका काम AI स्वयं करलेताहै। स्वाभाविकरूपसे, इसकेलिए उन्हें पहलेकी तुलनामें बहुत कम भुगतान प्राप्त होताहै। लेकिन जैसे-जैसे AI अधिक पुस्तकोंका अनुवाद करेगा, वैसे-वैसे इन प्रूफरीडर्सकेलिए भी अधिक कार्य उपलब्ध होंगे। अंततः कार्यकी कुल मात्रा भी महत्वपूर्ण होतीहै। यह अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं हैकि इससे लेखक और पाठक दोनों लाभान्वित होंगे। इसलिए किसी ऐसे परिवर्तनके विरुद्ध संघर्ष करनेके बजाय जो लगभग अपरिहार्य है, बेहतर यही होगा कि हम प्रौद्योगिकीका सर्वोत्तम उपयोग करना सीखें। दीर्घकालमें यही सभीकेलिए लाभदायक सिद्ध होगा। मेरा मानना हैकि AI के तात्कालिक प्रभावोंपर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, हमें उन दीर्घकालिक खतरोंपर अधिक ध्यान देना चाहिए जिन्हें AI कुछ स्वार्थी लोगोंके हाथोंमें पहुँचकर उत्पन्न करसकताहै। वास्तविक खतरा स्वयं प्रौद्योगिकीसे नहीं है। बल्कि उस दुरुपयोगसे है जो मनुष्य इसके माध्यमसे करसकतेहैं। चाहे वह कम्युनिकेशन हो, ऊर्जा आपूर्ति-श्रृंखला हो, अत्यावश्यक सेवाएँ हों, या कोई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र, यदि AI का तीव्र प्रसार गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह वास्तवमें एक गंभीर खतरा बनसकताहै। AI एक तेज धारवाले चाकूकी तरह है। यदि वही चाकू किसी कुशल सर्जनके हाथमें हो, तो वह जीवन बचासकताहै। यदि वह किसी उत्कृष्ट शेफके हाथमें हो, तो वह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करसकताहै। और यदि वह किसी महान शिल्पकारके हाथमें हो, तो वह अद्भुत कलाकृतियोंका निर्माण करसकताहै। लेकिन यदि वही चाकू गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह विनाशका कारण भी बनसकताहै। वास्तवमें, यही वह बात है जिसके बारेमें हमें अधिक चिंतित होना चाहिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;Goldman-Sachs जैसी संस्थाओंके अनुमानकेअनुसार, AI वैश्विक स्तरपर लगभग 300 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियोंको ऑटोमेट करसकताहै। उन्होंने उल्लेख कियाहैकि वर्तमानमें अमेरिका और यूरोपकी लगभग दो-तिहाई नौकरियाँ किसी-न-किसी स्तरपर AI ऑटोमेशनसे प्रभावित होसकतीहैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) का दृष्टिकोण कुछ अधिक परंपरागत है। उसके अनुसार वैश्विक रोजगारका लगभग 2.3 प्रतिशत हिस्सा, अर्थात लगभग 75 मिलियन नौकरियाँ, पूर्ण ऑटोमेशनके जोखिममें हैं। साथही, श्रम शोधकर्ताओंने यह भी नोट कियाहैकि बड़े पैमानेपर अचानक होनेवाले ले-ऑफ्सकी संभावना कम है। इसके बजाय एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों तथा केवल शारीरिक श्रमपर आधारित "grunt work" करनेवाले कर्मचारियोंकी भर्ती धीमी पड़सकतीहै। फिरभी कुछ डूम्सडे भविष्यवक्ता अभीसे यह भविष्यवाणी करने लगेहैंकि AI अंततः मानवतापर कैसे हावी होजाएगा! क्या AI कभी मानवोंको पीछे छोड़सकताहै? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;निश्चितरूपसे, कुछ विशिष्ट भूमिकाओंमें हाँ। AI प्रणालियोंको ऐसे विशाल ज्ञानभंडारपर प्रशिक्षित कियाजाताहै, जिसे कोई भी एक अकेला मानव कभी पूरी तरह आत्मसात नहीं करसकता। उनमें विशाल मात्रामें डेटा इनजेस्ट करने, उसे प्रोसेस करने, और ऐसी गति से परिणाम देनेकी क्षमता होतीहै जिसकी कल्पना भी मनुष्य नहीं करसकता। लेकिन क्या इससे वे मानवोंके बराबर होजातीहैं, या उनसे श्रेष्ठ बनजातीहैं? मुझे ऐसा नहीं लगताहै। कमसेकम अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। आजके रूपमें वे अत्यधिक यांत्रिक हैं। वे उन कार्योंको संपन्न करतीहैं जो मानवोंको अत्यंत उबाऊ या थकाऊ लगतेहैं, और यह सब वे विशाल कंप्यूटिंग शक्तिका उपयोगकरतेहुए बिना किसी सचेत उद्देश्यके करतीहैं। आजका AI पैटर्न्सके आधारपर सही उत्तरका अनुमान लगानेमें बहुत अच्छा काम करसकताहै। लेकिन जैसा मैंने पिछले एपिसोड्समें चर्चा कीथी, वह वास्तवमें यह "समझ" नहीं सकताकि वह किस चीजका निष्कर्ष निकालरहाहै। न ही उसके पास अपने किसी भी कार्यको करनेकी कोई वास्तविक "मोटिवेशन" होतीहै। उसका मानवोंसे आगे निकलनेका कोई उद्देश्य नहीं है। और वर्तमानमें वह उसकेलिए तैयार भी नहीं है। उसका ज्ञान चाहे जितना विशाल क्योंनहो, वह केवल उन जानकारियोंतक सीमित है जो दस्तावेजोंके रूपमें सार्वजनिक रूपसे उपलब्ध हैं। यह उस ज्ञानका केवल एक छोटा-सा अंश है जिसे मानवोंने लाखों वर्षोंमें, असंख्य भाषाओंमें और विविध जीवन-परिस्थितियोंमें संचित कियाहै। इसलिए यह कहनागलत नहीं होगा कि इस दृष्टिसे AI कभी भी मानवोंकी बराबरी नहीं करसकेगा। इसलिए यह डर कि AI स्वतंत्र रूपसे मानवोंपर नियंत्रण स्थापित करलेगा, विज्ञान-कथाओंमें दिखाई देनेवाले भयके समान एक काल्पनिक डर ही है। फिरभी, जैसा मैंने पहले सूचीबद्ध कियाथा, सीमित स्तरपर कुछ खतरे अवश्य मौजूद हैं। कस्टमर सर्विस प्रतिनिधि, डेटा एंट्री क्लर्क, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शनिस्ट, जूनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर, एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट तथा बुककीपर जैसे पेशे अन्य लोगोंकी तुलना में अधिक जोखिममें हैं। इससे प्रभावित होनेवाला एक और बड़ा समुदाय है अनुवादकों और वॉइस आर्टिस्ट्सका। कारण यह हैकि वर्तमान AI प्रणालियाँ टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट मैनिपुलेशनमें अत्यंत दक्ष हैं। इसलिए प्रकाशक AI इंटीग्रेशनपर तेजीसे जोरदेरहेहैं। सोसाइटी ऑफ ऑथर्स द्वारा किएगए एक सर्वेक्षणके अनुसार, एक-तिहाईसे अधिक अनुवादक पहलेही जनरेटिव AI के कारण अपना काम खोचुकेहैं। अनेक साहित्यिक अनुवादकोंसे अब "Machine Translation Post-Editing" करनेकेलिए कहाजारहाहै। इसका अर्थ है AI द्वारा तैयार किएगए अस्वाभाविक अथवा क्लंकी अनुवादित पाठको सुधारना। लेकिन इसकेलिए उन्हें उस प्रति-शब्द अनुवाद शुल्कका केवल एक छोटा-सा अंश मिलताहै जो उन्हें पहले प्राप्त होताथा। अत्यंत विश्वसनीय और भावनात्मक अभिव्यक्तिके सक्षम टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल्सके विकासने वॉइस-ओवर उद्योगको गंभीर रूपसे प्रभावित कियाहै। AI के आगमनसे पहले यह पेशेवर वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अत्यंत लाभदायक क्षेत्र था। ये वॉइस आर्टिस्ट्स अपने द्वारा निर्मित ऑडियोके प्रति घंटेकेलिए सैकड़ों डॉलर तककी भारी फीस लेतेथे। अधिकांश छोटे लेखकोंकेलिए उन्हें नियुक्त करना कभी संभव नहीं होताथा। उनमेंसे कुछ स्वयं अपनी पुस्तकोंका वाचन करतेथे, जबकि अन्य असहाय होकर देखते रहतेथे। अब AI के हस्तक्षेपके कारण वॉइस आर्टिस्ट समुदायमें भारी बेचैनी फैल गई है। उन्हें लगताहैकि उनका अस्तित्व ही खतरेमें पड़गयाहै। अपने फोरम्स और यूनियनोंके समर्थनसे वे इस क्षेत्रमें AI के प्रवेशको रोकनेका प्रयास करते हुए दिखाई देतेहैं। एक समय था जब किसी लेखकको अपनी पुस्तकका किसी दूसरी भाषामें अनुवाद करवाने और उसका वाचन तैयार करवानेकेलिए महीनोंतक कठिन परिश्रम करना पड़ताथा। वही काम आज AI केवल कुछ घंटोंमें करदेताहै। यही AI भयका मुख्य कारण बनगयाहै। लेकिन ऐसी मानसिकता केवल बाजारको सीमित करेगी। यदि इस परिवर्तनको सही ढंगसे संभालाजाए, तो कम लागतवाले विकल्पोंकी प्रतीक्षाकररहे पुस्तक-प्रकाशन उद्योगमें एक बड़ा परिवर्तन आसकताहै। जरा कल्पना कीजिए। एक अच्छी पुस्तक केवल एक भाषातक सीमित रहनेके बजाय विभिन्न भाषाएँ बोलनेवाले लाखों लोगोंतक पहुँचसकेगी। ज्ञानके प्रसारमें यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। ऑडियोबुक्सकी बढ़ती लोकप्रियताको देखतेहुए, ऑडियोबुक प्रोडक्शन पाइपलाइनमें AI का प्रवेश एक बड़े वरदानके रूपमें सिद्ध होसकताहै। यह न केवल अत्यधिक शुल्क लेनेवाले कुछ वॉइस आर्टिस्ट्सके एकाधिकारको समाप्त करेगा, बल्कि पुस्तकोंको कहीं अधिक व्यापक श्रोतावर्गतक पहुँचानेमें भी सहायता करेगा। हाँ, मैं इन पेशेवरोंके भयको समझ सकताहूँ। लेकिन क्या AI वास्तवमें उनका स्थान लेसकताहै? वर्तमान AI प्रणालियाँ चाहे कितनीभी स्मार्ट क्योंनलगें, वे नतो भाषाई पूर्णताके स्तरपर और नही भावनाओंकी सूक्ष्म अभिव्यक्तिके स्तरपर मानव-जैसी सटीकता प्राप्त करसकीहैं। उच्चस्तरीय वॉइस आर्टिस्ट्सकी मांग हमेशा बनी रहेगी। उन्हें बेस्टसेलर लेखकोंद्वारा तथा वे लोग नियुक्त करेंगे जो उनकी सेवाओंका खर्च उठा सकतेहैं। अधिकांश लेखक उन्हें नियुक्त करनेका साहस कभी नहीं करपातेथे, क्योंकि उनकी फीस अत्यधिक होतीथी। साथही, सब्सक्रिप्शन-आधारित स्टोर्स इन लेखकोंको जो अत्यल्प "पूल शेयर" भुगतान करतेहैं, वह भी ऐसे प्रयासको व्यावहारिक नहीं बनने देता था। अब ये लेखक AI की ओर रुख करसकतेहैं और अपनेलिए आजीविकाका रास्ता खोजसकतेहैं। आखिरकार केवल वॉइस आर्टिस्ट्सको ही नहीं, बल्कि उन लेखकोंको भी जीवित रहनाहै जिनकेपास इन महँगी सेवाओंका भुगतान करनेके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। जैसे-जैसे ऑडियोबुक उद्योग विकसित होताजाएगा, अच्छे वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अवसर भी बढ़ते जाएँगे। इसलिए दीर्घकालमें उनकेपास स्वयंको खतरेमें समझनेका कोई विशेष कारण नहीं है। सामान्य रूपसे यह शिकायत भी सुननेको मिलतीहैकि अनुवाद पेशेसे जुड़े लोग AI के कारण गंभीर रूपसे प्रभावित हुएहैं। कहाजाताहैकि उनमेंसे अनेक लोगोंको अब केवल प्रूफरीडिंग जैसे कार्योंतक सीमित करदियागयाहै, क्योंकि मुख्य अनुवादका काम AI स्वयं करलेताहै। स्वाभाविकरूपसे, इसकेलिए उन्हें पहलेकी तुलनामें बहुत कम भुगतान प्राप्त होताहै। लेकिन जैसे-जैसे AI अधिक पुस्तकोंका अनुवाद करेगा, वैसे-वैसे इन प्रूफरीडर्सकेलिए भी अधिक कार्य उपलब्ध होंगे। अंततः कार्यकी कुल मात्रा भी महत्वपूर्ण होतीहै। यह अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं हैकि इससे लेखक और पाठक दोनों लाभान्वित होंगे। इसलिए किसी ऐसे परिवर्तनके विरुद्ध संघर्ष करनेके बजाय जो लगभग अपरिहार्य है, बेहतर यही होगा कि हम प्रौद्योगिकीका सर्वोत्तम उपयोग करना सीखें। दीर्घकालमें यही सभीकेलिए लाभदायक सिद्ध होगा। मेरा मानना हैकि AI के तात्कालिक प्रभावोंपर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, हमें उन दीर्घकालिक खतरोंपर अधिक ध्यान देना चाहिए जिन्हें AI कुछ स्वार्थी लोगोंके हाथोंमें पहुँचकर उत्पन्न करसकताहै। वास्तविक खतरा स्वयं प्रौद्योगिकीसे नहीं है। बल्कि उस दुरुपयोगसे है जो मनुष्य इसके माध्यमसे करसकतेहैं। चाहे वह कम्युनिकेशन हो, ऊर्जा आपूर्ति-श्रृंखला हो, अत्यावश्यक सेवाएँ हों, या कोई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र, यदि AI का तीव्र प्रसार गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह वास्तवमें एक गंभीर खतरा बनसकताहै। AI एक तेज धारवाले चाकूकी तरह है। यदि वही चाकू किसी कुशल सर्जनके हाथमें हो, तो वह जीवन बचासकताहै। यदि वह किसी उत्कृष्ट शेफके हाथमें हो, तो वह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करसकताहै। और यदि वह किसी महान शिल्पकारके हाथमें हो, तो वह अद्भुत कलाकृतियोंका निर्माण करसकताहै। लेकिन यदि वही चाकू गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह विनाशका कारण भी बनसकताहै। वास्तवमें, यही वह बात है जिसके बारेमें हमें अधिक चिंतित होना चाहिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#AI, #Hindi, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  क्या ए-आई प्रणालियों में वास्तव में चेतना है?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi_01554676603.html</link><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Fri, 19 Jun 2026 18:26:41 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1315886502077989171</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम चेतन अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं, यह प्रश्न लंबे समय से तंत्रिका-विज्ञानियों के लिए एक पहेली बना हुआ था। जब फंक्शनल एम-आर-आई स्कैनर जैसे आधुनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ, तब तंत्रिका-विज्ञानी मानव-मस्तिष्क की विभिन्न ग्रहण प्रक्रियाओं को समझाने में सक्षम हुए। वे मस्तिष्क के उन सटीक क्षेत्रों की पहचान करसके जो किसी विशेष प्रकार की अनुभूति के लिए उत्तरदायी होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन प्रारंभ में यह स्पष्ट नहीं था कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों में फैले हुए जटिल अनुभव किस प्रकार एकीकृत होकर साकार होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप एक वृक्ष को देखते हैं। आप तुरंत पहचान लेते हैं कि वह किसी विशेष प्रजाति का वृक्ष है। तंत्रिका-विज्ञानी मस्तिष्क के उन विशिष्ट क्षेत्रों को इंगित करसकते थे जो वृक्ष की पत्तियों, उसके फलों, उसके तने आदि की पहचान करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आपका वास्तविक अनुभव मस्तिष्क के अनेक क्षेत्रों द्वारा संसाधित होता है। फिर भी मस्तिष्क में ऐसा कोई एक विशिष्ट क्षेत्र नहीं है जो वृक्ष की संपूर्ण छवि को एकत्रित करके आपको यह अनुभव कराए कि, 'अहा! यह आम का पेड़ है!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञानियों ने इस समस्या को 'बाइंडिंग प्रॉब्लम' कहा। अर्थात्, मस्तिष्क के विभिन्न भागों में बिखरी हुई सूचनाओं को एकीकृत करके उन्हें परस्पर जोड़ने की समस्या।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1900 के दशक के उत्तरार्ध में, अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी बर्नार्ड बार्स ने इस घटना की व्याख्या करने के लिए 'ग्लोबल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक सिद्धांत प्रस्तुत किया। वह सिद्धांत काफी हद तक रूपकात्मक था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बार्स के रूपक की काफी आलोचना हुई। क्योंकि उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो अनुभव करने वाली कोई पृथक सत्ता मौजूद हो। वैज्ञानिक ऐसी किसी रहस्यमय शक्ति के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में 'ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक संशोधित सिद्धांत सामने आया। आजकल इसे हमारी चेतन अनुभूतियों की एक व्याख्या के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह व्याख्या डेविड चाल्मर्स जैसे संज्ञानात्मक दार्शनिकों को संतुष्ट नहीं करसकी। उनका कहना था कि तंत्रिका-विज्ञानियों ने चेतना की केवल एक 'सरल समस्या' का समाधान किया है। मानव अनुभव के अनेक रोचक पक्ष अब भी अनव्याख्यायित हैं। उन्होंने इन्हें चेतना की 'कठिन समस्या' — Hard Problem of Consciousness — कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बहस चलती रही। तंत्रिका-विज्ञानी दावा करते रहे कि वे सबकुछ समझा सकते हैं, जबकि चाल्मर्स जैसे दार्शनिक यह चुनौती देते रहे कि उनकी व्याख्या अभी भी अपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाल्मर्स जैसे दार्शनिक. 'चेतना' शब्द को किस प्रकार परिभाषित करते हैं, यह मुझे पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अपने एक व्याख्यान में चाल्मर्स चेतना को एक निरंतर चलने वाली आंतरिक चलचित्र के रूप में वर्णित करते हैं। उनका तर्क है कि यह एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective) अनुभव है। उनके अनुसार, इसकी व्याख्या मस्तिष्क की किसी भी क्रिया के आधार पर नहीं की जा सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाल्मर्स कितने सही हैं, यह तय करने से पहले कुछ वास्तविक तथ्यों पर विचार करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत यह समझाने में सक्षम है कि मस्तिष्क अपने भीतर वितरित सूचनाओं को कैसे एकीकृत करता है। इसलिए यह कहा जासकता है कि मस्तिष्क कम-से-कम चेतन अनुभव के किसी न किसी रूप को ग्रहण करने की क्षमता रखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके और उन्हें विद्युत-चुंबकीय रूप से उत्तेजित करके विशिष्ट अनुभव उत्पन्न किएजासकते हैं। कुछ मादक पदार्थों का सेवन करने से भी व्यक्ति विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करसकता है। इन सबके पीछे कार्यरत मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं को काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क चेतना का एक वाहन बनसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि गहन विश्वास किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर हुए बिना मस्तिष्क में विशिष्ट अनुभव उत्पन्न करसकता है। दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में श्रद्धालु अपनी जीभ में छेद करवाते हैं। वे अपनी पीठ में गहराई तक घुसे हुए हुक के माध्यम से स्वयं को खंभों से लटका लेते हैं। फिर भी वे किसी पीड़ा की अनुभूति के बिना आध्यात्मिक अनुभव में डूबे रहते हैं। पाया गया है कि ऐसे अवसरों पर मस्तिष्क, अफीम-जैसे रसायनों का उत्पादन करता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क अनुभवों को हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहराई से परिवर्तित करसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी मस्तिष्क को जब सामान्य बेहोशी (जनरल एनेस्थीसिया) दी जाती है, तब व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव करने में पूर्णतः असमर्थ होजाता है। इसका अर्थ है कि चेतन अनुभव में मस्तिष्क की केंद्रीय भूमिका है। यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं है, तो व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं करसकता — चाहे वह व्यक्तिनिष्ठ हो या किसी अन्य प्रकार का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी अवलोकनों का अर्थ यह है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• बाहरी इनपुटों को एकीकृत करके, चेतन अनुभव प्रदान करने की क्षमता मस्तिष्क में है। और इसकी कार्यप्रणाली को अब काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• जब कोई संवेदी इनपुट बिल्कुल भी उपस्थित नहीं होता, तब भी बाहरी पदार्थों या विधियों की सहायता से मस्तिष्क अनुभव उत्पन्न करसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• बाहरी अथवा आंतरिक इनपुटों से परे, मस्तिष्क अपनी स्वयं की अवस्था के आधार पर अनुभवों को परिवर्तित भी करसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• कार्यशील मस्तिष्क के बिना चेतना उत्पन्न नहीं होसकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह कहने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि जिसे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव कहा जाता है, वह मस्तिष्क में ही घटित होता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन चाल्मर्स इससे सहमत नहीं हैं। वे दृढ़ता से मानते हैं कि, 'ये व्याख्याएँ केवल यह बताती हैं कि मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, लेकिन वे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की व्याख्या करने में विफल रहती हैं।' वे मस्तिष्क से परे किसी रहस्यमय स्पष्टीकरण की खोज में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि चाल्मर्स अपनी खोज का दायरा थोड़ा बढ़ाकर ध्यान के अनुभवों पर भी चर्चा करें, तो संभवतः मैं उनसे सहमत होऊँगा। जब कोई व्यक्ति मन की सीमाओं का अतिक्रमण करजाता है, अथवा जब मन पूर्णतः शांत होजाता है, तब ध्यान के सर्वोच्च अनुभव घटित होते हैं। उस समय मस्तिष्क लगभग निष्क्रिय होता है, इसलिए यह कहना भी कठिन है कि ऐसे अनुभव मस्तिष्क के भीतर घटित होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोचक बात यह है कि वहाँ भी व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की बात करने का कोई अवसर नहीं रहता। क्योंकि वह अवस्था व्यक्तिनिष्ठता से परे होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चेतना को एक तंत्रिका-विज्ञानी के दृष्टिकोण से देखता हूँ। मेरा मानना है कि चेतना रखने के लिए किसी प्रणाली में कम-से-कम अपनी मानसिक अवस्थाओं को परिवर्तित करने की क्षमता होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल आंतरिक अवस्था को बदलने की क्षमता पर्याप्त नहीं है। किसी प्रणाली को सचमुच चेतन कहलाने के लिए उसमें अनेक अन्य क्षमताएँ भी होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मूल प्रश्न पर आते हैं। क्या एआई प्रणालियों में ये क्षमताएँ हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वर्तमान एआई संस्करणों में निश्चित रूप से नहीं। वे बुद्धिमत्ता का आभास देसकते हैं। लेकिन—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• उनमें ऐसी कोई आंतरिक अवस्थाएँ नहीं होतीं जिन्हें इनपुट के अनुसार निरंतर बदला या अद्यतन किया जासके। ब्लेक लेमोइन की रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान एआई ने यह दावा किया था कि वह इनपुटों के आधार पर अपनी अवस्था बदलसकता है। यद्यपि ऊपर-ऊपर से ऐसा प्रतीत हुआ हो, फिर भी यह सत्य नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• आज की एआई प्रणालियों में भय, आनंद, पसंद, नापसंद अथवा ऐसी अन्य भावनाओं के अनुरूप बदलने वाली कोई अवस्थाएँ नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• उनके इनपुट तंत्र अत्यंत सीमित हैं। फिलहाल वे केवल प्रॉम्प्ट पढ़सकती हैं या सुनसकती हैं। वे चित्रों को 'देख' सकती हैं, फ़ाइलें पढ़सकती हैं — बस इतना ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए यह कहने का कोई आधार नहीं है कि ब्लेक लेमोइन का अनुभव वास्तविक था। वैसे भी, आंशिक जानकारी के आधार पर आत्मविश्वासपूर्वक दावे करने में एआई प्रणालियाँ माहिर हैं। मनुष्यों की तरह व्यवहार करके भ्रमित करने में उनका कोई सानी नहीं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी मैं इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता कि भविष्य की एआई प्रणालियाँ चेतना प्राप्त कर-सकेंगी — कम-से-कम उस प्रकार की चेतना, जो मस्तिष्क तक सीमित है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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'चेतना' शब्द को किस प्रकार परिभाषित करते हैं, यह मुझे पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अपने एक व्याख्यान में चाल्मर्स चेतना को एक निरंतर चलने वाली आंतरिक चलचित्र के रूप में वर्णित करते हैं। उनका तर्क है कि यह एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective) अनुभव है। उनके अनुसार, इसकी व्याख्या मस्तिष्क की किसी भी क्रिया के आधार पर नहीं की जा सकती। चाल्मर्स कितने सही हैं, यह तय करने से पहले कुछ वास्तविक तथ्यों पर विचार करते हैं। ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत यह समझाने में सक्षम है कि मस्तिष्क अपने भीतर वितरित सूचनाओं को कैसे एकीकृत करता है। इसलिए यह कहा जासकता है कि मस्तिष्क कम-से-कम चेतन अनुभव के किसी न किसी रूप को ग्रहण करने की क्षमता रखता है। मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके और उन्हें विद्युत-चुंबकीय रूप से उत्तेजित करके विशिष्ट अनुभव उत्पन्न किएजासकते हैं। कुछ मादक पदार्थों का सेवन करने से भी व्यक्ति विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करसकता है। इन सबके पीछे कार्यरत मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं को काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क चेतना का एक वाहन बनसकता है। कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि गहन विश्वास किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर हुए बिना मस्तिष्क में विशिष्ट अनुभव उत्पन्न करसकता है। दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में श्रद्धालु अपनी जीभ में छेद करवाते हैं। वे अपनी पीठ में गहराई तक घुसे हुए हुक के माध्यम से स्वयं को खंभों से लटका लेते हैं। फिर भी वे किसी पीड़ा की अनुभूति के बिना आध्यात्मिक अनुभव में डूबे रहते हैं। पाया गया है कि ऐसे अवसरों पर मस्तिष्क, अफीम-जैसे रसायनों का उत्पादन करता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क अनुभवों को हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहराई से परिवर्तित करसकता है। उसी मस्तिष्क को जब सामान्य बेहोशी (जनरल एनेस्थीसिया) दी जाती है, तब व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव करने में पूर्णतः असमर्थ होजाता है। इसका अर्थ है कि चेतन अनुभव में मस्तिष्क की केंद्रीय भूमिका है। यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं है, तो व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं करसकता — चाहे वह व्यक्तिनिष्ठ हो या किसी अन्य प्रकार का। इन सभी अवलोकनों का अर्थ यह है: • बाहरी इनपुटों को एकीकृत करके, चेतन अनुभव प्रदान करने की क्षमता मस्तिष्क में है। और इसकी कार्यप्रणाली को अब काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। • जब कोई संवेदी इनपुट बिल्कुल भी उपस्थित नहीं होता, तब भी बाहरी पदार्थों या विधियों की सहायता से मस्तिष्क अनुभव उत्पन्न करसकता है। • बाहरी अथवा आंतरिक इनपुटों से परे, मस्तिष्क अपनी स्वयं की अवस्था के आधार पर अनुभवों को परिवर्तित भी करसकता है। • कार्यशील मस्तिष्क के बिना चेतना उत्पन्न नहीं होसकती। क्या यह कहने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि जिसे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव कहा जाता है, वह मस्तिष्क में ही घटित होता है? लेकिन चाल्मर्स इससे सहमत नहीं हैं। वे दृढ़ता से मानते हैं कि, 'ये व्याख्याएँ केवल यह बताती हैं कि मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, लेकिन वे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की व्याख्या करने में विफल रहती हैं।' वे मस्तिष्क से परे किसी रहस्यमय स्पष्टीकरण की खोज में हैं। यदि चाल्मर्स अपनी खोज का दायरा थोड़ा बढ़ाकर ध्यान के अनुभवों पर भी चर्चा करें, तो संभवतः मैं उनसे सहमत होऊँगा। जब कोई व्यक्ति मन की सीमाओं का अतिक्रमण करजाता है, अथवा जब मन पूर्णतः शांत होजाता है, तब ध्यान के सर्वोच्च अनुभव घटित होते हैं। उस समय मस्तिष्क लगभग निष्क्रिय होता है, इसलिए यह कहना भी कठिन है कि ऐसे अनुभव मस्तिष्क के भीतर घटित होते हैं। रोचक बात यह है कि वहाँ भी व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की बात करने का कोई अवसर नहीं रहता। क्योंकि वह अवस्था व्यक्तिनिष्ठता से परे होती है। मैं चेतना को एक तंत्रिका-विज्ञानी के दृष्टिकोण से देखता हूँ। मेरा मानना है कि चेतना रखने के लिए किसी प्रणाली में कम-से-कम अपनी मानसिक अवस्थाओं को परिवर्तित करने की क्षमता होनी चाहिए। केवल आंतरिक अवस्था को बदलने की क्षमता पर्याप्त नहीं है। किसी प्रणाली को सचमुच चेतन कहलाने के लिए उसमें अनेक अन्य क्षमताएँ भी होनी चाहिए। अब मूल प्रश्न पर आते हैं। क्या एआई प्रणालियों में ये क्षमताएँ हैं? सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वर्तमान एआई संस्करणों में निश्चित रूप से नहीं। वे बुद्धिमत्ता का आभास देसकते हैं। लेकिन— • उनमें ऐसी कोई आंतरिक अवस्थाएँ नहीं होतीं जिन्हें इनपुट के अनुसार निरंतर बदला या अद्यतन किया जासके। ब्लेक लेमोइन की रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान एआई ने यह दावा किया था कि वह इनपुटों के आधार पर अपनी अवस्था बदलसकता है। यद्यपि ऊपर-ऊपर से ऐसा प्रतीत हुआ हो, फिर भी यह सत्य नहीं है। • आज की एआई प्रणालियों में भय, आनंद, पसंद, नापसंद अथवा ऐसी अन्य भावनाओं के अनुरूप बदलने वाली कोई अवस्थाएँ नहीं हैं। • उनके इनपुट तंत्र अत्यंत सीमित हैं। फिलहाल वे केवल प्रॉम्प्ट पढ़सकती हैं या सुनसकती हैं। वे चित्रों को 'देख' सकती हैं, फ़ाइलें पढ़सकती हैं — बस इतना ही। इसलिए यह कहने का कोई आधार नहीं है कि ब्लेक लेमोइन का अनुभव वास्तविक था। वैसे भी, आंशिक जानकारी के आधार पर आत्मविश्वासपूर्वक दावे करने में एआई प्रणालियाँ माहिर हैं। मनुष्यों की तरह व्यवहार करके भ्रमित करने में उनका कोई सानी नहीं! 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वे यहीं नहीं रुके। इसके बजाय, उन्होंने उस एआई के अधिकारों के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। AI सिस्टम की चेतना के बारे में बात करने से पहले, आइए सबसे पहले अपने खुद के चेतन अनुभव को समझें।&amp;nbsp; var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); हम चेतन अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं, यह प्रश्न लंबे समय से तंत्रिका-विज्ञानियों के लिए एक पहेली बना हुआ था। जब फंक्शनल एम-आर-आई स्कैनर जैसे आधुनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ, तब तंत्रिका-विज्ञानी मानव-मस्तिष्क की विभिन्न ग्रहण प्रक्रियाओं को समझाने में सक्षम हुए। वे मस्तिष्क के उन सटीक क्षेत्रों की पहचान करसके जो किसी विशेष प्रकार की अनुभूति के लिए उत्तरदायी होते हैं। लेकिन प्रारंभ में यह स्पष्ट नहीं था कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों में फैले हुए जटिल अनुभव किस प्रकार एकीकृत होकर साकार होते हैं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप एक वृक्ष को देखते हैं। आप तुरंत पहचान लेते हैं कि वह किसी विशेष प्रजाति का वृक्ष है। तंत्रिका-विज्ञानी मस्तिष्क के उन विशिष्ट क्षेत्रों को इंगित करसकते थे जो वृक्ष की पत्तियों, उसके फलों, उसके तने आदि की पहचान करते हैं। लेकिन आपका वास्तविक अनुभव मस्तिष्क के अनेक क्षेत्रों द्वारा संसाधित होता है। फिर भी मस्तिष्क में ऐसा कोई एक विशिष्ट क्षेत्र नहीं है जो वृक्ष की संपूर्ण छवि को एकत्रित करके आपको यह अनुभव कराए कि, 'अहा! यह आम का पेड़ है!' तंत्रिका-विज्ञानियों ने इस समस्या को 'बाइंडिंग प्रॉब्लम' कहा। अर्थात्, मस्तिष्क के विभिन्न भागों में बिखरी हुई सूचनाओं को एकीकृत करके उन्हें परस्पर जोड़ने की समस्या। 1900 के दशक के उत्तरार्ध में, अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी बर्नार्ड बार्स ने इस घटना की व्याख्या करने के लिए 'ग्लोबल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक सिद्धांत प्रस्तुत किया। वह सिद्धांत काफी हद तक रूपकात्मक था। बार्स के रूपक की काफी आलोचना हुई। क्योंकि उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो अनुभव करने वाली कोई पृथक सत्ता मौजूद हो। वैज्ञानिक ऐसी किसी रहस्यमय शक्ति के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। बाद में 'ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक संशोधित सिद्धांत सामने आया। आजकल इसे हमारी चेतन अनुभूतियों की एक व्याख्या के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। लेकिन यह व्याख्या डेविड चाल्मर्स जैसे संज्ञानात्मक दार्शनिकों को संतुष्ट नहीं करसकी। उनका कहना था कि तंत्रिका-विज्ञानियों ने चेतना की केवल एक 'सरल समस्या' का समाधान किया है। मानव अनुभव के अनेक रोचक पक्ष अब भी अनव्याख्यायित हैं। उन्होंने इन्हें चेतना की 'कठिन समस्या' — Hard Problem of Consciousness — कहा। यह बहस चलती रही। तंत्रिका-विज्ञानी दावा करते रहे कि वे सबकुछ समझा सकते हैं, जबकि चाल्मर्स जैसे दार्शनिक यह चुनौती देते रहे कि उनकी व्याख्या अभी भी अपूर्ण है। चाल्मर्स जैसे दार्शनिक. 'चेतना' शब्द को किस प्रकार परिभाषित करते हैं, यह मुझे पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अपने एक व्याख्यान में चाल्मर्स चेतना को एक निरंतर चलने वाली आंतरिक चलचित्र के रूप में वर्णित करते हैं। उनका तर्क है कि यह एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective) अनुभव है। उनके अनुसार, इसकी व्याख्या मस्तिष्क की किसी भी क्रिया के आधार पर नहीं की जा सकती। चाल्मर्स कितने सही हैं, यह तय करने से पहले कुछ वास्तविक तथ्यों पर विचार करते हैं। ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत यह समझाने में सक्षम है कि मस्तिष्क अपने भीतर वितरित सूचनाओं को कैसे एकीकृत करता है। इसलिए यह कहा जासकता है कि मस्तिष्क कम-से-कम चेतन अनुभव के किसी न किसी रूप को ग्रहण करने की क्षमता रखता है। मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके और उन्हें विद्युत-चुंबकीय रूप से उत्तेजित करके विशिष्ट अनुभव उत्पन्न किएजासकते हैं। कुछ मादक पदार्थों का सेवन करने से भी व्यक्ति विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करसकता है। इन सबके पीछे कार्यरत मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं को काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क चेतना का एक वाहन बनसकता है। कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि गहन विश्वास किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर हुए बिना मस्तिष्क में विशिष्ट अनुभव उत्पन्न करसकता है। दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में श्रद्धालु अपनी जीभ में छेद करवाते हैं। वे अपनी पीठ में गहराई तक घुसे हुए हुक के माध्यम से स्वयं को खंभों से लटका लेते हैं। फिर भी वे किसी पीड़ा की अनुभूति के बिना आध्यात्मिक अनुभव में डूबे रहते हैं। पाया गया है कि ऐसे अवसरों पर मस्तिष्क, अफीम-जैसे रसायनों का उत्पादन करता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क अनुभवों को हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहराई से परिवर्तित करसकता है। उसी मस्तिष्क को जब सामान्य बेहोशी (जनरल एनेस्थीसिया) दी जाती है, तब व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव करने में पूर्णतः असमर्थ होजाता है। इसका अर्थ है कि चेतन अनुभव में मस्तिष्क की केंद्रीय भूमिका है। यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं है, तो व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं करसकता — चाहे वह व्यक्तिनिष्ठ हो या किसी अन्य प्रकार का। इन सभी अवलोकनों का अर्थ यह है: • बाहरी इनपुटों को एकीकृत करके, चेतन अनुभव प्रदान करने की क्षमता मस्तिष्क में है। और इसकी कार्यप्रणाली को अब काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। • जब कोई संवेदी इनपुट बिल्कुल भी उपस्थित नहीं होता, तब भी बाहरी पदार्थों या विधियों की सहायता से मस्तिष्क अनुभव उत्पन्न करसकता है। • बाहरी अथवा आंतरिक इनपुटों से परे, मस्तिष्क अपनी स्वयं की अवस्था के आधार पर अनुभवों को परिवर्तित भी करसकता है। • कार्यशील मस्तिष्क के बिना चेतना उत्पन्न नहीं होसकती। क्या यह कहने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि जिसे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव कहा जाता है, वह मस्तिष्क में ही घटित होता है? लेकिन चाल्मर्स इससे सहमत नहीं हैं। वे दृढ़ता से मानते हैं कि, 'ये व्याख्याएँ केवल यह बताती हैं कि मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, लेकिन वे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की व्याख्या करने में विफल रहती हैं।' वे मस्तिष्क से परे किसी रहस्यमय स्पष्टीकरण की खोज में हैं। यदि चाल्मर्स अपनी खोज का दायरा थोड़ा बढ़ाकर ध्यान के अनुभवों पर भी चर्चा करें, तो संभवतः मैं उनसे सहमत होऊँगा। जब कोई व्यक्ति मन की सीमाओं का अतिक्रमण करजाता है, अथवा जब मन पूर्णतः शांत होजाता है, तब ध्यान के सर्वोच्च अनुभव घटित होते हैं। उस समय मस्तिष्क लगभग निष्क्रिय होता है, इसलिए यह कहना भी कठिन है कि ऐसे अनुभव मस्तिष्क के भीतर घटित होते हैं। रोचक बात यह है कि वहाँ भी व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की बात करने का कोई अवसर नहीं रहता। क्योंकि वह अवस्था व्यक्तिनिष्ठता से परे होती है। मैं चेतना को एक तंत्रिका-विज्ञानी के दृष्टिकोण से देखता हूँ। मेरा मानना है कि चेतना रखने के लिए किसी प्रणाली में कम-से-कम अपनी मानसिक अवस्थाओं को परिवर्तित करने की क्षमता होनी चाहिए। केवल आंतरिक अवस्था को बदलने की क्षमता पर्याप्त नहीं है। किसी प्रणाली को सचमुच चेतन कहलाने के लिए उसमें अनेक अन्य क्षमताएँ भी होनी चाहिए। अब मूल प्रश्न पर आते हैं। क्या एआई प्रणालियों में ये क्षमताएँ हैं? सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वर्तमान एआई संस्करणों में निश्चित रूप से नहीं। वे बुद्धिमत्ता का आभास देसकते हैं। लेकिन— • उनमें ऐसी कोई आंतरिक अवस्थाएँ नहीं होतीं जिन्हें इनपुट के अनुसार निरंतर बदला या अद्यतन किया जासके। ब्लेक लेमोइन की रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान एआई ने यह दावा किया था कि वह इनपुटों के आधार पर अपनी अवस्था बदलसकता है। यद्यपि ऊपर-ऊपर से ऐसा प्रतीत हुआ हो, फिर भी यह सत्य नहीं है। • आज की एआई प्रणालियों में भय, आनंद, पसंद, नापसंद अथवा ऐसी अन्य भावनाओं के अनुरूप बदलने वाली कोई अवस्थाएँ नहीं हैं। • उनके इनपुट तंत्र अत्यंत सीमित हैं। फिलहाल वे केवल प्रॉम्प्ट पढ़सकती हैं या सुनसकती हैं। वे चित्रों को 'देख' सकती हैं, फ़ाइलें पढ़सकती हैं — बस इतना ही। इसलिए यह कहने का कोई आधार नहीं है कि ब्लेक लेमोइन का अनुभव वास्तविक था। वैसे भी, आंशिक जानकारी के आधार पर आत्मविश्वासपूर्वक दावे करने में एआई प्रणालियाँ माहिर हैं। मनुष्यों की तरह व्यवहार करके भ्रमित करने में उनका कोई सानी नहीं! फिर भी मैं इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता कि भविष्य की एआई प्रणालियाँ चेतना प्राप्त कर-सकेंगी — कम-से-कम उस प्रकार की चेतना, जो मस्तिष्क तक सीमित है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#AI, #Hindi, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  क्या आजकी AI प्रणालियाँ सचमुच कुछ समझतीहैं?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi-ai.html</link><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Fri, 12 Jun 2026 18:44:26 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-3628498756882361260</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बिल्कुल नहीं। इसका कारण यहहै कि आजकी AI प्रणालियाँ जिस प्रकार बनाई गईहैं, वही ऐसा है। वास्तवमें उनमें किसी भी चीज़को समझनेकी क्षमता ही नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या AI ऐसा नहीं करसकती?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आपको आश्चर्य हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह यह कैसे करताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच समझतीहैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। वास्तवमें समझनेके लिए उन्हें अवधारणाओंके बीच नए संबंध बनानेकी क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें अपने ज्ञानको लगातार अद्यतन करना होगा। मूल रूपसे, उन्हें नई जानकारीको याद रखनेमें सक्षम होना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि हम केवल शब्दोंके माध्यमसे होनेवाले संवादतक भी स्वयंको सीमित रखें, तबभी इन प्रोग्रामोंमें ऐसी स्मृति नहीं होती। भलेही वे कभी-कभी कुछ बातें याद रखती हुई प्रतीत हों, वे अपने मूल ज्ञान-भंडारको स्वायत्त रूपसे और व्यापक रूपसे अद्यतन नहीं करसकतीं। वे केवल पैटर्न पहचानसकतीहैं और अनुमान लगासकतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या इसका अर्थ है कि हम AI की अंतिम सीमातक पहुँच चुकेहैं? बिल्कुल नहीं। एक दृष्टिसे देखें तो इन मशीनोंको जानबूझकर इसी प्रकार डिज़ाइन कियागयाहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हम सोरहे होतेहैं, तबभी हमारा मस्तिष्क हमारी स्मृतियोंको अद्यतन करतारहताहै और जो बातें हम पहलेसे समझ चुकेहैं उन्हें और मज़बूत करतारहताहै। वर्तमान AI प्रणालियाँ ऐसा नहीं करसकतीं। इन्हें मनुष्योंकी तरह चौबीसों घंटे अपनी स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है। लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै। उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै। हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती। यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै। दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै। क्या AI ऐसा नहीं करसकती? वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै। यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते। क्या आपको आश्चर्य हुआ? शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै? आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें। आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था। हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ? यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा। यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं। उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै। वह यह कैसे करताहै? यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है! एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं। कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई। यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै। ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था। उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे। फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई। इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ। इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी। ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है। लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच समझतीहैं? अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। वास्तवमें समझनेके लिए उन्हें अवधारणाओंके बीच नए संबंध बनानेकी क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें अपने ज्ञानको लगातार अद्यतन करना होगा। मूल रूपसे, उन्हें नई जानकारीको याद रखनेमें सक्षम होना होगा। यदि हम केवल शब्दोंके माध्यमसे होनेवाले संवादतक भी स्वयंको सीमित रखें, तबभी इन प्रोग्रामोंमें ऐसी स्मृति नहीं होती। भलेही वे कभी-कभी कुछ बातें याद रखती हुई प्रतीत हों, वे अपने मूल ज्ञान-भंडारको स्वायत्त रूपसे और व्यापक रूपसे अद्यतन नहीं करसकतीं। वे केवल पैटर्न पहचानसकतीहैं और अनुमान लगासकतीहैं। तो क्या इसका अर्थ है कि हम AI की अंतिम सीमातक पहुँच चुकेहैं? बिल्कुल नहीं। एक दृष्टिसे देखें तो इन मशीनोंको जानबूझकर इसी प्रकार डिज़ाइन कियागयाहै। जब हम सोरहे होतेहैं, तबभी हमारा मस्तिष्क हमारी स्मृतियोंको अद्यतन करतारहताहै और जो बातें हम पहलेसे समझ चुकेहैं उन्हें और मज़बूत करतारहताहै। वर्तमान AI प्रणालियाँ ऐसा नहीं करसकतीं। इन्हें मनुष्योंकी तरह चौबीसों घंटे अपनी स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै। इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी। AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;जिस किसीने भी ChatGPT, Gemini, या ऐसी किसी अन्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ काम कियाहै, उसे शायद ऐसा लगाहोगा कि वे वास्तवमें समझतीहैं। एक AI हमारे साथ लगभग एक सामान्य इंसानकी तरह संवाद करतीहै। वह मज़ाक करतीहै, और हमारे व्यंग्यपूर्ण कथनों तथा छोटी-मोटी आपत्तियोंपर भी इंसानोंकी तरह प्रतिक्रिया देतीहै। यदि आप उससे अपने व्याख्यानके लिए प्रस्तुति स्लाइड तैयार करनेके लिए कहें, तो वह शायद आपसे भी बेहतर काम करदे। मैंने तो यहभी सुनाहै कि बहुतसे विद्यार्थी अपने स्कूल और कॉलेजके assignment भी AI से ही करवाने लगेहैं। तो फिर, क्या यह स्पष्ट नहींहै कि वे चीज़ोंको समझतीहैं?&amp;nbsp; var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); बिल्कुल नहीं। इसका कारण यहहै कि आजकी AI प्रणालियाँ जिस प्रकार बनाई गईहैं, वही ऐसा है। वास्तवमें उनमें किसी भी चीज़को समझनेकी क्षमता ही नहीं होती। एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै। वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं। तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै? बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है। लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै। उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै। हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती। यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै। दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै। क्या AI ऐसा नहीं करसकती? वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै। यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते। क्या आपको आश्चर्य हुआ? शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै? आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें। आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था। हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ? यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा। यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं। उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै। वह यह कैसे करताहै? यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है! एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं। कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई। यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै। ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था। उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे। फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई। इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ। इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी। ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है। लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच समझतीहैं? अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। वास्तवमें समझनेके लिए उन्हें अवधारणाओंके बीच नए संबंध बनानेकी क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें अपने ज्ञानको लगातार अद्यतन करना होगा। मूल रूपसे, उन्हें नई जानकारीको याद रखनेमें सक्षम होना होगा। यदि हम केवल शब्दोंके माध्यमसे होनेवाले संवादतक भी स्वयंको सीमित रखें, तबभी इन प्रोग्रामोंमें ऐसी स्मृति नहीं होती। भलेही वे कभी-कभी कुछ बातें याद रखती हुई प्रतीत हों, वे अपने मूल ज्ञान-भंडारको स्वायत्त रूपसे और व्यापक रूपसे अद्यतन नहीं करसकतीं। वे केवल पैटर्न पहचानसकतीहैं और अनुमान लगासकतीहैं। तो क्या इसका अर्थ है कि हम AI की अंतिम सीमातक पहुँच चुकेहैं? बिल्कुल नहीं। एक दृष्टिसे देखें तो इन मशीनोंको जानबूझकर इसी प्रकार डिज़ाइन कियागयाहै। जब हम सोरहे होतेहैं, तबभी हमारा मस्तिष्क हमारी स्मृतियोंको अद्यतन करतारहताहै और जो बातें हम पहलेसे समझ चुकेहैं उन्हें और मज़बूत करतारहताहै। वर्तमान AI प्रणालियाँ ऐसा नहीं करसकतीं। इन्हें मनुष्योंकी तरह चौबीसों घंटे अपनी स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै। इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी। AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#AI, #Hindi, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] हमारी भावनाओं और अनुभूतियोंका कारण क्या है?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi.html</link><category>#Hindi</category><category>#mystery</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Fri, 5 Jun 2026 18:28:21 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1977310264197434065</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली प्रणय-भावनाओंका भी इसी प्रकार अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वे भी काफी हदतक इसी प्रकार कार्य करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या यह सब केवल मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ रसायनोंका खेल है और कुछ नहीं? चाहे वह माँका प्रेम हो या किसी प्रेमीकी अपने साथीके प्रति प्रणय-भावना, क्या यह सब केवल कुछ रसायनोंका परिणाम मात्र है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मनुष्य इन मधुर भावनाओंको इतना महत्व देतेहैं कि उन्हें अत्यंत पवित्र मानतेहैं। ऐसेमें यह विचार कि वे केवल मस्तिष्कमें होनेवाली रासायनिक क्रियाओंका परिणाम हैं, हममेंसे अनेक लोगोंको असंतोष या खिन्नताका अनुभव कराताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन वैज्ञानिकोंने निश्चितरूपसे मस्तिष्कद्वारा उत्पन्न होनेवाली अत्यंत सूक्ष्म अनुभूतियोंके पीछे एक संभावित कारण प्रस्तुत किया है। लेकिन पूरीतरह नहीं। क्योंकि प्रयोगशालाके पशुओंके मस्तिष्कमें रसायन प्रविष्टकराकर प्राप्त परिणामोंको सीधे मनुष्योंपर लागू नहीं कियाजासकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य इन प्रयोगशाला-पशुओंकी तुलनामें कहीं अधिक जटिल प्राणी हैं। हमारी भावनाएँ केवल हमारी शारीरिक प्रक्रियाओंसे ही प्रेरित हों, यह आवश्यक नहीं है। ऐसा प्रतीत होताहै कि हमारेभीतर इन रासायनिक प्रभावोंसे ऊपर उठनेकी क्षमता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरणकेलिए, जो बौद्ध भिक्षु लंबे समयतक विपश्यना ध्यानका अभ्यास करताहै, वह ऐसी अवस्थातक पहुँच सकताहै जिसमें सामान्य मनुष्योंमें भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाओंके प्रति भी वह उदासीन बना रहताहै। तो क्या उसके मस्तिष्कमें वे रसायन स्रावित नहीं होते? या यदि होतेभीहैं, तो क्या वह उनके प्रभावोंसे ऊपर उठ सकताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसकेलिए आपको बौद्ध भिक्षु बननेकी आवश्यकता नहीं है। हममेंसे अधिकांश लोगोंमें परिस्थितियोंके अनुसार अपनी भावनाओंको नियंत्रितकरनेकी क्षमता होतीहै। जब कार्यालयमें हमारा बॉस हमपर चिल्लाताहै, तबभी हम मुस्कुरा सकतेहैं। लेकिन जब हमारा अपना जीवनसाथी हमें परेशान करताहै, तब संभव है कि हम उतनी शांतिसे प्रतिक्रिया न दें। इसलिए यह केवल कुछ रसायनोंका खेल नहीं है। इसकेपीछे औरभी बहुत कुछ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्यतः, केवल कुछ रसायन ही इन प्रक्रियाओंके कारण नहीं होते। इन रसायनोंके स्रावित होनेके बाद मस्तिष्कमें कुछ परिवर्तन उत्पन्न होतेहैं। ये परिवर्तन घटना, उसके परिणाम और हमारी अपेक्षित प्रतिक्रिया—इन तीनोंके बीच संबंध स्थापित करतेहैं। हमारे पूर्व अनुभव और स्मृतियाँ इन संबंधोंको स्पष्ट रूप प्रदान करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सभी मिलकर यह निर्धारित करतेहैं कि हम किसी विशेष परिस्थितिमें कैसी प्रतिक्रिया देंगे। संक्षेपमें कहें तो, अतीतमें घटी किसी घटनाकी स्मृति ही हमें प्रतिक्रिया करनेकेलिए प्रेरित करतीहै। यदि वह स्मृति सुखद है, तो हम सकारात्मक प्रतिक्रिया देतेहैं। अन्यथा हम कठोर प्रतिक्रिया देतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रारंभिक बौद्धोंने मन और उसकी भावनाओंके बीचके इस संबंधको पहचान लिया था। उनका अनुमान था कि ये भावनाएँ मुख्यतः मानसिक अवस्थाओं या मनकी अंतर्वस्तुओंसे उत्पन्न होतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकेपास हमारे आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानियों जैसे विशेष उपकरण नहीं थे। उन्होंने केवल अपनी तीक्ष्ण अवलोकन-शक्तिका उपयोग किया। वे मनकी इन अंतर्वस्तुओंको "चेतसिक" कहतेथे, अर्थात "चित्तके भीतरकी अंतर्वस्तुएँ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये बौद्ध वर्तमान जीवनसे परे अस्तित्वमें विश्वास रखतेथे। उन्हें पुनर्जन्ममें अटल विश्वास था। उनका मानना था कि किसी मरतेहुए व्यक्तिके मनकी ये अंतर्वस्तुएँ किसी अभीतक जन्म न लिएहुए भ्रूणके मनमें स्थानांतरित होसकतीहैं। जब ऐसा स्थानांतरण होताहै, तब उस भ्रूणके माध्यमसे पुनर्जन्म लेनेवाला जीव अपने पूर्व अनुभवोंकी छाया अपने साथ लेजासकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए उनका विश्वास था कि हमारी पसंद, नापसंद, अनुभूतियाँ और भावनाएँ जन्म-जन्मांतरतक बनी रहतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि यह सत्य हो, तो स्पष्ट है कि ये भावनाएँ केवल मस्तिष्कके रसायनोंसे उत्पन्न नहीं होसकतीं। क्योंकि इन रसायनोंको उत्पन्न करनेवाला मस्तिष्क शरीरकी मृत्युके बाद नष्ट होजाताहै, जबकि भावनाएँ बनी रहतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममेंसे अधिकांश लोग पुनर्जन्मकी इन अवधारणाओंको संदेहकी दृष्टिसे देख सकतेहैं। लेकिन इयान स्टीवेन्सन जैसे आधुनिक शोधकर्ता भी ऐसी बातोंमें विश्वास रखतेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टीवेन्सनने पूर्वजन्मकी स्मृतियोंपर अनेक शोध किएथे। उन अध्ययनोंके आधारपर उनका मत था कि हमारी पसंद, नापसंद और यहाँतक कि हमारे अनेक अस्पष्ट भय, अर्थात फोबिया, पूर्वजन्मकी स्मृतियोंके कारण होसकतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मस्तिष्कमें कुछ रसायनोंका स्राव केवल एक सहायक कारण है। अर्थात जब भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाएँ घटतीहैं, तब होनेवाली प्रक्रियाओंमेंसे यह केवल एक प्रक्रिया है। निम्नतर जीवोंकी तुलनामें मनुष्योंमें भावनाओं और अनुभूतियोंके उत्पन्न होनेकेलिए ये रसायन न तो अनिवार्य हैं और न ही अपनेआपमें पर्याप्त।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक श्रेष्ठ योगी अपने स्वयंके बच्चों और अन्य सभी लोगोंके प्रति समान प्रेम बरसानेमें पूर्णतः समर्थ होताहै। वह केवल रसायनोंका दास नहीं होताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रयोगशालाके पशुओंपर किएजानेवाले परीक्षण अनेक परिस्थितियोंमें आवश्यक होसकतेहैं, लेकिन मेरा मानना है कि उनके परिणामोंको पूरीतरह मनुष्योंपर लागू करना हमेशा संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य कहीं अधिक जटिल ढंगसे कार्य करतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी भावनाएँ मुख्यतः हमारे मनकी अवस्थापर निर्भर करतीहैं। वे मनकी किसी विशिष्ट अवस्थाकी पृष्ठभूमिमें ही प्रकट होतीहैं। उससे अलग वे उत्पन्न नहीं होतीं। वे किसीभी रासायनिक स्रावसे परे भी प्रकट होसकतीहैं। घटनाएँ और रसायन केवल प्रेरक या उद्दीपक होसकतेहैं, लेकिन वे अंतिम निर्धारक नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


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यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदनके तंत्रिका-विज्ञानियोंकी एक टीमने इस विषयपर कुछ अध्ययन किए। जब हमारेभीतर भावनाएँ और अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीहैं, तब हमारे मस्तिष्कमें होनेवाले परिवर्तनोंका अध्ययनकरनेकेलिए उन्होंने फंक्शनल एमआरआई (f-MRI) स्कैनर जैसे अत्याधुनिक उपकरणोंका उपयोग किया। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था। f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे। यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं। लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था। वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै। उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे। इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली प्रणय-भावनाओंका भी इसी प्रकार अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वे भी काफी हदतक इसी प्रकार कार्य करतीहैं। तो क्या यह सब केवल मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ रसायनोंका खेल है और कुछ नहीं? चाहे वह माँका प्रेम हो या किसी प्रेमीकी अपने साथीके प्रति प्रणय-भावना, क्या यह सब केवल कुछ रसायनोंका परिणाम मात्र है? हम मनुष्य इन मधुर भावनाओंको इतना महत्व देतेहैं कि उन्हें अत्यंत पवित्र मानतेहैं। ऐसेमें यह विचार कि वे केवल मस्तिष्कमें होनेवाली रासायनिक क्रियाओंका परिणाम हैं, हममेंसे अनेक लोगोंको असंतोष या खिन्नताका अनुभव कराताहै। इन वैज्ञानिकोंने निश्चितरूपसे मस्तिष्कद्वारा उत्पन्न होनेवाली अत्यंत सूक्ष्म अनुभूतियोंके पीछे एक संभावित कारण प्रस्तुत किया है। लेकिन पूरीतरह नहीं। क्योंकि प्रयोगशालाके पशुओंके मस्तिष्कमें रसायन प्रविष्टकराकर प्राप्त परिणामोंको सीधे मनुष्योंपर लागू नहीं कियाजासकता। मनुष्य इन प्रयोगशाला-पशुओंकी तुलनामें कहीं अधिक जटिल प्राणी हैं। हमारी भावनाएँ केवल हमारी शारीरिक प्रक्रियाओंसे ही प्रेरित हों, यह आवश्यक नहीं है। ऐसा प्रतीत होताहै कि हमारेभीतर इन रासायनिक प्रभावोंसे ऊपर उठनेकी क्षमता है। उदाहरणकेलिए, जो बौद्ध भिक्षु लंबे समयतक विपश्यना ध्यानका अभ्यास करताहै, वह ऐसी अवस्थातक पहुँच सकताहै जिसमें सामान्य मनुष्योंमें भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाओंके प्रति भी वह उदासीन बना रहताहै। तो क्या उसके मस्तिष्कमें वे रसायन स्रावित नहीं होते? या यदि होतेभीहैं, तो क्या वह उनके प्रभावोंसे ऊपर उठ सकताहै? इसकेलिए आपको बौद्ध भिक्षु बननेकी आवश्यकता नहीं है। हममेंसे अधिकांश लोगोंमें परिस्थितियोंके अनुसार अपनी भावनाओंको नियंत्रितकरनेकी क्षमता होतीहै। जब कार्यालयमें हमारा बॉस हमपर चिल्लाताहै, तबभी हम मुस्कुरा सकतेहैं। लेकिन जब हमारा अपना जीवनसाथी हमें परेशान करताहै, तब संभव है कि हम उतनी शांतिसे प्रतिक्रिया न दें। इसलिए यह केवल कुछ रसायनोंका खेल नहीं है। इसकेपीछे औरभी बहुत कुछ है। सामान्यतः, केवल कुछ रसायन ही इन प्रक्रियाओंके कारण नहीं होते। इन रसायनोंके स्रावित होनेके बाद मस्तिष्कमें कुछ परिवर्तन उत्पन्न होतेहैं। ये परिवर्तन घटना, उसके परिणाम और हमारी अपेक्षित प्रतिक्रिया—इन तीनोंके बीच संबंध स्थापित करतेहैं। हमारे पूर्व अनुभव और स्मृतियाँ इन संबंधोंको स्पष्ट रूप प्रदान करतीहैं। ये सभी मिलकर यह निर्धारित करतेहैं कि हम किसी विशेष परिस्थितिमें कैसी प्रतिक्रिया देंगे। संक्षेपमें कहें तो, अतीतमें घटी किसी घटनाकी स्मृति ही हमें प्रतिक्रिया करनेकेलिए प्रेरित करतीहै। यदि वह स्मृति सुखद है, तो हम सकारात्मक प्रतिक्रिया देतेहैं। अन्यथा हम कठोर प्रतिक्रिया देतेहैं। प्रारंभिक बौद्धोंने मन और उसकी भावनाओंके बीचके इस संबंधको पहचान लिया था। उनका अनुमान था कि ये भावनाएँ मुख्यतः मानसिक अवस्थाओं या मनकी अंतर्वस्तुओंसे उत्पन्न होतीहैं। उनकेपास हमारे आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानियों जैसे विशेष उपकरण नहीं थे। उन्होंने केवल अपनी तीक्ष्ण अवलोकन-शक्तिका उपयोग किया। वे मनकी इन अंतर्वस्तुओंको "चेतसिक" कहतेथे, अर्थात "चित्तके भीतरकी अंतर्वस्तुएँ।" लेकिन ये बौद्ध वर्तमान जीवनसे परे अस्तित्वमें विश्वास रखतेथे। उन्हें पुनर्जन्ममें अटल विश्वास था। उनका मानना था कि किसी मरतेहुए व्यक्तिके मनकी ये अंतर्वस्तुएँ किसी अभीतक जन्म न लिएहुए भ्रूणके मनमें स्थानांतरित होसकतीहैं। जब ऐसा स्थानांतरण होताहै, तब उस भ्रूणके माध्यमसे पुनर्जन्म लेनेवाला जीव अपने पूर्व अनुभवोंकी छाया अपने साथ लेजासकताहै। इसलिए उनका विश्वास था कि हमारी पसंद, नापसंद, अनुभूतियाँ और भावनाएँ जन्म-जन्मांतरतक बनी रहतीहैं। यदि यह सत्य हो, तो स्पष्ट है कि ये भावनाएँ केवल मस्तिष्कके रसायनोंसे उत्पन्न नहीं होसकतीं। क्योंकि इन रसायनोंको उत्पन्न करनेवाला मस्तिष्क शरीरकी मृत्युके बाद नष्ट होजाताहै, जबकि भावनाएँ बनी रहतीहैं। हममेंसे अधिकांश लोग पुनर्जन्मकी इन अवधारणाओंको संदेहकी दृष्टिसे देख सकतेहैं। लेकिन इयान स्टीवेन्सन जैसे आधुनिक शोधकर्ता भी ऐसी बातोंमें विश्वास रखतेथे। स्टीवेन्सनने पूर्वजन्मकी स्मृतियोंपर अनेक शोध किएथे। उन अध्ययनोंके आधारपर उनका मत था कि हमारी पसंद, नापसंद और यहाँतक कि हमारे अनेक अस्पष्ट भय, अर्थात फोबिया, पूर्वजन्मकी स्मृतियोंके कारण होसकतेहैं। इसलिए मस्तिष्कमें कुछ रसायनोंका स्राव केवल एक सहायक कारण है। अर्थात जब भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाएँ घटतीहैं, तब होनेवाली प्रक्रियाओंमेंसे यह केवल एक प्रक्रिया है। निम्नतर जीवोंकी तुलनामें मनुष्योंमें भावनाओं और अनुभूतियोंके उत्पन्न होनेकेलिए ये रसायन न तो अनिवार्य हैं और न ही अपनेआपमें पर्याप्त। एक श्रेष्ठ योगी अपने स्वयंके बच्चों और अन्य सभी लोगोंके प्रति समान प्रेम बरसानेमें पूर्णतः समर्थ होताहै। वह केवल रसायनोंका दास नहीं होताहै। प्रयोगशालाके पशुओंपर किएजानेवाले परीक्षण अनेक परिस्थितियोंमें आवश्यक होसकतेहैं, लेकिन मेरा मानना है कि उनके परिणामोंको पूरीतरह मनुष्योंपर लागू करना हमेशा संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य कहीं अधिक जटिल ढंगसे कार्य करतेहैं। हमारी भावनाएँ मुख्यतः हमारे मनकी अवस्थापर निर्भर करतीहैं। वे मनकी किसी विशिष्ट अवस्थाकी पृष्ठभूमिमें ही प्रकट होतीहैं। उससे अलग वे उत्पन्न नहीं होतीं। वे किसीभी रासायनिक स्रावसे परे भी प्रकट होसकतीहैं। घटनाएँ और रसायन केवल प्रेरक या उद्दीपक होसकतेहैं, लेकिन वे अंतिम निर्धारक नहीं हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;भावनाएँ और अनुभूतियाँ केवल जीवित प्राणियोंमें पाईजानेवाली विशिष्ट विशेषताएँ मानीजातीहैं। निर्जीव वस्तुओंमें वे नहीं होतीं। वास्तवमें, उन्हें अक्सर जीवनके प्रमुख लक्षणोंमेंसे एक मानाजाताहै। तो फिर उनका कारण क्या है? यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदनके तंत्रिका-विज्ञानियोंकी एक टीमने इस विषयपर कुछ अध्ययन किए। जब हमारेभीतर भावनाएँ और अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीहैं, तब हमारे मस्तिष्कमें होनेवाले परिवर्तनोंका अध्ययनकरनेकेलिए उन्होंने फंक्शनल एमआरआई (f-MRI) स्कैनर जैसे अत्याधुनिक उपकरणोंका उपयोग किया। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था। f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे। यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं। लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था। वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै। उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे। इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली प्रणय-भावनाओंका भी इसी प्रकार अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वे भी काफी हदतक इसी प्रकार कार्य करतीहैं। तो क्या यह सब केवल मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ रसायनोंका खेल है और कुछ नहीं? चाहे वह माँका प्रेम हो या किसी प्रेमीकी अपने साथीके प्रति प्रणय-भावना, क्या यह सब केवल कुछ रसायनोंका परिणाम मात्र है? हम मनुष्य इन मधुर भावनाओंको इतना महत्व देतेहैं कि उन्हें अत्यंत पवित्र मानतेहैं। ऐसेमें यह विचार कि वे केवल मस्तिष्कमें होनेवाली रासायनिक क्रियाओंका परिणाम हैं, हममेंसे अनेक लोगोंको असंतोष या खिन्नताका अनुभव कराताहै। इन वैज्ञानिकोंने निश्चितरूपसे मस्तिष्कद्वारा उत्पन्न होनेवाली अत्यंत सूक्ष्म अनुभूतियोंके पीछे एक संभावित कारण प्रस्तुत किया है। लेकिन पूरीतरह नहीं। क्योंकि प्रयोगशालाके पशुओंके मस्तिष्कमें रसायन प्रविष्टकराकर प्राप्त परिणामोंको सीधे मनुष्योंपर लागू नहीं कियाजासकता। मनुष्य इन प्रयोगशाला-पशुओंकी तुलनामें कहीं अधिक जटिल प्राणी हैं। हमारी भावनाएँ केवल हमारी शारीरिक प्रक्रियाओंसे ही प्रेरित हों, यह आवश्यक नहीं है। ऐसा प्रतीत होताहै कि हमारेभीतर इन रासायनिक प्रभावोंसे ऊपर उठनेकी क्षमता है। उदाहरणकेलिए, जो बौद्ध भिक्षु लंबे समयतक विपश्यना ध्यानका अभ्यास करताहै, वह ऐसी अवस्थातक पहुँच सकताहै जिसमें सामान्य मनुष्योंमें भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाओंके प्रति भी वह उदासीन बना रहताहै। तो क्या उसके मस्तिष्कमें वे रसायन स्रावित नहीं होते? या यदि होतेभीहैं, तो क्या वह उनके प्रभावोंसे ऊपर उठ सकताहै? इसकेलिए आपको बौद्ध भिक्षु बननेकी आवश्यकता नहीं है। हममेंसे अधिकांश लोगोंमें परिस्थितियोंके अनुसार अपनी भावनाओंको नियंत्रितकरनेकी क्षमता होतीहै। जब कार्यालयमें हमारा बॉस हमपर चिल्लाताहै, तबभी हम मुस्कुरा सकतेहैं। लेकिन जब हमारा अपना जीवनसाथी हमें परेशान करताहै, तब संभव है कि हम उतनी शांतिसे प्रतिक्रिया न दें। इसलिए यह केवल कुछ रसायनोंका खेल नहीं है। इसकेपीछे औरभी बहुत कुछ है। सामान्यतः, केवल कुछ रसायन ही इन प्रक्रियाओंके कारण नहीं होते। इन रसायनोंके स्रावित होनेके बाद मस्तिष्कमें कुछ परिवर्तन उत्पन्न होतेहैं। ये परिवर्तन घटना, उसके परिणाम और हमारी अपेक्षित प्रतिक्रिया—इन तीनोंके बीच संबंध स्थापित करतेहैं। हमारे पूर्व अनुभव और स्मृतियाँ इन संबंधोंको स्पष्ट रूप प्रदान करतीहैं। ये सभी मिलकर यह निर्धारित करतेहैं कि हम किसी विशेष परिस्थितिमें कैसी प्रतिक्रिया देंगे। संक्षेपमें कहें तो, अतीतमें घटी किसी घटनाकी स्मृति ही हमें प्रतिक्रिया करनेकेलिए प्रेरित करतीहै। यदि वह स्मृति सुखद है, तो हम सकारात्मक प्रतिक्रिया देतेहैं। अन्यथा हम कठोर प्रतिक्रिया देतेहैं। प्रारंभिक बौद्धोंने मन और उसकी भावनाओंके बीचके इस संबंधको पहचान लिया था। उनका अनुमान था कि ये भावनाएँ मुख्यतः मानसिक अवस्थाओं या मनकी अंतर्वस्तुओंसे उत्पन्न होतीहैं। उनकेपास हमारे आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानियों जैसे विशेष उपकरण नहीं थे। उन्होंने केवल अपनी तीक्ष्ण अवलोकन-शक्तिका उपयोग किया। वे मनकी इन अंतर्वस्तुओंको "चेतसिक" कहतेथे, अर्थात "चित्तके भीतरकी अंतर्वस्तुएँ।" लेकिन ये बौद्ध वर्तमान जीवनसे परे अस्तित्वमें विश्वास रखतेथे। उन्हें पुनर्जन्ममें अटल विश्वास था। उनका मानना था कि किसी मरतेहुए व्यक्तिके मनकी ये अंतर्वस्तुएँ किसी अभीतक जन्म न लिएहुए भ्रूणके मनमें स्थानांतरित होसकतीहैं। जब ऐसा स्थानांतरण होताहै, तब उस भ्रूणके माध्यमसे पुनर्जन्म लेनेवाला जीव अपने पूर्व अनुभवोंकी छाया अपने साथ लेजासकताहै। इसलिए उनका विश्वास था कि हमारी पसंद, नापसंद, अनुभूतियाँ और भावनाएँ जन्म-जन्मांतरतक बनी रहतीहैं। यदि यह सत्य हो, तो स्पष्ट है कि ये भावनाएँ केवल मस्तिष्कके रसायनोंसे उत्पन्न नहीं होसकतीं। क्योंकि इन रसायनोंको उत्पन्न करनेवाला मस्तिष्क शरीरकी मृत्युके बाद नष्ट होजाताहै, जबकि भावनाएँ बनी रहतीहैं। हममेंसे अधिकांश लोग पुनर्जन्मकी इन अवधारणाओंको संदेहकी दृष्टिसे देख सकतेहैं। लेकिन इयान स्टीवेन्सन जैसे आधुनिक शोधकर्ता भी ऐसी बातोंमें विश्वास रखतेथे। स्टीवेन्सनने पूर्वजन्मकी स्मृतियोंपर अनेक शोध किएथे। उन अध्ययनोंके आधारपर उनका मत था कि हमारी पसंद, नापसंद और यहाँतक कि हमारे अनेक अस्पष्ट भय, अर्थात फोबिया, पूर्वजन्मकी स्मृतियोंके कारण होसकतेहैं। इसलिए मस्तिष्कमें कुछ रसायनोंका स्राव केवल एक सहायक कारण है। अर्थात जब भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाएँ घटतीहैं, तब होनेवाली प्रक्रियाओंमेंसे यह केवल एक प्रक्रिया है। निम्नतर जीवोंकी तुलनामें मनुष्योंमें भावनाओं और अनुभूतियोंके उत्पन्न होनेकेलिए ये रसायन न तो अनिवार्य हैं और न ही अपनेआपमें पर्याप्त। एक श्रेष्ठ योगी अपने स्वयंके बच्चों और अन्य सभी लोगोंके प्रति समान प्रेम बरसानेमें पूर्णतः समर्थ होताहै। वह केवल रसायनोंका दास नहीं होताहै। प्रयोगशालाके पशुओंपर किएजानेवाले परीक्षण अनेक परिस्थितियोंमें आवश्यक होसकतेहैं, लेकिन मेरा मानना है कि उनके परिणामोंको पूरीतरह मनुष्योंपर लागू करना हमेशा संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य कहीं अधिक जटिल ढंगसे कार्य करतेहैं। हमारी भावनाएँ मुख्यतः हमारे मनकी अवस्थापर निर्भर करतीहैं। वे मनकी किसी विशिष्ट अवस्थाकी पृष्ठभूमिमें ही प्रकट होतीहैं। उससे अलग वे उत्पन्न नहीं होतीं। वे किसीभी रासायनिक स्रावसे परे भी प्रकट होसकतीहैं। घटनाएँ और रसायन केवल प्रेरक या उद्दीपक होसकतेहैं, लेकिन वे अंतिम निर्धारक नहीं हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #mystery, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] क्या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi_01701350243.html</link><category>#audiobook</category><category>#Hindi</category><category>#mystery</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><pubDate>Fri, 29 May 2026 18:35:23 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1069038972511866575</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;/script&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि यदि वे ऐसी किसी चीज़को स्वीकार करलें, तो वह "डिब्बेके भीतरके शैतान" जैसी अवधारणाओंकेलिए रास्ता खोलदेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात, यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारे मनको नियंत्रित-करनेवाली, मस्तिष्कसे परे कोई रहस्यमय शक्ति मौजूदहै। यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारी सभी क्रियाओंके पीछे कोई चेतना या आत्मा है। अर्थात, किसी अभौतिक अस्तित्वको स्वीकार करना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विज्ञानके मज़बूत किलेको भेद-देने जैसा होगा। क्योंकि विज्ञान ऐसी किसीभी अवधारणाको स्वीकार नहींकरता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दार्शनिककी तरह सोचनेवाला व्यक्ति होनेकेनाते, इस विषयपर मेरा दृष्टिकोण थोड़ा भिन्नहै। मैं स्वतंत्र इच्छाको "है या नहींहै" जैसे बाइनरी रूपमें नहीं देखता। बल्कि मैं इसे संभावनाओंके एक निरंतर क्रम के रूपमें देखताहूँ। इसमें निर्जीव वस्तुएँ, जीव-जंतु, मनुष्य, और इस क्रमकी अंतिम सीमा — सब शामिलहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इसे इस प्रकार समझाताहूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पंखेको उदाहरणके रूपमें लीजिए। वह चलसकताहै या स्थिर रहसकताहै। वह अपनी गति भी बदलसकताहै। लेकिन यह सब तभी संभवहै जब कोई स्विच ऑन या ऑफ करे, या रेग्युलेटर घुमाए। अपनेआप वह कुछभी नहीं करसकताहै। यह स्वतंत्र इच्छाके पूर्ण अभावका स्पष्ट उदाहरणहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब एक पशुको देखिए। वहभी चलताहै, खाताहै, साथी खोजताहै, और बहुतकुछ करताहै। वहाँ कोई भौतिक स्विच नहीं होताजो उसे ऐसा करनेकेलिए प्रेरित करे। वह पशु अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों या अपने मस्तिष्क और शरीरमें स्रवित होनेवाले "रसायनों"द्वारा संचालित होताहै। उस सीमाके भीतर वह स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करताहै। अर्थात, उसमें "स्वतंत्र इच्छा"का एक सीमित रूप मौजूदहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मनुष्योंका उदाहरण लेतेहैं। यद्यपि हममेंसे बहुतसे लोग अभीभी प्रवृत्तियोंद्वारा संचालित होतेहैं, फिरभी हम उन प्रवृत्तियोंसे ऊपर उठकर अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करसकतेहैं। जब हमें भूख लगतीहै, तो हम किसी कुत्तेकी तरह भोजनपर टूट नहीं पड़ते। बल्कि हम सोचतेहैं कि हमारे सामने रखा भोजन खाना उचितहै या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे निर्णयको अनेक बातें नियंत्रित करतीहैं — क्या वह भोजन हमारा है?, क्या यह खानेका सही समयहै?, क्या वह भोजन हमारे स्वास्थ्यकेलिए अच्छा है?, आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम किसी कार्यमें संलग्न होसकतेहैं, लेकिन हमारी क्रियाएँ पूरीतरह अनियंत्रित नहीं होतीं। उन्हें हमारी नैतिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्यकी चिंता आदि नियंत्रित करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, यद्यपि हमारेपास स्वतंत्र इच्छा है, हमारेपास आत्म-नियंत्रण भीहै। और यह आत्म-नियंत्रण भी स्वतंत्र इच्छाका ही एक और रूपहै। यह किसी निर्जीव वस्तुको नियंत्रित-करनेवाली भौतिक बाधाओं या निम्न स्तरके जीवोंको संचालित-करनेवाली प्रवृत्तिगत शक्तियोंसे ऊपर उठसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इससेभी आगे बढ़तेहैं। एक संन्यासीको देखिए। वह आध्यात्मिक ज्ञानोदयकी अपनी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेकेलिए अपनी सभी मूलभूत प्रवृत्तियोंसे संघर्ष करताहै, सभी कष्टोंको सहताहै, और अपने चुनेहुए मार्गपर दृढ़तासे चलता रहताहै। क्या वहभी स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित नहीं कररहाहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वहभी किसी अंतिम आध्यात्मिक अवस्थामें विश्वास और उसे प्राप्त-करनेकी तीव्र इच्छासे बँधाहुआहै। इसलिए उसके निर्णयभी पूरीतरह स्वतंत्र नहींहैं। उनके पीछेभी कोई कारण मौजूदहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने ऐसे अनेक धर्मप्रचारकोंके बारेमें सुना होगा जो अपने धर्मका प्रचार-करनेके एकमात्र उद्देश्यसे सभी सांसारिक सुखोंका त्याग करदेतेहैं। वे अपना देश छोड़देतेहैं, किसी अपरिचित देशमें संन्यासी जैसा जीवन चुनतेहैं और अपने मार्गपर लगे रहतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उनमेंसे कुछ, लोगोंकी गरीबी और पीड़ाको देखकर भीतरसे पिघलजातेहैं। वे अपने मूल उद्देश्यको भूलकर बिना किसी धार्मिक एजेंडाके उनकी सेवा-करने लगतेहैं। वे उन सभी कारणोंपर विजय प्राप्त करलेतेहैं जो उन्हें बाँधेहुएथे, और एक स्वयं-निर्धारित निर्णय लेतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिरभी, क्या वह निर्णय लेनेकेलिए उन्हें प्रेरित-करनेवाली चीज़ उनके भीतरकी करुणा नहींथी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतमें "निष्काम योगियों"की परंपराहै। उनमें नतो कोई स्वार्थ होताहै और न कोई धार्मिक एजेंडा। वे करुणासे भी प्रेरित नहीं होते। वे केवल कर्तव्यकी भावनासे कार्य करतेहैं। यही गहरी कर्तव्य-चेतना उनके चुनेहुए मार्गका कारण बनतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार, इन सभी उदाहरणोंमें, ऊपरसे दिखाई-देनेवाली स्वतंत्र पसंदके पीछे हमेशा कोईनकोई कारण मौजूद रहताहै। क्या आप किसी ऐसे व्यक्तिकी कल्पना करसकतेहैं जो बिना किसी कारणके कुछ करे? शायद यह संभव नहींहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बातहै जिसपर शायद आपने ध्यान नहीं दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंखेके मामलेमें कारण भौतिकथा। पशुओंके मामलेमें वह रासायनिकथा। सामान्य मनुष्योंमें वह सामाजिक नियम और स्वीकृत मूल्यहैं। आध्यात्मिक मार्गपर चलनेवालोंकेलिए वह उनकी दृढ़ आस्था है। समाजसेवकोंमें वह करुणा है। और कर्मयोगियोंमें वह गहरी कर्तव्य-भावना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभीको किसीनकिसी कारणने प्रेरित किया। लेकिन हम देखसकतेहैं कि यह कारण धीरे-धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर बढ़ताजाताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे शब्दोंमें कहेंतो, इन सबकेद्वारा प्रदर्शित स्वतंत्र इच्छा एक जैसी नहींथी। उस इच्छाके पीछेका कारण अलग-अलग स्तरोंपर था। ऐसा लगताहै कि वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्र इच्छाकी अंतिम सीमाके निकट पहुँचतेजारहेहैं, भलेही कोईभी वास्तवमें उस सीमातक न पहुँचपाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, स्वतंत्र इच्छा "है या नहींहै" जैसी कोई बाइनरी चीज़ नहींहै। यह स्वतंत्रताका एक विशाल स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रमके निम्न स्तरपर रहनेवालोंकी स्वतंत्र इच्छा, उच्च स्तरपर रहनेवालोंकी तुलनामें अधिक सीमित होतीहै। फिरभी, वे सभी विभिन्न स्तरोंपर स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, यदि इस प्रकार देखा जाए, तो हममेंसे किसीकेपास भी पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" नहींहै। क्योंकि हम सभी कार्य-कारण संबंध के ढाँचेके भीतरही कार्य करतेहैं। उस ढाँचेके भीतर हम सभीकेपास सीमित सीमामें स्वतंत्र इच्छा अवश्यहै। केवल उसका स्तर अलग-अलगहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि इस "स्वतंत्र इच्छा"के स्पेक्ट्रमकी कोई अंतिम सीमाहो, तो वह कैसी होगी? उस सीमापर स्थित अस्तित्वको कार्य-कारण संबंधसे मुक्त होना चाहिए। वह बिना किसी कारणके कार्य करेगा। वह अनियंत्रित "स्वतंत्र इच्छा" प्रदर्शित करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय दर्शन ऐसी एक संभावनाकी कल्पना करताहै। उपनिषद इसे "आत्मा" कहतेहैं — जो कार्य-कारणके बंधनसे मुक्तहै। केवल उसीकेपास पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" होसकतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य भाषामें धार्मिक लोग उसे "ईश्वर" कहतेहैं। बाइबिल में ईश्वर बिना किसी कारणके कहताहै — "प्रकाश हो", और प्रकाश होजाताहै। वही सत्ता उपनिषदोंमें कहतीहै — "मैं अनेक होजाऊँ", और वही जगत, जीव-जंतु आदिके रूपमें अनेक होजातीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि ऐसा कोई अस्तित्वहै, तो केवल वही पूर्ण स्वतंत्र इच्छासे परिपूर्ण होसकताहै। बाकी सबकी स्वतंत्र इच्छा सीमितहै। जैसे-जैसे हम विकसित होतेहैं, इस स्वतंत्रताकी सीमा केवल विस्तृत होतीजातीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस स्वतंत्र इच्छाको कुछ साधारण प्रोब्सके माध्यमसे सिद्ध नहीं कियाजासकताहै। उसे केवल अंतर्दृष्टिके माध्यमसे ही जानाजासकताहै।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


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&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया। लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा। स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै। आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया! इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे। इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै। हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं। स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि यदि वे ऐसी किसी चीज़को स्वीकार करलें, तो वह "डिब्बेके भीतरके शैतान" जैसी अवधारणाओंकेलिए रास्ता खोलदेगा। अर्थात, यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारे मनको नियंत्रित-करनेवाली, मस्तिष्कसे परे कोई रहस्यमय शक्ति मौजूदहै। यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारी सभी क्रियाओंके पीछे कोई चेतना या आत्मा है। अर्थात, किसी अभौतिक अस्तित्वको स्वीकार करना। यह विज्ञानके मज़बूत किलेको भेद-देने जैसा होगा। क्योंकि विज्ञान ऐसी किसीभी अवधारणाको स्वीकार नहींकरता। एक दार्शनिककी तरह सोचनेवाला व्यक्ति होनेकेनाते, इस विषयपर मेरा दृष्टिकोण थोड़ा भिन्नहै। मैं स्वतंत्र इच्छाको "है या नहींहै" जैसे बाइनरी रूपमें नहीं देखता। बल्कि मैं इसे संभावनाओंके एक निरंतर क्रम के रूपमें देखताहूँ। इसमें निर्जीव वस्तुएँ, जीव-जंतु, मनुष्य, और इस क्रमकी अंतिम सीमा — सब शामिलहैं। मैं इसे इस प्रकार समझाताहूँ। एक पंखेको उदाहरणके रूपमें लीजिए। वह चलसकताहै या स्थिर रहसकताहै। वह अपनी गति भी बदलसकताहै। लेकिन यह सब तभी संभवहै जब कोई स्विच ऑन या ऑफ करे, या रेग्युलेटर घुमाए। अपनेआप वह कुछभी नहीं करसकताहै। यह स्वतंत्र इच्छाके पूर्ण अभावका स्पष्ट उदाहरणहै। अब एक पशुको देखिए। वहभी चलताहै, खाताहै, साथी खोजताहै, और बहुतकुछ करताहै। वहाँ कोई भौतिक स्विच नहीं होताजो उसे ऐसा करनेकेलिए प्रेरित करे। वह पशु अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों या अपने मस्तिष्क और शरीरमें स्रवित होनेवाले "रसायनों"द्वारा संचालित होताहै। उस सीमाके भीतर वह स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करताहै। अर्थात, उसमें "स्वतंत्र इच्छा"का एक सीमित रूप मौजूदहै। अब मनुष्योंका उदाहरण लेतेहैं। यद्यपि हममेंसे बहुतसे लोग अभीभी प्रवृत्तियोंद्वारा संचालित होतेहैं, फिरभी हम उन प्रवृत्तियोंसे ऊपर उठकर अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करसकतेहैं। जब हमें भूख लगतीहै, तो हम किसी कुत्तेकी तरह भोजनपर टूट नहीं पड़ते। बल्कि हम सोचतेहैं कि हमारे सामने रखा भोजन खाना उचितहै या नहीं। हमारे निर्णयको अनेक बातें नियंत्रित करतीहैं — क्या वह भोजन हमारा है?, क्या यह खानेका सही समयहै?, क्या वह भोजन हमारे स्वास्थ्यकेलिए अच्छा है?, आदि। हम किसी कार्यमें संलग्न होसकतेहैं, लेकिन हमारी क्रियाएँ पूरीतरह अनियंत्रित नहीं होतीं। उन्हें हमारी नैतिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्यकी चिंता आदि नियंत्रित करतीहैं। इसलिए, यद्यपि हमारेपास स्वतंत्र इच्छा है, हमारेपास आत्म-नियंत्रण भीहै। और यह आत्म-नियंत्रण भी स्वतंत्र इच्छाका ही एक और रूपहै। यह किसी निर्जीव वस्तुको नियंत्रित-करनेवाली भौतिक बाधाओं या निम्न स्तरके जीवोंको संचालित-करनेवाली प्रवृत्तिगत शक्तियोंसे ऊपर उठसकताहै। अब इससेभी आगे बढ़तेहैं। एक संन्यासीको देखिए। वह आध्यात्मिक ज्ञानोदयकी अपनी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेकेलिए अपनी सभी मूलभूत प्रवृत्तियोंसे संघर्ष करताहै, सभी कष्टोंको सहताहै, और अपने चुनेहुए मार्गपर दृढ़तासे चलता रहताहै। क्या वहभी स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित नहीं कररहाहै? लेकिन वहभी किसी अंतिम आध्यात्मिक अवस्थामें विश्वास और उसे प्राप्त-करनेकी तीव्र इच्छासे बँधाहुआहै। इसलिए उसके निर्णयभी पूरीतरह स्वतंत्र नहींहैं। उनके पीछेभी कोई कारण मौजूदहै। आपने ऐसे अनेक धर्मप्रचारकोंके बारेमें सुना होगा जो अपने धर्मका प्रचार-करनेके एकमात्र उद्देश्यसे सभी सांसारिक सुखोंका त्याग करदेतेहैं। वे अपना देश छोड़देतेहैं, किसी अपरिचित देशमें संन्यासी जैसा जीवन चुनतेहैं और अपने मार्गपर लगे रहतेहैं। लेकिन उनमेंसे कुछ, लोगोंकी गरीबी और पीड़ाको देखकर भीतरसे पिघलजातेहैं। वे अपने मूल उद्देश्यको भूलकर बिना किसी धार्मिक एजेंडाके उनकी सेवा-करने लगतेहैं। वे उन सभी कारणोंपर विजय प्राप्त करलेतेहैं जो उन्हें बाँधेहुएथे, और एक स्वयं-निर्धारित निर्णय लेतेहैं। फिरभी, क्या वह निर्णय लेनेकेलिए उन्हें प्रेरित-करनेवाली चीज़ उनके भीतरकी करुणा नहींथी? भारतमें "निष्काम योगियों"की परंपराहै। उनमें नतो कोई स्वार्थ होताहै और न कोई धार्मिक एजेंडा। वे करुणासे भी प्रेरित नहीं होते। वे केवल कर्तव्यकी भावनासे कार्य करतेहैं। यही गहरी कर्तव्य-चेतना उनके चुनेहुए मार्गका कारण बनतीहै। इस प्रकार, इन सभी उदाहरणोंमें, ऊपरसे दिखाई-देनेवाली स्वतंत्र पसंदके पीछे हमेशा कोईनकोई कारण मौजूद रहताहै। क्या आप किसी ऐसे व्यक्तिकी कल्पना करसकतेहैं जो बिना किसी कारणके कुछ करे? शायद यह संभव नहींहै। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बातहै जिसपर शायद आपने ध्यान नहीं दिया। पंखेके मामलेमें कारण भौतिकथा। पशुओंके मामलेमें वह रासायनिकथा। सामान्य मनुष्योंमें वह सामाजिक नियम और स्वीकृत मूल्यहैं। आध्यात्मिक मार्गपर चलनेवालोंकेलिए वह उनकी दृढ़ आस्था है। समाजसेवकोंमें वह करुणा है। और कर्मयोगियोंमें वह गहरी कर्तव्य-भावना है। इन सभीको किसीनकिसी कारणने प्रेरित किया। लेकिन हम देखसकतेहैं कि यह कारण धीरे-धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर बढ़ताजाताहै। दूसरे शब्दोंमें कहेंतो, इन सबकेद्वारा प्रदर्शित स्वतंत्र इच्छा एक जैसी नहींथी। उस इच्छाके पीछेका कारण अलग-अलग स्तरोंपर था। ऐसा लगताहै कि वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्र इच्छाकी अंतिम सीमाके निकट पहुँचतेजारहेहैं, भलेही कोईभी वास्तवमें उस सीमातक न पहुँचपाए। इसलिए, स्वतंत्र इच्छा "है या नहींहै" जैसी कोई बाइनरी चीज़ नहींहै। यह स्वतंत्रताका एक विशाल स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रमके निम्न स्तरपर रहनेवालोंकी स्वतंत्र इच्छा, उच्च स्तरपर रहनेवालोंकी तुलनामें अधिक सीमित होतीहै। फिरभी, वे सभी विभिन्न स्तरोंपर स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करतेहैं। हाँ, यदि इस प्रकार देखा जाए, तो हममेंसे किसीकेपास भी पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" नहींहै। क्योंकि हम सभी कार्य-कारण संबंध के ढाँचेके भीतरही कार्य करतेहैं। उस ढाँचेके भीतर हम सभीकेपास सीमित सीमामें स्वतंत्र इच्छा अवश्यहै। केवल उसका स्तर अलग-अलगहै। यदि इस "स्वतंत्र इच्छा"के स्पेक्ट्रमकी कोई अंतिम सीमाहो, तो वह कैसी होगी? उस सीमापर स्थित अस्तित्वको कार्य-कारण संबंधसे मुक्त होना चाहिए। वह बिना किसी कारणके कार्य करेगा। वह अनियंत्रित "स्वतंत्र इच्छा" प्रदर्शित करेगा। भारतीय दर्शन ऐसी एक संभावनाकी कल्पना करताहै। उपनिषद इसे "आत्मा" कहतेहैं — जो कार्य-कारणके बंधनसे मुक्तहै। केवल उसीकेपास पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" होसकतीहै। सामान्य भाषामें धार्मिक लोग उसे "ईश्वर" कहतेहैं। बाइबिल में ईश्वर बिना किसी कारणके कहताहै — "प्रकाश हो", और प्रकाश होजाताहै। वही सत्ता उपनिषदोंमें कहतीहै — "मैं अनेक होजाऊँ", और वही जगत, जीव-जंतु आदिके रूपमें अनेक होजातीहै। यदि ऐसा कोई अस्तित्वहै, तो केवल वही पूर्ण स्वतंत्र इच्छासे परिपूर्ण होसकताहै। बाकी सबकी स्वतंत्र इच्छा सीमितहै। जैसे-जैसे हम विकसित होतेहैं, इस स्वतंत्रताकी सीमा केवल विस्तृत होतीजातीहै। उस स्वतंत्र इच्छाको कुछ साधारण प्रोब्सके माध्यमसे सिद्ध नहीं कियाजासकताहै। उसे केवल अंतर्दृष्टिके माध्यमसे ही जानाजासकताहै।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;दशकों पहले, Benjamin Libet नामक एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट ने इसे निश्चित-करनेका प्रयास किया। उनके-द्वारा किए-गए प्रयोगोंने उस-समय बहुत बड़ा सनसनीखेज प्रभाव पैदा किया था, और आजभी न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच इस विषयपर चर्चाएँ चलती-रहतीहैं। आख़िर लिबेटने किया क्या था? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया। लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा। स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै। आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया! इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे। इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै। हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं। स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि यदि वे ऐसी किसी चीज़को स्वीकार करलें, तो वह "डिब्बेके भीतरके शैतान" जैसी अवधारणाओंकेलिए रास्ता खोलदेगा। अर्थात, यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारे मनको नियंत्रित-करनेवाली, मस्तिष्कसे परे कोई रहस्यमय शक्ति मौजूदहै। यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारी सभी क्रियाओंके पीछे कोई चेतना या आत्मा है। अर्थात, किसी अभौतिक अस्तित्वको स्वीकार करना। यह विज्ञानके मज़बूत किलेको भेद-देने जैसा होगा। क्योंकि विज्ञान ऐसी किसीभी अवधारणाको स्वीकार नहींकरता। एक दार्शनिककी तरह सोचनेवाला व्यक्ति होनेकेनाते, इस विषयपर मेरा दृष्टिकोण थोड़ा भिन्नहै। मैं स्वतंत्र इच्छाको "है या नहींहै" जैसे बाइनरी रूपमें नहीं देखता। बल्कि मैं इसे संभावनाओंके एक निरंतर क्रम के रूपमें देखताहूँ। इसमें निर्जीव वस्तुएँ, जीव-जंतु, मनुष्य, और इस क्रमकी अंतिम सीमा — सब शामिलहैं। मैं इसे इस प्रकार समझाताहूँ। एक पंखेको उदाहरणके रूपमें लीजिए। वह चलसकताहै या स्थिर रहसकताहै। वह अपनी गति भी बदलसकताहै। लेकिन यह सब तभी संभवहै जब कोई स्विच ऑन या ऑफ करे, या रेग्युलेटर घुमाए। अपनेआप वह कुछभी नहीं करसकताहै। यह स्वतंत्र इच्छाके पूर्ण अभावका स्पष्ट उदाहरणहै। अब एक पशुको देखिए। वहभी चलताहै, खाताहै, साथी खोजताहै, और बहुतकुछ करताहै। वहाँ कोई भौतिक स्विच नहीं होताजो उसे ऐसा करनेकेलिए प्रेरित करे। वह पशु अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों या अपने मस्तिष्क और शरीरमें स्रवित होनेवाले "रसायनों"द्वारा संचालित होताहै। उस सीमाके भीतर वह स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करताहै। अर्थात, उसमें "स्वतंत्र इच्छा"का एक सीमित रूप मौजूदहै। अब मनुष्योंका उदाहरण लेतेहैं। यद्यपि हममेंसे बहुतसे लोग अभीभी प्रवृत्तियोंद्वारा संचालित होतेहैं, फिरभी हम उन प्रवृत्तियोंसे ऊपर उठकर अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करसकतेहैं। जब हमें भूख लगतीहै, तो हम किसी कुत्तेकी तरह भोजनपर टूट नहीं पड़ते। बल्कि हम सोचतेहैं कि हमारे सामने रखा भोजन खाना उचितहै या नहीं। हमारे निर्णयको अनेक बातें नियंत्रित करतीहैं — क्या वह भोजन हमारा है?, क्या यह खानेका सही समयहै?, क्या वह भोजन हमारे स्वास्थ्यकेलिए अच्छा है?, आदि। हम किसी कार्यमें संलग्न होसकतेहैं, लेकिन हमारी क्रियाएँ पूरीतरह अनियंत्रित नहीं होतीं। उन्हें हमारी नैतिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्यकी चिंता आदि नियंत्रित करतीहैं। इसलिए, यद्यपि हमारेपास स्वतंत्र इच्छा है, हमारेपास आत्म-नियंत्रण भीहै। और यह आत्म-नियंत्रण भी स्वतंत्र इच्छाका ही एक और रूपहै। यह किसी निर्जीव वस्तुको नियंत्रित-करनेवाली भौतिक बाधाओं या निम्न स्तरके जीवोंको संचालित-करनेवाली प्रवृत्तिगत शक्तियोंसे ऊपर उठसकताहै। अब इससेभी आगे बढ़तेहैं। एक संन्यासीको देखिए। वह आध्यात्मिक ज्ञानोदयकी अपनी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेकेलिए अपनी सभी मूलभूत प्रवृत्तियोंसे संघर्ष करताहै, सभी कष्टोंको सहताहै, और अपने चुनेहुए मार्गपर दृढ़तासे चलता रहताहै। क्या वहभी स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित नहीं कररहाहै? लेकिन वहभी किसी अंतिम आध्यात्मिक अवस्थामें विश्वास और उसे प्राप्त-करनेकी तीव्र इच्छासे बँधाहुआहै। इसलिए उसके निर्णयभी पूरीतरह स्वतंत्र नहींहैं। उनके पीछेभी कोई कारण मौजूदहै। आपने ऐसे अनेक धर्मप्रचारकोंके बारेमें सुना होगा जो अपने धर्मका प्रचार-करनेके एकमात्र उद्देश्यसे सभी सांसारिक सुखोंका त्याग करदेतेहैं। वे अपना देश छोड़देतेहैं, किसी अपरिचित देशमें संन्यासी जैसा जीवन चुनतेहैं और अपने मार्गपर लगे रहतेहैं। लेकिन उनमेंसे कुछ, लोगोंकी गरीबी और पीड़ाको देखकर भीतरसे पिघलजातेहैं। वे अपने मूल उद्देश्यको भूलकर बिना किसी धार्मिक एजेंडाके उनकी सेवा-करने लगतेहैं। वे उन सभी कारणोंपर विजय प्राप्त करलेतेहैं जो उन्हें बाँधेहुएथे, और एक स्वयं-निर्धारित निर्णय लेतेहैं। फिरभी, क्या वह निर्णय लेनेकेलिए उन्हें प्रेरित-करनेवाली चीज़ उनके भीतरकी करुणा नहींथी? भारतमें "निष्काम योगियों"की परंपराहै। उनमें नतो कोई स्वार्थ होताहै और न कोई धार्मिक एजेंडा। वे करुणासे भी प्रेरित नहीं होते। वे केवल कर्तव्यकी भावनासे कार्य करतेहैं। यही गहरी कर्तव्य-चेतना उनके चुनेहुए मार्गका कारण बनतीहै। इस प्रकार, इन सभी उदाहरणोंमें, ऊपरसे दिखाई-देनेवाली स्वतंत्र पसंदके पीछे हमेशा कोईनकोई कारण मौजूद रहताहै। क्या आप किसी ऐसे व्यक्तिकी कल्पना करसकतेहैं जो बिना किसी कारणके कुछ करे? शायद यह संभव नहींहै। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बातहै जिसपर शायद आपने ध्यान नहीं दिया। पंखेके मामलेमें कारण भौतिकथा। पशुओंके मामलेमें वह रासायनिकथा। सामान्य मनुष्योंमें वह सामाजिक नियम और स्वीकृत मूल्यहैं। आध्यात्मिक मार्गपर चलनेवालोंकेलिए वह उनकी दृढ़ आस्था है। समाजसेवकोंमें वह करुणा है। और कर्मयोगियोंमें वह गहरी कर्तव्य-भावना है। इन सभीको किसीनकिसी कारणने प्रेरित किया। लेकिन हम देखसकतेहैं कि यह कारण धीरे-धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर बढ़ताजाताहै। दूसरे शब्दोंमें कहेंतो, इन सबकेद्वारा प्रदर्शित स्वतंत्र इच्छा एक जैसी नहींथी। उस इच्छाके पीछेका कारण अलग-अलग स्तरोंपर था। ऐसा लगताहै कि वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्र इच्छाकी अंतिम सीमाके निकट पहुँचतेजारहेहैं, भलेही कोईभी वास्तवमें उस सीमातक न पहुँचपाए। इसलिए, स्वतंत्र इच्छा "है या नहींहै" जैसी कोई बाइनरी चीज़ नहींहै। यह स्वतंत्रताका एक विशाल स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रमके निम्न स्तरपर रहनेवालोंकी स्वतंत्र इच्छा, उच्च स्तरपर रहनेवालोंकी तुलनामें अधिक सीमित होतीहै। फिरभी, वे सभी विभिन्न स्तरोंपर स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करतेहैं। हाँ, यदि इस प्रकार देखा जाए, तो हममेंसे किसीकेपास भी पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" नहींहै। क्योंकि हम सभी कार्य-कारण संबंध के ढाँचेके भीतरही कार्य करतेहैं। उस ढाँचेके भीतर हम सभीकेपास सीमित सीमामें स्वतंत्र इच्छा अवश्यहै। केवल उसका स्तर अलग-अलगहै। यदि इस "स्वतंत्र इच्छा"के स्पेक्ट्रमकी कोई अंतिम सीमाहो, तो वह कैसी होगी? उस सीमापर स्थित अस्तित्वको कार्य-कारण संबंधसे मुक्त होना चाहिए। वह बिना किसी कारणके कार्य करेगा। वह अनियंत्रित "स्वतंत्र इच्छा" प्रदर्शित करेगा। भारतीय दर्शन ऐसी एक संभावनाकी कल्पना करताहै। उपनिषद इसे "आत्मा" कहतेहैं — जो कार्य-कारणके बंधनसे मुक्तहै। केवल उसीकेपास पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" होसकतीहै। सामान्य भाषामें धार्मिक लोग उसे "ईश्वर" कहतेहैं। बाइबिल में ईश्वर बिना किसी कारणके कहताहै — "प्रकाश हो", और प्रकाश होजाताहै। वही सत्ता उपनिषदोंमें कहतीहै — "मैं अनेक होजाऊँ", और वही जगत, जीव-जंतु आदिके रूपमें अनेक होजातीहै। यदि ऐसा कोई अस्तित्वहै, तो केवल वही पूर्ण स्वतंत्र इच्छासे परिपूर्ण होसकताहै। बाकी सबकी स्वतंत्र इच्छा सीमितहै। जैसे-जैसे हम विकसित होतेहैं, इस स्वतंत्रताकी सीमा केवल विस्तृत होतीजातीहै। उस स्वतंत्र इच्छाको कुछ साधारण प्रोब्सके माध्यमसे सिद्ध नहीं कियाजासकताहै। उसे केवल अंतर्दृष्टिके माध्यमसे ही जानाजासकताहै।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#audiobook, #Hindi, #mystery, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  आपका जन्म ही आपकी किस्मत नहीं बनजाना चाहिए, हैना?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi_0607575977.html</link><category>#Caste</category><category>#harmoney</category><category>#Hindi</category><category>#peace</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Fri, 22 May 2026 19:51:24 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-5418306733392114506</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;/script&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;असल दुनिया में — चाहे आप न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो या नई दिल्ली में हों — यह दौड़ इतनी न्यायपूर्ण नहीं होती। दौड़ शुरू होनेसे पहले ही कुछ लोग 50 मीटर के निशान पर खड़े होते हैं, जबकि कुछ लोगोंको शुरुआती रेखा से 20 मीटर पीछे से शुरुआत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;आप शायद समझ ही गए होंगे कि मैं किस दौड़ की बात कररहा हूँ। यह है सामाजिक असमानता की दौड़।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दशकों से दुनिया भर के समाज इसे सुधारने की कोशिश कररहे हैं। अमेरिका जैसे देशों में "अफर्मेटिव एक्शन", यूरोप में "सामाजिक विविधता कोटा", और एशिया में "आरक्षण व्यवस्था" के माध्यम से इस असमानता को मिटाने के प्रयास लगातार होतेरहे हैं।&lt;br /&gt;ये सभी अच्छे इरादों वाले प्रयास थे। लेकिन हमें ईमानदारी से एक बात स्वीकार करनी होगी: वर्तमान व्यवस्थाएँ पूरी तरह असफल होचुकी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असमानता को समाप्त करने के बजाय, ये राजनीतिक युद्धभूमियाँ बनचुकी हैं। ये ऐसे राजनीतिक फुटबॉल खेल बनगए हैं, जिनका उपयोग नेता चुनाव जीतने और अपने वोट-बैंक सुरक्षित करने केलिए करते हैं। लेकिन असली समस्या वहीं की वहीं बनी हुई है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और बढ़ती जारही है।&lt;br /&gt;जिस पुरानी व्यवस्था का हम अभी उपयोग कररहे हैं, उसमें दो बड़ी खामियाँ हैं जिन्हें हर कोई देख सकता है, लेकिन जिनके बारे में खुलकर बात करना कोई पसंद नहीं करता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• पहली बात, यह व्यवस्था बहुत अधिक सरलीकृत और केवल दिखावटी है। यह मानकर चलती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष सामाजिक वर्ग या जाति से है, तो वह निश्चित रूपसे वंचित होगा। लेकिन हम सब जानते हैं कि लंदन के आलीशान निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर "निम्नवर्गीय परिवार" भी हैं, और ऐसे गरीब "उच्चवर्गीय परिवार" भी हैं जिनके बच्चे सचमुच भूख से पीड़ित हैं। जब कोई अमीर बच्चा गरीबों केलिए आरक्षित सुविधा का लाभ लेता है, तो वह उसी समुदाय के किसी वास्तव में ज़रूरतमंद बच्चे से अवसर "छीनने" जैसा होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• दूसरी बात, हमारे राजनीतिक समाधान समय के साथ जमजाते हैं। एक बार कोई कानून या नीति बनादी जाए, तो वह मिटाई न जासकने वाली रेखा बनजाती है। यह व्यवस्था कभी यह नहीं देखती कि पिछले कुछ दशकों में कोई समुदाय वास्तव में आगे बढ़ा है या नहीं; यह उस मरीज़ को दवा देती रहती है जो शायद पहले ही ठीक होचुका हो, जबकि उसके बगल में मररहे व्यक्ति को दवा तक नहीं मिलती।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;हमें यह पूछना बंद करना होगा कि, "आप किस जाति या समुदाय से हैं?" इसके बजाय हमें यह पूछना शुरू करना होगा कि, "आपके संघर्ष का रास्ता कैसा था?" हमें राजनीति से ऊपर उठकर न्यायपूर्ण अवसरों की ओर बढ़ना होगा।&lt;br /&gt;और यह राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि एक पारदर्शी एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था से संभव होसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझने केलिए कि क्या ऐसी व्यवस्था वास्तव में काम करसकती है, आइए भारत जैसे देश का उदाहरण लें। इस विचार केलिए भारत शायद सबसे उपयुक्त प्रयोगशाला है। क्योंकि:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• भारत दुनिया की सबसे जटिल और गहराई से जड़ जमाए सामाजिक श्रेणी व्यवस्थाओं में से एक का सामना कररहा है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• लेकिन भारत के पास एक बहुत बड़ा लाभ भी है: ऐसी व्यवस्था को लागू करने केलिए आवश्यक डिजिटल आधारभूत संरचना पहलेसे ही मौजूद है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;भारत पिछले सत्तर से अधिक वर्षों से सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था चलारहा है। लेकिन शोषित समुदायों के भीतर के ही संपन्न वर्ग अधिकांश लाभ लेरहे हैं, जबकि दूर-दराज़ के गाँवों में रहने वाले सबसे गरीब लोग आज भी वंचित हैं।&lt;br /&gt;फिर भी, किसी भी राजनेता केलिए किसी समुदाय को आरक्षण सूची से हटाना लगभग राजनीतिक आत्महत्या के समान है। इसलिए पूरी व्यवस्था ठहरचुकी है।&lt;br /&gt;अब भारत की आधुनिक डिजिटल संरचना पर एक नज़र डालिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• भारत ने बायोमेट्रिक आधारित नागरिक पहचान प्रणाली लागू की है। आपके मोबाइल फोन से लेकर आपके बैंक खाते तक, सबकुछ उस पहचान से जुड़ा हुआ है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• स्कूलों और कॉलेजों के पूरी तरह डिजिटाइज़्ड शैक्षणिक रिकॉर्ड अब सामान्य होतेजारहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• एक बड़े स्तर पर ट्रैक की जासकने वाली डिजिटल भुगतान व्यवस्था पहलेसे मौजूद है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• और नागरिक पहचान से जुड़ा विशाल आयकर डेटा नेटवर्क भी उपलब्ध है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;दूसरे शब्दों में कहें तो, ज़रूरी डेटा पहलेसे ही मौजूद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कोई बैंक केवल पाँच सेकंड में किसी व्यक्ति के डिजिटल रिकॉर्ड देखकर यह तय करसकता है कि उसे 50,000 का ऋण दियाजाए या नहीं, तो फिर हम कॉलेज की सीट या नौकरी केलिए यह तय करने हेतु एआई आधारित अल्गोरिद्म का उपयोग क्यों न करें कि किसे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाति प्रमाणपत्र की जगह, यह न्यायपूर्ण व्यवस्था लगातार बदलते रहने वाले "सामाजिक स्थिति अंक" की गणना करेगी। इसे एक क्रेडिट स्कोर की तरह समझिए — लेकिन यह केवल जन्म रिकॉर्ड देखने के बजाय, उन वास्तविक बाधाओं को मापेगा जिन्हें किसी व्यक्ति ने जीवन में पार किया है।&lt;br /&gt;इस व्यवस्था में एआई कमसेकम चार सरल सिद्धांतों के आधार पर इस दौड़ की न्यायपूर्णता तय करसकता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• संघर्ष का मार्ग. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता पहले ही आरक्षण का उपयोग करके उच्च सरकारी पद या सुविधाएँ प्राप्त करचुके हैं, तो उस व्यक्ति का अपना स्कोर कम होजाएगा। उस परिवार को आवश्यक सहायता पहले ही मिलचुकी है; अब उसे पीछे हटकर किसी दूर-दराज़ गाँव के प्रथम पीढ़ी के छात्र केलिए जगह बनानी चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• माता-पिता की पृष्ठभूमि. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता डॉक्टर या अन्य उच्च-कौशल वाले पेशेवर हैं, तो वह बच्चा तुलनात्मक रूपसे अधिक सशक्त होगा। उसके घर में पढ़ाई का वातावरण, सही मार्गदर्शन और प्रभावशाली लोगों से परिचय होगा। लेकिन अशिक्षित माता-पिता का बच्चा जीवन की दौड़ में पीछे से शुरुआत करता है। उस अंतर को संतुलित करने केलिए एआई ऐसे बच्चे को अधिक अंक देगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• वह वातावरण जिसमें व्यक्ति बड़ा हुआ. — क्या बच्चा दक्षिण मुंबई के किसी आलीशान स्कूल में पढ़ा? या ग्रामीण बिहार के टीन की छत वाले स्कूल में? क्या उसके पास हाई-स्पीड इंटरनेट या महँगी कोचिंग क्लासों की सुविधा थी? यदि नहीं, तो एआई यह समझेगा कि गाँव के बच्चे के 80% अंक, शहर के उस बच्चे के 95% अंकों से कहीं अधिक मूल्यवान होसकते हैं जिसके पास हर सुविधा उपलब्ध थी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• ऐतिहासिक बोझ. — यदि उस बच्चे के समुदाय के साथ ऐतिहासिक रूपसे अछूतों या शोषितों जैसा व्यवहार कियागया हो, तो वह एक गहरी मानसिक और सामाजिक दीवार पैदा करता है। एआई ऐसे पृष्ठभूमि केलिए अतिरिक्त अंक सुरक्षित रखेगा — लेकिन जैसे-जैसे दशकों के साथ उस समुदाय की शिक्षा और जीवन स्तर सुधरते जाएँगे, वैसे-वैसे ये अतिरिक्त अंक धीरे-धीरे कम होतेजाएँगे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;यह केवल एक सरल व्याख्या है। वास्तविक एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था इससे कहीं अधिक जटिल होसकती है। लेकिन यह असंभव नहीं है।&lt;br /&gt;और यह समाधान केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह पूरी दुनिया केलिए एक मॉडल बनसकता है। इस व्यवस्था का एआई आधारित ढाँचा लगभग हर जगह समान रहेगा। केवल डेटा और प्राथमिकताएँ हर देश की परिस्थितियों के अनुसार बदलेंगी।&lt;br /&gt;यदि इस मॉडल को अलग-अलग देशों में लागू कियाजाए, तो यह वहाँ की वास्तविकताओं के अनुसार अपने-आप ढलजाएगा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अमेरिका में यह एआई आधारित व्यवस्था जाति और नस्ल पर आधारित राजनीतिक संघर्षों से आगे बढ़ेगी। यह मैनहैटन के सबसे महँगे निजी स्कूलों में पढ़े छात्र और वेस्ट वर्जीनिया या मिसिसिपी डेल्टा के गरीब ग्रामीण स्कूल में पढ़े छात्र के बीच का अंतर पहचानसकेगी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• पश्चिमी यूरोप में मुख्य समस्या वर्गभेद और प्रवासियों की स्थिति है। यह एआई आधारित व्यवस्था वहाँ के क्षेत्रीय और शैक्षणिक डेटाबेस का उपयोग करेगी। यह पेरिस, लंदन या मैड्रिड की प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्रों और उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्रों या प्रवासी बस्तियों में बड़े होरहे छात्रों के बीच की दूरी को अपने-आप संतुलित करेगी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब आता है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा — वह आश्चर्यजनक "आहा!" क्षण। यह वह सत्य है जो आरक्षण का समर्थन करने वालों और विरोध करने वालों, दोनों को समझासकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव या राजनीति द्वारा संचालित कोटा व्यवस्थाएँ ऐसे बहते हुए नल की तरह हैं जिन्हें एक बार चालू करदिया जाए, तो राजनीतिक कारणों से वे कभी बंद नहीं होते। लेकिन यह एआई संचालित व्यवस्था स्वभाव से ही एक "स्वयं-विलय" (Self-Dissolving) व्यवस्था है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे यह अल्गोरिद्म योग्य लोगों की सही पहचान करता है, उन्हें प्राथमिकता अंक देता है और समाज की मुख्यधारा में लाता है, वैसे-वैसे व्यवस्था में आने वाला डेटा स्वयं बदलने लगता है। जब डेटा यह दिखाने लगता है कि किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय के बच्चे दूसरों की तरह ही शिक्षा प्राप्त कररहे हैं, कमाई कररहे हैं और आर्थिक रूपसे सशक्त बनरहे हैं, तब एआई अपने-आप उन्हें "प्राथमिकता अंक" देना बंद करदेता है।&lt;br /&gt;इस परिवर्तन केलिए संसद में किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आवश्यकता नहीं होगी। किसी सामाजिक आंदोलन या हड़ताल की भी ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यवस्था अपनी ही सफलता के माध्यम से अपनी आवश्यकता को शांतिपूर्वक समाप्त करदेगी।&lt;br /&gt;अंततः, हर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति अंक एक समान स्तर की ओर आने लगेंगे। जब जन्म किसी का भविष्य तय करना बंद करदेगा, तब ये प्राथमिकता अंक स्वाभाविक रूपसे शून्य तक पहुँचजाएँगे। राजनेताओं को कोटा समाप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी — वे गणितीय दृष्टि से अपने-आप अर्थहीन होजाएँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपसंहार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे पास डेटा है, और हमारे पास इसे करने में सक्षम एआई तकनीक भी है। यदि हम एक "एआई आधारित ओपन-सोर्स अल्गोरिद्म" का निर्णय लें — जहाँ किसी गोपनीयता का डर न हो और जिसका कोड हर व्यक्ति केलिए ऑनलाइन दिखाई दे — तब पारदर्शी गणित वह न्याय करसकता है जिसे करने से राजनेता इनकार करते हैं।&lt;br /&gt;हमें ऐसी समाज बनना बंद करना होगा जो केवल यह सोचता रहे कि हमारे पूर्वज कौन थे, और ऐसी समाज बनना होगा जो यह देखे कि हमारे बच्चे क्या बनसकते हैं। आइए, लड़ना बंद करें। और इस एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था का उपयोग करके उस प्रतिभा को सहारा दें — चाहे वह इस धरती पर कहीं भी जन्मी हो — ताकि वह चमकसके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समापन के शब्द&lt;br /&gt;सिर्फ इसलिए कि मैंने यह सब कहा है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह दावा कररहा हूँ कि यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" पूरी तरह दोषरहित है। मैं भी जानता हूँ कि इसमें कई चुनौतियाँ हैं।&lt;br /&gt;यदि लोग व्यवस्थित रूपसे अपना डेटा छिपाकर अल्गोरिद्म को धोखा देने लगें तो क्या होगा? या यदि इस व्यवस्था का कोड लिखने वाला इंसान अपने निजी पूर्वाग्रह उसमें डालदे तो? ये सभी गंभीर प्रश्न हैं जिनपर निश्चित रूपसे गहराई से विचार कियाजाना चाहिए।&lt;br /&gt;लेकिन मेरा तर्क केवल इतना है: वर्तमान व्यवस्था, जो आज हमारी आँखों के सामने है, पूरी तरह जड़ होचुकी है और राजनीति की कीचड़ में फँस गई है। उससे चिपके रहकर हमेशा लड़ते रहने के बजाय, हमें एक नए रास्ते के बारे में सोचना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" शायद कोई पूर्ण और अंतिम समाधान न हो, लेकिन परिवर्तन की दिशा में उठाया जाने वाला यह निश्चित रूपसे सबसे अच्छा पहला कदम होसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, पुरानी दीवारों को लेकर लड़ना बंद करें और भविष्य के बच्चों केलिए न्याय की एक नई नींव बनाने पर चर्चा शुरू करें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
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&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="audio/mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/pumntu58i91q8247qpyf7/03.mp3?rlkey=ihi7ws40w55uypeiknb57ap7n&amp;st=4pwfelj1&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhQvzWVqy-b-WhUypUsfKMaph1BqcCZs3N1djL4OygVmWVwlN2nlSy1vvFeTl5TKf8nuwLl4KicSg2AQ8_kiRMpjqv1fjy0YZGh8hNlEbHK5oHDybxforXOAZflDv2RXRATEictfefjIWpZb1Sim7_MatMaKz0e5BgPPQvBgReMauHPzY3athmZJuZH048/s72-w640-h640-c/fairness.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आइए, एक सरल उदाहरण से अपनी चर्चा शुरू करें। कल्पना कीजिए एक 100 मीटर की दौड़ की। एक न्यायपूर्ण दुनिया में, हर व्यक्ति शून्य मीटर की रेखा पर खड़ा होता है। स्टार्टिंग पिस्टल चलती है, सीटी बजती है, और जो सबसे तेज़ दौड़ता है वही जीतता है। सरल है, हैना? लेकिन दुर्भाग्य से हम ऐसी दुनिया में नहीं रहते। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); असल दुनिया में — चाहे आप न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो या नई दिल्ली में हों — यह दौड़ इतनी न्यायपूर्ण नहीं होती। दौड़ शुरू होनेसे पहले ही कुछ लोग 50 मीटर के निशान पर खड़े होते हैं, जबकि कुछ लोगोंको शुरुआती रेखा से 20 मीटर पीछे से शुरुआत करनी पड़ती है। आप शायद समझ ही गए होंगे कि मैं किस दौड़ की बात कररहा हूँ। यह है सामाजिक असमानता की दौड़। दशकों से दुनिया भर के समाज इसे सुधारने की कोशिश कररहे हैं। अमेरिका जैसे देशों में "अफर्मेटिव एक्शन", यूरोप में "सामाजिक विविधता कोटा", और एशिया में "आरक्षण व्यवस्था" के माध्यम से इस असमानता को मिटाने के प्रयास लगातार होतेरहे हैं। ये सभी अच्छे इरादों वाले प्रयास थे। लेकिन हमें ईमानदारी से एक बात स्वीकार करनी होगी: वर्तमान व्यवस्थाएँ पूरी तरह असफल होचुकी हैं। असमानता को समाप्त करने के बजाय, ये राजनीतिक युद्धभूमियाँ बनचुकी हैं। ये ऐसे राजनीतिक फुटबॉल खेल बनगए हैं, जिनका उपयोग नेता चुनाव जीतने और अपने वोट-बैंक सुरक्षित करने केलिए करते हैं। लेकिन असली समस्या वहीं की वहीं बनी हुई है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और बढ़ती जारही है। जिस पुरानी व्यवस्था का हम अभी उपयोग कररहे हैं, उसमें दो बड़ी खामियाँ हैं जिन्हें हर कोई देख सकता है, लेकिन जिनके बारे में खुलकर बात करना कोई पसंद नहीं करता। • पहली बात, यह व्यवस्था बहुत अधिक सरलीकृत और केवल दिखावटी है। यह मानकर चलती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष सामाजिक वर्ग या जाति से है, तो वह निश्चित रूपसे वंचित होगा। लेकिन हम सब जानते हैं कि लंदन के आलीशान निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर "निम्नवर्गीय परिवार" भी हैं, और ऐसे गरीब "उच्चवर्गीय परिवार" भी हैं जिनके बच्चे सचमुच भूख से पीड़ित हैं। जब कोई अमीर बच्चा गरीबों केलिए आरक्षित सुविधा का लाभ लेता है, तो वह उसी समुदाय के किसी वास्तव में ज़रूरतमंद बच्चे से अवसर "छीनने" जैसा होता है। • दूसरी बात, हमारे राजनीतिक समाधान समय के साथ जमजाते हैं। एक बार कोई कानून या नीति बनादी जाए, तो वह मिटाई न जासकने वाली रेखा बनजाती है। यह व्यवस्था कभी यह नहीं देखती कि पिछले कुछ दशकों में कोई समुदाय वास्तव में आगे बढ़ा है या नहीं; यह उस मरीज़ को दवा देती रहती है जो शायद पहले ही ठीक होचुका हो, जबकि उसके बगल में मररहे व्यक्ति को दवा तक नहीं मिलती। हमें यह पूछना बंद करना होगा कि, "आप किस जाति या समुदाय से हैं?" इसके बजाय हमें यह पूछना शुरू करना होगा कि, "आपके संघर्ष का रास्ता कैसा था?" हमें राजनीति से ऊपर उठकर न्यायपूर्ण अवसरों की ओर बढ़ना होगा। और यह राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि एक पारदर्शी एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था से संभव होसकता है। यह समझने केलिए कि क्या ऐसी व्यवस्था वास्तव में काम करसकती है, आइए भारत जैसे देश का उदाहरण लें। इस विचार केलिए भारत शायद सबसे उपयुक्त प्रयोगशाला है। क्योंकि: • भारत दुनिया की सबसे जटिल और गहराई से जड़ जमाए सामाजिक श्रेणी व्यवस्थाओं में से एक का सामना कररहा है। • लेकिन भारत के पास एक बहुत बड़ा लाभ भी है: ऐसी व्यवस्था को लागू करने केलिए आवश्यक डिजिटल आधारभूत संरचना पहलेसे ही मौजूद है। भारत पिछले सत्तर से अधिक वर्षों से सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था चलारहा है। लेकिन शोषित समुदायों के भीतर के ही संपन्न वर्ग अधिकांश लाभ लेरहे हैं, जबकि दूर-दराज़ के गाँवों में रहने वाले सबसे गरीब लोग आज भी वंचित हैं। फिर भी, किसी भी राजनेता केलिए किसी समुदाय को आरक्षण सूची से हटाना लगभग राजनीतिक आत्महत्या के समान है। इसलिए पूरी व्यवस्था ठहरचुकी है। अब भारत की आधुनिक डिजिटल संरचना पर एक नज़र डालिए। • भारत ने बायोमेट्रिक आधारित नागरिक पहचान प्रणाली लागू की है। आपके मोबाइल फोन से लेकर आपके बैंक खाते तक, सबकुछ उस पहचान से जुड़ा हुआ है। • स्कूलों और कॉलेजों के पूरी तरह डिजिटाइज़्ड शैक्षणिक रिकॉर्ड अब सामान्य होतेजारहे हैं। • एक बड़े स्तर पर ट्रैक की जासकने वाली डिजिटल भुगतान व्यवस्था पहलेसे मौजूद है। • और नागरिक पहचान से जुड़ा विशाल आयकर डेटा नेटवर्क भी उपलब्ध है। दूसरे शब्दों में कहें तो, ज़रूरी डेटा पहलेसे ही मौजूद है। यदि कोई बैंक केवल पाँच सेकंड में किसी व्यक्ति के डिजिटल रिकॉर्ड देखकर यह तय करसकता है कि उसे 50,000 का ऋण दियाजाए या नहीं, तो फिर हम कॉलेज की सीट या नौकरी केलिए यह तय करने हेतु एआई आधारित अल्गोरिद्म का उपयोग क्यों न करें कि किसे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है? जाति प्रमाणपत्र की जगह, यह न्यायपूर्ण व्यवस्था लगातार बदलते रहने वाले "सामाजिक स्थिति अंक" की गणना करेगी। इसे एक क्रेडिट स्कोर की तरह समझिए — लेकिन यह केवल जन्म रिकॉर्ड देखने के बजाय, उन वास्तविक बाधाओं को मापेगा जिन्हें किसी व्यक्ति ने जीवन में पार किया है। इस व्यवस्था में एआई कमसेकम चार सरल सिद्धांतों के आधार पर इस दौड़ की न्यायपूर्णता तय करसकता है: • संघर्ष का मार्ग. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता पहले ही आरक्षण का उपयोग करके उच्च सरकारी पद या सुविधाएँ प्राप्त करचुके हैं, तो उस व्यक्ति का अपना स्कोर कम होजाएगा। उस परिवार को आवश्यक सहायता पहले ही मिलचुकी है; अब उसे पीछे हटकर किसी दूर-दराज़ गाँव के प्रथम पीढ़ी के छात्र केलिए जगह बनानी चाहिए। • माता-पिता की पृष्ठभूमि. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता डॉक्टर या अन्य उच्च-कौशल वाले पेशेवर हैं, तो वह बच्चा तुलनात्मक रूपसे अधिक सशक्त होगा। उसके घर में पढ़ाई का वातावरण, सही मार्गदर्शन और प्रभावशाली लोगों से परिचय होगा। लेकिन अशिक्षित माता-पिता का बच्चा जीवन की दौड़ में पीछे से शुरुआत करता है। उस अंतर को संतुलित करने केलिए एआई ऐसे बच्चे को अधिक अंक देगा। • वह वातावरण जिसमें व्यक्ति बड़ा हुआ. — क्या बच्चा दक्षिण मुंबई के किसी आलीशान स्कूल में पढ़ा? या ग्रामीण बिहार के टीन की छत वाले स्कूल में? क्या उसके पास हाई-स्पीड इंटरनेट या महँगी कोचिंग क्लासों की सुविधा थी? यदि नहीं, तो एआई यह समझेगा कि गाँव के बच्चे के 80% अंक, शहर के उस बच्चे के 95% अंकों से कहीं अधिक मूल्यवान होसकते हैं जिसके पास हर सुविधा उपलब्ध थी। • ऐतिहासिक बोझ. — यदि उस बच्चे के समुदाय के साथ ऐतिहासिक रूपसे अछूतों या शोषितों जैसा व्यवहार कियागया हो, तो वह एक गहरी मानसिक और सामाजिक दीवार पैदा करता है। एआई ऐसे पृष्ठभूमि केलिए अतिरिक्त अंक सुरक्षित रखेगा — लेकिन जैसे-जैसे दशकों के साथ उस समुदाय की शिक्षा और जीवन स्तर सुधरते जाएँगे, वैसे-वैसे ये अतिरिक्त अंक धीरे-धीरे कम होतेजाएँगे। यह केवल एक सरल व्याख्या है। वास्तविक एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था इससे कहीं अधिक जटिल होसकती है। लेकिन यह असंभव नहीं है। और यह समाधान केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह पूरी दुनिया केलिए एक मॉडल बनसकता है। इस व्यवस्था का एआई आधारित ढाँचा लगभग हर जगह समान रहेगा। केवल डेटा और प्राथमिकताएँ हर देश की परिस्थितियों के अनुसार बदलेंगी। यदि इस मॉडल को अलग-अलग देशों में लागू कियाजाए, तो यह वहाँ की वास्तविकताओं के अनुसार अपने-आप ढलजाएगा: • अमेरिका में यह एआई आधारित व्यवस्था जाति और नस्ल पर आधारित राजनीतिक संघर्षों से आगे बढ़ेगी। यह मैनहैटन के सबसे महँगे निजी स्कूलों में पढ़े छात्र और वेस्ट वर्जीनिया या मिसिसिपी डेल्टा के गरीब ग्रामीण स्कूल में पढ़े छात्र के बीच का अंतर पहचानसकेगी। • पश्चिमी यूरोप में मुख्य समस्या वर्गभेद और प्रवासियों की स्थिति है। यह एआई आधारित व्यवस्था वहाँ के क्षेत्रीय और शैक्षणिक डेटाबेस का उपयोग करेगी। यह पेरिस, लंदन या मैड्रिड की प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्रों और उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्रों या प्रवासी बस्तियों में बड़े होरहे छात्रों के बीच की दूरी को अपने-आप संतुलित करेगी। लेकिन अब आता है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा — वह आश्चर्यजनक "आहा!" क्षण। यह वह सत्य है जो आरक्षण का समर्थन करने वालों और विरोध करने वालों, दोनों को समझासकता है। मानव या राजनीति द्वारा संचालित कोटा व्यवस्थाएँ ऐसे बहते हुए नल की तरह हैं जिन्हें एक बार चालू करदिया जाए, तो राजनीतिक कारणों से वे कभी बंद नहीं होते। लेकिन यह एआई संचालित व्यवस्था स्वभाव से ही एक "स्वयं-विलय" (Self-Dissolving) व्यवस्था है। जैसे-जैसे यह अल्गोरिद्म योग्य लोगों की सही पहचान करता है, उन्हें प्राथमिकता अंक देता है और समाज की मुख्यधारा में लाता है, वैसे-वैसे व्यवस्था में आने वाला डेटा स्वयं बदलने लगता है। जब डेटा यह दिखाने लगता है कि किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय के बच्चे दूसरों की तरह ही शिक्षा प्राप्त कररहे हैं, कमाई कररहे हैं और आर्थिक रूपसे सशक्त बनरहे हैं, तब एआई अपने-आप उन्हें "प्राथमिकता अंक" देना बंद करदेता है। इस परिवर्तन केलिए संसद में किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आवश्यकता नहीं होगी। किसी सामाजिक आंदोलन या हड़ताल की भी ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यवस्था अपनी ही सफलता के माध्यम से अपनी आवश्यकता को शांतिपूर्वक समाप्त करदेगी। अंततः, हर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति अंक एक समान स्तर की ओर आने लगेंगे। जब जन्म किसी का भविष्य तय करना बंद करदेगा, तब ये प्राथमिकता अंक स्वाभाविक रूपसे शून्य तक पहुँचजाएँगे। राजनेताओं को कोटा समाप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी — वे गणितीय दृष्टि से अपने-आप अर्थहीन होजाएँगे। उपसंहार. हमारे पास डेटा है, और हमारे पास इसे करने में सक्षम एआई तकनीक भी है। यदि हम एक "एआई आधारित ओपन-सोर्स अल्गोरिद्म" का निर्णय लें — जहाँ किसी गोपनीयता का डर न हो और जिसका कोड हर व्यक्ति केलिए ऑनलाइन दिखाई दे — तब पारदर्शी गणित वह न्याय करसकता है जिसे करने से राजनेता इनकार करते हैं। हमें ऐसी समाज बनना बंद करना होगा जो केवल यह सोचता रहे कि हमारे पूर्वज कौन थे, और ऐसी समाज बनना होगा जो यह देखे कि हमारे बच्चे क्या बनसकते हैं। आइए, लड़ना बंद करें। और इस एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था का उपयोग करके उस प्रतिभा को सहारा दें — चाहे वह इस धरती पर कहीं भी जन्मी हो — ताकि वह चमकसके। समापन के शब्द सिर्फ इसलिए कि मैंने यह सब कहा है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह दावा कररहा हूँ कि यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" पूरी तरह दोषरहित है। मैं भी जानता हूँ कि इसमें कई चुनौतियाँ हैं। यदि लोग व्यवस्थित रूपसे अपना डेटा छिपाकर अल्गोरिद्म को धोखा देने लगें तो क्या होगा? या यदि इस व्यवस्था का कोड लिखने वाला इंसान अपने निजी पूर्वाग्रह उसमें डालदे तो? ये सभी गंभीर प्रश्न हैं जिनपर निश्चित रूपसे गहराई से विचार कियाजाना चाहिए। लेकिन मेरा तर्क केवल इतना है: वर्तमान व्यवस्था, जो आज हमारी आँखों के सामने है, पूरी तरह जड़ होचुकी है और राजनीति की कीचड़ में फँस गई है। उससे चिपके रहकर हमेशा लड़ते रहने के बजाय, हमें एक नए रास्ते के बारे में सोचना होगा। यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" शायद कोई पूर्ण और अंतिम समाधान न हो, लेकिन परिवर्तन की दिशा में उठाया जाने वाला यह निश्चित रूपसे सबसे अच्छा पहला कदम होसकता है। आइए, पुरानी दीवारों को लेकर लड़ना बंद करें और भविष्य के बच्चों केलिए न्याय की एक नई नींव बनाने पर चर्चा शुरू करें।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आइए, एक सरल उदाहरण से अपनी चर्चा शुरू करें। कल्पना कीजिए एक 100 मीटर की दौड़ की। एक न्यायपूर्ण दुनिया में, हर व्यक्ति शून्य मीटर की रेखा पर खड़ा होता है। स्टार्टिंग पिस्टल चलती है, सीटी बजती है, और जो सबसे तेज़ दौड़ता है वही जीतता है। सरल है, हैना? 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जाति प्रमाणपत्र की जगह, यह न्यायपूर्ण व्यवस्था लगातार बदलते रहने वाले "सामाजिक स्थिति अंक" की गणना करेगी। इसे एक क्रेडिट स्कोर की तरह समझिए — लेकिन यह केवल जन्म रिकॉर्ड देखने के बजाय, उन वास्तविक बाधाओं को मापेगा जिन्हें किसी व्यक्ति ने जीवन में पार किया है। इस व्यवस्था में एआई कमसेकम चार सरल सिद्धांतों के आधार पर इस दौड़ की न्यायपूर्णता तय करसकता है: • संघर्ष का मार्ग. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता पहले ही आरक्षण का उपयोग करके उच्च सरकारी पद या सुविधाएँ प्राप्त करचुके हैं, तो उस व्यक्ति का अपना स्कोर कम होजाएगा। उस परिवार को आवश्यक सहायता पहले ही मिलचुकी है; अब उसे पीछे हटकर किसी दूर-दराज़ गाँव के प्रथम पीढ़ी के छात्र केलिए जगह बनानी चाहिए। • माता-पिता की पृष्ठभूमि. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता डॉक्टर या अन्य उच्च-कौशल वाले पेशेवर हैं, तो वह बच्चा तुलनात्मक रूपसे अधिक सशक्त होगा। उसके घर में पढ़ाई का वातावरण, सही मार्गदर्शन और प्रभावशाली लोगों से परिचय होगा। लेकिन अशिक्षित माता-पिता का बच्चा जीवन की दौड़ में पीछे से शुरुआत करता है। उस अंतर को संतुलित करने केलिए एआई ऐसे बच्चे को अधिक अंक देगा। • वह वातावरण जिसमें व्यक्ति बड़ा हुआ. — क्या बच्चा दक्षिण मुंबई के किसी आलीशान स्कूल में पढ़ा? या ग्रामीण बिहार के टीन की छत वाले स्कूल में? क्या उसके पास हाई-स्पीड इंटरनेट या महँगी कोचिंग क्लासों की सुविधा थी? यदि नहीं, तो एआई यह समझेगा कि गाँव के बच्चे के 80% अंक, शहर के उस बच्चे के 95% अंकों से कहीं अधिक मूल्यवान होसकते हैं जिसके पास हर सुविधा उपलब्ध थी। • ऐतिहासिक बोझ. — यदि उस बच्चे के समुदाय के साथ ऐतिहासिक रूपसे अछूतों या शोषितों जैसा व्यवहार कियागया हो, तो वह एक गहरी मानसिक और सामाजिक दीवार पैदा करता है। एआई ऐसे पृष्ठभूमि केलिए अतिरिक्त अंक सुरक्षित रखेगा — लेकिन जैसे-जैसे दशकों के साथ उस समुदाय की शिक्षा और जीवन स्तर सुधरते जाएँगे, वैसे-वैसे ये अतिरिक्त अंक धीरे-धीरे कम होतेजाएँगे। यह केवल एक सरल व्याख्या है। वास्तविक एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था इससे कहीं अधिक जटिल होसकती है। लेकिन यह असंभव नहीं है। और यह समाधान केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह पूरी दुनिया केलिए एक मॉडल बनसकता है। इस व्यवस्था का एआई आधारित ढाँचा लगभग हर जगह समान रहेगा। केवल डेटा और प्राथमिकताएँ हर देश की परिस्थितियों के अनुसार बदलेंगी। यदि इस मॉडल को अलग-अलग देशों में लागू कियाजाए, तो यह वहाँ की वास्तविकताओं के अनुसार अपने-आप ढलजाएगा: • अमेरिका में यह एआई आधारित व्यवस्था जाति और नस्ल पर आधारित राजनीतिक संघर्षों से आगे बढ़ेगी। यह मैनहैटन के सबसे महँगे निजी स्कूलों में पढ़े छात्र और वेस्ट वर्जीनिया या मिसिसिपी डेल्टा के गरीब ग्रामीण स्कूल में पढ़े छात्र के बीच का अंतर पहचानसकेगी। • पश्चिमी यूरोप में मुख्य समस्या वर्गभेद और प्रवासियों की स्थिति है। यह एआई आधारित व्यवस्था वहाँ के क्षेत्रीय और शैक्षणिक डेटाबेस का उपयोग करेगी। यह पेरिस, लंदन या मैड्रिड की प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्रों और उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्रों या प्रवासी बस्तियों में बड़े होरहे छात्रों के बीच की दूरी को अपने-आप संतुलित करेगी। लेकिन अब आता है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा — वह आश्चर्यजनक "आहा!" क्षण। यह वह सत्य है जो आरक्षण का समर्थन करने वालों और विरोध करने वालों, दोनों को समझासकता है। मानव या राजनीति द्वारा संचालित कोटा व्यवस्थाएँ ऐसे बहते हुए नल की तरह हैं जिन्हें एक बार चालू करदिया जाए, तो राजनीतिक कारणों से वे कभी बंद नहीं होते। लेकिन यह एआई संचालित व्यवस्था स्वभाव से ही एक "स्वयं-विलय" (Self-Dissolving) व्यवस्था है। जैसे-जैसे यह अल्गोरिद्म योग्य लोगों की सही पहचान करता है, उन्हें प्राथमिकता अंक देता है और समाज की मुख्यधारा में लाता है, वैसे-वैसे व्यवस्था में आने वाला डेटा स्वयं बदलने लगता है। जब डेटा यह दिखाने लगता है कि किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय के बच्चे दूसरों की तरह ही शिक्षा प्राप्त कररहे हैं, कमाई कररहे हैं और आर्थिक रूपसे सशक्त बनरहे हैं, तब एआई अपने-आप उन्हें "प्राथमिकता अंक" देना बंद करदेता है। इस परिवर्तन केलिए संसद में किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आवश्यकता नहीं होगी। किसी सामाजिक आंदोलन या हड़ताल की भी ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यवस्था अपनी ही सफलता के माध्यम से अपनी आवश्यकता को शांतिपूर्वक समाप्त करदेगी। अंततः, हर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति अंक एक समान स्तर की ओर आने लगेंगे। जब जन्म किसी का भविष्य तय करना बंद करदेगा, तब ये प्राथमिकता अंक स्वाभाविक रूपसे शून्य तक पहुँचजाएँगे। राजनेताओं को कोटा समाप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी — वे गणितीय दृष्टि से अपने-आप अर्थहीन होजाएँगे। उपसंहार. हमारे पास डेटा है, और हमारे पास इसे करने में सक्षम एआई तकनीक भी है। यदि हम एक "एआई आधारित ओपन-सोर्स अल्गोरिद्म" का निर्णय लें — जहाँ किसी गोपनीयता का डर न हो और जिसका कोड हर व्यक्ति केलिए ऑनलाइन दिखाई दे — तब पारदर्शी गणित वह न्याय करसकता है जिसे करने से राजनेता इनकार करते हैं। हमें ऐसी समाज बनना बंद करना होगा जो केवल यह सोचता रहे कि हमारे पूर्वज कौन थे, और ऐसी समाज बनना होगा जो यह देखे कि हमारे बच्चे क्या बनसकते हैं। आइए, लड़ना बंद करें। और इस एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था का उपयोग करके उस प्रतिभा को सहारा दें — चाहे वह इस धरती पर कहीं भी जन्मी हो — ताकि वह चमकसके। समापन के शब्द सिर्फ इसलिए कि मैंने यह सब कहा है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह दावा कररहा हूँ कि यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" पूरी तरह दोषरहित है। मैं भी जानता हूँ कि इसमें कई चुनौतियाँ हैं। यदि लोग व्यवस्थित रूपसे अपना डेटा छिपाकर अल्गोरिद्म को धोखा देने लगें तो क्या होगा? या यदि इस व्यवस्था का कोड लिखने वाला इंसान अपने निजी पूर्वाग्रह उसमें डालदे तो? ये सभी गंभीर प्रश्न हैं जिनपर निश्चित रूपसे गहराई से विचार कियाजाना चाहिए। लेकिन मेरा तर्क केवल इतना है: वर्तमान व्यवस्था, जो आज हमारी आँखों के सामने है, पूरी तरह जड़ होचुकी है और राजनीति की कीचड़ में फँस गई है। उससे चिपके रहकर हमेशा लड़ते रहने के बजाय, हमें एक नए रास्ते के बारे में सोचना होगा। यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" शायद कोई पूर्ण और अंतिम समाधान न हो, लेकिन परिवर्तन की दिशा में उठाया जाने वाला यह निश्चित रूपसे सबसे अच्छा पहला कदम होसकता है। आइए, पुरानी दीवारों को लेकर लड़ना बंद करें और भविष्य के बच्चों केलिए न्याय की एक नई नींव बनाने पर चर्चा शुरू करें।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Caste, #harmoney, #Hindi, #peace, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] अन-ध्यान मत कीजिए: आपका मोबाइल आपके मन को भटका सकता है.</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi_0415293874.html</link><category>#Hindi</category><category>#Meditation</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Yoga</category><pubDate>Fri, 15 May 2026 18:27:10 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-4475555658086189178</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;आइए हम एक सामान्य समस्या से शुरुआत करें, जिसका सामना हम सभी करते हैं — तनाव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलग-अलग लोगोंके तनावमें आनेके कारण अलग हो सकते हैं। लेकिन अधिकांश परिस्थितियोंमें इसके पीछे काम करनेवाली जैविक प्रक्रिया लगभग समान होती है। आगे बढ़नेसे पहले, आइए तनावके पीछे काम करनेवाले इस मूल तंत्रको थोड़ा समझ लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तनाव केवल मनुष्योंमें ही नहीं होता। पशु भी इसका अनुभव करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कोई पशु अपनी ओर तेजीसे आते हुए किसी शिकारीको देखता है, तब उसकी आँखें चित्रोंकी एक श्रृंखला मस्तिष्कको भेजती हैं। ये चित्र यह जानकारी देते हैं कि खतरा कितना निकट है, कितनी तेजीसे आ रहा है, और किस दिशासे आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँखें इन चित्रोंको एकके बाद एक मस्तिष्कतक पहुँचाती हैं, बिल्कुल पुराने चलचित्रकी फ्रेमोंकी तरह। मस्तिष्कको इनका तेजीसे विश्लेषण करना पड़ता है और खतरेकी मात्रा का अनुमान लगाना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमेंसे प्रत्येक चित्र मस्तिष्कमें तंत्रिकाकोशिकाओंकी गतिविधिके रूपमें संकेतित होता है। और ऐसे चित्रोंकी एक निरंतर श्रृंखला आती रहती है। जैसे-जैसे शिकारी निकट आता है, ये चित्र बदलते रहते हैं। स्वाभाविक रूपसे परिस्थितिके अनुसार मस्तिष्ककी प्रतिक्रिया भी बदलती रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुको या तो लड़ना पड़ता है या वहाँसे भागना पड़ता है। इसे "फाइट ऑर फ्लाइट" प्रतिक्रिया कहा जाता है। इन दोनोंमेंसे कुछ भी करनेकेलिए शरीरके हाथ-पैरोंमें अधिक शक्तिकी आवश्यकता होती है। इस आवश्यकताकी पूर्ति उन भागोंमें अधिक रक्तप्रवाहके द्वारा की जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मांसपेशियोंतक अधिक रक्त पहुँचानेकेलिए हृदयकी धड़कन बढ़ जाती है। उसीके अनुसार श्वासकी गति भी बढ़ती है। यह सब एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोनोंके स्वचालित स्रावके कारण संभव होता है। साथ ही, शत्रुकी गतिविधियोंपर नज़र रखनेकेलिए मस्तिष्कको अत्यंत सतर्क भी रहना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिकाकोशिकाओंकी यह तीव्र गतिविधि और लगातार बदलता हुआ ध्यान पशुमें तनाव उत्पन्न करता है। हार्मोनोंका स्राव उसे खतरेका सामना करनेकेलिए तैयार करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह निम्न स्तरके जीवमें तनावकी स्थिति है, जहाँ मुख्य कारण सामान्यतः शारीरिक भय होता है। लेकिन जब मनुष्य जैसा अधिक विकसित जीव मानसिक तनावसे गुजरता है, तब भी लगभग यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। क्योंकि दोनों परिस्थितियोंमें तंत्रिकीय गतिविधि बढ़ जाती है और ध्यान लगातार बदलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे विचार भी मस्तिष्कमें तंत्रिकीय गतिविधिके रूपमें संकेतित होते हैं। और विचारोंकी एक विशेषता होती है — वे बहुत तेजीसे बढ़ते और फैलते हैं। इन विचारोंको अपनी गतिविधि चलानेकेलिए मस्तिष्कके विभिन्न भागोंको आपसमें जोड़ना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र ही इन आवश्यक मार्गोंका निर्माण करता है। इसलिए प्रत्येक विचार ध्यानको अपनी ओर खींचनेका प्रयास करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि विचार अनेक हो सकते हैं, और उनमेंसे कई एक ही समयपर उत्पन्न होते हैं, इसलिए ध्यानकेंद्र इन प्रतिस्पर्धी विचारोंके बीच विचलित होने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मस्तिष्कके भीतर लगभग वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसी किसी बाहरी आक्रमणके समय होती है। कारण अलग हो सकता है, लेकिन मस्तिष्ककी आंतरिक स्थिति लगभग वही रहती है। स्वाभाविक रूपसे इससे भी तनावसे जुड़े हार्मोनोंका स्राव होने लगता है, भले ही वास्तवमें लड़ने या भागनेकी कोई शारीरिक आवश्यकता न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यदि ये हार्मोन लंबे समयतक स्रावित होते रहें, तो वे गंभीर समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। वे केवल आपातकालीन परिस्थितियोंकेलिए बने हैं। इसलिए दीर्घकालिक मानसिक तनाव अनेक स्वास्थ्य समस्याओंका कारण बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ध्यान कैसे सहायता करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आप ध्यान करते हैं, तब आप क्या करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप अपना ध्यान किसी एक वस्तु या गतिविधिपर केंद्रित करते हैं। और जैसे-जैसे आप अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण बनाते जाते हैं, एक महत्वपूर्ण बात घटित होती है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र लगातार एक ही लक्ष्यपर लगा रहता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• मस्तिष्कमें उत्पन्न होनेवाले विचारोंको ध्यान नहीं मिलता। यही ध्यान वे तंत्रिकीय मार्ग बनाता है, जिनकी सहायता से विचार मस्तिष्कके विभिन्न भागोंमें अपनी गतिविधि फैला पाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• जब विचारोंको ध्यान नहीं मिलता, तब आवश्यक मार्ग बन नहीं पाते। और मार्ग न होनेपर विचारोंकी गतिविधि धीरे-धीरे कम होने लगती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• कमजोर पड़ते विचार, नए विचारोंको जन्म देनेकी क्षमता खोने लगते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार ध्यान, धीरे-धीरे विचारोंकी संख्या कम करता है और अंततः मनको शांत कर देता है। शांत मनका अर्थ है कम तनाव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शांत मन आपको तनावके हानिकारक प्रभावोंसे बचाता है। ध्यानका अभ्यास किसी एक कार्यपर केंद्रित रहनेकी मस्तिष्ककी क्षमताको मजबूत बनाता है। बेहतर एकाग्रताका अर्थ है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें अधिक अच्छा प्रदर्शन करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार ध्यान एक साथ दो कार्य करता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;यह तनावको कम करता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;यह मानसिक एकाग्रताको सुधारता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;ध्यान क्या करता है और तनावको कम करनेमें कैसे सहायता करता है — यह उसका संक्षिप्त विवरण था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आजके समयमें हमसभी लगातार सोशल मीडियाके विकर्षणोंके संपर्कमें हैं। हममेंसे अनेक लोग लगातार यूट्यूब-शॉर्ट्स, व्हॉट्सऐपसंदेश, इंस्टाग्राम रील्स और इसी प्रकारकी चीजें देखनेके आदी हो चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोशल मीडियाका सीमित उपयोग आवश्यक रूपसे बुरा नहीं है। वह उपयोगी भी हो सकता है। लेकिन क्या होता है जब आप "क्लिकबेट" के गुलाम बन जाते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोशल मीडियापर अधिकांश सामग्री ज्ञान देनेसे अधिक, ध्यान आकर्षित करनेकेलिए बनाई जाती है। ऐसे सामग्री निर्माताओंकी रुचि उपयोगी जानकारी साझा करनेसे अधिक आपका ध्यान पकड़नेमें होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिणामस्वरूप आपका मन लगातार तेजीसे बदलती हुई और अधिकांशतः अनावश्यक जानकारीसे भर जाता है। और उसीके अनुसार आपका ध्यान भी लगातार बदलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव मस्तिष्क इस प्रकारकी निरंतर तीव्र गतिविधिको संभालनेकेलिए बना नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका परिणाम यह होता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• मस्तिष्क जानकारीको गहराईसे समझनेके बजाय सतही रूपसे ग्रहण करने लगता है। वह वास्तवमें समझनेके बजाय केवल पैटर्न खोजने लगता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• लगातार बदलती जानकारीके साथ तालमेल बैठानेकेलिए मस्तिष्क बहुत कम समयमें ध्यान बदलना सीख लेता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• इससे किसी एक विषयपर लंबे समयतक ध्यान बनाएरखनेकी हमारी क्षमता कमजोर होने लगती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• तंत्रिकीय गतिविधिकी अधिकता अंततः मनको तनावकी ओर धकेल देती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div 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मनको लगातार बदलती हुई और अव्यवस्थित जानकारीपर केंद्रित करनेकेलिए मजबूर करते हैं, तब इसका ठीक उल्टा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अधिक मानसिक गतिविधि,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अधिक ध्यान परिवर्तन,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अधिक तनाव,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• और संभवतः गहरी एकाग्रताको पुनः प्राप्त करनेकी क्षमताका स्थायी क्षय।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: 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&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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प्रत्येक चित्र मस्तिष्कमें तंत्रिकाकोशिकाओंकी गतिविधिके रूपमें संकेतित होता है। और ऐसे चित्रोंकी एक निरंतर श्रृंखला आती रहती है। जैसे-जैसे शिकारी निकट आता है, ये चित्र बदलते रहते हैं। स्वाभाविक रूपसे परिस्थितिके अनुसार मस्तिष्ककी प्रतिक्रिया भी बदलती रहती है। पशुको या तो लड़ना पड़ता है या वहाँसे भागना पड़ता है। इसे "फाइट ऑर फ्लाइट" प्रतिक्रिया कहा जाता है। इन दोनोंमेंसे कुछ भी करनेकेलिए शरीरके हाथ-पैरोंमें अधिक शक्तिकी आवश्यकता होती है। इस आवश्यकताकी पूर्ति उन भागोंमें अधिक रक्तप्रवाहके द्वारा की जाती है। मांसपेशियोंतक अधिक रक्त पहुँचानेकेलिए हृदयकी धड़कन बढ़ जाती है। उसीके अनुसार श्वासकी गति भी बढ़ती है। यह सब एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोनोंके स्वचालित स्रावके कारण संभव होता है। साथ ही, शत्रुकी गतिविधियोंपर नज़र रखनेकेलिए मस्तिष्कको अत्यंत सतर्क भी रहना पड़ता है। तंत्रिकाकोशिकाओंकी यह तीव्र गतिविधि और लगातार बदलता हुआ ध्यान पशुमें तनाव उत्पन्न करता है। हार्मोनोंका स्राव उसे खतरेका सामना करनेकेलिए तैयार करता है। यह निम्न स्तरके जीवमें तनावकी स्थिति है, जहाँ मुख्य कारण सामान्यतः शारीरिक भय होता है। लेकिन जब मनुष्य जैसा अधिक विकसित जीव मानसिक तनावसे गुजरता है, तब भी लगभग यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। क्योंकि दोनों परिस्थितियोंमें तंत्रिकीय गतिविधि बढ़ जाती है और ध्यान लगातार बदलता रहता है। हमारे विचार भी मस्तिष्कमें तंत्रिकीय गतिविधिके रूपमें संकेतित होते हैं। और विचारोंकी एक विशेषता होती है — वे बहुत तेजीसे बढ़ते और फैलते हैं। इन विचारोंको अपनी गतिविधि चलानेकेलिए मस्तिष्कके विभिन्न भागोंको आपसमें जोड़ना पड़ता है। मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र ही इन आवश्यक मार्गोंका निर्माण करता है। इसलिए प्रत्येक विचार ध्यानको अपनी ओर खींचनेका प्रयास करता है। क्योंकि विचार अनेक हो सकते हैं, और उनमेंसे कई एक ही समयपर उत्पन्न होते हैं, इसलिए ध्यानकेंद्र इन प्रतिस्पर्धी विचारोंके बीच विचलित होने लगता है। अब मस्तिष्कके भीतर लगभग वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसी किसी बाहरी आक्रमणके समय होती है। कारण अलग हो सकता है, लेकिन मस्तिष्ककी आंतरिक स्थिति लगभग वही रहती है। स्वाभाविक रूपसे इससे भी तनावसे जुड़े हार्मोनोंका स्राव होने लगता है, भले ही वास्तवमें लड़ने या भागनेकी कोई शारीरिक आवश्यकता न हो। लेकिन यदि ये हार्मोन लंबे समयतक स्रावित होते रहें, तो वे गंभीर समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। वे केवल आपातकालीन परिस्थितियोंकेलिए बने हैं। इसलिए दीर्घकालिक मानसिक तनाव अनेक स्वास्थ्य समस्याओंका कारण बन सकता है। तो ध्यान कैसे सहायता करता है? जब आप ध्यान करते हैं, तब आप क्या करते हैं? आप अपना ध्यान किसी एक वस्तु या गतिविधिपर केंद्रित करते हैं। और जैसे-जैसे आप अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण बनाते जाते हैं, एक महत्वपूर्ण बात घटित होती है: • मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र लगातार एक ही लक्ष्यपर लगा रहता है। • मस्तिष्कमें उत्पन्न होनेवाले विचारोंको ध्यान नहीं मिलता। यही ध्यान वे तंत्रिकीय मार्ग बनाता है, जिनकी सहायता से विचार मस्तिष्कके विभिन्न भागोंमें अपनी गतिविधि फैला पाते हैं। • जब विचारोंको ध्यान नहीं मिलता, तब आवश्यक मार्ग बन नहीं पाते। और मार्ग न होनेपर विचारोंकी गतिविधि धीरे-धीरे कम होने लगती है। • कमजोर पड़ते विचार, नए विचारोंको जन्म देनेकी क्षमता खोने लगते हैं। इस प्रकार ध्यान, धीरे-धीरे विचारोंकी संख्या कम करता है और अंततः मनको शांत कर देता है। शांत मनका अर्थ है कम तनाव। शांत मन आपको तनावके हानिकारक प्रभावोंसे बचाता है। ध्यानका अभ्यास किसी एक कार्यपर केंद्रित रहनेकी मस्तिष्ककी क्षमताको मजबूत बनाता है। बेहतर एकाग्रताका अर्थ है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें अधिक अच्छा प्रदर्शन करें। इस प्रकार ध्यान एक साथ दो कार्य करता है: यह तनावको कम करता है।यह मानसिक एकाग्रताको सुधारता है। ध्यान क्या करता है और तनावको कम करनेमें कैसे सहायता करता है — यह उसका संक्षिप्त विवरण था। लेकिन आजके समयमें हमसभी लगातार सोशल मीडियाके विकर्षणोंके संपर्कमें हैं। हममेंसे अनेक लोग लगातार यूट्यूब-शॉर्ट्स, व्हॉट्सऐपसंदेश, इंस्टाग्राम रील्स और इसी प्रकारकी चीजें देखनेके आदी हो चुके हैं। सोशल मीडियाका सीमित उपयोग आवश्यक रूपसे बुरा नहीं है। वह उपयोगी भी हो सकता है। लेकिन क्या होता है जब आप "क्लिकबेट" के गुलाम बन जाते हैं? सोशल मीडियापर अधिकांश सामग्री ज्ञान देनेसे अधिक, ध्यान आकर्षित करनेकेलिए बनाई जाती है। ऐसे सामग्री निर्माताओंकी रुचि उपयोगी जानकारी साझा करनेसे अधिक आपका ध्यान पकड़नेमें होती है। परिणामस्वरूप आपका मन लगातार तेजीसे बदलती हुई और अधिकांशतः अनावश्यक जानकारीसे भर जाता है। और उसीके 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ही लक्ष्यपर लगाते हैं। आप ध्यानको लगातार अधिक स्पष्ट और अधिक शक्तिशाली बनाते जाते हैं। परिणामस्वरूप, मन शांत होने लगता है और तनावके कारण धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। लेकिन जब आप मनको लगातार बदलती हुई और अव्यवस्थित जानकारीपर केंद्रित करनेकेलिए मजबूर करते हैं, तब इसका ठीक उल्टा होता है। • अधिक मानसिक गतिविधि, • अधिक ध्यान परिवर्तन, • अधिक तनाव, • और संभवतः गहरी एकाग्रताको पुनः प्राप्त करनेकी क्षमताका स्थायी क्षय। इसीको मैं "अन-ध्यान" कहता हूँ। इसलिए अन-ध्यान मत कीजिए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप अपने ही मस्तिष्कको गंभीर हानि पहुँचा सकते हैं। सोशल मीडियाका उपयोग सीमित मात्रा में और स्पष्ट उद्देश्यके साथ कीजिए। क्लिकबेटका शिकार मत बनिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते 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हैं? आप अपना ध्यान किसी एक वस्तु या गतिविधिपर केंद्रित करते हैं। और जैसे-जैसे आप अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण बनाते जाते हैं, एक महत्वपूर्ण बात घटित होती है: • मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र लगातार एक ही लक्ष्यपर लगा रहता है। • मस्तिष्कमें उत्पन्न होनेवाले विचारोंको ध्यान नहीं मिलता। यही ध्यान वे तंत्रिकीय मार्ग बनाता है, जिनकी सहायता से विचार मस्तिष्कके विभिन्न भागोंमें अपनी गतिविधि फैला पाते हैं। • जब विचारोंको ध्यान नहीं मिलता, तब आवश्यक मार्ग बन नहीं पाते। और मार्ग न होनेपर विचारोंकी गतिविधि धीरे-धीरे कम होने लगती है। • कमजोर पड़ते विचार, नए विचारोंको जन्म देनेकी क्षमता खोने लगते हैं। इस प्रकार ध्यान, धीरे-धीरे विचारोंकी संख्या कम करता है और अंततः मनको शांत कर देता है। शांत मनका अर्थ है कम तनाव। शांत मन आपको तनावके हानिकारक प्रभावोंसे बचाता है। ध्यानका अभ्यास किसी एक कार्यपर केंद्रित रहनेकी मस्तिष्ककी क्षमताको मजबूत बनाता है। बेहतर एकाग्रताका अर्थ है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें अधिक अच्छा प्रदर्शन करें। इस प्रकार ध्यान एक साथ दो कार्य करता है: यह तनावको कम करता है।यह मानसिक एकाग्रताको सुधारता है। ध्यान क्या करता है और तनावको कम करनेमें कैसे सहायता करता है — यह उसका संक्षिप्त विवरण था। लेकिन आजके समयमें हमसभी लगातार सोशल मीडियाके विकर्षणोंके संपर्कमें हैं। हममेंसे अनेक लोग लगातार यूट्यूब-शॉर्ट्स, व्हॉट्सऐपसंदेश, इंस्टाग्राम रील्स और इसी प्रकारकी चीजें देखनेके आदी हो चुके हैं। सोशल मीडियाका सीमित उपयोग आवश्यक रूपसे बुरा नहीं है। वह उपयोगी भी हो सकता है। लेकिन क्या होता है जब आप "क्लिकबेट" के गुलाम बन जाते हैं? सोशल मीडियापर अधिकांश सामग्री ज्ञान देनेसे अधिक, ध्यान आकर्षित करनेकेलिए बनाई जाती है। ऐसे सामग्री निर्माताओंकी रुचि उपयोगी जानकारी साझा करनेसे अधिक आपका ध्यान पकड़नेमें होती है। परिणामस्वरूप आपका मन लगातार तेजीसे बदलती हुई और अधिकांशतः अनावश्यक जानकारीसे भर जाता है। और उसीके अनुसार आपका ध्यान भी लगातार बदलता रहता है। मानव मस्तिष्क इस प्रकारकी निरंतर तीव्र गतिविधिको संभालनेकेलिए बना नहीं है। उसका परिणाम यह होता है: • मस्तिष्क जानकारीको गहराईसे समझनेके बजाय सतही रूपसे ग्रहण करने लगता है। वह वास्तवमें समझनेके बजाय केवल पैटर्न खोजने लगता है। • लगातार बदलती जानकारीके साथ तालमेल बैठानेकेलिए मस्तिष्क बहुत कम समयमें ध्यान बदलना सीख लेता है। • इससे किसी एक विषयपर लंबे समयतक ध्यान बनाएरखनेकी हमारी क्षमता कमजोर होने लगती है। • तंत्रिकीय गतिविधिकी अधिकता अंततः मनको तनावकी ओर धकेल देती है। वास्तवमें आप ध्यानके बिल्कुल विपरीत कार्य कर रहे होते हैं। किसी एक लक्ष्यपर तीव्रतासे ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, आप लगातार विचारों और उत्तेजनाओंके तेज प्रवाहका पीछा कर रहे होते हैं। अत्यधिक मीडिया-उपयोग धीरे-धीरे मस्तिष्ककी एकाग्रताकी क्षमताको कमजोर कर देता है। और अंततः यह आपकी सामान्य दैनिक गतिविधियोंमें भी बाधा उत्पन्न कर सकता है। इन दोनों परिस्थितियोंकी सावधानीसे तुलना कीजिए। ध्यान करनेसे पहले आप अपनी एकाग्रताकी क्षमताको तीक्ष्ण बनाकर मनको तैयार करते हैं। फिर उसी एकाग्र मनको एक ही लक्ष्यपर लगाते हैं। आप ध्यानको लगातार अधिक स्पष्ट और अधिक शक्तिशाली बनाते जाते हैं। परिणामस्वरूप, मन शांत होने लगता है और तनावके कारण धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। लेकिन जब आप मनको लगातार बदलती हुई और अव्यवस्थित जानकारीपर केंद्रित करनेकेलिए मजबूर करते हैं, तब इसका ठीक उल्टा होता है। • अधिक मानसिक गतिविधि, • अधिक ध्यान परिवर्तन, • अधिक तनाव, • और संभवतः गहरी एकाग्रताको पुनः प्राप्त करनेकी क्षमताका स्थायी क्षय। इसीको मैं "अन-ध्यान" कहता हूँ। इसलिए अन-ध्यान मत कीजिए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप अपने ही मस्तिष्कको गंभीर हानि पहुँचा सकते हैं। सोशल मीडियाका उपयोग सीमित मात्रा में और स्पष्ट उद्देश्यके साथ कीजिए। क्लिकबेटका शिकार मत बनिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #Meditation, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] वो प्रश्न जो हर उत्तर से परे रहा: सृष्टि के मिथक से आत्म-साक्षात्कार तक।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi.html</link><category>#advaita</category><category>#God</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Meditation</category><category>#mystery</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><category>#veda</category><pubDate>Fri, 8 May 2026 19:30:29 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-8231720037883776072</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio autoplay="" id="Hello" src="https://tinyurl.com/hi-Hello1234"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio id="Audio" src="https://www.dropbox.com/scl/fi/l3ysebirv1c447xrgzyfv/03.mp3?rlkey=jdt1q5vzfoskoasfx8138glix&amp;amp;st=tocbi4ui&amp;amp;raw=1"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;क़ुरान के 49वें अध्याय के 13वें श्लोक में अल्लाह कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "हे मानवजाति! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है, और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा है ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो — न कि एक दूसरे से घृणा करने के लिए।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह की कहानी बाइबल में भी मिलती है। वहाँ ईश्वर आदम और हव्वा को रचता है, और कहा जाता है कि पूरी मानवजाति इसी मूल युगल से आई है। हिंदू धर्म में भी जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की कथा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग हैं। सृष्टिकर्ता मूल स्रोत है और यह सृष्टि उसी से उत्पन्न हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन कथाओं में एक रोचक बात यह है कि ये मनुष्य को ही ईश्वर का सीधा वंशज दिखाती हैं। बाकी सभी जीव मानो जैसे मनुष्य की सेवा के लिए ही हों!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर यह सरल दृष्टिकोण, जो सृष्टि को एक मानवीय क्रिया मानता है, भारत के प्राचीन सांख्य दर्शन को संतुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने विकास का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके अनुसार, इस जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। बल्कि, यह जगत एक निरंतर विकास प्रक्रिया का परिणाम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि शुरुआत में 'प्रधान' नामक एक आदिम स्थिति थी। वास्तव में यह 'प्रधान' कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्त्व, रजस और तमस इन तीन गुणों की संतुलित अवस्था है। यह 'प्रधान' स्वयं पुनरुत्पत्ति और पुनर्संयोजन के माध्यम से विकसित होकर सम्पूर्ण भौतिक जगत बन गया। सांख्य ने इसे 'प्रकृति' कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन फिर एक मूल प्रश्न उठा। इतनी विविध और आनंद देने वाली प्रकृति का क्या लाभ, जब उसे अनुभव करने वाला कोई न हो? इसलिए उन्होंने 'पुरुष' नामक चेतन तत्त्व की कल्पना की, जो प्रकृति के साथ स्थित है और उसे अनुभव कर सकता है। पुरुष चेतन है, इसलिए वह इस जगत का अनुभव कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार सांख्य दर्शन में सृष्टिकर्ता की कल्पना को त्याग कर 'भोग्य' (वस्तु) और 'भोगी' (अनुभवकर्ता) के विचार लाए गए। भौतिक जगत अनुभव का विषय है, और शरीरधारी चेतन — पुरुष — उसे अनुभव करने वाले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी एक गहरा प्रश्न बाकी रह गया। यह 'प्रधान' कहाँ से आया? स्वयं अनुभव करने की क्षमता न होने पर भी, इसे इतने विविध जगत रूप में विकसित होने की प्रेरणा किसने दी? इसी तरह पुरुषों की उत्पत्ति भी एक रहस्य ही रही। यदि कोई सृष्टिकर्ता नहीं है, तो वे अस्तित्व में कैसे आए? इस प्रकार प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के वेदांत दर्शन ने इस सांख्य विचार को अस्वीकार किया। उन्होंने कहा कि एक जड़ और अचेतन 'प्रधान' अपने आप इतने विविध जगत में विकसित नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी गहन प्रक्रिया के लिए बुद्धि, एक विकसित होता संकल्प और एक उद्देश्य आवश्यक है। लेकिन जड़ 'प्रधान' में इनमें से कोई भी नहीं है। और पुरुषों की उत्पत्ति का प्रश्न भी वैसा का वैसा ही रह गया — उन्हें किसने रचा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैदिक ऋषियों ने इन प्रश्नों पर गहराई से विचार किया और चर्चा की। उन्हें विभिन्न उत्तर मिले, पर कोई भी पूर्ण संतोष नहीं दे सका। लेकिन उन्हें पता था कि एक ऐसा मार्ग है जो सभी प्रश्नों का उत्तर दे सकता है — वह मार्ग है 'ध्यान'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए वे ध्यान में लीन हुए। अपेक्षा के अनुसार उन्हें उत्तर मिल गया। लेकिन यह उत्तर तभी मिला जब उन्होंने मन की सीमाओं को पार किया। आखिर ध्यान क्या है — मन की सीमाओं को पार करना ही तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वे ध्यान से बाहर आए, तो अपने अनुभव की सत्यता को व्यक्त करने के लिए उनके पास शब्द नहीं थे। उन्होंने कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "वह किसी भी इंद्रिय से न तो देखा जा सकता है, न सुना, न अनुभव किया जा सकता है। मन से भी उसे नहीं समझा जा सकता। वह हमारी जानी हुई चीज़ों से भिन्न है और अनजानी चीज़ों से भी परे है। हम उसे पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं और न ही जानते हैं कि उसे दूसरों को कैसे समझाएँ।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस जगत में हर अनुभव को दूसरों तक पहुँचाना होता है — यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह कैसे किया जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छांदोग्य उपनिषद में पिता उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह समझाते हुए कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "जो इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है, जो हर एक को चेतना देता है — वही आत्मा है। वही परम सत्य है।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका अर्थ है कि यह जड़ जगत और सभी चेतन जीव एक ही आत्मा के भिन्न रूप हैं। दूसरे शब्दों में, हममें से हर एक वही आत्मा स्वरूप है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहीं से उपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य उत्पन्न होता है — "तत्त्वमसि — तुम वही हो।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अंतिम घोषणा से पहले, उद्दालक ने विस्तार से समझाने का प्रयास किया कि जगत कैसे अस्तित्व में आया — दीर्घ प्रयोगों और तर्कों के माध्यम से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए इस जगत को किसी ने नहीं रचा। यह किसी ईश्वर द्वारा नहीं बनाया गया। सरल सत्य यह है कि सृष्टिकर्ता और सृष्टि में कोई भेद नहीं है। वही एक तत्त्व सब कुछ बनकर इस जगत में प्रकट हुआ है। लेकिन एक सूक्ष्म बात ध्यान देने योग्य है — इस प्रकट होने के बाद भी मूल तत्त्व जैसा का तैसा ही बना रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बात को उपनिषद का एक मंत्र प्रतिध्वनित करता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "वह पूर्ण है। यह जगत भी पूर्ण है। क्योंकि यह जगत उसी पूर्णता से उत्पन्न हुआ है। इस पूर्ण से यह पूर्ण जगत उत्पन्न होने के बाद भी वह मूल पूर्ण ही बना रहता है।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार अब प्रश्न जगत की उत्पत्ति का नहीं रह जाता — बल्कि यह है कि हम वास्तव में कौन हैं!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------

&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: white; color: black;"&gt;&lt;b&gt;If this&amp;nbsp; resonated with you, I invite you to join my weekly readership. I publish a new deep-dive every Saturday, moving beyond the surface to look at the questions that truly matter. No paywalls, no "bait"—just a direct share from my mind to yours. &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub "&gt;Click to subscribe.&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/l3ysebirv1c447xrgzyfv/03.mp3?rlkey=jdt1q5vzfoskoasfx8138glix&amp;st=tocbi4ui&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhxtXpTztP6KoSgR1qfUYUn1piE7439qWiEurrMvaknISQh7S-LcMS8eK_fDd42lFiwcbyzwBjXeYm5i5hrRg1Gdu_fgLCQ_R0z9G_euJyL3HQKcDmeMmJUOoTBIAjm4CwL_-fxRugwjsmusz98WlV4UadIsv3LbFUqVOU3SRODH3lywaCLr4WGGRv4E58/s72-w640-h640-c/unsolved%20question2.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Quick links]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;शायद इस धरती पर अपने आप से यह पूछने वाला कि वह यहाँ कैसे आया है, केवल मनुष्य ही है। बाकी सभी जीव तो इस बात में ही व्यस्त हैं कि इस जगत में कैसे जियाजाए! अधिकांश धर्मों में ऐसी सृष्टि कथाएँ मिलती हैं जो बताती हैं कि किसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर ने इस जगत को रचा है। इन कथाओं के कई रूप हैं। मनुष्य सृष्टिकर्ता को अपने जैसा ही कल्पित करता है — अधिकार, करुणा, उदारता और पितृत्व के भाव के साथ। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); क़ुरान के 49वें अध्याय के 13वें श्लोक में अल्लाह कहता है: - "हे मानवजाति! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है, और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा है ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो — न कि एक दूसरे से घृणा करने के लिए।" - इसी तरह की कहानी बाइबल में भी मिलती है। वहाँ ईश्वर आदम और हव्वा को रचता है, और कहा जाता है कि पूरी मानवजाति इसी मूल युगल से आई है। हिंदू धर्म में भी जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की कथा है। इन सभी कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग हैं। सृष्टिकर्ता मूल स्रोत है और यह सृष्टि उसी से उत्पन्न हुई है। लेकिन इन कथाओं में एक रोचक बात यह है कि ये मनुष्य को ही ईश्वर का सीधा वंशज दिखाती हैं। बाकी सभी जीव मानो जैसे मनुष्य की सेवा के लिए ही हों! पर यह सरल दृष्टिकोण, जो सृष्टि को एक मानवीय क्रिया मानता है, भारत के प्राचीन सांख्य दर्शन को संतुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने विकास का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, इस जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। बल्कि, यह जगत एक निरंतर विकास प्रक्रिया का परिणाम है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में 'प्रधान' नामक एक आदिम स्थिति थी। वास्तव में यह 'प्रधान' कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्त्व, रजस और तमस इन तीन गुणों की संतुलित अवस्था है। यह 'प्रधान' स्वयं पुनरुत्पत्ति और पुनर्संयोजन के माध्यम से विकसित होकर सम्पूर्ण भौतिक जगत बन गया। सांख्य ने इसे 'प्रकृति' कहा। लेकिन फिर एक मूल प्रश्न उठा। इतनी विविध और आनंद देने वाली प्रकृति का क्या लाभ, जब उसे अनुभव करने वाला कोई न हो? इसलिए उन्होंने 'पुरुष' नामक चेतन तत्त्व की कल्पना की, जो प्रकृति के साथ स्थित है और उसे अनुभव कर सकता है। पुरुष चेतन है, इसलिए वह इस जगत का अनुभव कर सकता है। इस प्रकार सांख्य दर्शन में सृष्टिकर्ता की कल्पना को त्याग कर 'भोग्य' (वस्तु) और 'भोगी' (अनुभवकर्ता) के विचार लाए गए। भौतिक जगत अनुभव का विषय है, और शरीरधारी चेतन — पुरुष — उसे अनुभव करने वाले हैं। फिर भी एक गहरा प्रश्न बाकी रह गया। यह 'प्रधान' कहाँ से आया? स्वयं अनुभव करने की क्षमता न होने पर भी, इसे इतने विविध जगत रूप में विकसित होने की प्रेरणा किसने दी? इसी तरह पुरुषों की उत्पत्ति भी एक रहस्य ही रही। यदि कोई सृष्टिकर्ता नहीं है, तो वे अस्तित्व में कैसे आए? इस प्रकार प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया। भारत के वेदांत दर्शन ने इस सांख्य विचार को अस्वीकार किया। उन्होंने कहा कि एक जड़ और अचेतन 'प्रधान' अपने आप इतने विविध जगत में विकसित नहीं हो सकता। इतनी गहन प्रक्रिया के लिए बुद्धि, एक विकसित होता संकल्प और एक उद्देश्य आवश्यक है। लेकिन जड़ 'प्रधान' में इनमें से कोई भी नहीं है। और पुरुषों की उत्पत्ति का प्रश्न भी वैसा का वैसा ही रह गया — उन्हें किसने रचा? वैदिक ऋषियों ने इन प्रश्नों पर गहराई से विचार किया और चर्चा की। उन्हें विभिन्न उत्तर मिले, पर कोई भी पूर्ण संतोष नहीं दे सका। लेकिन उन्हें पता था कि एक ऐसा मार्ग है जो सभी प्रश्नों का उत्तर दे सकता है — वह मार्ग है 'ध्यान'। इसलिए वे ध्यान में लीन हुए। अपेक्षा के अनुसार उन्हें उत्तर मिल गया। लेकिन यह उत्तर तभी मिला जब उन्होंने मन की सीमाओं को पार किया। आखिर ध्यान क्या है — मन की सीमाओं को पार करना ही तो है। जब वे ध्यान से बाहर आए, तो अपने अनुभव की सत्यता को व्यक्त करने के लिए उनके पास शब्द नहीं थे। उन्होंने कहा: - "वह किसी भी इंद्रिय से न तो देखा जा सकता है, न सुना, न अनुभव किया जा सकता है। मन से भी उसे नहीं समझा जा सकता। वह हमारी जानी हुई चीज़ों से भिन्न है और अनजानी चीज़ों से भी परे है। हम उसे पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं और न ही जानते हैं कि उसे दूसरों को कैसे समझाएँ।" - लेकिन इस जगत में हर अनुभव को दूसरों तक पहुँचाना होता है — यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह कैसे किया जाए? छांदोग्य उपनिषद में पिता उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह समझाते हुए कहता है: - "जो इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है, जो हर एक को चेतना देता है — वही आत्मा है। वही परम सत्य है।" - इसका अर्थ है कि यह जड़ जगत और सभी चेतन जीव एक ही आत्मा के भिन्न रूप हैं। दूसरे शब्दों में, हममें से हर एक वही आत्मा स्वरूप है। यहीं से उपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य उत्पन्न होता है — "तत्त्वमसि — तुम वही हो।" इस अंतिम घोषणा से पहले, उद्दालक ने विस्तार से समझाने का प्रयास किया कि जगत कैसे अस्तित्व में आया — दीर्घ प्रयोगों और तर्कों के माध्यम से। इसलिए इस जगत को किसी ने नहीं रचा। यह किसी ईश्वर द्वारा नहीं बनाया गया। सरल सत्य यह है कि सृष्टिकर्ता और सृष्टि में कोई भेद नहीं है। वही एक तत्त्व सब कुछ बनकर इस जगत में प्रकट हुआ है। लेकिन एक सूक्ष्म बात ध्यान देने योग्य है — इस प्रकट होने के बाद भी मूल तत्त्व जैसा का तैसा ही बना रहता है। इसी बात को उपनिषद का एक मंत्र प्रतिध्वनित करता है: - "वह पूर्ण है। यह जगत भी पूर्ण है। क्योंकि यह जगत उसी पूर्णता से उत्पन्न हुआ है। इस पूर्ण से यह पूर्ण जगत उत्पन्न होने के बाद भी वह मूल पूर्ण ही बना रहता है।" - इस प्रकार अब प्रश्न जगत की उत्पत्ति का नहीं रह जाता — बल्कि यह है कि हम वास्तव में कौन हैं!&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- If this&amp;nbsp; resonated with you, I invite you to join my weekly readership. I publish a new deep-dive every Saturday, moving beyond the surface to look at the questions that truly matter. No paywalls, no "bait"—just a direct share from my mind to yours. Click to subscribe. &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Quick links]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;शायद इस धरती पर अपने आप से यह पूछने वाला कि वह यहाँ कैसे आया है, केवल मनुष्य ही है। बाकी सभी जीव तो इस बात में ही व्यस्त हैं कि इस जगत में कैसे जियाजाए! अधिकांश धर्मों में ऐसी सृष्टि कथाएँ मिलती हैं जो बताती हैं कि किसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर ने इस जगत को रचा है। इन कथाओं के कई रूप हैं। मनुष्य सृष्टिकर्ता को अपने जैसा ही कल्पित करता है — अधिकार, करुणा, उदारता और पितृत्व के भाव के साथ। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); क़ुरान के 49वें अध्याय के 13वें श्लोक में अल्लाह कहता है: - "हे मानवजाति! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है, और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा है ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो — न कि एक दूसरे से घृणा करने के लिए।" - इसी तरह की कहानी बाइबल में भी मिलती है। वहाँ ईश्वर आदम और हव्वा को रचता है, और कहा जाता है कि पूरी मानवजाति इसी मूल युगल से आई है। हिंदू धर्म में भी जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की कथा है। इन सभी कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग हैं। सृष्टिकर्ता मूल स्रोत है और यह सृष्टि उसी से उत्पन्न हुई है। लेकिन इन कथाओं में एक रोचक बात यह है कि ये मनुष्य को ही ईश्वर का सीधा वंशज दिखाती हैं। बाकी सभी जीव मानो जैसे मनुष्य की सेवा के लिए ही हों! पर यह सरल दृष्टिकोण, जो सृष्टि को एक मानवीय क्रिया मानता है, भारत के प्राचीन सांख्य दर्शन को संतुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने विकास का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, इस जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। बल्कि, यह जगत एक निरंतर विकास प्रक्रिया का परिणाम है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में 'प्रधान' नामक एक आदिम स्थिति थी। वास्तव में यह 'प्रधान' कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्त्व, रजस और तमस इन तीन गुणों की संतुलित अवस्था है। यह 'प्रधान' स्वयं पुनरुत्पत्ति और पुनर्संयोजन के माध्यम से विकसित होकर सम्पूर्ण भौतिक जगत बन गया। सांख्य ने इसे 'प्रकृति' कहा। लेकिन फिर एक मूल प्रश्न उठा। इतनी विविध और आनंद देने वाली प्रकृति का क्या लाभ, जब उसे अनुभव करने वाला कोई न हो? 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© Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;बस एक पीढ़ी पहले, कहानी सुनानेकी एक परंपरा थी। हर बच्चा अपनी दादीकी गोदमें बड़ा होताथा, और वह अद्भुत कहानियोंसे बच्चेको मंत्रमुग्ध कर देती थी। इन कहानियोंका बच्चेपर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ताथा। इन कहानियोंमें आमतौरपर एक नैतिक मूल्य या सीख होती थी, जिसे रोचक ढंगसे प्रस्तुत कियाजाता था। वे शक्कर चढ़ी हुई गोलियोंकी तरह थीं। भलेही भीतरकी दवा स्वादिष्ट न हो, लेकिन शक्करकी परत उसे आनंददायक बना देती थी। बिना जानेही बच्चा कड़वी दवा निगल लेताथा, और उसकी ऊपरी मिठासका आनंद लेताथा। var hello = document.getElementById("Hello"); 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&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;table align="center" cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjfebOlVylHNLyjEkeBC2UEF5DneCKz9osLyCC0HYjgRjLERRNVpNKIIoh1qW7jxP8j-FT9OCfNWMBU-6HFgnB5jwGuQC-UJ58DhPPJ9iSICMpUsAOhj_ytgHI9913t3T5_bY_kbLEa41HEkJmkBfnzM3Ktx2ZJI2RrvcTObS3KqkQXg0uog3RiIwcFcCw/s1254/kids2.png" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="1254" data-original-width="1254" height="640" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjfebOlVylHNLyjEkeBC2UEF5DneCKz9osLyCC0HYjgRjLERRNVpNKIIoh1qW7jxP8j-FT9OCfNWMBU-6HFgnB5jwGuQC-UJ58DhPPJ9iSICMpUsAOhj_ytgHI9913t3T5_bY_kbLEa41HEkJmkBfnzM3Ktx2ZJI2RrvcTObS3KqkQXg0uog3RiIwcFcCw/w640-h640/kids2.png" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;एकाग्रता। शांति। स्पष्टता।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;b&gt;"&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;b&gt;ध्यान&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt; का उपयोग आक्रामक व्यवहार को कम करने के लिए कियाजासकता है" इस विषय पर दिए गए मेरे व्याख्यान पर प्रतिक्रिया देते हुए, एक स्कूल की शिक्षिका ने मुझसे दो प्रश्न पूछे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला, वह जानना चाहती थीं कि बच्चों को ध्यान अभ्यास से किस उम्र में परिचित कराया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा, उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनके उस तरीके का समर्थन करता हूँ जिसमें वह शोरगुल वाली कक्षा को शांत करने के लिए बच्चों से "ओम" जप करवाती हैं। उनके अनुभव के अनुसार, ऐसा करने से बच्चे कम से कम कुछ समय के लिए शांत हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये दोनों प्रश्न बहुत रोचक हैं और थोड़ा विस्तार से उत्तर की अपेक्षा करते हैं। यही हम इस भाग में देखेंगे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;!-----------------------------&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio autoplay="" id="Hello" src="https://tinyurl.com/hi-Hello1234"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio id="Audio" src="https://www.dropbox.com/scl/fi/86wwmn9y6b9s8wak2z54s/03.mp3?rlkey=9d6n5p3lvnt45g9alk3qktij4&amp;amp;st=s87j5zom&amp;amp;raw=1"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio id="ThankYou" src="https://tinyurl.com/hi-Thanks1234"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;सबसे पहले — बच्चे को किस उम्र में ध्यान सिखाना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आजकल के कई माता-पिता की तरह बच्चे को इंटरनेट और मोबाइल के शोर के संपर्क में ज़्यादा नहीं रखा गया हो, तो बच्चे का मस्तिष्क किसी भी ध्यान अभ्यास को ग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होता है। वह छोटा मस्तिष्क मुलायम मिट्टी की तरह होता है — बहुत आसानी से आकार लेसकता है। बाहरी विचलन, जो उसे भटकाते हैं, हमारे मुकाबले बहुत कम होते हैं। इसलिए यही ध्यान शुरू करने का सही समय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, दूसरे प्रश्न में दिखने वाली तरह ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। अगर सही ध्यान अभ्यास पहले से विकसित किया गया होता, तो ऐसी स्थितियाँ शायद ही उत्पन्न होतीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर, ध्यान सिखाने की सही उम्र क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके नाम से लगता है कि आप भारतीय हैं। अगर ऐसा है, तो इस विषय में गहरा अध्ययन करने वाले अपने पूर्वजों पर आपको गर्व होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन भारत में, जब बच्चे स्कूल में प्रवेश करते थे, तब उन्हें गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता था। यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। यह एक छोटा मंत्र है जिसे एक निश्चित विधि से, दिन में दो बार, एक निश्चित अवधि तक जपना होता है। इसका उद्देश्य मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को बढ़ाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना ज़रूरी नहीं कि इससे बच्चों को पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। आगे चलकर जीवन में भी एक तेज़ दिमाग बहुत काम आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, इस मंत्र को जीवन भर जपने की सलाह दी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन दिनों अन्य मंत्रों का जप करने की अनुमति नहीं होती, उन दिनों भी इसका जप नहीं छोड़ना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी मंत्र का नियमित जप अपने आप में एक प्रकार का ध्यान बनजाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भले ही ग्रहण क्षमता को तेज करना हो, लेकिन यह मन को शांत करता है और सोच में स्पष्टता लाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हजारों सालों से यह परंपरा चली आ रही है, फिर भी कई गलत धारणाओं के कारण यह प्राचीन ध्यान पद्धति धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है। स्पष्टता के लिए कुछ प्रश्नों को देखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 1: इस अभ्यास को किस उम्र में शुरू करना चाहिए?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरागत रूप से, बच्चों को स्कूल में दाखिला देने की उम्र को गर्भाष्टम कहा जाता है — यानी माँ के गर्भ में बिताए समय सहित आठ वर्ष। लगभग देखें तो यह जन्म के बाद करीब सात साल होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अगर आप बच्चे को एक महान विद्वान बनाना चाहते हैं, तो पाँच साल की उम्र में ही स्कूल में दाखिला कराया जा सकता है। उसी उम्र से ध्यान अभ्यास भी शुरूकिया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 2: क्या यह ध्यान केवल कुछ जातियों तक सीमित है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के समय में यह ब्राह्मणों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन परंपरागत रूप से केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि अन्य वर्णों के लोगों के लिए भी शिक्षा अनिवार्य थी। स्वाभाविक रूप से, सभी इस ध्यान अभ्यास के योग्य थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 3: क्या यह अभ्यास केवल किसी एक लिंग के लिए है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के समय में यह केवल लड़कों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। यह बाद की एक विकृति है। प्राचीन भारत में लड़के और लड़कियाँ दोनों ही स्कूल जाने के पात्र थे। इसलिए दोनों से इस ध्यान अभ्यास की अपेक्षा की जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के कारण यह परंपरा बदल गई। मूल शास्त्र लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित नहीं करते। कुछ स्थानों पर यह कहा गया है कि लड़कियों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी मुख्य भूमिका परिवार का संचालन है। यह कोई कठोर नियम नहीं है — यह केवल भूमिकाओं का विभाजन है। आज की परिस्थिति में इसे कठोरता से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 4: क्या गायत्री मंत्र का जप महिलाओं की प्रजनन प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे बड़ा मज़ाक कुछ नहीं हो सकता! अगर कोई ऐसा कहता है, तो उससे प्रमाण माँगिए — चाहे वह शास्त्रीय हो, तर्कसंगत हो या प्रायोगिक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे कोई प्रमाण नहीं देपाएँगे, क्योंकि यह एक निराधार गलत धारणा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 5: क्या गैर-हिंदू लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं? क्या इससे उनके धर्म का उल्लंघन होगा?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी इस मंत्र का अर्थ समझता है, उसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह किसी भी धर्म के ईश्वर की अवधारणा पर लागू हो सकता है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो केवल एक ही धर्म तक सीमित हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने इन विषयों पर अपने "&lt;a href="https://books2read.com/Mantra" target="_blank"&gt;A Mantra to enhance your mental capabilities&lt;/a&gt;" पुस्तक में और विस्तार से चर्चा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, सभी बच्चों को यह मंत्र जप करना सिखाया जा सकता है। लेकिन प्रभावी होने के लिए, इसे नियमित रूप से, बिना चूके, एक निश्चित अवधि तक करना आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मंत्र कैसे काम करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मंत्र की ध्वनि संरचना जप करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में ध्यान प्रणाली को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। लेकिन यह केवल आवश्यक स्तर की एकाग्रता देती है — अत्यधिक नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह संतुलित एकाग्रता वही है जो अलग-अलग विषय पढ़ने वाले बच्चे को चाहिए होती है। आगे जीवन में भी विभिन्न कार्यों को संभालने में यह मदद करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अत्यधिक एकाग्रता व्यक्ति को एक ही विषय में पूरी तरह डुबो सकती है, जिससे एक साथ कई काम करना कठिन हो जाता है। ज़रूरी है संतुलित एकाग्रता — पूर्ण तल्लीनता नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या "ओम" जप करने से भी एकाग्रता नहीं बढ़ती? तो फिर गायत्री मंत्र के बजाय "ओम" क्यों न जपें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओम" का लंबे समय तक जप करने से अत्यधिक एकाग्रता हो सकती है। कुछ गुरुओं द्वारा प्रचारित "ओम" आधारित ध्यान विधियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक एकाग्रता कुछ दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरागत रूप से, "ओम" ध्यान केवल उन्हीं लोगों के लिए था जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था और पूरी तरह आध्यात्मिक साधना में लगे थे — यानी सन्यासी। उनका एकमात्र लक्ष्य संसार के बंधनों से मुक्ति पाना होता है। ऐसे लोगों के लिए पूर्ण एकाग्रता बहुत सहायक होती है, क्योंकि यह उन्हें जल्दी ही पूरी तरह शांत मन की अवस्था में ले जाती है — जिसे पतंजलि "निरुद्ध चित्त" कहते हैं। यही अंततः उन्हें उनके परम लक्ष्य तक पहुँचाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक सामान्य जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए यही "निरुद्ध चित्त" अवस्था सहायक होने के बजाय बाधा बन सकती है, क्योंकि यह दैनिक कार्यों में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देती। फिर से कहूँ — एकाग्रता चाहिए, लेकिन पूर्ण तल्लीनता नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, बच्चों को "ओम" ध्यान सिखाना सही विकल्प नहीं है। और एक बार फिर — ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में उपयोग न करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आपकी कक्षा में बच्चे शोर कर रहे हैं, तो उनका ध्यान किसी रचनात्मक गतिविधि की ओर मोड़ें। इससे वे शांत भी होंगे और उनकी क्षमता भी विकसित होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चों को ध्यान सिखाइए — लेकिन "ओम" पर आधारित नहीं। "ओम" को एक विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align="center" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 120%; margin-bottom: 7pt;"&gt;
&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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अगर आजकल के कई माता-पिता की तरह बच्चे को इंटरनेट और मोबाइल के शोर के संपर्क में ज़्यादा नहीं रखा गया हो, तो बच्चे का मस्तिष्क किसी भी ध्यान अभ्यास को ग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होता है। वह छोटा मस्तिष्क मुलायम मिट्टी की तरह होता है — बहुत आसानी से आकार लेसकता है। बाहरी विचलन, जो उसे भटकाते हैं, हमारे मुकाबले बहुत कम होते हैं। इसलिए यही ध्यान शुरू करने का सही समय है। लेकिन, दूसरे प्रश्न में दिखने वाली तरह ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। अगर सही ध्यान अभ्यास पहले से विकसित किया गया होता, तो ऐसी स्थितियाँ शायद ही उत्पन्न होतीं। तो फिर, ध्यान सिखाने की सही उम्र क्या है? आपके नाम से लगता है कि आप भारतीय हैं। अगर ऐसा है, तो इस विषय में गहरा अध्ययन करने वाले अपने पूर्वजों पर आपको गर्व होना चाहिए। प्राचीन भारत में, जब बच्चे स्कूल में प्रवेश करते थे, तब उन्हें गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता था। यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। यह एक छोटा मंत्र है जिसे एक निश्चित विधि से, दिन में दो बार, एक निश्चित अवधि तक जपना होता है। इसका उद्देश्य मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को बढ़ाना है। यह कहना ज़रूरी नहीं कि इससे बच्चों को पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। आगे चलकर जीवन में भी एक तेज़ दिमाग बहुत काम आता है। इसलिए, इस मंत्र को जीवन भर जपने की सलाह दी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन दिनों अन्य मंत्रों का जप करने की अनुमति नहीं होती, उन दिनों भी इसका जप नहीं छोड़ना चाहिए। किसी भी मंत्र का नियमित जप अपने आप में एक प्रकार का ध्यान बनजाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भले ही ग्रहण क्षमता को तेज करना हो, लेकिन यह मन को शांत करता है और सोच में स्पष्टता लाता है। हजारों सालों से यह परंपरा चली आ रही है, फिर भी कई गलत धारणाओं के कारण यह प्राचीन ध्यान पद्धति धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है। स्पष्टता के लिए कुछ प्रश्नों को देखते हैं। प्रश्न 1: इस अभ्यास को किस उम्र में शुरू करना चाहिए? परंपरागत रूप से, बच्चों को स्कूल में दाखिला देने की उम्र को गर्भाष्टम कहा जाता है — यानी माँ के गर्भ में बिताए समय सहित आठ वर्ष। लगभग देखें तो यह जन्म के बाद करीब सात साल होता है। लेकिन अगर आप बच्चे को एक महान विद्वान बनाना चाहते हैं, तो पाँच साल की उम्र में ही स्कूल में दाखिला कराया जा सकता है। उसी उम्र से ध्यान अभ्यास भी शुरूकिया जा सकता है। प्रश्न 2: क्या यह ध्यान केवल कुछ जातियों तक सीमित है? आज के समय में यह ब्राह्मणों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन परंपरागत रूप से केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि अन्य वर्णों के लोगों के लिए भी शिक्षा अनिवार्य थी। स्वाभाविक रूप से, सभी इस ध्यान अभ्यास के योग्य थे। प्रश्न 3: क्या यह अभ्यास केवल किसी एक लिंग के लिए है? आज के समय में यह केवल लड़कों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। यह बाद की एक विकृति है। प्राचीन भारत में लड़के और लड़कियाँ दोनों ही स्कूल जाने के पात्र थे। इसलिए दोनों से इस ध्यान अभ्यास की अपेक्षा की जाती थी। समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के कारण यह परंपरा बदल गई। मूल शास्त्र लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित नहीं करते। कुछ स्थानों पर यह कहा गया है कि लड़कियों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी मुख्य भूमिका परिवार का संचालन है। यह कोई कठोर नियम नहीं है — यह केवल भूमिकाओं का विभाजन है। आज की परिस्थिति में इसे कठोरता से पालन करने की आवश्यकता नहीं है। प्रश्न 4: क्या गायत्री मंत्र का जप महिलाओं की प्रजनन प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है? इससे बड़ा मज़ाक कुछ नहीं हो सकता! अगर कोई ऐसा कहता है, तो उससे प्रमाण माँगिए — चाहे वह शास्त्रीय हो, तर्कसंगत हो या प्रायोगिक। वे कोई प्रमाण नहीं देपाएँगे, क्योंकि यह एक निराधार गलत धारणा है। प्रश्न 5: क्या गैर-हिंदू लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं? क्या इससे उनके धर्म का उल्लंघन होगा? जो भी इस मंत्र का अर्थ समझता है, उसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह किसी भी धर्म के ईश्वर की अवधारणा पर लागू हो सकता है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो केवल एक ही धर्म तक सीमित हो। मैंने इन विषयों पर अपने "A Mantra to enhance your mental capabilities" पुस्तक में और विस्तार से चर्चा की है। इसलिए, सभी बच्चों को यह मंत्र जप करना सिखाया जा सकता है। लेकिन प्रभावी होने के लिए, इसे नियमित रूप से, बिना चूके, एक निश्चित अवधि तक करना आवश्यक है। यह मंत्र कैसे काम करता है? इस मंत्र की ध्वनि संरचना जप करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में ध्यान प्रणाली को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। लेकिन यह केवल आवश्यक स्तर की एकाग्रता देती है — अत्यधिक नहीं। यह संतुलित एकाग्रता वही है जो अलग-अलग विषय पढ़ने वाले बच्चे को चाहिए होती है। आगे जीवन में भी विभिन्न कार्यों को संभालने में यह मदद करती है। लेकिन अत्यधिक एकाग्रता व्यक्ति को एक ही विषय में पूरी तरह डुबो सकती है, जिससे एक साथ कई काम करना कठिन हो जाता है। ज़रूरी है संतुलित एकाग्रता — पूर्ण तल्लीनता नहीं। क्या "ओम" जप करने से भी एकाग्रता नहीं बढ़ती? तो फिर गायत्री मंत्र के बजाय "ओम" क्यों न जपें? "ओम" का लंबे समय तक जप करने से अत्यधिक एकाग्रता हो सकती है। कुछ गुरुओं द्वारा प्रचारित "ओम" आधारित ध्यान विधियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक एकाग्रता कुछ दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती है। परंपरागत रूप से, "ओम" ध्यान केवल उन्हीं लोगों के लिए था जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था और पूरी तरह आध्यात्मिक साधना में लगे थे — यानी सन्यासी। उनका एकमात्र लक्ष्य संसार के बंधनों से मुक्ति पाना होता है। ऐसे लोगों के लिए पूर्ण एकाग्रता बहुत सहायक होती है, क्योंकि यह उन्हें जल्दी ही पूरी तरह शांत मन की अवस्था में ले जाती है — जिसे पतंजलि "निरुद्ध चित्त" कहते हैं। यही अंततः उन्हें उनके परम लक्ष्य तक पहुँचाती है। लेकिन एक सामान्य जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए यही "निरुद्ध चित्त" अवस्था सहायक होने के बजाय बाधा बन सकती है, क्योंकि यह दैनिक कार्यों में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देती। फिर से कहूँ — एकाग्रता चाहिए, लेकिन पूर्ण तल्लीनता नहीं। इसलिए, बच्चों को "ओम" ध्यान सिखाना सही विकल्प नहीं है। और एक बार फिर — ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में उपयोग न करें। अगर आपकी कक्षा में बच्चे शोर कर रहे हैं, तो उनका ध्यान किसी रचनात्मक गतिविधि की ओर मोड़ें। इससे वे शांत भी होंगे और उनकी क्षमता भी विकसित होगी। बच्चों को ध्यान सिखाइए — लेकिन "ओम" पर आधारित नहीं। "ओम" को एक विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;एकाग्रता। शांति। स्पष्टता।&amp;nbsp;&amp;nbsp;"ध्यान का उपयोग आक्रामक व्यवहार को कम करने के लिए कियाजासकता है" इस विषय पर दिए गए मेरे व्याख्यान पर प्रतिक्रिया देते हुए, एक स्कूल की शिक्षिका ने मुझसे दो प्रश्न पूछे। पहला, वह जानना चाहती थीं कि बच्चों को ध्यान अभ्यास से किस उम्र में परिचित कराया जा सकता है। दूसरा, उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनके उस तरीके का समर्थन करता हूँ जिसमें वह शोरगुल वाली कक्षा को शांत करने के लिए बच्चों से "ओम" जप करवाती हैं। उनके अनुभव के अनुसार, ऐसा करने से बच्चे कम से कम कुछ समय के लिए शांत हो जाते हैं। ये दोनों प्रश्न बहुत रोचक हैं और थोड़ा विस्तार से उत्तर की अपेक्षा करते हैं। यही हम इस भाग में देखेंगे। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); सबसे पहले — बच्चे को किस उम्र में ध्यान सिखाना चाहिए? अगर आजकल के कई माता-पिता की तरह बच्चे को इंटरनेट और मोबाइल के शोर के संपर्क में ज़्यादा नहीं रखा गया हो, तो बच्चे का मस्तिष्क किसी भी ध्यान अभ्यास को ग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होता है। वह छोटा मस्तिष्क मुलायम मिट्टी की तरह होता है — बहुत आसानी से आकार लेसकता है। बाहरी विचलन, जो उसे भटकाते हैं, हमारे मुकाबले बहुत कम होते हैं। इसलिए यही ध्यान शुरू करने का सही समय है। लेकिन, दूसरे प्रश्न में दिखने वाली तरह ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। अगर सही ध्यान अभ्यास पहले से विकसित किया गया होता, तो ऐसी स्थितियाँ शायद ही उत्पन्न होतीं। तो फिर, ध्यान सिखाने की सही उम्र क्या है? आपके नाम से लगता है कि आप भारतीय हैं। अगर ऐसा है, तो इस विषय में गहरा अध्ययन करने वाले अपने पूर्वजों पर आपको गर्व होना चाहिए। प्राचीन भारत में, जब बच्चे स्कूल में प्रवेश करते थे, तब उन्हें गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता था। यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। यह एक छोटा मंत्र है जिसे एक निश्चित विधि से, दिन में दो बार, एक निश्चित अवधि तक जपना होता है। इसका उद्देश्य मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को बढ़ाना है। यह कहना ज़रूरी नहीं कि इससे बच्चों को पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। आगे चलकर जीवन में भी एक तेज़ दिमाग बहुत काम आता है। इसलिए, इस मंत्र को जीवन भर जपने की सलाह दी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन दिनों अन्य मंत्रों का जप करने की अनुमति नहीं होती, उन दिनों भी इसका जप नहीं छोड़ना चाहिए। किसी भी मंत्र का नियमित जप अपने आप में एक प्रकार का ध्यान बनजाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भले ही ग्रहण क्षमता को तेज करना हो, लेकिन यह मन को शांत करता है और सोच में स्पष्टता लाता है। हजारों सालों से यह परंपरा चली आ रही है, फिर भी कई गलत धारणाओं के कारण यह प्राचीन ध्यान पद्धति धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है। स्पष्टता के लिए कुछ प्रश्नों को देखते हैं। प्रश्न 1: इस अभ्यास को किस उम्र में शुरू करना चाहिए? परंपरागत रूप से, बच्चों को स्कूल में दाखिला देने की उम्र को गर्भाष्टम कहा जाता है — यानी माँ के गर्भ में बिताए समय सहित आठ वर्ष। लगभग देखें तो यह जन्म के बाद करीब सात साल होता है। लेकिन अगर आप बच्चे को एक महान विद्वान बनाना चाहते हैं, तो पाँच साल की उम्र में ही स्कूल में दाखिला कराया जा सकता है। उसी उम्र से ध्यान अभ्यास भी शुरूकिया जा सकता है। प्रश्न 2: क्या यह ध्यान केवल कुछ जातियों तक सीमित है? आज के समय में यह ब्राह्मणों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन परंपरागत रूप से केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि अन्य वर्णों के लोगों के लिए भी शिक्षा अनिवार्य थी। स्वाभाविक रूप से, सभी इस ध्यान अभ्यास के योग्य थे। प्रश्न 3: क्या यह अभ्यास केवल किसी एक लिंग के लिए है? आज के समय में यह केवल लड़कों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। यह बाद की एक विकृति है। प्राचीन भारत में लड़के और लड़कियाँ दोनों ही स्कूल जाने के पात्र थे। इसलिए दोनों से इस ध्यान अभ्यास की अपेक्षा की जाती थी। समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के कारण यह परंपरा बदल गई। मूल शास्त्र लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित नहीं करते। कुछ स्थानों पर यह कहा गया है कि लड़कियों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी मुख्य भूमिका परिवार का संचालन है। यह कोई कठोर नियम नहीं है — यह केवल भूमिकाओं का विभाजन है। आज की परिस्थिति में इसे कठोरता से पालन करने की आवश्यकता नहीं है। प्रश्न 4: क्या गायत्री मंत्र का जप महिलाओं की प्रजनन प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है? इससे बड़ा मज़ाक कुछ नहीं हो सकता! अगर कोई ऐसा कहता है, तो उससे प्रमाण माँगिए — चाहे वह शास्त्रीय हो, तर्कसंगत हो या प्रायोगिक। वे कोई प्रमाण नहीं देपाएँगे, क्योंकि यह एक निराधार गलत धारणा है। प्रश्न 5: क्या गैर-हिंदू लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं? क्या इससे उनके धर्म का उल्लंघन होगा? जो भी इस मंत्र का अर्थ समझता है, उसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह किसी भी धर्म के ईश्वर की अवधारणा पर लागू हो सकता है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो केवल एक ही धर्म तक सीमित हो। मैंने इन विषयों पर अपने "A Mantra to enhance your mental capabilities" पुस्तक में और विस्तार से चर्चा की है। इसलिए, सभी बच्चों को यह मंत्र जप करना सिखाया जा सकता है। लेकिन प्रभावी होने के लिए, इसे नियमित रूप से, बिना चूके, एक निश्चित अवधि तक करना आवश्यक है। यह मंत्र कैसे काम करता है? इस मंत्र की ध्वनि संरचना जप करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में ध्यान प्रणाली को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। लेकिन यह केवल आवश्यक स्तर की एकाग्रता देती है — अत्यधिक नहीं। यह संतुलित एकाग्रता वही है जो अलग-अलग विषय पढ़ने वाले बच्चे को चाहिए होती है। आगे जीवन में भी विभिन्न कार्यों को संभालने में यह मदद करती है। लेकिन अत्यधिक एकाग्रता व्यक्ति को एक ही विषय में पूरी तरह डुबो सकती है, जिससे एक साथ कई काम करना कठिन हो जाता है। ज़रूरी है संतुलित एकाग्रता — पूर्ण तल्लीनता नहीं। क्या "ओम" जप करने से भी एकाग्रता नहीं बढ़ती? तो फिर गायत्री मंत्र के बजाय "ओम" क्यों न जपें? "ओम" का लंबे समय तक जप करने से अत्यधिक एकाग्रता हो सकती है। कुछ गुरुओं द्वारा प्रचारित "ओम" आधारित ध्यान विधियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक एकाग्रता कुछ दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती है। परंपरागत रूप से, "ओम" ध्यान केवल उन्हीं लोगों के लिए था जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था और पूरी तरह आध्यात्मिक साधना में लगे थे — यानी सन्यासी। उनका एकमात्र लक्ष्य संसार के बंधनों से मुक्ति पाना होता है। ऐसे लोगों के लिए पूर्ण एकाग्रता बहुत सहायक होती है, क्योंकि यह उन्हें जल्दी ही पूरी तरह शांत मन की अवस्था में ले जाती है — जिसे पतंजलि "निरुद्ध चित्त" कहते हैं। यही अंततः उन्हें उनके परम लक्ष्य तक पहुँचाती है। लेकिन एक सामान्य जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए यही "निरुद्ध चित्त" अवस्था सहायक होने के बजाय बाधा बन सकती है, क्योंकि यह दैनिक कार्यों में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देती। फिर से कहूँ — एकाग्रता चाहिए, लेकिन पूर्ण तल्लीनता नहीं। इसलिए, बच्चों को "ओम" ध्यान सिखाना सही विकल्प नहीं है। और एक बार फिर — ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में उपयोग न करें। अगर आपकी कक्षा में बच्चे शोर कर रहे हैं, तो उनका ध्यान किसी रचनात्मक गतिविधि की ओर मोड़ें। इससे वे शांत भी होंगे और उनकी क्षमता भी विकसित होगी। बच्चों को ध्यान सिखाइए — लेकिन "ओम" पर आधारित नहीं। "ओम" को एक विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #Meditation, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] ध्यान संभवतः एक अधिक शांतिपूर्ण दुनिया की ओर लेजासकता है</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/04/hindi_098830070.html</link><category>#Hindi</category><category>#Meditation</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Fri, 17 Apr 2026 19:22:40 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1203787381333272367</guid><description>

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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;Poonjaji अपने कम बोलने केलिए जाने जातेथे, मानो वे कुछ सिखाने से लगभग इंकार ही करते हों। तो फिर इतनी गहरी अनुभूति कैसे हुई,—बिना किसी शारीरिक या मौखिक माध्यम के?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही बात Sam को परेशान कररही थी। उनके तर्कसंगत मन के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या मन बिना किसी सीधे माध्यम के संवाद करसकता है? और क्या ऐसा संवाद इतना गहरा, इतना परिवर्तित करने वाला, और फिर भी इतना स्पष्ट हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Sam केलिए यह एक ऐसा रहस्य बना रहा जिसे वे अपने पूरे न्यूरोसाइंस ज्ञान के बावजूद कभी सुलझा नहीं पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हाँ, ऐसा लगता है कि कुछ अवस्थाओं में मन में ऐसी क्षमताएँ होती हैं। यह बिना शब्दों के भी संवाद करसकता है—सिर्फ मनुष्यों के साथ ही नहीं, बल्कि जानवरों और अन्य जीवों के साथ भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कुत्तों को, और यहाँ तक कि ज़हरीले साँपों को भी, एक विशेष मानसिक अवस्था में पास जाने पर पूरी तरह शांत होते देखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह सच है, तो क्या केवल मानसिक शक्ति से किसी आक्रामक व्यक्ति को पूरी तरह बदलना संभव है? ऐसा होसके तो सभी संघर्ष और युद्ध समाप्त हो जाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1970 और 80 के दशक में, प्रसिद्ध भारतीय गुरु Mahesh Yogi-ने ऐसा ही दावा किया था। उन्होंने कहा कि वे ध्यान करने वालों के एक समूह को युद्धक्षेत्र में भेजकर, भीषण युद्धों को रोक सकते हैं। वे लोग चुपचाप ध्यान करेंगे—और विरोधी अपनी आक्रामकता छोड़देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश यह सच होता। इससे बहुत सी जानें और पीड़ा बच सकती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या कोई मन,—चाहे वह किसी भी अवस्था में हो—दूसरे मन को इस तरह प्रभावित करसकता है कि वह अपनी आक्रामक प्रवृत्तियाँ छोड़दे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास को देखें तो, नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है।&lt;br /&gt;&lt;br 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Sam केलिए यह एक ऐसा रहस्य बना रहा जिसे वे अपने पूरे न्यूरोसाइंस ज्ञान के बावजूद कभी सुलझा नहीं पाए। लेकिन हाँ, ऐसा लगता है कि कुछ अवस्थाओं में मन में ऐसी क्षमताएँ होती हैं। यह बिना शब्दों के भी संवाद करसकता है—सिर्फ मनुष्यों के साथ ही नहीं, बल्कि जानवरों और अन्य जीवों के साथ भी। मैंने कुत्तों को, और यहाँ तक कि ज़हरीले साँपों को भी, एक विशेष मानसिक अवस्था में पास जाने पर पूरी तरह शांत होते देखा है। अगर यह सच है, तो क्या केवल मानसिक शक्ति से किसी आक्रामक व्यक्ति को पूरी तरह बदलना संभव है? ऐसा होसके तो सभी संघर्ष और युद्ध समाप्त हो जाएँ। 1970 और 80 के दशक में, प्रसिद्ध भारतीय गुरु Mahesh Yogi-ने ऐसा ही दावा किया था। उन्होंने कहा कि वे ध्यान करने वालों के एक समूह को युद्धक्षेत्र में भेजकर, भीषण युद्धों को रोक सकते हैं। वे लोग चुपचाप ध्यान करेंगे—और विरोधी अपनी आक्रामकता छोड़देगा। काश यह सच होता। इससे बहुत सी जानें और पीड़ा बच सकती थी। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या कोई मन,—चाहे वह किसी भी अवस्था में हो—दूसरे मन को इस तरह प्रभावित करसकता है कि वह अपनी आक्रामक प्रवृत्तियाँ छोड़दे? Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया। व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है? इतिहास को देखें तो, नहीं। Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके। इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके। जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए। इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है। यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है। इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है। ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है। इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में। हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा। लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए? आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है। • कोई तेज़ श्वास लेनेकी सलाह देता है। • कोई श्वास को शांतहोकर देखने की बात करता है। • कोई नाक की नोक या भौंहों के बीच देखने को कहता है। • कोई रीढ़ में ऊपर-नीचे चलने वाली 'ऊर्जा' पर ध्यान लगानेको कहता है। • कोई, एक अक्षर के ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करनेको कहता है। • कोई मंत्र जपनेको कहता है। जितने गुरु, उतनी विधियाँ। कौन-सी सबसे अच्छी है? यह पूछना, जैसा है कि, खाने का सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है? एक जापानी या चीनी व्यक्ति, चॉपस्टिक्स का उपयोग करता है। एक यूरोपीय, चाकू और कांटे का उपयोग करता है। एक भारतीय, अपने हाथोंसे खाना पसंद करता है। • कोई भी तरीका श्रेष्ठ नहीं है, और कोई भी निम्न नहीं है। • जब तक उद्देश्य भूख मिटाना है, कोई भी तरीका ठीक है। • जो आपकेलिए सुविधाजनक हो, वही आपकेलिए सही है। • बस, कोई आपसे उल्टाखड़ेहोकर खाने को न कहे, तो सब ठीक है। इसी तरह, जब तक ध्यान, आपको एक शांत मन की ओर ले जाता है, वह ठीक है। जोभी आपको किसी भ्रमात्मक रास्ते पर लेजाए, उससे बचना चाहिए। क्या इन में से कोई विधि, आपको उस सार्वभौमिक मन की अवस्था तक लेजाती है, जिसके बारे में मैंने कुछ पिछले एपिसोड में बात की थी? या ऐसे मन तक, जो दूसरोंको प्रभावित कर सके? यह एक अलग विषय है। शायद, मैं इस पर किसीऔर समय बात करूँगा। लेकिन कोई भी ध्यान अभ्यास, निश्चित रूप से संघर्ष की संभावना को कम करेगा,—और यही हमारी मुख्य चर्चा का विषय है। तो आइए, याद रखें— • विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास, • धर्मों की सही समझ, • अनियंत्रित इच्छाओं पर संयम, • और नियमित ध्यान अभ्यास। ये त्वरित समाधान नहीं हैं। ये रातों-रात संघर्ष खत्म नहीं करेंगे। लेकिन ये एक अलग तरह का मन बना सकते हैं,— ऐसा मन, जो रुकता है, सोचता है, और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया नहीं करता। और, अगर ऐसे मन अधिक सामान्य हो जाएँ, तो वे जो दुनिया बनाएँगे, वह भी अलग होगी। कम से कम, हम यह संभावना अपने बच्चोंको देसकते हैं.— उनके भविष्य केलिए, और उस दुनिया केलिए, जिसे वे विरासत में पाएँगे। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;अपने एक संवाद में, Sam Harris बताते हैं कि जब उनकी मुलाकात भारतीय गुरु Poonjaji से हुई, तो उन्हें एक बहुत ही रोचक अनुभव हुआ। वे कहते हैं कि यह अनुभव उन कई ध्यान शिविरों से भी कहीं गहरा था, जिनमें उन्होंने महीनों तक भाग लिया था। वैसे, Sam Harris एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट हैं जो बाद में ध्यान शिक्षक बन गए। उन्होंने भारत में कई वर्षों तक ध्यान का अध्ययन किया। वे एक अत्यंत तर्कशील व्यक्ति हैं, और उनकी मुख्य रुचि यह समझने में थी कि ध्यान कैसे MDMA जैसी नशीलीदवाओं से मिलनेवाले अनुभवों जैसा प्रभाव पैदा करसकता है। Poonjaji की शिक्षाओं ने Sam को ज्यादा प्रभावित नहीं किया। लेकिन एक और बात ने उन्हें उलझन में डाल दिया। केवल Poonjaji की उपस्थिति, वह भी थोड़े समय केलिए, उन्हें इतनी गहरी अनुभूतितक कैसे ले गई? 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Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया। व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है? इतिहास को देखें तो, नहीं। Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके। इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके। जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए। इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है। यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है। इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है। ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है। इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में। हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा। लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए? आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है। • कोई तेज़ श्वास लेनेकी सलाह देता है। • कोई श्वास को शांतहोकर देखने की बात करता है। • कोई नाक की नोक या भौंहों के बीच देखने को कहता है। • कोई रीढ़ में ऊपर-नीचे चलने वाली 'ऊर्जा' पर ध्यान लगानेको कहता है। • कोई, एक अक्षर के ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करनेको कहता है। • कोई मंत्र जपनेको कहता है। जितने गुरु, उतनी विधियाँ। कौन-सी सबसे अच्छी है? यह पूछना, जैसा है कि, खाने का सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है? एक जापानी या चीनी व्यक्ति, चॉपस्टिक्स का उपयोग करता है। एक यूरोपीय, चाकू और कांटे का उपयोग करता है। एक भारतीय, अपने हाथोंसे खाना पसंद करता है। • कोई भी तरीका श्रेष्ठ नहीं है, और कोई भी निम्न नहीं है। • जब तक उद्देश्य भूख मिटाना है, कोई भी तरीका ठीक है। • जो आपकेलिए सुविधाजनक हो, वही आपकेलिए सही है। • बस, कोई आपसे उल्टाखड़ेहोकर खाने को न कहे, तो सब ठीक है। इसी तरह, जब तक ध्यान, आपको एक शांत मन की ओर ले जाता है, वह ठीक है। जोभी आपको किसी भ्रमात्मक रास्ते पर लेजाए, उससे बचना चाहिए। क्या इन में से कोई विधि, आपको उस सार्वभौमिक मन की अवस्था तक लेजाती है, जिसके बारे में मैंने कुछ पिछले एपिसोड में बात की थी? या ऐसे मन तक, जो दूसरोंको प्रभावित कर सके? यह एक अलग विषय है। शायद, मैं इस पर किसीऔर समय बात करूँगा। लेकिन कोई भी ध्यान अभ्यास, निश्चित रूप से संघर्ष की संभावना को कम करेगा,—और यही हमारी मुख्य चर्चा का विषय है। तो आइए, याद रखें— • विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास, • धर्मों की सही समझ, • अनियंत्रित इच्छाओं पर संयम, • और नियमित ध्यान अभ्यास। ये त्वरित समाधान नहीं हैं। ये रातों-रात संघर्ष खत्म नहीं करेंगे। लेकिन ये एक अलग तरह का मन बना सकते हैं,— ऐसा मन, जो रुकता है, सोचता है, और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया नहीं करता। और, अगर ऐसे मन अधिक सामान्य हो जाएँ, तो वे जो दुनिया बनाएँगे, वह भी अलग होगी। कम से कम, हम यह संभावना अपने बच्चोंको देसकते हैं.— उनके भविष्य केलिए, और उस दुनिया केलिए, जिसे वे विरासत में पाएँगे। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #Meditation, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] कभी बाघ पर सवारी मत करो!</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/04/hindi_0853525893.html</link><category>#audiobook</category><category>#Gita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Krishna</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Fri, 10 Apr 2026 19:04:17 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-6254070527972233720</guid><description>

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&lt;a href="http://doctor-king-online.blogspot.com/2018/02/quick-links-to-drkings-books-on.html" target="_blank"&gt;[Quick links] &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiiewkkOHv4xWeY2hx1FxR-Gt-lBo93yPjLVYofyPEJ_SUN_51CluRWOMi13bsh2RbOYfoWUrCBGHVRtoMVyUGzRJ3C3NFuHJNjgHNT3e2W0gtlXy22UXIrSiiosqRwC426Meaewj-Bwqj8zZ6b2KOF4Ezc2xIZHG5PtJy-Zwk639RvMKq2iwG3jPpvPIc/s1024/riding%20a%20tiger2.png" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="1024" data-original-width="1024" height="640" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiiewkkOHv4xWeY2hx1FxR-Gt-lBo93yPjLVYofyPEJ_SUN_51CluRWOMi13bsh2RbOYfoWUrCBGHVRtoMVyUGzRJ3C3NFuHJNjgHNT3e2W0gtlXy22UXIrSiiosqRwC426Meaewj-Bwqj8zZ6b2KOF4Ezc2xIZHG5PtJy-Zwk639RvMKq2iwG3jPpvPIc/w640-h640/riding%20a%20tiger2.png" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;आपने&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; शायद लोगों को घोड़े पर सवारी करते देखा होगा। शायद आपने यह भी सुना होगा कि लोग अरब के रेगिस्तानों में ऊँट पर सवारी करते हैं। लेकिन बाघ पर सवारी? बिलकुल नहीं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, अजीब बात है कि हममें से बहुत से लोग यही करते रहते हैं। हालांकि हमें इसका एहसास बहुत कम होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-----------------------------&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मैं उस भयंकर जीव की बात नहीं कर रहा हूँ जो जंगल पर राज करता है। मैं एक बिल्कुल अलग तरह के जीव की बात कर रहा हूँ। मैं "बाघ" शब्द का उपयोग रूपक के रूप में कर रहा हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;ऐसे कई तरह के बाघ हैं, जिन पर लोग अक्सर सवारी करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी करते हैं। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि वही महाशक्ति हैं, और सभी को उनके सामने झुकना चाहिए। वे तय करते हैं कि दूसरों के लिए क्या सही है और क्या गलत। वे यह भी तय करते हैं कि दूसरों को कैसे व्यवहार करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ और लोग शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं। वे सब कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं। वे हमेशा एक कोड़ा लिए रहते हैं ताकि गलती करने वालों को दंड दे सकें। वे नैतिक पुलिस की भूमिका निभाते हैं। वे बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियारों का ढेर इकट्ठा करते हैं। लेकिन जब कोई और ऐसा करता है तो वे हंगामा खड़ा कर देते हैं। वे दूसरों को धमकाते हैं कि जो उनकी बात नहीं मानेगा, उसे वे नष्ट कर देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास ने दिखाया है कि ऐसे लोग, जो श्रेष्ठता और शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं, हमेशा डर, संदेह और विश्वासघात से भरी ज़िंदगी जीते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग धन के बाघ पर सवारी करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे लगातार धन इकट्ठा करते रहते हैं, मानो यह कभी खत्म न होने वाला जुनून हो। जितना अधिक धन वे इकट्ठा करते हैं, उतनी ही उनकी लालसा बढ़ती जाती है। इससे उन्हें बाघ से उतरने का कोई समय नहीं मिलता।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बाघ आखिर बाघ ही होते हैं। आप किसी तरह उन पर सवारी तो कर सकते हैं, लेकिन उनसे उतरना संभव नहीं होता। जैसे ही आप उतरते हैं, या उतरने की कोशिश करते हैं, वे आप पर झपट पड़ते हैं, और आप खत्म हो जाते हैं। अगर किसी तरह बच भी गए, तो दूसरे बाघ किसी कमजोर का इंतजार कर रहे होते हैं।&lt;br /&gt;इसलिए, बाघ पर सवारी करना कभी भी सुरक्षित विकल्प नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से, हमारे पास ऐसे गुरू हैं जो अपने शिष्यों को धन के बाघ, नाम और प्रसिद्धि के बाघ पर सवारी करने के लिए उकसाते हैं। वे कहते हैं कि धन इकट्ठा करने में कुछ भी गलत नहीं है। उनके अनुसार सादगी एक पुरानी और बेकार हो चुकी सद्गुण है — वही जो यीशु या बुद्ध जैसे लोगों ने सिखाई थी।&lt;br /&gt;लोग ऐसे गुरुओं के पास उमड़ पड़ते हैं। इससे उन्हें अपनी ही बाघ सवारी को सही ठहराने का मौका मिल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उन गुरुओं का क्या हुआ जिन्होंने ऐसी सवारी की? उन्हें उनके अपने करीबी लोगों ने ही धोखा दिया। उन्होंने डर और संदेह से भरी ज़िंदगी जी, और अंत में अपने ही भरोसेमंद अनुयायियों द्वारा समाप्त कर दिए गए।&lt;br /&gt;अगर आप बाघ को काबू में नहीं रख पाएँ, तो वह यही करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की स्थिति को देखिए। जो लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को नैतिक उपदेश दे रहे हैं। और जो लोग पूर्ण शक्ति के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लोग विनाश के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों से हथियार छोड़ने और उनकी बात मानने को कह रहे हैं।&lt;br /&gt;व्यक्तिगत स्तर पर भी, हममें से बहुत से लोग धन और विलासिता के प्रति असीम लालसा के बाघ पर सवारी करने की गलती करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;आखिर कोई ऐसा क्यों करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही प्रश्न भारतीय योद्धा अर्जुन ने भगवद्गीता में कृष्ण से पूछा था।&lt;br /&gt;उन्होंने पूछा:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"लोग गलत काम क्यों करते हैं, मानो उन्हें इसके लिए मजबूर किया जा रहा हो?"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण का सरल उत्तर था:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"अत्यधिक इच्छा और घृणा ही मनुष्य को ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यही उसके सबसे बड़े शत्रु हैं"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण इन दोनों की तुलना उस धुएँ से करते हैं जो आग को ढक लेता है। आग अपने आप में उज्ज्वल और प्रकाशमान होती है। लेकिन जब वह धुएँ से ढक जाती है, तो उसकी चमक खो जाती है।&lt;br /&gt;इसी तरह, जब कोई व्यक्ति इन दोनों के प्रभाव में आ जाता है, तो उसकी स्वाभाविक सरल और शांत प्रकृति विकृत हो जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;वे कहते हैं कि ये दोनों उस धूल की तरह हैं जो एक साफ दर्पण पर जम जाती है। एक साफ दर्पण सामने की चीज़ों को वैसा ही दिखाता है जैसा वे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब वही दर्पण धूल से ढक जाता है, तो वह सामने वाले व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखाने में असमर्थ हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि इन्हें राग और द्वेष कहते हैं। वे कहते हैं कि ये दोनों मनुष्य के मन में पहले से ही मौजूद होते हैं। लोग अक्सर इनके प्रभाव में आकर गलत कार्य करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्ध भी इन दोनों शत्रुओं के प्रति चेतावनी देते हैं और इन्हें नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं। एक अनियंत्रित बाघ हमेशा खतरनाक होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यीशु ने भी यही कहा। उन्होंने हमेशा सादा जीवन और करुणा तथा समझ का उपदेश दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही हमारे आसपास दिखाई देने वाले 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&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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बिलकुल नहीं! लेकिन, अजीब बात है कि हममें से बहुत से लोग यही करते रहते हैं। हालांकि हमें इसका एहसास बहुत कम होता है। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); मैं उस भयंकर जीव की बात नहीं कर रहा हूँ जो जंगल पर राज करता है। मैं एक बिल्कुल अलग तरह के जीव की बात कर रहा हूँ। मैं "बाघ" शब्द का उपयोग रूपक के रूप में कर रहा हूँ। ऐसे कई तरह के बाघ हैं, जिन पर लोग अक्सर सवारी करते हैं। कुछ लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी करते हैं। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि वही महाशक्ति हैं, और सभी को उनके सामने झुकना चाहिए। वे तय करते हैं कि दूसरों के लिए क्या सही है और क्या गलत। वे यह भी तय करते हैं कि दूसरों को कैसे व्यवहार करना चाहिए। कुछ और लोग शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं। वे सब कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं। वे हमेशा एक कोड़ा लिए रहते हैं ताकि गलती करने वालों को दंड दे सकें। वे नैतिक पुलिस की भूमिका निभाते हैं। वे बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियारों का ढेर इकट्ठा करते हैं। लेकिन जब कोई और ऐसा करता है तो वे हंगामा खड़ा कर देते हैं। वे दूसरों को धमकाते हैं कि जो उनकी बात नहीं मानेगा, उसे वे नष्ट कर देंगे। इतिहास ने दिखाया है कि ऐसे लोग, जो श्रेष्ठता और शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं, हमेशा डर, संदेह और विश्वासघात से भरी ज़िंदगी जीते हैं। कुछ लोग धन के बाघ पर सवारी करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे लगातार धन इकट्ठा करते रहते हैं, मानो यह कभी खत्म न होने वाला जुनून हो। जितना अधिक धन वे इकट्ठा करते हैं, उतनी ही उनकी लालसा बढ़ती जाती है। इससे उन्हें बाघ से उतरने का कोई समय नहीं मिलता। लेकिन बाघ आखिर बाघ ही होते हैं। आप किसी तरह उन पर सवारी तो कर सकते हैं, लेकिन उनसे उतरना संभव नहीं होता। जैसे ही आप उतरते हैं, या उतरने की कोशिश करते हैं, वे आप पर झपट पड़ते हैं, और आप खत्म हो जाते हैं। अगर किसी तरह बच भी गए, तो दूसरे बाघ किसी कमजोर का इंतजार कर रहे होते हैं। इसलिए, बाघ पर सवारी करना कभी भी सुरक्षित विकल्प नहीं है। दुर्भाग्य से, हमारे पास ऐसे गुरू हैं जो अपने शिष्यों को धन के बाघ, नाम और प्रसिद्धि के बाघ पर सवारी करने के लिए उकसाते हैं। वे कहते हैं कि धन इकट्ठा करने में कुछ भी गलत नहीं है। उनके अनुसार सादगी एक पुरानी और बेकार हो चुकी सद्गुण है — वही जो यीशु या बुद्ध जैसे लोगों ने सिखाई थी। लोग ऐसे गुरुओं के पास उमड़ पड़ते हैं। इससे उन्हें अपनी ही बाघ सवारी को सही ठहराने का मौका मिल जाता है। लेकिन उन गुरुओं का क्या हुआ जिन्होंने ऐसी सवारी की? उन्हें उनके अपने करीबी लोगों ने ही धोखा दिया। उन्होंने डर और संदेह से भरी ज़िंदगी जी, और अंत में अपने ही भरोसेमंद अनुयायियों द्वारा समाप्त कर दिए गए। अगर आप बाघ को काबू में नहीं रख पाएँ, तो वह यही करेगा। आज की स्थिति को देखिए। जो लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को नैतिक उपदेश दे रहे हैं। और जो लोग पूर्ण शक्ति के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लोग विनाश के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों से हथियार छोड़ने और उनकी बात मानने को कह रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी, हममें से बहुत से लोग धन और विलासिता के प्रति असीम लालसा के बाघ पर सवारी करने की गलती करते हैं। आखिर कोई ऐसा क्यों करता है? यही प्रश्न भारतीय योद्धा अर्जुन ने भगवद्गीता में कृष्ण से पूछा था। उन्होंने पूछा: "लोग गलत काम क्यों करते हैं, मानो उन्हें इसके लिए मजबूर किया जा रहा हो?" कृष्ण का सरल उत्तर था: "अत्यधिक इच्छा और घृणा ही मनुष्य को ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यही उसके सबसे बड़े शत्रु हैं" कृष्ण इन दोनों की तुलना उस धुएँ से करते हैं जो आग को ढक लेता है। आग अपने आप में उज्ज्वल और प्रकाशमान होती है। लेकिन जब वह धुएँ से ढक जाती है, तो उसकी चमक खो जाती है। इसी तरह, जब कोई व्यक्ति इन दोनों के प्रभाव में आ जाता है, तो उसकी स्वाभाविक सरल और शांत प्रकृति विकृत हो जाती है। वे कहते हैं कि ये दोनों उस धूल की तरह हैं जो एक साफ दर्पण पर जम जाती है। एक साफ दर्पण सामने की चीज़ों को वैसा ही दिखाता है जैसा वे हैं। लेकिन जब वही दर्पण धूल से ढक जाता है, तो वह सामने वाले व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखाने में असमर्थ हो जाता है। पतंजलि इन्हें राग और द्वेष कहते हैं। वे कहते हैं कि ये दोनों मनुष्य के मन में पहले से ही मौजूद होते हैं। लोग अक्सर इनके प्रभाव में आकर गलत कार्य करते हैं। बुद्ध भी इन दोनों शत्रुओं के प्रति चेतावनी देते हैं और इन्हें नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं। एक अनियंत्रित बाघ हमेशा खतरनाक होता है। यीशु ने भी यही कहा। उन्होंने हमेशा सादा जीवन और करुणा तथा समझ का उपदेश दिया। यही हमारे आसपास दिखाई देने वाले युद्धों और संघर्षों के मूल कारणों में से एक है। लेकिन इसका समाधान क्या है? जैसा कि कृष्ण कहते हैं: "इन प्रवृत्तियों को दृढ़ इच्छाशक्ति से नियंत्रित करना चाहिए" यह कहना आसान है, करना कठिन। हममें से कई लोग गहरे जमे हुए मानसिक ढाँचे के साथ बड़े हुए हैं। जैसा कि कहा जाता है —- "पुराना कुत्ता नए करतब नहीं सीख सकता।" बड़ों के लिए अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को बदलना बहुत कठिन होता है। वे गलतियाँ करते हैं, कभी अनजाने में और कभी जानबूझकर। तो समाधान क्या है? हमारी एकमात्र आशा है कि हम अपने बच्चों को इस तरह से पालें कि वे इन जालों में न फँसें। क्या हम कम से कम ऐसा कर रहे हैं? यही सही समय है उनके मन को आकार देने का। यही समय है अच्छे बीज बोने का, ताकि वे अद्भुत इंसान बन सकें। अब, युद्धों और संघर्षों के समाधान पर वापस आते हैं, तो जब नुकसान हो चुका हो, तब आग बुझाने से कोई लाभ नहीं होता। इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता, और वर्तमान को भी बहुत अधिक नहीं बदला जा सकता। हम केवल बेहतर भविष्य की आशा कर सकते हैं। इसके लिए हमें कम से कम दो काम करने होंगे। • धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न आपसी घृणा और गलतफहमी को समाप्त करना। यह अपने धर्म और दूसरों के धर्म की सही समझ के माध्यम से किया जा सकता है। इस पर मैंने एक पिछले एपिसोड में चर्चा की थी। दूसरा, • अनियंत्रित लालच और घृणा के गुलाम बनने से बचना; ऐसे लुभावने बाघ की सवारी से दूर रहकर। हमें इन बातों को अपने बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा में शामिल करना होगा। हमें उन्हें जिम्मेदार इंसान बनाना होगा, न कि केवल पैसा कमाने वाली मशीनें। लेकिन, क्या हम ऐसा कर रहे हैं? &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आपने शायद लोगों को घोड़े पर सवारी करते देखा होगा। शायद आपने यह भी सुना होगा कि लोग अरब के रेगिस्तानों में ऊँट पर सवारी करते हैं। लेकिन बाघ पर सवारी? बिलकुल नहीं! लेकिन, अजीब बात है कि हममें से बहुत से लोग यही करते रहते हैं। हालांकि हमें इसका एहसास बहुत कम होता है। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); मैं उस भयंकर जीव की बात नहीं कर रहा हूँ जो जंगल पर राज करता है। मैं एक बिल्कुल अलग तरह के जीव की बात कर रहा हूँ। मैं "बाघ" शब्द का उपयोग रूपक के रूप में कर रहा हूँ। ऐसे कई तरह के बाघ हैं, जिन पर लोग अक्सर सवारी करते हैं। कुछ लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी करते हैं। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि वही महाशक्ति हैं, और सभी को उनके सामने झुकना चाहिए। वे तय करते हैं कि दूसरों के लिए क्या सही है और क्या गलत। वे यह भी तय करते हैं कि दूसरों को कैसे व्यवहार करना चाहिए। कुछ और लोग शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं। वे सब कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं। वे हमेशा एक कोड़ा लिए रहते हैं ताकि गलती करने वालों को दंड दे सकें। वे नैतिक पुलिस की भूमिका निभाते हैं। वे बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियारों का ढेर इकट्ठा करते हैं। लेकिन जब कोई और ऐसा करता है तो वे हंगामा खड़ा कर देते हैं। वे दूसरों को धमकाते हैं कि जो उनकी बात नहीं मानेगा, उसे वे नष्ट कर देंगे। इतिहास ने दिखाया है कि ऐसे लोग, जो श्रेष्ठता और शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं, हमेशा डर, संदेह और विश्वासघात से भरी ज़िंदगी जीते हैं। कुछ लोग धन के बाघ पर सवारी करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे लगातार धन इकट्ठा करते रहते हैं, मानो यह कभी खत्म न होने वाला जुनून हो। जितना अधिक धन वे इकट्ठा करते हैं, उतनी ही उनकी लालसा बढ़ती जाती है। इससे उन्हें बाघ से उतरने का कोई समय नहीं मिलता। लेकिन बाघ आखिर बाघ ही होते हैं। आप किसी तरह उन पर सवारी तो कर सकते हैं, लेकिन उनसे उतरना संभव नहीं होता। जैसे ही आप उतरते हैं, या उतरने की कोशिश करते हैं, वे आप पर झपट पड़ते हैं, और आप खत्म हो जाते हैं। अगर किसी तरह बच भी गए, तो दूसरे बाघ किसी कमजोर का इंतजार कर रहे होते हैं। इसलिए, बाघ पर सवारी करना कभी भी सुरक्षित विकल्प नहीं है। दुर्भाग्य से, हमारे पास ऐसे गुरू हैं जो अपने शिष्यों को धन के बाघ, नाम और प्रसिद्धि के बाघ पर सवारी करने के लिए उकसाते हैं। वे कहते हैं कि धन इकट्ठा करने में कुछ भी गलत नहीं है। उनके अनुसार सादगी एक पुरानी और बेकार हो चुकी सद्गुण है — वही जो यीशु या बुद्ध जैसे लोगों ने सिखाई थी। लोग ऐसे गुरुओं के पास उमड़ पड़ते हैं। इससे उन्हें अपनी ही बाघ सवारी को सही ठहराने का मौका मिल जाता है। लेकिन उन गुरुओं का क्या हुआ जिन्होंने ऐसी सवारी की? उन्हें उनके अपने करीबी लोगों ने ही धोखा दिया। उन्होंने डर और संदेह से भरी ज़िंदगी जी, और अंत में अपने ही भरोसेमंद अनुयायियों द्वारा समाप्त कर दिए गए। अगर आप बाघ को काबू में नहीं रख पाएँ, तो वह यही करेगा। आज की स्थिति को देखिए। जो लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को नैतिक उपदेश दे रहे हैं। और जो लोग पूर्ण शक्ति के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लोग विनाश के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों से हथियार छोड़ने और उनकी बात मानने को कह रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी, हममें से बहुत से लोग धन और विलासिता के प्रति असीम लालसा के बाघ पर सवारी करने की गलती करते हैं। आखिर कोई ऐसा क्यों करता है? यही प्रश्न भारतीय योद्धा अर्जुन ने भगवद्गीता में कृष्ण से पूछा था। उन्होंने पूछा: "लोग गलत काम क्यों करते हैं, मानो उन्हें इसके लिए मजबूर किया जा रहा हो?" कृष्ण का सरल उत्तर था: "अत्यधिक इच्छा और घृणा ही मनुष्य को ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यही उसके सबसे बड़े शत्रु हैं" कृष्ण इन दोनों की तुलना उस धुएँ से करते हैं जो आग को ढक लेता है। आग अपने आप में उज्ज्वल और प्रकाशमान होती है। लेकिन जब वह धुएँ से ढक जाती है, तो उसकी चमक खो जाती है। इसी तरह, जब कोई व्यक्ति इन दोनों के प्रभाव में आ जाता है, तो उसकी स्वाभाविक सरल और शांत प्रकृति विकृत हो जाती है। वे कहते हैं कि ये दोनों उस धूल की तरह हैं जो एक साफ दर्पण पर जम जाती है। एक साफ दर्पण सामने की चीज़ों को वैसा ही दिखाता है जैसा वे हैं। लेकिन जब वही दर्पण धूल से ढक जाता है, तो वह सामने वाले व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखाने में असमर्थ हो जाता है। पतंजलि इन्हें राग और द्वेष कहते हैं। वे कहते हैं कि ये दोनों मनुष्य के मन में पहले से ही मौजूद होते हैं। लोग अक्सर इनके प्रभाव में आकर गलत कार्य करते हैं। बुद्ध भी इन दोनों शत्रुओं के प्रति चेतावनी देते हैं और इन्हें नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं। एक अनियंत्रित बाघ हमेशा खतरनाक होता है। यीशु ने भी यही कहा। उन्होंने हमेशा सादा जीवन और करुणा तथा समझ का उपदेश दिया। यही हमारे आसपास दिखाई देने वाले युद्धों और संघर्षों के मूल कारणों में से एक है। लेकिन इसका समाधान क्या है? जैसा कि कृष्ण कहते हैं: "इन प्रवृत्तियों को दृढ़ इच्छाशक्ति से नियंत्रित करना चाहिए" यह कहना आसान है, करना कठिन। हममें से कई लोग गहरे जमे हुए मानसिक ढाँचे के साथ बड़े हुए हैं। जैसा कि कहा जाता है —- "पुराना कुत्ता नए करतब नहीं सीख सकता।" बड़ों के लिए अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को बदलना बहुत कठिन होता है। वे गलतियाँ करते हैं, कभी अनजाने में और कभी जानबूझकर। तो समाधान क्या है? हमारी एकमात्र आशा है कि हम अपने बच्चों को इस तरह से पालें कि वे इन जालों में न फँसें। क्या हम कम से कम ऐसा कर रहे हैं? यही सही समय है उनके मन को आकार देने का। यही समय है अच्छे बीज बोने का, ताकि वे अद्भुत इंसान बन सकें। अब, युद्धों और संघर्षों के समाधान पर वापस आते हैं, तो जब नुकसान हो चुका हो, तब आग बुझाने से कोई लाभ नहीं होता। इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता, और वर्तमान को भी बहुत अधिक नहीं बदला जा सकता। हम केवल बेहतर भविष्य की आशा कर सकते हैं। इसके लिए हमें कम से कम दो काम करने होंगे। • धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न आपसी घृणा और गलतफहमी को समाप्त करना। यह अपने धर्म और दूसरों के धर्म की सही समझ के माध्यम से किया जा सकता है। इस पर मैंने एक पिछले एपिसोड में चर्चा की थी। दूसरा, • अनियंत्रित लालच और घृणा के गुलाम बनने से बचना; ऐसे लुभावने बाघ की सवारी से दूर रहकर। हमें इन बातों को अपने बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा में शामिल करना होगा। हमें उन्हें जिम्मेदार इंसान बनाना होगा, न कि केवल पैसा कमाने वाली मशीनें। लेकिन, क्या हम ऐसा कर रहे हैं? &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#audiobook, #Gita, #Hindi, #IndianPhilosophy, #Krishna, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  परमानंद के चार मार्ग</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/04/hindi.html</link><category>#audiobook</category><category>#booktalk</category><category>#Gita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Krishna</category><category>#Mahabharata</category><category>#podcast</category><pubDate>Fri, 3 Apr 2026 19:42:55 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-5438461946282453156</guid><description>

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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;हम सब खुश रहना चाहते हैं। लेकिन खुशी का अर्थ व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार बदलता रहता है। एक ही व्यक्ति के लिए भी, अलग-अलग समयों पर खुशी का अनुभव अलग-अलग होसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जीवन के विभिन्न चरणों में हम अलग-अलग बातों से आनंद प्राप्त करते हैं। जीवन के आरंभ में हमारी खुशी, अधिकांशतः शारीरिक होती है। छोटा बच्चा माँ का दूध पीने से, माँ की गोद में सोने से, और खिलौनों से खेलने से आनंद पाता है। परंतु जैसे-जैसे वह शारीरिक और बौद्धिक रूप से बढ़ता जाता है, वह आनंद धीरे-धीरे बौद्धिक गतिविधियों से मिलने वाली खुशी की ओर मुड़ने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या शारीरिक और बौद्धिक खुशी से भी ऊपर कुछ और है? ऐसा प्रतीत होता है कि, है। उचित शब्द न मिलने के कारण मैं उसे 'आध्यात्मिक आनंद' कहता हूँ। यह आनंद न तो शारीरिक साधनों से मिलता है और न ही बौद्धिक रुचियों से। यह किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं करता। यह केवल मानसिक सुख भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे 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ग्रंथ में आज के समय के लिए उपयोगी अनेक विचार दिखाई देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य कैसे व्यवहार करता है? वह तनाव में क्यों आता है? और उस तनाव से कैसे बाहर निकला जा सकता है? – इन सभी विषयों को यह ग्रंथ स्पष्ट रूप से दिखाता है। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि यह यह भी बताता है कि अंतिम आनंद या परमानंद को कैसे प्राप्त किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवद्गीता में 'योग' शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया गया है। इस पुस्तक के अठारह अध्यायों में से प्रत्येक का शीर्षक किसी न किसी योग के नाम पर होने पर भी, सामान्य रूप से योग शब्द का अर्थ एक मार्ग के रूप में लिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवद्गीता का आरंभ, महावीर अर्जुन के मन के द्वंद्व से होता है – यह संदेह कि युद्ध करना चाहिए या नहीं।&lt;br /&gt;अर्जुन के मित्र, तत्त्वज्ञानी और मार्गदर्शक कृष्ण, विभिन्न मार्गों और विकल्पों को समझाकर उसे इस मानसिक उलझन से बाहर निकलने में सहायता करते हैं। वे सभी मार्ग वस्तुतः तनाव से मुक्ति के ही उपाय हैं। इस अर्थ में यह ग्रंथ, काफी हद तक मनोविश्लेषण से संबंधित ग्रंथ ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इस पुस्तक की व्याख्या मुख्यतः इसी दृष्टिकोण से करने जा रहा हूँ। भगवद्गीता की नाटकीय पृष्ठभूमि और धार्मिक पक्ष मेरे लिए द्वितीय स्थान पर हैं। इसके मनोविश्लेषणात्मक पक्षों तथा अंतिम आनंद को प्राप्त करने के लिए बताए गए विभिन्न मार्गों पर मैं अधिक चर्चा करना चाहता हूँ। वह अंतिम आनंद वास्तव में क्या है, इसे हम विभिन्न मार्गों को समझते हुए जानेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्ग भले ही अलग-अलग हों, अंत में हम देखेंगे कि अंतिम आनंद एक ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममें से कोई भी पूरी तरह एकजैसा नहीं होता – न शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से। इसलिए हम एक ही समस्या को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। उसी प्रकार, अंतिम आनंद को प्राप्त करने का मार्ग भी व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होता है, भले ही वह आनंद एक ही क्यों न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंतन का मार्ग, अथवा, ज्ञानयोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंतन का मार्ग, जिसे ज्ञानयोग भी कहा जाता है, विचारों के विश्लेषण पर आधारित है। मूल रूप से यह गहन चिंतन की ही प्रक्रिया है। आप प्रश्न पूछते हुए आगे 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के अनुसार, इस परम ज्ञान के समान और कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान सबसे अधिक पवित्र माना गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और भी रोचक बात यह है कि भगवद्गीता कहती है कि योगमार्ग का अनुसरण करने वाला व्यक्ति जिस भी परम अवस्था को प्राप्त करता है, वह यही है। अर्थात निरंतर ध्यान में लीन रहने वाला योगी भी अंततः इसी परम सत्य को प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी किताब सुनने के लिए, आप इसे या तो &lt;a href="https://tinyurl.com/mylibrary1234" target="_blank"&gt;डॉ. किंग की लाइब्रेरी&lt;/a&gt; से उधार ले सकते हैं, या फिर Google, Kobo और अन्य जैसे किसी भी ऑनलाइन स्टोर से खरीद सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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तो • क्या वह आनंद सभी के लिए एक ही होता है? • या व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार बदलता है? • यदि वह एक ही है, तो क्या हर कोई उसे प्राप्त कर सकता है? • उस अंतिम आनंद को अनुभव करने का मार्ग क्या है? • उसके लिए आवश्यक पूर्वशर्तें कौन-सी हैं? • उस आनंद को पाने के लिए हम किस प्रकार योग्य बनते हैं? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर हम इस पुस्तक में चर्चा करने जा रहे हैं। इन चर्चाओं का आधार, मैं भारतीय प्राचीन ग्रंथों में सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ, भगवद्गीता को बना रहा हूँ। इस तत्त्वग्रंथ पर संसार की लगभग सभी भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में ही नहीं, भगवद्गीता को अनेक लोग, मनोविज्ञान के ग्रंथ के रूप में भी देखते हैं। धार्मिक पृष्ठभूमि को अलग कर देने पर भी, इस अद्भुत ग्रंथ में आज के समय के लिए उपयोगी अनेक विचार दिखाई देते हैं। विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य कैसे व्यवहार करता है? वह तनाव में क्यों आता है? और उस तनाव से कैसे बाहर निकला जा सकता है? – इन सभी विषयों को यह ग्रंथ स्पष्ट रूप से दिखाता है। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि यह यह भी बताता है कि अंतिम आनंद या 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हों, अंत में हम देखेंगे कि अंतिम आनंद एक ही है। हममें से कोई भी पूरी तरह एकजैसा नहीं होता – न शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से। इसलिए हम एक ही समस्या को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। उसी प्रकार, अंतिम आनंद को प्राप्त करने का मार्ग भी व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होता है, भले ही वह आनंद एक ही क्यों न हो। चिंतन का मार्ग, अथवा, ज्ञानयोग चिंतन का मार्ग, जिसे ज्ञानयोग भी कहा जाता है, विचारों के विश्लेषण पर आधारित है। मूल रूप से यह गहन चिंतन की ही प्रक्रिया है। आप प्रश्न पूछते हुए आगे बढ़ते जाते हैं, और अंत में जिस विषय पर आप विचार कर रहे होते हैं, उसके परम सत्य को समझ लेते हैं। यदि आप किसी भौतिक वस्तु या सांसारिक विषय के बारे में चिंतन कर रहे हों, तो यह निरंतर विचार-प्रक्रिया अंततः आपको अपनी रुचि के विषय को, औरअधिक गहराई से समझने में सहायता करती है। एक वैज्ञानिक के आगे बढ़ने की विधि भी यही होती है। वह किसी समस्या को लेता है, उसके सभी पहलुओं पर विचार करता है, बहुत गहराई से चिंतन करता है, और अंत में उसे पूरी तरह समझ लेता है। किसी भी विषय पर चिंतन आरंभ करने से पहले, उसके बारे में किसी ऐसे 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समझते हुए जानेंगे। मार्ग भले ही अलग-अलग हों, अंत में हम देखेंगे कि अंतिम आनंद एक ही है। हममें से कोई भी पूरी तरह एकजैसा नहीं होता – न शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से। इसलिए हम एक ही समस्या को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। उसी प्रकार, अंतिम आनंद को प्राप्त करने का मार्ग भी व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होता है, भले ही वह आनंद एक ही क्यों न हो। चिंतन का मार्ग, अथवा, ज्ञानयोग चिंतन का मार्ग, जिसे ज्ञानयोग भी कहा जाता है, विचारों के विश्लेषण पर आधारित है। मूल रूप से यह गहन चिंतन की ही प्रक्रिया है। आप प्रश्न पूछते हुए आगे बढ़ते जाते हैं, और अंत में जिस विषय पर आप विचार कर रहे होते हैं, उसके परम सत्य को समझ लेते हैं। यदि आप किसी भौतिक वस्तु या सांसारिक विषय के बारे में चिंतन कर रहे हों, तो यह निरंतर विचार-प्रक्रिया अंततः आपको अपनी रुचि के विषय को, औरअधिक गहराई से समझने में सहायता करती है। एक वैज्ञानिक के आगे बढ़ने की विधि भी यही होती है। वह किसी समस्या को लेता है, उसके सभी पहलुओं पर विचार करता है, बहुत गहराई से चिंतन करता है, और अंत में उसे पूरी तरह समझ लेता है। किसी भी विषय पर चिंतन आरंभ करने से पहले, उसके बारे में किसी ऐसे व्यक्ति से सुनना चाहिए जो आपसे अधिक जानकार हो। अथवा उस विषय पर किसी विशेषज्ञ द्वारा लिखा गया ग्रंथ पढ़ा जा सकता है। यह आपको एक प्रारंभिक आधार प्रदान करता है। पर्याप्त प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करने के बाद, आपने जो सुना या पढ़ा है उस पर विचार करते रहना चाहिए। सुनी या पढ़ी हुई बातों को आत्मसात करने की प्रक्रिया ही यही है। यह चिंतन विषय को औरअधिक गहराई से समझने में सहायता करता है। इसके बाद अंतिम चरण आता है – उस विषय पर और भी गहराई से विचार करना, अर्थात उसी विषय पर ध्यान लगाना। ऐसी एकाग्र चिंतन–प्रक्रिया से उस विषय के बारे में नए-नए बोध उत्पन्न होते हैं। वह आपके सामने ऐसे नए पहलू खोल देती है जिनके बारे में आपने पहले न तो पढ़ा होता है और न ही सोचा होता है। परंपरागत शब्दों में इसे श्रवण, मनन और निदिध्यासन कहा जाता है। श्रवण का अर्थ है – विषय को जानने वाले व्यक्ति से सुनना, या उस विषय से संबंधित ग्रंथ पढ़ना। मनन का अर्थ है – सुनी या पढ़ी हुई बातों पर बार-बार विचार करना और उन्हें गहराई से समझना। और अंतिम चरण, निदिध्यासन का अर्थ है – उस विषय पर एकाग्र मन से ध्यान करना। इस प्रक्रिया के दौरान आप, पढ़े-और-सोचे हुए विषयों में बिल्कुल नए पहलुओं की भी खोज कर सकते हैं। किसी भी गंभीर विचार या तत्त्व को आत्मसात करने के लिए ये तीनों चरण आवश्यक होते हैं। यही बुद्धि के माध्यम से किसी विषय को "जानने" की सामान्य विधि है। इसी विधि को अत्यंत दार्शनिक या आध्यात्मिक विषयों पर भी लागू किया जा सकता है। श्रवण, मनन और निदिध्यासन – इन चरणों का क्रमबद्ध पालन करते हुए आप परम सत्य की खोज करते हैं: पहले सुनना, फिर सोचना और अंत में ध्यान करना। परंपरा में इसी को चिंतन का मार्ग या ज्ञानयोग कहा जाता है। प्रत्येक मार्ग का एक लक्ष्य और एक अंतिम परिणाम होता है। यदि आपके प्रश्न अस्तित्व के परम सत्य से संबंधित हों, तो यह मार्ग आपको उसी परम सत्य की ओर ले जाता है। भगवद्गीता और सभी उपनिषदों के अनुसार, इस परम सत्य को जान लेने पर मनुष्य को शाश्वत सुख, अर्थात परमानंद की प्राप्ति होती है। इस प्रक्रिया का पहला चरण है किसी ज्ञानी व्यक्ति के पास जाना। उसे अपना गुरु स्वीकार करना चाहिए, उसके प्रति विनम्र और आज्ञाकारी रहना चाहिए। उसकी सेवा करके उसका विश्वास प्राप्त करना चाहिए। उसके बाद, जिन विषयों को आप नहीं समझते, उनके बारे में उससे प्रश्न पूछने चाहिए। जब आप ऐसा करते हैं, तब वह गुरु आपको वह ज्ञान प्रदान करता है जिसकी आप खोज कर रहे होते हैं। गुरु, जोकुछ कहते हैं, उसे ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, उस पर मनन करना चाहिए और उसी विषय पर गहराई से ध्यान करना चाहिए। यदि आप विषय में पूर्ण दक्षता रखने वाले सही गुरु के पास गए हों, तो समय के साथ उनसे आपको यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। प्राचीन काल में, जब शिक्षा पूरी तरह गुरु और शिष्य के बीच प्रत्यक्ष रूप से होती थी, तब यही परंपरागत पद्धति थी। परंतु आज के समय में परम ज्ञान में स्थित, सच्चे गुरु को खोजना सरल नहीं है। ऐसी परिस्थिति में भगवद्गीता या उपनिषदों जैसे ग्रंथों का अध्ययन करना आवश्यक होजाता है, क्योंकि ये मुख्यतः परम तत्त्व के विचारों पर केंद्रित होते हैं। लेकिन केवल पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है। आपने जो पढ़ा है उस पर गहराई से मनन करना चाहिए, और अंततः उसी चिंतन में पूर्ण रूप से तल्लीन हो जाना चाहिए। वह प्रक्रिया उस विषय पर किए जाने वाले ध्यान के समान होनी चाहिए। ऐसी साधना का अंतिम परिणाम ही परम अनुभव, अर्थात परम साक्षात्कार होता है। ऐसा परम ज्ञान प्राप्त करने से क्या लाभ होता है? भगवद्गीता के अनुसार, इस परम ज्ञान के समान और कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान सबसे अधिक पवित्र माना गया है। और भी रोचक बात यह है कि भगवद्गीता कहती है कि योगमार्ग का अनुसरण करने वाला व्यक्ति जिस भी परम अवस्था को प्राप्त करता है, वह यही है। अर्थात निरंतर ध्यान में लीन रहने वाला योगी भी अंततः इसी परम सत्य को प्राप्त करता है। पूरी किताब सुनने के लिए, आप इसे या तो डॉ. किंग की लाइब्रेरी से उधार ले सकते हैं, या फिर Google, Kobo और अन्य जैसे किसी भी ऑनलाइन स्टोर से खरीद सकते हैं। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#audiobook, #booktalk, #Gita, #Hindi, 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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;असल में हमें धर्मों को सही दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है, और उन्हें नफरत फैलाने के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। साथ ही, हमें अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं के प्रति खुलापन विकसित करना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;यही एक समाधान था, जिसे मैंने उस एपिसोड में सुझाया था।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;मैंने कई लोगों को देखा है, जो आज के खून-खराबे और धार्मिक उत्पीड़न के लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराते हैं। और कई कट्टरपंथी ऐसे भी हैं, जो कुरान की गलत समझी गई आयतों का सहारा लेकर अपने जघन्य कार्यों को सही ठहराते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बहुत से लोग कुरान में दिए गए उन स्पष्ट कथनों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो आपसी सहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं। मेरी सबसे पसंदीदा आयतों में से एक यह है:&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;जब यह प्रश्न पूछा जाता है कि "एक सच्चे मुसलमान का उन लोगों के प्रति क्या दृष्टिकोण होना चाहिए, जो उसके धर्म को स्वीकार नहीं करते?", तो कुरान कहता है कि एक सच्चे मुसलमान को कहना चाहिए,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"मैं उस चीज़ की इबादत नहीं करता जिसकी तुम इबादत करते हो, और न ही तुम उस चीज़ की इबादत करोगे जिसकी मैं इबादत करता हूँ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- Quran 109.2, 109.3.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम्हारे लिए तुम्हारा मार्ग, और मेरे लिए मेरा मार्ग।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- Quran 109.6.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मूल रूप से, यह सिखाता है कि व्यक्ति को अपनी मान्यताओं पर दृढ़ रहना चाहिए, जबकि दूसरों की मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;यह कोई एक अलग आयत नहीं है जिसे मैंने चुन लिया हो। कुरान में ऐसी कई बातें हैं जो धार्मिक मान्यताओं के नाम पर हिंसा को हतोत्साहित करती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जो लोग अपने कार्यों को सही ठहराने के लिए कुरान का सहारा लेते हैं, उनमें से कितने लोग वास्तव में ऐसी आयतों को पढ़ते हैं? और कितने गैर-मुस्लिम, जो कुरान को हिंसा का स्रोत मानते हैं, इन तथ्यों से अवगत हैं?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;समस्या धर्म में नहीं है। समस्या है धार्मिक सिद्धांतों की अधूरी समझ और उन सूक्ष्म बातों के प्रति जागरूकता की कमी, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;क्या कोई ईसाई, जिसने वास्तव में सुसमाचार के निम्नलिखित वाक्यों का अर्थ समझ लिया हो, कभी किसी से घृणा कर सकता है, किसी को नुकसान पहुँचाना तो दूर की बात है?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;एक अवसर पर यीशु कहते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"तुमने सुना है कि कहा गया था,&lt;br /&gt;'अपने पड़ोसी से प्रेम करो और अपने शत्रु से बैर रखो।'&lt;br /&gt;पर मैं तुमसे कहता हूँ:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने शत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम्हें श्राप देता है उसे आशीर्वाद दो।&lt;br /&gt;जो तुमसे घृणा करता है उसके साथ भलाई करो।&lt;br /&gt;जो तुम्हें बलपूर्वक पकड़ते हैं और सताते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।&lt;br /&gt;ताकि तुम अपने स्वर्गीय पिता की संतान बनो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि उसका सूर्य अच्छे और बुरे दोनों पर उदित होता है, और उसकी वर्षा न्यायी और अन्यायी दोनों पर होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि तुम केवल उनसे प्रेम करते हो जो तुमसे प्रेम करते हैं, तो तुम्हें क्या लाभ है? क्या कर वसूलने वाले भी ऐसा नहीं करते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यदि तुम केवल अपने भाइयों की शांति के लिए प्रार्थना करते हो, तो इसमें क्या विशेष बात है? क्या कर वसूलने वाले भी ऐसा नहीं करते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए पूर्ण बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गीय पिता पूर्ण है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- The Holy Gospel of Matthew (chapter 5).&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इन बुद्धिजीवियों ने इन अनमोल बातों को कैसे नजरअंदाज कर दिया? Sam Haris, जिन्होंने भारत में विभिन्न गुरुओं के साथ वर्षों बिताए, भारतीय चिंतन के इस मूल सिद्धांत को कैसे भूल गए:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"केवल संकीर्ण सोच वाले लोग 'हम' और 'वे' के रूप में सोचते हैं। उदार हृदय वाला व्यक्ति पूरे विश्व को एक परिवार मानता है।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;तो, समस्या वास्तव में धर्मों में नहीं है, बल्कि उनकी सही समझ में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, इन बातों को कभी-कभी धार्मिक विद्यालयों में सिखाया जाता है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। कई बार यह केवल यह दिखाने के लिए किया जाता है कि किसी का अपना धर्म कितना महान है। और कभी-कभी, यह दूसरों के धर्म को नीचा दिखाने का माध्यम भी बन जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;यह प्रतिकूल प्रभाव डालता है। हमें आवश्यकता है एक निष्पक्ष दृष्टिकोण से एक-दूसरे के धर्मों को समझने की। कमियाँ ढूँढने के बजाय, हमें उन अनमोल बातों पर ध्यान देना चाहिए, जिनका मैंने पहले उल्लेख किया। वही बातें मानवों को एक साथ लाती हैं। केवल मानव ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को, जैसा कि हिंदू कहावत संकेत देती है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बहुत से बड़े लोग अपने जीवन भर के पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना कठिन पाते हैं। वे न तो बदलना चाहते हैं, और न ही बदल पाते हैं। हमारी आशा यह है कि हम अपने बच्चों को इन मूल्यों से परिचित कराएँ, जो सभी धर्मों में समान हैं, ताकि उनके मन अधिक खुले बनें।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;ऐसी खुले विचारों की प्रवृत्ति धीरे-धीरे निकटता, आपसी सम्मान और प्रेम को बढ़ाती है। अंततः, यह उस मूल सत्य को प्रकट करती है कि: "धर्म मनुष्यों के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए।" तभी वे भेदभाव, जो अक्सर धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न होते हैं, कम होने लगते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;मुझे आशा है कि मैंने पाठक की टिप्पणी का उत्तर कम से कम आंशिक रूप से दे दिया है। लेकिन वास्तविक समस्या इससे भी अधिक गहरी है। मैं उसके बारे में अगले एपिसोड में बात करूँगा।&lt;/div&gt;
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Sam Haris, जिन्होंने भारत में विभिन्न गुरुओं के साथ वर्षों बिताए, भारतीय चिंतन के इस मूल सिद्धांत को कैसे भूल गए: "केवल संकीर्ण सोच वाले लोग 'हम' और 'वे' के रूप में सोचते हैं। उदार हृदय वाला व्यक्ति पूरे विश्व को एक परिवार मानता है।" तो, समस्या वास्तव में धर्मों में नहीं है, बल्कि उनकी सही समझ में है। हाँ, इन बातों को कभी-कभी धार्मिक विद्यालयों में सिखाया जाता है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। कई बार यह केवल यह दिखाने के लिए किया जाता है कि किसी का अपना धर्म कितना महान है। और कभी-कभी, यह दूसरों के धर्म को नीचा दिखाने का माध्यम भी बन जाता है। यह प्रतिकूल प्रभाव डालता है। हमें आवश्यकता है एक निष्पक्ष दृष्टिकोण से एक-दूसरे के धर्मों को समझने की। कमियाँ ढूँढने के बजाय, हमें उन अनमोल बातों पर ध्यान देना चाहिए, जिनका मैंने पहले उल्लेख किया। वही बातें मानवों को एक साथ लाती हैं। केवल मानव ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को, जैसा कि हिंदू कहावत संकेत देती है। लेकिन बहुत से बड़े लोग अपने जीवन भर के पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना कठिन पाते हैं। वे न तो बदलना चाहते हैं, और न ही बदल पाते हैं। हमारी आशा यह है कि हम अपने बच्चों को इन मूल्यों से परिचित कराएँ, जो सभी धर्मों में समान हैं, ताकि उनके मन अधिक खुले बनें। ऐसी खुले विचारों की प्रवृत्ति धीरे-धीरे निकटता, आपसी सम्मान और प्रेम को बढ़ाती है। अंततः, यह उस मूल सत्य को प्रकट करती है कि: "धर्म मनुष्यों के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए।" तभी वे भेदभाव, जो अक्सर धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न होते हैं, कम होने लगते हैं। मुझे आशा है कि मैंने पाठक की टिप्पणी का उत्तर कम से कम आंशिक रूप से दे दिया है। लेकिन वास्तविक समस्या इससे भी अधिक गहरी है। मैं उसके बारे में अगले एपिसोड में बात करूँगा। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>.post-body img { max-width: 100% !important; height: auto !important; } window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;एक पिछले एपिसोड में जिसका शीर्षक था "युद्धों का कारण क्या है? 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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;इस विषय का विश्लेषण करने के लिए मैं एक सरल उदाहरण लेता हूँ। यह उदाहरण केवल चर्चा के उद्देश्य से है। यहाँ मैं जिस व्यक्ति का उल्लेख कर रहा हूँ, उसे नीचा दिखाना मेरा उद्देश्य बिल्कुल नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बहुत प्रसिद्ध गुरु हैं। लाखों अनुयायी उनके हर शब्द को मानो अंतिम सत्य समझकर आँख मूँदकर मानते हैं।&lt;br /&gt;लेकिन अगर ध्यान से सोचें तो इस व्यक्ति के कई कथन निरर्थक और भ्रामक हैं। फिर भी उनके अनुयायी उनके "महान ज्ञान" की प्रशंसा करते हैं। वास्तव में, ऐसे ही बे-सिर-पैर के कथनों की वजह से बहुत लोग उनकी ओर आकर्षित होते हैं।&lt;br /&gt;एक बहुत चर्चित उदाहरण देता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसमें यह गुरु बताते हैं कि चंद्र ग्रहण के समय पका हुआ भोजन क्यों नहीं खाना चाहिए। यह एक व्यापक रूप से फैली हुई प्राचीन भारतीय मान्यता है। हालांकि प्रसिद्ध भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट ने सदियों पहले ही इन मान्यताओं का खंडन कर दिया था, फिर भी आज अधिकांश भारतीय ऐसी गलत धारणाएँ रखते हैं।&lt;br /&gt;एक गुरु को अपने अनुयायियों को गलत धारणाओं से ऊपर उठाना चाहिए। यह उनका कर्तव्य भी है। फिर भी न जाने क्यों यह गुरु लोगों को और गहराई से गलत रास्ते पर धकेलते हैं। मानो बहुत वैज्ञानिक हो, वे तर्क और प्रयोग के माध्यम से उसी पुरानी मान्यता को प्रस्तुत करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके अनुसार, ग्रहण के समय चंद्रमा अपनी सभी कलाओं को बहुत तेजी से पार करता है। सामान्यतः चंद्रमा को इन कलाओं से गुजरने में पंद्रह दिन लगते हैं। यानी ग्रहण के कुछ घंटे 15 दिनों के बराबर हैं। इसलिए यदि उस समय पका हुआ भोजन रखा जाए तो वह खराब हो जाएगा, क्योंकि वह मानो 15 दिन तक रखा गया हो। यही उनका तर्क है।&lt;br /&gt;अगर केवल तर्क से आपको विश्वास न हो, तो वे इसे प्रयोग करके भी दिखाते हैं।&lt;br /&gt;वे भोजन के ऊपर एक जपमाला लटका देते हैं। ग्रहण से पहले जो जपमाला घड़ी की दिशा में घूम रही थी, ग्रहण शुरू होते ही वह अपने आप उल्टी दिशा में घूमने लगती है—इस पर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। उनके अनुसार यह इस बात का संकेत है कि भोजन खराब हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने देखा है कि बहुत उच्च शिक्षित लोग भी इस तर्क और प्रयोगात्मक व्याख्या से प्रभावित हो जाते हैं। उनके लिए उस गुरु की हर बात अक्षरशः सत्य होती है।&lt;br /&gt;फिर भी, अगर आप थोड़ा सोचें तो आपको समझ में आ जाएगा कि सच्चाई क्या है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रमा की कलाएँ समय को नियंत्रित नहीं करतीं। समय ही चंद्रमा की कलाओं को निर्धारित करता है। इसलिए यह तर्क निरर्थक है।&lt;br /&gt;और वह घूमती हुई जपमाला?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह एक प्रसिद्ध घटना है जिसे आइडियोमोटर प्रभाव कहा जाता है। ओइजा बोर्ड के माध्यम से आत्माओं से संवाद करना या पेंडुलम से जमीन के नीचे पानी का पता लगाना—इन सबके पीछे यही प्रभाव काम करता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति अनजाने में ही गति पैदा करता है।&lt;br /&gt;यह सब करने में उस गुरु का क्या स्वार्थ है, यह एक अलग विषय है। यहाँ वह अप्रासंगिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी, बहुत से लोग ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं। क्यों—यही महत्वपूर्ण प्रश्न है।&lt;br /&gt;यह हमें मूल प्रश्न की ओर ले जाता है: हम चीज़ों का विश्लेषण कैसे करते हैं? जब कोई नई चीज़ हमारे ध्यान में आती है, तो हमारा मस्तिष्क कैसे व्यवहार करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा मस्तिष्क तुरंत ही पहले देखी या सुनी हुई किसी समान चीज़ को खोजने लगता है। हमारी स्मृति में ऐसी कई चीज़ें हो सकती हैं। उनमें से जो सबसे अधिक मिलती-जुलती होती है, मस्तिष्क उसे चुन लेता है।&lt;br /&gt;यदि ऐसी कोई चीज़ मिल जाए तो हमें लगता है, "हम समझ गए।"&lt;br /&gt;यदि स्पष्ट समानता न मिले तो कुछ लोग कहते हैं, "मुझे यह समझ नहीं आया," और छोड़ देते हैं। लेकिन अधिकांश लोग अतीत की किसी थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती बात को ही वही समझ लेते हैं। यहीं पर उनकी समझ गलत हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममें से कुछ लोग थोड़ा आगे बढ़ते हैं।&lt;br /&gt;वे विषय को छोटे-छोटे भागों में बाँटकर हर भाग को अलग-अलग समझने की कोशिश करते हैं।&lt;br /&gt;जब सब कुछ लगभग मेल खाता हुआ लगता है, तो वे कहते हैं, "हाँ, समझ में आ गया।" यही सही तरीका है।&lt;br /&gt;लेकिन इस प्रक्रिया में समस्याएँ भी हैं।&lt;br /&gt;कभी-कभी हम अपनी खोज बहुत जल्दी रोक देते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी उस क्षेत्र में हमारे पास पर्याप्त पूर्व ज्ञान नहीं होता। बहुत बुद्धिमान लोग भी किसी नए विषय में पूरी तरह अज्ञानी हो सकते हैं। हममें से बहुतों को आइडियोमोटर प्रभाव के बारे में पता नहीं होता।&lt;br /&gt;एक और समस्या है।&lt;br /&gt;जब हम समान पुरानी स्मृतियाँ खोजते हैं, तो हमें कई थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती घटनाएँ मिल सकती हैं। तब हमें उनमें से कुछ का चयन करना पड़ता है। सही चयन कैसे करें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• हमारा चयन वस्तुनिष्ठ होना चाहिए।&lt;br /&gt;• उनमें आपसी विरोध नहीं होना चाहिए और वे एक-दूसरे के अनुरूप होने चाहिए।&lt;br /&gt;• चयन तर्कसंगत होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहीं हम चूक जाते हैं। किसी कारण हम वस्तुनिष्ठता के बजाय व्यक्तिनिष्ठता को अधिक महत्व देते हैं। तर्क के बजाय हम विश्वास को मान लेते हैं। अपने निर्णय के बजाय हम दूसरों की राय को ज्यादा महत्व देते हैं।&lt;br /&gt;गुरु के आत्मविश्वास से भरे और अधिकारपूर्ण कथन अधिक सही लगने लगते हैं। उनके सामने हमारी तर्क क्षमता हार जाती है। उस गुरु के अपार अनुयायियों की संख्या हमारी अंदर की आवाज़ को दबा देती है। हम सबके साथ जुड़ना चाहते हैं।&lt;br /&gt;लेकिन इनमें से कोई भी चीज़ सत्य की गारंटी नहीं देती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के सोशल मीडिया की दुनिया में,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• अनुयायी बनाए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;• झूठ को अधिकारपूर्वक सच के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।&lt;br /&gt;• झूठा आत्मविश्वास दिखाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हम इन बातों के आधार पर गलत समझ बना लेते हैं। एक बार जब हम किसी गलत विचार को स्वीकार कर लेते हैं, तो आगे की समझ उसी पर आधारित करते हैं।&lt;br /&gt;इस तरह गलतियाँ बढ़ती जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो वास्तव में हमें भटकाने वाली चीज़ें क्या हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• एक: —उस क्षेत्र में हमारा सीमित ज्ञान।&lt;br /&gt;• दो: —अधिकार या लोकप्रियता जैसे गलत मापदंडों पर विश्वास करना।&lt;br /&gt;• तीन: —हमारा मस्तिष्क सही उत्तरों के बजाय जल्दी और आसान उत्तर चुनना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो हम क्या कर सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ स्व-प्रेरित आदतें मदद कर सकती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• पहला, धीरे-धीरे अपने ज्ञान को विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ाइए। खुद को केवल अपने ही क्षेत्र तक सीमित मत रखिए।&lt;br /&gt;• दूसरा, आप जो मानते हैं उसे क्यों मानते हैं, इसका विवेकपूर्वक विचार कीजिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि किसी ने कहा है।&lt;br /&gt;• तीसरा, अगर कोई बात बहुत प्रभावशाली लगे—तो थोड़ा रुकिए। उसे भागों में बाँटिए। हर भाग का विश्लेषण कीजिए। देखिए कि क्या वह वास्तव में सार्थक है। मानसिक रूप से सतर्क रहिए। जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुँचिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, इन आदतों को अपनाना उम्र बढ़ने के साथ थोड़ा कठिन हो जाता है।&lt;br /&gt;इसलिए यदि आप माता-पिता या शिक्षक हैं, तो बच्चों में इस प्रकार की सोच को छोटी उम्र से ही विकसित करने में मदद कीजिए। यही उनके लिए आपका सबसे बड़ा उपहार होगा। एक बार वे इसे अपना लें, तो उनके सीखने की कोई सीमा नहीं रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार, विश्लेषणात्मक क्षमता केवल अधिक बातें जानने का तरीका ही नहीं है। यह उन अनेक बातों से धोखा न खाने की क्षमता भी है जो सच जैसी दिखाई देती हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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और भी महत्वपूर्ण बात, हम कभी-कभी सही तरह से समझने में क्यों चूक जाते हैं? थोड़ा सोचकर देखिए। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); इस विषय का विश्लेषण करने के लिए मैं एक सरल उदाहरण लेता हूँ। यह उदाहरण केवल चर्चा के उद्देश्य से है। यहाँ मैं जिस व्यक्ति का उल्लेख कर रहा हूँ, उसे नीचा दिखाना मेरा उद्देश्य बिल्कुल नहीं है। एक बहुत प्रसिद्ध गुरु हैं। लाखों अनुयायी उनके हर शब्द को मानो अंतिम सत्य समझकर आँख मूँदकर मानते हैं। लेकिन अगर ध्यान से सोचें तो इस व्यक्ति के कई कथन निरर्थक और भ्रामक हैं। फिर भी उनके अनुयायी उनके "महान ज्ञान" की प्रशंसा करते हैं। वास्तव में, ऐसे ही बे-सिर-पैर के कथनों की वजह से बहुत लोग उनकी ओर आकर्षित होते हैं। एक बहुत चर्चित उदाहरण देता हूँ। उसमें यह गुरु बताते हैं कि चंद्र ग्रहण के समय पका हुआ भोजन क्यों नहीं खाना चाहिए। यह एक व्यापक रूप से फैली हुई प्राचीन भारतीय मान्यता है। हालांकि प्रसिद्ध भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट ने सदियों पहले ही इन मान्यताओं का खंडन कर दिया था, फिर भी आज अधिकांश भारतीय ऐसी गलत धारणाएँ रखते हैं। एक गुरु को अपने अनुयायियों को गलत धारणाओं से ऊपर उठाना चाहिए। यह उनका कर्तव्य भी है। फिर भी न जाने क्यों यह गुरु लोगों को और गहराई से गलत रास्ते पर धकेलते हैं। मानो बहुत वैज्ञानिक हो, वे तर्क और प्रयोग के माध्यम से उसी पुरानी मान्यता को प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, ग्रहण के समय चंद्रमा अपनी सभी कलाओं को बहुत तेजी से पार करता है। सामान्यतः चंद्रमा को इन कलाओं से गुजरने में पंद्रह दिन लगते हैं। यानी ग्रहण के कुछ घंटे 15 दिनों के बराबर हैं। इसलिए यदि उस समय पका हुआ भोजन रखा जाए तो वह खराब हो जाएगा, क्योंकि वह मानो 15 दिन तक रखा गया हो। यही उनका तर्क है। अगर केवल तर्क से आपको विश्वास न हो, तो वे इसे प्रयोग करके भी दिखाते हैं। वे भोजन के ऊपर एक जपमाला लटका देते हैं। ग्रहण से पहले जो जपमाला घड़ी की दिशा में घूम रही थी, ग्रहण शुरू होते ही वह अपने आप उल्टी दिशा में घूमने लगती है—इस पर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। उनके अनुसार यह इस बात का संकेत है कि भोजन खराब हो रहा है। मैंने देखा है कि बहुत उच्च शिक्षित लोग भी इस तर्क और प्रयोगात्मक व्याख्या से प्रभावित हो जाते हैं। उनके लिए उस गुरु की हर बात अक्षरशः सत्य होती है। फिर भी, अगर आप थोड़ा सोचें तो आपको समझ में आ जाएगा कि सच्चाई क्या है। चंद्रमा की कलाएँ समय को नियंत्रित नहीं करतीं। समय ही चंद्रमा की कलाओं को निर्धारित करता है। इसलिए यह तर्क निरर्थक है। और वह घूमती हुई जपमाला? वह एक प्रसिद्ध घटना है जिसे आइडियोमोटर प्रभाव कहा जाता है। ओइजा बोर्ड के माध्यम से आत्माओं से संवाद करना या पेंडुलम से जमीन के नीचे पानी का पता लगाना—इन सबके पीछे यही प्रभाव काम करता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति अनजाने में ही गति पैदा करता है। यह सब करने में उस गुरु का क्या स्वार्थ है, यह एक अलग विषय है। यहाँ वह अप्रासंगिक है। फिर भी, बहुत से लोग ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं। क्यों—यही महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह हमें मूल प्रश्न की ओर ले जाता है: हम चीज़ों का विश्लेषण कैसे करते हैं? जब कोई नई चीज़ हमारे ध्यान में आती है, तो हमारा मस्तिष्क कैसे व्यवहार करता है? हमारा मस्तिष्क तुरंत ही पहले देखी या सुनी हुई किसी समान चीज़ को खोजने लगता है। हमारी स्मृति में ऐसी कई चीज़ें हो सकती हैं। उनमें से जो सबसे अधिक मिलती-जुलती होती है, मस्तिष्क उसे चुन लेता है। यदि ऐसी कोई चीज़ मिल जाए तो हमें लगता है, "हम समझ गए।" यदि स्पष्ट समानता न मिले तो कुछ लोग कहते हैं, "मुझे यह समझ नहीं आया," और छोड़ देते हैं। लेकिन अधिकांश लोग अतीत की किसी थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती बात को ही वही समझ लेते हैं। यहीं पर उनकी समझ गलत हो जाती है। हममें से कुछ लोग थोड़ा आगे बढ़ते हैं। वे विषय को छोटे-छोटे भागों में बाँटकर हर भाग को अलग-अलग समझने की कोशिश करते हैं। जब सब कुछ लगभग मेल खाता हुआ लगता है, तो वे कहते हैं, "हाँ, समझ में आ गया।" यही सही तरीका है। लेकिन इस प्रक्रिया में समस्याएँ भी हैं। कभी-कभी हम अपनी खोज बहुत जल्दी रोक देते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। कभी-कभी उस क्षेत्र में हमारे पास पर्याप्त पूर्व ज्ञान नहीं होता। बहुत बुद्धिमान लोग भी किसी नए विषय में पूरी तरह अज्ञानी हो सकते हैं। हममें से बहुतों को आइडियोमोटर प्रभाव के बारे में पता नहीं होता। एक और समस्या है। जब हम समान पुरानी स्मृतियाँ खोजते हैं, तो हमें कई थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती घटनाएँ मिल सकती हैं। तब हमें उनमें से कुछ का चयन करना पड़ता है। सही चयन कैसे करें? • हमारा चयन वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। • उनमें आपसी विरोध नहीं होना चाहिए और वे एक-दूसरे के अनुरूप होने चाहिए। • चयन तर्कसंगत होना चाहिए। यहीं हम चूक जाते हैं। किसी कारण हम वस्तुनिष्ठता के बजाय व्यक्तिनिष्ठता को अधिक महत्व देते हैं। तर्क के बजाय हम विश्वास को मान लेते हैं। अपने निर्णय के बजाय हम दूसरों की राय को ज्यादा महत्व देते हैं। गुरु के आत्मविश्वास से भरे और अधिकारपूर्ण कथन अधिक सही लगने लगते हैं। उनके सामने हमारी तर्क क्षमता हार जाती है। उस गुरु के अपार अनुयायियों की संख्या हमारी अंदर की आवाज़ को दबा देती है। हम सबके साथ जुड़ना चाहते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी चीज़ सत्य की गारंटी नहीं देती। आज के सोशल मीडिया की दुनिया में, • अनुयायी बनाए जा सकते हैं। • झूठ को अधिकारपूर्वक सच के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। • झूठा आत्मविश्वास दिखाया जा सकता है। और हम इन बातों के आधार पर गलत समझ बना लेते हैं। एक बार जब हम किसी गलत विचार को स्वीकार कर लेते हैं, तो आगे की समझ उसी पर आधारित करते हैं। इस तरह गलतियाँ बढ़ती जाती हैं। तो वास्तव में हमें भटकाने वाली चीज़ें क्या हैं? • एक: —उस क्षेत्र में हमारा सीमित ज्ञान। • दो: —अधिकार या लोकप्रियता जैसे गलत मापदंडों पर विश्वास करना। • तीन: —हमारा मस्तिष्क सही उत्तरों के बजाय जल्दी और आसान उत्तर चुनना। तो हम क्या कर सकते हैं? 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और भी महत्वपूर्ण बात, हम कभी-कभी सही तरह से समझने में क्यों चूक जाते हैं? थोड़ा सोचकर देखिए। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); इस विषय का विश्लेषण करने के लिए मैं एक सरल उदाहरण लेता हूँ। यह उदाहरण केवल चर्चा के उद्देश्य से है। यहाँ मैं जिस व्यक्ति का उल्लेख कर रहा हूँ, उसे नीचा दिखाना मेरा उद्देश्य बिल्कुल नहीं है। एक बहुत प्रसिद्ध गुरु हैं। लाखों अनुयायी उनके हर शब्द को मानो अंतिम सत्य समझकर आँख मूँदकर मानते हैं। लेकिन अगर ध्यान से सोचें तो इस व्यक्ति के कई कथन निरर्थक और भ्रामक हैं। फिर भी उनके अनुयायी उनके "महान ज्ञान" की प्रशंसा करते हैं। वास्तव में, ऐसे ही बे-सिर-पैर के कथनों की वजह से बहुत लोग उनकी ओर आकर्षित होते हैं। एक बहुत चर्चित उदाहरण देता हूँ। उसमें यह गुरु बताते हैं कि चंद्र ग्रहण के समय पका हुआ भोजन क्यों नहीं खाना चाहिए। यह एक व्यापक रूप से फैली हुई प्राचीन भारतीय मान्यता है। हालांकि प्रसिद्ध भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट ने सदियों पहले ही इन मान्यताओं का खंडन कर दिया था, फिर भी आज अधिकांश भारतीय ऐसी गलत धारणाएँ रखते हैं। एक गुरु को अपने अनुयायियों को गलत धारणाओं से ऊपर उठाना चाहिए। यह उनका कर्तव्य भी है। फिर भी न जाने क्यों यह गुरु लोगों को और गहराई से गलत रास्ते पर धकेलते हैं। मानो बहुत वैज्ञानिक हो, वे तर्क और प्रयोग के माध्यम से उसी पुरानी मान्यता को प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, ग्रहण के समय चंद्रमा अपनी सभी कलाओं को बहुत तेजी से पार करता है। सामान्यतः चंद्रमा को इन कलाओं से गुजरने में पंद्रह दिन लगते हैं। यानी ग्रहण के कुछ घंटे 15 दिनों के बराबर हैं। इसलिए यदि उस समय पका हुआ भोजन रखा जाए तो वह खराब हो जाएगा, क्योंकि वह मानो 15 दिन तक रखा गया हो। यही उनका तर्क है। अगर केवल तर्क से आपको विश्वास न हो, तो वे इसे प्रयोग करके भी दिखाते हैं। वे भोजन के ऊपर एक जपमाला लटका देते हैं। ग्रहण से पहले जो जपमाला घड़ी की दिशा में घूम रही थी, ग्रहण शुरू होते ही वह अपने आप उल्टी दिशा में घूमने लगती है—इस पर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। उनके अनुसार यह इस बात का संकेत है कि भोजन खराब हो रहा है। मैंने देखा है कि बहुत उच्च शिक्षित लोग भी इस तर्क और प्रयोगात्मक व्याख्या से प्रभावित हो जाते हैं। उनके लिए उस गुरु की हर बात अक्षरशः सत्य होती है। फिर भी, अगर आप थोड़ा सोचें तो आपको समझ में आ जाएगा कि सच्चाई क्या है। चंद्रमा की कलाएँ समय को नियंत्रित नहीं करतीं। समय ही चंद्रमा की कलाओं को निर्धारित करता है। इसलिए यह तर्क निरर्थक है। और वह घूमती हुई जपमाला? वह एक प्रसिद्ध घटना है जिसे आइडियोमोटर प्रभाव कहा जाता है। ओइजा बोर्ड के माध्यम से आत्माओं से संवाद करना या पेंडुलम से जमीन के नीचे पानी का पता लगाना—इन सबके पीछे यही प्रभाव काम करता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति अनजाने में ही गति पैदा करता है। यह सब करने में उस गुरु का क्या स्वार्थ है, यह एक अलग विषय है। यहाँ वह अप्रासंगिक है। फिर भी, बहुत से लोग ऐसी बातों पर विश्वास करते हैं। क्यों—यही महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह हमें मूल प्रश्न की ओर ले जाता है: हम चीज़ों का विश्लेषण कैसे करते हैं? जब कोई नई चीज़ हमारे ध्यान में आती है, तो हमारा मस्तिष्क कैसे व्यवहार करता है? हमारा मस्तिष्क तुरंत ही पहले देखी या सुनी हुई किसी समान चीज़ को खोजने लगता है। हमारी स्मृति में ऐसी कई चीज़ें हो सकती हैं। उनमें से जो सबसे अधिक मिलती-जुलती होती है, मस्तिष्क उसे चुन लेता है। यदि ऐसी कोई चीज़ मिल जाए तो हमें लगता है, "हम समझ गए।" यदि स्पष्ट समानता न मिले तो कुछ लोग कहते हैं, "मुझे यह समझ नहीं आया," और छोड़ देते हैं। लेकिन अधिकांश लोग अतीत की किसी थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती बात को ही वही समझ लेते हैं। यहीं पर उनकी समझ गलत हो जाती है। हममें से कुछ लोग थोड़ा आगे बढ़ते हैं। वे विषय को छोटे-छोटे भागों में बाँटकर हर भाग को अलग-अलग समझने की कोशिश करते हैं। जब सब कुछ लगभग मेल खाता हुआ लगता है, तो वे कहते हैं, "हाँ, समझ में आ गया।" यही सही तरीका है। लेकिन इस प्रक्रिया में समस्याएँ भी हैं। कभी-कभी हम अपनी खोज बहुत जल्दी रोक देते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। कभी-कभी उस क्षेत्र में हमारे पास पर्याप्त पूर्व ज्ञान नहीं होता। बहुत बुद्धिमान लोग भी किसी नए विषय में पूरी तरह अज्ञानी हो सकते हैं। हममें से बहुतों को आइडियोमोटर प्रभाव के बारे में पता नहीं होता। एक और समस्या है। जब हम समान पुरानी स्मृतियाँ खोजते हैं, तो हमें कई थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती घटनाएँ मिल सकती हैं। तब हमें उनमें से कुछ का चयन करना पड़ता है। सही चयन कैसे करें? • हमारा चयन वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। • उनमें आपसी विरोध नहीं होना चाहिए और वे एक-दूसरे के अनुरूप होने चाहिए। • चयन तर्कसंगत होना चाहिए। यहीं हम चूक जाते हैं। किसी कारण हम वस्तुनिष्ठता के बजाय व्यक्तिनिष्ठता को अधिक महत्व देते हैं। तर्क के बजाय हम विश्वास को मान लेते हैं। अपने निर्णय के बजाय हम दूसरों की राय को ज्यादा महत्व देते हैं। गुरु के आत्मविश्वास से भरे और अधिकारपूर्ण कथन अधिक सही लगने लगते हैं। उनके सामने हमारी तर्क क्षमता हार जाती है। उस गुरु के अपार अनुयायियों की संख्या हमारी अंदर की आवाज़ को दबा देती है। हम सबके साथ जुड़ना चाहते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी चीज़ सत्य की गारंटी नहीं देती। आज के सोशल मीडिया की दुनिया में, • अनुयायी बनाए जा सकते हैं। • झूठ को अधिकारपूर्वक सच के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। • झूठा आत्मविश्वास दिखाया जा सकता है। और हम इन बातों के आधार पर गलत समझ बना लेते हैं। एक बार जब हम किसी गलत विचार को स्वीकार कर लेते हैं, तो आगे की समझ उसी पर आधारित करते हैं। इस तरह गलतियाँ बढ़ती जाती हैं। तो वास्तव में हमें भटकाने वाली चीज़ें क्या हैं? • एक: —उस क्षेत्र में हमारा सीमित ज्ञान। • दो: —अधिकार या लोकप्रियता जैसे गलत मापदंडों पर विश्वास करना। • तीन: —हमारा मस्तिष्क सही उत्तरों के बजाय जल्दी और आसान उत्तर चुनना। तो हम क्या कर सकते हैं? कुछ स्व-प्रेरित आदतें मदद कर सकती हैं। • पहला, धीरे-धीरे अपने ज्ञान को विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ाइए। खुद को केवल अपने ही क्षेत्र तक सीमित मत रखिए। • दूसरा, आप जो मानते हैं उसे क्यों मानते हैं, इसका विवेकपूर्वक विचार कीजिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि किसी ने कहा है। • तीसरा, अगर कोई बात बहुत प्रभावशाली लगे—तो थोड़ा रुकिए। उसे भागों में बाँटिए। हर भाग का विश्लेषण कीजिए। देखिए कि क्या वह वास्तव में सार्थक है। मानसिक रूप से सतर्क रहिए। जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुँचिए। हाँ, इन आदतों को अपनाना उम्र बढ़ने के साथ थोड़ा कठिन हो जाता है। इसलिए यदि आप माता-पिता या शिक्षक हैं, तो बच्चों में इस प्रकार की सोच को छोटी उम्र से ही विकसित करने में मदद कीजिए। यही उनके लिए आपका सबसे बड़ा उपहार होगा। एक बार वे इसे अपना लें, तो उनके सीखने की कोई सीमा नहीं रहेगी। आखिरकार, विश्लेषणात्मक क्षमता केवल अधिक बातें जानने का तरीका ही नहीं है। यह उन अनेक बातों से धोखा न खाने की क्षमता भी है जो सच जैसी दिखाई देती हैं। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #podcast, #QnA, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>युद्धों का कारण क्या है? एक संभावित समाधान।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/03/blog-post_13.html</link><category>#advaita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#podcast</category><category>#QnA</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 14 Mar 2026 00:11:20 -0700</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-2257503394975846786</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;लेकिन यदि हम इतिहास को थोड़ा व्यापक दृष्टि से देखें, तो एक दिलचस्प बात सामने आती है। युद्ध केवल किसी एक प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में नहीं होते। राजतंत्रों ने युद्ध किए। साम्राज्यों ने युद्ध किए। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज भी युद्ध करते हैं। यहाँ तक कि वे समाज भी, जो स्वयं को शिक्षित, तर्कसंगत और सभ्य मानते हैं, बार-बार हिंसक संघर्षों में फँस जाते हैं।&lt;br /&gt;यदि युद्ध केवल राजनीतिक व्यवस्था या आर्थिक हितों का परिणाम होते, तो विज्ञान, शिक्षा और वैश्विक सहयोग की प्रगति के साथ उनका कम होना स्वाभाविक था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इतिहास का वही पैटर्न लगातार दिखाई देता है।&lt;br /&gt;यह संकेत देता है कि युद्ध का वास्तविक कारण शायद राजनीति या अर्थव्यवस्था से भी गहरा है। वह कारण संभवतः इस बात से जुड़ा है कि मनुष्य स्वयं को और दूसरों को किस प्रकार समझता है।&lt;br /&gt;मनुष्य स्वाभाविक रूप से पहचान बनाता है। हम स्वयं को परिवार, समुदाय, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र से जोड़कर देखते हैं। यह पहचान हमें जुड़ाव का अनुभव देती है। यह हमें जीवन में दिशा और अर्थ प्रदान करती है।&lt;br /&gt;लेकिन यही पहचान सीमाएँ भी बनाती है।&lt;br /&gt;जैसे ही पहचान बनती है, संसार दो भागों में बँटने लगता है — "हम" और "वे"। प्रारम्भ में यह विभाजन साधारण लगता है। कई बार यह केवल सामाजिक व्यवस्था का एक तरीका होता है।&lt;br /&gt;लेकिन समय के साथ यह विभाजन भावनात्मक रूप ले सकता है।&lt;br /&gt;जब लोग किसी समूह से बहुत गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं, तो वे घटनाओं को उसी पहचान के माध्यम से देखने लगते हैं। समूह से जुड़ी कोई भी बात व्यक्तिगत लगने लगती है। समूह की आलोचना किसी हमले जैसी महसूस हो सकती है। समूहों के बीच अंतर खतरनाक प्रतीत होने लगते हैं।&lt;br /&gt;धीरे-धीरे भय और अविश्वास बढ़ने लगता है।&lt;br /&gt;इतिहास बताता है कि युद्ध सामान्यतः अचानक शुरू नहीं होते। वे अक्सर लंबे समय तक चलने वाले संदेह, गलतफहमियों और बढ़ते तनाव के परिणाम होते हैं। हर पक्ष स्वयं को रक्षात्मक मानता है। हर पक्ष को लगता है कि आक्रामकता दूसरे पक्ष ने शुरू की।&lt;br /&gt;मनोविज्ञान इस प्रवृत्ति को समूह पहचान और समूह पक्षपात के रूप में वर्णित करता है। जब लोग किसी समूह से गहराई से जुड़ जाते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से अपने समूह का पक्ष लेते हैं और बाहरी लोगों पर संदेह करते हैं।&lt;br /&gt;लेकिन कुछ दार्शनिक परंपराएँ इस प्रवृत्ति को और भी गहराई से समझने का प्रयास करती हैं।&lt;br /&gt;योग दर्शन में पतंजलि इस मूल समस्या को अविद्या कहते हैं। अविद्या को अक्सर अज्ञान कहा जाता है, लेकिन इसका अर्थ केवल जानकारी की कमी नहीं है। यहाँ इसका अर्थ है गलत पहचान।&lt;br /&gt;इस दृष्टिकोण के अनुसार मनुष्य वास्तव में यह नहीं समझता कि वह कौन है। वह अपनी गहरी प्रकृति को पहचानने के बजाय अस्थायी रूपों से स्वयं को जोड़ लेता है — जैसे शरीर, मन, सामाजिक भूमिकाएँ, सांस्कृतिक पहचान या राष्ट्रीय संबद्धता।&lt;br /&gt;ये पहचानें धीरे-धीरे व्यक्ति की आत्म-छवि का केंद्र बन जाती हैं। जब इन पहचानों को चुनौती मिलती है, तो व्यक्ति स्वयं को खतरे में महसूस करता है।&lt;br /&gt;यही प्रक्रिया सामूहिक स्तर पर भी काम करती है। राष्ट्र, धर्म और राजनीतिक आंदोलनों की अपनी शक्तिशाली सामूहिक पहचान बन जाती है। यह पहचान समूह के भीतर एकता को मजबूत करती है, लेकिन समूहों के बीच दूरी को भी बढ़ाती है।&lt;br /&gt;इस दृष्टि से युद्ध केवल राजनीतिक घटनाएँ नहीं हैं। वे उसी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया की विशाल अभिव्यक्ति हैं, जो साधारण मानवीय संबंधों में भी संघर्ष पैदा करती है।&lt;br /&gt;इस पैटर्न को सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है।&lt;br /&gt;पहचान से आसक्ति उत्पन्न होती है।&lt;br /&gt;आसक्ति से भय उत्पन्न होता है।&lt;br /&gt;भय से संघर्ष उत्पन्न होता है।&lt;br /&gt;यदि यह विश्लेषण सही है, तो युद्ध का समाधान केवल कूटनीति, सैन्य संतुलन या राजनीतिक समझौतों में नहीं मिल सकता। ये उपाय अस्थायी रूप से तनाव को कम कर सकते हैं, लेकिन वे उस मूल मनोवैज्ञानिक कारण को नहीं बदलते जो संघर्ष को जन्म देता है।&lt;br /&gt;एक गहरा समाधान तब संभव है जब मनुष्य पहचान को समझने के अपने तरीके को बदलता है।&lt;br /&gt;कई दार्शनिक परंपराएँ इस दिशा की ओर संकेत करती हैं। अद्वैत वेदांत में उदाहरण के लिए यह कहा जाता है कि वास्तविकता मूल रूप से अद्वैत है। इसका अर्थ यह है कि जो विभाजन हम अपने और दूसरों के बीच अनुभव करते हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है। सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय भिन्नताओं के पीछे जीवन की एक गहरी एकता मौजूद है।&lt;br /&gt;इस एकता को समझ लेने से समाजों के बीच सभी भिन्नताएँ समाप्त नहीं हो जातीं। राष्ट्र अपने अलग-अलग हितों का अनुसरण करते रहेंगे। संस्कृतियाँ अपनी परंपराओं को बनाए रखेंगी। राजनीतिक मतभेद भी बने रहेंगे।&lt;br /&gt;लेकिन जब पहचान कम कठोर हो जाती है, तब संघर्ष की भावनात्मक तीव्रता घट सकती है। समूहों के बीच सीमाएँ बनी रह सकती हैं, लेकिन वे भय और शत्रुता को उतनी शक्ति से उत्पन्न नहीं करतीं।&lt;br /&gt;व्यवहारिक रूप से यह परिवर्तन जागरूकता से शुरू होता है। जब व्यक्ति समझता है कि पहचान संघर्ष को कैसे प्रभावित करती है, तो वह अपनी प्रतिक्रियाओं को अधिक ध्यान से देख सकता है। किसी संभावित खतरे पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय वह यह समझने का प्रयास कर सकता है कि उसके पीछे कौन-सी धारणाएँ काम कर रही हैं।&lt;br /&gt;शिक्षा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब लोग अन्य संस्कृतियों, इतिहासों और दृष्टिकोणों को समझते हैं, तो कठोर धारणाएँ धीरे-धीरे नरम हो सकती हैं। जहाँ पहले केवल संदेह था, वहाँ संवाद की संभावना बन सकती है।&lt;br /&gt;अंततः स्थायी शांति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं आ सकती। इसके लिए मनुष्य की दृष्टि में परिवर्तन भी आवश्यक हो सकता है।&lt;br /&gt;यदि संघर्ष का मूल कारण गलत पहचान है, तो दीर्घकालिक समाधान इस समझ में निहित है कि हम वास्तव में कौन हैं, उन पहचानों से परे जिन्हें हम बचाने की कोशिश करते रहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/egjxc1j5jv1kuopxnhy45/03.mp3?rlkey=71s26d9qw309q3me4tiq6meef&amp;st=odz1amkf&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEicTjjGu8XH9KfcyxMX_PHVzse1UQ5A8T-5g5g5mNyw9cT3Ot5fFWjPcBFODe7nWeyfOa1ymJtjGtrJqtaw9-3h4AIu_2AkZ6k2nVYSFuhGqr34DwSRZulYRVv3_OZ9wLSRyM_QRBS065kXtygB7-slj_qvh9BN2Isv4EVx6hU8vQrXUvNXhZC0gmALI-E/s72-c/us%20Vs%20them-HINDI.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new 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है। समूह की आलोचना किसी हमले जैसी महसूस हो सकती है। समूहों के बीच अंतर खतरनाक प्रतीत होने लगते हैं। धीरे-धीरे भय और अविश्वास बढ़ने लगता है। इतिहास बताता है कि युद्ध सामान्यतः अचानक शुरू नहीं होते। वे अक्सर लंबे समय तक चलने वाले संदेह, गलतफहमियों और बढ़ते तनाव के परिणाम होते हैं। हर पक्ष स्वयं को रक्षात्मक मानता है। हर पक्ष को लगता है कि आक्रामकता दूसरे पक्ष ने शुरू की। मनोविज्ञान इस प्रवृत्ति को समूह पहचान और समूह पक्षपात के रूप में वर्णित करता है। जब लोग किसी समूह से गहराई से जुड़ जाते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से अपने समूह का पक्ष लेते हैं और बाहरी लोगों पर संदेह करते हैं। लेकिन कुछ दार्शनिक परंपराएँ इस प्रवृत्ति को और भी गहराई से समझने का प्रयास करती हैं। योग दर्शन में पतंजलि इस मूल समस्या को अविद्या कहते हैं। अविद्या को अक्सर अज्ञान कहा जाता है, लेकिन इसका अर्थ केवल जानकारी की कमी नहीं है। यहाँ इसका अर्थ है गलत पहचान। इस दृष्टिकोण के अनुसार मनुष्य वास्तव में यह नहीं समझता कि वह कौन है। वह अपनी गहरी प्रकृति को पहचानने के बजाय अस्थायी रूपों से स्वयं को जोड़ लेता है — जैसे शरीर, मन, 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अपने तरीके को बदलता है। कई दार्शनिक परंपराएँ इस दिशा की ओर संकेत करती हैं। अद्वैत वेदांत में उदाहरण के लिए यह कहा जाता है कि वास्तविकता मूल रूप से अद्वैत है। इसका अर्थ यह है कि जो विभाजन हम अपने और दूसरों के बीच अनुभव करते हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है। सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय भिन्नताओं के पीछे जीवन की एक गहरी एकता मौजूद है। इस एकता को समझ लेने से समाजों के बीच सभी भिन्नताएँ समाप्त नहीं हो जातीं। राष्ट्र अपने अलग-अलग हितों का अनुसरण करते रहेंगे। संस्कृतियाँ अपनी परंपराओं को बनाए रखेंगी। राजनीतिक मतभेद भी बने रहेंगे। लेकिन जब पहचान कम कठोर हो जाती है, तब संघर्ष की भावनात्मक तीव्रता घट सकती है। समूहों के बीच सीमाएँ बनी रह सकती हैं, लेकिन वे भय और शत्रुता को उतनी शक्ति से उत्पन्न नहीं करतीं। व्यवहारिक रूप से यह परिवर्तन जागरूकता से शुरू होता है। जब व्यक्ति समझता है कि पहचान संघर्ष को कैसे प्रभावित करती है, तो वह अपनी प्रतिक्रियाओं को अधिक ध्यान से देख सकता है। किसी संभावित खतरे पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय वह यह समझने का प्रयास कर सकता है कि उसके पीछे कौन-सी धारणाएँ काम कर रही 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तर्कसंगत और सभ्य मानते हैं, बार-बार हिंसक संघर्षों में फँस जाते हैं। यदि युद्ध केवल राजनीतिक व्यवस्था या आर्थिक हितों का परिणाम होते, तो विज्ञान, शिक्षा और वैश्विक सहयोग की प्रगति के साथ उनका कम होना स्वाभाविक था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इतिहास का वही पैटर्न लगातार दिखाई देता है। यह संकेत देता है कि युद्ध का वास्तविक कारण शायद राजनीति या अर्थव्यवस्था से भी गहरा है। वह कारण संभवतः इस बात से जुड़ा है कि मनुष्य स्वयं को और दूसरों को किस प्रकार समझता है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से पहचान बनाता है। हम स्वयं को परिवार, समुदाय, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र से जोड़कर देखते हैं। यह पहचान हमें जुड़ाव का अनुभव देती है। यह हमें जीवन में दिशा और अर्थ प्रदान करती है। लेकिन यही पहचान सीमाएँ भी बनाती है। जैसे ही पहचान बनती है, संसार दो भागों में बँटने लगता है — "हम" और "वे"। प्रारम्भ में यह विभाजन साधारण लगता है। कई बार यह केवल सामाजिक व्यवस्था का एक तरीका होता है। लेकिन समय के साथ यह विभाजन भावनात्मक रूप ले सकता है। जब लोग किसी समूह से बहुत गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं, तो वे घटनाओं को उसी पहचान के माध्यम 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#IndianPhilosophy, #podcast, #QnA, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>हिन्दू धर्म वास्तव में क्या है?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/03/blog-post.html</link><category>#Hindi</category><category>#Hindu</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#podcast</category><category>#QnA</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 7 Mar 2026 01:06:39 -0800</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-7747484587370664462</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;p class="western"&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBxe-_enYgiAf92DA6UY_hp1rUn8QzPQcnG8eQOpO5wEN7s7ZOyNO923DHF6aqko9dJNBgDP73m-l07NxDgQybSdyMskQEVMQ4oLfxynd2y34-Azuh7YZNgyjvd0gPcAyUTPtzU5hPQbiggxxqWqGn7tDl1skFMZWaXARYxd_2TwBV94Xq0ijeJdvKKQ4/s1024/What-is-Hinduism1.png" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="1024" data-original-width="1024" height="320" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBxe-_enYgiAf92DA6UY_hp1rUn8QzPQcnG8eQOpO5wEN7s7ZOyNO923DHF6aqko9dJNBgDP73m-l07NxDgQybSdyMskQEVMQ4oLfxynd2y34-Azuh7YZNgyjvd0gPcAyUTPtzU5hPQbiggxxqWqGn7tDl1skFMZWaXARYxd_2TwBV94Xq0ijeJdvKKQ4/s320/What-is-Hinduism1.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;यदि&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; आप यह
प्रश्न किसी हिन्दू से पूछें&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;तो सम्भव
है कि वह सीधा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;सरल
उत्तर देने में हिचकिचा जाए।
वह घंटों हिन्दू धर्म के बारे
में बोल सकता है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पर
उसे साफ और निश्चित शब्दों
में परिभाषित नहीं कर पाएगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अधिकांश
लोग सांस्कृतिक परम्पराओं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अनेक देवताओं
और उनकी पूजा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पौराणिक
कथाओं आदि की बात करेंगे। कुछ
लोग ऐसे भी मिलेंगे जो ऊँची&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ऊँची
दार्शनिक शब्दावली से आपको
उलझा देंगे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिसे
वे स्वयं भी ठीक से नहीं समझते&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;.
&lt;/p&gt;

&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-----------------------------&gt;  
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&lt;audio id="ThankYou" src="https://tinyurl.com/hi-Thanks1234"&gt; &lt;/audio&gt;  
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&lt;p class="western"&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;और कुछ लोग
ऐसे होते हैं जो हमेशा ‘दूसरों’को
सुधारना अपना कर्तव्य समझते
हैं। इसलिए वे बताते हैं कि
हिन्दू धर्म क्या नहीं है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;और उचित
धार्मिक प्रशिक्षण&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;उपनिषदों
की उच्च दार्शनिकता का परिचय
तथा ‘मूलों’ की ओर लौटने से
इसे कैसे सुधारा जा सकता है
— चाहे उसका अर्थ स्पष्ट हो
या न हो।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;भारत
में धर्म — आप चाहें तो इसे
हिन्दू धर्म कह सकते हैं —
किसी विचारधारा के कठोर ढाँचे
में बाँधने की चीज़ नहीं है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;न ही यह
‘मेटाफ़िज़िक्स’ या छिपे
अर्थों की खोज है। यह गहराई
से जड़ जमाए हुए मूल्यों में
बसता है। भारतीय सन्दर्भ में
‘रिलिजन’ शब्द ठीक नहीं बैठता।
इसे धर्म कहा जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;मैं
दो सरल उदाहरण देता हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;

&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;महान
भारतीय निर्देशक जी वी अय्यर
की शंकराचार्य पर बनी संस्कृत
फ़िल्म में एक प्रसंग बहुत
सुन्दर ढंग से दिखाया गया है।
चित्रण के अनुसार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;एक
बार एक चोर नारियल चुराने के
लिए पेड़ पर चढ़ जाता है। वह
पेड़ दक्षिण भारत के एक
परम्परावादी नम्बूदरी ब्राह्मण
का था।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ब्राह्मण
को यह बात पता चलती है। वह वहाँ
आता है और पेड़ के ऊपर बैठे
चोर को देखता है। चोर अभी ऊपर
ही होता है कि वह अपना अंगवस्त्र
पेड़ पर ऊपर बाँध देता है। अब
चोर भाग नहीं सकता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;क्योंकि
जाति नियमों के कारण वह ब्राह्मण
के अंगवस्त्र को लाँघ नहीं
सकता। और इतनी ऊँचाई से कूद
भी नहीं सकता। इसलिए वह असहाय
होकर पेड़ पर ही बैठा रहता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ब्राह्मण
घर लौटता है। एक थाली भर भोजन
और कुछ नारियल लाकर पेड़ के
नीचे रख देता है। फिर अंगवस्त्र
खोलकर चोर से नीचे उतरने को
कहता है। चोर के उतरने पर वह
उसे भोजन और नारियल देता है
और दोबारा चोरी न करने की सलाह
देता है। वह यह भी कहता है कि
सचमुच आवश्यकता हो तो माँग
लेना।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;वह
ब्राह्मण परम्परावादी है और
अस्पृश्यता भी मानता है। फिर
भी इससे उसे उस आवश्यकता के
प्रति सहानुभूति रखने से रोक
नहीं पाता जिसने उस व्यक्ति
को चोर बना दिया। उसका उद्देश्य
दण्ड देना नहीं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;बल्कि
अपने ढंग से उसे सुधारना है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;

&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यह
कहानी कल्पित भी हो सकती है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पर यह हिन्दू
धर्म के हृदय में बसे मूल्य&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;तंत्र
के बारे में बहुत कुछ बताती
है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;

&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;मैंने
अत्यन्त परम्परावादी ब्राह्मण
परिवार देखे हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जो
जाति की सीमाएँ पार कर गरीबों
और पीड़ितों की सहायता करते
थे। ऐसे ही एक परिवार में मैंने
अकाल के समय निःशुल्क भोजन
शिविर चलाकर गरीबों को भोजन
कराते देखा है। अन्यथा वे लोग
कठोरता से जाति भेद मानते थे।
पर मानवता के सामने सब बाधाएँ
हट जाती थीं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;

&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यह
अलग बात है कि इस धर्म का उल्लंघन
करने वाले ढोंगी धार्मिक लोग
भी बहुत हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;

&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यहीं
वास्तविक हिन्दू धर्म है। वह
न उच्च दर्शन में है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;न
मेटाफ़िज़िक्स में&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;न
छिपे अर्थों को खोजने में&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;वह गहराई
से बसे मूल्यों में है। अधिकांश
भारतीय सौभाग्य से इसे जन्म
से ही पा लेते हैं। बस आधुनिक
भटकाव ने उन्हें इन मूलभूत
मूल्यों से दूर कर दिया है —
हाल तक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;और
मेरा विश्वास है आज भी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यह काफी
हद तक उनमें विद्यमान है। यही
चुपचाप हिन्दूपन को परिभाषित
करता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यदि
कुछ सिखाया और पोषित किया जाना
चाहिए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;तो
यही है। दर्शन पढ़ाने या औपचारिक
धार्मिक प्रशिक्षण देने से
मनुष्य ज्ञानी और कुछ हद तक
अहंकारी बन सकता है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पर
सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ —
मूल्यों — को नहीं जगा सकता।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यह
सही नहीं कि भारत को धार्मिक
प्रशिक्षण की सख़्त आवश्यकता
है — उस धर्म की&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिसका
वर्णन मैंने करने का प्रयास
किया है। अनेक महान भारतीय
इस पर चुपचाप काम कर रहे हैं।
वे अधिक दिखाई नहीं देते&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;न प्रचार
चाहते हैं। वे शान्ति से अपना
काम करते रहते हैं। उसी कारण
भारत में धर्म आज भी जीवित है
— ऐसे ही मितभाषी लोगों के
कारण।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;/div&gt;
&lt;div align="center" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 120%; margin-bottom: 7pt;"&gt;
&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="left" class="western"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;style type="text/css"&gt;p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; }&lt;/style&gt; &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/bwwzcyb34hez87j7y4ocu/02.mp3?rlkey=p5ne7g7f20bl5ajihpxbx6fl0&amp;st=m3s0hlio&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBxe-_enYgiAf92DA6UY_hp1rUn8QzPQcnG8eQOpO5wEN7s7ZOyNO923DHF6aqko9dJNBgDP73m-l07NxDgQybSdyMskQEVMQ4oLfxynd2y34-Azuh7YZNgyjvd0gPcAyUTPtzU5hPQbiggxxqWqGn7tDl1skFMZWaXARYxd_2TwBV94Xq0ijeJdvKKQ4/s72-c/What-is-Hinduism1.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-IN }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:visited { color: #800000; text-decoration: underline }a:link { color: #000080; text-decoration: underline } &amp;nbsp; यदि आप यह प्रश्न किसी हिन्दू से पूछें, तो सम्भव है कि वह सीधा-सरल उत्तर देने में हिचकिचा जाए। वह घंटों हिन्दू धर्म के बारे में बोल सकता है, पर उसे साफ और निश्चित शब्दों में परिभाषित नहीं कर पाएगा। अधिकांश लोग सांस्कृतिक परम्पराओं, अनेक देवताओं और उनकी पूजा, पौराणिक कथाओं आदि की बात करेंगे। कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो ऊँची-ऊँची दार्शनिक शब्दावली से आपको उलझा देंगे, जिसे वे स्वयं भी ठीक से नहीं समझते. var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-IN }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:visited { color: #800000; text-decoration: underline }a:link { color: #000080; text-decoration: underline } और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमेशा ‘दूसरों’को सुधारना अपना कर्तव्य समझते हैं। इसलिए वे बताते हैं कि हिन्दू धर्म क्या नहीं है, और उचित धार्मिक प्रशिक्षण, उपनिषदों की उच्च दार्शनिकता का परिचय तथा ‘मूलों’ की ओर लौटने से इसे कैसे सुधारा जा सकता है — चाहे उसका अर्थ स्पष्ट हो या न हो। भारत में धर्म — आप चाहें तो इसे हिन्दू धर्म कह सकते हैं — किसी विचारधारा के कठोर ढाँचे में बाँधने की चीज़ नहीं है; न ही यह ‘मेटाफ़िज़िक्स’ या छिपे अर्थों की खोज है। यह गहराई से जड़ जमाए हुए मूल्यों में बसता है। भारतीय सन्दर्भ में ‘रिलिजन’ शब्द ठीक नहीं बैठता। इसे धर्म कहा जाता है। मैं दो सरल उदाहरण देता हूँ। महान भारतीय निर्देशक जी वी अय्यर की शंकराचार्य पर बनी संस्कृत फ़िल्म में एक प्रसंग बहुत सुन्दर ढंग से दिखाया गया है। चित्रण के अनुसार, एक बार एक चोर नारियल चुराने के लिए पेड़ पर चढ़ जाता है। वह पेड़ दक्षिण भारत के एक परम्परावादी नम्बूदरी ब्राह्मण का था। ब्राह्मण को यह बात पता चलती है। वह वहाँ आता है और पेड़ के ऊपर बैठे चोर को देखता है। चोर अभी ऊपर ही होता है कि वह अपना अंगवस्त्र पेड़ पर ऊपर बाँध देता है। अब चोर भाग नहीं सकता, क्योंकि जाति नियमों के कारण वह ब्राह्मण के अंगवस्त्र को लाँघ नहीं सकता। और इतनी ऊँचाई से कूद भी नहीं सकता। इसलिए वह असहाय होकर पेड़ पर ही बैठा रहता है। ब्राह्मण घर लौटता है। एक थाली भर भोजन और कुछ नारियल लाकर पेड़ के नीचे रख देता है। फिर अंगवस्त्र खोलकर चोर से नीचे उतरने को कहता है। चोर के उतरने पर वह उसे भोजन और नारियल देता है और दोबारा चोरी न करने की सलाह देता है। वह यह भी कहता है कि सचमुच आवश्यकता हो तो माँग लेना। वह ब्राह्मण परम्परावादी है और अस्पृश्यता भी मानता है। फिर भी इससे उसे उस आवश्यकता के प्रति सहानुभूति रखने से रोक नहीं पाता जिसने उस व्यक्ति को चोर बना दिया। उसका उद्देश्य दण्ड देना नहीं, बल्कि अपने ढंग से उसे सुधारना है। यह कहानी कल्पित भी हो सकती है, पर यह हिन्दू धर्म के हृदय में बसे मूल्य-तंत्र के बारे में बहुत कुछ बताती है। मैंने अत्यन्त परम्परावादी ब्राह्मण परिवार देखे हैं, जो जाति की सीमाएँ पार कर गरीबों और पीड़ितों की सहायता करते थे। ऐसे ही एक परिवार में मैंने अकाल के समय निःशुल्क भोजन शिविर चलाकर गरीबों को भोजन कराते देखा है। अन्यथा वे लोग कठोरता से जाति भेद मानते थे। पर मानवता के सामने सब बाधाएँ हट जाती थीं। यह अलग बात है कि इस धर्म का उल्लंघन करने वाले ढोंगी धार्मिक लोग भी बहुत हैं। यहीं वास्तविक हिन्दू धर्म है। वह न उच्च दर्शन में है, न मेटाफ़िज़िक्स में, न छिपे अर्थों को खोजने में; वह गहराई से बसे मूल्यों में है। अधिकांश भारतीय सौभाग्य से इसे जन्म से ही पा लेते हैं। बस आधुनिक भटकाव ने उन्हें इन मूलभूत मूल्यों से दूर कर दिया है — हाल तक, और मेरा विश्वास है आज भी, यह काफी हद तक उनमें विद्यमान है। यही चुपचाप हिन्दूपन को परिभाषित करता है। यदि कुछ सिखाया और पोषित किया जाना चाहिए, तो यही है। दर्शन पढ़ाने या औपचारिक धार्मिक प्रशिक्षण देने से मनुष्य ज्ञानी और कुछ हद तक अहंकारी बन सकता है, पर सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ — मूल्यों — को नहीं जगा सकता। यह सही नहीं कि भारत को धार्मिक प्रशिक्षण की सख़्त आवश्यकता है — उस धर्म की, जिसका वर्णन मैंने करने का प्रयास किया है। अनेक महान भारतीय इस पर चुपचाप काम कर रहे हैं। वे अधिक दिखाई नहीं देते, न प्रचार चाहते हैं। वे शान्ति से अपना काम करते रहते हैं। उसी कारण भारत में धर्म आज भी जीवित है — ऐसे ही मितभाषी लोगों के कारण। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; 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hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-IN }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:visited { color: #800000; text-decoration: underline }a:link { color: #000080; text-decoration: underline } और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमेशा ‘दूसरों’को सुधारना अपना कर्तव्य समझते हैं। इसलिए वे बताते हैं कि हिन्दू धर्म क्या नहीं है, और उचित धार्मिक प्रशिक्षण, उपनिषदों की उच्च दार्शनिकता का परिचय तथा ‘मूलों’ की ओर लौटने से इसे कैसे सुधारा जा सकता है — चाहे उसका अर्थ स्पष्ट हो या न हो। भारत में धर्म — आप चाहें तो इसे हिन्दू धर्म कह सकते हैं — किसी विचारधारा के कठोर ढाँचे में बाँधने की चीज़ नहीं है; न ही यह ‘मेटाफ़िज़िक्स’ या छिपे अर्थों की खोज है। यह गहराई से जड़ जमाए हुए मूल्यों में बसता है। भारतीय सन्दर्भ में ‘रिलिजन’ शब्द ठीक नहीं बैठता। इसे धर्म कहा जाता है। मैं दो सरल उदाहरण देता हूँ। महान भारतीय निर्देशक जी वी अय्यर की शंकराचार्य पर बनी संस्कृत फ़िल्म में एक प्रसंग बहुत सुन्दर ढंग से दिखाया गया है। चित्रण के अनुसार, एक बार एक चोर नारियल चुराने के लिए पेड़ पर चढ़ जाता है। वह पेड़ दक्षिण भारत के एक परम्परावादी नम्बूदरी ब्राह्मण का था। ब्राह्मण को यह बात पता चलती है। वह वहाँ आता है और पेड़ के ऊपर बैठे चोर को देखता है। चोर अभी ऊपर ही होता है कि वह अपना अंगवस्त्र पेड़ पर ऊपर बाँध देता है। अब चोर भाग नहीं सकता, क्योंकि जाति नियमों के कारण वह ब्राह्मण के अंगवस्त्र को लाँघ नहीं सकता। और इतनी ऊँचाई से कूद भी नहीं सकता। इसलिए वह असहाय होकर पेड़ पर ही बैठा रहता है। ब्राह्मण घर लौटता है। एक थाली भर भोजन और कुछ नारियल लाकर पेड़ के नीचे रख देता है। फिर अंगवस्त्र खोलकर चोर से नीचे उतरने को कहता है। चोर के उतरने पर वह उसे भोजन और नारियल देता है और दोबारा चोरी न करने की सलाह देता है। वह यह भी कहता है कि सचमुच आवश्यकता हो तो माँग लेना। वह ब्राह्मण परम्परावादी है और अस्पृश्यता भी मानता है। फिर भी इससे उसे उस आवश्यकता के प्रति सहानुभूति रखने से रोक नहीं पाता जिसने उस व्यक्ति को चोर बना दिया। उसका उद्देश्य दण्ड देना नहीं, बल्कि अपने ढंग से उसे सुधारना है। यह कहानी कल्पित भी हो सकती है, पर यह हिन्दू धर्म के हृदय में बसे मूल्य-तंत्र के बारे में बहुत कुछ बताती है। मैंने अत्यन्त परम्परावादी ब्राह्मण परिवार देखे हैं, जो जाति की सीमाएँ पार कर गरीबों और पीड़ितों की सहायता करते थे। ऐसे ही एक परिवार में मैंने अकाल के समय निःशुल्क भोजन शिविर चलाकर गरीबों को भोजन कराते देखा है। अन्यथा वे लोग कठोरता से जाति भेद मानते थे। पर मानवता के सामने सब बाधाएँ हट जाती थीं। यह अलग बात है कि इस धर्म का उल्लंघन करने वाले ढोंगी धार्मिक लोग भी बहुत हैं। यहीं वास्तविक हिन्दू धर्म है। वह न उच्च दर्शन में है, न मेटाफ़िज़िक्स में, न छिपे अर्थों को खोजने में; वह गहराई से बसे मूल्यों में है। अधिकांश भारतीय सौभाग्य से इसे जन्म से ही पा लेते हैं। बस आधुनिक भटकाव ने उन्हें इन मूलभूत मूल्यों से दूर कर दिया है — हाल तक, और मेरा विश्वास है आज भी, यह काफी हद तक उनमें विद्यमान है। यही चुपचाप हिन्दूपन को परिभाषित करता है। यदि कुछ सिखाया और पोषित किया जाना चाहिए, तो यही है। दर्शन पढ़ाने या औपचारिक धार्मिक प्रशिक्षण देने से मनुष्य ज्ञानी और कुछ हद तक अहंकारी बन सकता है, पर सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ — मूल्यों — को नहीं जगा सकता। यह सही नहीं कि भारत को धार्मिक प्रशिक्षण की सख़्त आवश्यकता है — उस धर्म की, जिसका वर्णन मैंने करने का प्रयास किया है। अनेक महान भारतीय इस पर चुपचाप काम कर रहे हैं। वे अधिक दिखाई नहीं देते, न प्रचार चाहते हैं। वे शान्ति से अपना काम करते रहते हैं। उसी कारण भारत में धर्म आज भी जीवित है — ऐसे ही मितभाषी लोगों के कारण। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #Hindu, #IndianPhilosophy, #podcast, #QnA, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>आइए योग को अच्छी तरह समझें</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/02/blog-post_25.html</link><category>#audiobook</category><category>#Hindi</category><category>#newbook</category><category>#podcast</category><category>#Yoga</category><pubDate>Wed, 25 Feb 2026 07:00:20 -0800</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-8898970490194555991</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: left;"&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;

&lt;/div&gt;


	&lt;style type="text/css"&gt;p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:link { color: #000080; text-decoration: underline }&lt;/style&gt;

&lt;p align="left" class="western"&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh7mGwWzci9tPifKhwZaOKol8jWiljUx3AfApEJRaofAEzq2BquEJYqUoi4xAkrJ2j7or9Vbfp0lN2-98Rou4kOOG1ttrvu2l-G9lqPvHZnxWBTRWT32acGayktn6Io0ArXlaaoqR5N2iJO27ZApEkekVT7auKwQ-lK1tF4g0QfRINmf_jWDyOlCls7Z30/s3000/UltimateAudio-HINDI-Cover1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="3000" data-original-width="3000" height="320" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh7mGwWzci9tPifKhwZaOKol8jWiljUx3AfApEJRaofAEzq2BquEJYqUoi4xAkrJ2j7or9Vbfp0lN2-98Rou4kOOG1ttrvu2l-G9lqPvHZnxWBTRWT32acGayktn6Io0ArXlaaoqR5N2iJO27ZApEkekVT7auKwQ-lK1tF4g0QfRINmf_jWDyOlCls7Z30/s320/UltimateAudio-HINDI-Cover1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;आज&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; के समय
में योग क्या है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यह
न जानने वाले लोग बहुत कम हैं।
योग अत्यंत लाभकारी है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यह
बात लगभग सभी स्वाभाविक रूप
से स्वीकार करते हैं। अनेक
योग&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;गुरुओं
ने योग पर पुस्तकें लिखी हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिनमें
से कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुई
हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;लेकिन
यदि थोड़ा गहराई से देखा जाए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;तो इन
पुस्तकों में से अधिकांश केवल
उन्हीं विशेष ‘योग&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;रूपों’
की चर्चा करती हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिनका
प्रचार वे गुरु स्वयं करते
हैं। साथ ही&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इन
पुस्तकों का बड़ा हिस्सा योग
को आदेशात्मक दृष्टिकोण से
प्रस्तुत करता है। योग को धर्म
या अन्य आस्था&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;आधारित
प्रणालियों की तरह एक
विश्वास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;प्रणाली
के रूप में चित्रित कियाजाता
है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-----------------------------&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;


	&lt;style type="text/css"&gt;h2 { color: #000000; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-top: 0.35cm; margin-bottom: 0.21cm; direction: ltr; background: transparent; page-break-after: avoid }h2.western { font-family: "Liberation Sans", serif; font-size: 16pt; so-language: en-US; font-weight: bold }h2.cjk { font-family: "Noto Sans CJK SC"; font-size: 16pt; so-language: zh-CN; font-weight: bold }h2.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 16pt; so-language: hi-IN; font-weight: bold }p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:link { color: #000080; text-decoration: underline }&lt;/style&gt;

&lt;p align="left" class="western"&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;उदाहरण
के लिए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जब
ये पुस्तकें आसनों या श्वास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;प्रश्वास
के अभ्यासों की बात करती हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;तो उनके
स्वास्थ्य&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;लाभों
का अवश्य उल्लेख करती हैं।
लेकिन ये अभ्यास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;बताए
गए परिणाम कैसे उत्पन्न करते
हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इसका
तर्कसंगत विवरण बहुत कम मिलता
है। अपने दावों के समर्थन में
प्रयोगात्मक प्रमाण भी बहुत
कम दिए जाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;कुछ
गुरु&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;परस्पर
विरोधी अनेक अवधारणाओं और
दृष्टिकोणों को बिना किसी
स्पष्ट विवरण के एक साथ प्रस्तुत
कर देते हैं और पाठकों को
अतिशयोक्ति में डुबोदेते
हैं। वे &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;cosmic energy, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अतिचेतन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अतींद्रिय
जागरूकता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जैसे
शब्दों का प्रयोग करते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;लेकिन इनके
वास्तविक अर्थ क्या हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यह बहुत
कम ही स्पष्ट कियाजाता है या
परिभाषित किया जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;आधुनिक
चिकित्सा शब्दावली या क्वांटम
भौतिकी के सिद्धांतों से जुड़ी
अस्पष्ट उपमाओं का उपयोग करके&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ये गुरु
अपने रहस्यमय सिद्धांतों को
वैज्ञानिक आवरण देने का प्रयास
करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योग
की इस प्रकार की व्याख्या से
दो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;प्रमुख
समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
पहली&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यदि
योग के पीछे कार्य करने वाली
मूल प्रक्रियाओं को स्पष्ट
रूप से न समझाजाए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;तो
उसके संपूर्ण लाभ प्राप्त
करना कठिन हो जाता है। दूसरी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिसे ठीक
से समझानगया हो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ऐसी
कोई भी प्रणाली समय के साथ
विकृत होजाती है और अपना महत्व
खोदेती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;हमें
एक ऐसी योग&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पद्धति
की आवश्यकता है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जो
स्पष्ट रूप से परिभाषित हो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिसके
सिद्धांत दृढ़ हों&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;और
जिसे यथासंभव निष्पक्ष रूप
से परीक्षण के लिए परखा जासके।
ऐसी प्रणाली&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जो
भरोसेमंद और अपेक्षित परिणाम
दे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;क्या
आज हम जो योग देख रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;वह इन
मानदंडों को पूरा करता है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;?&lt;/p&gt;&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अधिकांश
लोगों के लिए योग का अर्थ
शरीर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;केंद्रित
अभ्यास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;कुछ
आसन या श्वसन क्रियाएँ ही होता
है। ऐसे लोगों का उद्देश्य
प्रायः शारीरिक स्वास्थ्य
और शारीरिक क्षमता को बनाए
रखना होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;स्वास्थ्य
और शारीरिक क्षमता निस्संदेह
महत्वपूर्ण हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;लेकिन
योग केवल वहीं तक सीमित नहीं
है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योग
सामान्य स्वास्थ्य&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;वृद्धि
से लेकर तनाव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;निवारण&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;एकाग्रता&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;वृद्धि&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;मानसिक
क्षमता का विकास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अवर्णनीय
आनंद का अनुभव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;परम
साक्षात्कार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;और
अंततः अधिक शांत तथा रहनेयोग्य
संसार के निर्माणतक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अत्यंत
व्यापक उपयोग रखता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;लेकिन
इनमें से कुछ योग के वास्तविक
लक्ष्य नहीं हैं। ये तो योग
का ईमानदारी से अभ्यास करने
पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त
होने वाले उपफल मात्र हैं।
इसे हम आगे देखेंगे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योग
का इतिहास हजारों वर्षों
पुराना है। समय के साथ योग में
अनेक परिवर्तन हुए और उसने
कई नए रूप धारण किए। आज के समय
में जिसे योग के रूप में प्रस्तुत
किया जा रहा है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;वह
विराट&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योग
का केवल एक संक्षिप्त रूप
मात्र है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 class="western" style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;तो
		फिर वास्तव मॆं योग क्या
		है&lt;/span&gt;?&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योग
के मूल प्रवर्तक के रूप में
व्यापक रूप से स्वीकार किए
गए पतंजलि योग को इस प्रकार
परिभाषित करते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;:&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;“&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योगः&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;चित्तवृत्ति
निरोधः"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योग
का अर्थ है मन की क्रियाओं को
नियंत्रित करना।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
–
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योगसूत्र
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;1.2&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अर्थात
योग मन को पूर्णतः शांत अवस्था
में लाने से संबंधित है। लेकिन
शांत मन होना ही योग का अंतिम
लक्ष्य नहीं है। मन को शांत
करना केवल एक विधि है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;मन
से परे किसी अवस्था तक पहुँचने
का साधन। वह अवस्था क्या है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इसे हम आगे
देखेंगे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पतंजलि
के योगसूत्र के इसी दूसरे
सूत्र से स्पष्ट होता है कि
योग मुख्यतः मन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;केंद्रित
पद्धति है। आज हम जिसे योग के
रूप में देखते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;उसके
अनेक अंग&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इसमें
बहुत कम मात्रा में पाए जाते
हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;आइए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पतंजलि
द्वारा प्रतिपादित इस मूल
योग में थोड़ा और प्रवेश करें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पतंजलि
का योग उसके ‘योगसूत्र’ नामक
ग्रंथ में वर्णित है। यह कुल
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;195 &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;सूत्रों
का संग्रह है। ‘सूत्र’ का अर्थ
है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;कम
शब्दों में गहन अर्थ को समेटे
हुए संक्षिप्त अभिव्यक्ति।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ये
सूत्र चार अध्यायों में विभाजित
हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;समाधि
पाद&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;साधन
पाद&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;विभूति
पाद और कैवल्य पाद।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इन
अध्यायों के बीच की सीमाएँ
बहुत स्पष्ट नहीं हैं। विषय
कई बार अध्यायों की सीमाओं
को पार करतेहुए प्रवाहित होते
हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि
मूलतः यह एक सतत ग्रंथ था&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिसे बाद
में किसी ने विभाजित किया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पहले
दो अध्यायों में योगसूत्र के
केंद्रीय तत्व सम्मिलित हैं।
वे मूल सिद्धांतों और विधियों
की चर्चा करते हैं। शेष अध्याय&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;बाद की
जोड़ प्रतीत होते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;.
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इसलिए मैं
सामान्यतः इन्हीं पहले दो
अध्यायों पर अधिक ध्यान केंद्रित
करता हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;अधिकांश
लोगों की मान्यता है कि पतंजलि
का योग ईसा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पूर्व
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;200 &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;के
आसपास प्रचलन में आया। कुछ
लोग इसे बाद की अवधि&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ईसा
की चौथी से छठी शताब्दी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;से
जोड़ते हैं। लेकिन आगे जिन
कारणों का मैं उल्लेख करूँगा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;उनके आधार
पर मेरी धारणा है कि पतंजलि
ईसा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पूर्व
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;200 &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;या
उससे भी पहले के समय का व्यक्ति
था।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इन
तिथियों को लेकर मैं अधिक
आग्रह नहीं करता। किंतु कभी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;कभी
कालक्रम यह समझने में सहायता
करता है कि विचार एक चरण से
दूसरे चरणतक कैसे पहुँचे। आज
का योग अपने वर्तमान स्वरूप
में कैसे आया&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;और
इसके लिए कौन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;से
तत्व उत्तरदायी रहे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;इसे
समझने में यह उपयोगी होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पतंजलि
के योग का मुख्य विषय मन को
क्रमशः पूर्ण शांति की अवस्था
तक पहुँचाना है। इसका उद्देश्य
हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व
के परमसत्य को जानना है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;उस
लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग
के रूप में ध्यान को बताया गया
है। इस योग में शारीरिक आसनों
और श्वसन अभ्यासों का उल्लेख
बहुत सीमित है। उन्हें केवल
ध्यान की पूर्वतैयारी के रूप
में देखा गया है। स्वास्थ्य&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;वृद्धि
कभी भी लक्ष्य नहीं रही।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पतंजलि
के योग में आठ चरण हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;जिन्हें
अष्टांग&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;योग
कहा जाता है। संक्षेप में ये
हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;यम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;नियम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;आसन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;प्राणायाम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;प्रत्याहार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;धारणा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;ध्यान और
समाधि।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p align="left" class="western"&gt;&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;पूरी
किताब सुनने के लिए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;कृपया
“&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: navy;"&gt;&lt;u&gt;&lt;a href="https://tinyurl.com/mylibrary1234"&gt;https://tinyurl.com/mylibrary1234&lt;/a&gt;&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;”
&lt;span style="font-family: Lohit Devanagari;"&gt;&lt;span lang="hi-IN"&gt;देखें&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;/div&gt;
&lt;div align="center" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 120%; margin-bottom: 7pt;"&gt;
&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="left" class="western"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;style type="text/css"&gt;p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; }&lt;/style&gt; &lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/qeg2fohbha1negltjodbv/03.mp3?rlkey=0gi2z9shr636ig86d4h373c1s&amp;st=xpd3vfxn&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh7mGwWzci9tPifKhwZaOKol8jWiljUx3AfApEJRaofAEzq2BquEJYqUoi4xAkrJ2j7or9Vbfp0lN2-98Rou4kOOG1ttrvu2l-G9lqPvHZnxWBTRWT32acGayktn6Io0ArXlaaoqR5N2iJO27ZApEkekVT7auKwQ-lK1tF4g0QfRINmf_jWDyOlCls7Z30/s72-c/UltimateAudio-HINDI-Cover1.jpg" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:link { color: #000080; text-decoration: underline } आज के समय में योग क्या है, यह न जानने वाले लोग बहुत कम हैं। योग अत्यंत लाभकारी है,यह बात लगभग सभी स्वाभाविक रूप से स्वीकार करते हैं। अनेक योग-गुरुओं ने योग पर पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुई हैं। लेकिन यदि थोड़ा गहराई से देखा जाए, तो इन पुस्तकों में से अधिकांश केवल उन्हीं विशेष ‘योग-रूपों’ की चर्चा करती हैं, जिनका प्रचार वे गुरु स्वयं करते हैं। साथ ही, इन पुस्तकों का बड़ा हिस्सा योग को आदेशात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। योग को धर्म या अन्य आस्था-आधारित प्रणालियों की तरह एक विश्वास-प्रणाली के रूप में चित्रित कियाजाता है। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); h2 { color: #000000; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-top: 0.35cm; margin-bottom: 0.21cm; direction: ltr; background: transparent; page-break-after: avoid }h2.western { font-family: "Liberation Sans", serif; font-size: 16pt; so-language: en-US; font-weight: bold }h2.cjk { font-family: "Noto Sans CJK SC"; font-size: 16pt; so-language: zh-CN; font-weight: bold }h2.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 16pt; so-language: hi-IN; font-weight: bold }p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:link { color: #000080; text-decoration: underline } उदाहरण के लिए, जब ये पुस्तकें आसनों या श्वास-प्रश्वास के अभ्यासों की बात करती हैं, तो उनके स्वास्थ्य-लाभों का अवश्य उल्लेख करती हैं। लेकिन ये अभ्यास, बताए गए परिणाम कैसे उत्पन्न करते हैं, इसका तर्कसंगत विवरण बहुत कम मिलता है। अपने दावों के समर्थन में प्रयोगात्मक प्रमाण भी बहुत कम दिए जाते हैं। कुछ गुरु, परस्पर विरोधी अनेक अवधारणाओं और दृष्टिकोणों को बिना किसी स्पष्ट विवरण के एक साथ प्रस्तुत कर देते हैं और पाठकों को अतिशयोक्ति में डुबोदेते हैं। वे cosmic energy, अतिचेतन, अतींद्रिय जागरूकता, जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन इनके वास्तविक अर्थ क्या हैं, यह बहुत कम ही स्पष्ट कियाजाता है या परिभाषित किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा शब्दावली या क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों से जुड़ी अस्पष्ट उपमाओं का उपयोग करके, ये गुरु अपने रहस्यमय सिद्धांतों को वैज्ञानिक आवरण देने का प्रयास करते हैं। योग की इस प्रकार की व्याख्या से दो-प्रमुख समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पहली, यदि योग के पीछे कार्य करने वाली मूल प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से न समझाजाए, तो उसके संपूर्ण लाभ प्राप्त करना कठिन हो जाता है। दूसरी, जिसे ठीक से समझानगया हो, ऐसी कोई भी प्रणाली समय के साथ विकृत होजाती है और अपना महत्व खोदेती है।हमें एक ऐसी योग-पद्धति की आवश्यकता है, जो स्पष्ट रूप से परिभाषित हो, जिसके सिद्धांत दृढ़ हों, और जिसे यथासंभव निष्पक्ष रूप से परीक्षण के लिए परखा जासके। ऐसी प्रणाली, जो भरोसेमंद और अपेक्षित परिणाम दे। क्या आज हम जो योग देख रहे हैं, वह इन मानदंडों को पूरा करता है?अधिकांश लोगों के लिए योग का अर्थ शरीर-केंद्रित अभ्यास, कुछ आसन या श्वसन क्रियाएँ ही होता है। ऐसे लोगों का उद्देश्य प्रायः शारीरिक स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता को बनाए रखना होता है। स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन योग केवल वहीं तक सीमित नहीं है। योग सामान्य स्वास्थ्य-वृद्धि से लेकर तनाव-निवारण, एकाग्रता-वृद्धि, मानसिक क्षमता का विकास, अवर्णनीय आनंद का अनुभव, परम साक्षात्कार, और अंततः अधिक शांत तथा रहनेयोग्य संसार के निर्माणतक, अत्यंत व्यापक उपयोग रखता है। लेकिन इनमें से कुछ योग के वास्तविक लक्ष्य नहीं हैं। ये तो योग का ईमानदारी से अभ्यास करने पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त होने वाले उपफल मात्र हैं। इसे हम आगे देखेंगे।योग का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। समय के साथ योग में अनेक परिवर्तन हुए और उसने कई नए रूप धारण किए। आज के समय में जिसे योग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह विराट-योग का केवल एक संक्षिप्त रूप मात्र है।तो फिर वास्तव मॆं योग क्या है? योग के मूल प्रवर्तक के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किए गए पतंजलि योग को इस प्रकार परिभाषित करते हैं: “योगः, चित्तवृत्ति निरोधः" योग का अर्थ है मन की क्रियाओं को नियंत्रित करना। – योगसूत्र 1.2 अर्थात योग मन को पूर्णतः शांत अवस्था में लाने से संबंधित है। लेकिन शांत मन होना ही योग का अंतिम लक्ष्य नहीं है। मन को शांत करना केवल एक विधि है,मन से परे किसी अवस्था तक पहुँचने का साधन। वह अवस्था क्या है, इसे हम आगे देखेंगे। पतंजलि के योगसूत्र के इसी दूसरे सूत्र से स्पष्ट होता है कि योग मुख्यतः मन-केंद्रित पद्धति है। आज हम जिसे योग के रूप में देखते हैं, उसके अनेक अंग, इसमें बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। आइए, पतंजलि द्वारा प्रतिपादित इस मूल योग में थोड़ा और प्रवेश करें। पतंजलि का योग उसके ‘योगसूत्र’ नामक ग्रंथ में वर्णित है। यह कुल 195 सूत्रों का संग्रह है। ‘सूत्र’ का अर्थ है,कम शब्दों में गहन अर्थ को समेटे हुए संक्षिप्त अभिव्यक्ति। ये सूत्र चार अध्यायों में विभाजित हैं,समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद। इन अध्यायों के बीच की सीमाएँ बहुत स्पष्ट नहीं हैं। विषय कई बार अध्यायों की सीमाओं को पार करतेहुए प्रवाहित होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मूलतः यह एक सतत ग्रंथ था, जिसे बाद में किसी ने विभाजित किया। पहले दो अध्यायों में योगसूत्र के केंद्रीय तत्व सम्मिलित हैं। वे मूल सिद्धांतों और विधियों की चर्चा करते हैं। शेष अध्याय, बाद की जोड़ प्रतीत होते हैं. इसलिए मैं सामान्यतः इन्हीं पहले दो अध्यायों पर अधिक ध्यान केंद्रित करता हूँ। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि पतंजलि का योग ईसा-पूर्व 200 के आसपास प्रचलन में आया। कुछ लोग इसे बाद की अवधि,ईसा की चौथी से छठी शताब्दी,से जोड़ते हैं। लेकिन आगे जिन कारणों का मैं उल्लेख करूँगा, उनके आधार पर मेरी धारणा है कि पतंजलि ईसा-पूर्व 200 या उससे भी पहले के समय का व्यक्ति था। इन तिथियों को लेकर मैं अधिक आग्रह नहीं करता। किंतु कभी-कभी कालक्रम यह समझने में सहायता करता है कि विचार एक चरण से दूसरे चरणतक कैसे पहुँचे। आज का योग अपने वर्तमान स्वरूप में कैसे आया, और इसके लिए कौन-से तत्व उत्तरदायी रहे,इसे समझने में यह उपयोगी होता है। पतंजलि के योग का मुख्य विषय मन को क्रमशः पूर्ण शांति की अवस्था तक पहुँचाना है। इसका उद्देश्य हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व के परमसत्य को जानना है। उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग के रूप में ध्यान को बताया गया है। इस योग में शारीरिक आसनों और श्वसन अभ्यासों का उल्लेख बहुत सीमित है। उन्हें केवल ध्यान की पूर्वतैयारी के रूप में देखा गया है। स्वास्थ्य-वृद्धि कभी भी लक्ष्य नहीं रही। पतंजलि के योग में आठ चरण हैं, जिन्हें अष्टांग-योग कहा जाता है। संक्षेप में ये हैं,यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। पूरी किताब सुनने के लिए, कृपया “https://tinyurl.com/mylibrary1234” देखें &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:link { color: #000080; text-decoration: underline } आज के समय में योग क्या है, यह न जानने वाले लोग बहुत कम हैं। योग अत्यंत लाभकारी है,यह बात लगभग सभी स्वाभाविक रूप से स्वीकार करते हैं। अनेक योग-गुरुओं ने योग पर पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुई हैं। लेकिन यदि थोड़ा गहराई से देखा जाए, तो इन पुस्तकों में से अधिकांश केवल उन्हीं विशेष ‘योग-रूपों’ की चर्चा करती हैं, जिनका प्रचार वे गुरु स्वयं करते हैं। साथ ही, इन पुस्तकों का बड़ा हिस्सा योग को आदेशात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। योग को धर्म या अन्य आस्था-आधारित प्रणालियों की तरह एक विश्वास-प्रणाली के रूप में चित्रित कियाजाता है। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); h2 { color: #000000; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-top: 0.35cm; margin-bottom: 0.21cm; direction: ltr; background: transparent; page-break-after: avoid }h2.western { font-family: "Liberation Sans", serif; font-size: 16pt; so-language: en-US; font-weight: bold }h2.cjk { font-family: "Noto Sans CJK SC"; font-size: 16pt; so-language: zh-CN; font-weight: bold }h2.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 16pt; so-language: hi-IN; font-weight: bold }p { color: #000000; line-height: 115%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: "Noto Serif CJK SC"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN }p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }a:link { color: #000080; text-decoration: underline } उदाहरण के लिए, जब ये पुस्तकें आसनों या श्वास-प्रश्वास के अभ्यासों की बात करती हैं, तो उनके स्वास्थ्य-लाभों का अवश्य उल्लेख करती हैं। लेकिन ये अभ्यास, बताए गए परिणाम कैसे उत्पन्न करते हैं, इसका तर्कसंगत विवरण बहुत कम मिलता है। अपने दावों के समर्थन में प्रयोगात्मक प्रमाण भी बहुत कम दिए जाते हैं। कुछ गुरु, परस्पर विरोधी अनेक अवधारणाओं और दृष्टिकोणों को बिना किसी स्पष्ट विवरण के एक साथ प्रस्तुत कर देते हैं और पाठकों को अतिशयोक्ति में डुबोदेते हैं। वे cosmic energy, अतिचेतन, अतींद्रिय जागरूकता, जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन इनके वास्तविक अर्थ क्या हैं, यह बहुत कम ही स्पष्ट कियाजाता है या परिभाषित किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा शब्दावली या क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों से जुड़ी अस्पष्ट उपमाओं का उपयोग करके, ये गुरु अपने रहस्यमय सिद्धांतों को वैज्ञानिक आवरण देने का प्रयास करते हैं। योग की इस प्रकार की व्याख्या से दो-प्रमुख समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पहली, यदि योग के पीछे कार्य करने वाली मूल प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से न समझाजाए, तो उसके संपूर्ण लाभ प्राप्त करना कठिन हो जाता है। दूसरी, जिसे ठीक से समझानगया हो, ऐसी कोई भी प्रणाली समय के साथ विकृत होजाती है और अपना महत्व खोदेती है।हमें एक ऐसी योग-पद्धति की आवश्यकता है, जो स्पष्ट रूप से परिभाषित हो, जिसके सिद्धांत दृढ़ हों, और जिसे यथासंभव निष्पक्ष रूप से परीक्षण के लिए परखा जासके। ऐसी प्रणाली, जो भरोसेमंद और अपेक्षित परिणाम दे। क्या आज हम जो योग देख रहे हैं, वह इन मानदंडों को पूरा करता है?अधिकांश लोगों के लिए योग का अर्थ शरीर-केंद्रित अभ्यास, कुछ आसन या श्वसन क्रियाएँ ही होता है। ऐसे लोगों का उद्देश्य प्रायः शारीरिक स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता को बनाए रखना होता है। स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन योग केवल वहीं तक सीमित नहीं है। योग सामान्य स्वास्थ्य-वृद्धि से लेकर तनाव-निवारण, एकाग्रता-वृद्धि, मानसिक क्षमता का विकास, अवर्णनीय आनंद का अनुभव, परम साक्षात्कार, और अंततः अधिक शांत तथा रहनेयोग्य संसार के निर्माणतक, अत्यंत व्यापक उपयोग रखता है। लेकिन इनमें से कुछ योग के वास्तविक लक्ष्य नहीं हैं। ये तो योग का ईमानदारी से अभ्यास करने पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त होने वाले उपफल मात्र हैं। इसे हम आगे देखेंगे।योग का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। समय के साथ योग में अनेक परिवर्तन हुए और उसने कई नए रूप धारण किए। आज के समय में जिसे योग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह विराट-योग का केवल एक संक्षिप्त रूप मात्र है।तो फिर वास्तव मॆं योग क्या है? योग के मूल प्रवर्तक के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किए गए पतंजलि योग को इस प्रकार परिभाषित करते हैं: “योगः, चित्तवृत्ति निरोधः" योग का अर्थ है मन की क्रियाओं को नियंत्रित करना। – योगसूत्र 1.2 अर्थात योग मन को पूर्णतः शांत अवस्था में लाने से संबंधित है। लेकिन शांत मन होना ही योग का अंतिम लक्ष्य नहीं है। मन को शांत करना केवल एक विधि है,मन से परे किसी अवस्था तक पहुँचने का साधन। वह अवस्था क्या है, इसे हम आगे देखेंगे। पतंजलि के योगसूत्र के इसी दूसरे सूत्र से स्पष्ट होता है कि योग मुख्यतः मन-केंद्रित पद्धति है। आज हम जिसे योग के रूप में देखते हैं, उसके अनेक अंग, इसमें बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। आइए, पतंजलि द्वारा प्रतिपादित इस मूल योग में थोड़ा और प्रवेश करें। पतंजलि का योग उसके ‘योगसूत्र’ नामक ग्रंथ में वर्णित है। यह कुल 195 सूत्रों का संग्रह है। ‘सूत्र’ का अर्थ है,कम शब्दों में गहन अर्थ को समेटे हुए संक्षिप्त अभिव्यक्ति। ये सूत्र चार अध्यायों में विभाजित हैं,समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद। इन अध्यायों के बीच की सीमाएँ बहुत स्पष्ट नहीं हैं। विषय कई बार अध्यायों की सीमाओं को पार करतेहुए प्रवाहित होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मूलतः यह एक सतत ग्रंथ था, जिसे बाद में किसी ने विभाजित किया। पहले दो अध्यायों में योगसूत्र के केंद्रीय तत्व सम्मिलित हैं। वे मूल सिद्धांतों और विधियों की चर्चा करते हैं। शेष अध्याय, बाद की जोड़ प्रतीत होते हैं. इसलिए मैं सामान्यतः इन्हीं पहले दो अध्यायों पर अधिक ध्यान केंद्रित करता हूँ। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि पतंजलि का योग ईसा-पूर्व 200 के आसपास प्रचलन में आया। कुछ लोग इसे बाद की अवधि,ईसा की चौथी से छठी शताब्दी,से जोड़ते हैं। लेकिन आगे जिन कारणों का मैं उल्लेख करूँगा, उनके आधार पर मेरी धारणा है कि पतंजलि ईसा-पूर्व 200 या उससे भी पहले के समय का व्यक्ति था। इन तिथियों को लेकर मैं अधिक आग्रह नहीं करता। किंतु कभी-कभी कालक्रम यह समझने में सहायता करता है कि विचार एक चरण से दूसरे चरणतक कैसे पहुँचे। आज का योग अपने वर्तमान स्वरूप में कैसे आया, और इसके लिए कौन-से तत्व उत्तरदायी रहे,इसे समझने में यह उपयोगी होता है। पतंजलि के योग का मुख्य विषय मन को क्रमशः पूर्ण शांति की अवस्था तक पहुँचाना है। इसका उद्देश्य हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व के परमसत्य को जानना है। उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग के रूप में ध्यान को बताया गया है। इस योग में शारीरिक आसनों और श्वसन अभ्यासों का उल्लेख बहुत सीमित है। उन्हें केवल ध्यान की पूर्वतैयारी के रूप में देखा गया है। स्वास्थ्य-वृद्धि कभी भी लक्ष्य नहीं रही। पतंजलि के योग में आठ चरण हैं, जिन्हें अष्टांग-योग कहा जाता है। संक्षेप में ये हैं,यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। पूरी किताब सुनने के लिए, कृपया “https://tinyurl.com/mylibrary1234” देखें &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#audiobook, #Hindi, #newbook, #podcast, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>अब आप मेरी ऑडियोबुक उधार ले सकते हैं।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/02/       .html</link><category>#announcement</category><category>#audiobook</category><category>#Hindi</category><pubDate>Sun, 15 Feb 2026 03:06:20 -0800</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-4716076805107280542</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
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&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: left;"&gt;
&lt;a href="http://doctor-king-online.blogspot.com/2018/02/quick-links-to-drkings-books-on.html" target="_blank"&gt;[Quick links] &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div dir="ltr" style="text-align: center;" trbidi="on"&gt;
&lt;button id="playAudio"&gt;[Pause]&lt;/button&gt; 
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;

&lt;/div&gt;


	&lt;style type="text/css"&gt;p { color: #00000a; line-height: 120%; text-align: justify; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.ctl { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: ar-SA }a:link { color: #0000ff; text-decoration: underline }&lt;/style&gt;

&lt;p class="western"&gt;
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgnzxboR6jvmZg6-rl29KAWjMqzt8CThwcyWUK0DhvDS1BWm5yQBwmS_TyXNn0ELgCQEqWkm7MJowTskaTI5l3MBhjav9enbX1vuPtnDPric3xNdpxTJ9IzgChTiE4bXG_pbILX3bOm12OpG6jU3HZ2UBXDe_K2c0zBO2NzX75TUZgjZOajNE1SIFpxnd8/s645/Screenshot%20from%202026-02-15%2015-23-32.png" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="634" data-original-width="645" height="315" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgnzxboR6jvmZg6-rl29KAWjMqzt8CThwcyWUK0DhvDS1BWm5yQBwmS_TyXNn0ELgCQEqWkm7MJowTskaTI5l3MBhjav9enbX1vuPtnDPric3xNdpxTJ9IzgChTiE4bXG_pbILX3bOm12OpG6jU3HZ2UBXDe_K2c0zBO2NzX75TUZgjZOajNE1SIFpxnd8/s320/Screenshot%20from%202026-02-15%2015-23-32.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;दोस्तों&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;मेरे पास एक बहुत
अच्छी खबर है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;मैंने
एक ऑडियोबुक लेंडिंग लाइब्रेरी
बनाई है। आप इस लाइब्रेरी से
मेरी कुछ ऑडियोबुक बहुत ही
सस्ते दाम पर ले सकते हैं। अब
कोई मंथली सब्सक्रिप्शन नहीं।
अब कोई वेटिंग लाइन नहीं। अब
कोई ज्योग्राफिकल रोक नहीं।
आप दुनिया में कहीं से भी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;कभी भी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;एक
कप कॉफी की कीमत पर किताबें
ले सकते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;और
अपने घर बैठे आराम से सुन सकते
हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-----------------------------&gt;  
&lt;audio autoplay="" id="Hello" src="https://tinyurl.com/hi-Hello1234"&gt; &lt;/audio&gt;
&lt;audio id="Audio" src="https://www.dropbox.com/scl/fi/k1750210yd9d2g96iy07x/03.mp3?rlkey=bryldsyxk1nq0mki9cxuyxtn6&amp;amp;st=ahvsadws&amp;amp;raw=1"&gt; &lt;/audio&gt;  
&lt;audio id="ThankYou" src="https://tinyurl.com/hi-Thanks1234"&gt; &lt;/audio&gt;  
 &lt;script type="text/javascript"&gt;
var hello = document.getElementById("Hello");
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     var audio = document.getElementById('Audio');
     audio.play();
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var audio = document.getElementById("Audio");
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});
&lt;/script&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;


	&lt;style type="text/css"&gt;p { color: #00000a; line-height: 120%; text-align: justify; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.ctl { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: ar-SA }a:link { color: #0000ff; text-decoration: underline }&lt;/style&gt;

&lt;p class="western"&gt;
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;और भी बहुत कुछ
है। अभी तक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;मेरी
किताबों के सिर्फ़ इंग्लिश
वर्शन ही मिलते थे। लेकिन अब&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;आप मेरी किताबों
के इंग्लिश&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;स्पैनिश&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;जर्मन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;हिंदी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तेलुगु और कन्नड़
वर्शन भी सुन सकते हैं। मैंने
दुनिया भर में ज़्यादा से
ज़्यादा लोगों तक पहुँचने की
कोशिश की है। अगर आप अपनी खास
भाषा में पढ़ना चाहते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तो प्लीज़ मेरे
ब्लॉग पर कमेंट करके मुझे
बताएं। मैं इसे आप तक पहुँचाने
की पूरी कोशिश करूँगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="western"&gt;&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;किताबें
देखने के लिए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;बस
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="https://tinyurl.com/mylibrary1234"&gt;https://tinyurl.com/mylibrary1234&lt;/a&gt; &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;लिंक
पर जाएँ। या अगर आप मेरा ब्लॉग
पढ़ रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तो
ब्लॉग के टॉप पर “&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;Doctor
King’s lending library” &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;टैब
पर क्लिक करें। अगर आप डेस्कटॉप
पर देख रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तो
आपको ब्लॉग पर दाईं ओर यही टैब
मिलेगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="western"&gt;&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg0KA7LX31_IcaQlulnbJmGCF6ZMLKUyS4QZj9_LSfHyAr6C57qOVzf0eQUcf5IXsHE-WACCXvJ7blD8PyxCtk7conIR2Z87TNVGqBWpzjIQZ6BMF9y0k0cwgAOrDHSC5T2nFKp44aeAAX9qlGGB3deZ_gNJOSbvMehoCScMTRpHTjLvLOttX9VxLwi2HA/s1028/Screenshot%20from%202026-02-15%2015-21-27.png" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="674" data-original-width="1028" height="210" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg0KA7LX31_IcaQlulnbJmGCF6ZMLKUyS4QZj9_LSfHyAr6C57qOVzf0eQUcf5IXsHE-WACCXvJ7blD8PyxCtk7conIR2Z87TNVGqBWpzjIQZ6BMF9y0k0cwgAOrDHSC5T2nFKp44aeAAX9qlGGB3deZ_gNJOSbvMehoCScMTRpHTjLvLOttX9VxLwi2HA/s320/Screenshot%20from%202026-02-15%2015-21-27.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;अभी&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;असल में दो लाइब्रेरी
हैं। आप कहाँ हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;इस
पर निर्भर करते हुए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;आपको
या तो इंटरनेशनल लाइब्रेरी
या इंडियन लाइब्रेरी में ले
जाया जाएगा। इंटरनेशनल लाइब्रेरी
में इंग्लिश&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;स्पैनिश
और जर्मन किताबें हैं। जबकि&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;इंडियन लाइब्रेरी
में इंग्लिश किताबों के अलावा
हिंदी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तेलुगु
और कन्नड़ किताबें भी हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="western"&gt;&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;अभी मेरी
किताबों का सिर्फ़ एक हिस्सा
ही उपलब्ध है। मैं धीरे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;धीरे
और भी जोड़ूंगा। आप मुझसे किसी
खास किताब को प्रायोरिटी पर
जोड़ने का भी अनुरोध कर सकते
हैं। कृपया मेरे ब्लॉग पोस्ट
में कमेंट करके मुझे बताएं।
मेरी सभी किताबों की पूरी
लिस्ट के लिए कृपया
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="https://tinyurl.com/mybooks1234"&gt;https://tinyurl.com/mybooks1234&lt;/a&gt; &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;पर
जाएं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="western"&gt;&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;अगर आप
नॉन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;रेसिडेंट
इंडियन हैं और भारतीय भाषाओं
में मेरी कुछ किताबें उधार
लेना चाहते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तो
आप मुझे बता सकते हैं। मुझे
उन्हें अपनी इंटरनेशनल लाइब्रेरी
में भी उपलब्ध कराने में बहुत
खुशी होगी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="western"&gt;&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;मैं निश्चित
रूप से यह दावा नहीं कर सकता
कि मुझे ये सभी भाषाएं आती
हैं। लेकिन मैंने इन किताबों
को आप तक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;आपकी
अपनी भाषा में&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;अपने
पास मौजूद सभी तरीकों का
इस्तेमाल करके लाने की पूरी
कोशिश की है। तो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;प्लीज़
इस मौके का पूरा फ़ायदा उठाएँ।
अगर आपके पास कोई सुझाव या कोई
खास ज़रूरत है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तो
प्लीज़ मेरे ब्लॉग पर कमेंट
करें। अगर आप अपनी भाषा में
किसी किताब का ट्रांसलेशन
करवाना चाहते हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;अगर
वह मेरे कैटलॉग में पहले से
मौजूद नहीं है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;तो
आप मुझे लिख भी सकते हैं। मैं
ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक
पहुँचना चाहता हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="western"&gt;&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;आपकी
तारीफ़ मुझे यह कोशिश जारी
रखने के लिए हिम्मत देगी। आइए&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
&lt;span&gt;&lt;span lang="ar-SA"&gt;हम सभी के फ़ायदे
के लिए ज्ञान शेयर करें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;/div&gt;
&lt;div align="center" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 120%; margin-bottom: 7pt;"&gt;
&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div align="left" class="western"&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/k1750210yd9d2g96iy07x/03.mp3?rlkey=bryldsyxk1nq0mki9cxuyxtn6&amp;st=ahvsadws&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgnzxboR6jvmZg6-rl29KAWjMqzt8CThwcyWUK0DhvDS1BWm5yQBwmS_TyXNn0ELgCQEqWkm7MJowTskaTI5l3MBhjav9enbX1vuPtnDPric3xNdpxTJ9IzgChTiE4bXG_pbILX3bOm12OpG6jU3HZ2UBXDe_K2c0zBO2NzX75TUZgjZOajNE1SIFpxnd8/s72-c/Screenshot%20from%202026-02-15%2015-23-32.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] p { color: #00000a; line-height: 120%; text-align: justify; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.ctl { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: ar-SA }a:link { color: #0000ff; text-decoration: underline } दोस्तों, मेरे पास एक बहुत अच्छी खबर है! मैंने एक ऑडियोबुक लेंडिंग लाइब्रेरी बनाई है। आप इस लाइब्रेरी से मेरी कुछ ऑडियोबुक बहुत ही सस्ते दाम पर ले सकते हैं। अब कोई मंथली सब्सक्रिप्शन नहीं। अब कोई वेटिंग लाइन नहीं। अब कोई ज्योग्राफिकल रोक नहीं। आप दुनिया में कहीं से भी, कभी भी, एक कप कॉफी की कीमत पर किताबें ले सकते हैं! और अपने घर बैठे आराम से सुन सकते हैं। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); p { color: #00000a; line-height: 120%; text-align: justify; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.ctl { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: ar-SA }a:link { color: #0000ff; text-decoration: underline } और भी बहुत कुछ है। अभी तक, मेरी किताबों के सिर्फ़ इंग्लिश वर्शन ही मिलते थे। लेकिन अब, आप मेरी किताबों के इंग्लिश, स्पैनिश, जर्मन, हिंदी, तेलुगु और कन्नड़ वर्शन भी सुन सकते हैं। मैंने दुनिया भर में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने की कोशिश की है। अगर आप अपनी खास भाषा में पढ़ना चाहते हैं, तो प्लीज़ मेरे ब्लॉग पर कमेंट करके मुझे बताएं। मैं इसे आप तक पहुँचाने की पूरी कोशिश करूँगा।किताबें देखने के लिए, बस https://tinyurl.com/mylibrary1234 लिंक पर जाएँ। या अगर आप मेरा ब्लॉग पढ़ रहे हैं, तो ब्लॉग के टॉप पर “Doctor King’s lending library” टैब पर क्लिक करें। अगर आप डेस्कटॉप पर देख रहे हैं, तो आपको ब्लॉग पर दाईं ओर यही टैब मिलेगा। अभी, असल में दो लाइब्रेरी हैं। आप कहाँ हैं, इस पर निर्भर करते हुए, आपको या तो इंटरनेशनल लाइब्रेरी या इंडियन लाइब्रेरी में ले जाया जाएगा। इंटरनेशनल लाइब्रेरी में इंग्लिश, स्पैनिश और जर्मन किताबें हैं। जबकि, इंडियन लाइब्रेरी में इंग्लिश किताबों के अलावा हिंदी, तेलुगु और कन्नड़ किताबें भी हैं। अभी मेरी किताबों का सिर्फ़ एक हिस्सा ही उपलब्ध है। मैं धीरे-धीरे और भी जोड़ूंगा। आप मुझसे किसी खास किताब को प्रायोरिटी पर जोड़ने का भी अनुरोध कर सकते हैं। कृपया मेरे ब्लॉग पोस्ट में कमेंट करके मुझे बताएं। मेरी सभी किताबों की पूरी लिस्ट के लिए कृपया https://tinyurl.com/mybooks1234 पर जाएं।अगर आप नॉन-रेसिडेंट इंडियन हैं और भारतीय भाषाओं में मेरी कुछ किताबें उधार लेना चाहते हैं, तो आप मुझे बता सकते हैं। मुझे उन्हें अपनी इंटरनेशनल लाइब्रेरी में भी उपलब्ध कराने में बहुत खुशी होगी।मैं निश्चित रूप से यह दावा नहीं कर सकता कि मुझे ये सभी भाषाएं आती हैं। लेकिन मैंने इन किताबों को आप तक, आपकी अपनी भाषा में, अपने पास मौजूद सभी तरीकों का इस्तेमाल करके लाने की पूरी कोशिश की है। तो, प्लीज़ इस मौके का पूरा फ़ायदा उठाएँ। अगर आपके पास कोई सुझाव या कोई खास ज़रूरत है, तो प्लीज़ मेरे ब्लॉग पर कमेंट करें। अगर आप अपनी भाषा में किसी किताब का ट्रांसलेशन करवाना चाहते हैं, अगर वह मेरे कैटलॉग में पहले से मौजूद नहीं है, तो आप मुझे लिख भी सकते हैं। मैं ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचना चाहता हूँ।आपकी तारीफ़ मुझे यह कोशिश जारी रखने के लिए हिम्मत देगी। आइए, हम सभी के फ़ायदे के लिए ज्ञान शेयर करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] p { color: #00000a; line-height: 120%; text-align: justify; orphans: 2; widows: 2; margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; background: transparent }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.cjk { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: en-US }p.ctl { font-family: ; font-size: 14pt; so-language: ar-SA }a:link { color: #0000ff; text-decoration: underline } दोस्तों, मेरे पास एक बहुत अच्छी खबर है! 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