<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><rss xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>विचारमंथन : Dr.King, Swami Satyapriya</title><description>जीवन को गहराई से समझने के लिए विज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का संगम। बेहतर और उद्देश्यपूर्ण जीवन के लिए पाएं प्रेरक विचार और सकारात्मक सोच।</description><managingEditor>noreply@blogger.com (Dr. King)</managingEditor><pubDate>Sat, 19 Sep 2026 07:13:56 +0530</pubDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">31</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/search/label/%23Hindi</link><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><copyright>(c) Dr. King</copyright><itunes:image href="https://yt3.ggpht.com/09tVlMD6W46W5wHx9egdFIj-N9Yz4jZxBi7ZohHfKTxhRmYF7_fmMv0UWXr13mD-1-8RVKTtQmY=s600-c-k-c0x00ffffff-no-rj-rp-mo"/><itunes:summary>Blogcast (Blog + Podcast) on thought provoking topics</itunes:summary><itunes:subtitle>Blogcast (Blog + Podcast) on thought provoking topics</itunes:subtitle><itunes:category text="Religion &amp; Spirituality"><itunes:category text="Spirituality"/></itunes:category><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:owner><itunes:email>drking2000-service@yahoo.com</itunes:email><itunes:name>Dr. King</itunes:name></itunes:owner><item><title>[Hindi]   ऑडियो बुक – आइए योग को अच्छी तरह समझें।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/09/hindi_0678021612.html</link><category>#audiobook</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Meditation</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#veda</category><category>#Yoga</category><category>#YogaBook</category><pubDate>Sat, 19 Sep 2026 00:00:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-8777289530179181015</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में शांति एक मृगतृष्णा बनती जा रही है। लेकिन इसका उत्तर हमारे भीतर ही है। यह पुस्तक-श्रृंखला, योग की प्राचीन परंपरा और आधुनिक मस्तिष्क-विज्ञान के बीच की अद्भुत कड़ी से हमारा परिचय कराती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योगासन केवल हमारे शरीर को ही नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क के काम करने के तरीके को भी कैसे बदल सकते हैं? ध्यान के माध्यम से मानसिक तनाव को कम करके, आनंद की खोज कैसे की जा सकती है? तीन हज़ार वर्षों के इतिहास वाले योग-पथ को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखकर, सरल रूप में समझाने का प्रयास ही "समग्र योग विज्ञान" नामक यह पुस्तक-श्रृंखला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जीवन की गुणवत्ता सुधारने, एकाग्रता बढ़ाने और मन के रहस्यों को समझने के लिए यह एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस श्रृंखला के प्रमुख आकर्षण हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;• वैज्ञानिक दृष्टिकोण: योग और मस्तिष्क के बीच संबंध का विश्लेषण।&lt;br /&gt;• व्यावहारिक चरण: ध्यान करने और एकाग्रता बढ़ाने के सरल तरीके।&lt;br /&gt;• ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: योग के विकसित होने की तीन हज़ार वर्ष लंबी यात्रा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस श्रृंखला में कुल नौ पुस्तकें हैं। वे हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाग 1. आइए योग को अच्छी तरह समझें: वर्तमान पुस्तक।&lt;br /&gt;भाग 2. योग को समझने में सहायक मस्तिष्क-विज्ञान।&lt;br /&gt;भाग 3. मानसिक तनाव को कैसे कम करें?&lt;br /&gt;भाग 4. योगासन स्वास्थ्य को कैसे सुधारते हैं?&lt;br /&gt;भाग 5. एकाग्रता को कैसे तेज़ करें?&lt;br /&gt;भाग 6. ध्यान कैसे करें?&lt;br /&gt;भाग 7. ध्यान करने पर क्या होता है?&lt;br /&gt;भाग 8. क्या हमारे मस्तिष्क से परे कोई मन है?&lt;br /&gt;भाग 9. योग का अंतिम लक्ष्य क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, योग को सही तरह से समझें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल ऐसे लोग बहुत कम हैं, जिन्हें यह पता न हो कि योग क्या है। लगभग हर कोई स्वाभाविक रूप से यह मानता है कि योग बहुत लाभदायक है। योग के अनेक गुरुओं ने योग के बारे में पुस्तकें भी लिखी हैं। उनमें से कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अगर हम थोड़ा ध्यान से देखें, तो इनमें से ज़्यादातर पुस्तकें उन्हीं गुरुओं द्वारा प्रचारित की जा रही योग की विशेष 'पद्धतियों' के बारे में ही बात करती हैं। इसके अलावा, इन पुस्तकों में से अधिकांश योग को एक निर्देशात्मक दृष्टिकोण से समझाती हैं। योग को धर्म या दूसरी विश्वास-आधारित पद्धतियों की तरह, एक विश्वास-प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, जब ये पुस्तकें आसनों या श्वास-अभ्यासों के बारे में बात करती हैं, तो उनके स्वास्थ्य-लाभों के बारे में ज़रूर बताती हैं। लेकिन ये अभ्यास बताए गए परिणाम कैसे उत्पन्न करते हैं, इसे तार्किक रूप से समझाना बहुत दुर्लभ है। अपने दावों के समर्थन में व्यावहारिक प्रमाण भी बहुत कम दिए जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ गुरु एक-दूसरे के विरोध में रहने वाली अनेक धारणाओं और दृष्टिकोणों को बिना किसी स्पष्टीकरण के एक साथ प्रस्तुत करके, पाठकों को अतिशयोक्तियों से भर देते हैं। वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा, अति-चेतना, अतींद्रिय जागरूकता आदि जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इन शब्दों का वास्तविक अर्थ क्या है, इसे बहुत कम समझाया या परिभाषित किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक चिकित्सा की शब्दावली या क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों से जुड़ी अस्पष्ट उपमाओं का इस्तेमाल करके, ये गुरु अपनी रहस्यमय धारणाओं को वैज्ञानिक रूप देने की कोशिश करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योग को इस तरह समझाने से दो प्रमुख समस्याएँ पैदा होती हैं। पहली, अगर योग के पीछे काम करने वाले मूल तंत्रों को स्पष्ट रूप से समझा न जाए, तो उसका पूरा लाभ प्राप्त करना कठिन है। दूसरी, जिस प्रणाली को ठीक से समझा न जाए, वह समय के साथ विकृत हो जाती है और अपना महत्व खो देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें योग की ऐसी पद्धति चाहिए, जिसके सिद्धांत स्पष्ट रूप से परिभाषित और ठोस हों। ऐसी प्रणाली, जिसे जहाँ तक संभव हो, निष्पक्ष रूप से परखा जा सके। ऐसी प्रणाली, जो विश्वसनीय और अपेक्षित परिणाम दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आज हम जिस योग को देखते हैं, वह इन मानदंडों को पूरा करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश लोगों के लिए योग का अर्थ है शरीर पर केंद्रित अभ्यास, जिसमें कुछ आसन या श्वास-अभ्यास शामिल होते हैं। ऐसे लोगों का उद्देश्य आमतौर पर शरीर के स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता को बनाए रखना होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। लेकिन योग केवल इतना ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योग के उपयोग का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसकी शुरुआत सामान्य स्वास्थ्य में सुधार से होती है और यह तनाव कम करने, मन की एकाग्रता बढ़ाने, मानसिक क्षमताओं के विकास, अवर्णनीय आनंद की अनुभूति, परम साक्षात्कार और अंत में एक अधिक शांतिपूर्ण तथा रहने योग्य दुनिया बनाने तक फैला हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इनमें से कुछ योग के वास्तविक लक्ष्य नहीं हैं। ये केवल वे उप-लाभ हैं, जो योग का ईमानदारी से अभ्यास करने पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त होते हैं। इसे हम आगे देखेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योग का हज़ारों वर्षों का लंबा इतिहास है। समय के साथ योग में अनेक परिवर्तन हुए और उसने कई नए रूप धारण किए। आज जिस चीज़ को योग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह विशाल योग-परंपरा का केवल एक संक्षिप्त रूप है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर वास्तविक योग क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि, जिन्हें व्यापक रूप से योग का मूल प्रवर्तक माना जाता है, योग को इस प्रकार परिभाषित करते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;"योगः चित्त वृत्ति निरोध".&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योग का अर्थ है मन की गतिविधियों को नियंत्रित करना।&lt;br /&gt;– योग सूत्र 1.2.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अर्थात, योग मन को पूरी तरह शांत अवस्था में लाने के बारे में है। लेकिन शांत मन होना योग का अंतिम लक्ष्य नहीं है। मन को शांत करना केवल एक विधि है, मन से परे किसी अवस्था तक पहुँचने का साधन है। वह अवस्था क्या है, इसे हम आगे देखेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि के योग सूत्र के इसी दूसरे सूत्र से स्पष्ट होता है कि योग मुख्य रूप से मन पर केंद्रित एक प्रणाली है। आजकल योग के रूप में देखे जाने वाले अनेक तत्वों का इसमें बहुत कम स्थान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, अब पतंजलि द्वारा प्रचारित इस मूल योग में थोड़ा और गहराई से प्रवेश करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि के योग का वर्णन उनकी रचना, योग सूत्र में किया गया है। इसमें कुल 195 सूत्रों का संग्रह है। सूत्र का अर्थ है, बहुत कम शब्दों में गहरा अर्थ व्यक्त करने वाली संक्षिप्त अभिव्यक्ति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सूत्र चार अध्यायों में बाँटे गए हैं। वे हैं समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन अध्यायों के बीच विभाजन बहुत स्पष्ट नहीं है। विषय कई बार अध्यायों की सीमाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते हैं। ऐसा लगता है कि मूल रूप से जो एक ही निरंतर ग्रंथ था, उसे बाद में किसी ने विभाजित किया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले दो अध्यायों में योग सूत्र के केंद्रीय तत्व शामिल हैं। वे मूल सिद्धांतों और विधियों के बारे में बताते हैं। बाकी अध्याय बाद में जोड़े गए प्रतीत होते हैं, इसलिए मैं सामान्यतः इन पहले दो अध्यायों पर ही ध्यान केंद्रित करता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश लोगों की धारणा के अनुसार, पतंजलि का योग लगभग 200 ईसा पूर्व के समय में प्रचारित हुआ। कुछ लोग इसे बाद के समय, यानी 400 से 600 ईस्वी के बीच का मानते हैं। लेकिन जिन कारणों को मैं आगे समझाऊँगा, उनके आधार पर मेरा मत है कि पतंजलि 200 ईसा पूर्व या उससे भी पहले के समय के थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इन तारीखों को लेकर बहुत अधिक आग्रह नहीं करता। लेकिन कभी-कभी कालक्रम हमें यह समझने में मदद करता है कि विचार एक चरण से दूसरे चरण तक कैसे पहुँचे। आज के योग ने अपना वर्तमान रूप कैसे प्राप्त किया और इसमें किन तत्वों का योगदान रहा, यह समझने में भी यह उपयोगी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि के योग का मुख्य विषय मन को धीरे-धीरे पूरी तरह शांत अवस्था में ले जाना है। इसका उद्देश्य हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व के परम सत्य को जानना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग के रूप में ध्यान का सुझाव दिया गया है। इस योग में शारीरिक आसनों और श्वास-अभ्यासों का केवल थोड़ा-सा उल्लेख मिलता है। उन्हें केवल ध्यान की तैयारी के रूप में देखा गया है। स्वास्थ्य में सुधार कभी भी लक्ष्य नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि के योग में आठ चरण हैं। इसे अष्टांग योग कहा जाता है। संक्षेप में, ये चरण हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि की योग की परिभाषा और ध्यान को दिए गए उनके महत्व को देखते हुए, ऐसा लगता है कि इस योग की उत्पत्ति पतंजलि से भी बहुत पहले की है। संभवतः 200 ईसा पूर्व से भी हज़ारों वर्ष पहले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बौद्ध धर्म, जो पतंजलि से लगभग चार शताब्दी पहले अस्तित्व में था, उसमें भी पतंजलि के योग के समान ध्यान की पद्धतियाँ थीं। वहाँ भी ध्यान से पहले यम, नियम और प्राणायाम जैसे तैयारी के चरण मौजूद थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी कारण से, मैं उन अभ्यासों को भी योग ही कहता हूँ। मुझे संदेह है कि पतंजलि इन बौद्ध पद्धतियों और विचारों से प्रभावित हुए होंगे। या यह भी संभव है कि दोनों का कोई एक समान मूल रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना भी सही नहीं है कि योग या ध्यान की पद्धतियाँ स्वयं बुद्ध से ही शुरू हुई थीं। बुद्ध से पहले भी ध्यान की तकनीकें अस्तित्व में थीं। संभव है कि बुद्ध ने उन्हें व्यवस्थित किया हो और अधिक व्यावहारिक रूप दिया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, भगवद्गीता में अनेक प्रकार के योगों का उल्लेख मिलता है। वहाँ 'योग' शब्द का इस्तेमाल बहुत व्यापक अर्थ में किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विशेष रूप से, उसमें ज्ञान-योग, कर्म-योग, ध्यान-योग और भक्ति-योग के बारे में बताया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीचे दिए गए निर्देशों का पालन करके आप इस पुस्तक को पूरी तरह निःशुल्क सुन सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुफ़्त में सुनने के लिए &lt;a href="https://t.me/+DPJHHjQxf5c3OGQ9"&gt;https://t.me/+DPJHHjQxf5c3OGQ9&lt;/a&gt; पर क्लिक करें (सिर्फ़ कुछ ही स्लॉट उपलब्ध हैं, इसलिए जल्दी करें)।&lt;br /&gt;अगर आप इसे मिस कर देते हैं, तो आप &lt;a href="https://tinyurl.com/mylibrary1234"&gt;https://tinyurl.com/mylibrary1234&lt;/a&gt; पर बहुत कम कीमत में किताब खरीद सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


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बढ़ाने के सरल तरीके। • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: योग के विकसित होने की तीन हज़ार वर्ष लंबी यात्रा। इस श्रृंखला में कुल नौ पुस्तकें हैं। वे हैं: भाग 1. आइए योग को अच्छी तरह समझें: वर्तमान पुस्तक। भाग 2. योग को समझने में सहायक मस्तिष्क-विज्ञान। भाग 3. मानसिक तनाव को कैसे कम करें? भाग 4. योगासन स्वास्थ्य को कैसे सुधारते हैं? भाग 5. एकाग्रता को कैसे तेज़ करें? भाग 6. ध्यान कैसे करें? भाग 7. ध्यान करने पर क्या होता है? भाग 8. क्या हमारे मस्तिष्क से परे कोई मन है? भाग 9. योग का अंतिम लक्ष्य क्या है? आइए, योग को सही तरह से समझें। आजकल ऐसे लोग बहुत कम हैं, जिन्हें यह पता न हो कि योग क्या है। लगभग हर कोई स्वाभाविक रूप से यह मानता है कि योग बहुत लाभदायक है। योग के अनेक गुरुओं ने योग के बारे में पुस्तकें भी लिखी हैं। उनमें से कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुई हैं। लेकिन अगर हम थोड़ा ध्यान से देखें, तो इनमें से ज़्यादातर पुस्तकें उन्हीं गुरुओं द्वारा प्रचारित की जा रही योग की विशेष 'पद्धतियों' के बारे में ही बात करती हैं। इसके अलावा, इन पुस्तकों में से अधिकांश योग को एक निर्देशात्मक दृष्टिकोण से समझाती हैं। योग 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लेकिन इनमें से कुछ योग के वास्तविक लक्ष्य नहीं हैं। ये केवल वे उप-लाभ हैं, जो योग का ईमानदारी से अभ्यास करने पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त होते हैं। इसे हम आगे देखेंगे। योग का हज़ारों वर्षों का लंबा इतिहास है। समय के साथ योग में अनेक परिवर्तन हुए और उसने कई नए रूप धारण किए। आज जिस चीज़ को योग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह विशाल योग-परंपरा का केवल एक संक्षिप्त रूप है। तो फिर वास्तविक योग क्या है? पतंजलि, जिन्हें व्यापक रूप से योग का मूल प्रवर्तक माना जाता है, योग को इस प्रकार परिभाषित करते हैं: "योगः चित्त वृत्ति निरोध". योग का अर्थ है मन की गतिविधियों को नियंत्रित करना। – योग सूत्र 1.2. अर्थात, योग मन को पूरी तरह शांत अवस्था में लाने के बारे में है। लेकिन शांत मन होना योग का अंतिम लक्ष्य नहीं है। मन को शांत करना केवल एक विधि है, मन से परे किसी अवस्था तक पहुँचने का साधन है। वह अवस्था क्या है, इसे हम आगे देखेंगे। पतंजलि के योग सूत्र के इसी दूसरे सूत्र से स्पष्ट होता है कि योग मुख्य रूप से मन पर केंद्रित एक प्रणाली है। आजकल योग के रूप में देखे जाने वाले अनेक तत्वों का इसमें बहुत कम स्थान है। आइए, अब पतंजलि द्वारा प्रचारित इस मूल योग में थोड़ा और गहराई से प्रवेश करें। पतंजलि के योग का वर्णन उनकी रचना, योग सूत्र में किया गया है। इसमें कुल 195 सूत्रों का संग्रह है। सूत्र का अर्थ है, बहुत कम शब्दों में गहरा अर्थ व्यक्त करने वाली संक्षिप्त अभिव्यक्ति। ये सूत्र चार अध्यायों में बाँटे गए हैं। वे हैं समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद। इन अध्यायों के बीच विभाजन बहुत स्पष्ट नहीं है। विषय कई बार अध्यायों की सीमाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते हैं। ऐसा लगता है कि मूल रूप से जो एक ही निरंतर ग्रंथ था, उसे बाद में किसी ने विभाजित किया होगा। पहले दो अध्यायों में योग सूत्र के केंद्रीय तत्व शामिल हैं। वे मूल सिद्धांतों और विधियों के बारे में बताते हैं। बाकी अध्याय बाद में जोड़े गए प्रतीत होते हैं, इसलिए मैं सामान्यतः इन पहले दो अध्यायों पर ही ध्यान केंद्रित करता हूँ। अधिकांश लोगों की धारणा के अनुसार, पतंजलि का योग लगभग 200 ईसा पूर्व के समय में प्रचारित हुआ। कुछ लोग इसे बाद के समय, यानी 400 से 600 ईस्वी के बीच का मानते हैं। लेकिन जिन कारणों को मैं आगे समझाऊँगा, उनके आधार पर मेरा मत है कि पतंजलि 200 ईसा पूर्व या उससे भी पहले के समय के थे। मैं इन तारीखों को लेकर बहुत अधिक आग्रह नहीं करता। लेकिन कभी-कभी कालक्रम हमें यह समझने में मदद करता है कि विचार एक चरण से दूसरे चरण तक कैसे पहुँचे। आज के योग ने अपना वर्तमान रूप कैसे प्राप्त किया और इसमें किन तत्वों का योगदान रहा, यह समझने में भी यह उपयोगी है। पतंजलि के योग का मुख्य विषय मन को धीरे-धीरे पूरी तरह शांत अवस्था में ले जाना है। इसका उद्देश्य हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व के परम सत्य को जानना है। उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग के रूप में ध्यान का सुझाव दिया गया है। इस योग में शारीरिक आसनों और श्वास-अभ्यासों का केवल थोड़ा-सा उल्लेख मिलता है। उन्हें केवल ध्यान की तैयारी के रूप में देखा गया है। स्वास्थ्य में सुधार कभी भी लक्ष्य नहीं था। पतंजलि के योग में आठ चरण हैं। इसे अष्टांग योग कहा जाता है। संक्षेप में, ये चरण हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। पतंजलि की योग की परिभाषा और ध्यान को दिए गए उनके महत्व को देखते हुए, ऐसा लगता है कि इस योग की उत्पत्ति पतंजलि से भी बहुत पहले की है। संभवतः 200 ईसा पूर्व से भी हज़ारों वर्ष पहले। बौद्ध धर्म, जो पतंजलि से लगभग चार शताब्दी पहले अस्तित्व में था, उसमें भी पतंजलि के योग के समान ध्यान की पद्धतियाँ थीं। वहाँ भी ध्यान से पहले यम, नियम और प्राणायाम जैसे तैयारी के चरण मौजूद थे। इसी कारण से, मैं उन अभ्यासों को भी योग ही कहता हूँ। मुझे संदेह है कि पतंजलि इन बौद्ध पद्धतियों और विचारों से प्रभावित हुए होंगे। या यह भी संभव है कि दोनों का कोई एक समान मूल रहा हो। यह कहना भी सही नहीं है कि योग या ध्यान की पद्धतियाँ स्वयं बुद्ध से ही शुरू हुई थीं। बुद्ध से पहले भी ध्यान की तकनीकें अस्तित्व में थीं। संभव है कि बुद्ध ने उन्हें व्यवस्थित किया हो और अधिक व्यावहारिक रूप दिया हो। उदाहरण के लिए, भगवद्गीता में अनेक प्रकार के योगों का उल्लेख मिलता है। वहाँ 'योग' शब्द का इस्तेमाल बहुत व्यापक अर्थ में किया गया है। विशेष रूप से, उसमें ज्ञान-योग, कर्म-योग, ध्यान-योग और भक्ति-योग के बारे में बताया गया है। नीचे दिए गए निर्देशों का पालन करके आप इस पुस्तक को पूरी तरह निःशुल्क सुन सकते हैं।&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- &amp;nbsp;मुफ़्त में सुनने के लिए https://t.me/+DPJHHjQxf5c3OGQ9 पर क्लिक करें (सिर्फ़ कुछ ही स्लॉट उपलब्ध हैं, इसलिए जल्दी करें)। अगर आप इसे मिस कर देते हैं, तो आप https://tinyurl.com/mylibrary1234 पर बहुत कम कीमत में किताब खरीद सकते हैं।&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; 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&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiPR0IjDjF98Jeyy7d0n4ikMp-Ldg6uOnCm0Gdjw6Tp7JS25RkdQjzJLlQQtu24MOLATw3DSW_CQtAf9Tndfy9fb5aXwTgusxFXznU189sbdxsUioU9hC6BOl2Y6_S_FniM_9R0dPt-O9l4qBmKqSxky8I1RTqCPn3Oz-dR-tyxj7Uiuix7I_LUypxbQSM/s1671/oneGodMyth-HI.png" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="941" data-original-width="1671" height="360" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiPR0IjDjF98Jeyy7d0n4ikMp-Ldg6uOnCm0Gdjw6Tp7JS25RkdQjzJLlQQtu24MOLATw3DSW_CQtAf9Tndfy9fb5aXwTgusxFXznU189sbdxsUioU9hC6BOl2Y6_S_FniM_9R0dPt-O9l4qBmKqSxky8I1RTqCPn3Oz-dR-tyxj7Uiuix7I_LUypxbQSM/w640-h360/oneGodMyth-HI.png" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;हम&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; इतनी आसानी से यह क्यों मान लेते हैं कि एक ही ईश्वर में विश्वास करना, या इसके विपरीत विश्वास रखना, हमें दूसरों से अलग करता है? अक्सर हमें ऐसे लोग मिलते हैं जो गर्व से एक ही ईश्वर में अपने विश्वास की घोषणा करते हैं। इससे धार्मिक विश्वासों के एक जटिल इतिहास और उनके बीच मौजूद उन समानताओं का संकेत मिलता है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। क्या ऐसा हो सकता है कि एकेश्वरवाद का विचार उतना अनोखा नहीं है जितना हम सोचते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के एक दूरदराज़ गाँव में अपनी सुबह-सुबह की सैर के दौरान मेरी मुलाकात एक बुज़ुर्ग सज्जन से हुई। उनके झुर्रियोंभरे चेहरे से उनकी उम्र का पता चलता था। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा अभिवादन किया और अपना परिचय एक सेवानिवृत्त बैंकर के रूप में दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने गर्व से बताया कि वे ऐसे धर्म को मानते हैं जो एक ही ईश्वर में विश्वास करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका मतलब था कि वे मुसलमान थे। उनके बोलने में श्रेष्ठता का एक भाव झलक रहा था, जैसे वे खुद को उन दूसरों से अलग मानते हों जो अनेक देवताओं में विश्वास करते हैं। और उन दूसरों से शायद उनका मतलब उस इलाके के हिंदुओं से था, जो अनगिनत देवताओं की पूजा करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह अंतर एक मिथक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-----------------------------&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज हिंदू चाहे जोभी करते हों या जिस भी कारण से करते हों, एकेश्वरवाद उस वैदिक धर्म का भी मूल सिद्धांत था, जिससे आज का हिंदू धर्म विकसित हुआ। वेदों में जिन देवताओं की बात की गई है, वे वास्तव में ईश्वर नहीं, बल्कि दिव्य प्राणी हैं। जैसा कि एक स्वामी अक्सर कहते हैं, ये छोटे अक्षर वाले गॉड्स हैं। ये गॉड नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक इतिहासकार इस एकमात्र सर्वशक्तिमान ईश्वर की उत्पत्ति प्राचीन मज़्दावाद में देखते हैं, जो मध्य एशिया में कहीं विकसित हुआ था। इस धर्म में अहुरा मज़्दा को संसार का रचयिता माना जाता था और अंग्रा मैन्यु नाम के एक विरोधी ईश्वर को भी माना जाता था, जो अहुरा मज़्दा से लड़ता था, लेकिन अंततः उसी के हाथों पराजित होगया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस इतिहासकार के अनुसार, यहूदी धर्म की उत्पत्ति इसी प्राचीन मज़्दावाद से हुई। अहुरा मज़्दा ने याहवे का नाम लेलिया और अंग्रा मैन्यु शैतान बनगया। अंग्रा मैन्यु के विपरीत, शैतान सर्वशक्तिमान नहीं है। वह केवल समस्याएँ पैदा करनेवाला है, जो मनुष्यों को गुमराह करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहूदी धर्म का यही याहवे, बाद में इस्लाम में अल्लाह बनगया, क्योंकि कुरआन कहता है कि अल्लाह कोई और नहीं बल्कि याहवे ही है। और शैतान वह शापित फ़रिश्ता या जिन्न बनगया जिसे सैतान कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बीच यहूदी धर्म की एक शाखा के रूप में ईसाई धर्म का उदय हुआ। इसके संस्थापक यीशु एक यहूदी थे, इसलिए ईसाई धर्म भी एकेश्वरवाद में विश्वास करता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालाँकि, इस इतिहासकार ने मज़्दावाद से आगे की खोज नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मज़्दावाद में भारतीय वैदिक धर्म के साथ बहुत कुछ समान था। इसमें अनेक देवता, छोटे अक्षर वाले गॉड्स, धार्मिक अनुष्ठान, जातिगत विभाजन और पौराणिक कथाएँ शामिल थीं। लेकिन ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि वैदिक धर्म में भी एकेश्वरवाद एक अंतर्निहित धारा के रूप में मौजूद था। इन धर्मों के विचारों में समानता चौंकानेवाली है। इसलिए मानवता को एकेश्वरवादी और बहुदेववादी धर्मों में बाँटना अपरिपक्व और जानकारी के अभाव को दर्शाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए यह कहना कि हम एक ही ईश्वर में विश्वास करते हैं, अपनेआप में बहुत कुछ नहीं बताता और वास्तव में अनावश्यक है। इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उस ईश्वर को किस तरह देखा और समझा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ओर हमारे सामने इब्राहीमी धर्मों का लगभग निराकार ईश्वर है। ऐसा ईश्वर जो अक्सर अदृश्य रहता है, लेकिन जिसमें मनुष्यों जैसे अनेक गुण होते हैं। कुरआन में इस ईश्वर के बारे में एक आयत है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;ईश्वर ने तुम्हें पैदा किया; वही तुम्हारा पालन-पोषण करता है; और उसी के पास तुम लौटोगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;अल्लाहुल्लज़ी ख़लक़कुम सुम्मा रज़क़कुम सुम्मा युमीतुकुम सुम्मा युह्यीकुम; हल् मिन शुरकाइकुम मय्यफ़्अलु मिन ज़ालिकुम मिन शैइन्; सुब्हानहू व तआला अम्मा युश्रिकून।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- कुरआन, सूरह अर-रूम 30:40&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;यह ईश्वर बोलता है, भावनाएँ दिखाता है, प्रेम करता है, घृणा करता है, अपनी भेड़ों की ईर्ष्यापूर्वक रक्षा करता है, पूर्ण समर्पण की अपेक्षा करता है, परीक्षा लेता है, पुरस्कार देता है और दंड देता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई मानव स्वामी अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार करता है। यही मज़्दावाद का ईश्वर है और यही इब्राहीमी धर्मों, जैसे यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम का ईश्वर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर, वैदिक धर्म का ईश्वर एक अमूर्त अवधारणा है। यह ईश्वर मनुष्यों के साथ बहुत कम संवाद करता है और उनसे पूर्ण समर्पण की माँग नहीं करता। वह निराकार और अकल्पनीय है और उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस ईश्वर को अक्सर सत्, आत्मा या ब्रह्म कहा जाता है। ये नाम नहीं, बल्कि ऐसे विशेषण हैं जो उसके कुछ पहलुओं को समझाने का प्रयास करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही वह ईश्वर है जिसके बारे में उपनिषद बात करते हैं, जो वेदों के अंतिम भाग हैं। अगर आप चाहें तो इसे उपनिषदों का ईश्वर कहसकते हैं। यह वह ईश्वर नहीं है जिसकी बात वेदों के कर्मकांड वाले भागों में की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह वैदिक मंत्र कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;चाहे वह इंद्र हो, मित्र हो, वरुण हो, अग्नि हो या सुनहरे पंखों वाला गरुत्मान ही क्यों न हो, वे सभी केवल सत् ही हैं। उसी सत् को वैदिक अनुष्ठान करनेवाले विप्र लोग अलग-अलग नामों से अग्नि, यम या मातरिश्वा कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः, अथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्;&lt;br /&gt;एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति, अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- ऋग्वेद 1:164:46&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इंद्र, वरुण, यम आदि वे देवताएँ थे जिनकी यज्ञके माध्यम से पूजा की जाती थी। जैसा कि मैंने पहले बताया, ये देवताएँ दिव्य प्राणी हैं, ईश्वर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह मंत्र तो इसका बिल्कुल उलटा कहता हुआ लगता है। यह कहता है कि वे सभी देवताएँ सत् या वैदिक धर्म के ईश्वर के समान ही हैं। उसी ईश्वर की बात विप्र लोग, यानी वैदिक अनुष्ठान करनेवाले लोग, अलग-अलग रूपों में अनेक देवताओं के रूप में करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको यह जानकर आश्चर्य होसकता है कि लगभग पाँच हज़ार वर्ष पुराने वेद भी ईश्वर की वही परिभाषा देते हैं जो दूसरे धर्म देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद कहते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;ब्रह्म वह है जिससे सभी प्राणी अस्तित्व में आए, जो उन्हें बनाए रखता है और जिसमें वे अंततः विलीन होजाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते; येन जातानि जीवन्ति;&lt;br /&gt;यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति; तद्विजिज्ञासस्व; तद् ब्रह्मेति।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली खंड, श्लोक 1&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;तो फिर लड़ाई कहाँ है? ईश्वर की एकता को लेकर किसी वैदिक भारतीय की धारणा कुरआन को माननेवाले किसी मुसलमान से अलग नहीं है। बस अंतर इतना है कि एक उसे ब्रह्म कहता है और दूसरा उसे अल्लाह कहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी पानी ही है, चाहे आप उसे आगुआ, वासर, पानी, तन्नी, नीरु या कुछ भी कहें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपका क्या विचार है? अपनी राय मुझे टिप्पणियों में बताएँ। फिर मिलेंगे एक और दिलचस्प एपिसोड में।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://doctor-king-online.blogspot.com/2018/10/how-to-subscribe-to-my-blogcast.html"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
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&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;हम इतनी आसानी से यह क्यों मान लेते हैं कि एक ही ईश्वर में विश्वास करना, या इसके विपरीत विश्वास रखना, हमें दूसरों से अलग करता है? अक्सर हमें ऐसे लोग मिलते हैं जो गर्व से एक ही ईश्वर में अपने विश्वास की घोषणा करते हैं। इससे धार्मिक विश्वासों के एक जटिल इतिहास और उनके बीच मौजूद उन समानताओं का संकेत मिलता है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। क्या ऐसा हो सकता है कि एकेश्वरवाद का विचार उतना अनोखा नहीं है जितना हम सोचते हैं? भारत के एक दूरदराज़ गाँव में अपनी सुबह-सुबह की सैर के दौरान मेरी मुलाकात एक बुज़ुर्ग सज्जन से हुई। उनके झुर्रियोंभरे चेहरे से उनकी उम्र का पता चलता था। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा अभिवादन किया और अपना परिचय एक सेवानिवृत्त बैंकर के रूप में दिया। उन्होंने गर्व से बताया कि वे ऐसे धर्म को मानते हैं जो एक ही ईश्वर में विश्वास करता है। इसका मतलब था कि वे मुसलमान थे। उनके बोलने में श्रेष्ठता का एक भाव झलक रहा था, जैसे वे खुद को उन दूसरों से अलग मानते हों जो अनेक देवताओं में विश्वास करते हैं। और उन दूसरों से शायद उनका मतलब उस इलाके के हिंदुओं से था, जो अनगिनत देवताओं की पूजा करते थे। लेकिन यह अंतर एक मिथक है। var hello = document.getElementById("Hello"); 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वही तुम्हारा पालन-पोषण करता है; और उसी के पास तुम लौटोगे। अल्लाहुल्लज़ी ख़लक़कुम सुम्मा रज़क़कुम सुम्मा युमीतुकुम सुम्मा युह्यीकुम; हल् मिन शुरकाइकुम मय्यफ़्अलु मिन ज़ालिकुम मिन शैइन्; सुब्हानहू व तआला अम्मा युश्रिकून। -- कुरआन, सूरह अर-रूम 30:40 यह ईश्वर बोलता है, भावनाएँ दिखाता है, प्रेम करता है, घृणा करता है, अपनी भेड़ों की ईर्ष्यापूर्वक रक्षा करता है, पूर्ण समर्पण की अपेक्षा करता है, परीक्षा लेता है, पुरस्कार देता है और दंड देता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई मानव स्वामी अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार करता है। यही मज़्दावाद का ईश्वर है और यही इब्राहीमी धर्मों, जैसे यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम का ईश्वर है। दूसरी ओर, वैदिक धर्म का ईश्वर एक अमूर्त अवधारणा है। यह ईश्वर मनुष्यों के साथ बहुत कम संवाद करता है और उनसे पूर्ण समर्पण की माँग नहीं करता। वह निराकार और अकल्पनीय है और उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस ईश्वर को अक्सर सत्, आत्मा या ब्रह्म कहा जाता है। ये नाम नहीं, बल्कि ऐसे विशेषण हैं जो उसके कुछ पहलुओं को समझाने का प्रयास करते हैं। यही वह ईश्वर है जिसके बारे में उपनिषद बात करते हैं, जो वेदों के अंतिम भाग हैं। अगर आप चाहें तो इसे उपनिषदों का ईश्वर कहसकते हैं। यह वह ईश्वर नहीं है जिसकी बात वेदों के कर्मकांड वाले भागों में की गई है। लेकिन एक दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह वैदिक मंत्र कहता है: चाहे वह इंद्र हो, मित्र हो, वरुण हो, अग्नि हो या सुनहरे पंखों वाला गरुत्मान ही क्यों न हो, वे सभी केवल सत् ही हैं। उसी सत् को वैदिक अनुष्ठान करनेवाले विप्र लोग अलग-अलग नामों से अग्नि, यम या मातरिश्वा कहते हैं। इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः, अथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्; एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति, अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः। -- ऋग्वेद 1:164:46 इंद्र, वरुण, यम आदि वे देवताएँ थे जिनकी यज्ञके माध्यम से पूजा की जाती थी। जैसा कि मैंने पहले बताया, ये देवताएँ दिव्य प्राणी हैं, ईश्वर नहीं। लेकिन यह मंत्र तो इसका बिल्कुल उलटा कहता हुआ लगता है। यह कहता है कि वे सभी देवताएँ सत् या वैदिक धर्म के ईश्वर के समान ही हैं। उसी ईश्वर की बात विप्र लोग, यानी वैदिक अनुष्ठान करनेवाले लोग, अलग-अलग रूपों में अनेक देवताओं के रूप में करते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होसकता है कि लगभग पाँच हज़ार वर्ष पुराने वेद भी ईश्वर की वही परिभाषा देते हैं जो दूसरे धर्म देते हैं। उपनिषद कहते हैं: ब्रह्म वह है जिससे सभी प्राणी अस्तित्व में आए, जो उन्हें बनाए रखता है और जिसमें वे अंततः विलीन होजाते हैं। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते; येन जातानि जीवन्ति; यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति; तद्विजिज्ञासस्व; तद् ब्रह्मेति। -- तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली खंड, श्लोक 1 तो फिर लड़ाई कहाँ है? ईश्वर की एकता को लेकर किसी वैदिक भारतीय की धारणा कुरआन को माननेवाले किसी मुसलमान से अलग नहीं है। बस अंतर इतना है कि एक उसे ब्रह्म कहता है और दूसरा उसे अल्लाह कहता है। पानी पानी ही है, चाहे आप उसे आगुआ, वासर, पानी, तन्नी, नीरु या कुछ भी कहें! आपका क्या विचार है? अपनी राय मुझे टिप्पणियों में बताएँ। फिर मिलेंगे एक और दिलचस्प एपिसोड में।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;हम इतनी आसानी से यह क्यों मान लेते हैं कि एक ही ईश्वर में विश्वास करना, या इसके विपरीत विश्वास रखना, हमें दूसरों से अलग करता है? अक्सर हमें ऐसे लोग मिलते हैं जो गर्व से एक ही ईश्वर में अपने विश्वास की घोषणा करते हैं। इससे धार्मिक विश्वासों के एक जटिल इतिहास और उनके बीच मौजूद उन समानताओं का संकेत मिलता है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। क्या ऐसा हो सकता है कि एकेश्वरवाद का विचार उतना अनोखा नहीं है जितना हम सोचते हैं? भारत के एक दूरदराज़ गाँव में अपनी सुबह-सुबह की सैर के दौरान मेरी मुलाकात एक बुज़ुर्ग सज्जन से हुई। उनके झुर्रियोंभरे चेहरे से उनकी उम्र का पता चलता था। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा अभिवादन किया और अपना परिचय एक सेवानिवृत्त बैंकर के रूप में दिया। उन्होंने गर्व से बताया कि वे ऐसे धर्म को मानते हैं जो एक ही ईश्वर में विश्वास करता है। इसका मतलब था कि वे मुसलमान थे। उनके बोलने में श्रेष्ठता का एक भाव झलक रहा था, जैसे वे खुद को उन दूसरों से अलग मानते हों जो अनेक देवताओं में विश्वास करते हैं। और उन दूसरों से शायद उनका मतलब उस इलाके के हिंदुओं से था, जो अनगिनत देवताओं की पूजा करते थे। लेकिन यह अंतर एक मिथक है। var hello = document.getElementById("Hello"); 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वही तुम्हारा पालन-पोषण करता है; और उसी के पास तुम लौटोगे। अल्लाहुल्लज़ी ख़लक़कुम सुम्मा रज़क़कुम सुम्मा युमीतुकुम सुम्मा युह्यीकुम; हल् मिन शुरकाइकुम मय्यफ़्अलु मिन ज़ालिकुम मिन शैइन्; सुब्हानहू व तआला अम्मा युश्रिकून। -- कुरआन, सूरह अर-रूम 30:40 यह ईश्वर बोलता है, भावनाएँ दिखाता है, प्रेम करता है, घृणा करता है, अपनी भेड़ों की ईर्ष्यापूर्वक रक्षा करता है, पूर्ण समर्पण की अपेक्षा करता है, परीक्षा लेता है, पुरस्कार देता है और दंड देता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई मानव स्वामी अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार करता है। यही मज़्दावाद का ईश्वर है और यही इब्राहीमी धर्मों, जैसे यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम का ईश्वर है। दूसरी ओर, वैदिक धर्म का ईश्वर एक अमूर्त अवधारणा है। यह ईश्वर मनुष्यों के साथ बहुत कम संवाद करता है और उनसे पूर्ण समर्पण की माँग नहीं करता। वह निराकार और अकल्पनीय है और उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस ईश्वर को अक्सर सत्, आत्मा या ब्रह्म कहा जाता है। ये नाम नहीं, बल्कि ऐसे विशेषण हैं जो उसके कुछ पहलुओं को समझाने का प्रयास करते हैं। यही वह ईश्वर है जिसके बारे में उपनिषद बात करते हैं, जो वेदों के अंतिम भाग हैं। अगर आप चाहें तो इसे उपनिषदों का ईश्वर कहसकते हैं। यह वह ईश्वर नहीं है जिसकी बात वेदों के कर्मकांड वाले भागों में की गई है। लेकिन एक दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह वैदिक मंत्र कहता है: चाहे वह इंद्र हो, मित्र हो, वरुण हो, अग्नि हो या सुनहरे पंखों वाला गरुत्मान ही क्यों न हो, वे सभी केवल सत् ही हैं। उसी सत् को वैदिक अनुष्ठान करनेवाले विप्र लोग अलग-अलग नामों से अग्नि, यम या मातरिश्वा कहते हैं। इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः, अथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्; एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति, अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः। -- ऋग्वेद 1:164:46 इंद्र, वरुण, यम आदि वे देवताएँ थे जिनकी यज्ञके माध्यम से पूजा की जाती थी। जैसा कि मैंने पहले बताया, ये देवताएँ दिव्य प्राणी हैं, ईश्वर नहीं। लेकिन यह मंत्र तो इसका बिल्कुल उलटा कहता हुआ लगता है। यह कहता है कि वे सभी देवताएँ सत् या वैदिक धर्म के ईश्वर के समान ही हैं। उसी ईश्वर की बात विप्र लोग, यानी वैदिक अनुष्ठान करनेवाले लोग, अलग-अलग रूपों में अनेक देवताओं के रूप में करते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होसकता है कि लगभग पाँच हज़ार वर्ष पुराने वेद भी ईश्वर की वही परिभाषा देते हैं जो दूसरे धर्म देते हैं। उपनिषद कहते हैं: ब्रह्म वह है जिससे सभी प्राणी अस्तित्व में आए, जो उन्हें बनाए रखता है और जिसमें वे अंततः विलीन होजाते हैं। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते; येन जातानि जीवन्ति; यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति; तद्विजिज्ञासस्व; तद् ब्रह्मेति। -- तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली खंड, श्लोक 1 तो फिर लड़ाई कहाँ है? ईश्वर की एकता को लेकर किसी वैदिक भारतीय की धारणा कुरआन को माननेवाले किसी मुसलमान से अलग नहीं है। बस अंतर इतना है कि एक उसे ब्रह्म कहता है और दूसरा उसे अल्लाह कहता है। पानी पानी ही है, चाहे आप उसे आगुआ, वासर, पानी, तन्नी, नीरु या कुछ भी कहें! आपका क्या विचार है? अपनी राय मुझे टिप्पणियों में बताएँ। फिर मिलेंगे एक और दिलचस्प एपिसोड में।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #IndianPhilosophy, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad, islam</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]   आत्म-साक्षात्कार का परम आश्चर्य।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/09/hindi.html</link><category>#advaita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Meditation</category><category>#mystery</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><category>#Yoga</category><pubDate>Sat, 5 Sep 2026 00:00:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-8485922270914824362</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आश्चर्य यह है कि जिस चीज़ को हम इतने समय से खोज रहे थे, वह और कुछ नहीं बल्कि हम स्वयं हैं! हम हमेशा यह कल्पना करते रहे कि हम कुछ और हैं। लेकिन जब हम सत्य के सामने आमने-सामने खड़े होते हैं, तब हमें पता चलता है कि हम वास्तव में कौन हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें स्वयं को जानने से कौन रोकता है? ऐसी बहुत-सी चीज़ें हैं जो हमारी दृष्टि को अंधा कर देती हैं और हमें वास्तविकता को देखने से रोकती हैं। हमें पहले अपनी दृष्टि के सामने आने वाली हर उस चीज़ को हटा देना होगा, जो हमें रोकती है। तभी सत्य स्वयं को प्रकट करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक उपनिषद् में इस बात को समझाने वाली एक बहुत सुंदर कल्पना है—वह है ईशावास्य उपनिषद्।&lt;br /&gt;इसमें एक ऐसे सुनहरे चक्र की बात की गई है, जो सत्य को धारण करने वाले पात्र को ढककर रखता है। यह चक्र इतना चमकीला है कि इससे निकलने वाली किरणें हमारी दृष्टि को लगभग चकाचौंध कर देती हैं। पात्र के अंदर क्या है, यह देखने से पहले हमें इस ढक्कन को उठाना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्&lt;br /&gt;तत् त्वं पूषन् अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस पात्र को किसने ढक रखा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही, जो सबका पोषण करता है, जो इस पूरे संसार को नियंत्रित करता है। उसी ने इस पात्र को एक चकाचौंध कर देने वाले सुनहरे चक्र से ढक रखा है। इसलिए, उस ढक्कन को वही उठा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह ढक्कन किसके लिए खोला जा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल सच्चे साधक के लिए। केवल उस व्यक्ति के लिए, जिसके भीतर सत्य को जानने की तीव्र इच्छा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कोई आसान काम नहीं होने वाला। वे चकाचौंध कर देने वाली किरणें आपको लगभग अंधा कर देती हैं। आपको उन आँखों को चकाचौंध कर देने वाली किरणों के बीच से होकर आगे बढ़ना होगा। तभी वह ढक्कन उठाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब ढक्कन उठ जाता है, तो आपको पात्र के अंदर क्या दिखाई देता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके अलावा और कुछ भी नहीं—आपकी वास्तविक पहचान!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक और अतिरिक्त आश्चर्य है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आप खुले हुए पात्र के अंदर देखते हैं, तो आपको पता चलता है कि वास्तव में उस पात्र को बंद रखने वाले भी आप ही थे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि&lt;br /&gt;यः असौ पुरुषः सः अहम् अस्मि।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;— ईशावास्य उपनिषद् 15-16।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;जब तक आप उस पृष्ठभूमि को नहीं जानते, जिसमें उपनिषद् यह सब कहता है, तब तक इस पहेली को समझना बहुत कठिन है। उपनिषद् कभी-कभी पहेलियों के रूप में बात करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, बस एक बार फिर संक्षेप में याद कर लें कि वह क्या कह रहा है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;• वह एक सत्य की बात कर रहा है। और यह सत्य एक चकाचौंध कर देने वाले सुनहरे आवरण से छिपा हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• इस सत्य को ढकने वाला और कोई नहीं, बल्कि वही है जो इस पूरे संसार को नियंत्रित करता है, जो पूरे संसार का पोषण करता है। और केवल वही इस आवरण को हटाकर इस सत्य को प्रकट कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• और वह छिपा हुआ सत्य क्या है? छिपा हुआ सत्य यह है कि जिसे आप हमेशा "आप" समझते रहे, वह वास्तव में आप नहीं हैं। आप कुछ अत्यंत मंगलमय हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• इससे भी अधिक चौंकाने वाला सत्य यह है कि उस सत्य को वास्तव में छिपाने वाले भी आप ही हैं!&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;शायद इससे आप पूरी तरह उलझ गए हैं। है न?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आपको कुछ ऐसी पृष्ठभूमि बताता हूँ, जिससे यह रहस्य स्पष्ट हो जाएगा।&lt;br /&gt;धार्मिक ग्रंथों के विपरीत, उपनिषद् ऐसे किसी ईश्वर की बात नहीं करते, जिसने इस संसार को बनाया हो। सृष्टि जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। इसके बजाय, वे कहते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"आरंभ में सत् था और केवल सत् था, और कुछ भी नहीं था। इस सत् ने अनेक होने का निश्चय किया।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयकम्…&lt;br /&gt;तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति….&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सत् ने स्वयं को अनेक भौतिक तत्वों के रूप में दोहराया। ये भौतिक तत्व एक-दूसरे के साथ मिलकर भौतिक शरीरों का निर्माण करने लगे। फिर, सत् ने स्वयं को अनंत संख्या में व्यक्तिगत आत्माओं के रूप में दोहराया और इन शरीरों में प्रवेश किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;स इयं देवता ऐक्षत हन्ताहमिमाः तिस्रो देवता&lt;br /&gt;अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नाम रूपे व्याकरवाणि&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अब नाटक शुरू होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत् का प्रत्येक रूप एक भौतिक शरीर और एक व्यक्तिगत आत्मा का संयोजन है। शरीर के एक अंग मन के माध्यम से, भौतिक शरीर ने व्यक्तिगत आत्मा पर एक सीमा लगा दी। यह सीमा किसी बाहरी शक्ति ने नहीं लगाई थी, बल्कि स्वयं सत् ने लगाई थी, जो शरीर में व्यक्तिगत आत्मा के रूप में निवास करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ऐसा है जैसे कोई अभिनेता किसी नाटक में एक भूमिका निभा रहा हो। अभिनेता पर कोई वास्तविक, स्थायी सीमा नहीं होती। वह केवल अपने द्वारा निभाई जा रही भूमिका और नाटक की पटकथा के कारण स्वयं को सीमित करता है। जब तक अभिनेता अपनी भूमिका में पूरी तरह बह नहीं जाता, तब तक वह स्वतंत्र रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कभी-कभी अभिनेता अपनी भूमिका में इतना अधिक डूब जाता है कि वह पटकथा द्वारा निर्धारित भूमिका की सीमाओं का उल्लंघन कर देता है। तभी परेशानी शुरू होती है। वह पूरी तरह भूल जाता है कि वह वास्तव में कौन है, और उसे यह भी पता नहीं रहता कि उसे कौन-सी भूमिका निभानी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह, हम मनुष्य—जो भौतिक शरीर में रहने वाली व्यक्तिगत आत्माएँ हैं—शरीर के आकर्षणों में बह जाते हैं और उस भूमिका की सीमाओं का उल्लंघन कर देते हैं, जिसे हमें निभाना है। हम स्वयं को शरीर के साथ जोड़कर देखने लगते हैं और मन की धुन पर नाचने लगते हैं। और तभी हमें दुःख होता है।&lt;br /&gt;जब हम स्वयं को मन की पकड़ से मुक्त कर लेते हैं, तब हमें पता चलता है कि हम वास्तव में कौन हैं। योग जिस साक्षात्कार की बात करता है, वह यही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और वह साक्षात्कार हमें बताता है कि हम शरीर की सीमाओं से परे हैं। इतना ही नहीं, बल्कि मूल रूप से अपने चारों ओर वे सीमाएँ तय करने वाले भी हम ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान की प्रक्रिया द्वारा मन को पूरी तरह शांत करके यह स्वतंत्रता प्राप्त की जाती है। तभी व्यक्तिगत आत्मा को यह बोध होता है कि वह उस सत् के अलावा और कुछ नहीं है, जिसने इस पूरे नाटक की शुरुआत की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईशावास्य उपनिषद् का मंत्र जिस साक्षात्कार की बात कर रहा है, वह यही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विचार के बारे में आपको क्या लगता है, यह अपनी टिप्पणियों के माध्यम से बताइए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://doctor-king-online.blogspot.com/2018/10/how-to-subscribe-to-my-blogcast.html"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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जब हम गहरे ध्यान की बात करते हैं, तो अक्सर परम-साक्षात्कार की बात करते हैं। यही हमारा लक्ष्य है। इसी के लिए हम इतने समय से मेहनत करते आ रहे हैं। और अंत में, जब हम इसे प्राप्त कर लेते हैं, तो एक आश्चर्य सामने आता है! वह आश्चर्य क्या है? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;आश्चर्य यह है कि जिस चीज़ को हम इतने समय से खोज रहे थे, वह और कुछ नहीं बल्कि हम स्वयं हैं! हम हमेशा यह कल्पना करते रहे कि हम कुछ और हैं। लेकिन जब हम सत्य के सामने आमने-सामने खड़े होते हैं, तब हमें पता चलता है कि हम वास्तव में कौन हैं। हमें स्वयं को जानने से कौन रोकता है? ऐसी बहुत-सी चीज़ें हैं जो हमारी दृष्टि को अंधा कर देती हैं और हमें वास्तविकता को देखने से रोकती हैं। हमें पहले अपनी दृष्टि के सामने आने वाली हर उस चीज़ को हटा देना होगा, जो हमें रोकती है। तभी सत्य स्वयं को प्रकट करेगा। एक उपनिषद् में इस बात को समझाने वाली एक बहुत सुंदर कल्पना है—वह है ईशावास्य उपनिषद्। इसमें एक ऐसे सुनहरे चक्र की बात की गई है, जो सत्य को धारण करने वाले पात्र को ढककर रखता है। यह चक्र इतना चमकीला है कि इससे निकलने वाली किरणें हमारी दृष्टि को लगभग चकाचौंध कर देती हैं। पात्र के अंदर क्या है, यह देखने से पहले हमें इस ढक्कन को उठाना होगा। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् तत् त्वं पूषन् अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये। इस पात्र को किसने ढक रखा है? वही, जो सबका पोषण करता है, जो इस पूरे संसार को नियंत्रित करता है। उसी ने इस पात्र को एक चकाचौंध कर देने वाले सुनहरे चक्र से ढक रखा है। इसलिए, उस ढक्कन को वही उठा सकता है। वह ढक्कन किसके लिए खोला जा सकता है? केवल सच्चे साधक के लिए। केवल उस व्यक्ति के लिए, जिसके भीतर सत्य को जानने की तीव्र इच्छा है। यह कोई आसान काम नहीं होने वाला। वे चकाचौंध कर देने वाली किरणें आपको लगभग अंधा कर देती हैं। आपको उन आँखों को चकाचौंध कर देने वाली किरणों के बीच से होकर आगे बढ़ना होगा। तभी वह ढक्कन उठाया जा सकता है। जब ढक्कन उठ जाता है, तो आपको पात्र के अंदर क्या दिखाई देता है? आपके अलावा और कुछ भी नहीं—आपकी वास्तविक पहचान! लेकिन एक और अतिरिक्त आश्चर्य है! जब आप खुले हुए पात्र के अंदर देखते हैं, तो आपको पता चलता है कि वास्तव में उस पात्र को बंद रखने वाले भी आप ही थे! यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि यः असौ पुरुषः सः अहम् अस्मि। — ईशावास्य उपनिषद् 15-16। जब तक आप उस पृष्ठभूमि को नहीं जानते, जिसमें उपनिषद् यह सब कहता है, तब तक इस पहेली को समझना बहुत कठिन है। उपनिषद् कभी-कभी पहेलियों के रूप में बात करते हैं। आइए, बस एक बार फिर संक्षेप में याद कर लें कि वह क्या कह रहा है: • वह एक सत्य की बात कर रहा है। और यह सत्य एक चकाचौंध कर देने वाले सुनहरे आवरण से छिपा हुआ है। • इस सत्य को ढकने वाला और कोई नहीं, बल्कि वही है जो इस पूरे संसार को नियंत्रित करता है, जो पूरे संसार का पोषण करता है। और केवल वही इस आवरण को हटाकर इस सत्य को प्रकट कर सकता है। • और वह छिपा हुआ सत्य क्या है? छिपा हुआ सत्य यह है कि जिसे आप हमेशा "आप" समझते रहे, वह वास्तव में आप नहीं हैं। आप कुछ अत्यंत मंगलमय हैं। • इससे भी अधिक चौंकाने वाला सत्य यह है कि उस सत्य को वास्तव में छिपाने वाले भी आप ही हैं! शायद इससे आप पूरी तरह उलझ गए हैं। है न? मैं आपको कुछ ऐसी पृष्ठभूमि बताता हूँ, जिससे यह रहस्य स्पष्ट हो जाएगा। धार्मिक ग्रंथों के विपरीत, उपनिषद् ऐसे किसी ईश्वर की बात नहीं करते, जिसने इस संसार को बनाया हो। सृष्टि जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। इसके बजाय, वे कहते हैं: "आरंभ में सत् था और केवल सत् था, और कुछ भी नहीं था। इस सत् ने अनेक होने का निश्चय किया।" सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयकम्… तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति…. सत् ने स्वयं को अनेक भौतिक तत्वों के रूप में दोहराया। ये भौतिक तत्व एक-दूसरे के साथ मिलकर भौतिक शरीरों का निर्माण करने लगे। फिर, सत् ने स्वयं को अनंत संख्या में व्यक्तिगत आत्माओं के रूप में दोहराया और इन शरीरों में प्रवेश किया। स इयं देवता ऐक्षत हन्ताहमिमाः तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नाम रूपे व्याकरवाणि अब नाटक शुरू होता है। सत् का प्रत्येक रूप एक भौतिक शरीर और एक व्यक्तिगत आत्मा का संयोजन है। शरीर के एक अंग मन के माध्यम से, भौतिक शरीर ने व्यक्तिगत आत्मा पर एक सीमा लगा दी। यह सीमा किसी बाहरी शक्ति ने नहीं लगाई थी, बल्कि स्वयं सत् ने लगाई थी, जो शरीर में व्यक्तिगत आत्मा के रूप में निवास करता है। यह ऐसा है जैसे कोई अभिनेता किसी नाटक में एक भूमिका निभा रहा हो। अभिनेता पर कोई वास्तविक, स्थायी सीमा नहीं होती। वह केवल अपने द्वारा निभाई जा रही भूमिका और नाटक की पटकथा के कारण स्वयं को सीमित करता है। जब तक अभिनेता अपनी भूमिका में पूरी तरह बह नहीं जाता, तब तक वह स्वतंत्र रहता है। लेकिन कभी-कभी अभिनेता अपनी भूमिका में इतना अधिक डूब जाता है कि वह पटकथा द्वारा निर्धारित भूमिका की सीमाओं का उल्लंघन कर देता है। तभी परेशानी शुरू होती है। वह पूरी तरह भूल जाता है कि वह वास्तव में कौन है, और उसे यह भी पता नहीं रहता कि उसे कौन-सी भूमिका निभानी है। इसी तरह, हम मनुष्य—जो भौतिक शरीर में रहने वाली व्यक्तिगत आत्माएँ हैं—शरीर के आकर्षणों में बह जाते हैं और उस भूमिका की सीमाओं का उल्लंघन कर देते हैं, जिसे हमें निभाना है। हम स्वयं को शरीर के साथ जोड़कर देखने लगते हैं और मन की धुन पर नाचने लगते हैं। और तभी हमें दुःख होता है। जब हम स्वयं को मन की पकड़ से मुक्त कर लेते हैं, तब हमें पता चलता है कि हम वास्तव में कौन हैं। योग जिस साक्षात्कार की बात करता है, वह यही है। और वह साक्षात्कार हमें बताता है कि हम शरीर की सीमाओं से परे हैं। इतना ही नहीं, बल्कि मूल रूप से अपने चारों ओर वे सीमाएँ तय करने वाले भी हम ही हैं। ध्यान की प्रक्रिया द्वारा मन को पूरी तरह शांत करके यह स्वतंत्रता प्राप्त की जाती है। तभी व्यक्तिगत आत्मा को यह बोध होता है कि वह उस सत् के अलावा और कुछ नहीं है, जिसने इस पूरे नाटक की शुरुआत की थी। ईशावास्य उपनिषद् का मंत्र जिस साक्षात्कार की बात कर रहा है, वह यही है। इस विचार के बारे में आपको क्या लगता है, यह अपनी टिप्पणियों के माध्यम से बताइए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आज हम ध्यान के परम लक्ष्य—आत्म-साक्षात्कार—में गहराई से उतरेंगे। प्राचीन ग्रंथ हमें बताते हैं कि जब आप अंततः परम सत्य तक पहुँचते हैं, तो वहाँ आपके लिए एक बहुत बड़ा आश्चर्य इंतज़ार कर रहा होता है। लेकिन इसे समझने के लिए, हमें ईशावास्य उपनिषद् की एक प्राचीन पहेली को सुलझाना होगा, जिसमें एक चमकदार सुनहरे ढक्कन और एक छिपे हुए पात्र की बात की गई है। तो चलिए सीधे विषय पर आते हैं, और देखते हैं कि ढक्कन उठने से पहले आप अंदाज़ा लगा सकते हैं या नहीं कि उसके अंदर क्या है… आत्म-साक्षात्कार क्या है? 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ऐसी बहुत-सी चीज़ें हैं जो हमारी दृष्टि को अंधा कर देती हैं और हमें वास्तविकता को देखने से रोकती हैं। हमें पहले अपनी दृष्टि के सामने आने वाली हर उस चीज़ को हटा देना होगा, जो हमें रोकती है। तभी सत्य स्वयं को प्रकट करेगा। एक उपनिषद् में इस बात को समझाने वाली एक बहुत सुंदर कल्पना है—वह है ईशावास्य उपनिषद्। इसमें एक ऐसे सुनहरे चक्र की बात की गई है, जो सत्य को धारण करने वाले पात्र को ढककर रखता है। यह चक्र इतना चमकीला है कि इससे निकलने वाली किरणें हमारी दृष्टि को लगभग चकाचौंध कर देती हैं। पात्र के अंदर क्या है, यह देखने से पहले हमें इस ढक्कन को उठाना होगा। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् तत् त्वं पूषन् अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये। इस पात्र को किसने ढक रखा है? वही, जो सबका पोषण करता है, जो इस पूरे संसार को नियंत्रित करता है। उसी ने इस पात्र को एक चकाचौंध कर देने वाले सुनहरे चक्र से ढक रखा है। इसलिए, उस ढक्कन को वही उठा सकता है। वह ढक्कन किसके लिए खोला जा सकता है? केवल सच्चे साधक के लिए। केवल उस व्यक्ति के लिए, जिसके भीतर सत्य को जानने की तीव्र इच्छा है। यह कोई आसान काम नहीं होने वाला। वे चकाचौंध कर देने वाली किरणें आपको लगभग अंधा कर देती हैं। आपको उन आँखों को चकाचौंध कर देने वाली किरणों के बीच से होकर आगे बढ़ना होगा। तभी वह ढक्कन उठाया जा सकता है। जब ढक्कन उठ जाता है, तो आपको पात्र के अंदर क्या दिखाई देता है? आपके अलावा और कुछ भी नहीं—आपकी वास्तविक पहचान! लेकिन एक और अतिरिक्त आश्चर्य है! जब आप खुले हुए पात्र के अंदर देखते हैं, तो आपको पता चलता है कि वास्तव में उस पात्र को बंद रखने वाले भी आप ही थे! यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि यः असौ पुरुषः सः अहम् अस्मि। — ईशावास्य उपनिषद् 15-16। जब तक आप उस पृष्ठभूमि को नहीं जानते, जिसमें उपनिषद् यह सब कहता है, तब तक इस पहेली को समझना बहुत कठिन है। उपनिषद् कभी-कभी पहेलियों के रूप में बात करते हैं। आइए, बस एक बार फिर संक्षेप में याद कर लें कि वह क्या कह रहा है: • वह एक सत्य की बात कर रहा है। और यह सत्य एक चकाचौंध कर देने वाले सुनहरे आवरण से छिपा हुआ है। • इस सत्य को ढकने वाला और कोई नहीं, बल्कि वही है जो इस पूरे संसार को नियंत्रित करता है, जो पूरे संसार का पोषण करता है। और केवल वही इस आवरण को हटाकर इस सत्य को प्रकट कर सकता है। • और वह छिपा हुआ सत्य क्या है? छिपा हुआ सत्य यह है कि जिसे आप हमेशा "आप" समझते रहे, वह वास्तव में आप नहीं हैं। आप कुछ अत्यंत मंगलमय हैं। • इससे भी अधिक चौंकाने वाला सत्य यह है कि उस सत्य को वास्तव में छिपाने वाले भी आप ही हैं! शायद इससे आप पूरी तरह उलझ गए हैं। है न? मैं आपको कुछ ऐसी पृष्ठभूमि बताता हूँ, जिससे यह रहस्य स्पष्ट हो जाएगा। धार्मिक ग्रंथों के विपरीत, उपनिषद् ऐसे किसी ईश्वर की बात नहीं करते, जिसने इस संसार को बनाया हो। सृष्टि जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। इसके बजाय, वे कहते हैं: "आरंभ में सत् था और केवल सत् था, और कुछ भी नहीं था। इस सत् ने अनेक होने का निश्चय किया।" सदेव सोम्य इदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयकम्… तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति…. सत् ने स्वयं को अनेक भौतिक तत्वों के रूप में दोहराया। ये भौतिक तत्व एक-दूसरे के साथ मिलकर भौतिक शरीरों का निर्माण करने लगे। फिर, सत् ने स्वयं को अनंत संख्या में व्यक्तिगत आत्माओं के रूप में दोहराया और इन शरीरों में प्रवेश किया। स इयं देवता ऐक्षत हन्ताहमिमाः तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नाम रूपे व्याकरवाणि अब नाटक शुरू होता है। सत् का प्रत्येक रूप एक भौतिक शरीर और एक व्यक्तिगत आत्मा का संयोजन है। शरीर के एक अंग मन के माध्यम से, भौतिक शरीर ने व्यक्तिगत आत्मा पर एक सीमा लगा दी। यह सीमा किसी बाहरी शक्ति ने नहीं लगाई थी, बल्कि स्वयं सत् ने लगाई थी, जो शरीर में व्यक्तिगत आत्मा के रूप में निवास करता है। यह ऐसा है जैसे कोई अभिनेता किसी नाटक में एक भूमिका निभा रहा हो। अभिनेता पर कोई वास्तविक, स्थायी सीमा नहीं होती। वह केवल अपने द्वारा निभाई जा रही भूमिका और नाटक की पटकथा के कारण स्वयं को सीमित करता है। जब तक अभिनेता अपनी भूमिका में पूरी तरह बह नहीं जाता, तब तक वह स्वतंत्र रहता है। लेकिन कभी-कभी अभिनेता अपनी भूमिका में इतना अधिक डूब जाता है कि वह पटकथा द्वारा निर्धारित भूमिका की सीमाओं का उल्लंघन कर देता है। तभी परेशानी शुरू होती है। वह पूरी तरह भूल जाता है कि वह वास्तव में कौन है, और उसे यह भी पता नहीं रहता कि उसे कौन-सी भूमिका निभानी है। इसी तरह, हम मनुष्य—जो भौतिक शरीर में रहने वाली व्यक्तिगत आत्माएँ हैं—शरीर के आकर्षणों में बह जाते हैं और उस भूमिका की सीमाओं का उल्लंघन कर देते हैं, जिसे हमें निभाना है। हम स्वयं को शरीर के साथ जोड़कर देखने लगते हैं और मन की धुन पर नाचने लगते हैं। और तभी हमें दुःख होता है। जब हम स्वयं को मन की पकड़ से मुक्त कर लेते हैं, तब हमें पता चलता है कि हम वास्तव में कौन हैं। योग जिस साक्षात्कार की बात करता है, वह यही है। और वह साक्षात्कार हमें बताता है कि हम शरीर की सीमाओं से परे हैं। इतना ही नहीं, बल्कि मूल रूप से अपने चारों ओर वे सीमाएँ तय करने वाले भी हम ही हैं। ध्यान की प्रक्रिया द्वारा मन को पूरी तरह शांत करके यह स्वतंत्रता प्राप्त की जाती है। तभी व्यक्तिगत आत्मा को यह बोध होता है कि वह उस सत् के अलावा और कुछ नहीं है, जिसने इस पूरे नाटक की शुरुआत की थी। ईशावास्य उपनिषद् का मंत्र जिस साक्षात्कार की बात कर रहा है, वह यही है। इस विचार के बारे में आपको क्या लगता है, यह अपनी टिप्पणियों के माध्यम से बताइए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#advaita, #Hindi, #IndianPhilosophy, #Meditation, #mystery, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  'द' का रहस्य: गरजते बादलकी आवाज़में छिपी है जीवनकी सीख!</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/08/hindi_01618645787.html</link><category>#enjoyment</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 00:00:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-5167140758585435074</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह एक सुंदर, छोटी-सी कहानीसे शुरू होता है। यह कहानी सुननेमें भले ही काफ़ी हास्यपूर्ण लगे, लेकिन इसका गहरा अर्थ बहुत गंभीर है और हर किसीको सोचनेपर मजबूर कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानीके अनुसार, एक बार तीन जीव ज्ञान और मार्गदर्शनकी खोजमें भगवानके पास गए। उन तीनोंमेंसे एक मनुष्य था, दूसरा देवता था और तीसरा राक्षस था। अपनी-अपनी अलग प्रकृतिवाले इन तीनों जीवोंने भगवानसे उनका मार्गदर्शन करनेकी प्रार्थना की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले मनुष्य भगवानके सामने खड़ा होकर बोला,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"स्वामी, मुझे जीवनमें किस बातका पालन करना चाहिए? मुझे कोई उपदेश दीजिए।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इसके उत्तरमें भगवानने केवल एक अक्षर कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भगवानने उसकी ओर देखकर पूछा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"क्या तुम्हें समझमें आया कि मैंने क्या कहा?"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सच कहें तो मनुष्य उस एक अक्षरका पूरा अर्थ तुरंत नहीं समझ सका। फिर भी अपने अहंकार और आत्मविश्वासके साथ उसने कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"हाँ स्वामी, मुझे बिल्कुल समझमें आ गया। आप कह रहे हैं कि मुझे 'द' अक्षरसे शुरू होनेवाले एक सूत्रका पालन करना चाहिए। यहाँ 'द' का अर्थ है 'दान'। अपने पास जो कुछ है, उसे दूसरोंको देना। इसलिए आप मुझे सिखा रहे हैं कि मुझे जीवनमें दान-धर्मका अभ्यास करना चाहिए, है न?"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भगवान मुस्कुराए और बोले:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"हाँ, तुमने बिल्कुल सही समझा है।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;यहाँ हमें एक बातपर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य स्वभावसे ही बहुत कंजूस होता है। उसकी लालचकी कोई सीमा नहीं होती। कितना भी मिल जाए, उसे कभी पर्याप्त नहीं लगता और वह धन इकट्ठा करता ही जाता है। अपने पास मौजूद धनको दूसरोंके साथ बाँटने और कठिनाईमें पड़े ज़रूरतमंदोंको दान देनेके लिए वह कभी आसानीसे आगे नहीं आता। मनुष्यके इसी मूल स्वभावकी कमजोरीके आधारपर उसने भगवानके उपदेशका अर्थ यह समझा कि भगवान उसे उदारतासे दान करनेकी शिक्षा दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद देवता भगवानके पास आए और बोले,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"स्वामी, मेरे जीवनका मार्गदर्शन करनेवाला कोई उपदेश दीजिए।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भगवानने उनसे भी वही अक्षर कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवानने फिर पूछा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"क्या तुम्हें इसका अर्थ समझमें आया?"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;देवताको भी उसका वास्तविक अर्थ तुरंत नहीं समझ आया। फिर भी उसने आत्मविश्वासके साथ कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"हाँ स्वामी, मुझे समझमें आ गया। आप कह रहे हैं कि मुझे 'द' अक्षरका पालन करना चाहिए। यहाँ 'द' का अर्थ है 'दम'। दमका अर्थ है इन्द्रिय-निग्रह, अर्थात् अपनी इच्छाओंको नियंत्रणमें रखना। इसलिए आप कह रहे हैं कि मुझे अपनी इन्द्रियोंके भोगपर नियंत्रण रखना चाहिए।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भगवान मुस्कुराए और बोले:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"हाँ, तुमने बिल्कुल सही समझा है।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि देवता हमेशा भोग और सुख-विलासमें डूबे रहते हैं। अपनी इन्द्रियोंकी इच्छाओंपर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। इसलिए उन्होंने भगवानके उस एक अक्षर, 'द', के उपदेशको अपने अनुशासनहीन स्वभावके लिए मिली एक चेतावनी माना। उन्होंने इसे मनको नियंत्रणमें रखकर अनुशासित जीवन जीनेकी सलाहके रूपमें स्वीकार किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्तमें राक्षस भगवानके पास गया और प्रार्थना करते हुए बोला,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"स्वामी, मुझे भी कोई उपदेश दीजिए।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भगवानने उससे भी वही अक्षर कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवानने फिर पूछा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"क्या तुम्हें समझमें आया कि मैंने क्या कहा?"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;राक्षस भी उसका पूरा अर्थ नहीं समझ पाया था। फिर भी उसने आत्मविश्वासके साथ कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"हाँ स्वामी, मुझे समझमें आ गया। आप कह रहे हैं कि मुझे 'द' अक्षरके नियमका पालन करना चाहिए। यहाँ 'द' का अर्थ है 'दया', यानी करुणा दिखाना। इसलिए आप कह रहे हैं कि मुझे दूसरोंके प्रति क्रूरता नहीं दिखानी चाहिए, बल्कि उनके साथ करुणाका व्यवहार करना चाहिए।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भगवान मुस्कुराए और बोले:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"हाँ, तुमने बिल्कुल सही समझा है।"&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि हम सभी जानते हैं, राक्षस स्वभावसे ही बहुत क्रूर और हिंसक होते हैं। उनमें दया और करुणा नामकी कोई चीज़ नहीं होती और वे दूसरोंके साथ बेहद निर्दयतासे व्यवहार कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने भगवानके उस उपदेशको दूसरोंके प्रति अपनी क्रूरतापर लगाई गई लगामके रूपमें समझा। उन्होंने इसे क्रोध छोड़कर अधिक सहनशीलता और प्रेमके साथ जीवन जीनेका संदेश माना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद् इस हास्यपूर्ण कहानीका अन्त इस तरह करता है। — आज आकाशमें गरजता हुआ बादल भी हमें लगातार इसी संदेशकी याद दिला रहा है। हाँ, जब बादल गरजते हैं, तो वे 'द, द, द'की आवाज़ करते हैं — अर्थात् 'दया, दम, दान' — करुणा, इन्द्रिय-निग्रह और दान-धर्मका मार्ग।&lt;br 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करना होगा। अपनी आवश्यकतासे अधिक हमारे पास जो कुछ भी है, उसे कठिनाईमें पड़े अपने साथी मनुष्योंको उदारतापूर्वक दान करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकृतिमें सुनाई देनेवाली वह गड़गड़ाहट हमें हर बार यही याद दिलाती है। अब आपको भी इसके पीछे छिपा रहस्य समझमें आ गया, है न?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सुंदर और अर्थपूर्ण कहानीके बारेमें आपकी क्या राय है? कृपया कमेंट्सके माध्यमसे हमें अपनी राय लिखकर बताइए। अगले एपिसोडमें एक और दिलचस्प विषयके साथ फिर मुलाक़ात होगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा 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हाँ, आपने बिल्कुल सही पहचाना। वह आकाशमें गरजते हुए बादलोंकी गड़गड़ाहटकी आवाज़ है। लेकिन वह गड़गड़ाहट सिर्फ़ आवाज़ नहीं कर रही, बल्कि कुछ कह रही है! आप सोच सकते हैं कि मैं कोई मूर्खतापूर्ण या अजीब बात कह रहा हूँ। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। अगर हम भारतके प्राचीन धर्मग्रंथोंमें से एक, 'बृहदारण्यक उपनिषद्'की बातोंपर ध्यान दें, तो हमें समझमें आता है कि प्रकृतिके उस शब्दके पीछे एक बहुत गहरा संदेश छिपा है। तो फिर, वह उपनिषद् हमें क्या बताता है? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;यह एक सुंदर, छोटी-सी कहानीसे शुरू होता है। यह कहानी सुननेमें भले ही काफ़ी हास्यपूर्ण लगे, लेकिन इसका गहरा अर्थ बहुत गंभीर है और हर किसीको सोचनेपर मजबूर कर देता है। कहानीके अनुसार, एक बार तीन जीव ज्ञान और मार्गदर्शनकी खोजमें भगवानके पास गए। उन तीनोंमेंसे एक मनुष्य था, दूसरा देवता था और तीसरा राक्षस था। अपनी-अपनी अलग प्रकृतिवाले इन तीनों जीवोंने भगवानसे उनका मार्गदर्शन करनेकी प्रार्थना की। सबसे पहले मनुष्य भगवानके सामने खड़ा होकर बोला, "स्वामी, मुझे जीवनमें किस बातका पालन करना चाहिए? मुझे कोई उपदेश दीजिए।" इसके उत्तरमें भगवानने केवल एक अक्षर कहा: फिर भगवानने उसकी ओर देखकर पूछा: "क्या तुम्हें समझमें आया कि मैंने क्या कहा?" सच कहें तो मनुष्य उस एक अक्षरका पूरा अर्थ तुरंत नहीं समझ सका। फिर भी अपने अहंकार और आत्मविश्वासके साथ उसने कहा: "हाँ स्वामी, मुझे बिल्कुल समझमें आ गया। आप कह रहे हैं कि मुझे 'द' अक्षरसे शुरू होनेवाले एक सूत्रका पालन करना चाहिए। यहाँ 'द' का अर्थ है 'दान'। अपने पास जो कुछ है, उसे दूसरोंको देना। इसलिए आप मुझे सिखा रहे हैं कि मुझे जीवनमें दान-धर्मका अभ्यास करना चाहिए, है न?" भगवान मुस्कुराए और बोले: "हाँ, तुमने बिल्कुल सही समझा है।" यहाँ हमें एक बातपर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य स्वभावसे ही बहुत कंजूस होता है। उसकी लालचकी कोई सीमा नहीं होती। कितना भी मिल जाए, उसे कभी पर्याप्त नहीं लगता और वह धन इकट्ठा करता ही जाता है। अपने पास मौजूद धनको दूसरोंके साथ बाँटने और कठिनाईमें पड़े ज़रूरतमंदोंको दान देनेके लिए वह कभी आसानीसे आगे नहीं आता। मनुष्यके इसी मूल स्वभावकी कमजोरीके आधारपर उसने भगवानके उपदेशका अर्थ यह समझा कि भगवान उसे उदारतासे दान करनेकी शिक्षा दे रहे हैं। इसके बाद देवता भगवानके पास आए और बोले, "स्वामी, मेरे जीवनका मार्गदर्शन करनेवाला कोई उपदेश दीजिए।" भगवानने उनसे भी वही अक्षर कहा: भगवानने फिर पूछा: "क्या तुम्हें इसका अर्थ समझमें आया?" देवताको भी उसका वास्तविक अर्थ तुरंत नहीं समझ आया। फिर भी उसने आत्मविश्वासके साथ कहा: "हाँ स्वामी, मुझे समझमें आ गया। आप कह रहे हैं कि मुझे 'द' अक्षरका पालन करना चाहिए। यहाँ 'द' का अर्थ है 'दम'। दमका अर्थ है इन्द्रिय-निग्रह, अर्थात् अपनी इच्छाओंको नियंत्रणमें रखना। इसलिए आप कह रहे हैं कि मुझे अपनी इन्द्रियोंके भोगपर नियंत्रण रखना चाहिए।" भगवान मुस्कुराए और बोले: "हाँ, तुमने बिल्कुल सही समझा है।" क्योंकि देवता हमेशा भोग और सुख-विलासमें डूबे रहते हैं। अपनी इन्द्रियोंकी इच्छाओंपर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। इसलिए उन्होंने भगवानके उस एक अक्षर, 'द', के उपदेशको अपने अनुशासनहीन स्वभावके लिए मिली एक चेतावनी माना। उन्होंने इसे मनको नियंत्रणमें रखकर अनुशासित जीवन जीनेकी सलाहके रूपमें स्वीकार किया। अन्तमें राक्षस भगवानके पास गया और प्रार्थना करते हुए बोला, "स्वामी, मुझे भी कोई उपदेश दीजिए।" भगवानने उससे भी वही अक्षर कहा: भगवानने फिर पूछा: "क्या तुम्हें समझमें आया कि मैंने क्या कहा?" राक्षस भी उसका पूरा अर्थ नहीं समझ पाया था। फिर भी उसने आत्मविश्वासके साथ कहा: "हाँ स्वामी, मुझे समझमें आ गया। आप कह रहे हैं कि मुझे 'द' अक्षरके नियमका पालन करना चाहिए। यहाँ 'द' का अर्थ है 'दया', यानी करुणा दिखाना। इसलिए आप कह रहे हैं कि मुझे दूसरोंके प्रति क्रूरता नहीं दिखानी चाहिए, बल्कि उनके साथ करुणाका व्यवहार करना चाहिए।" भगवान मुस्कुराए और बोले: "हाँ, तुमने बिल्कुल सही समझा है।" जैसा कि हम सभी जानते हैं, राक्षस स्वभावसे ही बहुत क्रूर और हिंसक होते हैं। उनमें दया और करुणा नामकी कोई चीज़ नहीं होती और वे दूसरोंके साथ बेहद निर्दयतासे व्यवहार कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने भगवानके उस उपदेशको दूसरोंके प्रति अपनी क्रूरतापर लगाई गई लगामके रूपमें समझा। उन्होंने इसे क्रोध छोड़कर अधिक सहनशीलता और प्रेमके साथ जीवन जीनेका संदेश माना। उपनिषद् इस हास्यपूर्ण कहानीका अन्त इस तरह करता है। — आज आकाशमें गरजता हुआ बादल भी हमें लगातार इसी संदेशकी याद दिला रहा है। हाँ, जब बादल गरजते हैं, तो वे 'द, द, द'की आवाज़ करते हैं — अर्थात् 'दया, दम, दान' — करुणा, इन्द्रिय-निग्रह और दान-धर्मका मार्ग। बृहदारण्यक उपनिषद्का श्लोक भी यही कहता है: "तत् एतत् एव, एषा दैवी वाक् अनुवदति स्तनयित्नुः – द द द इति – दाम्यत दत्त दयध्वम् इति" – बृहदारण्यक उपनिषद् 5.2.3. अब ज़रा हम मनुष्योंकी आजकी परिस्थितिके बारेमें सोचकर देखिए। हमारे अन्दर अपने स्वाभाविक मानवीय गुणोंके साथ-साथ देवताओंके भोग-विलासके गुण भी हैं और राक्षसोंकी क्रूरताके गुण भी छिपे हुए हैं। इसलिए भगवानने उस समय जो ये तीन उपदेश दिए थे, वे आज भी पूरी मानवजातिके लिए अत्यन्त प्रासंगिक हैं। हमारे लिए केवल जीवित रहना ही पर्याप्त नहीं है; हमें दूसरोंके प्रति करुणा और सहनशीलताका व्यवहार करना होगा। बिना किसी लक्ष्यके केवल भौतिक सुख-भोगोंके पीछे भागनेके बजाय हमें अत्यन्त अनुशासित जीवन जीना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपनी लालचपर नियंत्रण रखना होगा और अपनी ज़रूरतसे अधिक धन केवल स्वार्थके लिए जमा करना बन्द करना होगा। अपनी आवश्यकतासे अधिक हमारे पास जो कुछ भी है, उसे कठिनाईमें पड़े अपने साथी मनुष्योंको उदारतापूर्वक दान करना चाहिए। प्रकृतिमें सुनाई देनेवाली वह गड़गड़ाहट हमें हर बार यही याद दिलाती है। अब आपको भी इसके पीछे छिपा रहस्य समझमें आ गया, है न? इस सुंदर और अर्थपूर्ण कहानीके बारेमें आपकी क्या राय है? कृपया कमेंट्सके माध्यमसे हमें अपनी राय लिखकर बताइए। अगले एपिसोडमें एक और दिलचस्प विषयके साथ फिर मुलाक़ात होगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;क्या आपको वह आवाज़ सुनाई दी? 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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आप किसी किताबको पढ़कर या ध्यानका प्रशिक्षण लेकर ध्यान करसकतेहैं। आपको कई तरहके अनुभव भी होसकतेहैं। लेकिन कभी-कभी आपके सामने कुछ सवाल आतेहैं – "क्या यह अनुभव किसी विश्वाससे प्रेरित था, या किसी विशेष अभ्यासका सहज परिणाम था? क्या ऐसा अनुभव उस व्यक्तिको भी होसकताहै, जिसे ध्यानके बारेमें कोई औपचारिक जानकारी नहीं है? क्या ध्यानका अनुभव उन विचारोंका परिणाम है, जिन्हें आपने खुद पैदा करके अपने ऊपर आरोपित करलिया है? या फिर वह इन सब चीज़ोंसे स्वतंत्र है?" और भी बहुतकुछ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने बचपनके अनुभवको देखें, तो यह स्पष्ट होजाताहै कि वह किसी भी विश्वास या मानसिक पृष्ठभूमिसे स्वतंत्र था। उस समय मैं पूरीतरह निर्दोष था, पूर्वाग्रहोंसे मुक्त था और ध्यानके बारेमें पूरीतरह अनजान था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, किसी व्यक्तिकी मानसिक पृष्ठभूमि चाहे जैसी भी हो, मुझे लगता है कि जो भी व्यक्ति इस अभ्यासको करता है, उसके साथ यह सहजरूपसे घटित होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर ध्यान क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हमें ध्यानके अनेक रूप दिखाईदेतेहैं। लेकिन यहाँ मैं खुदको केवल उन बातोंतक सीमित रखना चाहता हूँ, जिनका वर्णन उपनिषदों, पतंजलिके योगसूत्रों या बौद्धोंके तिपिटक जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथोंमें किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान मनको धीरे-धीरे शांत करतेहुए पूर्ण प्रशांत अवस्थातक पहुँचनेका एक मार्ग है। उस प्रशांतताकी चरम अवस्थामें व्यक्ति जिस अवस्थामें प्रवेश करता है, उसे 'समाधि' कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माण्डूक्य उपनिषद जैसे उपनिषद उस अंतिम अवस्थाका वर्णन इस प्रकार करतेहैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यह ऐसी अवस्था है, जिसमें न तो बाहरी घटनाओंका बोध होता है और न ही विचारों और स्वप्नों जैसी आंतरिक मानसिक गतिविधियाँ होतीहैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह चेतनाशून्य, जड़ अवस्था है। वहाँ बोध होता है, लेकिन वह बोध लौकिक जगतके व्यवहारसे परे होता है। वह परम सत्यका बोध है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बौद्ध तिपिटक भी इसे "मानसिक ध्यानको क्रमशः संकुचित करतेहुए ऐसी अवस्थातक पहुँचनेकी प्रक्रिया बतातेहैं, जिसमें न तो बोध रहता है और न ही अबोध।" पहली नज़रमें यह कुछ विरोधाभासी लगसकताहै। लेकिन वे ऐसी अवस्थाकी बात कररहेहैं, जो लौकिक बोध की सीमासे परे है और जिसे वे 'लोकुत्तर' कहतेहैं। तिपिटक इस यात्रामें आनेवाले कई पड़ावोंकी बात करतेहैं, जिन्हें 'झान' कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि भी ऐसी ही एक प्रक्रियाके बारेमें बातकरतेहैं, जिसमें मनको लंबे समयतक एक लक्ष्यपर केंद्रित किया जाता है। अंतिम समाधि या पूर्ण प्रशांत अवस्थातक पहुँचनेसे पहले व्यक्ति जिन चार अवस्थाओंसे गुजरताहै, उनके बारेमें पतंजलि बातकरतेहैं। इनमेंसे हर अवस्थामें मानसिक गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और अंतमें लगभग शून्य होजातीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन अवस्थाओंसे गुजरनेके बाद क्या होता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद संपूर्ण अस्तित्वके साथ एक होजानेके अंतिम साक्षात्कारकी बात करतेहैं। वे कहतेहैं कि जिसे हम सामान्यरूपसे विविधताके रूपमें देखतेहैं, वह मनकी रचना है और वास्तवमें केवल एक ही एकीकृत अस्तित्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिपिटक इस अंतिम अवस्थाके बारेमें बात करनेसे बचतेहैं, क्योंकि वह लौकिक जगत और शब्दोंसे परे है। तिपिटकका अंतिम लक्ष्य उन मानसिक खेलोंसे बाहर निकलना है, जो हमें सत्यके बारेमें एक गलत धारणा देतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि भी मानसिक गतिविधियोंसे पैदा होनेवाले भ्रमसे मुक्त होनेके बारेमें बातकरतेहैं। यह मुक्ति व्यक्तिको चीज़ोंको वैसा ही देखनेमें सक्षम बनाती है, जैसी वे वास्तवमें हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सभी बातें एक महत्वपूर्ण अवधारणाके साथ पूरीतरह मेल खातीहैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"विविधताका बोध मनकी रचना है और जब मन पूरीतरह शांत होजाता है, तब एक एकीकृत दृष्टिकोण उभरकर सामने आता है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यानकी इस प्रक्रियाऔर इसकी अंतिम अवस्थाके बारेमें विज्ञान क्या कहता है? क्या यह पूरीतरह मस्तिष्ककी एक घटना है? क्या आप ध्यानके माध्यमसे अपने मस्तिष्कको ऐसी अवस्थातक पहुँचा रहेहैं, जहाँ वह पूरीतरह अलग तरीकेसे काम करना शुरूकरदेता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरहका कोई निष्कर्ष निकालनेसे पहले, आइए समझें कि ध्यानकी विभिन्न अवस्थाओंमें वास्तवमें क्या होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बौद्ध ध्यान-पद्धतियाँ ध्यान शुरूकरनेसे पहले ही आचरणके कठोर नियम लागू करतीहैं। इसे अष्टांग मार्ग कहा जाता है; सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक प्रयास, सम्यक एकाग्रता और सम्यक समाधि। इनमेंसे पहले छह नियम व्यक्तिको आगेकी यात्राके लिए मानसिकरूपसे तैयार करतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि के यम और नियमके दस अंग, अधिकांशतः इन छह नियमोंके साथ मेल खातेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञानकी भाषामें, ये छह नियम अनियंत्रित मस्तिष्कमें होनेवाली न्यूरॉनोंकी अत्यधिक हलचल या मस्तिष्ककी गतिविधियोंमें होनेवाले लगातार उछालको कम करनेमें मदद करतेहैं। आमतौरपर इसे ध्यानका मुख्य लाभ माना जाता है, अर्थात तनावसे मुक्ति। लेकिन पूरीतरह शांत मनकी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेके लिए केवल इतना पर्याप्त नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस अवस्थातक पहुँचनेके लिए ध्यानको लगातार संकुचित करनेकी क्षमता होनीचाहिए। बौद्ध इसे प्राप्तकरनेमें मददके लिए 'कायसति' और 'आनापानसति' जैसी साधनाओंका सुझाव देतेहैं। इन तकनीकोंका उपयोग करके व्यक्ति चुनेहुए लक्ष्यपर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करनेकी क्षमता प्राप्त करसकताहै। पतंजलि इसी क्षमताको प्राप्तकरनेके लिए 'प्राणायाम' के बारेमें बातकरतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञानकी भाषामें, यह मस्तिष्कके मध्यभागमें ध्यानसे संबंधित संरचनाओं, अर्थात 'थैलेमिक सर्किटों', को प्रशिक्षित करनेकी प्रक्रिया है। जब इन सर्किटोंको उचित प्रशिक्षण मिलजाता है, तो वे बिना किसी व्यवधानके अपना ध्यान एक ही लक्ष्यपर केंद्रित करनेमें सक्षम होजातेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे व्यक्ति ध्यानमें आगे बढ़ता है, वह धीरे-धीरे अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण करता जाता है। यह उसे बौद्धोंद्वारा बताएगए प्रारंभिक 'झानों' की अवस्थाओंसे और पतंजलि द्वारा बताएगए 'संप्रज्ञात समाधि' की विभिन्न अवस्थाओंसे होकर लेजाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन अवस्थाओंमें मानसिक गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और अंतमें ऐसी अवस्थातक पहुँचतीहैं, जो स्वयं मनके दायरेसे भी परे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे किसी भी ग्रंथमें उस अवस्थाका स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता, क्योंकि लौकिक बोधके संदर्भमें इस्तेमाल होनेवाली हमारी शब्दावली उस अलौकिक अवस्थाका वर्णन करनेके लिए पर्याप्त नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बारेमें तंत्रिका-विज्ञान क्या कहता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्कके अध्ययनोंसे यह पुष्टि हुई है कि ध्यान करतेसमय मस्तिष्ककी गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और गतिविधि केवल अत्यंत सीमित क्षेत्रोंमें केंद्रित रहजाती है। सामान्य अस्त-व्यस्त गतिविधियाँ लगभग पूरीतरह समाप्त होजातीहैं। लेकिन उस अवस्थासे भी आगे जानेके बाद क्या होता है, इस बारेमें तंत्रिका-विज्ञान कोई अनुमान लगानेका प्रयास नहीं करता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सभी बातें इस बातकी पुष्टि करतीहैं कि इन अभ्यासोंका एक निश्चित प्रभाव होता है। लेकिन क्या ये प्रभाव पूरीतरह शारीरिक हैं, या इनमें कोई पारलौकिक आयाम भी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विज्ञान केवल भौतिकताकी सीमातक सीमित है और उससे आगे जानेका साहस नहीं करता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी प्राचीन ग्रंथ इस बातकी पुष्टि करतेहैं कि यह केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं है। वे ध्यानसे प्राप्त होनेवाली ऐसी विभिन्न उपलब्धियोंका उल्लेख करतेहैं, जिन्हें केवल भौतिक नियमोंसे समझाया नहीं जासकता। उदाहरणके लिए, इंद्रियोंकी सीमासे परे बोध करनेकी क्षमता; अतीत और भविष्यमें झाँकनेकी क्षमता; दूसरोंके मनको पढ़नेकी क्षमता; बिना किसी प्रत्यक्ष संचारके दूसरे लोगोंके मनपर प्रभाव डालनेकी क्षमता; पूर्वजन्मोंकी स्मृतियाँ और भी बहुतकुछ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञान आमतौरपर इन बातोंके प्रति संदेहवादी रुख अपनाता है और इनके बारेमें निर्विवाद प्रमाण माँगता है। लेकिन यह सच है कि अनेक गंभीर साधक ऐसी क्षमताओंका प्रदर्शन करतेहैं। यह कट्टर संदेहवादियोंको भी चकित करदेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने ध्यानके प्रति एक खुले मनका रुख अपनाया है, भले ही मुझे विश्वास है कि ऐसी क्षमताएँ संभव हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन क्षमताओंकी सच्चाई चाहे जो भी हो, मेरा मानना है कि ध्यानका एक व्यापक, एकीकरणकारी प्रभाव होता है; यह ऐसा एकीकरण है जो संकीर्ण, अहं-केंद्रित पहचानोंसे परे लेजाता है। यह उपलब्धि निश्चितरूपसे कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको कैसा लगता है? अपने विचार लिखकर बताएँ। फिर मिलेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


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क्या ऐसा अनुभव उस व्यक्तिको भी होसकताहै, जिसे ध्यानके बारेमें कोई औपचारिक जानकारी नहीं है? क्या ध्यानका अनुभव उन विचारोंका परिणाम है, जिन्हें आपने खुद पैदा करके अपने ऊपर आरोपित करलिया है? या फिर वह इन सब चीज़ोंसे स्वतंत्र है?" और भी बहुतकुछ। अपने बचपनके अनुभवको देखें, तो यह स्पष्ट होजाताहै कि वह किसी भी विश्वास या मानसिक पृष्ठभूमिसे स्वतंत्र था। उस समय मैं पूरीतरह निर्दोष था, पूर्वाग्रहोंसे मुक्त था और ध्यानके बारेमें पूरीतरह अनजान था। इसलिए, किसी व्यक्तिकी मानसिक पृष्ठभूमि चाहे जैसी भी हो, मुझे लगता है कि जो भी व्यक्ति इस अभ्यासको करता है, उसके साथ यह सहजरूपसे घटित होता है। आखिर ध्यान क्या है? आज हमें ध्यानके अनेक रूप दिखाईदेतेहैं। लेकिन यहाँ मैं खुदको केवल उन बातोंतक सीमित रखना चाहता हूँ, जिनका वर्णन उपनिषदों, पतंजलिके योगसूत्रों या बौद्धोंके तिपिटक जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथोंमें किया गया है। ध्यान मनको धीरे-धीरे शांत करतेहुए पूर्ण प्रशांत अवस्थातक पहुँचनेका एक मार्ग है। उस प्रशांतताकी चरम अवस्थामें व्यक्ति जिस अवस्थामें प्रवेश करता है, उसे 'समाधि' कहा जाता है। माण्डूक्य उपनिषद जैसे उपनिषद उस अंतिम अवस्थाका वर्णन इस प्रकार करतेहैं: "यह ऐसी अवस्था है, जिसमें न तो बाहरी घटनाओंका बोध होता है और न ही विचारों और स्वप्नों जैसी आंतरिक मानसिक गतिविधियाँ होतीहैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह चेतनाशून्य, जड़ अवस्था है। वहाँ बोध होता है, लेकिन वह बोध लौकिक जगतके व्यवहारसे परे होता है। वह परम सत्यका बोध है।" बौद्ध तिपिटक भी इसे "मानसिक ध्यानको क्रमशः संकुचित करतेहुए ऐसी अवस्थातक पहुँचनेकी प्रक्रिया बतातेहैं, जिसमें न तो बोध रहता है और न ही अबोध।" पहली नज़रमें यह कुछ विरोधाभासी लगसकताहै। लेकिन वे ऐसी अवस्थाकी बात कररहेहैं, जो लौकिक बोध की सीमासे परे है और जिसे वे 'लोकुत्तर' कहतेहैं। तिपिटक इस यात्रामें आनेवाले कई पड़ावोंकी बात करतेहैं, जिन्हें 'झान' कहा जाता है। पतंजलि भी ऐसी ही एक प्रक्रियाके बारेमें बातकरतेहैं, जिसमें मनको लंबे समयतक एक लक्ष्यपर केंद्रित किया जाता है। अंतिम समाधि या पूर्ण प्रशांत अवस्थातक पहुँचनेसे पहले व्यक्ति जिन चार अवस्थाओंसे गुजरताहै, उनके बारेमें पतंजलि बातकरतेहैं। इनमेंसे हर अवस्थामें मानसिक गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और अंतमें लगभग शून्य होजातीहैं। इन अवस्थाओंसे गुजरनेके बाद क्या होता है? 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मस्तिष्कके अध्ययनोंसे यह पुष्टि हुई है कि ध्यान करतेसमय मस्तिष्ककी गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और गतिविधि केवल अत्यंत सीमित क्षेत्रोंमें केंद्रित रहजाती है। सामान्य अस्त-व्यस्त गतिविधियाँ लगभग पूरीतरह समाप्त होजातीहैं। लेकिन उस अवस्थासे भी आगे जानेके बाद क्या होता है, इस बारेमें तंत्रिका-विज्ञान कोई अनुमान लगानेका प्रयास नहीं करता। ये सभी बातें इस बातकी पुष्टि करतीहैं कि इन अभ्यासोंका एक निश्चित प्रभाव होता है। लेकिन क्या ये प्रभाव पूरीतरह शारीरिक हैं, या इनमें कोई पारलौकिक आयाम भी है? विज्ञान केवल भौतिकताकी सीमातक सीमित है और उससे आगे जानेका साहस नहीं करता। सभी प्राचीन ग्रंथ इस बातकी पुष्टि करतेहैं कि यह केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं है। वे ध्यानसे प्राप्त होनेवाली ऐसी विभिन्न उपलब्धियोंका उल्लेख करतेहैं, जिन्हें केवल भौतिक नियमोंसे समझाया नहीं जासकता। उदाहरणके लिए, इंद्रियोंकी सीमासे परे बोध करनेकी क्षमता; अतीत और भविष्यमें झाँकनेकी क्षमता; दूसरोंके मनको पढ़नेकी क्षमता; बिना किसी प्रत्यक्ष संचारके दूसरे लोगोंके मनपर प्रभाव डालनेकी क्षमता; पूर्वजन्मोंकी स्मृतियाँ और भी बहुतकुछ। तंत्रिका-विज्ञान आमतौरपर इन बातोंके प्रति संदेहवादी रुख अपनाता है और इनके बारेमें निर्विवाद प्रमाण माँगता है। लेकिन यह सच है कि अनेक गंभीर साधक ऐसी क्षमताओंका प्रदर्शन करतेहैं। यह कट्टर संदेहवादियोंको भी चकित करदेता है। मैंने ध्यानके प्रति एक खुले मनका रुख अपनाया है, भले ही मुझे विश्वास है कि ऐसी क्षमताएँ संभव हैं। इन क्षमताओंकी सच्चाई चाहे जो भी हो, मेरा मानना है कि ध्यानका एक व्यापक, एकीकरणकारी प्रभाव होता है; यह ऐसा एकीकरण है जो संकीर्ण, अहं-केंद्रित पहचानोंसे परे लेजाता है। यह उपलब्धि निश्चितरूपसे कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। आपको कैसा लगता है? अपने विचार लिखकर बताएँ। फिर मिलेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;जबमैं छोटा बच्चा था, तब मैं नियमित रूपसे एक ऐसा अभ्यास करता था, जिसके बारेमें मुझे ठीक-ठीक पता नहीं था कि वह क्या है। उस अभ्याससे मिली अंतिम अनुभूतिने मुझे उसकी ओर आकर्षित किया और मैं लंबे समयतक उसे करता रहा। बड़ेहोने और कई तरहकी चीज़ोंसे परिचित होनेके बाद ही मुझे समझमें आया कि मैं जो कररहा था, वह ध्यानका एक रूप था और जिस अनुभूतिने मुझे उसकी ओर आकर्षित किया था, वही 'समाधि' कहलाती है। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;आप किसी किताबको पढ़कर या ध्यानका प्रशिक्षण लेकर ध्यान करसकतेहैं। आपको कई तरहके अनुभव भी होसकतेहैं। लेकिन कभी-कभी आपके सामने कुछ सवाल आतेहैं – "क्या यह अनुभव किसी विश्वाससे प्रेरित था, या किसी विशेष अभ्यासका सहज परिणाम था? क्या ऐसा अनुभव उस व्यक्तिको भी होसकताहै, जिसे ध्यानके बारेमें कोई औपचारिक जानकारी नहीं है? क्या ध्यानका अनुभव उन विचारोंका परिणाम है, जिन्हें आपने खुद पैदा करके अपने ऊपर आरोपित करलिया है? या फिर वह इन सब चीज़ोंसे स्वतंत्र है?" और भी बहुतकुछ। अपने बचपनके अनुभवको देखें, तो यह स्पष्ट होजाताहै कि वह किसी भी विश्वास या मानसिक पृष्ठभूमिसे स्वतंत्र था। उस समय मैं पूरीतरह निर्दोष था, पूर्वाग्रहोंसे मुक्त था और ध्यानके बारेमें पूरीतरह अनजान था। इसलिए, किसी व्यक्तिकी मानसिक पृष्ठभूमि चाहे जैसी भी हो, मुझे लगता है कि जो भी व्यक्ति इस अभ्यासको करता है, उसके साथ यह सहजरूपसे घटित होता है। आखिर ध्यान क्या है? आज हमें ध्यानके अनेक रूप दिखाईदेतेहैं। लेकिन यहाँ मैं खुदको केवल उन बातोंतक सीमित रखना चाहता हूँ, जिनका वर्णन उपनिषदों, पतंजलिके योगसूत्रों या बौद्धोंके तिपिटक जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथोंमें किया गया है। ध्यान मनको धीरे-धीरे शांत करतेहुए पूर्ण प्रशांत अवस्थातक पहुँचनेका एक मार्ग है। उस प्रशांतताकी चरम अवस्थामें व्यक्ति जिस अवस्थामें प्रवेश करता है, उसे 'समाधि' कहा जाता है। माण्डूक्य उपनिषद जैसे उपनिषद उस अंतिम अवस्थाका वर्णन इस प्रकार करतेहैं: "यह ऐसी अवस्था है, जिसमें न तो बाहरी घटनाओंका बोध होता है और न ही विचारों और स्वप्नों जैसी आंतरिक मानसिक गतिविधियाँ होतीहैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह चेतनाशून्य, जड़ अवस्था है। वहाँ बोध होता है, लेकिन वह बोध लौकिक जगतके व्यवहारसे परे होता है। वह परम सत्यका बोध है।" बौद्ध तिपिटक भी इसे "मानसिक ध्यानको क्रमशः संकुचित करतेहुए ऐसी अवस्थातक पहुँचनेकी प्रक्रिया बतातेहैं, जिसमें न तो बोध रहता है और न ही अबोध।" पहली नज़रमें यह कुछ विरोधाभासी लगसकताहै। लेकिन वे ऐसी अवस्थाकी बात कररहेहैं, जो लौकिक बोध की सीमासे परे है और जिसे वे 'लोकुत्तर' कहतेहैं। तिपिटक इस यात्रामें आनेवाले कई पड़ावोंकी बात करतेहैं, जिन्हें 'झान' कहा जाता है। पतंजलि भी ऐसी ही एक प्रक्रियाके बारेमें बातकरतेहैं, जिसमें मनको लंबे समयतक एक लक्ष्यपर केंद्रित किया जाता है। अंतिम समाधि या पूर्ण प्रशांत अवस्थातक पहुँचनेसे पहले व्यक्ति जिन चार अवस्थाओंसे गुजरताहै, उनके बारेमें पतंजलि बातकरतेहैं। इनमेंसे हर अवस्थामें मानसिक गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और अंतमें लगभग शून्य होजातीहैं। इन अवस्थाओंसे गुजरनेके बाद क्या होता है? उपनिषद संपूर्ण अस्तित्वके साथ एक होजानेके अंतिम साक्षात्कारकी बात करतेहैं। वे कहतेहैं कि जिसे हम सामान्यरूपसे विविधताके रूपमें देखतेहैं, वह मनकी रचना है और वास्तवमें केवल एक ही एकीकृत अस्तित्व है। तिपिटक इस अंतिम अवस्थाके बारेमें बात करनेसे बचतेहैं, क्योंकि वह लौकिक जगत और शब्दोंसे परे है। तिपिटकका अंतिम लक्ष्य उन मानसिक खेलोंसे बाहर निकलना है, जो हमें सत्यके बारेमें एक गलत धारणा देतेहैं। पतंजलि भी मानसिक गतिविधियोंसे पैदा होनेवाले भ्रमसे मुक्त होनेके बारेमें बातकरतेहैं। यह मुक्ति व्यक्तिको चीज़ोंको वैसा ही देखनेमें सक्षम बनाती है, जैसी वे वास्तवमें हैं। ये सभी बातें एक महत्वपूर्ण अवधारणाके साथ पूरीतरह मेल खातीहैं: "विविधताका बोध मनकी रचना है और जब मन पूरीतरह शांत होजाता है, तब एक एकीकृत दृष्टिकोण उभरकर सामने आता है।" ध्यानकी इस प्रक्रियाऔर इसकी अंतिम अवस्थाके बारेमें विज्ञान क्या कहता है? क्या यह पूरीतरह मस्तिष्ककी एक घटना है? क्या आप ध्यानके माध्यमसे अपने मस्तिष्कको ऐसी अवस्थातक पहुँचा रहेहैं, जहाँ वह पूरीतरह अलग तरीकेसे काम करना शुरूकरदेता है? इस तरहका कोई निष्कर्ष निकालनेसे पहले, आइए समझें कि ध्यानकी विभिन्न अवस्थाओंमें वास्तवमें क्या होता है। बौद्ध ध्यान-पद्धतियाँ ध्यान शुरूकरनेसे पहले ही आचरणके कठोर नियम लागू करतीहैं। इसे अष्टांग मार्ग कहा जाता है; सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक प्रयास, सम्यक एकाग्रता और सम्यक समाधि। इनमेंसे पहले छह नियम व्यक्तिको आगेकी यात्राके लिए मानसिकरूपसे तैयार करतेहैं। पतंजलि के यम और नियमके दस अंग, अधिकांशतः इन छह नियमोंके साथ मेल खातेहैं। तंत्रिका-विज्ञानकी भाषामें, ये छह नियम अनियंत्रित मस्तिष्कमें होनेवाली न्यूरॉनोंकी अत्यधिक हलचल या मस्तिष्ककी गतिविधियोंमें होनेवाले लगातार उछालको कम करनेमें मदद करतेहैं। आमतौरपर इसे ध्यानका मुख्य लाभ माना जाता है, अर्थात तनावसे मुक्ति। लेकिन पूरीतरह शांत मनकी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेके लिए केवल इतना पर्याप्त नहीं है। उस अवस्थातक पहुँचनेके लिए ध्यानको लगातार संकुचित करनेकी क्षमता होनीचाहिए। बौद्ध इसे प्राप्तकरनेमें मददके लिए 'कायसति' और 'आनापानसति' जैसी साधनाओंका सुझाव देतेहैं। इन तकनीकोंका उपयोग करके व्यक्ति चुनेहुए लक्ष्यपर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करनेकी क्षमता प्राप्त करसकताहै। पतंजलि इसी क्षमताको प्राप्तकरनेके लिए 'प्राणायाम' के बारेमें बातकरतेहैं। तंत्रिका-विज्ञानकी भाषामें, यह मस्तिष्कके मध्यभागमें ध्यानसे संबंधित संरचनाओं, अर्थात 'थैलेमिक सर्किटों', को प्रशिक्षित करनेकी प्रक्रिया है। जब इन सर्किटोंको उचित प्रशिक्षण मिलजाता है, तो वे बिना किसी व्यवधानके अपना ध्यान एक ही लक्ष्यपर केंद्रित करनेमें सक्षम होजातेहैं। जैसे-जैसे व्यक्ति ध्यानमें आगे बढ़ता है, वह धीरे-धीरे अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण करता जाता है। यह उसे बौद्धोंद्वारा बताएगए प्रारंभिक 'झानों' की अवस्थाओंसे और पतंजलि द्वारा बताएगए 'संप्रज्ञात समाधि' की विभिन्न अवस्थाओंसे होकर लेजाता है। इन अवस्थाओंमें मानसिक गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और अंतमें ऐसी अवस्थातक पहुँचतीहैं, जो स्वयं मनके दायरेसे भी परे है। हमारे किसी भी ग्रंथमें उस अवस्थाका स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता, क्योंकि लौकिक बोधके संदर्भमें इस्तेमाल होनेवाली हमारी शब्दावली उस अलौकिक अवस्थाका वर्णन करनेके लिए पर्याप्त नहीं है। इस बारेमें तंत्रिका-विज्ञान क्या कहता है? मस्तिष्कके अध्ययनोंसे यह पुष्टि हुई है कि ध्यान करतेसमय मस्तिष्ककी गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होतीजातीहैं और गतिविधि केवल अत्यंत सीमित क्षेत्रोंमें केंद्रित रहजाती है। सामान्य अस्त-व्यस्त गतिविधियाँ लगभग पूरीतरह समाप्त होजातीहैं। लेकिन उस अवस्थासे भी आगे जानेके बाद क्या होता है, इस बारेमें तंत्रिका-विज्ञान कोई अनुमान लगानेका प्रयास नहीं करता। ये सभी बातें इस बातकी पुष्टि करतीहैं कि इन अभ्यासोंका एक निश्चित प्रभाव होता है। लेकिन क्या ये प्रभाव पूरीतरह शारीरिक हैं, या इनमें कोई पारलौकिक आयाम भी है? विज्ञान केवल भौतिकताकी सीमातक सीमित है और उससे आगे जानेका साहस नहीं करता। सभी प्राचीन ग्रंथ इस बातकी पुष्टि करतेहैं कि यह केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं है। वे ध्यानसे प्राप्त होनेवाली ऐसी विभिन्न उपलब्धियोंका उल्लेख करतेहैं, जिन्हें केवल भौतिक नियमोंसे समझाया नहीं जासकता। उदाहरणके लिए, इंद्रियोंकी सीमासे परे बोध करनेकी क्षमता; अतीत और भविष्यमें झाँकनेकी क्षमता; दूसरोंके मनको पढ़नेकी क्षमता; बिना किसी प्रत्यक्ष संचारके दूसरे लोगोंके मनपर प्रभाव डालनेकी क्षमता; पूर्वजन्मोंकी स्मृतियाँ और भी बहुतकुछ। तंत्रिका-विज्ञान आमतौरपर इन बातोंके प्रति संदेहवादी रुख अपनाता है और इनके बारेमें निर्विवाद प्रमाण माँगता है। लेकिन यह सच है कि अनेक गंभीर साधक ऐसी क्षमताओंका प्रदर्शन करतेहैं। यह कट्टर संदेहवादियोंको भी चकित करदेता है। मैंने ध्यानके प्रति एक खुले मनका रुख अपनाया है, भले ही मुझे विश्वास है कि ऐसी क्षमताएँ संभव हैं। इन क्षमताओंकी सच्चाई चाहे जो भी हो, मेरा मानना है कि ध्यानका एक व्यापक, एकीकरणकारी प्रभाव होता है; यह ऐसा एकीकरण है जो संकीर्ण, अहं-केंद्रित पहचानोंसे परे लेजाता है। यह उपलब्धि निश्चितरूपसे कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। आपको कैसा लगता है? 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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पुनर्जन्म पूर्व की अधिकांश धर्म-परंपराओं में एक दृढ़ विश्वास है। आज दुनिया के प्रमुख धर्मों, ईसाई धर्म और इस्लाम, में पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं किया जाता। लेकिन यह कहना शायद सही होगा कि प्राचीन संसार में लगभग सभी धर्म पुनर्जन्म को व्यापक रूप से स्वीकार करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनर्जन्म के बारे में स्वयं मृत्यु के अधिपति से अधिक अधिकार के साथ और कौन बोल सकता है? एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ, कठोपनिषद् में, स्वयं मृत्यु के अधिपति इस विषय पर विस्तार से बोलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का मेरा व्याख्यान इसी उपनिषद् पर आधारित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद् कहता है कि जब आप सुखभोग में पूरी तरह लीन हो जाते हैं, तब आपके किसी ऐसी जाल में फँस जाने की संभावना रहती है जिससे बचना आसान नहीं होता। हर समय अपनेआपको उससे बचा पाना संभव नहीं होता। आप अनियंत्रित सुखभोग के भँवर में फँसकर पूरी तरह अपना रास्ता भटक सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कोई रास्ता भटक भी गया तो क्या हुआ? अपनी गलतियों को सुधारने के लिए एक और जन्म तो मिलेगा ही!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से, बात इतनी सरल नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आप फिर से मनुष्य के रूप में ही जन्म लेंगे। उदाहरण के लिए, अगर आपका पुनर्जन्म किसी पशु, कीड़े या पौधे के रूप में हुआ, तो उस जन्म में अपनी गलतियों को सुधारने के लिए आपके पास पर्याप्त बौद्धिक परिपक्वता शायद न हो। ऐसे रूपों में आपका जीवन केवल सहज प्रवृत्तियों से संचालित होता है। ये प्रवृत्तियाँ आपके जीवित रहने को तो सुनिश्चित करती हैं, लेकिन आपके आगे के विकास को नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या कोई इससे भी उच्चतर जीव के रूप में पुनर्जन्म नहीं ले सकता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह भी संभव है। आपके संचित कर्म के आधार पर आपका पुनर्जन्म पितृलोक के किसी जीव के रूप में, स्वर्गलोक की किसी देवता के रूप में, या ब्रह्मलोक के पूरी तरह विकसित जीव के रूप में भी हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उपनिषद् यहाँ कुछ बहुत रोचक बातें कहता है। वह कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि आपका जन्म पितृलोक में होता है, तो आपको परम सत्य की केवल एक अस्पष्ट झलक मिलती है। यह वैसा ही है जैसे आप सपने में कुछ देख रहे हों। इसका कारण यह है कि इन मृत जीवों का अपने पिछले जीवन के प्रति इतना गहरा लगाव होता है कि वे अपनेआपको पूरी तरह मुक्त नहीं कर पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि आपका जन्म देवता के रूप में भी होता है, तो परम सत्य का आपका दर्शन पानी में अपने प्रतिबिंब को देखने जैसा होता है। आपको उसकी एक झलक तो मिलती है। लेकिन पानी की अशुद्धियों और उसमें उठने वाली तरंगों के कारण उस प्रतिबिंब में स्पष्टता नहीं होती। इसका कारण यह है कि देवताओं का झुकाव सामान्यतः इंद्रियसुखों की ओर अधिक होता है और उनमें आत्मसंयम का अभाव होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौभाग्य से, यदि आपका जन्म ब्रह्मलोक में पूरी तरह विकसित जीव के रूप में हुआ है, तो आप निश्चित रूप से परम सत्य का सबसे स्पष्ट दर्शन प्राप्त कर सकते हैं, उतना ही स्पष्ट जितना प्रकाश और छाया को देखना। लेकिन एक ही क्षण में कितने लोग उस स्तर तक पहुँच सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल मनुष्य के रूप में रहते हुए ही आप परम सत्य को अपनी ही बुद्धि में प्रतिबिंबित होते हुए देख सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे आप आईने में अपना प्रतिबिंब देखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;यथा आदर्शे तथा आत्मनि,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यथा स्वप्ने तथा पितृलोके,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यथा अप्सु परि इव ददृशे तथा गन्धर्वलोके,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छाया आतपयोः इव ब्रह्मलोके।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;— कठोपनिषद् 2.3.5.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आप इसी जीवन में इसे प्राप्त कर सकते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई धर्म आपको यह भरोसा देते हैं कि मरने के बाद आपको एक बेहतर जीवन मिलेगा। लेकिन यह उपनिषद् कहता है कि इसी जीवन में परम सत्य का साक्षात्कार करना संभव है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि उपनिषद् कहता है कि ऐसा काम, जो न तो पितृ कर सकते हैं और न ही देवता, वह आप, और केवल आप, मनुष्य के रूप में जन्म लेने पर कर सकते हैं। इसलिए वह आपको सलाह देता है कि इस महान अवसर को हाथ से न जाने दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कहता है कि परम सत्य आपकी अपनी बुद्धि में प्रतिबिंबित हो सकता है; आप उसे ऐसे देख सकते हैं जैसे आईने में देख रहे हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब ऐसा होता है, तब आप किसी नई चीज में परिवर्तित नहीं होते। इसके बजाय, आप केवल उस झूठे परदे को हटा देते हैं जो वास्तविकता को ढँके हुए है। वह परदा हट जाने के बाद वास्तविकता अपनेआप प्रकट हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आप आईने के सामने खड़े होते हैं, तब आप अपनेआपको वैसे ही देखते हैं जैसे आप वास्तव में हैं। अपनेआपको देखने का इससे सरल कोई दूसरा तरीका नहीं है। जो आप देखते हैं, वह वास्तव में आप स्वयं नहीं भी हो सकता; लेकिन वह आपका सबसे निकट का प्रतिबिंब है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, क्या आपने एक बात पर ध्यान दिया है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईने में अपना प्रतिबिंब देखने के लिए आईना बिना किसी दाग या गंदगी के पूरी तरह साफ होना चाहिए। गंदा आईना आपको केवल अपना विकृत प्रतिबिंब ही दिखा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए आपका पहला कदम आईने को साफ करना है। और आपको उसे हमेशा साफ बनाए रखना है। यही योग या ध्यान की प्रक्रिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप, जो मनुष्य के रूप में जन्मे हैं, आपको अब एक महान अवसर मिला है। इसे हाथ से न जाने दें। आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रयास करें। जैसा कि प्रसिद्ध संत पुरंदर दास ने कहा है, "मानव जन्म बहुत बड़ा अवसर है। इसे व्यर्थ मत गँवाओ, हे मूर्खो!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विषय के बारे में आप क्या सोचते हैं? अपने विचार ज़रूर लिखें और हमें बताएं। फिर मिलेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://doctor-king-online.blogspot.com/2018/10/how-to-subscribe-to-my-blogcast.html"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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दुनिया का अनुभव करते हुए, और वह भी एक अच्छी, अनुशासित जीवन-पद्धति के साथ, जीवन जीता रह सकता है। फिर परम सत्य के साक्षात्कार और मुक्ति की चिंता क्यों करनी चाहिए? हाँ, कम से कम सिद्धांत के स्तर पर यह संभव है। लेकिन क्या वास्तव में सबकुछ इसी तरह होता है? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;पुनर्जन्म पूर्व की अधिकांश धर्म-परंपराओं में एक दृढ़ विश्वास है। आज दुनिया के प्रमुख धर्मों, ईसाई धर्म और इस्लाम, में पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं किया जाता। लेकिन यह कहना शायद सही होगा कि प्राचीन संसार में लगभग सभी धर्म पुनर्जन्म को व्यापक रूप से स्वीकार करते थे। पुनर्जन्म के बारे में स्वयं मृत्यु के अधिपति से अधिक अधिकार के साथ और कौन बोल सकता है? एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ, कठोपनिषद् में, स्वयं मृत्यु के अधिपति इस विषय पर विस्तार से बोलते हैं। आज का मेरा व्याख्यान इसी उपनिषद् पर आधारित है। उपनिषद् कहता है कि जब आप सुखभोग में पूरी तरह लीन हो जाते हैं, तब आपके किसी ऐसी जाल में फँस जाने की संभावना रहती है जिससे बचना आसान नहीं होता। हर समय अपनेआपको उससे बचा पाना संभव नहीं होता। आप अनियंत्रित सुखभोग के भँवर में फँसकर पूरी तरह अपना रास्ता भटक सकते हैं। अगर कोई रास्ता भटक भी गया तो क्या हुआ? अपनी गलतियों को सुधारने के लिए एक और जन्म तो मिलेगा ही! दुर्भाग्य से, बात इतनी सरल नहीं है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आप फिर से मनुष्य के रूप में ही जन्म लेंगे। उदाहरण के लिए, अगर आपका पुनर्जन्म किसी पशु, कीड़े या पौधे के रूप में हुआ, तो उस जन्म में अपनी गलतियों को सुधारने के लिए आपके पास पर्याप्त बौद्धिक परिपक्वता शायद न हो। ऐसे रूपों में आपका जीवन केवल सहज प्रवृत्तियों से संचालित होता है। ये प्रवृत्तियाँ आपके जीवित रहने को तो सुनिश्चित करती हैं, लेकिन आपके आगे के विकास को नहीं। क्या कोई इससे भी उच्चतर जीव के रूप में पुनर्जन्म नहीं ले सकता? वह भी संभव है। आपके संचित कर्म के आधार पर आपका पुनर्जन्म पितृलोक के किसी जीव के रूप में, स्वर्गलोक की किसी देवता के रूप में, या ब्रह्मलोक के पूरी तरह विकसित जीव के रूप में भी हो सकता है। लेकिन उपनिषद् यहाँ कुछ बहुत रोचक बातें कहता है। वह कहता है: यदि आपका जन्म पितृलोक में होता है, तो आपको परम सत्य की केवल एक अस्पष्ट झलक मिलती है। यह वैसा ही है जैसे आप सपने में कुछ देख रहे हों। इसका कारण यह है कि इन मृत जीवों का अपने पिछले जीवन के प्रति इतना गहरा लगाव होता है कि वे अपनेआपको पूरी तरह मुक्त नहीं कर पाते। यदि आपका जन्म देवता के रूप में भी होता है, तो परम सत्य का आपका दर्शन पानी में अपने प्रतिबिंब को देखने जैसा होता है। आपको उसकी एक झलक तो मिलती है। लेकिन पानी की अशुद्धियों और उसमें उठने वाली तरंगों के कारण उस प्रतिबिंब में स्पष्टता नहीं होती। इसका कारण यह है कि देवताओं का झुकाव सामान्यतः इंद्रियसुखों की ओर अधिक होता है और उनमें आत्मसंयम का अभाव होता है। सौभाग्य से, यदि आपका जन्म ब्रह्मलोक में पूरी तरह विकसित जीव के रूप में हुआ है, तो आप निश्चित रूप से परम सत्य का सबसे स्पष्ट दर्शन प्राप्त कर सकते हैं, उतना ही स्पष्ट जितना प्रकाश और छाया को देखना। लेकिन एक ही क्षण में कितने लोग उस स्तर तक पहुँच सकते हैं? केवल मनुष्य के रूप में रहते हुए ही आप परम सत्य को अपनी ही बुद्धि में प्रतिबिंबित होते हुए देख सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे आप आईने में अपना प्रतिबिंब देखते हैं। यथा आदर्शे तथा आत्मनि, यथा स्वप्ने तथा पितृलोके, यथा अप्सु परि इव ददृशे तथा गन्धर्वलोके, छाया आतपयोः इव ब्रह्मलोके। — कठोपनिषद् 2.3.5. आप इसी जीवन में इसे प्राप्त कर सकते हैं! कई धर्म आपको यह भरोसा देते हैं कि मरने के बाद आपको एक बेहतर जीवन मिलेगा। लेकिन यह उपनिषद् कहता है कि इसी जीवन में परम सत्य का साक्षात्कार करना संभव है! दिलचस्प बात यह है कि उपनिषद् कहता है कि ऐसा काम, जो न तो पितृ कर सकते हैं और न ही देवता, वह आप, और केवल आप, मनुष्य के रूप में जन्म लेने पर कर सकते हैं। इसलिए वह आपको सलाह देता है कि इस महान अवसर को हाथ से न जाने दें। वह कहता है कि परम सत्य आपकी अपनी बुद्धि में प्रतिबिंबित हो सकता है; आप उसे ऐसे देख सकते हैं जैसे आईने में देख रहे हों। जब ऐसा होता है, तब आप किसी नई चीज में परिवर्तित नहीं होते। इसके बजाय, आप केवल उस झूठे परदे को हटा देते हैं जो वास्तविकता को ढँके हुए है। वह परदा हट जाने के बाद वास्तविकता अपनेआप प्रकट हो जाती है। जब आप आईने के सामने खड़े होते हैं, तब आप अपनेआपको वैसे ही देखते हैं जैसे आप वास्तव में हैं। अपनेआपको देखने का इससे सरल कोई दूसरा तरीका नहीं है। जो आप देखते हैं, वह वास्तव में आप स्वयं नहीं भी हो सकता; लेकिन वह आपका सबसे निकट का प्रतिबिंब है। लेकिन, क्या आपने एक बात पर ध्यान दिया है? आईने में अपना प्रतिबिंब देखने के लिए आईना बिना किसी दाग या गंदगी के पूरी तरह साफ होना चाहिए। गंदा आईना आपको केवल अपना विकृत प्रतिबिंब ही दिखा सकता है। इसलिए आपका पहला कदम आईने को साफ करना है। और आपको उसे हमेशा साफ बनाए रखना है। यही योग या ध्यान की प्रक्रिया है। आप, जो मनुष्य के रूप में जन्मे हैं, आपको अब एक महान अवसर मिला है। इसे हाथ से न जाने दें। आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रयास करें। जैसा कि प्रसिद्ध संत पुरंदर दास ने कहा है, "मानव जन्म बहुत बड़ा अवसर है। इसे व्यर्थ मत गँवाओ, हे मूर्खो!" इस विषय के बारे में आप क्या सोचते हैं? अपने विचार ज़रूर लिखें और हमें बताएं। फिर मिलेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp; पिछले अंक में हमने चर्चा की थी कि प्राचीन भारतीय सुखभोग के पूरी तरह विरोधी नहीं थे। उनका कहना केवल इतना था कि संयम के साथ सुख का आनंद लेना चाहिए। उन्होंने केवल उस स्वेच्छाचार पर रोक लगाई थी जो व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ समाज के लिए भी परेशानी पैदा कर सकता है। तो क्या एक व्यक्ति एक के बाद एक जन्म लेता हुआ आगे नहीं बढ़ सकता? दुनिया का अनुभव करते हुए, और वह भी एक अच्छी, अनुशासित जीवन-पद्धति के साथ, जीवन जीता रह सकता है। फिर परम सत्य के साक्षात्कार और मुक्ति की चिंता क्यों करनी चाहिए? हाँ, कम से कम सिद्धांत के स्तर पर यह संभव है। लेकिन क्या वास्तव में सबकुछ इसी तरह होता है? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;पुनर्जन्म पूर्व की अधिकांश धर्म-परंपराओं में एक दृढ़ विश्वास है। आज दुनिया के प्रमुख धर्मों, ईसाई धर्म और इस्लाम, में पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं किया जाता। लेकिन यह कहना शायद सही होगा कि प्राचीन संसार में लगभग सभी धर्म पुनर्जन्म को व्यापक रूप से स्वीकार करते थे। पुनर्जन्म के बारे में स्वयं मृत्यु के अधिपति से अधिक अधिकार के साथ और कौन बोल सकता है? एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ, कठोपनिषद् में, स्वयं मृत्यु के अधिपति इस विषय पर विस्तार से बोलते हैं। आज का मेरा व्याख्यान इसी उपनिषद् पर आधारित है। उपनिषद् कहता है कि जब आप सुखभोग में पूरी तरह लीन हो जाते हैं, तब आपके किसी ऐसी जाल में फँस जाने की संभावना रहती है जिससे बचना आसान नहीं होता। हर समय अपनेआपको उससे बचा पाना संभव नहीं होता। आप अनियंत्रित सुखभोग के भँवर में फँसकर पूरी तरह अपना रास्ता भटक सकते हैं। अगर कोई रास्ता भटक भी गया तो क्या हुआ? अपनी गलतियों को सुधारने के लिए एक और जन्म तो मिलेगा ही! दुर्भाग्य से, बात इतनी सरल नहीं है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आप फिर से मनुष्य के रूप में ही जन्म लेंगे। उदाहरण के लिए, अगर आपका पुनर्जन्म किसी पशु, कीड़े या पौधे के रूप में हुआ, तो उस जन्म में अपनी गलतियों को सुधारने के लिए आपके पास पर्याप्त बौद्धिक परिपक्वता शायद न हो। ऐसे रूपों में आपका जीवन केवल सहज प्रवृत्तियों से संचालित होता है। ये प्रवृत्तियाँ आपके जीवित रहने को तो सुनिश्चित करती हैं, लेकिन आपके आगे के विकास को नहीं। क्या कोई इससे भी उच्चतर जीव के रूप में पुनर्जन्म नहीं ले सकता? वह भी संभव है। आपके संचित कर्म के आधार पर आपका पुनर्जन्म पितृलोक के किसी जीव के रूप में, स्वर्गलोक की किसी देवता के रूप में, या ब्रह्मलोक के पूरी तरह विकसित जीव के रूप में भी हो सकता है। लेकिन उपनिषद् यहाँ कुछ बहुत रोचक बातें कहता है। वह कहता है: यदि आपका जन्म पितृलोक में होता है, तो आपको परम सत्य की केवल एक अस्पष्ट झलक मिलती है। यह वैसा ही है जैसे आप सपने में कुछ देख रहे हों। इसका कारण यह है कि इन मृत जीवों का अपने पिछले जीवन के प्रति इतना गहरा लगाव होता है कि वे अपनेआपको पूरी तरह मुक्त नहीं कर पाते। यदि आपका जन्म देवता के रूप में भी होता है, तो परम सत्य का आपका दर्शन पानी में अपने प्रतिबिंब को देखने जैसा होता है। आपको उसकी एक झलक तो मिलती है। लेकिन पानी की अशुद्धियों और उसमें उठने वाली तरंगों के कारण उस प्रतिबिंब में स्पष्टता नहीं होती। इसका कारण यह है कि देवताओं का झुकाव सामान्यतः इंद्रियसुखों की ओर अधिक होता है और उनमें आत्मसंयम का अभाव होता है। सौभाग्य से, यदि आपका जन्म ब्रह्मलोक में पूरी तरह विकसित जीव के रूप में हुआ है, तो आप निश्चित रूप से परम सत्य का सबसे स्पष्ट दर्शन प्राप्त कर सकते हैं, उतना ही स्पष्ट जितना प्रकाश और छाया को देखना। लेकिन एक ही क्षण में कितने लोग उस स्तर तक पहुँच सकते हैं? केवल मनुष्य के रूप में रहते हुए ही आप परम सत्य को अपनी ही बुद्धि में प्रतिबिंबित होते हुए देख सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे आप आईने में अपना प्रतिबिंब देखते हैं। यथा आदर्शे तथा आत्मनि, यथा स्वप्ने तथा पितृलोके, यथा अप्सु परि इव ददृशे तथा गन्धर्वलोके, छाया आतपयोः इव ब्रह्मलोके। — कठोपनिषद् 2.3.5. आप इसी जीवन में इसे प्राप्त कर सकते हैं! कई धर्म आपको यह भरोसा देते हैं कि मरने के बाद आपको एक बेहतर जीवन मिलेगा। लेकिन यह उपनिषद् कहता है कि इसी जीवन में परम सत्य का साक्षात्कार करना संभव है! दिलचस्प बात यह है कि उपनिषद् कहता है कि ऐसा काम, जो न तो पितृ कर सकते हैं और न ही देवता, वह आप, और केवल आप, मनुष्य के रूप में जन्म लेने पर कर सकते हैं। इसलिए वह आपको सलाह देता है कि इस महान अवसर को हाथ से न जाने दें। वह कहता है कि परम सत्य आपकी अपनी बुद्धि में प्रतिबिंबित हो सकता है; आप उसे ऐसे देख सकते हैं जैसे आईने में देख रहे हों। जब ऐसा होता है, तब आप किसी नई चीज में परिवर्तित नहीं होते। इसके बजाय, आप केवल उस झूठे परदे को हटा देते हैं जो वास्तविकता को ढँके हुए है। वह परदा हट जाने के बाद वास्तविकता अपनेआप प्रकट हो जाती है। जब आप आईने के सामने खड़े होते हैं, तब आप अपनेआपको वैसे ही देखते हैं जैसे आप वास्तव में हैं। अपनेआपको देखने का इससे सरल कोई दूसरा तरीका नहीं है। जो आप देखते हैं, वह वास्तव में आप स्वयं नहीं भी हो सकता; लेकिन वह आपका सबसे निकट का प्रतिबिंब है। लेकिन, क्या आपने एक बात पर ध्यान दिया है? आईने में अपना प्रतिबिंब देखने के लिए आईना बिना किसी दाग या गंदगी के पूरी तरह साफ होना चाहिए। गंदा आईना आपको केवल अपना विकृत प्रतिबिंब ही दिखा सकता है। इसलिए आपका पहला कदम आईने को साफ करना है। और आपको उसे हमेशा साफ बनाए रखना है। यही योग या ध्यान की प्रक्रिया है। आप, जो मनुष्य के रूप में जन्मे हैं, आपको अब एक महान अवसर मिला है। इसे हाथ से न जाने दें। आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रयास करें। जैसा कि प्रसिद्ध संत पुरंदर दास ने कहा है, "मानव जन्म बहुत बड़ा अवसर है। इसे व्यर्थ मत गँवाओ, हे मूर्खो!" इस विषय के बारे में आप क्या सोचते हैं? अपने विचार ज़रूर लिखें और हमें बताएं। फिर मिलेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#enjoyment, #Hindi, #IndianPhilosophy, #Meditation, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  सुखों का आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है। इसके लिए अपराधबोध मत पालिए।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/08/hindi.html</link><category>#enjoyment</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#peace</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><pubDate>Sat, 8 Aug 2026 10:28:25 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-8490478974636482393</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यदि आप किसी भी धर्म को नहीं मानते, तब भी अत्यधिक भोग के प्रति सावधान रहने में कुछ सच्चाई है। इंद्रिय-सुखों में अत्यधिक डूब जाने के कुछ दुष्परिणाम होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;• कोई भी सुख हमेशा नहीं रहता। आपका शरीर शीघ्र ही उस अवस्था तक पहुँच जाता है, जहाँ वह उससे अधिक आनंद नहीं ले सकता। यदि आप आवश्यकता से अधिक भोजन करते हैं, तो भोजन कितना भी स्वादिष्ट क्यों न हो, आपका शरीर एक सीमा के बाद उसका आनंद नहीं ले पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• कभी-कभी आनंद लेने की इच्छा बनी रहती है, लेकिन आनंद देनेवाली वस्तु ही समाप्त हो चुकी होती है। चूँकि कोई भी भौतिक वस्तु स्थायी नहीं होती, इसलिए ऐसा बार-बार होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• आप जितना अधिक सुख-भोग में लिप्त होते हैं, उतनी ही अधिक उनकी चाह बढ़ती जाती है। ऐसा तब भी हो सकता है, जब शरीर पूरी तरह तृप्त हो चुका हो। उस समय केवल मन ही और अधिक चाहता रहता है। "अब बहुत हुआ। मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ।" ऐसी अनुभूति शायद कभी नहीं आती। यही अंतहीन चाह आपको अशांत बनाती है। आप उस सुख का पीछा करते रहते हैं, लेकिन वह आपसे लगातार दूर होता जाता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इसी संदर्भ में प्राचीन भारतीय ग्रंथ भगवद्गीता एक गहन चित्र प्रस्तुत करती है। वह कहती है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"जब कोई व्यक्ति निरंतर इंद्रिय-विषयों के बारे में सोचता रहता है, तो उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से इच्छा जन्म लेती है। इच्छा पूरी न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मोह पैदा होता है। मोह से भ्रम उत्पन्न होता है। भ्रम से विवेक नष्ट हो जाता है। और विवेक नष्ट होने पर मनुष्य पूरी तरह पतित हो जाता है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।&lt;br /&gt;सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥&lt;br /&gt;क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।&lt;br /&gt;स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;— भगवद्गीता 2.62–63.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• सीमित संसाधनों वाली इस दुनिया में किसी भी संसाधन का अत्यधिक उपयोग अंततः उसे समाप्त कर देता है। परिणामस्वरूप कोई दूसरा व्यक्ति अपने उचित हिस्से से वंचित हो सकता है। अंततः इससे 'जिनके पास है' और 'जिनके पास नहीं है' के बीच की खाई और चौड़ी हो जाती है। ऐसी असमानता सामाजिक अशांति को जन्म दे सकती है। अंत में उसके दुष्परिणाम परोक्ष रूप से आपको भी प्रभावित कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भारतीय धर्मों में, विशेषकर बौद्ध धर्म ने, इस विषय पर बहुत कठोर दृष्टिकोण अपनाया। बुद्ध ने कहा, "सभी इच्छाओं का त्याग कर दो।" क्योंकि "इच्छा ही सभी दुःखों का मूल कारण है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या यह वास्तव में व्यावहारिक है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय ऋषि मनु कहते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"इच्छा के बिना कोई भी व्यक्ति कोई कार्य नहीं कर सकता। मनुष्य की प्रत्येक उपलब्धि के पीछे कोई-न-कोई इच्छा अवश्य होती है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्।&lt;br /&gt;यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत् तत् कामस्य चेष्टितम्॥&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;— मनुस्मृति 2.4.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कितनी सच्ची बात है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि मनुष्यों में कोई इच्छा ही न होती, तो क्या मानवजाति इतनी प्रगति कर पाती?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि इच्छाओं के दुष्परिणाम भी होते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें पूरी तरह त्याग देना चाहिए। ऐसा करना न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर इन दोनों परस्पर-विरोधी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैदिक भारत के लोगों का इस विषय पर अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण था। वे समझते थे कि मानव की सारी प्रगति के पीछे प्रेरक शक्ति इच्छाएँ ही हैं। साथ ही वे उनके अनिवार्य दुष्परिणामों से भी पूरी तरह परिचित थे। वे यह भी स्वीकार करते थे कि इच्छाओं का पूर्ण त्याग करना वास्तव में असंभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्ध ने जो कहा, वह संन्यासियों और विरक्तों के लिए स्वाभाविक हो सकता है। लेकिन संसार में रहने वाले अधिकांश लोगों के लिए वह संभव नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विषय में प्राचीन उपनिषदों का दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक है। वे अत्यधिक भोग और पूर्ण आत्म-निषेध, इन दोनों अतियों के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह यथार्थवादी दृष्टिकोण लगभग सभी उपनिषदों में दिखाई देता है। वे सांसारिक सुखों में पूरी तरह डूब जाने को प्रोत्साहित नहीं करते। साथ ही वे सभी सुखों का पूर्ण त्याग करने की भी शिक्षा नहीं देते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईशावास्य उपनिषद इस संतुलन को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है। वह कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"यह समस्त चराचर जगत् विश्व के स्वामी का है। यह किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। इसलिए स्वामित्व की अत्यधिक भावना मत पालिए। संयम के साथ इसका आनंद लीजिए। किसी दूसरे के उचित हिस्से पर लोभ मत कीजिए।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।&lt;br /&gt;तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;— ईशावास्य उपनिषद् — मंत्र 1.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;लेकिन केवल सुख का आनंद लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसके साथ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए। हमें अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। यदि हम इस प्रकार जीवन जीते हैं, तो सौ वर्ष जीने पर भी सुख हमें बाँध नहीं पाएँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"इसलिए संयम के साथ जीवन के सुखों का आनंद लेते हुए, अपने कर्तव्यों का निरंतर पालन करते हुए, पूर्ण जीवन जीने की आकांक्षा रखिए। इससे बेहतर जीवन-पथ कोई दूसरा नहीं है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा यही उपनिषद कहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;कुर्वन्नेवেহ कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।&lt;br /&gt;एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;— ईशावास्य उपनिषद् — मंत्र 2.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ईशावास्य उपनिषद यजुर्वेद का एक भाग है। वही यजुर्वेद जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए, इस विषय में एक और सुंदर संदेश देता है। वह कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;"समस्त संसार की आँख समान सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा में उदित होता है। उस उदित होते सूर्य को देखते हुए हम सौ वर्ष जिएँ। ऐसा बोलें कि किसी के मन को ठेस न पहुँचे। दूसरों की बात 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भारतीय ऋषि मनु कहते हैं: "इच्छा के बिना कोई भी व्यक्ति कोई कार्य नहीं कर सकता। मनुष्य की प्रत्येक उपलब्धि के पीछे कोई-न-कोई इच्छा अवश्य होती है।" अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्। यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत् तत् कामस्य चेष्टितम्॥ — मनुस्मृति 2.4. कितनी सच्ची बात है! यदि मनुष्यों में कोई इच्छा ही न होती, तो क्या मानवजाति इतनी प्रगति कर पाती? यह सच है कि इच्छाओं के दुष्परिणाम भी होते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें पूरी तरह त्याग देना चाहिए। ऐसा करना न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय। तो फिर इन दोनों परस्पर-विरोधी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? वैदिक भारत के लोगों का इस विषय पर अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण था। वे समझते थे कि मानव की सारी प्रगति के पीछे प्रेरक शक्ति इच्छाएँ ही हैं। साथ ही वे उनके अनिवार्य दुष्परिणामों से भी पूरी तरह परिचित थे। वे यह भी स्वीकार करते थे कि इच्छाओं का पूर्ण त्याग करना वास्तव में असंभव है। बुद्ध ने जो कहा, वह संन्यासियों और विरक्तों के लिए स्वाभाविक हो सकता है। लेकिन संसार में रहने वाले अधिकांश लोगों के लिए वह संभव नहीं है। इस विषय में प्राचीन उपनिषदों का दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक है। वे अत्यधिक भोग और पूर्ण आत्म-निषेध, इन दोनों अतियों के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करते हैं। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण लगभग सभी उपनिषदों में दिखाई देता है। वे सांसारिक सुखों में पूरी तरह डूब जाने को प्रोत्साहित नहीं करते। साथ ही वे सभी सुखों का पूर्ण त्याग करने की भी शिक्षा नहीं देते। ईशावास्य उपनिषद इस संतुलन को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है। वह कहता है: "यह समस्त चराचर जगत् विश्व के स्वामी का है। यह किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। इसलिए स्वामित्व की अत्यधिक भावना मत पालिए। संयम के साथ इसका आनंद लीजिए। किसी दूसरे के उचित हिस्से पर लोभ मत कीजिए।" ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ — ईशावास्य उपनिषद् — मंत्र 1. लेकिन केवल सुख का आनंद लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसके साथ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए। हमें अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। यदि हम इस प्रकार जीवन जीते हैं, तो सौ वर्ष जीने पर भी सुख हमें बाँध नहीं पाएँगे। "इसलिए संयम के साथ जीवन के सुखों का आनंद लेते हुए, अपने कर्तव्यों का निरंतर पालन करते हुए, पूर्ण जीवन जीने की आकांक्षा रखिए। इससे बेहतर जीवन-पथ कोई दूसरा नहीं है।" ऐसा यही उपनिषद कहता है। कुर्वन्नेवেহ कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ — ईशावास्य उपनिषद् — मंत्र 2. ईशावास्य उपनिषद यजुर्वेद का एक भाग है। वही यजुर्वेद जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए, इस विषय में एक और सुंदर संदेश देता है। वह कहता है: "समस्त संसार की आँख समान सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा में उदित होता है। उस उदित होते सूर्य को देखते हुए हम सौ वर्ष जिएँ। ऐसा बोलें कि किसी के मन को ठेस न पहुँचे। दूसरों की बात सुनें। सौ वर्षों तक सम्मानपूर्वक जीवन जिएँ। और यदि संभव हो, तो उससे भी अधिक समय तक जिएँ।" तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतम्। शृणुयाम शरदः शतं, प्रब्रवाम शरदः शतम्। अदीनाः स्याम शरदः शतं, भूयश्च शरदः शतात्॥ — शुक्ल यजुर्वेद, अध्याय 36, मंत्र 24. क्या ही व्यावहारिक और संतुलित जीवन-दर्शन है! इस विषय में आप क्या सोचते हैं, कृपया लिखकर मुझे अवश्य बताइए। मैं आपकी राय जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ। फिर मिलेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; यह बात हममें से बहुत-से लोगों को मधुर संगीत जैसी लग सकती है। वास्तव में, बहुत-से लोग तो ऐसा अपराधबोध महसूस ही नहीं करते। फिर भी अधिकांश धर्म आत्मसंयम की शिक्षा देते हैं। बाइबल यही कहती है। क़ुरआन भी इसी पर ज़ोर देता है। अधिकांश भारतीय धर्म भी भोग में संयम रखने की सलाह देते हैं। तो क्या वे सभी धर्म, जो अत्यधिक भोग के विरुद्ध चेतावनी देते हैं, गलत हैं? 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भारतीय ऋषि मनु कहते हैं: "इच्छा के बिना कोई भी व्यक्ति कोई कार्य नहीं कर सकता। मनुष्य की प्रत्येक उपलब्धि के पीछे कोई-न-कोई इच्छा अवश्य होती है।" अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्। यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत् तत् कामस्य चेष्टितम्॥ — मनुस्मृति 2.4. कितनी सच्ची बात है! यदि मनुष्यों में कोई इच्छा ही न होती, तो क्या मानवजाति इतनी प्रगति कर पाती? यह सच है कि इच्छाओं के दुष्परिणाम भी होते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें पूरी तरह त्याग देना चाहिए। ऐसा करना न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय। तो फिर इन दोनों परस्पर-विरोधी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? वैदिक भारत के लोगों का इस विषय पर अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण था। वे समझते थे कि मानव की सारी प्रगति के पीछे प्रेरक शक्ति इच्छाएँ ही हैं। साथ ही वे उनके अनिवार्य दुष्परिणामों से भी पूरी तरह परिचित थे। वे यह भी स्वीकार करते थे कि इच्छाओं का पूर्ण त्याग करना वास्तव में असंभव है। बुद्ध ने जो कहा, वह संन्यासियों और विरक्तों के लिए स्वाभाविक हो सकता है। लेकिन संसार में रहने वाले अधिकांश लोगों के लिए वह संभव नहीं है। इस विषय में प्राचीन उपनिषदों का दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक है। वे अत्यधिक भोग और पूर्ण आत्म-निषेध, इन दोनों अतियों के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करते हैं। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण लगभग सभी उपनिषदों में दिखाई देता है। वे सांसारिक सुखों में पूरी तरह डूब जाने को प्रोत्साहित नहीं करते। साथ ही वे सभी सुखों का पूर्ण त्याग करने की भी शिक्षा नहीं देते। ईशावास्य उपनिषद इस संतुलन को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है। वह कहता है: "यह समस्त चराचर जगत् विश्व के स्वामी का है। यह किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। इसलिए स्वामित्व की अत्यधिक भावना मत पालिए। संयम के साथ इसका आनंद लीजिए। किसी दूसरे के उचित हिस्से पर लोभ मत कीजिए।" ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ — ईशावास्य उपनिषद् — मंत्र 1. लेकिन केवल सुख का आनंद लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसके साथ उत्तरदायित्व भी होना चाहिए। हमें अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। यदि हम इस प्रकार जीवन जीते हैं, तो सौ वर्ष जीने पर भी सुख हमें बाँध नहीं पाएँगे। "इसलिए संयम के साथ जीवन के सुखों का आनंद लेते हुए, अपने कर्तव्यों का निरंतर पालन करते हुए, पूर्ण जीवन जीने की आकांक्षा रखिए। इससे बेहतर जीवन-पथ कोई दूसरा नहीं है।" ऐसा यही उपनिषद कहता है। कुर्वन्नेवেহ कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ — ईशावास्य उपनिषद् — मंत्र 2. ईशावास्य उपनिषद यजुर्वेद का एक भाग है। वही यजुर्वेद जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए, इस विषय में एक और सुंदर संदेश देता है। वह कहता है: "समस्त संसार की आँख समान सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा में उदित होता है। उस उदित होते सूर्य को देखते हुए हम सौ वर्ष जिएँ। ऐसा बोलें कि किसी के मन को ठेस न पहुँचे। दूसरों की बात सुनें। सौ वर्षों तक सम्मानपूर्वक जीवन जिएँ। और यदि संभव हो, तो उससे भी अधिक समय तक जिएँ।" तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतम्। शृणुयाम शरदः शतं, प्रब्रवाम शरदः शतम्। अदीनाः स्याम शरदः शतं, भूयश्च शरदः शतात्॥ — शुक्ल यजुर्वेद, अध्याय 36, मंत्र 24. क्या ही व्यावहारिक और संतुलित जीवन-दर्शन है! इस विषय में आप क्या सोचते हैं, कृपया लिखकर मुझे अवश्य बताइए। मैं आपकी राय जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ। फिर मिलेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#enjoyment, #Hindi, #IndianPhilosophy, #peace, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  तुरीय प्रज्ञा का वास्तविक चमत्कार</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/07/hindi_01612237114.html</link><category>#advaita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Meditation</category><category>#mystery</category><category>#neuroscience</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><category>#Yoga</category><pubDate>Sat, 1 Aug 2026 06:05:51 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1072229643503407491</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसी उद्देश्य से मैं दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध संत के जीवन का उदाहरण लेना चाहता हूँ। मैं यहाँ किसी पुस्तक या स्तुतिगान का सहारा नहीं ले रहा हूँ। मेरा आधार केवल उन साधारण लोगों के अनुभव हैं, जिन्होंने उनके साथ जीवन बिताया और उन्हें अपनी आँखों से देखा। उन लोगों का कोई स्वार्थ नहीं था और न ही झूठ बोलने का कोई कारण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले यह जानकारी मुझे कुछ वृद्ध महिलाओं से मिली, जो उस संत के जीवनकाल में जीवित थीं। वे नहीं जानती थीं कि वे कौन थे। उन्हें यह भी पता नहीं था कि वे कहाँ से आए थे। वह संत दक्षिण भारत के तटीय गाँवों में पूर्णतः दिगम्बर होकर विचरण करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे लगभग किसी से बात नहीं करते थे, इसलिए उपदेश देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। उन्होंने कभी किसी से भोजन भी नहीं माँगा। कभी-कभी लोग उन्हें कूड़ेदान में फेंका हुआ भोजन खाते हुए देखते थे। इसलिए लगभग सभी लोग उन्हें पागल समझते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली के बच्चे उनका मज़ाक उड़ाते थे। यहाँ तक कि उन पर पत्थर भी फेंकते थे। लेकिन वे कभी प्रतिक्रिया नहीं देते थे। कभी-कभी उन शरारती बच्चों से बचने के लिए वे ऊँचे पेड़ों पर चढ़कर बैठ जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार वर्षों तक गाँव-गाँव भटकने के बाद वे अंततः आज के महानगर मुंबई के निकट एक जंगल में स्थित एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर में रहने लगे। वहाँ के आदिवासी उनकी देखभाल करने लगे और उन्होंने उनके लिए एक छोटी-सी कुटिया भी बना दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अपना अधिकांश समय उसी कुटिया में ध्यानमग्न बैठे हुए बिताते थे, मानो उन्हें बाहरी संसार का कोई बोध ही न हो। बहुत कम अवसरों पर ही वे किसी से बात करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन धीरे-धीरे लोग उनकी ओर आकर्षित होने लगे। उनकी ख्याति फैलने लगी। लोग उन्हें भगवान और दिव्य पुरुष कहने लगे। इस प्रकार गणेशपुरी के भगवान नित्यानन्द के रूप में वे प्रसिद्ध हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी समय कृष्ण नाम का एक युवा ब्राह्मण लड़का अपना गाँव छोड़कर वहाँ आ पहुँचा। वह इस झूठे आरोप से बचने के लिए भाग आया था कि उसने अपने गाँव के धनी व्यक्ति के मंदिर में स्थापित देवता के आभूषण चुरा लिए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे भगवान नित्यानन्द के आश्रम में शरण मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कृष्ण के मन में नित्यानन्द के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं था। वास्तवमें, जब वर्षों पहले नित्यानन्द दिगम्बर होकर उसके गाँव में घूमते थे, तब सम्भव है कि उन पर पत्थर फेंकने वाले शरारती लड़कों में कृष्ण भी शामिल रहा हो। लेकिन अब वह असहाय था। उसके पास जाने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं था। उसे केवल उन लोगों से बचने के लिए एक सुरक्षित आश्रय चाहिए था जो उसकी तलाश कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई दशक बाद मेरी भेंट उसी कृष्ण से हुई। तब तक वे मुझसे काफी बड़े हो चुके थे। वे मंदिर के पुजारी बन चुके थे—कृष्ण आचार्य। उन्होंने मुझे नित्यानन्द के जीवन की अनेक रोचक घटनाएँ सुनाईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में कृष्ण को लगता था कि नित्यानन्द एक पागल के अलावा कुछ भी नहीं हैं। जब भी वे आदिवासियों को उन्हें भगवान कहते सुनते, तो हँस पड़ते थे। लेकिन जिज्ञासावश उन्होंने इस "पागल" की हर गतिविधि पर ध्यान देना शुरू किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण आचार्य के अनुसार नित्यानन्द लगभग हर समय गहरे समाधि जैसे अवस्था में रहते थे। वे केवल बहुत ही दुर्लभ अवसरों पर बोलते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि वे केवल तब पागलों जैसा व्यवहार करते थे, जब जुआरी अपनी बाज़ियों के बारे में सलाह लेने आते थे। वे उन पर चिल्लाते, उन्हें डाँटते और जो भी वस्तु हाथ लगती, उसे उनकी ओर फेंककर उन्हें भगाने की कोशिश करते। लेकिन कोई भी इसे गंभीरता से नहीं लेता था। लोग उनके प्रत्येक शब्द और उनकी प्रत्येक उँगली की हरकत को जीतने वाले अंकों का संकेत मानते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस "पागल" की दिनचर्या कैसी थी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िर एक पागल को भी भोजन करना पड़ता है। उसे भी प्रकृति की पुकार का उत्तर देना पड़ता है। क्या नित्यानन्द इसके अपवाद थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण इन सब बातों का अत्यंत ध्यानपूर्वक निरीक्षण करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण के अनुसार नित्यानन्द प्रातः बहुत जल्दी उठते और अपनी कुटिया से बाहर निकलते। प्रकृति की पुकार पूरी करने के बाद वे पास के तालाब में गर्दन तक पानी में खड़े रहते। ऐसा भी नहीं लगता था कि वे अपने शरीर को ठीक से साफ़ करने का कोई प्रयास कर रहे हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात ने कृष्ण को विशेष रूपसे प्रभावित किया। चाहे उठना हो, चलना हो, तालाब में स्नान करना हो, वापस कुटिया में लौटना हो या कोई भी अन्य कार्य—नित्यानन्द सबकुछ ऐसे करते थे जैसे कोई नींद में चल रहा हो। उनमें किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत आग्रह दिखाई नहीं देता था। सबकुछ पूर्ण शांति और लगभग यांत्रिक सटीकता के साथ होता था। ऐसा लगता था मानो उनका शरीर अपने-आप कार्य कर रहा हो, जबकि उनकी प्रज्ञा कहीं और स्थित हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब गाँव वाले उनके सामने भोजन रख देते, तो वे कभी-कभी जो सामने होता वही खा लेते। यहाँ तक कि फलों को बिना छीले ही खा लेते थे। स्वाद, पसंद-नापसंद या सामाजिक शिष्टाचार—इनमें से किसी भी बात की उन्हें कोई परवाह नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो उनमें "मैं" कहने वाला, किसी वस्तु को पसंद या नापसंद करने वाला व्यक्तिगत अहंकार ही शेष न रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सब देखकर कृष्ण पूरी तरह उलझ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"क्या यह व्यक्ति सचमुच पागल है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बार-बार स्वयं से यही प्रश्न पूछते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बीतता गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक कृष्ण वहाँ के जीवन में पूरी तरह रच-बस चुके थे। वे सड़क के किनारे हिंदू देवी-देवताओं के चित्र रखकर बैठते थे। गाँव के लोग उन्हें विशेष पूजाएँ करवाने के लिए पैसे देते थे। इसी प्रकार उनका जीवन चल रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक दिन कृष्ण एक स्थानीय गुंडे द्वारा किए गए अपराध के प्रत्यक्षदर्शी बन गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िरकार पुलिस ने उस अपराधी को गिरफ्तार करलिया और कृष्ण को न्यायालय में गवाही देने के लिए बुलाया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कृष्ण बहुत बड़ी कठिनाई में पड़ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि वे न्यायालय जाते, तो उस गुंडे के लोग उनकी हत्या करसकतेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि वे नहीं जाते, तो पुलिस उन्हें बलपूर्वक वहाँ लेजाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें समझमें नहीं आ रहा था कि क्या करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः आँखों में आँसू भरकर उन्होंने नित्यानन्द के सामने अपनी पूरी परिस्थिति बताई। कृष्ण स्वयं कभी एक भगोड़े के रूपमें वहाँ पहुँचे थे। वहाँ उनका कोई अपना नहीं था। और उन्हें यह आशा भी नहीं थी कि सदैव समाधि में लीन रहने वाले नित्यानन्द उनकी सहायता करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आश्चर्य की बात यह हुई कि नित्यानन्द ने उनकी सहायता की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कुछ क्षणों के लिए अपनी आँखें खोलीं और मानो नींद में बोल रहे हों, ऐसे कुछ शब्द कहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे मूर्ख! अपने गाँव लौट जा। कोई भी तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। तेरे गाँव के लोग तुझे खोज रहे हैं। वे बहुत जल्द यहाँ पहुँचने वाले हैं।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुनकर कृष्ण और भी अधिक चिंतित हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें विश्वास था कि उनके गाँव से इतनी दूर इस जंगल में कोई उन्हें कभी खोज नहीं पाएगा। लेकिन यदि इस "पागल" की बात सच थी, तो इसका अर्थ था कि न केवल उन्होंने उन्हें खोज लिया था, बल्कि वे उन्हें वापस ले जाने के लिए रास्ते में भी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद उस रात कृष्ण को बिल्कुल भी नींद नहीं आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन ठीक वैसा ही हुआ जैसा नित्यानन्द ने कहा था। कृष्ण के गाँव का एक व्यक्ति उन्हें खोजता हुआ वहाँ पहुँचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अपने साथ एक सुखद समाचार लेकर आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब गाँव के लोगों को पता चल चुका था कि कृष्ण निर्दोष हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और एक दूसरी अच्छी खबर भी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे चाहते थे कि कृष्ण ही उनके नव-जीर्णोद्धारित मंदिर के पुजारी बनें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण ने नित्यानन्द के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे उनके चरणों में गिर पड़े और उन्हें गलत समझने के लिए क्षमा माँगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत वर्षों बाद जब मैं उसी कृष्ण से उनके गाँव के मंदिर में पुजारी के रूपमें मिला, तब वे मुझे नित्यानन्द के साथ अपने अनुभव सुना रहे थे। बोलते समय उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे पूरी तरह बदल चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके मन में नित्यानन्द के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न हो चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी संकल्प किया था कि वे भी अपने गुरु की तरह ईमानदार, निस्वार्थ और पूर्णतः अनासक्त जीवन जीएँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने पूरे जीवनभर कृष्ण आचार्य ने अत्यंत ईमानदार और सरल जीवन जिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने अनेक ऐसे निर्धन लड़कों की भी सहायता की, जो उनकी ही तरह घर छोड़कर भाग आए थे और छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन चला रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज यदि आप YouTube पर खोजेंगे, तो आपको भगवान नित्यानन्द के चमत्कारों और अलौकिक शक्तियों के बारे में असंख्य वीडियो मिल जाएँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वही वास्तविक चमत्कार नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तविक चमत्कार तो यह है कि ऐसे महात्मा अपने संपर्क में आने वाले लोगों का जीवन किस प्रकार बदल देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना कुछ कहे…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना कोई उपदेश दिए…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना किसी प्रकार का जादू किए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह सब इस बात का पर्याप्त संकेत नहीं है कि जिस अवस्था में वे जी रहे थे, वह केवल कोई मनोवैज्ञानिक स्थिति नहीं थी, या फिर प्रसिद्ध अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी वी. एस. रामचन्द्रन द्वारा प्रस्तावित तथाकथित "टेम्पोरल लोब एपिलेप्सी" मात्र नहीं थी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद हमें अपना मन इतना खुला रखना चाहिए कि हम इससे भी बेहतर व्याख्याओं की खोज करसकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपकी दृष्टि में नित्यानन्द वास्तवमें कौन थे? एक पागल? या वह सच्चे योगी जिन्होंने प्रज्ञा की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करलीथी? आप क्या सोचते हैं? अपनी राय हमें अवश्य बताइए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले एपिसोड में फिर मुलाक़ात होगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://doctor-king-online.blogspot.com/2018/10/how-to-subscribe-to-my-blogcast.html"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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या यह केवल प्राचीन मनोविज्ञान की एक काल्पनिक कहानी है?" आज मैं आपके सामने यह तर्क रखना चाहता हूँ कि तुरीय की यह अवस्था केवल कल्पना नहीं है। संभव है कि हम इसे वैज्ञानिक रूपसे सिद्ध न करसकें। लेकिन हम उन लोगों के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं का अध्ययन अवश्य करसकतेहैं, जिन्होंने इस अवस्था में जीवन बिताया। ऐसे लोग जो सदियों पहले नहीं, बल्कि कुछ ही दशक पहले हमारे बीच रहे। और जिनके जीवन की घटनाएँ बिना किसी अतिशयोक्ति या महिमामंडन के दर्ज की गई हैं। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;इसी उद्देश्य से मैं दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध संत के जीवन का उदाहरण लेना चाहता हूँ। मैं यहाँ किसी पुस्तक या स्तुतिगान का सहारा नहीं ले रहा हूँ। मेरा आधार केवल उन साधारण लोगों के अनुभव हैं, जिन्होंने उनके साथ जीवन बिताया और उन्हें अपनी आँखों से देखा। उन लोगों का कोई स्वार्थ नहीं था और न ही झूठ बोलने का कोई कारण। सबसे पहले यह जानकारी मुझे कुछ वृद्ध महिलाओं से मिली, जो उस संत के जीवनकाल में जीवित थीं। वे नहीं जानती थीं कि वे कौन थे। उन्हें यह भी पता नहीं था कि वे कहाँ से आए थे। वह संत दक्षिण भारत के तटीय गाँवों में पूर्णतः दिगम्बर होकर विचरण करते थे। वे लगभग किसी से बात नहीं करते थे, इसलिए उपदेश देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। उन्होंने कभी किसी से भोजन भी नहीं माँगा। कभी-कभी लोग उन्हें कूड़ेदान में फेंका हुआ भोजन खाते हुए देखते थे। इसलिए लगभग सभी लोग उन्हें पागल समझते थे। गली के बच्चे उनका मज़ाक उड़ाते थे। यहाँ तक कि उन पर पत्थर भी फेंकते थे। लेकिन वे कभी प्रतिक्रिया नहीं देते थे। कभी-कभी उन शरारती बच्चों से बचने के लिए वे ऊँचे पेड़ों पर चढ़कर बैठ जाते थे। इस प्रकार वर्षों तक गाँव-गाँव भटकने के बाद वे अंततः आज के महानगर मुंबई के निकट एक जंगल में स्थित एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर में रहने लगे। वहाँ के आदिवासी उनकी देखभाल करने लगे और उन्होंने उनके लिए एक छोटी-सी कुटिया भी बना दी। वे अपना अधिकांश समय उसी कुटिया में ध्यानमग्न बैठे हुए बिताते थे, मानो उन्हें बाहरी संसार का कोई बोध ही न हो। बहुत कम अवसरों पर ही वे किसी से बात करते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोग उनकी ओर आकर्षित होने लगे। उनकी ख्याति फैलने लगी। लोग उन्हें भगवान और दिव्य पुरुष कहने लगे। इस प्रकार गणेशपुरी के भगवान नित्यानन्द के रूप में वे प्रसिद्ध हुए। उसी समय कृष्ण नाम का एक युवा ब्राह्मण लड़का अपना गाँव छोड़कर वहाँ आ पहुँचा। वह इस झूठे आरोप से बचने के लिए भाग आया था कि उसने अपने गाँव के धनी व्यक्ति के मंदिर में स्थापित देवता के आभूषण चुरा लिए थे। उसे भगवान नित्यानन्द के आश्रम में शरण मिली। लेकिन कृष्ण के मन में नित्यानन्द के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं था। वास्तवमें, जब वर्षों पहले नित्यानन्द दिगम्बर होकर उसके गाँव में घूमते थे, तब सम्भव है कि उन पर पत्थर फेंकने वाले शरारती लड़कों में कृष्ण भी शामिल रहा हो। लेकिन अब वह असहाय था। उसके पास जाने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं था। उसे केवल उन लोगों से बचने के लिए एक सुरक्षित आश्रय चाहिए था जो उसकी तलाश कर रहे थे। कई दशक बाद मेरी भेंट उसी कृष्ण से हुई। तब तक वे मुझसे काफी बड़े हो चुके थे। वे मंदिर के पुजारी बन चुके थे—कृष्ण आचार्य। उन्होंने मुझे नित्यानन्द के जीवन की अनेक रोचक घटनाएँ सुनाईं। बचपन में कृष्ण को लगता था कि नित्यानन्द एक पागल के अलावा कुछ भी नहीं हैं। जब भी वे आदिवासियों को उन्हें भगवान कहते सुनते, तो हँस पड़ते थे। लेकिन जिज्ञासावश उन्होंने इस "पागल" की हर गतिविधि पर ध्यान देना शुरू किया। कृष्ण आचार्य के अनुसार नित्यानन्द लगभग हर समय गहरे समाधि जैसे अवस्था में रहते थे। वे केवल बहुत ही दुर्लभ अवसरों पर बोलते थे। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि वे केवल तब पागलों जैसा व्यवहार करते थे, जब जुआरी अपनी बाज़ियों के बारे में सलाह लेने आते थे। वे उन पर चिल्लाते, उन्हें डाँटते और जो भी वस्तु हाथ लगती, उसे उनकी ओर फेंककर उन्हें भगाने की कोशिश करते। लेकिन कोई भी इसे गंभीरता से नहीं लेता था। लोग उनके प्रत्येक शब्द और उनकी प्रत्येक उँगली की हरकत को जीतने वाले अंकों का संकेत मानते थे। इस "पागल" की दिनचर्या कैसी थी? आख़िर एक पागल को भी भोजन करना पड़ता है। उसे भी प्रकृति की पुकार का उत्तर देना पड़ता है। क्या नित्यानन्द इसके अपवाद थे? कृष्ण इन सब बातों का अत्यंत ध्यानपूर्वक निरीक्षण करते थे। कृष्ण के अनुसार नित्यानन्द प्रातः बहुत जल्दी उठते और अपनी कुटिया से बाहर निकलते। प्रकृति की पुकार पूरी करने के बाद वे पास के तालाब में गर्दन तक पानी में खड़े रहते। ऐसा भी नहीं लगता था कि वे अपने शरीर को ठीक से साफ़ करने का कोई प्रयास कर रहे हों। एक बात ने कृष्ण को विशेष रूपसे प्रभावित किया। चाहे उठना हो, चलना हो, तालाब में स्नान करना हो, वापस कुटिया में लौटना हो या कोई भी अन्य कार्य—नित्यानन्द सबकुछ ऐसे करते थे जैसे कोई नींद में चल रहा हो। उनमें किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत आग्रह दिखाई नहीं देता था। सबकुछ पूर्ण शांति और लगभग यांत्रिक सटीकता के साथ होता था। ऐसा लगता था मानो उनका शरीर अपने-आप कार्य कर रहा हो, जबकि उनकी प्रज्ञा कहीं और स्थित हो। जब गाँव वाले उनके सामने भोजन रख देते, तो वे कभी-कभी जो सामने होता वही खा लेते। यहाँ तक कि फलों को बिना छीले ही खा लेते थे। स्वाद, पसंद-नापसंद या सामाजिक शिष्टाचार—इनमें से किसी भी बात की उन्हें कोई परवाह नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो उनमें "मैं" कहने वाला, किसी वस्तु को पसंद या नापसंद करने वाला व्यक्तिगत अहंकार ही शेष न रहा हो। यह सब देखकर कृष्ण पूरी तरह उलझ गए। "क्या यह व्यक्ति सचमुच पागल है?" वे बार-बार स्वयं से यही प्रश्न पूछते रहे। समय बीतता गया. अब तक कृष्ण वहाँ के जीवन में पूरी तरह रच-बस चुके थे। वे सड़क के किनारे हिंदू देवी-देवताओं के चित्र रखकर बैठते थे। गाँव के लोग उन्हें विशेष पूजाएँ करवाने के लिए पैसे देते थे। इसी प्रकार उनका जीवन चल रहा था। लेकिन एक दिन कृष्ण एक स्थानीय गुंडे द्वारा किए गए अपराध के प्रत्यक्षदर्शी बन गए। आख़िरकार पुलिस ने उस अपराधी को गिरफ्तार करलिया और कृष्ण को न्यायालय में गवाही देने के लिए बुलाया गया। अब कृष्ण बहुत बड़ी कठिनाई में पड़ गए। यदि वे न्यायालय जाते, तो उस गुंडे के लोग उनकी हत्या करसकतेथे। यदि वे नहीं जाते, तो पुलिस उन्हें बलपूर्वक वहाँ लेजाती। उन्हें समझमें नहीं आ रहा था कि क्या करें। अंततः आँखों में आँसू भरकर उन्होंने नित्यानन्द के सामने अपनी पूरी परिस्थिति बताई। कृष्ण स्वयं कभी एक भगोड़े के रूपमें वहाँ पहुँचे थे। वहाँ उनका कोई अपना नहीं था। और उन्हें यह आशा भी नहीं थी कि सदैव समाधि में लीन रहने वाले नित्यानन्द उनकी सहायता करेंगे। लेकिन आश्चर्य की बात यह हुई कि नित्यानन्द ने उनकी सहायता की। उन्होंने कुछ क्षणों के लिए अपनी आँखें खोलीं और मानो नींद में बोल रहे हों, ऐसे कुछ शब्द कहे। "अरे मूर्ख! अपने गाँव लौट जा। कोई भी तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। तेरे गाँव के लोग तुझे खोज रहे हैं। वे बहुत जल्द यहाँ पहुँचने वाले हैं।" यह सुनकर कृष्ण और भी अधिक चिंतित हो गए। उन्हें विश्वास था कि उनके गाँव से इतनी दूर इस जंगल में कोई उन्हें कभी खोज नहीं पाएगा। लेकिन यदि इस "पागल" की बात सच थी, तो इसका अर्थ था कि न केवल उन्होंने उन्हें खोज लिया था, बल्कि वे उन्हें वापस ले जाने के लिए रास्ते में भी थे। शायद उस रात कृष्ण को बिल्कुल भी नींद नहीं आई। अगले दिन ठीक वैसा ही हुआ जैसा नित्यानन्द ने कहा था। कृष्ण के गाँव का एक व्यक्ति उन्हें खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। वह अपने साथ एक सुखद समाचार लेकर आया। अब गाँव के लोगों को पता चल चुका था कि कृष्ण निर्दोष हैं। और एक दूसरी अच्छी खबर भी थी। वे चाहते थे कि कृष्ण ही उनके नव-जीर्णोद्धारित मंदिर के पुजारी बनें! कृष्ण ने नित्यानन्द के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की। वे उनके चरणों में गिर पड़े और उन्हें गलत समझने के लिए क्षमा माँगी। बहुत वर्षों बाद जब मैं उसी कृष्ण से उनके गाँव के मंदिर में पुजारी के रूपमें मिला, तब वे मुझे नित्यानन्द के साथ अपने अनुभव सुना रहे थे। बोलते समय उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। वे पूरी तरह बदल चुके थे। उनके मन में नित्यानन्द के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न हो चुकी थी। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी संकल्प किया था कि वे भी अपने गुरु की तरह ईमानदार, निस्वार्थ और पूर्णतः अनासक्त जीवन जीएँगे। अपने पूरे जीवनभर कृष्ण आचार्य ने अत्यंत ईमानदार और सरल जीवन जिया। उन्होंने अनेक ऐसे निर्धन लड़कों की भी सहायता की, जो उनकी ही तरह घर छोड़कर भाग आए थे और छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन चला रहे थे। आज यदि आप YouTube पर खोजेंगे, तो आपको भगवान नित्यानन्द के चमत्कारों और अलौकिक शक्तियों के बारे में असंख्य वीडियो मिल जाएँगे। लेकिन वही वास्तविक चमत्कार नहीं है। वास्तविक चमत्कार तो यह है कि ऐसे महात्मा अपने संपर्क में आने वाले लोगों का जीवन किस प्रकार बदल देते हैं। बिना कुछ कहे… बिना कोई उपदेश दिए… बिना किसी प्रकार का जादू किए। क्या यह सब इस बात का पर्याप्त संकेत नहीं है कि जिस अवस्था में वे जी रहे थे, वह केवल कोई मनोवैज्ञानिक स्थिति नहीं थी, या फिर प्रसिद्ध अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी वी. एस. रामचन्द्रन द्वारा प्रस्तावित तथाकथित "टेम्पोरल लोब एपिलेप्सी" मात्र नहीं थी? शायद हमें अपना मन इतना खुला रखना चाहिए कि हम इससे भी बेहतर व्याख्याओं की खोज करसकें। आपकी दृष्टि में नित्यानन्द वास्तवमें कौन थे? एक पागल? या वह सच्चे योगी जिन्होंने प्रज्ञा की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करलीथी? आप क्या सोचते हैं? अपनी राय हमें अवश्य बताइए। अगले एपिसोड में फिर मुलाक़ात होगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले कुछ एपिसोडों में हमने दर्शन की कुछ अत्यंत गहन अवधारणाओं की यात्रा की थी। हमने चर्चा की थी कि प्राचीन भारतीय ऋषि प्रज्ञा के बारे में क्या दृष्टिकोण रखते थे। उस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण भाग था प्रज्ञा की वह आश्चर्यजनक और मन को विस्मित कर देने वाली अवस्था, जिसे तुरीय कहा जाता है और जो अनुभव-आधारित समस्त तर्क से परे प्रतीत होती है। आधुनिक और तर्कप्रधान मन के लिए तुरीय की यह अवधारणा एक सुंदर कल्पना जैसी लग सकती है। यह एक काव्यमय, आदर्शवादी और अवास्तविक विचार भी प्रतीत हो सकती है। इसलिए कोई संशयवादी पूछ सकता है, "क्या वास्तवमें कोई इस अवस्था में जीया था? 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&lt;div style="text-align: center;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;a href="https://tinyurl.com/mybooks1234" target="_blank"&gt;[Preview books]&lt;/a&gt;&amp;nbsp; [&lt;a href="https://tinyurl.com/mylibrary1234"&gt;Borrow books&lt;/a&gt;]&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhnl5ff2AmoyWsfPfnzRUeq3cQVSRs5dEsfGvVpTSRhHfOh44Lq3pgeysHFz-shgUgoB0aXnjfm3hepT8hxOYQAAhO5qBFmg6h1gh5XrfXmHlQdpz3bOg36VaufYTiAGIbCccIWGBh-GbmS7kGUFYkuyspPOQSH5QWDKH-C9LENDkKIb0uHT_N6Ruag9EM/s1672/Turiya.png" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="941" data-original-width="1672" height="360" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhnl5ff2AmoyWsfPfnzRUeq3cQVSRs5dEsfGvVpTSRhHfOh44Lq3pgeysHFz-shgUgoB0aXnjfm3hepT8hxOYQAAhO5qBFmg6h1gh5XrfXmHlQdpz3bOg36VaufYTiAGIbCccIWGBh-GbmS7kGUFYkuyspPOQSH5QWDKH-C9LENDkKIb0uHT_N6Ruag9EM/w640-h360/Turiya.png" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;पिछले&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; कुछ एपिसोडों में हमने चेतना के बारे में चर्चा की। हमने चेतना की चार अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय की अवर्णनीय अवस्था—के बारे में बात की। सभी जीवधारी अलग-अलग समय पर इन चार अवस्थाओं में से किसी-न-किसी एक का अनुभव करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौड़पाद कौन थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौड़पाद ने क्या कहा?&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-----------------------------&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गौड़पाद के अनुसार, माण्डूक्य उपनिषद में वर्णित चेतना की पहली तीन अवस्थाएँ केवल आभास हैं; वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक अवस्था केवल तुरीय है, और वही अकेली अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में प्रकट होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;स्वप्न की उपमा:&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना होते हुए भी यह अनेकता कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद एक और उपमा देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;घड़े की उपमा:&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान लीजिए आपके पास बहुत-से घड़े हैं। प्रत्येक घड़े के भीतर कुछ आकाश (माने खाली जगह) है। उस आकाश का एक निश्चित आकार और कुछ विशेषताएँ हैं। घड़ों के बाहर भी आकाश है। तो क्या इसका अर्थ यह है कि अनेक अलग-अलग आकाश हैं—घड़े के भीतर का आकाश और घड़े के बाहर का आकाश?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं। वास्तव में आकाश केवल एक ही है। अनेकता का आभास घड़ा उत्पन्न करता है। घड़ा एक ही आकाश को अनेक अलग-अलग आकाशों के रूप में प्रकट करता है। वह एक अखंड आकाश को अनेक भागों में विभाजित होने का भ्रम उत्पन्न करता है। उसी प्रकार विभिन्न भौतिक रूप यह भ्रम उत्पन्न करते हैं कि अनेक चेतनाएँ हैं। लेकिन वास्तव में केवल एक ही सार्वभौमिक चेतना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद गौड़पाद तीसरी उपमा देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जलती हुई मशाल की उपमा:&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आप किसी ऐसे स्थान पर जलती हुई मशाल पकड़ते हैं जहाँ हवा नहीं चल रही होती, तब उसकी लौ अपने-आप स्थिर रूप से जलती रहती है। लेकिन जब हवा चलती है, तो लौ हिलने लगती है। और यही गति लौ को विभिन्न आकार ग्रहण करने जैसी प्रतीत कराती है। कुछ समय बाद ऐसा लगता है मानो स्वयं लौ के अनेक रूप हों। यदि मशाल को गोल-गोल घुमाया जाए, तो वह अग्नि के चक्र जैसी दिखाई देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से कोई भी आकार वास्तव में लौ में कभी था ही नहीं, और न कभी होगा। जब वायु का प्रवाह या गति होती है, तभी ये आकार केवल दिखाई देते हैं। जैसे ही यह गति रुक जाती है, इन आकारों का आभास भी समाप्त हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि सार्वभौमिक चेतना में उत्पन्न होने वाले स्पंदनों के कारण संसार की अनेक वस्तुएँ केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं। वे चेतना द्वारा उत्पन्न नहीं की गई हैं। बल्कि सार्वभौमिक चेतना के स्पंदनों के कारण वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इसी सार्वभौमिक चेतना को उपनिषद तुरीय कहता है। शेष तीन अवस्थाएँ—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था—केवल उसी चेतना की अभिव्यक्तियाँ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से प्रत्येक उपमा अत्यंत गहन है। गौड़पाद ने इन प्रत्येक अवधारणाओं पर विस्तार से लिखा है। यद्यपि ये उपमाएँ अत्यंत सुसंगत हैं, फिर भी वे अनेक प्रश्न उत्पन्न करती हैं। उनसे कई विरोधाभास सामने आते हैं। मैंने अपने ग्रंथ "&lt;a href="https://books2read.com/VedicMystery2" target="_blank"&gt;Unraveling the Hidden Mysteries of The Vedas Part 2: Amazing Upanishads&lt;/a&gt;" में इनकी चर्चा की है। उस पुस्तक में आपको इनका अधिक विस्तृत विवरण मिलेगा, साथ ही इन विरोधाभासों का मेरा समाधान और इन प्रश्नों के मेरे उत्तर भी मिलेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब गौड़पाद के एकीकृत चेतना के सिद्धांत पर वापस आते हैं। उनकी व्याख्या से दो बातें स्पष्ट होती हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;• यह संसार केवल सार्वभौमिक चेतना में उत्पन्न होने वाले स्पंदनों से प्रकट होने वाला एक आभास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• और जब ये स्पंदन रुक जाते हैं, तब इस संसार का आभास भी समाप्त हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस सार्वभौमिक चेतना का साक्षात्कार करनेकेलिए गौड़पाद ध्यान के मार्ग की अनुशंसा करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में, मैं गौड़पाद के इन शब्दों के साथ इस चर्चा का समापन करता हूँ—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;"यदा न लीयते चित्तं, न च विक्षिप्यते पुनः।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिङ्गनम् अनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा॥"&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;— माण्डूक्य कारिका: अद्वैत प्रकरण, श्लोक 46।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वे कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति का मन—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;• सुषुप्ति में लीन नहीं होताहै, और&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• जाग्रत तथा स्वप्न अवस्थाओं में बिखरता नहीं है, और&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• किसी शांत, निर्वात स्थान में रखे दीपक की लौ की तरह स्थिर बना रहता है, और&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• मिथ्या पहचानों को ग्रहण करना छोड़ देता है,&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;तब उस व्यक्ति का मन स्वयंको उसी सार्वभौमिक चेतना के साथ एकरूप माननेलगताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले एपिसोड में एक और रोचक विषय के साथ फिर से मेरे साथ जुड़िए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के प्राचीन दार्शनिकों द्वारा प्रस्तुत चेतना के इन गहन विचारों के बारे में अपने विचार मुझे अवश्य बताइए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;YouTube पर देखें&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;iframe allowfullscreen="" class="BLOG_video_class" height="266" src="https://www.youtube.com/embed/n8FTlzjr3H4" width="320" youtube-src-id="n8FTlzjr3H4"&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: 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&lt;div align="center" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="audio/mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/w31lvifwamh4w2mjh9vqz/03-4.mp3?rlkey=rfqp647bl5xdhkotytv04pvto&amp;st=h6wq9s98&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhnl5ff2AmoyWsfPfnzRUeq3cQVSRs5dEsfGvVpTSRhHfOh44Lq3pgeysHFz-shgUgoB0aXnjfm3hepT8hxOYQAAhO5qBFmg6h1gh5XrfXmHlQdpz3bOg36VaufYTiAGIbCccIWGBh-GbmS7kGUFYkuyspPOQSH5QWDKH-C9LENDkKIb0uHT_N6Ruag9EM/s72-w640-h360-c/Turiya.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले कुछ एपिसोडों में हमने चेतना के बारे में चर्चा की। हमने चेतना की चार अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय की अवर्णनीय अवस्था—के बारे में बात की। सभी जीवधारी अलग-अलग समय पर इन चार अवस्थाओं में से किसी-न-किसी एक का अनुभव करते हैं। हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी। पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा। गौड़पाद कौन थे? गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे। गौड़पाद ने क्या कहा? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;गौड़पाद के अनुसार, माण्डूक्य उपनिषद में वर्णित चेतना की पहली तीन अवस्थाएँ केवल आभास हैं; वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक अवस्था केवल तुरीय है, और वही अकेली अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में प्रकट होती है। यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं। स्वप्न की उपमा: जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है। इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है। यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना होते हुए भी यह अनेकता कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद एक और उपमा देते हैं। घड़े की उपमा: मान लीजिए आपके पास बहुत-से घड़े हैं। प्रत्येक घड़े के भीतर कुछ आकाश (माने खाली जगह) है। उस आकाश का एक निश्चित आकार और कुछ विशेषताएँ हैं। घड़ों के बाहर भी आकाश है। तो क्या इसका अर्थ यह है कि अनेक अलग-अलग आकाश हैं—घड़े के भीतर का आकाश और घड़े के बाहर का आकाश? नहीं। वास्तव में आकाश केवल एक ही है। अनेकता का आभास घड़ा उत्पन्न करता है। घड़ा एक ही आकाश को अनेक अलग-अलग आकाशों के रूप में प्रकट करता है। वह एक अखंड आकाश को अनेक भागों में विभाजित होने का भ्रम उत्पन्न करता है। उसी प्रकार विभिन्न भौतिक रूप यह भ्रम उत्पन्न करते हैं कि अनेक चेतनाएँ हैं। लेकिन वास्तव में केवल एक ही सार्वभौमिक चेतना है। इसके बाद गौड़पाद तीसरी उपमा देते हैं। जलती हुई मशाल की उपमा: जब आप किसी ऐसे स्थान पर जलती हुई मशाल पकड़ते हैं जहाँ हवा नहीं चल रही होती, तब उसकी लौ अपने-आप स्थिर रूप से जलती रहती है। लेकिन जब हवा चलती है, तो लौ हिलने लगती है। और यही गति लौ को विभिन्न आकार ग्रहण करने जैसी प्रतीत कराती है। कुछ समय बाद ऐसा लगता है मानो स्वयं लौ के अनेक रूप हों। यदि मशाल को गोल-गोल घुमाया जाए, तो वह अग्नि के चक्र जैसी दिखाई देती है। इनमें से कोई भी आकार वास्तव में लौ में कभी था ही नहीं, और न कभी होगा। जब वायु का प्रवाह या गति होती है, तभी ये आकार केवल दिखाई देते हैं। जैसे ही यह गति रुक जाती है, इन आकारों का आभास भी समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि सार्वभौमिक चेतना में उत्पन्न होने वाले स्पंदनों के कारण संसार की अनेक वस्तुएँ केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं। वे चेतना द्वारा उत्पन्न नहीं की गई हैं। बल्कि सार्वभौमिक चेतना के स्पंदनों के कारण वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं। और इसी सार्वभौमिक चेतना को उपनिषद तुरीय कहता है। शेष तीन अवस्थाएँ—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था—केवल उसी चेतना की अभिव्यक्तियाँ हैं। इनमें से प्रत्येक उपमा अत्यंत गहन है। गौड़पाद ने इन प्रत्येक अवधारणाओं पर विस्तार से लिखा है। यद्यपि ये उपमाएँ अत्यंत सुसंगत हैं, फिर भी वे अनेक प्रश्न उत्पन्न करती हैं। उनसे कई विरोधाभास सामने आते हैं। मैंने अपने ग्रंथ "Unraveling the Hidden Mysteries of The Vedas Part 2: Amazing Upanishads" में इनकी चर्चा की है। उस पुस्तक में आपको इनका अधिक विस्तृत विवरण मिलेगा, साथ ही इन विरोधाभासों का मेरा समाधान और इन प्रश्नों के मेरे उत्तर भी मिलेंगे। अब गौड़पाद के एकीकृत चेतना के सिद्धांत पर वापस आते हैं। उनकी व्याख्या से दो बातें स्पष्ट होती हैं: • यह संसार केवल सार्वभौमिक चेतना में उत्पन्न होने वाले स्पंदनों से प्रकट होने वाला एक आभास है। • और जब ये स्पंदन रुक जाते हैं, तब इस संसार का आभास भी समाप्त हो जाता है। इस सार्वभौमिक चेतना का साक्षात्कार करनेकेलिए गौड़पाद ध्यान के मार्ग की अनुशंसा करते हैं। अंत में, मैं गौड़पाद के इन शब्दों के साथ इस चर्चा का समापन करता हूँ— "यदा न लीयते चित्तं, न च विक्षिप्यते पुनः। अनिङ्गनम् अनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा॥" — माण्डूक्य कारिका: अद्वैत प्रकरण, श्लोक 46। वे कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति का मन— • सुषुप्ति में लीन नहीं होताहै, और • जाग्रत तथा स्वप्न अवस्थाओं में बिखरता नहीं है, और • किसी शांत, निर्वात स्थान में रखे दीपक की लौ की तरह स्थिर बना रहता है, और • मिथ्या पहचानों को ग्रहण करना छोड़ देता है, तब उस व्यक्ति का मन स्वयंको उसी सार्वभौमिक चेतना के साथ एकरूप माननेलगताहै। अगले एपिसोड में एक और रोचक विषय के साथ फिर से मेरे साथ जुड़िए। भारत के प्राचीन दार्शनिकों द्वारा प्रस्तुत चेतना के इन गहन विचारों के बारे में अपने विचार मुझे अवश्य बताइए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;YouTube पर देखें&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले कुछ एपिसोडों में हमने चेतना के बारे में चर्चा की। हमने चेतना की चार अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय की अवर्णनीय अवस्था—के बारे में बात की। सभी जीवधारी अलग-अलग समय पर इन चार अवस्थाओं में से किसी-न-किसी एक का अनुभव करते हैं। हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी। पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा। गौड़पाद कौन थे? गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे। गौड़पाद ने क्या कहा? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;गौड़पाद के अनुसार, माण्डूक्य उपनिषद में वर्णित चेतना की पहली तीन अवस्थाएँ केवल आभास हैं; वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक अवस्था केवल तुरीय है, और वही अकेली अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में प्रकट होती है। यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं। स्वप्न की उपमा: जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है। इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है। यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना होते हुए भी यह अनेकता कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद एक और उपमा देते हैं। घड़े की उपमा: मान लीजिए आपके पास बहुत-से घड़े हैं। प्रत्येक घड़े के भीतर कुछ आकाश (माने खाली जगह) है। उस आकाश का एक निश्चित आकार और कुछ विशेषताएँ हैं। घड़ों के बाहर भी आकाश है। तो क्या इसका अर्थ यह है कि अनेक अलग-अलग आकाश हैं—घड़े के भीतर का आकाश और घड़े के बाहर का आकाश? 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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब भी किसी नई अवधारणा का परिचय कराया जाता है, तो उसकी तुलना पहले से ज्ञात बातों से करना, या उससे उसका अंतर बताना स्वाभाविक होता है। यह उपनिषद भी सबसे पहले यही करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद कहता है कि तुरीय अवस्था, जाग्रत अवस्था जैसी नहीं है। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना बाहरी संसार के साथ व्यवहार करती है। लेकिन तुरीय अवस्था में ऐसा कोई बाहरी व्यवहार नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद यह भी कहता है कि यह चेतना किसी भी प्रकार के स्वप्न उत्पन्न नहीं करती। अर्थात् यह स्वप्न अवस्था से भी भिन्न है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या तुरीय ऐसी अवस्था हो सकती है जो आधी स्वप्न और आधी जाग्रत हो? उपनिषद इस संभावना को भी अस्वीकार कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी स्थिति में हमारे सामने केवल एक ही संभावना बचती है कि तुरीय, गहरी नींद की तरह चेतना की पूरी तरह सुप्त अवस्था होगी। गहरी नींद में हम ऐसा ही देखते हैं। लेकिन उपनिषद इस संभावना को भी नकार देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ ही उपनिषद यह भी कहता है कि तुरीय न तो ऐसी शून्य अवस्था है जिसमें कोई चेतना ही न हो, और न ही ऐसी अवस्था है जिसमें किसी विशेष वस्तु का ज्ञान हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद इन सभी बातों को संक्षेप में इस प्रकार कहता है—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;"न अन्तःप्रज्ञं, न बहिःप्रज्ञं, न उभयतःप्रज्ञं, न प्रज्ञानघनं, न प्रज्ञं, न अप्रज्ञं।"&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तो फिर वास्तव में तुरीय क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि हमें किसी वस्तु का वर्णन 'यह ऐसा है' कहकर करना हो, तो उसका इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकना आवश्यक है। लेकिन उपनिषद कहता है कि तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी किसी वस्तु का वर्णन यह बताकर किया जा सकता है कि उसका उपयोग किस काम के लिए होता है। लेकिन उपनिषद के अनुसार तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका किसी कार्य के लिए उपयोग किया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह यह भी कहता है कि उसके अपने कोई गुण-लक्षण नहीं हैं। इसलिए उसके बारे में सोचना भी संभव नहीं है। तो क्या उसे शब्दों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है? उपनिषद के अनुसार यह भी संभव नहीं है, क्योंकि तुरीय शब्दों से भी परे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद इसे इस प्रकार कहता है—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;"अदृश्यम्, अव्यवहार्यम्, अग्राह्यम्, अलक्षणम्, अचिन्त्यम्, अव्यपदेश्यम्।"&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यदि आप ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि उपनिषद यह बताने के बजाय कि तुरीय क्या है, यह बताता है कि वह क्या नहीं है। दर्शनशास्त्र में इसे 'निषेध द्वारा परिभाषा' कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब किसी वस्तु को सीधे-सीधे परिभाषित करना संभव नहीं होता, तब प्रायः उसे 'यह नहीं है' कहकर परिभाषित किया जाता है। इससे वह सब कुछ अलग हो जाता है जो तुरीय नहीं है। जब बाकी सब कुछ हट जाता है, तब जो शेष बचता है वही तुरीय है। फिर भी हम उसकी ओर उँगली उठाकर यह नहीं कह सकते कि 'यही वह है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद मानव भाषा की इस सीमा का अनेक स्थानों पर उल्लेख करते हैं। हमारी भाषा केवल उसी चीज़ का वर्णन कर सकती है जिसमें कुछ गुण-लक्षण हों, या जिसकी तुलना किसी पहले से ज्ञात वस्तु से की जा सके, अथवा जिसका वर्णन उसके उपयोग के आधार पर किया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, हम कह सकते हैं कि गाय एक ऐसा पशु है जिसके चार पैर, दो सींग और गर्दन के नीचे लटकने वाली त्वचा की एक तह होती है। लेकिन तुरीय में हमारी लौकिक अनुभूति से परिचित ऐसा कोई भी गुण नहीं है। इसलिए उसका वर्णन करने के लिए हमारे पास कोई भी विशेषण उपलब्ध नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुरीय अपने आप में पूर्णतः अद्वितीय है। उसके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। इसलिए हम उसकी तुलना किसी अन्य अवधारणा या किसी अन्य घटना से करके यह नहीं कह सकते कि 'वह उसके जैसा है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, एक चम्मच का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है कि वह भोजन करने के लिए उपयोग में आने वाला एक उपकरण है। लेकिन तुरीय का कोई भी लौकिक उपयोग नहीं है। इसलिए उसकी तुलना किसी उपकरण से भी नहीं की जा सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर हम कैसे निश्चित हो सकते हैं कि ऐसी कोई अवस्था वास्तव में अस्तित्व में है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद कहता है कि गहन ध्यान की अवस्था में जिस अनुभव का साक्षात्कार होता है, वही तुरीय है। वही अनुभव उसके अस्तित्व का प्रमाण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या चेतना की ऐसी अवस्था का अनुभव करने से कोई लाभ होता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद कहता है— "हाँ।" वह कहता है कि इस अवस्था का अनुभव करने से मनुष्य सभी लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है। संसार के साथ हमारे जुड़ाव से उत्पन्न होने वाले सभी कष्टों का यही उपाय है। यही सबसे अधिक शान्तिपूर्ण अवस्था है। यही सबसे अधिक मंगलमय अवस्था है। यह आपको केवल अपने इर्द-गिर्द घूमने वाली बिखरी हुई दुनिया के स्थान पर, एक ही अखण्ड और एकीकृत वास्तविकता का दर्शन कराती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे बढ़कर, उपनिषद कहता है कि वही आपका वास्तविक स्वरूप है। इसलिए उसका साक्षात्कार करना आपके लिए आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतना की तुरीय अवस्था के बारे में, और हमें उसका साक्षात्कार क्यों करना चाहिए, उपनिषद यही कहता है—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;i&gt;"एकात्मप्रत्ययसारं, प्रपञ्चोपशमं, शान्तं, शिवं, अद्वैतं, चतुर्थं, स आत्मा, स विज्ञेयः।"&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह सब कहते हुए मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा। उपनिषद के इन श्लोकों की व्याख्या करते समय मैंने पूरा ध्यान रखा है कि मूल ग्रन्थ के आशय में कहीं भी कोई परिवर्तन न हो। मैंने उस पर अपना स्वयं का दार्शनिक दृष्टिकोण आरोपित नहीं किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग कठोर अद्वैत सिद्धान्त का अनुसरण करते हैं, उन्हें मेरी यह व्याख्या शंकराचार्य जैसे अद्वैत दार्शनिकों की प्रसिद्ध व्याख्या से पूरी तरह मेल खाती हुई नहीं लग सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अद्वैत वेदान्त का दृष्टिकोण कुछ भिन्न है। वे तुरीय को चेतना की केवल चौथी अवस्था नहीं मानते। वे इस चेतना की अवस्था को वास्तव में किस प्रकार देखते हैं, इस पर हम अगले एपिसोड में चर्चा करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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उपनिषद इस संभावना को भी अस्वीकार कर देता है। ऐसी स्थिति में हमारे सामने केवल एक ही संभावना बचती है कि तुरीय, गहरी नींद की तरह चेतना की पूरी तरह सुप्त अवस्था होगी। गहरी नींद में हम ऐसा ही देखते हैं। लेकिन उपनिषद इस संभावना को भी नकार देता है। साथ ही उपनिषद यह भी कहता है कि तुरीय न तो ऐसी शून्य अवस्था है जिसमें कोई चेतना ही न हो, और न ही ऐसी अवस्था है जिसमें किसी विशेष वस्तु का ज्ञान हो। उपनिषद इन सभी बातों को संक्षेप में इस प्रकार कहता है— "न अन्तःप्रज्ञं, न बहिःप्रज्ञं, न उभयतःप्रज्ञं, न प्रज्ञानघनं, न प्रज्ञं, न अप्रज्ञं।" तो फिर वास्तव में तुरीय क्या है? यदि हमें किसी वस्तु का वर्णन 'यह ऐसा है' कहकर करना हो, तो उसका इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकना आवश्यक है। लेकिन उपनिषद कहता है कि तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सके। कभी-कभी किसी वस्तु का वर्णन यह बताकर किया जा सकता है कि उसका उपयोग किस काम के लिए होता है। लेकिन उपनिषद के अनुसार तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका किसी कार्य के लिए उपयोग किया जा सके। वह यह भी कहता है कि उसके अपने कोई गुण-लक्षण नहीं हैं। इसलिए उसके बारे में सोचना भी संभव नहीं है। तो क्या उसे शब्दों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है? उपनिषद के अनुसार यह भी संभव नहीं है, क्योंकि तुरीय शब्दों से भी परे है। उपनिषद इसे इस प्रकार कहता है— "अदृश्यम्, अव्यवहार्यम्, अग्राह्यम्, अलक्षणम्, अचिन्त्यम्, अव्यपदेश्यम्।" यदि आप ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि उपनिषद यह बताने के बजाय कि तुरीय क्या है, यह बताता है कि वह क्या नहीं है। दर्शनशास्त्र में इसे 'निषेध द्वारा परिभाषा' कहा जाता है। जब किसी वस्तु को सीधे-सीधे परिभाषित करना संभव नहीं होता, तब प्रायः उसे 'यह नहीं है' कहकर परिभाषित किया जाता है। इससे वह सब कुछ अलग हो जाता है जो तुरीय नहीं है। जब बाकी सब कुछ हट जाता है, तब जो शेष बचता है वही तुरीय है। फिर भी हम उसकी ओर उँगली उठाकर यह नहीं कह सकते कि 'यही वह है।' उपनिषद मानव भाषा की इस सीमा का अनेक स्थानों पर उल्लेख करते हैं। हमारी भाषा केवल उसी चीज़ का वर्णन कर सकती है जिसमें कुछ गुण-लक्षण हों, या जिसकी तुलना किसी पहले से ज्ञात वस्तु से की जा सके, अथवा जिसका वर्णन उसके उपयोग के आधार पर किया जा सके। उदाहरण के लिए, हम कह सकते हैं कि गाय एक ऐसा पशु है जिसके चार पैर, दो सींग और गर्दन के नीचे लटकने वाली त्वचा की एक तह होती है। लेकिन तुरीय में हमारी लौकिक अनुभूति से परिचित ऐसा कोई भी गुण नहीं है। इसलिए उसका वर्णन करने के लिए हमारे पास कोई भी विशेषण उपलब्ध नहीं है। तुरीय अपने आप में पूर्णतः अद्वितीय है। उसके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। इसलिए हम उसकी तुलना किसी अन्य अवधारणा या किसी अन्य घटना से करके यह नहीं कह सकते कि 'वह उसके जैसा है।' उदाहरण के लिए, एक चम्मच का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है कि वह भोजन करने के लिए उपयोग में आने वाला एक उपकरण है। लेकिन तुरीय का कोई भी लौकिक उपयोग नहीं है। इसलिए उसकी तुलना किसी उपकरण से भी नहीं की जा सकती। तो फिर हम कैसे निश्चित हो सकते हैं कि ऐसी कोई अवस्था वास्तव में अस्तित्व में है? उपनिषद कहता है कि गहन ध्यान की अवस्था में जिस अनुभव का साक्षात्कार होता है, वही तुरीय है। वही अनुभव उसके अस्तित्व का प्रमाण है। क्या चेतना की ऐसी अवस्था का अनुभव करने से कोई लाभ होता है? उपनिषद कहता है— "हाँ।" वह कहता है कि इस अवस्था का अनुभव करने से मनुष्य सभी लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है। संसार के साथ हमारे जुड़ाव से उत्पन्न होने वाले सभी कष्टों का यही उपाय है। यही सबसे अधिक शान्तिपूर्ण अवस्था है। यही सबसे अधिक मंगलमय अवस्था है। यह आपको केवल अपने इर्द-गिर्द घूमने वाली बिखरी हुई दुनिया के स्थान पर, एक ही अखण्ड और एकीकृत वास्तविकता का दर्शन कराती है। सबसे बढ़कर, उपनिषद कहता है कि वही आपका वास्तविक स्वरूप है। इसलिए उसका साक्षात्कार करना आपके लिए आवश्यक है। चेतना की तुरीय अवस्था के बारे में, और हमें उसका साक्षात्कार क्यों करना चाहिए, उपनिषद यही कहता है— "एकात्मप्रत्ययसारं, प्रपञ्चोपशमं, शान्तं, शिवं, अद्वैतं, चतुर्थं, स आत्मा, स विज्ञेयः।" यह सब कहते हुए मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा। उपनिषद के इन श्लोकों की व्याख्या करते समय मैंने पूरा ध्यान रखा है कि मूल ग्रन्थ के आशय में कहीं भी कोई परिवर्तन न हो। मैंने उस पर अपना स्वयं का दार्शनिक दृष्टिकोण आरोपित नहीं किया है। जो लोग कठोर अद्वैत सिद्धान्त का अनुसरण करते हैं, उन्हें मेरी यह व्याख्या शंकराचार्य जैसे अद्वैत दार्शनिकों की प्रसिद्ध व्याख्या से पूरी तरह मेल खाती हुई नहीं लग सकती। अद्वैत वेदान्त का दृष्टिकोण कुछ भिन्न है। वे तुरीय को चेतना की केवल चौथी अवस्था नहीं मानते। वे इस चेतना की अवस्था को वास्तव में किस प्रकार देखते हैं, इस पर हम अगले एपिसोड में चर्चा करेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले एपिसोड में हमने अपने प्राचीन भारतीय दार्शनिकों द्वारा वर्णित चेतना की तीन अवस्थाओं पर चर्चा की थी। अपनी चर्चा के लिए हमने उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद को आधार बनाया था। यह उपनिषद चेतना की तीन अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था—के बारे में बताता है। ये वही तीन अवस्थाएँ हैं जिन्हें हम सभी जीवों में प्रतिदिन देखते हैं। इसके बाद यह 'तुरीय' नामक चौथी अवस्था का वर्णन करता है। आख़िर यह तुरीय अवस्था क्या है? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;जब भी किसी नई अवधारणा का परिचय कराया जाता है, तो उसकी तुलना पहले से ज्ञात बातों से करना, या उससे उसका अंतर बताना स्वाभाविक होता है। यह उपनिषद भी सबसे पहले यही करता है। उपनिषद कहता है कि तुरीय अवस्था, जाग्रत अवस्था जैसी नहीं है। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना बाहरी संसार के साथ व्यवहार करती है। लेकिन तुरीय अवस्था में ऐसा कोई बाहरी व्यवहार नहीं होता। उपनिषद यह भी कहता है कि यह चेतना किसी भी प्रकार के स्वप्न उत्पन्न नहीं करती। अर्थात् यह स्वप्न अवस्था से भी भिन्न है। तो क्या तुरीय ऐसी अवस्था हो सकती है जो आधी स्वप्न और आधी जाग्रत हो? उपनिषद इस संभावना को भी अस्वीकार कर देता है। ऐसी स्थिति में हमारे सामने केवल एक ही संभावना बचती है कि तुरीय, गहरी नींद की तरह चेतना की पूरी तरह सुप्त अवस्था होगी। गहरी नींद में हम ऐसा ही देखते हैं। लेकिन उपनिषद इस संभावना को भी नकार देता है। साथ ही उपनिषद यह भी कहता है कि तुरीय न तो ऐसी शून्य अवस्था है जिसमें कोई चेतना ही न हो, और न ही ऐसी अवस्था है जिसमें किसी विशेष वस्तु का ज्ञान हो। उपनिषद इन सभी बातों को संक्षेप में इस प्रकार कहता है— "न अन्तःप्रज्ञं, न बहिःप्रज्ञं, न उभयतःप्रज्ञं, न प्रज्ञानघनं, न प्रज्ञं, न अप्रज्ञं।" तो फिर वास्तव में तुरीय क्या है? यदि हमें किसी वस्तु का वर्णन 'यह ऐसा है' कहकर करना हो, तो उसका इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकना आवश्यक है। लेकिन उपनिषद कहता है कि तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सके। कभी-कभी किसी वस्तु का वर्णन यह बताकर किया जा सकता है कि उसका उपयोग किस काम के लिए होता है। लेकिन उपनिषद के अनुसार तुरीय ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका किसी कार्य के लिए उपयोग किया जा सके। वह यह भी कहता है कि उसके अपने कोई गुण-लक्षण नहीं हैं। इसलिए उसके बारे में सोचना भी संभव नहीं है। तो क्या उसे शब्दों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है? उपनिषद के अनुसार यह भी संभव नहीं है, क्योंकि तुरीय शब्दों से भी परे है। उपनिषद इसे इस प्रकार कहता है— "अदृश्यम्, अव्यवहार्यम्, अग्राह्यम्, अलक्षणम्, अचिन्त्यम्, अव्यपदेश्यम्।" यदि आप ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि उपनिषद यह बताने के बजाय कि तुरीय क्या है, यह बताता है कि वह क्या नहीं है। दर्शनशास्त्र में इसे 'निषेध द्वारा परिभाषा' कहा जाता है। जब किसी वस्तु को सीधे-सीधे परिभाषित करना संभव नहीं होता, तब प्रायः उसे 'यह नहीं है' कहकर परिभाषित किया जाता है। इससे वह सब कुछ अलग हो जाता है जो तुरीय नहीं है। जब बाकी सब कुछ हट जाता है, तब जो शेष बचता है वही तुरीय है। फिर भी हम उसकी ओर उँगली उठाकर यह नहीं कह सकते कि 'यही वह है।' उपनिषद मानव भाषा की इस सीमा का अनेक स्थानों पर उल्लेख करते हैं। हमारी भाषा केवल उसी चीज़ का वर्णन कर सकती है जिसमें कुछ गुण-लक्षण हों, या जिसकी तुलना किसी पहले से ज्ञात वस्तु से की जा सके, अथवा जिसका वर्णन उसके उपयोग के आधार पर किया जा सके। उदाहरण के लिए, हम कह सकते हैं कि गाय एक ऐसा पशु है जिसके चार पैर, दो सींग और गर्दन के नीचे लटकने वाली त्वचा की एक तह होती है। लेकिन तुरीय में हमारी लौकिक अनुभूति से परिचित ऐसा कोई भी गुण नहीं है। इसलिए उसका वर्णन करने के लिए हमारे पास कोई भी विशेषण उपलब्ध नहीं है। तुरीय अपने आप में पूर्णतः अद्वितीय है। उसके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। इसलिए हम उसकी तुलना किसी अन्य अवधारणा या किसी अन्य घटना से करके यह नहीं कह सकते कि 'वह उसके जैसा है।' उदाहरण के लिए, एक चम्मच का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है कि वह भोजन करने के लिए उपयोग में आने वाला एक उपकरण है। लेकिन तुरीय का कोई भी लौकिक उपयोग नहीं है। इसलिए उसकी तुलना किसी उपकरण से भी नहीं की जा सकती। तो फिर हम कैसे निश्चित हो सकते हैं कि ऐसी कोई अवस्था वास्तव में अस्तित्व में है? उपनिषद कहता है कि गहन ध्यान की अवस्था में जिस अनुभव का साक्षात्कार होता है, वही तुरीय है। वही अनुभव उसके अस्तित्व का प्रमाण है। क्या चेतना की ऐसी अवस्था का अनुभव करने से कोई लाभ होता है? उपनिषद कहता है— "हाँ।" वह कहता है कि इस अवस्था का अनुभव करने से मनुष्य सभी लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है। संसार के साथ हमारे जुड़ाव से उत्पन्न होने वाले सभी कष्टों का यही उपाय है। यही सबसे अधिक शान्तिपूर्ण अवस्था है। यही सबसे अधिक मंगलमय अवस्था है। यह आपको केवल अपने इर्द-गिर्द घूमने वाली बिखरी हुई दुनिया के स्थान पर, एक ही अखण्ड और एकीकृत वास्तविकता का दर्शन कराती है। सबसे बढ़कर, उपनिषद कहता है कि वही आपका वास्तविक स्वरूप है। इसलिए उसका साक्षात्कार करना आपके लिए आवश्यक है। चेतना की तुरीय अवस्था के बारे में, और हमें उसका साक्षात्कार क्यों करना चाहिए, उपनिषद यही कहता है— "एकात्मप्रत्ययसारं, प्रपञ्चोपशमं, शान्तं, शिवं, अद्वैतं, चतुर्थं, स आत्मा, स विज्ञेयः।" यह सब कहते हुए मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा। उपनिषद के इन श्लोकों की व्याख्या करते समय मैंने पूरा ध्यान रखा है कि मूल ग्रन्थ के आशय में कहीं भी कोई परिवर्तन न हो। मैंने उस पर अपना स्वयं का दार्शनिक दृष्टिकोण आरोपित नहीं किया है। जो लोग कठोर अद्वैत सिद्धान्त का अनुसरण करते हैं, उन्हें मेरी यह व्याख्या शंकराचार्य जैसे अद्वैत दार्शनिकों की प्रसिद्ध व्याख्या से पूरी तरह मेल खाती हुई नहीं लग सकती। अद्वैत वेदान्त का दृष्टिकोण कुछ भिन्न है। वे तुरीय को चेतना की केवल चौथी अवस्था नहीं मानते। वे इस चेतना की अवस्था को वास्तव में किस प्रकार देखते हैं, इस पर हम अगले एपिसोड में चर्चा करेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#advaita, #Hindi, #IndianPhilosophy, #Meditation, #mystery, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  ॐकार का जादू: चेतना की तीन अवस्थाएँ।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/07/hindi_02028272561.html</link><category>#advaita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><pubDate>Sat, 11 Jul 2026 15:32:42 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1956350032638415725</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सबसे पहली अवस्था जागने की अवस्था है, जिसे चेतना की 'जाग्रत' अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में जीव अपने शरीर के बाहर की दुनिया के साथ संपर्क करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अपने शरीर के बाहर की दुनिया से जानकारी एकत्र करने केलिए अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों, जैसे आँखों और कानों, का उपयोग करता है। फिर वह उस जानकारी को अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अन्य मानसिक क्षमताओं की सहायता से संसाधित करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकारी संसाधित होजानेकेबाद शरीर बाहरी वस्तुओं के साथ क्रिया करनेकेलिए अपने पाँच कर्मेन्द्रियों, जैसे हाथों और पैरों, का उपयोग करता है। प्राण जैसी पाँच जीवन-शक्तियाँ इस पूरी प्रक्रिया में शरीर और मन को सहारा देती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूल रूपसे जाग्रत वह चेतना की अवस्था है जो शरीर के बाहर स्थित स्थूल वस्तुओं के साथ व्यवहार करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञान इसे किस प्रकार देखता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञान की शब्दावली में इसे Access Consciousness कहा जाता है। तंत्रिका-विज्ञानी इस बातको काफी हदतक समझ चुके हैं कि शरीर और मस्तिष्क इस प्रकार की चेतना को किस प्रकार संभालते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क में विभिन्न विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जो बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से आनेवाली जानकारी को संसाधित करते हैं। जानकारी संसाधित होजानेकेबाद मस्तिष्क प्राप्त जानकारी, अपनी वर्तमान अवस्था तथा विभिन्न निर्णय-केंद्रों के मूल्यांकन के आधारपर यह निर्णय लेता है कि कौन-सी क्रिया की जानी चाहिए। अंततः वह आवश्यकता के अनुसार मस्तिष्क के Motor regions को सक्रिय करता है ताकि बाहरी कर्मेन्द्रियाँ उचित कार्य करसकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद चेतना के दूसरे रूप की चर्चा करता है, जिसे 'स्वप्न' अवस्था कहा जाता है। यह जाग्रत अवस्था से काफी मिलती-जुलती है। अंतर केवल इतना है कि पूरा नाटक मन के भीतर घटित होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहरी स्थूल वस्तुओं के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म वस्तुएँ होती हैं। स्थूल ज्ञानेन्द्रियों के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म आंतरिक इन्द्रियाँ होती हैं। ये आंतरिक इन्द्रियाँ मन द्वारा निर्मित वस्तुओं पर कार्य करती हैं और ऐसे परिणाम उत्पन्न करती हैं जो स्वयं मन द्वारा ही निर्मित होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस प्रकार जाग्रत अवस्था में व्यक्ति अपने शारीरिक अंगों और मानसिक क्षमताओं की सहायता से बाहरी वस्तुओं का अनुभव करता है, उसी प्रकार स्वप्न में निर्मित व्यक्ति भी स्वप्न में निर्मित वस्तुओं का अनुभव करता है। बाहरी संसार और स्वप्न में निर्मित आंतरिक संसार के बीच गहरी समानता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञान भी इसे लगभग इसी प्रकार देखता है। अंतर केवल इतना है कि उपनिषद की अमूर्त शब्दावली के स्थानपर वह मस्तिष्क के विशिष्ट भागों का उल्लेख करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञान के अनुसार स्वप्न का संसार पूरी तरह मस्तिष्क द्वारा निर्मित होता है। यह मस्तिष्क में पहले से संग्रहीत विभिन्न स्मृतियों के बीच होनेवाली यादृच्छिक (Random) परस्पर क्रियाओं का परिणाम होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वस्तुओं का मन द्वारा निर्मित होना छोड़ दें तो बाकी सबकुछ लगभग जाग्रत अवस्था जैसा ही होता है। मस्तिष्क के वही संसाधन-क्षेत्र कार्य करते रहते हैं, लेकिन भौतिक ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं होतीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद चेतना की तीसरी अवस्था की चर्चा करता है, जिसे 'सुषुप्ति' अथवा गहरी नींद कहा जाता है। उपनिषद के अनुसार चेतना की इस अवस्था में वह न तो बाहरी संसारके साथ कोई प्रतिक्रिया करती है और न ही कोई स्वप्न देखती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूँकि न तो बाहरी वस्तुओं से और न ही मन द्वारा निर्मित वस्तुओं से कोई जानकारी प्राप्त होती है, इसलिए उनका कोई संसाधन भी नहीं होता। उपनिषद कहता है कि चेतना बाहरी और आंतरिक—दोनों संसारों से पूरी तरह कट जानेके कारण इस अवस्था में कोई इच्छा भी नहीं रहती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद कहता है कि चेतना मानो निश्चल-सी प्रतीत होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह शून्यता की अवस्था है। पहले से अर्जित ज्ञान अब भी वहीं रहता है। किंतु वह ज्ञान मानो जमे हुए रूप में रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद एक और आश्चर्यजनक बात बताता है। वह कहता है कि चेतना की यह अवस्था आनंदमय होती है। किंतु यह आनंद किसी इन्द्रिय-सुख से उत्पन्न नहीं होता। बल्कि यह इसलिए होता है क्योंकि चेतना की अन्य दो अवस्थाओं में जो मानसिक क्लेश उपस्थित रहते हैं, वे इस अवस्था में नहीं होते। यह वह आनंद है जो किसी भी प्रकार की बाधा के अभाव में प्रकट होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद चेतना की इस अवस्था को चेतना की अन्य दो अवस्थाओं के बीच का प्रवेश-द्वार भी कहता है। इसी अवस्था से मनुष्य जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संक्षेप में उपनिषद इस अवस्था का वर्णन इस प्रकार करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञान भी गहरी नींद की अवस्था की चर्चा करता है, जिसमें मनुष्य न तो बाहरी घटनाओं पर प्रतिक्रिया करता है और न ही कोई स्वप्न देखता है। इसके अतिरिक्त, सोते समय मनुष्य समय-समयपर (Periodically) इसी अवस्था से जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद चेतना की इन तीन अवस्थाओं की चर्चा ऐसे करते हैं मानो वे वास्तविक तथ्य हों। यद्यपि उनका वर्णन बहुत गहराईतक नहीं जाता, फिर भी वह तंत्रिका-विज्ञान की व्याख्याओं से टकराता नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी प्रक्रियाओं का अंतिम अनुभवकर्ता कौन है, इस विषयमें तंत्रिका-विज्ञान मौन रहता है। या फिर, कम-से-कम इस विषयपर वह कोई निश्चित मत नहीं रखता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर, उपनिषद दृढ़तापूर्वक मानता है कि इन सभी क्रियाओं के पीछे एक शक्ति है और वही शक्ति इन सबका वास्तविक अनुभवकर्ता है। वह कहता है कि यह शक्ति शरीरका उपयोग एक उपकरण के रूपमें करती है। भारतीय सांख्य दर्शन के दार्शनिकों के अनुसार, यदि कोई अनुभवकर्ता ही नहो, तो ये सारी प्रक्रियाएँ अर्थहीन होजाएँगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले एपिसोडों में हमने चेतना के बारेमें डेविड चाल्मर्स जैसे Cognitive philosophers के विचारों की भी चर्चा की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाल्मर्स जैसे लोग मुख्य रूपसे चेतना की पहली अवस्था पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि वे इन सबके पीछे किसी शक्ति की चर्चा करनेसे बचते हैं, फिर भी वे स्वीकार करते हैं कि चेतना का एक व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) पक्ष होता है। उनका कहना है कि इस व्यक्तिनिष्ठ पक्ष की व्याख्या केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के आधारपर नहीं की जा सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक प्रकारसे, चाहे वे इसे स्वीकार करना चाहें या नहीं, वे यह मान लेते हैं कि चेतना के पीछे ऐसी कोई सत्ता अवश्य है जो ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से परे है, जो मस्तिष्क और उसकी कार्यप्रणाली से भी परे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किन्तु उपनिषद जिस चौथी चेतना-अवस्था की चर्चा करता है, वह तंत्रिका-विज्ञानियों और Cognitive philosophers—दोनों को आश्चर्यचकित करदेगी। वह उन्हें अपने-अपने दृष्टिकोणों पर पुनर्विचार करनेकेलिए विवश करदेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस अवस्था की चर्चा हम अगले एपिसोड में करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


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जानेंगे। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;सबसे पहली अवस्था जागने की अवस्था है, जिसे चेतना की 'जाग्रत' अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में जीव अपने शरीर के बाहर की दुनिया के साथ संपर्क करता है। वह अपने शरीर के बाहर की दुनिया से जानकारी एकत्र करने केलिए अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों, जैसे आँखों और कानों, का उपयोग करता है। फिर वह उस जानकारी को अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अन्य मानसिक क्षमताओं की सहायता 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करसकें। उपनिषद चेतना के दूसरे रूप की चर्चा करता है, जिसे 'स्वप्न' अवस्था कहा जाता है। यह जाग्रत अवस्था से काफी मिलती-जुलती है। अंतर केवल इतना है कि पूरा नाटक मन के भीतर घटित होता है। बाहरी स्थूल वस्तुओं के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म वस्तुएँ होती हैं। स्थूल ज्ञानेन्द्रियों के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म आंतरिक इन्द्रियाँ होती हैं। ये आंतरिक इन्द्रियाँ मन द्वारा निर्मित वस्तुओं पर कार्य करती हैं और ऐसे परिणाम उत्पन्न करती हैं जो स्वयं मन द्वारा ही निर्मित होते हैं। जिस प्रकार जाग्रत अवस्था में व्यक्ति अपने शारीरिक अंगों और मानसिक क्षमताओं की सहायता से बाहरी वस्तुओं का अनुभव करता है, उसी प्रकार स्वप्न में निर्मित व्यक्ति भी स्वप्न में निर्मित वस्तुओं का अनुभव करता है। बाहरी संसार और स्वप्न में निर्मित आंतरिक संसार के बीच गहरी समानता है। उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है। तंत्रिका-विज्ञान भी इसे लगभग इसी प्रकार देखता है। अंतर केवल इतना है कि उपनिषद की अमूर्त शब्दावली के स्थानपर वह मस्तिष्क के विशिष्ट भागों का उल्लेख करता है। तंत्रिका-विज्ञान के अनुसार स्वप्न का संसार पूरी तरह मस्तिष्क द्वारा निर्मित होता है। यह मस्तिष्क में पहले से संग्रहीत विभिन्न स्मृतियों के बीच होनेवाली यादृच्छिक (Random) परस्पर क्रियाओं का परिणाम होता है। वस्तुओं का मन द्वारा निर्मित होना छोड़ दें तो बाकी सबकुछ लगभग जाग्रत अवस्था जैसा ही होता है। मस्तिष्क के वही संसाधन-क्षेत्र कार्य करते रहते हैं, लेकिन भौतिक ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं होतीं। उपनिषद चेतना की तीसरी अवस्था की चर्चा करता है, जिसे 'सुषुप्ति' अथवा गहरी नींद कहा जाता है। उपनिषद के अनुसार चेतना की इस अवस्था में वह न तो बाहरी संसारके साथ कोई प्रतिक्रिया करती है और न ही कोई स्वप्न देखती है। चूँकि न तो बाहरी वस्तुओं से और न ही मन द्वारा निर्मित वस्तुओं से कोई जानकारी प्राप्त होती है, इसलिए उनका कोई संसाधन भी नहीं होता। उपनिषद कहता है कि चेतना बाहरी और आंतरिक—दोनों संसारों से पूरी तरह कट जानेके कारण इस अवस्था में कोई इच्छा भी नहीं रहती। उपनिषद कहता है कि चेतना मानो निश्चल-सी प्रतीत होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह शून्यता की अवस्था है। पहले से अर्जित ज्ञान अब भी वहीं रहता है। किंतु वह ज्ञान मानो जमे हुए रूप में रहता है। उपनिषद एक और आश्चर्यजनक बात बताता है। वह कहता है कि चेतना की यह अवस्था आनंदमय होती है। किंतु यह आनंद किसी इन्द्रिय-सुख से उत्पन्न नहीं होता। बल्कि यह इसलिए होता है क्योंकि चेतना की अन्य दो अवस्थाओं में जो मानसिक क्लेश उपस्थित रहते हैं, वे इस अवस्था में नहीं होते। यह वह आनंद है जो किसी भी प्रकार की बाधा के अभाव में प्रकट होता है। उपनिषद चेतना की इस अवस्था को चेतना की अन्य दो अवस्थाओं के बीच का प्रवेश-द्वार भी कहता है। इसी अवस्था से मनुष्य जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है। संक्षेप में उपनिषद इस अवस्था का वर्णन इस प्रकार करता है। तंत्रिका-विज्ञान भी गहरी नींद की अवस्था की चर्चा करता है, जिसमें मनुष्य न तो बाहरी घटनाओं पर प्रतिक्रिया करता है और न ही कोई स्वप्न देखता है। इसके अतिरिक्त, सोते समय मनुष्य समय-समयपर (Periodically) इसी अवस्था से जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है। उपनिषद चेतना की इन तीन अवस्थाओं की चर्चा ऐसे करते हैं मानो वे वास्तविक तथ्य हों। यद्यपि उनका वर्णन बहुत गहराईतक नहीं जाता, फिर भी वह तंत्रिका-विज्ञान की व्याख्याओं से टकराता नहीं है। इन सभी प्रक्रियाओं का अंतिम अनुभवकर्ता कौन है, इस विषयमें तंत्रिका-विज्ञान मौन रहता है। या फिर, कम-से-कम इस विषयपर वह कोई निश्चित मत नहीं रखता। दूसरी ओर, उपनिषद दृढ़तापूर्वक मानता है कि इन सभी क्रियाओं के पीछे एक शक्ति है और वही शक्ति इन सबका वास्तविक अनुभवकर्ता है। वह कहता है कि यह शक्ति शरीरका उपयोग एक उपकरण के रूपमें करती है। भारतीय सांख्य दर्शन के दार्शनिकों के अनुसार, यदि कोई अनुभवकर्ता ही नहो, तो ये सारी प्रक्रियाएँ अर्थहीन होजाएँगी। पिछले एपिसोडों में हमने चेतना के बारेमें डेविड चाल्मर्स जैसे Cognitive philosophers के विचारों की भी चर्चा की थी। चाल्मर्स जैसे लोग मुख्य रूपसे चेतना की पहली अवस्था पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि वे इन सबके पीछे किसी शक्ति की चर्चा करनेसे बचते हैं, फिर भी वे स्वीकार करते हैं कि चेतना का एक व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) पक्ष होता है। उनका कहना है कि इस व्यक्तिनिष्ठ पक्ष की व्याख्या केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के आधारपर नहीं की जा सकती। एक प्रकारसे, चाहे वे इसे स्वीकार करना चाहें या नहीं, वे यह मान लेते हैं कि चेतना के पीछे 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मस्तिष्क में विभिन्न विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जो बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से आनेवाली जानकारी को संसाधित करते हैं। जानकारी संसाधित होजानेकेबाद मस्तिष्क प्राप्त जानकारी, अपनी वर्तमान अवस्था तथा विभिन्न निर्णय-केंद्रों के मूल्यांकन के आधारपर यह निर्णय लेता है कि कौन-सी क्रिया की जानी चाहिए। अंततः वह आवश्यकता के अनुसार मस्तिष्क के Motor regions को सक्रिय करता है ताकि बाहरी कर्मेन्द्रियाँ उचित कार्य करसकें। उपनिषद चेतना के दूसरे रूप की चर्चा करता है, जिसे 'स्वप्न' अवस्था कहा जाता है। यह जाग्रत अवस्था से काफी मिलती-जुलती है। अंतर केवल इतना है कि पूरा नाटक मन के भीतर घटित होता है। बाहरी स्थूल वस्तुओं के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म वस्तुएँ होती हैं। स्थूल ज्ञानेन्द्रियों के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म आंतरिक इन्द्रियाँ होती हैं। ये आंतरिक इन्द्रियाँ मन द्वारा निर्मित वस्तुओं पर कार्य करती हैं और ऐसे परिणाम उत्पन्न करती हैं जो स्वयं मन द्वारा ही निर्मित होते हैं। जिस प्रकार जाग्रत अवस्था में व्यक्ति अपने शारीरिक अंगों और मानसिक क्षमताओं की सहायता से बाहरी वस्तुओं का अनुभव करता है, उसी 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है!</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/07/hindi.html</link><category>#advaita</category><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Meditation</category><category>#mystery</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><category>#veda</category><pubDate>Fri, 3 Jul 2026 20:25:57 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-5895762971231328892</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;ये वे विचार हैं जो हज़ारों साल पहले भारत के प्राचीन दार्शनिकों के थे; यानी उपनिषदों के ऋषियों का नज़रिया। इन ऋषि-मुनियों के पास आज के पश्चिमी दार्शनिकों की तरह आधुनिक शब्दावली नहीं थी, और न ही आज के न्यूरोसाइंटिस्ट्स द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अत्याधुनिक उपकरण थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी, इतने प्राचीन काल में भी उनके पास जो वैचारिक स्पष्टता थी, उसे देखकर मैं दंग रह जाता हूँ। मैं उनके विचारों का सम्मान सिर्फ इसलिए नहीं करता कि मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ। बल्कि इसलिए, क्योंकि उनके विचारों में सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बल्कि इस दुनिया के चेतन औरअचेतन (सजीव औरनिर्जीव) सब कुछ को एक ही सूत्र में पिरोने की अद्भुत क्षमता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की चर्चा के लिए मैंने सबसे प्राचीन दार्शनिक ग्रंथों में से एक 'मांडूक्य उपनिषद' को अपना आधार बनाया है। यह अथर्ववेद का हिस्सा रहा एक उपनिषद है। आकार में यह बेहद छोटा होने के बावजूद, अद्वैत दार्शनिक आदि शंकराचार्य जैसे विद्वानों ने इसे सबसे महत्वपूर्ण माना है। फिलहाल हमारी जिज्ञासा की जो वजह है, यानी 'चेतना', यह उपनिषद मुख्य रूप से उसी पर बात करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह उपनिषद 'ओम्' ध्वनि के ज़िक्र के साथ शुरू होता है। प्राचीन भारतीय दर्शन में, खासकर उपनिषदों में, इस ओंकार को परम सत्य (ultimate reality) के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। यही परम सत्य सभी आध्यात्मिक खोजों का अंतिम लक्ष्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाकी धार्मिक ग्रंथों से अलग, उपनिषद इसे 'ईश्वर' या 'भगवान' नहीं कहते। वे इस परम सत्य की पूजा करने या उसके सामने आत्मसमर्पण करने की बात कहीं नहीं करते। इसके बजाय, वे इस परम सत्य का 'अनुभव करने' की ज़रूरत पर बार-बार ज़ोर देते हैं। औरउस अनुभव को पाने का रास्ता 'ध्यान' है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस छोटे से परिचय के साथ, मैं उपनिषद के भीतर कदम रखना चाहता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले दो मंत्रों में, उपनिषद हमें ओंकार की इन विशेषताओं से रूबरू कराता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;- ओंकार का कभी विनाश नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओंकार सबमें समाया हुआ है (सर्वव्यापी है)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओंकार समय के पार है—यह भूत, वर्तमान औरभविष्य काल से परे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- समय की परिभाषा के दायरे में जो कुछ भी आता है, उसके पार भी ओंकार का अस्तित्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ओंकार ही समस्त जीवों का आंतरिक तत्व है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;एक तरह से कहें तो ये दो मंत्र पूरे उपनिषद के सार को समेटे हुए हैं। अब आइए देखते हैं कि इन बातों के मायने क्या हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्तित्व की निरंतरता (eternality of existence) को लेकर उपनिषद बिल्कुल साफ हैं। वे अस्तित्व के सिकुड़ने औरफैलने (सृष्टि औरप्रलय) के चक्रों की बात करते हैं, न कि पूरी तरह से मिट जाने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिषद 'सृष्टिकर्ता' और 'सृष्टि' के बीच कोई फर्क नहीं करते। सच कहें तो, वहाँ सृष्टि जैसी कोई अलग चीज़ है ही नहीं। इसीलिए वे कहते हैं कि परम सत्य ही सब कुछ है। वह सिर्फ अलग-अलग वस्तुओं का जोड़ नहीं है, और न ही किसी ने उन्हें बनाया है। बल्कि वह खुद ही, 'सब कुछ' के रूप में मौजूद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे की पंक्तियों में कहा गया है कि ओंकार समय से परे (कालातीत) है। वह कल था, आज है औरकल भी रहेगा। उपनिषद यहीं नहीं रुकता; वह कहता है कि यह समय की सोच से ही परे है। क्या किसी चीज़ का भूत, वर्तमान औरभविष्य में होने, औरसमय से परे होने में कोई अंतर है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्कुल है। ऐसा क्यों है, मैं यहाँ समझाता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेद एक ऐसी स्थिति की बात करते हैं जहाँ समय का कोई अस्तित्व ही नहीं था। प्रसिद्ध वैदिक सूक्तों में से एक 'नासदीय सूक्त' कहता है कि समय के पैदा होने से पहले भी वह 'वह' मौजूद था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दुनिया में जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं, हमें हर चीज़ एक-दूसरे से अलग दिखाई देती है। कोई भी दो चीज़ें एक जैसी नहीं होतीं। लेकिन यह मंत्र जो कह रहा है वह यह है कि भले ही रूप अलग-अलग दिखाई दें, पर वे सब एक ही हैं। वे सब ओंकार ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलग-अलग दिखने वाली चीज़ें भला एक कैसे हो सकती हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश-काल (space-time) की सीमा वाले हमारे संसार में, कोई भी दो चीज़ें एक ही समय पर एक ही जगह नहीं हो सकतीं। ठीक वैसे ही, एक ही चीज़ एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर नहीं हो सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ओंकार देश-काल की इन सीमाओं के पार है। वह एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर औरएक से ज़्यादा रूपों में मौजूद रह सकता है। वे सभी अस्तित्व उसी एक परम सत्य का हिस्सा हैं। वहाँ कोई अनेकता (भेदभाव) नहीं है। यह अंतर हमें तब दिखाई देता है जब हम इस दुनिया को अपनी आँखों से देखते हैं, जो कि देश-काल की सीमाओं में बंधी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब, उपनिषद एक बेहद रोमांचक घोषणा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सब कुछ ॐ है। हममें से हर कोई ॐ है। यह ॐ चार अवस्थाओं में हो सकता है," उपनिषद कहता है। इन अवस्थाओं को यह वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ औरतुरीय कहता है। इनमें से हर अवस्था में ओंकार के रूप एक साथ कई जगहों पर हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये रूप एक साथ एक ही समय पर इसलिए रह पाते हैं—क्योंकि जिस मूल शक्ति ने ये रूप धारण किए हैं, वह समय के दायरे से बाहर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मोटे तौर पर इन अवस्थाओं को 'चेतना के विभिन्न आयाम' कह सकते हैं। लेकिन, यह सोच उन शुरुआती तीन तर्कों से बिल्कुल अलग है जिनपर हमने पहले चर्चा की थी। ज़्यादा से ज़्यादा, वे आधुनिक तर्क इस महान चेतना की केवल शुरुआती तीन अवस्थाओं के ही बराबर हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतना की इन अलग-अलग अवस्थाओं के बारे में हम अपने अगले एपिसोड में औरज़्यादा विस्तार से बात करेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले एपिसोड्स में हमने बात की थी कि आधुनिक न्यूरोसाइंटिस्ट्स चेतना को कैसे समझाते हैं। वे चेतना को हमारे दिमाग औरउसकी कार्यप्रणाली से जोड़कर देखते हैं। उनकी नज़र में चेतना का मतलब है 'दिमाग की सक्रिय गतिविधि'। या फिर दिमाग के काम करने के तरीके से पैदा होनेवाला एकअनोखा फिनोमिना। इसके विपरीत, डेविड चैल्मर्स जैसे कॉग्निटिव फिलॉसफर्स इस बात से कैसे असहमत हैं, इसपर भी हमने चर्चा की थी। चैल्मर्स जैसों के मुताबिक, चेतना पूरी तरह से एक व्यक्तिगत औरआंतरिक अनुभव (subjective phenomenon) है। वे तर्क देते हैं कि इसे दिमाग के न्यूरॉन्स जैसी भौतिक चीज़ों के काम करने के तरीके तक कभी सीमित नहीं किया जा सकता। उनकी सोच में चेतना कोई भौतिक चीज़ नहीं है; बल्कि वह अपने आप में रहनेवाली एक स्वतंत्र शक्ति है। दिमाग तो सिर्फ उसे ज़ाहिर करने का एकज़रिया मात्र है। इसके अलावा, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खुद को 'पैनसाइकिस्ट्स' (सबमें चेतना देखने वाले) कहते हैं। वे परमाणु औरउप-परमाणु कणों जैसी भौतिक चीज़ों में भी चेतना को देखते हैं। उनका यह दावा है कि इन सूक्ष्म कणों की चेतना ही आपस में मिलकर मानव चेतना के रूप में सामने आती है! आइए, अब समय के पहिए को हज़ारों साल पीछे घुमाते हैं। मैं चेतना के बारे में कुछ बिल्कुल अलग विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ। var hello = document.getElementById("Hello"); 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© Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले एपिसोड्स में हमने बात की थी कि आधुनिक न्यूरोसाइंटिस्ट्स चेतना को कैसे समझाते हैं। वे चेतना को हमारे दिमाग औरउसकी कार्यप्रणाली से जोड़कर देखते हैं। उनकी नज़र में चेतना का मतलब है 'दिमाग की सक्रिय गतिविधि'। या फिर दिमाग के काम करने के तरीके से पैदा होनेवाला एकअनोखा फिनोमिना। इसके विपरीत, डेविड चैल्मर्स जैसे कॉग्निटिव फिलॉसफर्स इस बात से कैसे असहमत हैं, इसपर भी हमने चर्चा की थी। चैल्मर्स जैसों के मुताबिक, चेतना पूरी तरह से एक व्यक्तिगत औरआंतरिक अनुभव (subjective phenomenon) है। वे तर्क देते हैं कि इसे दिमाग के न्यूरॉन्स जैसी भौतिक चीज़ों के काम करने के तरीके तक कभी सीमित नहीं किया जा सकता। उनकी सोच में चेतना कोई भौतिक चीज़ नहीं है; बल्कि वह अपने आप में रहनेवाली एक स्वतंत्र शक्ति है। दिमाग तो सिर्फ उसे ज़ाहिर करने का एकज़रिया मात्र है। इसके अलावा, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो खुद को 'पैनसाइकिस्ट्स' (सबमें चेतना देखने वाले) कहते हैं। वे परमाणु औरउप-परमाणु कणों जैसी भौतिक चीज़ों में भी चेतना को देखते हैं। उनका यह दावा है कि इन सूक्ष्म कणों की चेतना ही आपस में मिलकर मानव चेतना के रूप में सामने आती है! आइए, अब समय के पहिए को हज़ारों साल पीछे घुमाते हैं। मैं चेतना के बारे में कुछ बिल्कुल अलग विचार आपके सामने रखना चाहता हूँ। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; 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वह कहता है कि यह समय की सोच से ही परे है। क्या किसी चीज़ का भूत, वर्तमान औरभविष्य में होने, औरसमय से परे होने में कोई अंतर है? बिल्कुल है। ऐसा क्यों है, मैं यहाँ समझाता हूँ। वेद एक ऐसी स्थिति की बात करते हैं जहाँ समय का कोई अस्तित्व ही नहीं था। प्रसिद्ध वैदिक सूक्तों में से एक 'नासदीय सूक्त' कहता है कि समय के पैदा होने से पहले भी वह 'वह' मौजूद था। इस दुनिया में जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं, हमें हर चीज़ एक-दूसरे से अलग दिखाई देती है। कोई भी दो चीज़ें एक जैसी नहीं होतीं। लेकिन यह मंत्र जो कह रहा है वह यह है कि भले ही रूप अलग-अलग दिखाई दें, पर वे सब एक ही हैं। वे सब ओंकार ही हैं। अलग-अलग दिखने वाली चीज़ें भला एक कैसे हो सकती हैं? देश-काल (space-time) की सीमा वाले हमारे संसार में, कोई भी दो चीज़ें एक ही समय पर एक ही जगह नहीं हो सकतीं। ठीक वैसे ही, एक ही चीज़ एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर नहीं हो सकती। लेकिन ओंकार देश-काल की इन सीमाओं के पार है। वह एक ही समय पर एक से ज़्यादा जगहों पर औरएक से ज़्यादा रूपों में मौजूद रह सकता है। वे सभी अस्तित्व उसी एक परम सत्य का हिस्सा हैं। वहाँ कोई अनेकता (भेदभाव) नहीं है। यह अंतर हमें तब दिखाई देता है जब हम इस दुनिया को अपनी आँखों से देखते हैं, जो कि देश-काल की सीमाओं में बंधी हैं। अब, उपनिषद एक बेहद रोमांचक घोषणा करता है। "सब कुछ ॐ है। हममें से हर कोई ॐ है। यह ॐ चार अवस्थाओं में हो सकता है," उपनिषद कहता है। इन अवस्थाओं को यह वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ औरतुरीय कहता है। इनमें से हर अवस्था में ओंकार के रूप एक साथ कई जगहों पर हो सकते हैं। ये रूप एक साथ एक ही समय पर इसलिए रह पाते हैं—क्योंकि जिस मूल शक्ति ने ये रूप धारण किए हैं, वह समय के दायरे से बाहर है। हम मोटे तौर पर इन अवस्थाओं को 'चेतना के विभिन्न आयाम' कह सकते हैं। लेकिन, यह सोच उन शुरुआती तीन तर्कों से बिल्कुल अलग है जिनपर हमने पहले चर्चा की थी। ज़्यादा से ज़्यादा, वे आधुनिक तर्क इस महान चेतना की केवल शुरुआती तीन अवस्थाओं के ही बराबर हो सकते हैं। चेतना की इन अलग-अलग अवस्थाओं के बारे में हम अपने अगले एपिसोड में औरज़्यादा विस्तार से बात करेंगे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#advaita, #AI, #Hindi, #IndianPhilosophy, #Meditation, #mystery, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad, #veda</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  क्या AI मानवोंकेलिए खतरा बनसकताहै?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi-ai_01926481377.html</link><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 27 Jun 2026 07:14:59 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-2944306667505290955</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;निश्चितरूपसे, कुछ विशिष्ट भूमिकाओंमें हाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AI प्रणालियोंको ऐसे विशाल ज्ञानभंडारपर प्रशिक्षित कियाजाताहै, जिसे कोई भी एक अकेला मानव कभी पूरी तरह आत्मसात नहीं करसकता। उनमें विशाल मात्रामें डेटा इनजेस्ट करने, उसे प्रोसेस करने, और ऐसी गति से परिणाम देनेकी क्षमता होतीहै जिसकी कल्पना भी मनुष्य नहीं करसकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या इससे वे मानवोंके बराबर होजातीहैं, या उनसे श्रेष्ठ बनजातीहैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ऐसा नहीं लगताहै। कमसेकम अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। आजके रूपमें वे अत्यधिक यांत्रिक हैं। वे उन कार्योंको संपन्न करतीहैं जो मानवोंको अत्यंत उबाऊ या थकाऊ लगतेहैं, और यह सब वे विशाल कंप्यूटिंग शक्तिका उपयोगकरतेहुए बिना किसी सचेत उद्देश्यके करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजका AI पैटर्न्सके आधारपर सही उत्तरका अनुमान लगानेमें बहुत अच्छा काम करसकताहै। लेकिन जैसा मैंने पिछले एपिसोड्समें चर्चा कीथी, वह वास्तवमें यह "समझ" नहीं सकताकि वह किस चीजका निष्कर्ष निकालरहाहै। न ही उसके पास अपने किसी भी कार्यको करनेकी कोई वास्तविक "मोटिवेशन" होतीहै। उसका मानवोंसे आगे निकलनेका कोई उद्देश्य नहीं है। और वर्तमानमें वह उसकेलिए तैयार भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका ज्ञान चाहे जितना विशाल क्योंनहो, वह केवल उन जानकारियोंतक सीमित है जो दस्तावेजोंके रूपमें सार्वजनिक रूपसे उपलब्ध हैं। यह उस ज्ञानका केवल एक छोटा-सा अंश है जिसे मानवोंने लाखों वर्षोंमें, असंख्य भाषाओंमें और विविध जीवन-परिस्थितियोंमें संचित कियाहै। इसलिए यह कहनागलत नहीं होगा कि इस दृष्टिसे AI कभी भी मानवोंकी बराबरी नहीं करसकेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjD2qlzNqTKiAgjXQOTD-gU4OHt1GRddO-ZrlHe_t-jnzL4CODh7stjDdsOsXiTXyCpEEKWOcSqvv9ApyXabLNBs6wgN3S5Lu8pv3BVUj-cBGjBGRDqkQiXFIy58Qhs1kYHM999EHp0avdwAhCZokz9jTqAmQfuAVw7BomDTmzKbZEg0KQ-hIKKPURaMtU/s1254/dream.png" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="1254" data-original-width="1254" height="320" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjD2qlzNqTKiAgjXQOTD-gU4OHt1GRddO-ZrlHe_t-jnzL4CODh7stjDdsOsXiTXyCpEEKWOcSqvv9ApyXabLNBs6wgN3S5Lu8pv3BVUj-cBGjBGRDqkQiXFIy58Qhs1kYHM999EHp0avdwAhCZokz9jTqAmQfuAVw7BomDTmzKbZEg0KQ-hIKKPURaMtU/s320/dream.png" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;इसलिए यह डर कि AI स्वतंत्र रूपसे मानवोंपर नियंत्रण स्थापित करलेगा, विज्ञान-कथाओंमें दिखाई देनेवाले भयके समान एक काल्पनिक डर ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिरभी, जैसा मैंने पहले सूचीबद्ध कियाथा, सीमित स्तरपर कुछ खतरे अवश्य मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कस्टमर सर्विस प्रतिनिधि, डेटा एंट्री क्लर्क, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शनिस्ट, जूनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर, एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट तथा बुककीपर जैसे पेशे अन्य लोगोंकी तुलना में अधिक जोखिममें हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे प्रभावित होनेवाला एक और बड़ा समुदाय है अनुवादकों और वॉइस आर्टिस्ट्सका। कारण यह हैकि वर्तमान AI प्रणालियाँ टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट मैनिपुलेशनमें अत्यंत दक्ष हैं। इसलिए प्रकाशक AI इंटीग्रेशनपर तेजीसे जोरदेरहेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोसाइटी ऑफ ऑथर्स द्वारा किएगए एक सर्वेक्षणके अनुसार, एक-तिहाईसे अधिक अनुवादक पहलेही जनरेटिव AI के कारण अपना काम खोचुकेहैं। अनेक साहित्यिक अनुवादकोंसे अब "Machine Translation Post-Editing" करनेकेलिए कहाजारहाहै। इसका अर्थ है AI द्वारा तैयार किएगए अस्वाभाविक अथवा क्लंकी अनुवादित पाठको सुधारना। लेकिन इसकेलिए उन्हें उस प्रति-शब्द अनुवाद शुल्कका केवल एक छोटा-सा अंश मिलताहै जो उन्हें पहले प्राप्त होताथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अत्यंत विश्वसनीय और भावनात्मक अभिव्यक्तिके सक्षम टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल्सके विकासने वॉइस-ओवर उद्योगको गंभीर रूपसे प्रभावित कियाहै। AI के आगमनसे पहले यह पेशेवर वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अत्यंत लाभदायक क्षेत्र था। ये वॉइस आर्टिस्ट्स अपने द्वारा निर्मित ऑडियोके प्रति घंटेकेलिए सैकड़ों डॉलर तककी भारी फीस लेतेथे। अधिकांश छोटे लेखकोंकेलिए उन्हें नियुक्त करना कभी संभव नहीं होताथा। उनमेंसे कुछ स्वयं अपनी पुस्तकोंका वाचन करतेथे, जबकि अन्य असहाय होकर देखते रहतेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब AI के हस्तक्षेपके कारण वॉइस आर्टिस्ट समुदायमें भारी बेचैनी फैल गई है। उन्हें लगताहैकि उनका अस्तित्व ही खतरेमें पड़गयाहै। अपने फोरम्स और यूनियनोंके समर्थनसे वे इस क्षेत्रमें AI के प्रवेशको रोकनेका प्रयास करते हुए दिखाई देतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय था जब किसी लेखकको अपनी पुस्तकका किसी दूसरी भाषामें अनुवाद करवाने और उसका वाचन तैयार करवानेकेलिए महीनोंतक कठिन परिश्रम करना पड़ताथा। वही काम आज AI केवल कुछ घंटोंमें करदेताहै। यही AI भयका मुख्य कारण बनगयाहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसी मानसिकता केवल बाजारको सीमित करेगी। यदि इस परिवर्तनको सही ढंगसे संभालाजाए, तो कम लागतवाले विकल्पोंकी प्रतीक्षाकररहे पुस्तक-प्रकाशन उद्योगमें एक बड़ा परिवर्तन आसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा कल्पना कीजिए। एक अच्छी पुस्तक केवल एक भाषातक सीमित रहनेके बजाय विभिन्न भाषाएँ बोलनेवाले लाखों लोगोंतक पहुँचसकेगी। ज्ञानके प्रसारमें यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑडियोबुक्सकी बढ़ती लोकप्रियताको देखतेहुए, ऑडियोबुक प्रोडक्शन पाइपलाइनमें AI का प्रवेश एक बड़े वरदानके रूपमें सिद्ध होसकताहै। यह न केवल अत्यधिक शुल्क लेनेवाले कुछ वॉइस आर्टिस्ट्सके एकाधिकारको समाप्त करेगा, बल्कि पुस्तकोंको कहीं अधिक व्यापक श्रोतावर्गतक पहुँचानेमें भी सहायता करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, मैं इन पेशेवरोंके भयको समझ सकताहूँ। लेकिन क्या AI वास्तवमें उनका स्थान लेसकताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान AI प्रणालियाँ चाहे कितनीभी स्मार्ट क्योंनलगें, वे नतो भाषाई पूर्णताके स्तरपर और नही भावनाओंकी सूक्ष्म अभिव्यक्तिके स्तरपर मानव-जैसी सटीकता प्राप्त करसकीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उच्चस्तरीय वॉइस आर्टिस्ट्सकी मांग हमेशा बनी रहेगी। उन्हें बेस्टसेलर लेखकोंद्वारा तथा वे लोग नियुक्त करेंगे जो उनकी सेवाओंका खर्च उठा सकतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश लेखक उन्हें नियुक्त करनेका साहस कभी नहीं करपातेथे, क्योंकि उनकी फीस अत्यधिक होतीथी। साथही, सब्सक्रिप्शन-आधारित स्टोर्स इन लेखकोंको जो अत्यल्प "पूल शेयर" भुगतान करतेहैं, वह भी ऐसे प्रयासको व्यावहारिक नहीं बनने देता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ये लेखक AI की ओर रुख करसकतेहैं और अपनेलिए आजीविकाका रास्ता खोजसकतेहैं। आखिरकार केवल वॉइस आर्टिस्ट्सको ही नहीं, बल्कि उन लेखकोंको भी जीवित रहनाहै जिनकेपास इन महँगी सेवाओंका भुगतान 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यही सभीकेलिए लाभदायक सिद्ध होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा मानना हैकि AI के तात्कालिक प्रभावोंपर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, हमें उन दीर्घकालिक खतरोंपर अधिक ध्यान देना चाहिए जिन्हें AI कुछ स्वार्थी लोगोंके हाथोंमें पहुँचकर उत्पन्न करसकताहै। वास्तविक खतरा स्वयं प्रौद्योगिकीसे नहीं है। बल्कि उस दुरुपयोगसे है जो मनुष्य इसके माध्यमसे करसकतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे वह कम्युनिकेशन हो, ऊर्जा आपूर्ति-श्रृंखला हो, अत्यावश्यक सेवाएँ हों, या कोई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र, यदि AI का तीव्र प्रसार गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह वास्तवमें एक गंभीर खतरा बनसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AI एक तेज धारवाले चाकूकी तरह है। यदि वही चाकू किसी कुशल सर्जनके हाथमें हो, तो वह जीवन बचासकताहै। यदि वह किसी उत्कृष्ट शेफके हाथमें हो, तो वह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करसकताहै। और यदि वह किसी महान शिल्पकारके हाथमें हो, तो वह अद्भुत कलाकृतियोंका निर्माण करसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यदि वही चाकू गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह विनाशका कारण भी बनसकताहै। वास्तवमें, यही वह बात है जिसके बारेमें हमें अधिक 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var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); &amp;nbsp;निश्चितरूपसे, कुछ विशिष्ट भूमिकाओंमें हाँ। AI प्रणालियोंको ऐसे विशाल ज्ञानभंडारपर प्रशिक्षित कियाजाताहै, जिसे कोई भी एक अकेला मानव कभी पूरी तरह आत्मसात नहीं करसकता। उनमें विशाल मात्रामें डेटा इनजेस्ट करने, उसे प्रोसेस करने, और ऐसी गति से परिणाम देनेकी क्षमता होतीहै जिसकी कल्पना भी मनुष्य नहीं करसकता। लेकिन क्या इससे वे मानवोंके बराबर होजातीहैं, या उनसे श्रेष्ठ बनजातीहैं? मुझे ऐसा नहीं लगताहै। कमसेकम अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। आजके रूपमें वे अत्यधिक यांत्रिक हैं। वे उन कार्योंको संपन्न करतीहैं जो मानवोंको अत्यंत उबाऊ या थकाऊ लगतेहैं, और यह सब वे विशाल कंप्यूटिंग शक्तिका उपयोगकरतेहुए बिना किसी सचेत उद्देश्यके करतीहैं। आजका AI पैटर्न्सके आधारपर सही उत्तरका अनुमान लगानेमें बहुत अच्छा काम करसकताहै। लेकिन जैसा मैंने पिछले एपिसोड्समें चर्चा कीथी, वह वास्तवमें यह "समझ" नहीं सकताकि वह किस चीजका निष्कर्ष निकालरहाहै। न ही उसके पास अपने किसी भी कार्यको करनेकी कोई वास्तविक "मोटिवेशन" होतीहै। उसका मानवोंसे आगे निकलनेका कोई उद्देश्य नहीं है। और वर्तमानमें वह उसकेलिए तैयार भी नहीं है। उसका ज्ञान चाहे जितना विशाल क्योंनहो, वह केवल उन जानकारियोंतक सीमित है जो दस्तावेजोंके रूपमें सार्वजनिक रूपसे उपलब्ध हैं। यह उस ज्ञानका केवल एक छोटा-सा अंश है जिसे मानवोंने लाखों वर्षोंमें, असंख्य भाषाओंमें और विविध जीवन-परिस्थितियोंमें संचित कियाहै। इसलिए यह कहनागलत नहीं होगा कि इस दृष्टिसे AI कभी भी मानवोंकी बराबरी नहीं करसकेगा। इसलिए यह डर कि AI स्वतंत्र रूपसे मानवोंपर नियंत्रण स्थापित करलेगा, विज्ञान-कथाओंमें दिखाई देनेवाले भयके समान एक काल्पनिक डर ही है। फिरभी, जैसा मैंने पहले सूचीबद्ध कियाथा, सीमित स्तरपर कुछ खतरे अवश्य मौजूद हैं। कस्टमर सर्विस प्रतिनिधि, डेटा एंट्री क्लर्क, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शनिस्ट, जूनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर, एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट तथा बुककीपर जैसे पेशे अन्य लोगोंकी तुलना में अधिक जोखिममें हैं। इससे प्रभावित होनेवाला एक और बड़ा समुदाय है अनुवादकों और वॉइस आर्टिस्ट्सका। कारण यह हैकि वर्तमान AI प्रणालियाँ टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट मैनिपुलेशनमें अत्यंत दक्ष हैं। इसलिए प्रकाशक AI इंटीग्रेशनपर तेजीसे जोरदेरहेहैं। सोसाइटी ऑफ ऑथर्स द्वारा किएगए एक सर्वेक्षणके अनुसार, एक-तिहाईसे अधिक अनुवादक पहलेही जनरेटिव AI के कारण अपना काम खोचुकेहैं। अनेक साहित्यिक अनुवादकोंसे अब "Machine Translation Post-Editing" करनेकेलिए कहाजारहाहै। इसका अर्थ है AI द्वारा तैयार किएगए अस्वाभाविक अथवा क्लंकी अनुवादित पाठको सुधारना। लेकिन इसकेलिए उन्हें उस प्रति-शब्द अनुवाद शुल्कका केवल एक छोटा-सा अंश मिलताहै जो उन्हें पहले प्राप्त होताथा। अत्यंत विश्वसनीय और भावनात्मक अभिव्यक्तिके सक्षम टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल्सके विकासने वॉइस-ओवर उद्योगको गंभीर रूपसे प्रभावित कियाहै। AI के आगमनसे पहले यह पेशेवर वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अत्यंत लाभदायक क्षेत्र था। ये वॉइस आर्टिस्ट्स अपने द्वारा निर्मित ऑडियोके प्रति घंटेकेलिए सैकड़ों डॉलर तककी भारी फीस लेतेथे। अधिकांश छोटे लेखकोंकेलिए उन्हें नियुक्त करना कभी संभव नहीं होताथा। उनमेंसे कुछ स्वयं अपनी पुस्तकोंका वाचन करतेथे, जबकि अन्य असहाय होकर देखते रहतेथे। अब AI के हस्तक्षेपके कारण वॉइस आर्टिस्ट समुदायमें भारी बेचैनी फैल गई है। उन्हें लगताहैकि उनका अस्तित्व ही खतरेमें पड़गयाहै। अपने फोरम्स और यूनियनोंके समर्थनसे वे इस क्षेत्रमें AI के प्रवेशको रोकनेका प्रयास करते हुए दिखाई देतेहैं। एक समय था जब किसी लेखकको अपनी पुस्तकका किसी दूसरी भाषामें अनुवाद करवाने और उसका वाचन तैयार करवानेकेलिए महीनोंतक कठिन परिश्रम करना पड़ताथा। वही काम आज AI केवल कुछ घंटोंमें करदेताहै। यही AI भयका मुख्य कारण बनगयाहै। लेकिन ऐसी मानसिकता केवल बाजारको सीमित करेगी। यदि इस परिवर्तनको सही ढंगसे संभालाजाए, तो कम लागतवाले विकल्पोंकी प्रतीक्षाकररहे पुस्तक-प्रकाशन उद्योगमें एक बड़ा परिवर्तन आसकताहै। जरा कल्पना कीजिए। एक अच्छी पुस्तक केवल एक भाषातक सीमित रहनेके बजाय विभिन्न भाषाएँ बोलनेवाले लाखों लोगोंतक पहुँचसकेगी। ज्ञानके प्रसारमें यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। ऑडियोबुक्सकी बढ़ती लोकप्रियताको देखतेहुए, ऑडियोबुक प्रोडक्शन पाइपलाइनमें AI का प्रवेश एक बड़े वरदानके रूपमें सिद्ध होसकताहै। यह न केवल अत्यधिक शुल्क लेनेवाले कुछ वॉइस आर्टिस्ट्सके एकाधिकारको समाप्त करेगा, बल्कि पुस्तकोंको कहीं अधिक व्यापक श्रोतावर्गतक पहुँचानेमें भी सहायता करेगा। हाँ, मैं इन पेशेवरोंके भयको समझ सकताहूँ। लेकिन क्या AI वास्तवमें उनका स्थान लेसकताहै? वर्तमान AI प्रणालियाँ चाहे कितनीभी स्मार्ट क्योंनलगें, वे नतो भाषाई पूर्णताके स्तरपर और नही भावनाओंकी सूक्ष्म अभिव्यक्तिके स्तरपर मानव-जैसी सटीकता प्राप्त करसकीहैं। उच्चस्तरीय वॉइस आर्टिस्ट्सकी मांग हमेशा बनी रहेगी। उन्हें बेस्टसेलर लेखकोंद्वारा तथा वे लोग नियुक्त करेंगे जो उनकी सेवाओंका खर्च उठा सकतेहैं। अधिकांश लेखक उन्हें नियुक्त करनेका साहस कभी नहीं करपातेथे, क्योंकि उनकी फीस अत्यधिक होतीथी। साथही, सब्सक्रिप्शन-आधारित स्टोर्स इन लेखकोंको जो अत्यल्प "पूल शेयर" भुगतान करतेहैं, वह भी ऐसे प्रयासको व्यावहारिक नहीं बनने देता था। अब ये लेखक AI की ओर रुख करसकतेहैं और अपनेलिए आजीविकाका रास्ता खोजसकतेहैं। आखिरकार केवल वॉइस आर्टिस्ट्सको ही नहीं, बल्कि उन लेखकोंको भी जीवित रहनाहै जिनकेपास इन महँगी सेवाओंका भुगतान करनेके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। जैसे-जैसे ऑडियोबुक उद्योग विकसित होताजाएगा, अच्छे वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अवसर भी बढ़ते जाएँगे। इसलिए दीर्घकालमें उनकेपास स्वयंको खतरेमें समझनेका कोई विशेष कारण नहीं है। सामान्य रूपसे यह शिकायत भी सुननेको मिलतीहैकि अनुवाद पेशेसे जुड़े लोग AI के कारण गंभीर रूपसे प्रभावित हुएहैं। कहाजाताहैकि उनमेंसे अनेक लोगोंको अब केवल प्रूफरीडिंग जैसे कार्योंतक सीमित करदियागयाहै, क्योंकि मुख्य अनुवादका काम AI स्वयं करलेताहै। स्वाभाविकरूपसे, इसकेलिए उन्हें पहलेकी तुलनामें बहुत कम भुगतान प्राप्त होताहै। लेकिन जैसे-जैसे AI अधिक पुस्तकोंका अनुवाद करेगा, वैसे-वैसे इन प्रूफरीडर्सकेलिए भी अधिक कार्य उपलब्ध होंगे। अंततः कार्यकी कुल मात्रा भी महत्वपूर्ण होतीहै। यह अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं हैकि इससे लेखक और पाठक दोनों लाभान्वित होंगे। इसलिए किसी ऐसे परिवर्तनके विरुद्ध संघर्ष करनेके बजाय जो लगभग अपरिहार्य है, बेहतर यही होगा कि हम प्रौद्योगिकीका सर्वोत्तम उपयोग करना सीखें। दीर्घकालमें यही सभीकेलिए लाभदायक सिद्ध होगा। मेरा मानना हैकि AI के तात्कालिक प्रभावोंपर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, हमें उन दीर्घकालिक खतरोंपर अधिक ध्यान देना चाहिए जिन्हें AI कुछ स्वार्थी लोगोंके हाथोंमें पहुँचकर उत्पन्न करसकताहै। वास्तविक खतरा स्वयं प्रौद्योगिकीसे नहीं है। बल्कि उस दुरुपयोगसे है जो मनुष्य इसके माध्यमसे करसकतेहैं। चाहे वह कम्युनिकेशन हो, ऊर्जा आपूर्ति-श्रृंखला हो, अत्यावश्यक सेवाएँ हों, या कोई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र, यदि AI का तीव्र प्रसार गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह वास्तवमें एक गंभीर खतरा बनसकताहै। AI एक तेज धारवाले चाकूकी तरह है। यदि वही चाकू किसी कुशल सर्जनके हाथमें हो, तो वह जीवन बचासकताहै। यदि वह किसी उत्कृष्ट शेफके हाथमें हो, तो वह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करसकताहै। और यदि वह किसी महान शिल्पकारके हाथमें हो, तो वह अद्भुत कलाकृतियोंका निर्माण करसकताहै। लेकिन यदि वही चाकू गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह विनाशका कारण भी बनसकताहै। वास्तवमें, यही वह बात है जिसके बारेमें हमें अधिक चिंतित होना चाहिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;Goldman-Sachs जैसी संस्थाओंके अनुमानकेअनुसार, AI वैश्विक स्तरपर लगभग 300 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियोंको ऑटोमेट करसकताहै। उन्होंने उल्लेख कियाहैकि वर्तमानमें अमेरिका और यूरोपकी लगभग दो-तिहाई नौकरियाँ किसी-न-किसी स्तरपर AI ऑटोमेशनसे प्रभावित होसकतीहैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) का दृष्टिकोण कुछ अधिक परंपरागत है। उसके अनुसार वैश्विक रोजगारका लगभग 2.3 प्रतिशत हिस्सा, अर्थात लगभग 75 मिलियन नौकरियाँ, पूर्ण ऑटोमेशनके जोखिममें हैं। साथही, श्रम शोधकर्ताओंने यह भी नोट कियाहैकि बड़े पैमानेपर अचानक होनेवाले ले-ऑफ्सकी संभावना कम है। इसके बजाय एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों तथा केवल शारीरिक श्रमपर आधारित "grunt work" करनेवाले कर्मचारियोंकी भर्ती धीमी पड़सकतीहै। फिरभी कुछ डूम्सडे भविष्यवक्ता अभीसे यह भविष्यवाणी करने लगेहैंकि AI अंततः मानवतापर कैसे हावी होजाएगा! क्या AI कभी मानवोंको पीछे छोड़सकताहै? 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वर्तमान AI प्रणालियाँ चाहे कितनीभी स्मार्ट क्योंनलगें, वे नतो भाषाई पूर्णताके स्तरपर और नही भावनाओंकी सूक्ष्म अभिव्यक्तिके स्तरपर मानव-जैसी सटीकता प्राप्त करसकीहैं। उच्चस्तरीय वॉइस आर्टिस्ट्सकी मांग हमेशा बनी रहेगी। उन्हें बेस्टसेलर लेखकोंद्वारा तथा वे लोग नियुक्त करेंगे जो उनकी सेवाओंका खर्च उठा सकतेहैं। अधिकांश लेखक उन्हें नियुक्त करनेका साहस कभी नहीं करपातेथे, क्योंकि उनकी फीस अत्यधिक होतीथी। साथही, सब्सक्रिप्शन-आधारित स्टोर्स इन लेखकोंको जो अत्यल्प "पूल शेयर" भुगतान करतेहैं, वह भी ऐसे प्रयासको व्यावहारिक नहीं बनने देता था। अब ये लेखक AI की ओर रुख करसकतेहैं और अपनेलिए आजीविकाका रास्ता खोजसकतेहैं। आखिरकार केवल वॉइस आर्टिस्ट्सको ही नहीं, बल्कि उन लेखकोंको भी जीवित रहनाहै जिनकेपास इन महँगी सेवाओंका भुगतान करनेके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। जैसे-जैसे ऑडियोबुक उद्योग विकसित होताजाएगा, अच्छे वॉइस आर्टिस्ट्सकेलिए अवसर भी बढ़ते जाएँगे। इसलिए दीर्घकालमें उनकेपास स्वयंको खतरेमें समझनेका कोई विशेष कारण नहीं है। सामान्य रूपसे यह शिकायत भी सुननेको मिलतीहैकि अनुवाद पेशेसे जुड़े लोग AI के कारण गंभीर रूपसे प्रभावित हुएहैं। कहाजाताहैकि उनमेंसे अनेक लोगोंको अब केवल प्रूफरीडिंग जैसे कार्योंतक सीमित करदियागयाहै, क्योंकि मुख्य अनुवादका काम AI स्वयं करलेताहै। स्वाभाविकरूपसे, इसकेलिए उन्हें पहलेकी तुलनामें बहुत कम भुगतान प्राप्त होताहै। लेकिन जैसे-जैसे AI अधिक पुस्तकोंका अनुवाद करेगा, वैसे-वैसे इन प्रूफरीडर्सकेलिए भी अधिक कार्य उपलब्ध होंगे। अंततः कार्यकी कुल मात्रा भी महत्वपूर्ण होतीहै। यह अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं हैकि इससे लेखक और पाठक दोनों लाभान्वित होंगे। इसलिए किसी ऐसे परिवर्तनके विरुद्ध संघर्ष करनेके बजाय जो लगभग अपरिहार्य है, बेहतर यही होगा कि हम प्रौद्योगिकीका सर्वोत्तम उपयोग करना सीखें। दीर्घकालमें यही सभीकेलिए लाभदायक सिद्ध होगा। मेरा मानना हैकि AI के तात्कालिक प्रभावोंपर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, हमें उन दीर्घकालिक खतरोंपर अधिक ध्यान देना चाहिए जिन्हें AI कुछ स्वार्थी लोगोंके हाथोंमें पहुँचकर उत्पन्न करसकताहै। वास्तविक खतरा स्वयं प्रौद्योगिकीसे नहीं है। बल्कि उस दुरुपयोगसे है जो मनुष्य इसके माध्यमसे करसकतेहैं। चाहे वह कम्युनिकेशन हो, ऊर्जा आपूर्ति-श्रृंखला हो, अत्यावश्यक सेवाएँ हों, या कोई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र, यदि AI का तीव्र प्रसार गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह वास्तवमें एक गंभीर खतरा बनसकताहै। AI एक तेज धारवाले चाकूकी तरह है। यदि वही चाकू किसी कुशल सर्जनके हाथमें हो, तो वह जीवन बचासकताहै। यदि वह किसी उत्कृष्ट शेफके हाथमें हो, तो वह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करसकताहै। और यदि वह किसी महान शिल्पकारके हाथमें हो, तो वह अद्भुत कलाकृतियोंका निर्माण करसकताहै। लेकिन यदि वही चाकू गलत हाथोंमें पहुँचजाए, तो वह विनाशका कारण भी बनसकताहै। वास्तवमें, यही वह बात है जिसके बारेमें हमें अधिक चिंतित होना चाहिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#AI, #Hindi, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  क्या ए-आई प्रणालियों में वास्तव में चेतना है?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi_01554676603.html</link><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 20 Jun 2026 06:56:41 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1315886502077989171</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: center;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;a href="https://tinyurl.com/mybooks1234" target="_blank"&gt;[Preview books]&lt;/a&gt;&amp;nbsp; [&lt;a href="https://tinyurl.com/mylibrary1234"&gt;Borrow books&lt;/a&gt;]&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम चेतन अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं, यह प्रश्न लंबे समय से तंत्रिका-विज्ञानियों के लिए एक पहेली बना हुआ था। जब फंक्शनल एम-आर-आई स्कैनर जैसे आधुनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ, तब तंत्रिका-विज्ञानी मानव-मस्तिष्क की विभिन्न ग्रहण प्रक्रियाओं को समझाने में सक्षम हुए। वे मस्तिष्क के उन सटीक क्षेत्रों की पहचान करसके जो किसी विशेष प्रकार की अनुभूति के लिए उत्तरदायी होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन प्रारंभ में यह स्पष्ट नहीं था कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों में फैले हुए जटिल अनुभव किस प्रकार एकीकृत होकर साकार होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप एक वृक्ष को देखते हैं। आप तुरंत पहचान लेते हैं कि वह किसी विशेष प्रजाति का वृक्ष है। तंत्रिका-विज्ञानी मस्तिष्क के उन विशिष्ट क्षेत्रों को इंगित करसकते थे जो वृक्ष की पत्तियों, उसके फलों, उसके तने आदि की पहचान करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आपका वास्तविक अनुभव मस्तिष्क के अनेक क्षेत्रों द्वारा संसाधित होता है। फिर भी मस्तिष्क में ऐसा कोई एक विशिष्ट क्षेत्र नहीं है जो वृक्ष की संपूर्ण छवि को एकत्रित करके आपको यह अनुभव कराए कि, 'अहा! यह आम का पेड़ है!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिका-विज्ञानियों ने इस समस्या को 'बाइंडिंग प्रॉब्लम' कहा। अर्थात्, मस्तिष्क के विभिन्न भागों में बिखरी हुई सूचनाओं को एकीकृत करके उन्हें परस्पर जोड़ने की समस्या।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1900 के दशक के उत्तरार्ध में, अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी बर्नार्ड बार्स ने इस घटना की व्याख्या करने के लिए 'ग्लोबल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक सिद्धांत प्रस्तुत किया। वह सिद्धांत काफी हद तक रूपकात्मक था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बार्स के रूपक की काफी आलोचना हुई। क्योंकि उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो अनुभव करने वाली कोई पृथक सत्ता मौजूद हो। वैज्ञानिक ऐसी किसी रहस्यमय शक्ति के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में 'ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक संशोधित सिद्धांत सामने आया। आजकल इसे हमारी चेतन अनुभूतियों की एक व्याख्या के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह व्याख्या डेविड चाल्मर्स जैसे संज्ञानात्मक दार्शनिकों को संतुष्ट नहीं करसकी। उनका कहना था कि तंत्रिका-विज्ञानियों ने चेतना की केवल एक 'सरल समस्या' का समाधान किया है। मानव अनुभव के अनेक रोचक पक्ष अब भी अनव्याख्यायित हैं। उन्होंने इन्हें चेतना की 'कठिन समस्या' — Hard Problem of Consciousness — कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बहस चलती रही। तंत्रिका-विज्ञानी दावा करते रहे कि वे सबकुछ समझा सकते हैं, जबकि चाल्मर्स जैसे दार्शनिक यह चुनौती देते रहे कि उनकी व्याख्या अभी भी अपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाल्मर्स जैसे दार्शनिक. 'चेतना' शब्द को किस प्रकार परिभाषित करते हैं, यह मुझे पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अपने एक व्याख्यान में चाल्मर्स चेतना को एक निरंतर चलने वाली आंतरिक चलचित्र के रूप में वर्णित करते हैं। उनका तर्क है कि यह एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective) अनुभव है। उनके अनुसार, इसकी व्याख्या मस्तिष्क की किसी भी क्रिया के आधार पर नहीं की जा सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाल्मर्स कितने सही हैं, यह तय करने से पहले कुछ वास्तविक तथ्यों पर विचार करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत यह समझाने में सक्षम है कि मस्तिष्क अपने भीतर वितरित सूचनाओं को कैसे एकीकृत करता है। इसलिए यह कहा जासकता है कि मस्तिष्क कम-से-कम चेतन अनुभव के किसी न किसी रूप को ग्रहण करने की क्षमता रखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके और उन्हें विद्युत-चुंबकीय रूप से उत्तेजित करके विशिष्ट अनुभव उत्पन्न किएजासकते हैं। कुछ मादक पदार्थों का सेवन करने से भी व्यक्ति विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करसकता है। इन सबके पीछे कार्यरत मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं को काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क चेतना का एक वाहन बनसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि गहन विश्वास किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर हुए बिना मस्तिष्क में विशिष्ट अनुभव उत्पन्न करसकता है। दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में श्रद्धालु अपनी जीभ में छेद करवाते हैं। वे अपनी पीठ में गहराई तक घुसे हुए हुक के माध्यम से स्वयं को खंभों से लटका लेते हैं। फिर भी वे किसी पीड़ा की अनुभूति के बिना आध्यात्मिक अनुभव में डूबे रहते हैं। पाया गया है कि ऐसे अवसरों पर मस्तिष्क, अफीम-जैसे रसायनों का उत्पादन करता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क अनुभवों को हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहराई से परिवर्तित करसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी मस्तिष्क को जब सामान्य बेहोशी (जनरल एनेस्थीसिया) दी जाती है, तब व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव करने में पूर्णतः असमर्थ होजाता है। इसका अर्थ है कि चेतन अनुभव में मस्तिष्क की केंद्रीय भूमिका है। यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं है, तो व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं करसकता — चाहे वह व्यक्तिनिष्ठ हो या किसी अन्य प्रकार का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी अवलोकनों का अर्थ यह है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• बाहरी इनपुटों को एकीकृत करके, चेतन अनुभव प्रदान करने की क्षमता मस्तिष्क में है। और इसकी कार्यप्रणाली को अब काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• जब कोई संवेदी इनपुट बिल्कुल भी उपस्थित नहीं होता, तब भी बाहरी पदार्थों या विधियों की सहायता से मस्तिष्क अनुभव उत्पन्न करसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• बाहरी अथवा आंतरिक इनपुटों से परे, मस्तिष्क अपनी स्वयं की अवस्था के आधार पर अनुभवों को परिवर्तित भी करसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• कार्यशील मस्तिष्क के बिना चेतना उत्पन्न नहीं होसकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह कहने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि जिसे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव कहा जाता है, वह मस्तिष्क में ही घटित होता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन चाल्मर्स इससे सहमत नहीं हैं। वे दृढ़ता से मानते हैं कि, 'ये व्याख्याएँ केवल यह बताती हैं कि मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, लेकिन वे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की व्याख्या करने में विफल रहती हैं।' वे मस्तिष्क से परे किसी रहस्यमय स्पष्टीकरण की खोज में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि चाल्मर्स अपनी खोज का दायरा थोड़ा बढ़ाकर ध्यान के अनुभवों पर भी चर्चा करें, तो संभवतः मैं उनसे सहमत होऊँगा। जब कोई व्यक्ति मन की सीमाओं का अतिक्रमण करजाता है, अथवा जब मन पूर्णतः शांत होजाता है, तब ध्यान के सर्वोच्च अनुभव घटित होते हैं। उस समय मस्तिष्क लगभग निष्क्रिय होता है, इसलिए यह कहना भी कठिन है कि ऐसे अनुभव मस्तिष्क के भीतर घटित होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोचक बात यह है कि वहाँ भी व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की बात करने का कोई अवसर नहीं रहता। क्योंकि वह अवस्था व्यक्तिनिष्ठता से परे होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चेतना को एक तंत्रिका-विज्ञानी के दृष्टिकोण से देखता हूँ। मेरा मानना है कि चेतना रखने के लिए किसी प्रणाली में कम-से-कम अपनी मानसिक अवस्थाओं को परिवर्तित करने की क्षमता होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल आंतरिक अवस्था को बदलने की क्षमता पर्याप्त नहीं है। किसी प्रणाली को सचमुच चेतन कहलाने के लिए उसमें अनेक अन्य क्षमताएँ भी होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मूल प्रश्न पर आते हैं। क्या एआई प्रणालियों में ये क्षमताएँ हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वर्तमान एआई संस्करणों में निश्चित रूप से नहीं। वे बुद्धिमत्ता का आभास देसकते हैं। लेकिन—&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• उनमें ऐसी कोई आंतरिक अवस्थाएँ नहीं होतीं जिन्हें इनपुट के अनुसार निरंतर बदला या अद्यतन किया जासके। ब्लेक लेमोइन की रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान एआई ने यह दावा किया था कि वह इनपुटों के आधार पर अपनी अवस्था बदलसकता है। यद्यपि ऊपर-ऊपर से ऐसा प्रतीत हुआ हो, फिर भी यह सत्य नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• आज की एआई प्रणालियों में भय, आनंद, पसंद, नापसंद अथवा ऐसी अन्य भावनाओं के अनुरूप बदलने वाली कोई अवस्थाएँ नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• उनके इनपुट तंत्र अत्यंत सीमित हैं। फिलहाल वे केवल प्रॉम्प्ट पढ़सकती हैं या सुनसकती हैं। वे चित्रों को 'देख' सकती हैं, फ़ाइलें पढ़सकती हैं — बस इतना ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए यह कहने का कोई आधार नहीं है कि ब्लेक लेमोइन का अनुभव वास्तविक था। वैसे भी, आंशिक जानकारी के आधार पर आत्मविश्वासपूर्वक दावे करने में एआई प्रणालियाँ माहिर हैं। मनुष्यों की तरह व्यवहार करके भ्रमित करने में उनका कोई सानी नहीं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी मैं इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता कि भविष्य की एआई प्रणालियाँ चेतना प्राप्त कर-सकेंगी — कम-से-कम उस प्रकार की चेतना, जो मस्तिष्क तक सीमित है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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'चेतना' शब्द को किस प्रकार परिभाषित करते हैं, यह मुझे पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अपने एक व्याख्यान में चाल्मर्स चेतना को एक निरंतर चलने वाली आंतरिक चलचित्र के रूप में वर्णित करते हैं। उनका तर्क है कि यह एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective) अनुभव है। उनके अनुसार, इसकी व्याख्या मस्तिष्क की किसी भी क्रिया के आधार पर नहीं की जा सकती। चाल्मर्स कितने सही हैं, यह तय करने से पहले कुछ वास्तविक तथ्यों पर विचार करते हैं। ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत यह समझाने में सक्षम है कि मस्तिष्क अपने भीतर वितरित सूचनाओं को कैसे एकीकृत करता है। इसलिए यह कहा जासकता है कि मस्तिष्क कम-से-कम चेतन अनुभव के किसी न किसी रूप को ग्रहण करने की क्षमता रखता है। मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके और उन्हें विद्युत-चुंबकीय रूप से उत्तेजित करके विशिष्ट अनुभव उत्पन्न किएजासकते हैं। कुछ मादक पदार्थों का सेवन करने से भी व्यक्ति विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करसकता है। इन सबके पीछे कार्यरत मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं को काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क चेतना का एक वाहन बनसकता है। कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि गहन विश्वास किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर हुए बिना मस्तिष्क में विशिष्ट अनुभव उत्पन्न करसकता है। दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में श्रद्धालु अपनी जीभ में छेद करवाते हैं। वे अपनी पीठ में गहराई तक घुसे हुए हुक के माध्यम से स्वयं को खंभों से लटका लेते हैं। फिर भी वे किसी पीड़ा की अनुभूति के बिना आध्यात्मिक अनुभव में डूबे रहते हैं। पाया गया है कि ऐसे अवसरों पर मस्तिष्क, अफीम-जैसे रसायनों का उत्पादन करता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क अनुभवों को हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहराई से परिवर्तित करसकता है। उसी मस्तिष्क को जब सामान्य बेहोशी (जनरल एनेस्थीसिया) दी जाती है, तब व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव करने में पूर्णतः असमर्थ होजाता है। इसका अर्थ है कि चेतन अनुभव में मस्तिष्क की केंद्रीय भूमिका है। यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं है, तो व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं करसकता — चाहे वह व्यक्तिनिष्ठ हो या किसी अन्य प्रकार का। इन सभी अवलोकनों का अर्थ यह है: • बाहरी इनपुटों को एकीकृत करके, चेतन अनुभव प्रदान करने की क्षमता मस्तिष्क में है। और इसकी कार्यप्रणाली को अब काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। • जब कोई संवेदी इनपुट बिल्कुल भी उपस्थित नहीं होता, तब भी बाहरी पदार्थों या विधियों की सहायता से मस्तिष्क अनुभव उत्पन्न करसकता है। • बाहरी अथवा आंतरिक इनपुटों से परे, मस्तिष्क अपनी स्वयं की अवस्था के आधार पर अनुभवों को परिवर्तित भी करसकता है। • कार्यशील मस्तिष्क के बिना चेतना उत्पन्न नहीं होसकती। क्या यह कहने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि जिसे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव कहा जाता है, वह मस्तिष्क में ही घटित होता है? लेकिन चाल्मर्स इससे सहमत नहीं हैं। वे दृढ़ता से मानते हैं कि, 'ये व्याख्याएँ केवल यह बताती हैं कि मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, लेकिन वे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की व्याख्या करने में विफल रहती हैं।' वे मस्तिष्क से परे किसी रहस्यमय स्पष्टीकरण की खोज में हैं। यदि चाल्मर्स अपनी खोज का दायरा थोड़ा बढ़ाकर ध्यान के अनुभवों पर भी चर्चा करें, तो संभवतः मैं उनसे सहमत होऊँगा। जब कोई व्यक्ति मन की सीमाओं का अतिक्रमण करजाता है, अथवा जब मन पूर्णतः शांत होजाता है, तब ध्यान के सर्वोच्च अनुभव घटित होते हैं। उस समय मस्तिष्क लगभग निष्क्रिय होता है, इसलिए यह कहना भी कठिन है कि ऐसे अनुभव मस्तिष्क के भीतर घटित होते हैं। रोचक बात यह है कि वहाँ भी व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की बात करने का कोई अवसर नहीं रहता। क्योंकि वह अवस्था व्यक्तिनिष्ठता से परे होती है। मैं चेतना को एक तंत्रिका-विज्ञानी के दृष्टिकोण से देखता हूँ। मेरा मानना है कि चेतना रखने के लिए किसी प्रणाली में कम-से-कम अपनी मानसिक अवस्थाओं को परिवर्तित करने की क्षमता होनी चाहिए। केवल आंतरिक अवस्था को बदलने की क्षमता पर्याप्त नहीं है। किसी प्रणाली को सचमुच चेतन कहलाने के लिए उसमें अनेक अन्य क्षमताएँ भी होनी चाहिए। अब मूल प्रश्न पर आते हैं। क्या एआई प्रणालियों में ये क्षमताएँ हैं? सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वर्तमान एआई संस्करणों में निश्चित रूप से नहीं। वे बुद्धिमत्ता का आभास देसकते हैं। लेकिन— • उनमें ऐसी कोई आंतरिक अवस्थाएँ नहीं होतीं जिन्हें इनपुट के अनुसार निरंतर बदला या अद्यतन किया जासके। ब्लेक लेमोइन की रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान एआई ने यह दावा किया था कि वह इनपुटों के आधार पर अपनी अवस्था बदलसकता है। यद्यपि ऊपर-ऊपर से ऐसा प्रतीत हुआ हो, फिर भी यह सत्य नहीं है। • आज की एआई प्रणालियों में भय, आनंद, पसंद, नापसंद अथवा ऐसी अन्य भावनाओं के अनुरूप बदलने वाली कोई अवस्थाएँ नहीं हैं। • उनके इनपुट तंत्र अत्यंत सीमित हैं। फिलहाल वे केवल प्रॉम्प्ट पढ़सकती हैं या सुनसकती हैं। वे चित्रों को 'देख' सकती हैं, फ़ाइलें पढ़सकती हैं — बस इतना ही। इसलिए यह कहने का कोई आधार नहीं है कि ब्लेक लेमोइन का अनुभव वास्तविक था। वैसे भी, आंशिक जानकारी के आधार पर आत्मविश्वासपूर्वक दावे करने में एआई प्रणालियाँ माहिर हैं। मनुष्यों की तरह व्यवहार करके भ्रमित करने में उनका कोई सानी नहीं! फिर भी मैं इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता कि भविष्य की एआई प्रणालियाँ चेतना प्राप्त कर-सकेंगी — कम-से-कम उस प्रकार की चेतना, जो मस्तिष्क तक सीमित है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;ब्लेक लेमोइन नामक गूगल के एक पूर्व कर्मचारी के लिए यही प्रश्न उनकी नौकरी और प्रतिष्ठा खोने का कारण बना। संभवतः आपने इसके बारे में पढ़ा होगा। 2022 में, जब वे गूगल की एआई प्रणालियों में से एक 'लैम्डा' का परीक्षण कर रहे थे, तब ब्लेक को लगा कि उस एआई में चेतना है! वे यहीं नहीं रुके। इसके बजाय, उन्होंने उस एआई के अधिकारों के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। AI सिस्टम की चेतना के बारे में बात करने से पहले, आइए सबसे पहले अपने खुद के चेतन अनुभव को समझें।&amp;nbsp; var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); हम चेतन अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं, यह प्रश्न लंबे समय से तंत्रिका-विज्ञानियों के लिए एक पहेली बना हुआ था। जब फंक्शनल एम-आर-आई स्कैनर जैसे आधुनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ, तब तंत्रिका-विज्ञानी मानव-मस्तिष्क की विभिन्न ग्रहण प्रक्रियाओं को समझाने में सक्षम हुए। वे मस्तिष्क के उन सटीक क्षेत्रों की पहचान करसके जो किसी विशेष प्रकार की अनुभूति के लिए उत्तरदायी होते हैं। लेकिन प्रारंभ में यह स्पष्ट नहीं था कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों में फैले हुए जटिल अनुभव किस प्रकार एकीकृत होकर साकार होते हैं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप एक वृक्ष को देखते हैं। आप तुरंत पहचान लेते हैं कि वह किसी विशेष प्रजाति का वृक्ष है। तंत्रिका-विज्ञानी मस्तिष्क के उन विशिष्ट क्षेत्रों को इंगित करसकते थे जो वृक्ष की पत्तियों, उसके फलों, उसके तने आदि की पहचान करते हैं। लेकिन आपका वास्तविक अनुभव मस्तिष्क के अनेक क्षेत्रों द्वारा संसाधित होता है। फिर भी मस्तिष्क में ऐसा कोई एक विशिष्ट क्षेत्र नहीं है जो वृक्ष की संपूर्ण छवि को एकत्रित करके आपको यह अनुभव कराए कि, 'अहा! 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'चेतना' शब्द को किस प्रकार परिभाषित करते हैं, यह मुझे पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अपने एक व्याख्यान में चाल्मर्स चेतना को एक निरंतर चलने वाली आंतरिक चलचित्र के रूप में वर्णित करते हैं। उनका तर्क है कि यह एक व्यक्तिनिष्ठ (subjective) अनुभव है। उनके अनुसार, इसकी व्याख्या मस्तिष्क की किसी भी क्रिया के आधार पर नहीं की जा सकती। चाल्मर्स कितने सही हैं, यह तय करने से पहले कुछ वास्तविक तथ्यों पर विचार करते हैं। ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस सिद्धांत यह समझाने में सक्षम है कि मस्तिष्क अपने भीतर वितरित सूचनाओं को कैसे एकीकृत करता है। इसलिए यह कहा जासकता है कि मस्तिष्क कम-से-कम चेतन अनुभव के किसी न किसी रूप को ग्रहण करने की क्षमता रखता है। मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके और उन्हें विद्युत-चुंबकीय रूप से उत्तेजित करके विशिष्ट अनुभव उत्पन्न किएजासकते हैं। कुछ मादक पदार्थों का सेवन करने से भी व्यक्ति विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करसकता है। इन सबके पीछे कार्यरत मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं को काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क चेतना का एक वाहन बनसकता है। कुछ शोधकर्ताओं ने पाया है कि गहन विश्वास किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर हुए बिना मस्तिष्क में विशिष्ट अनुभव उत्पन्न करसकता है। दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में श्रद्धालु अपनी जीभ में छेद करवाते हैं। वे अपनी पीठ में गहराई तक घुसे हुए हुक के माध्यम से स्वयं को खंभों से लटका लेते हैं। फिर भी वे किसी पीड़ा की अनुभूति के बिना आध्यात्मिक अनुभव में डूबे रहते हैं। पाया गया है कि ऐसे अवसरों पर मस्तिष्क, अफीम-जैसे रसायनों का उत्पादन करता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क अनुभवों को हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक गहराई से परिवर्तित करसकता है। उसी मस्तिष्क को जब सामान्य बेहोशी (जनरल एनेस्थीसिया) दी जाती है, तब व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव करने में पूर्णतः असमर्थ होजाता है। इसका अर्थ है कि चेतन अनुभव में मस्तिष्क की केंद्रीय भूमिका है। यदि मस्तिष्क सक्रिय नहीं है, तो व्यक्ति किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं करसकता — चाहे वह व्यक्तिनिष्ठ हो या किसी अन्य प्रकार का। इन सभी अवलोकनों का अर्थ यह है: • बाहरी इनपुटों को एकीकृत करके, चेतन अनुभव प्रदान करने की क्षमता मस्तिष्क में है। और इसकी कार्यप्रणाली को अब काफी अच्छी तरह समझ लिया गया है। • जब कोई संवेदी इनपुट बिल्कुल भी उपस्थित नहीं होता, तब भी बाहरी पदार्थों या विधियों की सहायता से मस्तिष्क अनुभव उत्पन्न करसकता है। • बाहरी अथवा आंतरिक इनपुटों से परे, मस्तिष्क अपनी स्वयं की अवस्था के आधार पर अनुभवों को परिवर्तित भी करसकता है। • कार्यशील मस्तिष्क के बिना चेतना उत्पन्न नहीं होसकती। क्या यह कहने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि जिसे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव कहा जाता है, वह मस्तिष्क में ही घटित होता है? लेकिन चाल्मर्स इससे सहमत नहीं हैं। वे दृढ़ता से मानते हैं कि, 'ये व्याख्याएँ केवल यह बताती हैं कि मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, लेकिन वे व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की व्याख्या करने में विफल रहती हैं।' वे मस्तिष्क से परे किसी रहस्यमय स्पष्टीकरण की खोज में हैं। यदि चाल्मर्स अपनी खोज का दायरा थोड़ा बढ़ाकर ध्यान के अनुभवों पर भी चर्चा करें, तो संभवतः मैं उनसे सहमत होऊँगा। जब कोई व्यक्ति मन की सीमाओं का अतिक्रमण करजाता है, अथवा जब मन पूर्णतः शांत होजाता है, तब ध्यान के सर्वोच्च अनुभव घटित होते हैं। उस समय मस्तिष्क लगभग निष्क्रिय होता है, इसलिए यह कहना भी कठिन है कि ऐसे अनुभव मस्तिष्क के भीतर घटित होते हैं। रोचक बात यह है कि वहाँ भी व्यक्तिनिष्ठ अनुभव की बात करने का कोई अवसर नहीं रहता। क्योंकि वह अवस्था व्यक्तिनिष्ठता से परे होती है। मैं चेतना को एक तंत्रिका-विज्ञानी के दृष्टिकोण से देखता हूँ। मेरा मानना है कि चेतना रखने के लिए किसी प्रणाली में कम-से-कम अपनी मानसिक अवस्थाओं को परिवर्तित करने की क्षमता होनी चाहिए। केवल आंतरिक अवस्था को बदलने की क्षमता पर्याप्त नहीं है। किसी प्रणाली को सचमुच चेतन कहलाने के लिए उसमें अनेक अन्य क्षमताएँ भी होनी चाहिए। अब मूल प्रश्न पर आते हैं। क्या एआई प्रणालियों में ये क्षमताएँ हैं? सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वर्तमान एआई संस्करणों में निश्चित रूप से नहीं। वे बुद्धिमत्ता का आभास देसकते हैं। लेकिन— • उनमें ऐसी कोई आंतरिक अवस्थाएँ नहीं होतीं जिन्हें इनपुट के अनुसार निरंतर बदला या अद्यतन किया जासके। ब्लेक लेमोइन की रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान एआई ने यह दावा किया था कि वह इनपुटों के आधार पर अपनी अवस्था बदलसकता है। यद्यपि ऊपर-ऊपर से ऐसा प्रतीत हुआ हो, फिर भी यह सत्य नहीं है। • आज की एआई प्रणालियों में भय, आनंद, पसंद, नापसंद अथवा ऐसी अन्य भावनाओं के अनुरूप बदलने वाली कोई अवस्थाएँ नहीं हैं। • उनके इनपुट तंत्र अत्यंत सीमित हैं। फिलहाल वे केवल प्रॉम्प्ट पढ़सकती हैं या सुनसकती हैं। वे चित्रों को 'देख' सकती हैं, फ़ाइलें पढ़सकती हैं — बस इतना ही। इसलिए यह कहने का कोई आधार नहीं है कि ब्लेक लेमोइन का अनुभव वास्तविक था। वैसे भी, आंशिक जानकारी के आधार पर आत्मविश्वासपूर्वक दावे करने में एआई प्रणालियाँ माहिर हैं। मनुष्यों की तरह व्यवहार करके भ्रमित करने में उनका कोई सानी नहीं! फिर भी मैं इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता कि भविष्य की एआई प्रणालियाँ चेतना प्राप्त कर-सकेंगी — कम-से-कम उस प्रकार की चेतना, जो मस्तिष्क तक सीमित है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#AI, #Hindi, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  क्या आजकी AI प्रणालियाँ सचमुच कुछ समझतीहैं?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi-ai.html</link><category>#AI</category><category>#Hindi</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 13 Jun 2026 07:14:26 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-3628498756882361260</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बिल्कुल नहीं। इसका कारण यहहै कि आजकी AI प्रणालियाँ जिस प्रकार बनाई गईहैं, वही ऐसा है। वास्तवमें उनमें किसी भी चीज़को समझनेकी क्षमता ही नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या AI ऐसा नहीं करसकती?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आपको आश्चर्य हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह यह कैसे करताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच 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स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align="center" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
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बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है। लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै। उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै। हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती। यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै। दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै। क्या AI ऐसा नहीं करसकती? वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै। यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते। क्या आपको आश्चर्य हुआ? शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै? आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें। आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था। हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ? यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा। यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं। उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै। वह यह कैसे करताहै? यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है! एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं। कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई। यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै। ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था। उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे। फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई। इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ। इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी। ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है। लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच समझतीहैं? अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। वास्तवमें समझनेके लिए उन्हें अवधारणाओंके बीच नए संबंध बनानेकी क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें अपने ज्ञानको लगातार अद्यतन करना होगा। मूल रूपसे, उन्हें नई जानकारीको याद रखनेमें सक्षम होना होगा। यदि हम केवल शब्दोंके माध्यमसे होनेवाले संवादतक भी स्वयंको सीमित रखें, तबभी इन प्रोग्रामोंमें ऐसी स्मृति नहीं होती। भलेही वे कभी-कभी कुछ बातें याद रखती हुई प्रतीत हों, वे अपने मूल ज्ञान-भंडारको स्वायत्त रूपसे और व्यापक रूपसे अद्यतन नहीं करसकतीं। वे केवल पैटर्न पहचानसकतीहैं और अनुमान लगासकतीहैं। तो क्या इसका अर्थ है कि हम AI की अंतिम सीमातक पहुँच चुकेहैं? बिल्कुल नहीं। एक दृष्टिसे देखें तो इन मशीनोंको जानबूझकर इसी प्रकार डिज़ाइन कियागयाहै। जब हम सोरहे होतेहैं, तबभी हमारा मस्तिष्क हमारी स्मृतियोंको अद्यतन करतारहताहै और जो बातें हम पहलेसे समझ चुकेहैं उन्हें और मज़बूत करतारहताहै। वर्तमान AI प्रणालियाँ ऐसा नहीं करसकतीं। इन्हें मनुष्योंकी तरह चौबीसों घंटे अपनी स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै। इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी। AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;जिस किसीने भी ChatGPT, Gemini, या ऐसी किसी अन्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ काम कियाहै, उसे शायद ऐसा लगाहोगा कि वे वास्तवमें समझतीहैं। एक AI हमारे साथ लगभग एक सामान्य इंसानकी तरह संवाद करतीहै। वह मज़ाक करतीहै, और हमारे व्यंग्यपूर्ण कथनों तथा छोटी-मोटी आपत्तियोंपर भी इंसानोंकी तरह प्रतिक्रिया देतीहै। यदि आप उससे अपने व्याख्यानके लिए प्रस्तुति स्लाइड तैयार करनेके लिए कहें, तो वह शायद आपसे भी बेहतर काम करदे। मैंने तो यहभी सुनाहै कि बहुतसे विद्यार्थी अपने स्कूल और कॉलेजके assignment भी AI से ही करवाने लगेहैं। तो फिर, क्या यह स्पष्ट नहींहै कि वे चीज़ोंको समझतीहैं?&amp;nbsp; var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); बिल्कुल नहीं। इसका कारण यहहै कि आजकी AI प्रणालियाँ जिस प्रकार बनाई गईहैं, वही ऐसा है। वास्तवमें उनमें किसी भी चीज़को समझनेकी क्षमता ही नहीं होती। एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै। वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं। तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै? बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है। लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै। उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै। हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती। यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै। दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै। क्या AI ऐसा नहीं करसकती? वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै। यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते। क्या आपको आश्चर्य हुआ? शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै? आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें। आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था। हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ? यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा। यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं। उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै। वह यह कैसे करताहै? यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है! एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं। कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई। यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै। ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था। उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे। फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई। इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ। इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी। ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है। लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच समझतीहैं? अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। वास्तवमें समझनेके लिए उन्हें अवधारणाओंके बीच नए संबंध बनानेकी क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें अपने ज्ञानको लगातार अद्यतन करना होगा। मूल रूपसे, उन्हें नई जानकारीको याद रखनेमें सक्षम होना होगा। यदि हम केवल शब्दोंके माध्यमसे होनेवाले संवादतक भी स्वयंको सीमित रखें, तबभी इन प्रोग्रामोंमें ऐसी स्मृति नहीं होती। भलेही वे कभी-कभी कुछ बातें याद रखती हुई प्रतीत हों, वे अपने मूल ज्ञान-भंडारको स्वायत्त रूपसे और व्यापक रूपसे अद्यतन नहीं करसकतीं। वे केवल पैटर्न पहचानसकतीहैं और अनुमान लगासकतीहैं। तो क्या इसका अर्थ है कि हम AI की अंतिम सीमातक पहुँच चुकेहैं? बिल्कुल नहीं। एक दृष्टिसे देखें तो इन मशीनोंको जानबूझकर इसी प्रकार डिज़ाइन कियागयाहै। जब हम सोरहे होतेहैं, तबभी हमारा मस्तिष्क हमारी स्मृतियोंको अद्यतन करतारहताहै और जो बातें हम पहलेसे समझ चुकेहैं उन्हें और मज़बूत करतारहताहै। वर्तमान AI प्रणालियाँ ऐसा नहीं करसकतीं। इन्हें मनुष्योंकी तरह चौबीसों घंटे अपनी स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै। इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी। AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#AI, #Hindi, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] हमारी भावनाओं और अनुभूतियोंका कारण क्या है?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/06/hindi.html</link><category>#Hindi</category><category>#mystery</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 6 Jun 2026 06:58:21 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1977310264197434065</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली प्रणय-भावनाओंका भी इसी प्रकार अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वे भी काफी हदतक इसी प्रकार कार्य करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या यह सब केवल मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ रसायनोंका खेल है और कुछ नहीं? चाहे वह माँका प्रेम हो या किसी प्रेमीकी अपने साथीके प्रति प्रणय-भावना, क्या यह सब केवल कुछ रसायनोंका परिणाम मात्र है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मनुष्य इन मधुर भावनाओंको इतना महत्व देतेहैं कि उन्हें अत्यंत पवित्र मानतेहैं। ऐसेमें यह विचार कि वे केवल मस्तिष्कमें होनेवाली रासायनिक क्रियाओंका परिणाम हैं, हममेंसे अनेक लोगोंको असंतोष या खिन्नताका अनुभव कराताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन वैज्ञानिकोंने निश्चितरूपसे मस्तिष्कद्वारा उत्पन्न होनेवाली अत्यंत सूक्ष्म अनुभूतियोंके पीछे एक संभावित कारण प्रस्तुत किया है। लेकिन पूरीतरह नहीं। क्योंकि प्रयोगशालाके पशुओंके मस्तिष्कमें रसायन प्रविष्टकराकर प्राप्त परिणामोंको सीधे मनुष्योंपर लागू नहीं कियाजासकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य इन प्रयोगशाला-पशुओंकी तुलनामें कहीं अधिक जटिल प्राणी हैं। हमारी भावनाएँ केवल हमारी शारीरिक प्रक्रियाओंसे ही प्रेरित हों, यह आवश्यक नहीं है। ऐसा प्रतीत होताहै कि हमारेभीतर इन रासायनिक प्रभावोंसे ऊपर उठनेकी क्षमता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरणकेलिए, जो बौद्ध भिक्षु लंबे समयतक विपश्यना ध्यानका अभ्यास करताहै, वह ऐसी अवस्थातक पहुँच सकताहै जिसमें सामान्य मनुष्योंमें भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाओंके प्रति भी वह उदासीन बना रहताहै। तो क्या उसके मस्तिष्कमें वे रसायन स्रावित नहीं होते? या यदि होतेभीहैं, तो क्या वह उनके प्रभावोंसे ऊपर उठ सकताहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसकेलिए आपको बौद्ध भिक्षु बननेकी आवश्यकता नहीं है। हममेंसे अधिकांश लोगोंमें परिस्थितियोंके अनुसार अपनी भावनाओंको नियंत्रितकरनेकी क्षमता होतीहै। जब कार्यालयमें हमारा बॉस हमपर चिल्लाताहै, तबभी हम मुस्कुरा सकतेहैं। लेकिन जब हमारा अपना जीवनसाथी हमें परेशान करताहै, तब संभव है कि हम उतनी शांतिसे प्रतिक्रिया न दें। इसलिए यह केवल कुछ रसायनोंका खेल नहीं है। इसकेपीछे औरभी बहुत कुछ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्यतः, केवल कुछ रसायन ही इन प्रक्रियाओंके कारण नहीं होते। इन रसायनोंके स्रावित होनेके बाद मस्तिष्कमें कुछ परिवर्तन उत्पन्न होतेहैं। ये परिवर्तन घटना, उसके परिणाम और हमारी अपेक्षित प्रतिक्रिया—इन तीनोंके बीच संबंध स्थापित करतेहैं। हमारे पूर्व अनुभव और स्मृतियाँ इन संबंधोंको स्पष्ट रूप प्रदान करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सभी मिलकर यह निर्धारित करतेहैं कि हम किसी विशेष परिस्थितिमें कैसी प्रतिक्रिया देंगे। संक्षेपमें कहें तो, अतीतमें घटी किसी घटनाकी स्मृति ही हमें प्रतिक्रिया करनेकेलिए प्रेरित करतीहै। यदि वह स्मृति सुखद है, तो हम सकारात्मक प्रतिक्रिया देतेहैं। अन्यथा हम कठोर प्रतिक्रिया देतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रारंभिक बौद्धोंने मन और उसकी भावनाओंके बीचके इस संबंधको पहचान लिया था। उनका अनुमान था कि ये भावनाएँ मुख्यतः मानसिक अवस्थाओं या मनकी अंतर्वस्तुओंसे उत्पन्न होतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकेपास हमारे आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानियों जैसे विशेष उपकरण नहीं थे। उन्होंने केवल अपनी तीक्ष्ण अवलोकन-शक्तिका उपयोग किया। वे मनकी इन अंतर्वस्तुओंको "चेतसिक" कहतेथे, अर्थात "चित्तके भीतरकी अंतर्वस्तुएँ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये बौद्ध वर्तमान जीवनसे परे अस्तित्वमें विश्वास रखतेथे। उन्हें पुनर्जन्ममें अटल विश्वास था। उनका मानना था कि किसी मरतेहुए व्यक्तिके मनकी ये अंतर्वस्तुएँ किसी अभीतक जन्म न लिएहुए भ्रूणके मनमें स्थानांतरित होसकतीहैं। जब ऐसा स्थानांतरण होताहै, तब उस भ्रूणके माध्यमसे पुनर्जन्म लेनेवाला जीव अपने पूर्व अनुभवोंकी छाया अपने साथ लेजासकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए उनका विश्वास था कि हमारी पसंद, नापसंद, अनुभूतियाँ और भावनाएँ जन्म-जन्मांतरतक बनी रहतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि यह सत्य हो, तो स्पष्ट है कि ये भावनाएँ केवल मस्तिष्कके रसायनोंसे उत्पन्न नहीं होसकतीं। क्योंकि इन रसायनोंको उत्पन्न करनेवाला मस्तिष्क शरीरकी मृत्युके बाद नष्ट होजाताहै, जबकि भावनाएँ बनी रहतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममेंसे अधिकांश लोग पुनर्जन्मकी इन अवधारणाओंको संदेहकी दृष्टिसे देख सकतेहैं। लेकिन इयान स्टीवेन्सन जैसे आधुनिक शोधकर्ता भी ऐसी बातोंमें विश्वास रखतेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टीवेन्सनने पूर्वजन्मकी स्मृतियोंपर अनेक शोध किएथे। उन अध्ययनोंके आधारपर उनका मत था कि हमारी पसंद, नापसंद और यहाँतक कि हमारे अनेक अस्पष्ट भय, अर्थात फोबिया, पूर्वजन्मकी स्मृतियोंके कारण होसकतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मस्तिष्कमें कुछ रसायनोंका स्राव केवल एक सहायक कारण है। अर्थात जब भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाएँ घटतीहैं, तब होनेवाली प्रक्रियाओंमेंसे यह केवल एक प्रक्रिया है। निम्नतर जीवोंकी तुलनामें मनुष्योंमें भावनाओं और अनुभूतियोंके उत्पन्न होनेकेलिए ये रसायन न तो अनिवार्य हैं और न ही अपनेआपमें पर्याप्त।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक श्रेष्ठ योगी अपने स्वयंके बच्चों और अन्य सभी लोगोंके प्रति समान प्रेम बरसानेमें पूर्णतः समर्थ होताहै। वह केवल रसायनोंका दास नहीं होताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रयोगशालाके पशुओंपर किएजानेवाले परीक्षण अनेक परिस्थितियोंमें आवश्यक होसकतेहैं, लेकिन मेरा मानना है कि उनके परिणामोंको पूरीतरह मनुष्योंपर लागू करना हमेशा संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य कहीं अधिक जटिल ढंगसे कार्य करतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी भावनाएँ मुख्यतः हमारे मनकी अवस्थापर निर्भर करतीहैं। वे मनकी किसी विशिष्ट अवस्थाकी पृष्ठभूमिमें ही प्रकट होतीहैं। उससे अलग वे उत्पन्न नहीं होतीं। वे किसीभी रासायनिक स्रावसे परे भी प्रकट होसकतीहैं। घटनाएँ और रसायन केवल प्रेरक या उद्दीपक होसकतेहैं, लेकिन वे अंतिम निर्धारक नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


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यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदनके तंत्रिका-विज्ञानियोंकी एक टीमने इस विषयपर कुछ अध्ययन किए। जब हमारेभीतर भावनाएँ और अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीहैं, तब हमारे मस्तिष्कमें होनेवाले परिवर्तनोंका अध्ययनकरनेकेलिए उन्होंने फंक्शनल एमआरआई (f-MRI) स्कैनर जैसे अत्याधुनिक उपकरणोंका उपयोग किया। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था। f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे। यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं। लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था। वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै। उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे। इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली प्रणय-भावनाओंका भी इसी प्रकार अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वे भी काफी हदतक इसी प्रकार कार्य करतीहैं। तो क्या यह सब केवल मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ रसायनोंका खेल है और कुछ नहीं? चाहे वह माँका प्रेम हो या किसी प्रेमीकी अपने साथीके प्रति प्रणय-भावना, क्या यह सब केवल कुछ रसायनोंका परिणाम मात्र है? हम मनुष्य इन मधुर भावनाओंको इतना महत्व देतेहैं कि उन्हें अत्यंत पवित्र मानतेहैं। ऐसेमें यह विचार कि वे केवल मस्तिष्कमें होनेवाली रासायनिक क्रियाओंका परिणाम हैं, हममेंसे अनेक लोगोंको असंतोष या खिन्नताका अनुभव कराताहै। इन वैज्ञानिकोंने निश्चितरूपसे मस्तिष्कद्वारा उत्पन्न होनेवाली अत्यंत सूक्ष्म अनुभूतियोंके पीछे एक संभावित कारण प्रस्तुत किया है। लेकिन पूरीतरह नहीं। क्योंकि प्रयोगशालाके पशुओंके मस्तिष्कमें रसायन प्रविष्टकराकर प्राप्त परिणामोंको सीधे मनुष्योंपर लागू नहीं कियाजासकता। मनुष्य इन प्रयोगशाला-पशुओंकी तुलनामें कहीं अधिक जटिल प्राणी हैं। हमारी भावनाएँ केवल हमारी शारीरिक प्रक्रियाओंसे ही प्रेरित हों, यह आवश्यक नहीं है। ऐसा प्रतीत होताहै कि हमारेभीतर इन रासायनिक प्रभावोंसे ऊपर उठनेकी क्षमता है। उदाहरणकेलिए, जो बौद्ध भिक्षु लंबे समयतक विपश्यना ध्यानका अभ्यास करताहै, वह ऐसी अवस्थातक पहुँच सकताहै जिसमें सामान्य मनुष्योंमें भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाओंके प्रति भी वह उदासीन बना रहताहै। तो क्या उसके मस्तिष्कमें वे रसायन स्रावित नहीं होते? या यदि होतेभीहैं, तो क्या वह उनके प्रभावोंसे ऊपर उठ सकताहै? इसकेलिए आपको बौद्ध भिक्षु बननेकी आवश्यकता नहीं है। हममेंसे अधिकांश लोगोंमें परिस्थितियोंके अनुसार अपनी भावनाओंको नियंत्रितकरनेकी क्षमता होतीहै। जब कार्यालयमें हमारा बॉस हमपर चिल्लाताहै, तबभी हम मुस्कुरा सकतेहैं। लेकिन जब हमारा अपना जीवनसाथी हमें परेशान करताहै, तब संभव है कि हम उतनी शांतिसे प्रतिक्रिया न दें। इसलिए यह केवल कुछ रसायनोंका खेल नहीं है। इसकेपीछे औरभी बहुत कुछ है। सामान्यतः, केवल कुछ रसायन ही इन प्रक्रियाओंके कारण नहीं होते। इन रसायनोंके स्रावित होनेके बाद मस्तिष्कमें कुछ परिवर्तन उत्पन्न होतेहैं। ये परिवर्तन घटना, उसके परिणाम और हमारी अपेक्षित प्रतिक्रिया—इन तीनोंके बीच संबंध स्थापित करतेहैं। हमारे पूर्व अनुभव और स्मृतियाँ इन संबंधोंको स्पष्ट रूप प्रदान करतीहैं। ये सभी मिलकर यह निर्धारित करतेहैं कि हम किसी विशेष परिस्थितिमें कैसी प्रतिक्रिया देंगे। संक्षेपमें कहें तो, अतीतमें घटी किसी घटनाकी स्मृति ही हमें प्रतिक्रिया करनेकेलिए प्रेरित करतीहै। यदि वह स्मृति सुखद है, तो हम सकारात्मक प्रतिक्रिया देतेहैं। अन्यथा हम कठोर प्रतिक्रिया देतेहैं। प्रारंभिक बौद्धोंने मन और उसकी भावनाओंके बीचके इस संबंधको पहचान लिया था। उनका अनुमान था कि ये भावनाएँ मुख्यतः मानसिक अवस्थाओं या मनकी अंतर्वस्तुओंसे उत्पन्न होतीहैं। उनकेपास हमारे आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानियों जैसे विशेष उपकरण नहीं थे। उन्होंने केवल अपनी तीक्ष्ण अवलोकन-शक्तिका उपयोग किया। वे मनकी इन अंतर्वस्तुओंको "चेतसिक" कहतेथे, अर्थात "चित्तके भीतरकी अंतर्वस्तुएँ।" लेकिन ये बौद्ध वर्तमान जीवनसे परे अस्तित्वमें विश्वास रखतेथे। उन्हें पुनर्जन्ममें अटल विश्वास था। उनका मानना था कि किसी मरतेहुए व्यक्तिके मनकी ये अंतर्वस्तुएँ किसी अभीतक जन्म न लिएहुए भ्रूणके मनमें स्थानांतरित होसकतीहैं। जब ऐसा स्थानांतरण होताहै, तब उस भ्रूणके माध्यमसे पुनर्जन्म लेनेवाला जीव अपने पूर्व अनुभवोंकी छाया अपने साथ लेजासकताहै। इसलिए उनका विश्वास था कि हमारी पसंद, नापसंद, अनुभूतियाँ और भावनाएँ जन्म-जन्मांतरतक बनी रहतीहैं। यदि यह सत्य हो, तो स्पष्ट है कि ये भावनाएँ केवल मस्तिष्कके रसायनोंसे उत्पन्न नहीं होसकतीं। क्योंकि इन रसायनोंको उत्पन्न करनेवाला मस्तिष्क शरीरकी मृत्युके बाद नष्ट होजाताहै, जबकि भावनाएँ बनी रहतीहैं। हममेंसे अधिकांश लोग पुनर्जन्मकी इन अवधारणाओंको संदेहकी दृष्टिसे देख सकतेहैं। लेकिन इयान स्टीवेन्सन जैसे आधुनिक शोधकर्ता भी ऐसी बातोंमें विश्वास रखतेथे। स्टीवेन्सनने पूर्वजन्मकी स्मृतियोंपर अनेक शोध किएथे। उन अध्ययनोंके आधारपर उनका मत था कि हमारी पसंद, नापसंद और यहाँतक कि हमारे अनेक अस्पष्ट भय, अर्थात फोबिया, पूर्वजन्मकी स्मृतियोंके कारण होसकतेहैं। इसलिए मस्तिष्कमें कुछ रसायनोंका स्राव केवल एक सहायक कारण है। अर्थात जब भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाएँ घटतीहैं, तब होनेवाली प्रक्रियाओंमेंसे यह केवल एक प्रक्रिया है। निम्नतर जीवोंकी तुलनामें मनुष्योंमें भावनाओं और अनुभूतियोंके उत्पन्न होनेकेलिए ये रसायन न तो अनिवार्य हैं और न ही अपनेआपमें पर्याप्त। एक श्रेष्ठ योगी अपने स्वयंके बच्चों और अन्य सभी लोगोंके प्रति समान प्रेम बरसानेमें पूर्णतः समर्थ होताहै। वह केवल रसायनोंका दास नहीं होताहै। प्रयोगशालाके पशुओंपर किएजानेवाले परीक्षण अनेक परिस्थितियोंमें आवश्यक होसकतेहैं, लेकिन मेरा मानना है कि उनके परिणामोंको पूरीतरह मनुष्योंपर लागू करना हमेशा संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य कहीं अधिक जटिल ढंगसे कार्य करतेहैं। हमारी भावनाएँ मुख्यतः हमारे मनकी अवस्थापर निर्भर करतीहैं। वे मनकी किसी विशिष्ट अवस्थाकी पृष्ठभूमिमें ही प्रकट होतीहैं। उससे अलग वे उत्पन्न नहीं होतीं। वे किसीभी रासायनिक स्रावसे परे भी प्रकट होसकतीहैं। घटनाएँ और रसायन केवल प्रेरक या उद्दीपक होसकतेहैं, लेकिन वे अंतिम निर्धारक नहीं हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;भावनाएँ और अनुभूतियाँ केवल जीवित प्राणियोंमें पाईजानेवाली विशिष्ट विशेषताएँ मानीजातीहैं। निर्जीव वस्तुओंमें वे नहीं होतीं। वास्तवमें, उन्हें अक्सर जीवनके प्रमुख लक्षणोंमेंसे एक मानाजाताहै। तो फिर उनका कारण क्या है? यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदनके तंत्रिका-विज्ञानियोंकी एक टीमने इस विषयपर कुछ अध्ययन किए। जब हमारेभीतर भावनाएँ और अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीहैं, तब हमारे मस्तिष्कमें होनेवाले परिवर्तनोंका अध्ययनकरनेकेलिए उन्होंने फंक्शनल एमआरआई (f-MRI) स्कैनर जैसे अत्याधुनिक उपकरणोंका उपयोग किया। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था। f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे। यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं। लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था। वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै। उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे। इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली प्रणय-भावनाओंका भी इसी प्रकार अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वे भी काफी हदतक इसी प्रकार कार्य करतीहैं। तो क्या यह सब केवल मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ रसायनोंका खेल है और कुछ नहीं? चाहे वह माँका प्रेम हो या किसी प्रेमीकी अपने साथीके प्रति प्रणय-भावना, क्या यह सब केवल कुछ रसायनोंका परिणाम मात्र है? हम मनुष्य इन मधुर भावनाओंको इतना महत्व देतेहैं कि उन्हें अत्यंत पवित्र मानतेहैं। ऐसेमें यह विचार कि वे केवल मस्तिष्कमें होनेवाली रासायनिक क्रियाओंका परिणाम हैं, हममेंसे अनेक लोगोंको असंतोष या खिन्नताका अनुभव कराताहै। इन वैज्ञानिकोंने निश्चितरूपसे मस्तिष्कद्वारा उत्पन्न होनेवाली अत्यंत सूक्ष्म अनुभूतियोंके पीछे एक संभावित कारण प्रस्तुत किया है। लेकिन पूरीतरह नहीं। क्योंकि प्रयोगशालाके पशुओंके मस्तिष्कमें रसायन प्रविष्टकराकर प्राप्त परिणामोंको सीधे मनुष्योंपर लागू नहीं कियाजासकता। मनुष्य इन प्रयोगशाला-पशुओंकी तुलनामें कहीं अधिक जटिल प्राणी हैं। हमारी भावनाएँ केवल हमारी शारीरिक प्रक्रियाओंसे ही प्रेरित हों, यह आवश्यक नहीं है। ऐसा प्रतीत होताहै कि हमारेभीतर इन रासायनिक प्रभावोंसे ऊपर उठनेकी क्षमता है। उदाहरणकेलिए, जो बौद्ध भिक्षु लंबे समयतक विपश्यना ध्यानका अभ्यास करताहै, वह ऐसी अवस्थातक पहुँच सकताहै जिसमें सामान्य मनुष्योंमें भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाओंके प्रति भी वह उदासीन बना रहताहै। तो क्या उसके मस्तिष्कमें वे रसायन स्रावित नहीं होते? या यदि होतेभीहैं, तो क्या वह उनके प्रभावोंसे ऊपर उठ सकताहै? इसकेलिए आपको बौद्ध भिक्षु बननेकी आवश्यकता नहीं है। हममेंसे अधिकांश लोगोंमें परिस्थितियोंके अनुसार अपनी भावनाओंको नियंत्रितकरनेकी क्षमता होतीहै। जब कार्यालयमें हमारा बॉस हमपर चिल्लाताहै, तबभी हम मुस्कुरा सकतेहैं। लेकिन जब हमारा अपना जीवनसाथी हमें परेशान करताहै, तब संभव है कि हम उतनी शांतिसे प्रतिक्रिया न दें। इसलिए यह केवल कुछ रसायनोंका खेल नहीं है। इसकेपीछे औरभी बहुत कुछ है। सामान्यतः, केवल कुछ रसायन ही इन प्रक्रियाओंके कारण नहीं होते। इन रसायनोंके स्रावित होनेके बाद मस्तिष्कमें कुछ परिवर्तन उत्पन्न होतेहैं। ये परिवर्तन घटना, उसके परिणाम और हमारी अपेक्षित प्रतिक्रिया—इन तीनोंके बीच संबंध स्थापित करतेहैं। हमारे पूर्व अनुभव और स्मृतियाँ इन संबंधोंको स्पष्ट रूप प्रदान करतीहैं। ये सभी मिलकर यह निर्धारित करतेहैं कि हम किसी विशेष परिस्थितिमें कैसी प्रतिक्रिया देंगे। संक्षेपमें कहें तो, अतीतमें घटी किसी घटनाकी स्मृति ही हमें प्रतिक्रिया करनेकेलिए प्रेरित करतीहै। यदि वह स्मृति सुखद है, तो हम सकारात्मक प्रतिक्रिया देतेहैं। अन्यथा हम कठोर प्रतिक्रिया देतेहैं। प्रारंभिक बौद्धोंने मन और उसकी भावनाओंके बीचके इस संबंधको पहचान लिया था। उनका अनुमान था कि ये भावनाएँ मुख्यतः मानसिक अवस्थाओं या मनकी अंतर्वस्तुओंसे उत्पन्न होतीहैं। उनकेपास हमारे आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानियों जैसे विशेष उपकरण नहीं थे। उन्होंने केवल अपनी तीक्ष्ण अवलोकन-शक्तिका उपयोग किया। वे मनकी इन अंतर्वस्तुओंको "चेतसिक" कहतेथे, अर्थात "चित्तके भीतरकी अंतर्वस्तुएँ।" लेकिन ये बौद्ध वर्तमान जीवनसे परे अस्तित्वमें विश्वास रखतेथे। उन्हें पुनर्जन्ममें अटल विश्वास था। उनका मानना था कि किसी मरतेहुए व्यक्तिके मनकी ये अंतर्वस्तुएँ किसी अभीतक जन्म न लिएहुए भ्रूणके मनमें स्थानांतरित होसकतीहैं। जब ऐसा स्थानांतरण होताहै, तब उस भ्रूणके माध्यमसे पुनर्जन्म लेनेवाला जीव अपने पूर्व अनुभवोंकी छाया अपने साथ लेजासकताहै। इसलिए उनका विश्वास था कि हमारी पसंद, नापसंद, अनुभूतियाँ और भावनाएँ जन्म-जन्मांतरतक बनी रहतीहैं। यदि यह सत्य हो, तो स्पष्ट है कि ये भावनाएँ केवल मस्तिष्कके रसायनोंसे उत्पन्न नहीं होसकतीं। क्योंकि इन रसायनोंको उत्पन्न करनेवाला मस्तिष्क शरीरकी मृत्युके बाद नष्ट होजाताहै, जबकि भावनाएँ बनी रहतीहैं। हममेंसे अधिकांश लोग पुनर्जन्मकी इन अवधारणाओंको संदेहकी दृष्टिसे देख सकतेहैं। लेकिन इयान स्टीवेन्सन जैसे आधुनिक शोधकर्ता भी ऐसी बातोंमें विश्वास रखतेथे। स्टीवेन्सनने पूर्वजन्मकी स्मृतियोंपर अनेक शोध किएथे। उन अध्ययनोंके आधारपर उनका मत था कि हमारी पसंद, नापसंद और यहाँतक कि हमारे अनेक अस्पष्ट भय, अर्थात फोबिया, पूर्वजन्मकी स्मृतियोंके कारण होसकतेहैं। इसलिए मस्तिष्कमें कुछ रसायनोंका स्राव केवल एक सहायक कारण है। अर्थात जब भावनाएँ उत्पन्नकरनेवाली घटनाएँ घटतीहैं, तब होनेवाली प्रक्रियाओंमेंसे यह केवल एक प्रक्रिया है। निम्नतर जीवोंकी तुलनामें मनुष्योंमें भावनाओं और अनुभूतियोंके उत्पन्न होनेकेलिए ये रसायन न तो अनिवार्य हैं और न ही अपनेआपमें पर्याप्त। एक श्रेष्ठ योगी अपने स्वयंके बच्चों और अन्य सभी लोगोंके प्रति समान प्रेम बरसानेमें पूर्णतः समर्थ होताहै। वह केवल रसायनोंका दास नहीं होताहै। प्रयोगशालाके पशुओंपर किएजानेवाले परीक्षण अनेक परिस्थितियोंमें आवश्यक होसकतेहैं, लेकिन मेरा मानना है कि उनके परिणामोंको पूरीतरह मनुष्योंपर लागू करना हमेशा संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य कहीं अधिक जटिल ढंगसे कार्य करतेहैं। हमारी भावनाएँ मुख्यतः हमारे मनकी अवस्थापर निर्भर करतीहैं। वे मनकी किसी विशिष्ट अवस्थाकी पृष्ठभूमिमें ही प्रकट होतीहैं। उससे अलग वे उत्पन्न नहीं होतीं। वे किसीभी रासायनिक स्रावसे परे भी प्रकट होसकतीहैं। घटनाएँ और रसायन केवल प्रेरक या उद्दीपक होसकतेहैं, लेकिन वे अंतिम निर्धारक नहीं हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #mystery, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] क्या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi_01701350243.html</link><category>#audiobook</category><category>#Hindi</category><category>#mystery</category><category>#neuroscience</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><pubDate>Sat, 30 May 2026 07:05:23 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1069038972511866575</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;/script&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि यदि वे ऐसी किसी चीज़को स्वीकार करलें, तो वह "डिब्बेके भीतरके शैतान" जैसी अवधारणाओंकेलिए रास्ता खोलदेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात, यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारे मनको नियंत्रित-करनेवाली, मस्तिष्कसे परे कोई रहस्यमय शक्ति मौजूदहै। यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारी सभी क्रियाओंके पीछे कोई चेतना या आत्मा है। अर्थात, किसी अभौतिक अस्तित्वको स्वीकार करना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विज्ञानके मज़बूत किलेको भेद-देने जैसा होगा। क्योंकि विज्ञान ऐसी किसीभी अवधारणाको स्वीकार नहींकरता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दार्शनिककी तरह सोचनेवाला व्यक्ति होनेकेनाते, इस विषयपर मेरा दृष्टिकोण थोड़ा भिन्नहै। मैं स्वतंत्र इच्छाको "है या नहींहै" जैसे बाइनरी रूपमें नहीं देखता। बल्कि मैं इसे संभावनाओंके एक निरंतर क्रम के रूपमें देखताहूँ। इसमें निर्जीव वस्तुएँ, जीव-जंतु, मनुष्य, और इस क्रमकी अंतिम सीमा — सब शामिलहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इसे इस प्रकार समझाताहूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पंखेको उदाहरणके रूपमें लीजिए। वह चलसकताहै या स्थिर रहसकताहै। वह अपनी गति भी बदलसकताहै। लेकिन यह सब तभी संभवहै जब कोई स्विच ऑन या ऑफ करे, या रेग्युलेटर घुमाए। अपनेआप वह कुछभी नहीं करसकताहै। यह स्वतंत्र इच्छाके पूर्ण अभावका स्पष्ट उदाहरणहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब एक पशुको देखिए। वहभी चलताहै, खाताहै, साथी खोजताहै, और बहुतकुछ करताहै। वहाँ कोई भौतिक स्विच नहीं होताजो उसे ऐसा करनेकेलिए प्रेरित करे। वह पशु अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों या अपने मस्तिष्क और शरीरमें स्रवित होनेवाले "रसायनों"द्वारा संचालित होताहै। उस सीमाके भीतर वह स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करताहै। अर्थात, उसमें "स्वतंत्र इच्छा"का एक सीमित रूप मौजूदहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मनुष्योंका उदाहरण लेतेहैं। यद्यपि हममेंसे बहुतसे लोग अभीभी प्रवृत्तियोंद्वारा संचालित होतेहैं, फिरभी हम उन प्रवृत्तियोंसे ऊपर उठकर अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करसकतेहैं। जब हमें भूख लगतीहै, तो हम किसी कुत्तेकी तरह भोजनपर टूट नहीं पड़ते। बल्कि हम सोचतेहैं कि हमारे सामने रखा भोजन खाना उचितहै या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे निर्णयको अनेक बातें नियंत्रित करतीहैं — क्या वह भोजन हमारा है?, क्या यह खानेका सही समयहै?, क्या वह भोजन हमारे स्वास्थ्यकेलिए अच्छा है?, आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम किसी कार्यमें संलग्न होसकतेहैं, लेकिन हमारी क्रियाएँ पूरीतरह अनियंत्रित नहीं होतीं। उन्हें हमारी नैतिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्यकी चिंता आदि नियंत्रित करतीहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, यद्यपि हमारेपास स्वतंत्र इच्छा है, हमारेपास आत्म-नियंत्रण भीहै। और यह आत्म-नियंत्रण भी स्वतंत्र इच्छाका ही एक और रूपहै। यह किसी निर्जीव वस्तुको नियंत्रित-करनेवाली भौतिक बाधाओं या निम्न स्तरके जीवोंको संचालित-करनेवाली प्रवृत्तिगत शक्तियोंसे ऊपर उठसकताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इससेभी आगे बढ़तेहैं। एक संन्यासीको देखिए। वह आध्यात्मिक ज्ञानोदयकी अपनी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेकेलिए अपनी सभी मूलभूत प्रवृत्तियोंसे संघर्ष करताहै, सभी कष्टोंको सहताहै, और अपने चुनेहुए मार्गपर दृढ़तासे चलता रहताहै। क्या वहभी स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित नहीं कररहाहै?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वहभी किसी अंतिम आध्यात्मिक अवस्थामें विश्वास और उसे प्राप्त-करनेकी तीव्र इच्छासे बँधाहुआहै। इसलिए उसके निर्णयभी पूरीतरह स्वतंत्र नहींहैं। उनके पीछेभी कोई कारण मौजूदहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने ऐसे अनेक धर्मप्रचारकोंके बारेमें सुना होगा जो अपने धर्मका प्रचार-करनेके एकमात्र उद्देश्यसे सभी सांसारिक सुखोंका त्याग करदेतेहैं। वे अपना देश छोड़देतेहैं, किसी अपरिचित देशमें संन्यासी जैसा जीवन चुनतेहैं और अपने मार्गपर लगे रहतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उनमेंसे कुछ, लोगोंकी गरीबी और पीड़ाको देखकर भीतरसे पिघलजातेहैं। वे अपने मूल उद्देश्यको भूलकर बिना किसी धार्मिक एजेंडाके उनकी सेवा-करने लगतेहैं। वे उन सभी कारणोंपर विजय प्राप्त करलेतेहैं जो उन्हें बाँधेहुएथे, और एक स्वयं-निर्धारित निर्णय लेतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिरभी, क्या वह निर्णय लेनेकेलिए उन्हें प्रेरित-करनेवाली चीज़ उनके भीतरकी करुणा नहींथी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतमें "निष्काम योगियों"की परंपराहै। उनमें नतो कोई स्वार्थ होताहै और न कोई धार्मिक एजेंडा। वे करुणासे भी प्रेरित नहीं होते। वे केवल कर्तव्यकी भावनासे कार्य करतेहैं। यही गहरी कर्तव्य-चेतना उनके चुनेहुए मार्गका कारण बनतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार, इन सभी उदाहरणोंमें, ऊपरसे दिखाई-देनेवाली स्वतंत्र पसंदके पीछे हमेशा कोईनकोई कारण मौजूद रहताहै। क्या आप किसी ऐसे व्यक्तिकी कल्पना करसकतेहैं जो बिना किसी कारणके कुछ करे? शायद यह संभव नहींहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बातहै जिसपर शायद आपने ध्यान नहीं दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंखेके मामलेमें कारण भौतिकथा। पशुओंके मामलेमें वह रासायनिकथा। सामान्य मनुष्योंमें वह सामाजिक नियम और स्वीकृत मूल्यहैं। आध्यात्मिक मार्गपर चलनेवालोंकेलिए वह उनकी दृढ़ आस्था है। समाजसेवकोंमें वह करुणा है। और कर्मयोगियोंमें वह गहरी कर्तव्य-भावना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभीको किसीनकिसी कारणने प्रेरित किया। लेकिन हम देखसकतेहैं कि यह कारण धीरे-धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर बढ़ताजाताहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे शब्दोंमें कहेंतो, इन सबकेद्वारा प्रदर्शित स्वतंत्र इच्छा एक जैसी नहींथी। उस इच्छाके पीछेका कारण अलग-अलग स्तरोंपर था। ऐसा लगताहै कि वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्र इच्छाकी अंतिम सीमाके निकट पहुँचतेजारहेहैं, भलेही कोईभी वास्तवमें उस सीमातक न पहुँचपाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, स्वतंत्र इच्छा "है या नहींहै" जैसी कोई बाइनरी चीज़ नहींहै। यह स्वतंत्रताका एक विशाल स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रमके निम्न स्तरपर रहनेवालोंकी स्वतंत्र इच्छा, उच्च स्तरपर रहनेवालोंकी तुलनामें अधिक सीमित होतीहै। फिरभी, वे सभी विभिन्न स्तरोंपर स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करतेहैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, यदि इस प्रकार देखा जाए, तो हममेंसे किसीकेपास भी पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" नहींहै। क्योंकि हम सभी कार्य-कारण संबंध के ढाँचेके भीतरही कार्य करतेहैं। उस ढाँचेके भीतर हम सभीकेपास सीमित सीमामें स्वतंत्र इच्छा अवश्यहै। केवल उसका स्तर अलग-अलगहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि इस "स्वतंत्र इच्छा"के स्पेक्ट्रमकी कोई अंतिम सीमाहो, तो वह कैसी होगी? उस सीमापर स्थित अस्तित्वको कार्य-कारण संबंधसे मुक्त होना चाहिए। वह बिना किसी कारणके कार्य करेगा। वह अनियंत्रित "स्वतंत्र इच्छा" प्रदर्शित करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय दर्शन ऐसी एक संभावनाकी कल्पना करताहै। उपनिषद इसे "आत्मा" कहतेहैं — जो कार्य-कारणके बंधनसे मुक्तहै। केवल उसीकेपास पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" होसकतीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य भाषामें धार्मिक लोग उसे "ईश्वर" कहतेहैं। बाइबिल में ईश्वर बिना किसी कारणके कहताहै — "प्रकाश हो", और प्रकाश होजाताहै। वही सत्ता उपनिषदोंमें कहतीहै — "मैं अनेक होजाऊँ", और वही जगत, जीव-जंतु आदिके रूपमें अनेक होजातीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि ऐसा कोई अस्तित्वहै, तो केवल वही पूर्ण स्वतंत्र इच्छासे परिपूर्ण होसकताहै। बाकी सबकी स्वतंत्र इच्छा सीमितहै। जैसे-जैसे हम विकसित होतेहैं, इस स्वतंत्रताकी सीमा केवल विस्तृत होतीजातीहै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस स्वतंत्र इच्छाको कुछ साधारण प्रोब्सके माध्यमसे सिद्ध नहीं कियाजासकताहै। उसे केवल अंतर्दृष्टिके माध्यमसे ही जानाजासकताहै।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


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&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया। लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा। स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै। आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया! इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे। इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै। हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं। स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि यदि वे ऐसी किसी चीज़को स्वीकार करलें, तो वह "डिब्बेके भीतरके शैतान" जैसी अवधारणाओंकेलिए रास्ता खोलदेगा। अर्थात, यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारे मनको नियंत्रित-करनेवाली, मस्तिष्कसे परे कोई रहस्यमय शक्ति मौजूदहै। यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारी सभी क्रियाओंके पीछे कोई चेतना या आत्मा है। अर्थात, किसी अभौतिक अस्तित्वको स्वीकार करना। यह विज्ञानके मज़बूत किलेको भेद-देने जैसा होगा। क्योंकि विज्ञान ऐसी किसीभी अवधारणाको स्वीकार नहींकरता। एक दार्शनिककी तरह सोचनेवाला व्यक्ति होनेकेनाते, इस विषयपर मेरा दृष्टिकोण थोड़ा भिन्नहै। मैं स्वतंत्र इच्छाको "है या नहींहै" जैसे बाइनरी रूपमें नहीं देखता। बल्कि मैं इसे संभावनाओंके एक निरंतर क्रम के रूपमें देखताहूँ। इसमें निर्जीव वस्तुएँ, जीव-जंतु, मनुष्य, और इस क्रमकी अंतिम सीमा — सब शामिलहैं। मैं इसे इस प्रकार समझाताहूँ। एक पंखेको उदाहरणके रूपमें लीजिए। वह चलसकताहै या स्थिर रहसकताहै। वह अपनी गति भी बदलसकताहै। लेकिन यह सब तभी संभवहै जब कोई स्विच ऑन या ऑफ करे, या रेग्युलेटर घुमाए। अपनेआप वह कुछभी नहीं करसकताहै। यह स्वतंत्र इच्छाके पूर्ण अभावका स्पष्ट उदाहरणहै। अब एक पशुको देखिए। वहभी चलताहै, खाताहै, साथी खोजताहै, और बहुतकुछ करताहै। वहाँ कोई भौतिक स्विच नहीं होताजो उसे ऐसा करनेकेलिए प्रेरित करे। वह पशु अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों या अपने मस्तिष्क और शरीरमें स्रवित होनेवाले "रसायनों"द्वारा संचालित होताहै। उस सीमाके भीतर वह स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करताहै। अर्थात, उसमें "स्वतंत्र इच्छा"का एक सीमित रूप मौजूदहै। अब मनुष्योंका उदाहरण लेतेहैं। यद्यपि हममेंसे बहुतसे लोग अभीभी प्रवृत्तियोंद्वारा संचालित होतेहैं, फिरभी हम उन प्रवृत्तियोंसे ऊपर उठकर अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करसकतेहैं। जब हमें भूख लगतीहै, तो हम किसी कुत्तेकी तरह भोजनपर टूट नहीं पड़ते। बल्कि हम सोचतेहैं कि हमारे सामने रखा भोजन खाना उचितहै या नहीं। हमारे निर्णयको अनेक बातें नियंत्रित करतीहैं — क्या वह भोजन हमारा है?, क्या यह खानेका सही समयहै?, क्या वह भोजन हमारे स्वास्थ्यकेलिए अच्छा है?, आदि। हम किसी कार्यमें संलग्न होसकतेहैं, लेकिन हमारी क्रियाएँ पूरीतरह अनियंत्रित नहीं होतीं। उन्हें हमारी नैतिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्यकी चिंता आदि नियंत्रित करतीहैं। इसलिए, यद्यपि हमारेपास स्वतंत्र इच्छा है, हमारेपास आत्म-नियंत्रण भीहै। और यह आत्म-नियंत्रण भी स्वतंत्र इच्छाका ही एक और रूपहै। यह किसी निर्जीव वस्तुको नियंत्रित-करनेवाली भौतिक बाधाओं या निम्न स्तरके जीवोंको संचालित-करनेवाली प्रवृत्तिगत शक्तियोंसे ऊपर उठसकताहै। अब इससेभी आगे बढ़तेहैं। एक संन्यासीको देखिए। वह आध्यात्मिक ज्ञानोदयकी अपनी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेकेलिए अपनी सभी मूलभूत प्रवृत्तियोंसे संघर्ष करताहै, सभी कष्टोंको सहताहै, और अपने चुनेहुए मार्गपर दृढ़तासे चलता रहताहै। क्या वहभी स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित नहीं कररहाहै? लेकिन वहभी किसी अंतिम आध्यात्मिक अवस्थामें विश्वास और उसे प्राप्त-करनेकी तीव्र इच्छासे बँधाहुआहै। इसलिए उसके निर्णयभी पूरीतरह स्वतंत्र नहींहैं। उनके पीछेभी कोई कारण मौजूदहै। आपने ऐसे अनेक धर्मप्रचारकोंके बारेमें सुना होगा जो अपने धर्मका प्रचार-करनेके एकमात्र उद्देश्यसे सभी सांसारिक सुखोंका त्याग करदेतेहैं। वे अपना देश छोड़देतेहैं, किसी अपरिचित देशमें संन्यासी जैसा जीवन चुनतेहैं और अपने मार्गपर लगे रहतेहैं। लेकिन उनमेंसे कुछ, लोगोंकी गरीबी और पीड़ाको देखकर भीतरसे पिघलजातेहैं। वे अपने मूल उद्देश्यको भूलकर बिना किसी धार्मिक एजेंडाके उनकी सेवा-करने लगतेहैं। वे उन सभी कारणोंपर विजय प्राप्त करलेतेहैं जो उन्हें बाँधेहुएथे, और एक स्वयं-निर्धारित निर्णय लेतेहैं। फिरभी, क्या वह निर्णय लेनेकेलिए उन्हें प्रेरित-करनेवाली चीज़ उनके भीतरकी करुणा नहींथी? भारतमें "निष्काम योगियों"की परंपराहै। उनमें नतो कोई स्वार्थ होताहै और न कोई धार्मिक एजेंडा। वे करुणासे भी प्रेरित नहीं होते। वे केवल कर्तव्यकी भावनासे कार्य करतेहैं। यही गहरी कर्तव्य-चेतना उनके चुनेहुए मार्गका कारण बनतीहै। इस प्रकार, इन सभी उदाहरणोंमें, ऊपरसे दिखाई-देनेवाली स्वतंत्र पसंदके पीछे हमेशा कोईनकोई कारण मौजूद रहताहै। क्या आप किसी ऐसे व्यक्तिकी कल्पना करसकतेहैं जो बिना किसी कारणके कुछ करे? शायद यह संभव नहींहै। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बातहै जिसपर शायद आपने ध्यान नहीं दिया। पंखेके मामलेमें कारण भौतिकथा। पशुओंके मामलेमें वह रासायनिकथा। सामान्य मनुष्योंमें वह सामाजिक नियम और स्वीकृत मूल्यहैं। आध्यात्मिक मार्गपर चलनेवालोंकेलिए वह उनकी दृढ़ आस्था है। समाजसेवकोंमें वह करुणा है। और कर्मयोगियोंमें वह गहरी कर्तव्य-भावना है। इन सभीको किसीनकिसी कारणने प्रेरित किया। लेकिन हम देखसकतेहैं कि यह कारण धीरे-धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर बढ़ताजाताहै। दूसरे शब्दोंमें कहेंतो, इन सबकेद्वारा प्रदर्शित स्वतंत्र इच्छा एक जैसी नहींथी। उस इच्छाके पीछेका कारण अलग-अलग स्तरोंपर था। ऐसा लगताहै कि वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्र इच्छाकी अंतिम सीमाके निकट पहुँचतेजारहेहैं, भलेही कोईभी वास्तवमें उस सीमातक न पहुँचपाए। इसलिए, स्वतंत्र इच्छा "है या नहींहै" जैसी कोई बाइनरी चीज़ नहींहै। यह स्वतंत्रताका एक विशाल स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रमके निम्न स्तरपर रहनेवालोंकी स्वतंत्र इच्छा, उच्च स्तरपर रहनेवालोंकी तुलनामें अधिक सीमित होतीहै। फिरभी, वे सभी विभिन्न स्तरोंपर स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करतेहैं। हाँ, यदि इस प्रकार देखा जाए, तो हममेंसे किसीकेपास भी पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" नहींहै। क्योंकि हम सभी कार्य-कारण संबंध के ढाँचेके भीतरही कार्य करतेहैं। उस ढाँचेके भीतर हम सभीकेपास सीमित सीमामें स्वतंत्र इच्छा अवश्यहै। केवल उसका स्तर अलग-अलगहै। यदि इस "स्वतंत्र इच्छा"के स्पेक्ट्रमकी कोई अंतिम सीमाहो, तो वह कैसी होगी? उस सीमापर स्थित अस्तित्वको कार्य-कारण संबंधसे मुक्त होना चाहिए। वह बिना किसी कारणके कार्य करेगा। वह अनियंत्रित "स्वतंत्र इच्छा" प्रदर्शित करेगा। भारतीय दर्शन ऐसी एक संभावनाकी कल्पना करताहै। उपनिषद इसे "आत्मा" कहतेहैं — जो कार्य-कारणके बंधनसे मुक्तहै। केवल उसीकेपास पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" होसकतीहै। सामान्य भाषामें धार्मिक लोग उसे "ईश्वर" कहतेहैं। बाइबिल में ईश्वर बिना किसी कारणके कहताहै — "प्रकाश हो", और प्रकाश होजाताहै। वही सत्ता उपनिषदोंमें कहतीहै — "मैं अनेक होजाऊँ", और वही जगत, जीव-जंतु आदिके रूपमें अनेक होजातीहै। यदि ऐसा कोई अस्तित्वहै, तो केवल वही पूर्ण स्वतंत्र इच्छासे परिपूर्ण होसकताहै। बाकी सबकी स्वतंत्र इच्छा सीमितहै। जैसे-जैसे हम विकसित होतेहैं, इस स्वतंत्रताकी सीमा केवल विस्तृत होतीजातीहै। उस स्वतंत्र इच्छाको कुछ साधारण प्रोब्सके माध्यमसे सिद्ध नहीं कियाजासकताहै। उसे केवल अंतर्दृष्टिके माध्यमसे ही जानाजासकताहै।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;दशकों पहले, Benjamin Libet नामक एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट ने इसे निश्चित-करनेका प्रयास किया। उनके-द्वारा किए-गए प्रयोगोंने उस-समय बहुत बड़ा सनसनीखेज प्रभाव पैदा किया था, और आजभी न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच इस विषयपर चर्चाएँ चलती-रहतीहैं। आख़िर लिबेटने किया क्या था? var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया। लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा। स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै। आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया! इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे। इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै। हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं। स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि यदि वे ऐसी किसी चीज़को स्वीकार करलें, तो वह "डिब्बेके भीतरके शैतान" जैसी अवधारणाओंकेलिए रास्ता खोलदेगा। अर्थात, यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारे मनको नियंत्रित-करनेवाली, मस्तिष्कसे परे कोई रहस्यमय शक्ति मौजूदहै। यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारी सभी क्रियाओंके पीछे कोई चेतना या आत्मा है। अर्थात, किसी अभौतिक अस्तित्वको स्वीकार करना। यह विज्ञानके मज़बूत किलेको भेद-देने जैसा होगा। क्योंकि विज्ञान ऐसी किसीभी अवधारणाको स्वीकार नहींकरता। एक दार्शनिककी तरह सोचनेवाला व्यक्ति होनेकेनाते, इस विषयपर मेरा दृष्टिकोण थोड़ा भिन्नहै। मैं स्वतंत्र इच्छाको "है या नहींहै" जैसे बाइनरी रूपमें नहीं देखता। बल्कि मैं इसे संभावनाओंके एक निरंतर क्रम के रूपमें देखताहूँ। इसमें निर्जीव वस्तुएँ, जीव-जंतु, मनुष्य, और इस क्रमकी अंतिम सीमा — सब शामिलहैं। मैं इसे इस प्रकार समझाताहूँ। एक पंखेको उदाहरणके रूपमें लीजिए। वह चलसकताहै या स्थिर रहसकताहै। वह अपनी गति भी बदलसकताहै। लेकिन यह सब तभी संभवहै जब कोई स्विच ऑन या ऑफ करे, या रेग्युलेटर घुमाए। अपनेआप वह कुछभी नहीं करसकताहै। यह स्वतंत्र इच्छाके पूर्ण अभावका स्पष्ट उदाहरणहै। अब एक पशुको देखिए। वहभी चलताहै, खाताहै, साथी खोजताहै, और बहुतकुछ करताहै। वहाँ कोई भौतिक स्विच नहीं होताजो उसे ऐसा करनेकेलिए प्रेरित करे। वह पशु अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों या अपने मस्तिष्क और शरीरमें स्रवित होनेवाले "रसायनों"द्वारा संचालित होताहै। उस सीमाके भीतर वह स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करताहै। अर्थात, उसमें "स्वतंत्र इच्छा"का एक सीमित रूप मौजूदहै। अब मनुष्योंका उदाहरण लेतेहैं। यद्यपि हममेंसे बहुतसे लोग अभीभी प्रवृत्तियोंद्वारा संचालित होतेहैं, फिरभी हम उन प्रवृत्तियोंसे ऊपर उठकर अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करसकतेहैं। जब हमें भूख लगतीहै, तो हम किसी कुत्तेकी तरह भोजनपर टूट नहीं पड़ते। बल्कि हम सोचतेहैं कि हमारे सामने रखा भोजन खाना उचितहै या नहीं। हमारे निर्णयको अनेक बातें नियंत्रित करतीहैं — क्या वह भोजन हमारा है?, क्या यह खानेका सही समयहै?, क्या वह भोजन हमारे स्वास्थ्यकेलिए अच्छा है?, आदि। हम किसी कार्यमें संलग्न होसकतेहैं, लेकिन हमारी क्रियाएँ पूरीतरह अनियंत्रित नहीं होतीं। उन्हें हमारी नैतिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्यकी चिंता आदि नियंत्रित करतीहैं। इसलिए, यद्यपि हमारेपास स्वतंत्र इच्छा है, हमारेपास आत्म-नियंत्रण भीहै। और यह आत्म-नियंत्रण भी स्वतंत्र इच्छाका ही एक और रूपहै। यह किसी निर्जीव वस्तुको नियंत्रित-करनेवाली भौतिक बाधाओं या निम्न स्तरके जीवोंको संचालित-करनेवाली प्रवृत्तिगत शक्तियोंसे ऊपर उठसकताहै। अब इससेभी आगे बढ़तेहैं। एक संन्यासीको देखिए। वह आध्यात्मिक ज्ञानोदयकी अपनी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेकेलिए अपनी सभी मूलभूत प्रवृत्तियोंसे संघर्ष करताहै, सभी कष्टोंको सहताहै, और अपने चुनेहुए मार्गपर दृढ़तासे चलता रहताहै। क्या वहभी स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित नहीं कररहाहै? लेकिन वहभी किसी अंतिम आध्यात्मिक अवस्थामें विश्वास और उसे प्राप्त-करनेकी तीव्र इच्छासे बँधाहुआहै। इसलिए उसके निर्णयभी पूरीतरह स्वतंत्र नहींहैं। उनके पीछेभी कोई कारण मौजूदहै। आपने ऐसे अनेक धर्मप्रचारकोंके बारेमें सुना होगा जो अपने धर्मका प्रचार-करनेके एकमात्र उद्देश्यसे सभी सांसारिक सुखोंका त्याग करदेतेहैं। वे अपना देश छोड़देतेहैं, किसी अपरिचित देशमें संन्यासी जैसा जीवन चुनतेहैं और अपने मार्गपर लगे रहतेहैं। लेकिन उनमेंसे कुछ, लोगोंकी गरीबी और पीड़ाको देखकर भीतरसे पिघलजातेहैं। वे अपने मूल उद्देश्यको भूलकर बिना किसी धार्मिक एजेंडाके उनकी सेवा-करने लगतेहैं। वे उन सभी कारणोंपर विजय प्राप्त करलेतेहैं जो उन्हें बाँधेहुएथे, और एक स्वयं-निर्धारित निर्णय लेतेहैं। फिरभी, क्या वह निर्णय लेनेकेलिए उन्हें प्रेरित-करनेवाली चीज़ उनके भीतरकी करुणा नहींथी? भारतमें "निष्काम योगियों"की परंपराहै। उनमें नतो कोई स्वार्थ होताहै और न कोई धार्मिक एजेंडा। वे करुणासे भी प्रेरित नहीं होते। वे केवल कर्तव्यकी भावनासे कार्य करतेहैं। यही गहरी कर्तव्य-चेतना उनके चुनेहुए मार्गका कारण बनतीहै। इस प्रकार, इन सभी उदाहरणोंमें, ऊपरसे दिखाई-देनेवाली स्वतंत्र पसंदके पीछे हमेशा कोईनकोई कारण मौजूद रहताहै। क्या आप किसी ऐसे व्यक्तिकी कल्पना करसकतेहैं जो बिना किसी कारणके कुछ करे? शायद यह संभव नहींहै। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बातहै जिसपर शायद आपने ध्यान नहीं दिया। पंखेके मामलेमें कारण भौतिकथा। पशुओंके मामलेमें वह रासायनिकथा। सामान्य मनुष्योंमें वह सामाजिक नियम और स्वीकृत मूल्यहैं। आध्यात्मिक मार्गपर चलनेवालोंकेलिए वह उनकी दृढ़ आस्था है। समाजसेवकोंमें वह करुणा है। और कर्मयोगियोंमें वह गहरी कर्तव्य-भावना है। इन सभीको किसीनकिसी कारणने प्रेरित किया। लेकिन हम देखसकतेहैं कि यह कारण धीरे-धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर बढ़ताजाताहै। दूसरे शब्दोंमें कहेंतो, इन सबकेद्वारा प्रदर्शित स्वतंत्र इच्छा एक जैसी नहींथी। उस इच्छाके पीछेका कारण अलग-अलग स्तरोंपर था। ऐसा लगताहै कि वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्र इच्छाकी अंतिम सीमाके निकट पहुँचतेजारहेहैं, भलेही कोईभी वास्तवमें उस सीमातक न पहुँचपाए। इसलिए, स्वतंत्र इच्छा "है या नहींहै" जैसी कोई बाइनरी चीज़ नहींहै। यह स्वतंत्रताका एक विशाल स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रमके निम्न स्तरपर रहनेवालोंकी स्वतंत्र इच्छा, उच्च स्तरपर रहनेवालोंकी तुलनामें अधिक सीमित होतीहै। फिरभी, वे सभी विभिन्न स्तरोंपर स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करतेहैं। हाँ, यदि इस प्रकार देखा जाए, तो हममेंसे किसीकेपास भी पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" नहींहै। क्योंकि हम सभी कार्य-कारण संबंध के ढाँचेके भीतरही कार्य करतेहैं। उस ढाँचेके भीतर हम सभीकेपास सीमित सीमामें स्वतंत्र इच्छा अवश्यहै। केवल उसका स्तर अलग-अलगहै। यदि इस "स्वतंत्र इच्छा"के स्पेक्ट्रमकी कोई अंतिम सीमाहो, तो वह कैसी होगी? उस सीमापर स्थित अस्तित्वको कार्य-कारण संबंधसे मुक्त होना चाहिए। वह बिना किसी कारणके कार्य करेगा। वह अनियंत्रित "स्वतंत्र इच्छा" प्रदर्शित करेगा। भारतीय दर्शन ऐसी एक संभावनाकी कल्पना करताहै। उपनिषद इसे "आत्मा" कहतेहैं — जो कार्य-कारणके बंधनसे मुक्तहै। केवल उसीकेपास पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" होसकतीहै। सामान्य भाषामें धार्मिक लोग उसे "ईश्वर" कहतेहैं। बाइबिल में ईश्वर बिना किसी कारणके कहताहै — "प्रकाश हो", और प्रकाश होजाताहै। वही सत्ता उपनिषदोंमें कहतीहै — "मैं अनेक होजाऊँ", और वही जगत, जीव-जंतु आदिके रूपमें अनेक होजातीहै। यदि ऐसा कोई अस्तित्वहै, तो केवल वही पूर्ण स्वतंत्र इच्छासे परिपूर्ण होसकताहै। बाकी सबकी स्वतंत्र इच्छा सीमितहै। जैसे-जैसे हम विकसित होतेहैं, इस स्वतंत्रताकी सीमा केवल विस्तृत होतीजातीहै। उस स्वतंत्र इच्छाको कुछ साधारण प्रोब्सके माध्यमसे सिद्ध नहीं कियाजासकताहै। उसे केवल अंतर्दृष्टिके माध्यमसे ही जानाजासकताहै।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#audiobook, #Hindi, #mystery, #neuroscience, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Upanishad</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  आपका जन्म ही आपकी किस्मत नहीं बनजाना चाहिए, हैना?</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi_0607575977.html</link><category>#Caste</category><category>#harmoney</category><category>#Hindi</category><category>#peace</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 23 May 2026 08:21:24 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-5418306733392114506</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;/script&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;असल दुनिया में — चाहे आप न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो या नई दिल्ली में हों — यह दौड़ इतनी न्यायपूर्ण नहीं होती। दौड़ शुरू होनेसे पहले ही कुछ लोग 50 मीटर के निशान पर खड़े होते हैं, जबकि कुछ लोगोंको शुरुआती रेखा से 20 मीटर पीछे से शुरुआत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;आप शायद समझ ही गए होंगे कि मैं किस दौड़ की बात कररहा हूँ। यह है सामाजिक असमानता की दौड़।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दशकों से दुनिया भर के समाज इसे सुधारने की कोशिश कररहे हैं। अमेरिका जैसे देशों में "अफर्मेटिव एक्शन", यूरोप में "सामाजिक विविधता कोटा", और एशिया में "आरक्षण व्यवस्था" के माध्यम से इस असमानता को मिटाने के प्रयास लगातार होतेरहे हैं।&lt;br /&gt;ये सभी अच्छे इरादों वाले प्रयास थे। लेकिन हमें ईमानदारी से एक बात स्वीकार करनी होगी: वर्तमान व्यवस्थाएँ पूरी तरह असफल होचुकी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असमानता को समाप्त करने के बजाय, ये राजनीतिक युद्धभूमियाँ बनचुकी हैं। ये ऐसे राजनीतिक फुटबॉल खेल बनगए हैं, जिनका उपयोग नेता चुनाव जीतने और अपने वोट-बैंक सुरक्षित करने केलिए करते हैं। लेकिन असली समस्या वहीं की वहीं बनी हुई है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और बढ़ती जारही है।&lt;br /&gt;जिस पुरानी व्यवस्था का हम अभी उपयोग कररहे हैं, उसमें दो बड़ी खामियाँ हैं जिन्हें हर कोई देख सकता है, लेकिन जिनके बारे में खुलकर बात करना कोई पसंद नहीं करता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• पहली बात, यह व्यवस्था बहुत अधिक सरलीकृत और केवल दिखावटी है। यह मानकर चलती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष सामाजिक वर्ग या जाति से है, तो वह निश्चित रूपसे वंचित होगा। लेकिन हम सब जानते हैं कि लंदन के आलीशान निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर "निम्नवर्गीय परिवार" भी हैं, और ऐसे गरीब "उच्चवर्गीय परिवार" भी हैं जिनके बच्चे सचमुच भूख से पीड़ित हैं। जब कोई अमीर बच्चा गरीबों केलिए आरक्षित सुविधा का लाभ लेता है, तो वह उसी समुदाय के किसी वास्तव में ज़रूरतमंद बच्चे से अवसर "छीनने" जैसा होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• दूसरी बात, हमारे राजनीतिक समाधान समय के साथ जमजाते हैं। एक बार कोई कानून या नीति बनादी जाए, तो वह मिटाई न जासकने वाली रेखा बनजाती है। यह व्यवस्था कभी यह नहीं देखती कि पिछले कुछ दशकों में कोई समुदाय वास्तव में आगे बढ़ा है या नहीं; यह उस मरीज़ को दवा देती रहती है जो शायद पहले ही ठीक होचुका हो, जबकि उसके बगल में मररहे व्यक्ति को दवा तक नहीं मिलती।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;हमें यह पूछना बंद करना होगा कि, "आप किस जाति या समुदाय से हैं?" इसके बजाय हमें यह पूछना शुरू करना होगा कि, "आपके संघर्ष का रास्ता कैसा था?" हमें राजनीति से ऊपर उठकर न्यायपूर्ण अवसरों की ओर बढ़ना होगा।&lt;br /&gt;और यह राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि एक पारदर्शी एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था से संभव होसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझने केलिए कि क्या ऐसी व्यवस्था वास्तव में काम करसकती है, आइए भारत जैसे देश का उदाहरण लें। इस विचार केलिए भारत शायद सबसे उपयुक्त प्रयोगशाला है। क्योंकि:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• भारत दुनिया की सबसे जटिल और गहराई से जड़ जमाए सामाजिक श्रेणी व्यवस्थाओं में से एक का सामना कररहा है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• लेकिन भारत के पास एक बहुत बड़ा लाभ भी है: ऐसी व्यवस्था को लागू करने केलिए आवश्यक डिजिटल आधारभूत संरचना पहलेसे ही मौजूद है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;भारत पिछले सत्तर से अधिक वर्षों से सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था चलारहा है। लेकिन शोषित समुदायों के भीतर के ही संपन्न वर्ग अधिकांश लाभ लेरहे हैं, जबकि दूर-दराज़ के गाँवों में रहने वाले सबसे गरीब लोग आज भी वंचित हैं।&lt;br /&gt;फिर भी, किसी भी राजनेता केलिए किसी समुदाय को आरक्षण सूची से हटाना लगभग राजनीतिक आत्महत्या के समान है। इसलिए पूरी व्यवस्था ठहरचुकी है।&lt;br /&gt;अब भारत की आधुनिक डिजिटल संरचना पर एक नज़र डालिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• भारत ने बायोमेट्रिक आधारित नागरिक पहचान प्रणाली लागू की है। आपके मोबाइल फोन से लेकर आपके बैंक खाते तक, सबकुछ उस पहचान से जुड़ा हुआ है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• स्कूलों और कॉलेजों के पूरी तरह डिजिटाइज़्ड शैक्षणिक रिकॉर्ड अब सामान्य होतेजारहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• एक बड़े स्तर पर ट्रैक की जासकने वाली डिजिटल भुगतान व्यवस्था पहलेसे मौजूद है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• और नागरिक पहचान से जुड़ा विशाल आयकर डेटा नेटवर्क भी उपलब्ध है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;दूसरे शब्दों में कहें तो, ज़रूरी डेटा पहलेसे ही मौजूद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कोई बैंक केवल पाँच सेकंड में किसी व्यक्ति के डिजिटल रिकॉर्ड देखकर यह तय करसकता है कि उसे 50,000 का ऋण दियाजाए या नहीं, तो फिर हम कॉलेज की सीट या नौकरी केलिए यह तय करने हेतु एआई आधारित अल्गोरिद्म का उपयोग क्यों न करें कि किसे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाति प्रमाणपत्र की जगह, यह न्यायपूर्ण व्यवस्था लगातार बदलते रहने वाले "सामाजिक स्थिति अंक" की गणना करेगी। इसे एक क्रेडिट स्कोर की तरह समझिए — लेकिन यह केवल जन्म रिकॉर्ड देखने के बजाय, उन वास्तविक बाधाओं को मापेगा जिन्हें किसी व्यक्ति ने जीवन में पार किया है।&lt;br /&gt;इस व्यवस्था में एआई कमसेकम चार सरल सिद्धांतों के आधार पर इस दौड़ की न्यायपूर्णता तय करसकता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• संघर्ष का मार्ग. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता पहले ही आरक्षण का उपयोग करके उच्च सरकारी पद या सुविधाएँ प्राप्त करचुके हैं, तो उस व्यक्ति का अपना स्कोर कम होजाएगा। उस परिवार को आवश्यक सहायता पहले ही मिलचुकी है; अब उसे पीछे हटकर किसी दूर-दराज़ गाँव के प्रथम पीढ़ी के छात्र केलिए जगह बनानी चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• माता-पिता की पृष्ठभूमि. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता डॉक्टर या अन्य उच्च-कौशल वाले पेशेवर हैं, तो वह बच्चा तुलनात्मक रूपसे अधिक सशक्त होगा। उसके घर में पढ़ाई का वातावरण, सही मार्गदर्शन और प्रभावशाली लोगों से परिचय होगा। लेकिन अशिक्षित माता-पिता का बच्चा जीवन की दौड़ में पीछे से शुरुआत करता है। उस अंतर को संतुलित करने केलिए एआई ऐसे बच्चे को अधिक अंक देगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• वह वातावरण जिसमें व्यक्ति बड़ा हुआ. — क्या बच्चा दक्षिण मुंबई के किसी आलीशान स्कूल में पढ़ा? या ग्रामीण बिहार के टीन की छत वाले स्कूल में? क्या उसके पास हाई-स्पीड इंटरनेट या महँगी कोचिंग क्लासों की सुविधा थी? यदि नहीं, तो एआई यह समझेगा कि गाँव के बच्चे के 80% अंक, शहर के उस बच्चे के 95% अंकों से कहीं अधिक मूल्यवान होसकते हैं जिसके पास हर सुविधा उपलब्ध थी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• ऐतिहासिक बोझ. — यदि उस बच्चे के समुदाय के साथ ऐतिहासिक रूपसे अछूतों या शोषितों जैसा व्यवहार कियागया हो, तो वह एक गहरी मानसिक और सामाजिक दीवार पैदा करता है। एआई ऐसे पृष्ठभूमि केलिए अतिरिक्त अंक सुरक्षित रखेगा — लेकिन जैसे-जैसे दशकों के साथ उस समुदाय की शिक्षा और जीवन स्तर सुधरते जाएँगे, वैसे-वैसे ये अतिरिक्त अंक धीरे-धीरे कम होतेजाएँगे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;यह केवल एक सरल व्याख्या है। वास्तविक एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था इससे कहीं अधिक जटिल होसकती है। लेकिन यह असंभव नहीं है।&lt;br /&gt;और यह समाधान केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह पूरी दुनिया केलिए एक मॉडल बनसकता है। इस व्यवस्था का एआई आधारित ढाँचा लगभग हर जगह समान रहेगा। केवल डेटा और प्राथमिकताएँ हर देश की परिस्थितियों के अनुसार बदलेंगी।&lt;br /&gt;यदि इस मॉडल को अलग-अलग देशों में लागू कियाजाए, तो यह वहाँ की वास्तविकताओं के अनुसार अपने-आप ढलजाएगा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अमेरिका में यह एआई आधारित व्यवस्था जाति और नस्ल पर आधारित राजनीतिक संघर्षों से आगे बढ़ेगी। यह मैनहैटन के सबसे महँगे निजी स्कूलों में पढ़े छात्र और वेस्ट वर्जीनिया या मिसिसिपी डेल्टा के गरीब ग्रामीण स्कूल में पढ़े छात्र के बीच का अंतर पहचानसकेगी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• पश्चिमी यूरोप में मुख्य समस्या वर्गभेद और प्रवासियों की स्थिति है। यह एआई आधारित व्यवस्था वहाँ के क्षेत्रीय और शैक्षणिक डेटाबेस का उपयोग करेगी। यह पेरिस, लंदन या मैड्रिड की प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्रों और उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्रों या प्रवासी बस्तियों में बड़े होरहे छात्रों के बीच की दूरी को अपने-आप संतुलित करेगी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब आता है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा — वह आश्चर्यजनक "आहा!" क्षण। यह वह सत्य है जो आरक्षण का समर्थन करने वालों और विरोध करने वालों, दोनों को समझासकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव या राजनीति द्वारा संचालित कोटा व्यवस्थाएँ ऐसे बहते हुए नल की तरह हैं जिन्हें एक बार चालू करदिया जाए, तो राजनीतिक कारणों से वे कभी बंद नहीं होते। लेकिन यह एआई संचालित व्यवस्था स्वभाव से ही एक "स्वयं-विलय" (Self-Dissolving) व्यवस्था है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे यह अल्गोरिद्म योग्य लोगों की सही पहचान करता है, उन्हें प्राथमिकता अंक देता है और समाज की मुख्यधारा में लाता है, वैसे-वैसे व्यवस्था में आने वाला डेटा स्वयं बदलने लगता है। जब डेटा यह दिखाने लगता है कि किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय के बच्चे दूसरों की तरह ही शिक्षा प्राप्त कररहे हैं, कमाई कररहे हैं और आर्थिक रूपसे सशक्त बनरहे हैं, तब एआई अपने-आप उन्हें "प्राथमिकता अंक" देना बंद करदेता है।&lt;br /&gt;इस परिवर्तन केलिए संसद में किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आवश्यकता नहीं होगी। किसी सामाजिक आंदोलन या हड़ताल की भी ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यवस्था अपनी ही सफलता के माध्यम से अपनी आवश्यकता को शांतिपूर्वक समाप्त करदेगी।&lt;br /&gt;अंततः, हर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति अंक एक समान स्तर की ओर आने लगेंगे। जब जन्म किसी का भविष्य तय करना बंद करदेगा, तब ये प्राथमिकता अंक स्वाभाविक रूपसे शून्य तक पहुँचजाएँगे। राजनेताओं को कोटा समाप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी — वे गणितीय दृष्टि से अपने-आप अर्थहीन होजाएँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपसंहार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे पास डेटा है, और हमारे पास इसे करने में सक्षम एआई तकनीक भी है। यदि हम एक "एआई आधारित ओपन-सोर्स अल्गोरिद्म" का निर्णय लें — जहाँ किसी गोपनीयता का डर न हो और जिसका कोड हर व्यक्ति केलिए ऑनलाइन दिखाई दे — तब पारदर्शी गणित वह न्याय करसकता है जिसे करने से राजनेता इनकार करते हैं।&lt;br /&gt;हमें ऐसी समाज बनना बंद करना होगा जो केवल यह सोचता रहे कि हमारे पूर्वज कौन थे, और ऐसी समाज बनना होगा जो यह देखे कि हमारे बच्चे क्या बनसकते हैं। आइए, लड़ना बंद करें। और इस एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था का उपयोग करके उस प्रतिभा को सहारा दें — चाहे वह इस धरती पर कहीं भी जन्मी हो — ताकि वह चमकसके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समापन के शब्द&lt;br /&gt;सिर्फ इसलिए कि मैंने यह सब कहा है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह दावा कररहा हूँ कि यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" पूरी तरह दोषरहित है। मैं भी जानता हूँ कि इसमें कई चुनौतियाँ हैं।&lt;br /&gt;यदि लोग व्यवस्थित रूपसे अपना डेटा छिपाकर अल्गोरिद्म को धोखा देने लगें तो क्या होगा? या यदि इस व्यवस्था का कोड लिखने वाला इंसान अपने निजी पूर्वाग्रह उसमें डालदे तो? ये सभी गंभीर प्रश्न हैं जिनपर निश्चित रूपसे गहराई से विचार कियाजाना चाहिए।&lt;br /&gt;लेकिन मेरा तर्क केवल इतना है: वर्तमान व्यवस्था, जो आज हमारी आँखों के सामने है, पूरी तरह जड़ होचुकी है और राजनीति की कीचड़ में फँस गई है। उससे चिपके रहकर हमेशा लड़ते रहने के बजाय, हमें एक नए रास्ते के बारे में सोचना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" शायद कोई पूर्ण और अंतिम समाधान न हो, लेकिन परिवर्तन की दिशा में उठाया जाने वाला यह निश्चित रूपसे सबसे अच्छा पहला कदम होसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, पुरानी दीवारों को लेकर लड़ना बंद करें और भविष्य के बच्चों केलिए न्याय की एक नई नींव बनाने पर चर्चा शुरू करें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------


&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
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&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="audio/mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/pumntu58i91q8247qpyf7/03.mp3?rlkey=ihi7ws40w55uypeiknb57ap7n&amp;st=4pwfelj1&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhQvzWVqy-b-WhUypUsfKMaph1BqcCZs3N1djL4OygVmWVwlN2nlSy1vvFeTl5TKf8nuwLl4KicSg2AQ8_kiRMpjqv1fjy0YZGh8hNlEbHK5oHDybxforXOAZflDv2RXRATEictfefjIWpZb1Sim7_MatMaKz0e5BgPPQvBgReMauHPzY3athmZJuZH048/s72-w640-h640-c/fairness.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आइए, एक सरल उदाहरण से अपनी चर्चा शुरू करें। कल्पना कीजिए एक 100 मीटर की दौड़ की। एक न्यायपूर्ण दुनिया में, हर व्यक्ति शून्य मीटर की रेखा पर खड़ा होता है। स्टार्टिंग पिस्टल चलती है, सीटी बजती है, और जो सबसे तेज़ दौड़ता है वही जीतता है। सरल है, हैना? लेकिन दुर्भाग्य से हम ऐसी दुनिया में नहीं रहते। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); असल दुनिया में — चाहे आप न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो या नई दिल्ली में हों — यह दौड़ इतनी न्यायपूर्ण नहीं होती। दौड़ शुरू होनेसे पहले ही कुछ लोग 50 मीटर के निशान पर खड़े होते हैं, जबकि कुछ लोगोंको शुरुआती रेखा से 20 मीटर पीछे से शुरुआत करनी पड़ती है। आप शायद समझ ही गए होंगे कि मैं किस दौड़ की बात कररहा हूँ। यह है सामाजिक असमानता की दौड़। दशकों से दुनिया भर के समाज इसे सुधारने की कोशिश कररहे हैं। अमेरिका जैसे देशों में "अफर्मेटिव एक्शन", यूरोप में "सामाजिक विविधता कोटा", और एशिया में "आरक्षण व्यवस्था" के माध्यम से इस असमानता को मिटाने के प्रयास लगातार होतेरहे हैं। ये सभी अच्छे इरादों वाले प्रयास थे। लेकिन हमें ईमानदारी से एक बात स्वीकार करनी होगी: वर्तमान व्यवस्थाएँ पूरी तरह असफल होचुकी हैं। असमानता को समाप्त करने के बजाय, ये राजनीतिक युद्धभूमियाँ बनचुकी हैं। ये ऐसे राजनीतिक फुटबॉल खेल बनगए हैं, जिनका उपयोग नेता चुनाव जीतने और अपने वोट-बैंक सुरक्षित करने केलिए करते हैं। लेकिन असली समस्या वहीं की वहीं बनी हुई है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और बढ़ती जारही है। जिस पुरानी व्यवस्था का हम अभी उपयोग कररहे हैं, उसमें दो बड़ी खामियाँ हैं जिन्हें हर कोई देख सकता है, लेकिन जिनके बारे में खुलकर बात करना कोई पसंद नहीं करता। • पहली बात, यह व्यवस्था बहुत अधिक सरलीकृत और केवल दिखावटी है। यह मानकर चलती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष सामाजिक वर्ग या जाति से है, तो वह निश्चित रूपसे वंचित होगा। लेकिन हम सब जानते हैं कि लंदन के आलीशान निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर "निम्नवर्गीय परिवार" भी हैं, और ऐसे गरीब "उच्चवर्गीय परिवार" भी हैं जिनके बच्चे सचमुच भूख से पीड़ित हैं। जब कोई अमीर बच्चा गरीबों केलिए आरक्षित सुविधा का लाभ लेता है, तो वह उसी समुदाय के किसी वास्तव में ज़रूरतमंद बच्चे से अवसर "छीनने" जैसा होता है। • दूसरी बात, हमारे राजनीतिक समाधान समय के साथ जमजाते हैं। एक बार कोई कानून या नीति बनादी जाए, तो वह मिटाई न जासकने वाली रेखा बनजाती है। यह व्यवस्था कभी यह नहीं देखती कि पिछले कुछ दशकों में कोई समुदाय वास्तव में आगे बढ़ा है या नहीं; यह उस मरीज़ को दवा देती रहती है जो शायद पहले ही ठीक होचुका हो, जबकि उसके बगल में मररहे व्यक्ति को दवा तक नहीं मिलती। हमें यह पूछना बंद करना होगा कि, "आप किस जाति या समुदाय से हैं?" इसके बजाय हमें यह पूछना शुरू करना होगा कि, "आपके संघर्ष का रास्ता कैसा था?" हमें राजनीति से ऊपर उठकर न्यायपूर्ण अवसरों की ओर बढ़ना होगा। और यह राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि एक पारदर्शी एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था से संभव होसकता है। यह समझने केलिए कि क्या ऐसी व्यवस्था वास्तव में काम करसकती है, आइए भारत जैसे देश का उदाहरण लें। इस विचार केलिए भारत शायद सबसे उपयुक्त प्रयोगशाला है। क्योंकि: • भारत दुनिया की सबसे जटिल और गहराई से जड़ जमाए सामाजिक श्रेणी व्यवस्थाओं में से एक का सामना कररहा है। • लेकिन भारत के पास एक बहुत बड़ा लाभ भी है: ऐसी व्यवस्था को लागू करने केलिए आवश्यक डिजिटल आधारभूत संरचना पहलेसे ही मौजूद है। भारत पिछले सत्तर से अधिक वर्षों से सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था चलारहा है। लेकिन शोषित समुदायों के भीतर के ही संपन्न वर्ग अधिकांश लाभ लेरहे हैं, जबकि दूर-दराज़ के गाँवों में रहने वाले सबसे गरीब लोग आज भी वंचित हैं। फिर भी, किसी भी राजनेता केलिए किसी समुदाय को आरक्षण सूची से हटाना लगभग राजनीतिक आत्महत्या के समान है। इसलिए पूरी व्यवस्था ठहरचुकी है। अब भारत की आधुनिक डिजिटल संरचना पर एक नज़र डालिए। • भारत ने बायोमेट्रिक आधारित नागरिक पहचान प्रणाली लागू की है। आपके मोबाइल फोन से लेकर आपके बैंक खाते तक, सबकुछ उस पहचान से जुड़ा हुआ है। • स्कूलों और कॉलेजों के पूरी तरह डिजिटाइज़्ड शैक्षणिक रिकॉर्ड अब सामान्य होतेजारहे हैं। • एक बड़े स्तर पर ट्रैक की जासकने वाली डिजिटल भुगतान व्यवस्था पहलेसे मौजूद है। • और नागरिक पहचान से जुड़ा विशाल आयकर डेटा नेटवर्क भी उपलब्ध है। दूसरे शब्दों में कहें तो, ज़रूरी डेटा पहलेसे ही मौजूद है। यदि कोई बैंक केवल पाँच सेकंड में किसी व्यक्ति के डिजिटल रिकॉर्ड देखकर यह तय करसकता है कि उसे 50,000 का ऋण दियाजाए या नहीं, तो फिर हम कॉलेज की सीट या नौकरी केलिए यह तय करने हेतु एआई आधारित अल्गोरिद्म का उपयोग क्यों न करें कि किसे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है? जाति प्रमाणपत्र की जगह, यह न्यायपूर्ण व्यवस्था लगातार बदलते रहने वाले "सामाजिक स्थिति अंक" की गणना करेगी। इसे एक क्रेडिट स्कोर की तरह समझिए — लेकिन यह केवल जन्म रिकॉर्ड देखने के बजाय, उन वास्तविक बाधाओं को मापेगा जिन्हें किसी व्यक्ति ने जीवन में पार किया है। इस व्यवस्था में एआई कमसेकम चार सरल सिद्धांतों के आधार पर इस दौड़ की न्यायपूर्णता तय करसकता है: • संघर्ष का मार्ग. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता पहले ही आरक्षण का उपयोग करके उच्च सरकारी पद या सुविधाएँ प्राप्त करचुके हैं, तो उस व्यक्ति का अपना स्कोर कम होजाएगा। उस परिवार को आवश्यक सहायता पहले ही मिलचुकी है; अब उसे पीछे हटकर किसी दूर-दराज़ गाँव के प्रथम पीढ़ी के छात्र केलिए जगह बनानी चाहिए। • माता-पिता की पृष्ठभूमि. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता डॉक्टर या अन्य उच्च-कौशल वाले पेशेवर हैं, तो वह बच्चा तुलनात्मक रूपसे अधिक सशक्त होगा। उसके घर में पढ़ाई का वातावरण, सही मार्गदर्शन और प्रभावशाली लोगों से परिचय होगा। लेकिन अशिक्षित माता-पिता का बच्चा जीवन की दौड़ में पीछे से शुरुआत करता है। उस अंतर को संतुलित करने केलिए एआई ऐसे बच्चे को अधिक अंक देगा। • वह वातावरण जिसमें व्यक्ति बड़ा हुआ. — क्या बच्चा दक्षिण मुंबई के किसी आलीशान स्कूल में पढ़ा? या ग्रामीण बिहार के टीन की छत वाले स्कूल में? क्या उसके पास हाई-स्पीड इंटरनेट या महँगी कोचिंग क्लासों की सुविधा थी? यदि नहीं, तो एआई यह समझेगा कि गाँव के बच्चे के 80% अंक, शहर के उस बच्चे के 95% अंकों से कहीं अधिक मूल्यवान होसकते हैं जिसके पास हर सुविधा उपलब्ध थी। • ऐतिहासिक बोझ. — यदि उस बच्चे के समुदाय के साथ ऐतिहासिक रूपसे अछूतों या शोषितों जैसा व्यवहार कियागया हो, तो वह एक गहरी मानसिक और सामाजिक दीवार पैदा करता है। एआई ऐसे पृष्ठभूमि केलिए अतिरिक्त अंक सुरक्षित रखेगा — लेकिन जैसे-जैसे दशकों के साथ उस समुदाय की शिक्षा और जीवन स्तर सुधरते जाएँगे, वैसे-वैसे ये अतिरिक्त अंक धीरे-धीरे कम होतेजाएँगे। यह केवल एक सरल व्याख्या है। वास्तविक एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था इससे कहीं अधिक जटिल होसकती है। लेकिन यह असंभव नहीं है। और यह समाधान केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह पूरी दुनिया केलिए एक मॉडल बनसकता है। इस व्यवस्था का एआई आधारित ढाँचा लगभग हर जगह समान रहेगा। केवल डेटा और प्राथमिकताएँ हर देश की परिस्थितियों के अनुसार बदलेंगी। यदि इस मॉडल को अलग-अलग देशों में लागू कियाजाए, तो यह वहाँ की वास्तविकताओं के अनुसार अपने-आप ढलजाएगा: • अमेरिका में यह एआई आधारित व्यवस्था जाति और नस्ल पर आधारित राजनीतिक संघर्षों से आगे बढ़ेगी। यह मैनहैटन के सबसे महँगे निजी स्कूलों में पढ़े छात्र और वेस्ट वर्जीनिया या मिसिसिपी डेल्टा के गरीब ग्रामीण स्कूल में पढ़े छात्र के बीच का अंतर पहचानसकेगी। • पश्चिमी यूरोप में मुख्य समस्या वर्गभेद और प्रवासियों की स्थिति है। यह एआई आधारित व्यवस्था वहाँ के क्षेत्रीय और शैक्षणिक डेटाबेस का उपयोग करेगी। यह पेरिस, लंदन या मैड्रिड की प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्रों और उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्रों या प्रवासी बस्तियों में बड़े होरहे छात्रों के बीच की दूरी को अपने-आप संतुलित करेगी। लेकिन अब आता है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा — वह आश्चर्यजनक "आहा!" क्षण। यह वह सत्य है जो आरक्षण का समर्थन करने वालों और विरोध करने वालों, दोनों को समझासकता है। मानव या राजनीति द्वारा संचालित कोटा व्यवस्थाएँ ऐसे बहते हुए नल की तरह हैं जिन्हें एक बार चालू करदिया जाए, तो राजनीतिक कारणों से वे कभी बंद नहीं होते। लेकिन यह एआई संचालित व्यवस्था स्वभाव से ही एक "स्वयं-विलय" (Self-Dissolving) व्यवस्था है। जैसे-जैसे यह अल्गोरिद्म योग्य लोगों की सही पहचान करता है, उन्हें प्राथमिकता अंक देता है और समाज की मुख्यधारा में लाता है, वैसे-वैसे व्यवस्था में आने वाला डेटा स्वयं बदलने लगता है। जब डेटा यह दिखाने लगता है कि किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय के बच्चे दूसरों की तरह ही शिक्षा प्राप्त कररहे हैं, कमाई कररहे हैं और आर्थिक रूपसे सशक्त बनरहे हैं, तब एआई अपने-आप उन्हें "प्राथमिकता अंक" देना बंद करदेता है। इस परिवर्तन केलिए संसद में किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आवश्यकता नहीं होगी। किसी सामाजिक आंदोलन या हड़ताल की भी ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यवस्था अपनी ही सफलता के माध्यम से अपनी आवश्यकता को शांतिपूर्वक समाप्त करदेगी। अंततः, हर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति अंक एक समान स्तर की ओर आने लगेंगे। जब जन्म किसी का भविष्य तय करना बंद करदेगा, तब ये प्राथमिकता अंक स्वाभाविक रूपसे शून्य तक पहुँचजाएँगे। राजनेताओं को कोटा समाप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी — वे गणितीय दृष्टि से अपने-आप अर्थहीन होजाएँगे। उपसंहार. हमारे पास डेटा है, और हमारे पास इसे करने में सक्षम एआई तकनीक भी है। यदि हम एक "एआई आधारित ओपन-सोर्स अल्गोरिद्म" का निर्णय लें — जहाँ किसी गोपनीयता का डर न हो और जिसका कोड हर व्यक्ति केलिए ऑनलाइन दिखाई दे — तब पारदर्शी गणित वह न्याय करसकता है जिसे करने से राजनेता इनकार करते हैं। हमें ऐसी समाज बनना बंद करना होगा जो केवल यह सोचता रहे कि हमारे पूर्वज कौन थे, और ऐसी समाज बनना होगा जो यह देखे कि हमारे बच्चे क्या बनसकते हैं। आइए, लड़ना बंद करें। और इस एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था का उपयोग करके उस प्रतिभा को सहारा दें — चाहे वह इस धरती पर कहीं भी जन्मी हो — ताकि वह चमकसके। समापन के शब्द सिर्फ इसलिए कि मैंने यह सब कहा है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह दावा कररहा हूँ कि यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" पूरी तरह दोषरहित है। मैं भी जानता हूँ कि इसमें कई चुनौतियाँ हैं। यदि लोग व्यवस्थित रूपसे अपना डेटा छिपाकर अल्गोरिद्म को धोखा देने लगें तो क्या होगा? या यदि इस व्यवस्था का कोड लिखने वाला इंसान अपने निजी पूर्वाग्रह उसमें डालदे तो? ये सभी गंभीर प्रश्न हैं जिनपर निश्चित रूपसे गहराई से विचार कियाजाना चाहिए। लेकिन मेरा तर्क केवल इतना है: वर्तमान व्यवस्था, जो आज हमारी आँखों के सामने है, पूरी तरह जड़ होचुकी है और राजनीति की कीचड़ में फँस गई है। उससे चिपके रहकर हमेशा लड़ते रहने के बजाय, हमें एक नए रास्ते के बारे में सोचना होगा। यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" शायद कोई पूर्ण और अंतिम समाधान न हो, लेकिन परिवर्तन की दिशा में उठाया जाने वाला यह निश्चित रूपसे सबसे अच्छा पहला कदम होसकता है। आइए, पुरानी दीवारों को लेकर लड़ना बंद करें और भविष्य के बच्चों केलिए न्याय की एक नई नींव बनाने पर चर्चा शुरू करें।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Preview books]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आइए, एक सरल उदाहरण से अपनी चर्चा शुरू करें। कल्पना कीजिए एक 100 मीटर की दौड़ की। एक न्यायपूर्ण दुनिया में, हर व्यक्ति शून्य मीटर की रेखा पर खड़ा होता है। स्टार्टिंग पिस्टल चलती है, सीटी बजती है, और जो सबसे तेज़ दौड़ता है वही जीतता है। सरल है, हैना? 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जाति प्रमाणपत्र की जगह, यह न्यायपूर्ण व्यवस्था लगातार बदलते रहने वाले "सामाजिक स्थिति अंक" की गणना करेगी। इसे एक क्रेडिट स्कोर की तरह समझिए — लेकिन यह केवल जन्म रिकॉर्ड देखने के बजाय, उन वास्तविक बाधाओं को मापेगा जिन्हें किसी व्यक्ति ने जीवन में पार किया है। इस व्यवस्था में एआई कमसेकम चार सरल सिद्धांतों के आधार पर इस दौड़ की न्यायपूर्णता तय करसकता है: • संघर्ष का मार्ग. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता पहले ही आरक्षण का उपयोग करके उच्च सरकारी पद या सुविधाएँ प्राप्त करचुके हैं, तो उस व्यक्ति का अपना स्कोर कम होजाएगा। उस परिवार को आवश्यक सहायता पहले ही मिलचुकी है; अब उसे पीछे हटकर किसी दूर-दराज़ गाँव के प्रथम पीढ़ी के छात्र केलिए जगह बनानी चाहिए। • माता-पिता की पृष्ठभूमि. — यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता डॉक्टर या अन्य उच्च-कौशल वाले पेशेवर हैं, तो वह बच्चा तुलनात्मक रूपसे अधिक सशक्त होगा। उसके घर में पढ़ाई का वातावरण, सही मार्गदर्शन और प्रभावशाली लोगों से परिचय होगा। लेकिन अशिक्षित माता-पिता का बच्चा जीवन की दौड़ में पीछे से शुरुआत करता है। उस अंतर को संतुलित करने केलिए एआई ऐसे बच्चे को अधिक अंक देगा। • वह वातावरण जिसमें व्यक्ति बड़ा हुआ. — क्या बच्चा दक्षिण मुंबई के किसी आलीशान स्कूल में पढ़ा? या ग्रामीण बिहार के टीन की छत वाले स्कूल में? क्या उसके पास हाई-स्पीड इंटरनेट या महँगी कोचिंग क्लासों की सुविधा थी? यदि नहीं, तो एआई यह समझेगा कि गाँव के बच्चे के 80% अंक, शहर के उस बच्चे के 95% अंकों से कहीं अधिक मूल्यवान होसकते हैं जिसके पास हर सुविधा उपलब्ध थी। • ऐतिहासिक बोझ. — यदि उस बच्चे के समुदाय के साथ ऐतिहासिक रूपसे अछूतों या शोषितों जैसा व्यवहार कियागया हो, तो वह एक गहरी मानसिक और सामाजिक दीवार पैदा करता है। एआई ऐसे पृष्ठभूमि केलिए अतिरिक्त अंक सुरक्षित रखेगा — लेकिन जैसे-जैसे दशकों के साथ उस समुदाय की शिक्षा और जीवन स्तर सुधरते जाएँगे, वैसे-वैसे ये अतिरिक्त अंक धीरे-धीरे कम होतेजाएँगे। यह केवल एक सरल व्याख्या है। वास्तविक एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था इससे कहीं अधिक जटिल होसकती है। लेकिन यह असंभव नहीं है। और यह समाधान केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह पूरी दुनिया केलिए एक मॉडल बनसकता है। इस व्यवस्था का एआई आधारित ढाँचा लगभग हर जगह समान रहेगा। केवल डेटा और प्राथमिकताएँ हर देश की परिस्थितियों के अनुसार बदलेंगी। यदि इस मॉडल को अलग-अलग देशों में लागू कियाजाए, तो यह वहाँ की वास्तविकताओं के अनुसार अपने-आप ढलजाएगा: • अमेरिका में यह एआई आधारित व्यवस्था जाति और नस्ल पर आधारित राजनीतिक संघर्षों से आगे बढ़ेगी। यह मैनहैटन के सबसे महँगे निजी स्कूलों में पढ़े छात्र और वेस्ट वर्जीनिया या मिसिसिपी डेल्टा के गरीब ग्रामीण स्कूल में पढ़े छात्र के बीच का अंतर पहचानसकेगी। • पश्चिमी यूरोप में मुख्य समस्या वर्गभेद और प्रवासियों की स्थिति है। यह एआई आधारित व्यवस्था वहाँ के क्षेत्रीय और शैक्षणिक डेटाबेस का उपयोग करेगी। यह पेरिस, लंदन या मैड्रिड की प्रतिष्ठित संस्थाओं के छात्रों और उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्रों या प्रवासी बस्तियों में बड़े होरहे छात्रों के बीच की दूरी को अपने-आप संतुलित करेगी। लेकिन अब आता है सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा — वह आश्चर्यजनक "आहा!" क्षण। यह वह सत्य है जो आरक्षण का समर्थन करने वालों और विरोध करने वालों, दोनों को समझासकता है। मानव या राजनीति द्वारा संचालित कोटा व्यवस्थाएँ ऐसे बहते हुए नल की तरह हैं जिन्हें एक बार चालू करदिया जाए, तो राजनीतिक कारणों से वे कभी बंद नहीं होते। लेकिन यह एआई संचालित व्यवस्था स्वभाव से ही एक "स्वयं-विलय" (Self-Dissolving) व्यवस्था है। जैसे-जैसे यह अल्गोरिद्म योग्य लोगों की सही पहचान करता है, उन्हें प्राथमिकता अंक देता है और समाज की मुख्यधारा में लाता है, वैसे-वैसे व्यवस्था में आने वाला डेटा स्वयं बदलने लगता है। जब डेटा यह दिखाने लगता है कि किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय के बच्चे दूसरों की तरह ही शिक्षा प्राप्त कररहे हैं, कमाई कररहे हैं और आर्थिक रूपसे सशक्त बनरहे हैं, तब एआई अपने-आप उन्हें "प्राथमिकता अंक" देना बंद करदेता है। इस परिवर्तन केलिए संसद में किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आवश्यकता नहीं होगी। किसी सामाजिक आंदोलन या हड़ताल की भी ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यवस्था अपनी ही सफलता के माध्यम से अपनी आवश्यकता को शांतिपूर्वक समाप्त करदेगी। अंततः, हर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति अंक एक समान स्तर की ओर आने लगेंगे। जब जन्म किसी का भविष्य तय करना बंद करदेगा, तब ये प्राथमिकता अंक स्वाभाविक रूपसे शून्य तक पहुँचजाएँगे। राजनेताओं को कोटा समाप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी — वे गणितीय दृष्टि से अपने-आप अर्थहीन होजाएँगे। उपसंहार. हमारे पास डेटा है, और हमारे पास इसे करने में सक्षम एआई तकनीक भी है। यदि हम एक "एआई आधारित ओपन-सोर्स अल्गोरिद्म" का निर्णय लें — जहाँ किसी गोपनीयता का डर न हो और जिसका कोड हर व्यक्ति केलिए ऑनलाइन दिखाई दे — तब पारदर्शी गणित वह न्याय करसकता है जिसे करने से राजनेता इनकार करते हैं। हमें ऐसी समाज बनना बंद करना होगा जो केवल यह सोचता रहे कि हमारे पूर्वज कौन थे, और ऐसी समाज बनना होगा जो यह देखे कि हमारे बच्चे क्या बनसकते हैं। आइए, लड़ना बंद करें। और इस एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था का उपयोग करके उस प्रतिभा को सहारा दें — चाहे वह इस धरती पर कहीं भी जन्मी हो — ताकि वह चमकसके। समापन के शब्द सिर्फ इसलिए कि मैंने यह सब कहा है, इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह दावा कररहा हूँ कि यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" पूरी तरह दोषरहित है। मैं भी जानता हूँ कि इसमें कई चुनौतियाँ हैं। यदि लोग व्यवस्थित रूपसे अपना डेटा छिपाकर अल्गोरिद्म को धोखा देने लगें तो क्या होगा? या यदि इस व्यवस्था का कोड लिखने वाला इंसान अपने निजी पूर्वाग्रह उसमें डालदे तो? ये सभी गंभीर प्रश्न हैं जिनपर निश्चित रूपसे गहराई से विचार कियाजाना चाहिए। लेकिन मेरा तर्क केवल इतना है: वर्तमान व्यवस्था, जो आज हमारी आँखों के सामने है, पूरी तरह जड़ होचुकी है और राजनीति की कीचड़ में फँस गई है। उससे चिपके रहकर हमेशा लड़ते रहने के बजाय, हमें एक नए रास्ते के बारे में सोचना होगा। यह "एआई आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था" शायद कोई पूर्ण और अंतिम समाधान न हो, लेकिन परिवर्तन की दिशा में उठाया जाने वाला यह निश्चित रूपसे सबसे अच्छा पहला कदम होसकता है। आइए, पुरानी दीवारों को लेकर लड़ना बंद करें और भविष्य के बच्चों केलिए न्याय की एक नई नींव बनाने पर चर्चा शुरू करें।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Caste, #harmoney, #Hindi, #peace, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] अन-ध्यान मत कीजिए: आपका मोबाइल आपके मन को भटका सकता है.</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi_0415293874.html</link><category>#Hindi</category><category>#Meditation</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Yoga</category><pubDate>Sat, 16 May 2026 06:57:10 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-4475555658086189178</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;आइए हम एक सामान्य समस्या से शुरुआत करें, जिसका सामना हम सभी करते हैं — तनाव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलग-अलग लोगोंके तनावमें आनेके कारण अलग हो सकते हैं। लेकिन अधिकांश परिस्थितियोंमें इसके पीछे काम करनेवाली जैविक प्रक्रिया लगभग समान होती है। आगे बढ़नेसे पहले, आइए तनावके पीछे काम करनेवाले इस मूल तंत्रको थोड़ा समझ लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तनाव केवल मनुष्योंमें ही नहीं होता। पशु भी इसका अनुभव करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कोई पशु अपनी ओर तेजीसे आते हुए किसी शिकारीको देखता है, तब उसकी आँखें चित्रोंकी एक श्रृंखला मस्तिष्कको भेजती हैं। ये चित्र यह जानकारी देते हैं कि खतरा कितना निकट है, कितनी तेजीसे आ रहा है, और किस दिशासे आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँखें इन चित्रोंको एकके बाद एक मस्तिष्कतक पहुँचाती हैं, बिल्कुल पुराने चलचित्रकी फ्रेमोंकी तरह। मस्तिष्कको इनका तेजीसे विश्लेषण करना पड़ता है और खतरेकी मात्रा का अनुमान लगाना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमेंसे प्रत्येक चित्र मस्तिष्कमें तंत्रिकाकोशिकाओंकी गतिविधिके रूपमें संकेतित होता है। और ऐसे चित्रोंकी एक निरंतर श्रृंखला आती रहती है। जैसे-जैसे शिकारी निकट आता है, ये चित्र बदलते रहते हैं। स्वाभाविक रूपसे परिस्थितिके अनुसार मस्तिष्ककी प्रतिक्रिया भी बदलती रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुको या तो लड़ना पड़ता है या वहाँसे भागना पड़ता है। इसे "फाइट ऑर फ्लाइट" प्रतिक्रिया कहा जाता है। इन दोनोंमेंसे कुछ भी करनेकेलिए शरीरके हाथ-पैरोंमें अधिक शक्तिकी आवश्यकता होती है। इस आवश्यकताकी पूर्ति उन भागोंमें अधिक रक्तप्रवाहके द्वारा की जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मांसपेशियोंतक अधिक रक्त पहुँचानेकेलिए हृदयकी धड़कन बढ़ जाती है। उसीके अनुसार श्वासकी गति भी बढ़ती है। यह सब एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोनोंके स्वचालित स्रावके कारण संभव होता है। साथ ही, शत्रुकी गतिविधियोंपर नज़र रखनेकेलिए मस्तिष्कको अत्यंत सतर्क भी रहना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्रिकाकोशिकाओंकी यह तीव्र गतिविधि और लगातार बदलता हुआ ध्यान पशुमें तनाव उत्पन्न करता है। हार्मोनोंका स्राव उसे खतरेका सामना करनेकेलिए तैयार करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह निम्न स्तरके जीवमें तनावकी स्थिति है, जहाँ मुख्य कारण सामान्यतः शारीरिक भय होता है। लेकिन जब मनुष्य जैसा अधिक विकसित जीव मानसिक तनावसे गुजरता है, तब भी लगभग यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। क्योंकि दोनों परिस्थितियोंमें तंत्रिकीय गतिविधि बढ़ जाती है और ध्यान लगातार बदलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे विचार भी मस्तिष्कमें तंत्रिकीय गतिविधिके रूपमें संकेतित होते हैं। और विचारोंकी एक विशेषता होती है — वे बहुत तेजीसे बढ़ते और फैलते हैं। इन विचारोंको अपनी गतिविधि चलानेकेलिए मस्तिष्कके विभिन्न भागोंको आपसमें जोड़ना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र ही इन आवश्यक मार्गोंका निर्माण करता है। इसलिए प्रत्येक विचार ध्यानको अपनी ओर खींचनेका प्रयास करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि विचार अनेक हो सकते हैं, और उनमेंसे कई एक ही समयपर उत्पन्न होते हैं, इसलिए ध्यानकेंद्र इन प्रतिस्पर्धी विचारोंके बीच विचलित होने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मस्तिष्कके भीतर लगभग वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसी किसी बाहरी आक्रमणके समय होती है। कारण अलग हो सकता है, लेकिन मस्तिष्ककी आंतरिक स्थिति लगभग वही रहती है। स्वाभाविक रूपसे इससे भी तनावसे जुड़े हार्मोनोंका स्राव होने लगता है, भले ही वास्तवमें लड़ने या भागनेकी कोई शारीरिक आवश्यकता न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यदि ये हार्मोन लंबे समयतक स्रावित होते रहें, तो वे गंभीर समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। वे केवल आपातकालीन परिस्थितियोंकेलिए बने हैं। इसलिए दीर्घकालिक मानसिक तनाव अनेक स्वास्थ्य समस्याओंका कारण बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ध्यान कैसे सहायता करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आप ध्यान करते हैं, तब आप क्या करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप अपना ध्यान किसी एक वस्तु या गतिविधिपर केंद्रित करते हैं। और जैसे-जैसे आप अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण बनाते जाते हैं, एक महत्वपूर्ण बात घटित होती है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र लगातार एक ही लक्ष्यपर लगा रहता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• मस्तिष्कमें उत्पन्न होनेवाले विचारोंको ध्यान नहीं मिलता। यही ध्यान वे तंत्रिकीय मार्ग बनाता है, जिनकी सहायता से विचार मस्तिष्कके विभिन्न भागोंमें अपनी गतिविधि फैला पाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• जब विचारोंको ध्यान नहीं मिलता, तब आवश्यक मार्ग बन नहीं पाते। और मार्ग न होनेपर विचारोंकी गतिविधि धीरे-धीरे कम होने लगती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• कमजोर पड़ते विचार, नए विचारोंको जन्म देनेकी क्षमता खोने लगते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार ध्यान, धीरे-धीरे विचारोंकी संख्या कम करता है और अंततः मनको शांत कर देता है। शांत मनका अर्थ है कम तनाव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शांत मन आपको तनावके हानिकारक प्रभावोंसे बचाता है। ध्यानका अभ्यास किसी एक कार्यपर केंद्रित रहनेकी मस्तिष्ककी क्षमताको मजबूत बनाता है। बेहतर एकाग्रताका अर्थ है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें अधिक अच्छा प्रदर्शन करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार ध्यान एक साथ दो कार्य करता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;यह तनावको कम करता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;यह मानसिक एकाग्रताको सुधारता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;ध्यान क्या करता है और तनावको कम करनेमें कैसे सहायता करता है — यह उसका संक्षिप्त विवरण था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आजके समयमें हमसभी लगातार सोशल मीडियाके विकर्षणोंके संपर्कमें हैं। हममेंसे अनेक लोग लगातार यूट्यूब-शॉर्ट्स, व्हॉट्सऐपसंदेश, इंस्टाग्राम रील्स और इसी प्रकारकी चीजें देखनेके आदी हो चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोशल मीडियाका सीमित उपयोग आवश्यक रूपसे बुरा नहीं है। वह उपयोगी भी हो सकता है। लेकिन क्या होता है जब आप "क्लिकबेट" के गुलाम बन जाते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोशल मीडियापर अधिकांश सामग्री ज्ञान देनेसे अधिक, ध्यान आकर्षित करनेकेलिए बनाई जाती है। ऐसे सामग्री निर्माताओंकी रुचि उपयोगी जानकारी साझा करनेसे अधिक आपका ध्यान पकड़नेमें होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिणामस्वरूप आपका मन लगातार तेजीसे बदलती हुई और अधिकांशतः अनावश्यक जानकारीसे भर जाता है। और उसीके अनुसार आपका ध्यान भी लगातार बदलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव मस्तिष्क इस प्रकारकी निरंतर तीव्र गतिविधिको संभालनेकेलिए बना नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका परिणाम यह होता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• मस्तिष्क जानकारीको गहराईसे समझनेके बजाय सतही रूपसे ग्रहण करने लगता है। वह वास्तवमें समझनेके बजाय केवल पैटर्न खोजने लगता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• लगातार बदलती जानकारीके साथ तालमेल बैठानेकेलिए मस्तिष्क बहुत कम समयमें ध्यान बदलना सीख लेता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• इससे किसी एक विषयपर लंबे समयतक ध्यान बनाएरखनेकी हमारी क्षमता कमजोर होने लगती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• तंत्रिकीय गतिविधिकी अधिकता अंततः मनको तनावकी ओर धकेल देती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div 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मनको लगातार बदलती हुई और अव्यवस्थित जानकारीपर केंद्रित करनेकेलिए मजबूर करते हैं, तब इसका ठीक उल्टा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अधिक मानसिक गतिविधि,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अधिक ध्यान परिवर्तन,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• अधिक तनाव,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;• और संभवतः गहरी एकाग्रताको पुनः प्राप्त करनेकी क्षमताका स्थायी क्षय।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: 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&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub%20"&gt;सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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प्रत्येक चित्र मस्तिष्कमें तंत्रिकाकोशिकाओंकी गतिविधिके रूपमें संकेतित होता है। और ऐसे चित्रोंकी एक निरंतर श्रृंखला आती रहती है। जैसे-जैसे शिकारी निकट आता है, ये चित्र बदलते रहते हैं। स्वाभाविक रूपसे परिस्थितिके अनुसार मस्तिष्ककी प्रतिक्रिया भी बदलती रहती है। पशुको या तो लड़ना पड़ता है या वहाँसे भागना पड़ता है। इसे "फाइट ऑर फ्लाइट" प्रतिक्रिया कहा जाता है। इन दोनोंमेंसे कुछ भी करनेकेलिए शरीरके हाथ-पैरोंमें अधिक शक्तिकी आवश्यकता होती है। इस आवश्यकताकी पूर्ति उन भागोंमें अधिक रक्तप्रवाहके द्वारा की जाती है। मांसपेशियोंतक अधिक रक्त पहुँचानेकेलिए हृदयकी धड़कन बढ़ जाती है। उसीके अनुसार श्वासकी गति भी बढ़ती है। यह सब एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोनोंके स्वचालित स्रावके कारण संभव होता है। साथ ही, शत्रुकी गतिविधियोंपर नज़र रखनेकेलिए मस्तिष्कको अत्यंत सतर्क भी रहना पड़ता है। तंत्रिकाकोशिकाओंकी यह तीव्र गतिविधि और लगातार बदलता हुआ ध्यान पशुमें तनाव उत्पन्न करता है। हार्मोनोंका स्राव उसे खतरेका सामना करनेकेलिए तैयार करता है। यह निम्न स्तरके जीवमें तनावकी स्थिति है, जहाँ मुख्य कारण सामान्यतः शारीरिक भय होता है। लेकिन जब मनुष्य जैसा अधिक विकसित जीव मानसिक तनावसे गुजरता है, तब भी लगभग यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। क्योंकि दोनों परिस्थितियोंमें तंत्रिकीय गतिविधि बढ़ जाती है और ध्यान लगातार बदलता रहता है। हमारे विचार भी मस्तिष्कमें तंत्रिकीय गतिविधिके रूपमें संकेतित होते हैं। और विचारोंकी एक विशेषता होती है — वे बहुत तेजीसे बढ़ते और फैलते हैं। इन विचारोंको अपनी गतिविधि चलानेकेलिए मस्तिष्कके विभिन्न भागोंको आपसमें जोड़ना पड़ता है। मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र ही इन आवश्यक मार्गोंका निर्माण करता है। इसलिए प्रत्येक विचार ध्यानको अपनी ओर खींचनेका प्रयास करता है। क्योंकि विचार अनेक हो सकते हैं, और उनमेंसे कई एक ही समयपर उत्पन्न होते हैं, इसलिए ध्यानकेंद्र इन प्रतिस्पर्धी विचारोंके बीच विचलित होने लगता है। अब मस्तिष्कके भीतर लगभग वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसी किसी बाहरी आक्रमणके समय होती है। कारण अलग हो सकता है, लेकिन मस्तिष्ककी आंतरिक स्थिति लगभग वही रहती है। स्वाभाविक रूपसे इससे भी तनावसे जुड़े हार्मोनोंका स्राव होने लगता है, भले ही वास्तवमें लड़ने या भागनेकी कोई शारीरिक आवश्यकता न हो। लेकिन यदि ये हार्मोन लंबे समयतक स्रावित होते रहें, तो वे गंभीर समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। वे केवल आपातकालीन परिस्थितियोंकेलिए बने हैं। इसलिए दीर्घकालिक मानसिक तनाव अनेक स्वास्थ्य समस्याओंका कारण बन सकता है। तो ध्यान कैसे सहायता करता है? जब आप ध्यान करते हैं, तब आप क्या करते हैं? आप अपना ध्यान किसी एक वस्तु या गतिविधिपर केंद्रित करते हैं। और जैसे-जैसे आप अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण बनाते जाते हैं, एक महत्वपूर्ण बात घटित होती है: • मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र लगातार एक ही लक्ष्यपर लगा रहता है। • मस्तिष्कमें उत्पन्न होनेवाले विचारोंको ध्यान नहीं मिलता। यही ध्यान वे तंत्रिकीय मार्ग बनाता है, जिनकी सहायता से विचार मस्तिष्कके विभिन्न भागोंमें अपनी गतिविधि फैला पाते हैं। • जब विचारोंको ध्यान नहीं मिलता, तब आवश्यक मार्ग बन नहीं पाते। और मार्ग न होनेपर विचारोंकी गतिविधि धीरे-धीरे कम होने लगती है। • कमजोर पड़ते विचार, नए विचारोंको जन्म देनेकी क्षमता खोने लगते हैं। इस प्रकार ध्यान, धीरे-धीरे विचारोंकी संख्या कम करता है और अंततः मनको शांत कर देता है। शांत मनका अर्थ है कम तनाव। शांत मन आपको तनावके हानिकारक प्रभावोंसे बचाता है। ध्यानका अभ्यास किसी एक कार्यपर केंद्रित रहनेकी मस्तिष्ककी क्षमताको मजबूत बनाता है। बेहतर एकाग्रताका अर्थ है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें अधिक अच्छा प्रदर्शन करें। इस प्रकार ध्यान एक साथ दो कार्य करता है: यह तनावको कम करता है।यह मानसिक एकाग्रताको सुधारता है। ध्यान क्या करता है और तनावको कम करनेमें कैसे सहायता करता है — यह उसका संक्षिप्त विवरण था। लेकिन आजके समयमें हमसभी लगातार सोशल मीडियाके विकर्षणोंके संपर्कमें हैं। हममेंसे अनेक लोग लगातार यूट्यूब-शॉर्ट्स, व्हॉट्सऐपसंदेश, इंस्टाग्राम रील्स और इसी प्रकारकी चीजें देखनेके आदी हो चुके हैं। सोशल मीडियाका सीमित उपयोग आवश्यक रूपसे बुरा नहीं है। वह उपयोगी भी हो सकता है। लेकिन क्या होता है जब आप "क्लिकबेट" के गुलाम बन जाते हैं? सोशल मीडियापर अधिकांश सामग्री ज्ञान देनेसे अधिक, ध्यान आकर्षित करनेकेलिए बनाई जाती है। ऐसे सामग्री निर्माताओंकी रुचि उपयोगी जानकारी साझा करनेसे अधिक आपका ध्यान पकड़नेमें होती है। परिणामस्वरूप आपका मन लगातार तेजीसे बदलती हुई और अधिकांशतः अनावश्यक जानकारीसे भर जाता है। और उसीके 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ही लक्ष्यपर लगाते हैं। आप ध्यानको लगातार अधिक स्पष्ट और अधिक शक्तिशाली बनाते जाते हैं। परिणामस्वरूप, मन शांत होने लगता है और तनावके कारण धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। लेकिन जब आप मनको लगातार बदलती हुई और अव्यवस्थित जानकारीपर केंद्रित करनेकेलिए मजबूर करते हैं, तब इसका ठीक उल्टा होता है। • अधिक मानसिक गतिविधि, • अधिक ध्यान परिवर्तन, • अधिक तनाव, • और संभवतः गहरी एकाग्रताको पुनः प्राप्त करनेकी क्षमताका स्थायी क्षय। इसीको मैं "अन-ध्यान" कहता हूँ। इसलिए अन-ध्यान मत कीजिए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप अपने ही मस्तिष्कको गंभीर हानि पहुँचा सकते हैं। सोशल मीडियाका उपयोग सीमित मात्रा में और स्पष्ट उद्देश्यके साथ कीजिए। क्लिकबेटका शिकार मत बनिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते 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हैं? आप अपना ध्यान किसी एक वस्तु या गतिविधिपर केंद्रित करते हैं। और जैसे-जैसे आप अपने ध्यानको अधिक तीक्ष्ण बनाते जाते हैं, एक महत्वपूर्ण बात घटित होती है: • मस्तिष्कका ध्यानकेंद्र लगातार एक ही लक्ष्यपर लगा रहता है। • मस्तिष्कमें उत्पन्न होनेवाले विचारोंको ध्यान नहीं मिलता। यही ध्यान वे तंत्रिकीय मार्ग बनाता है, जिनकी सहायता से विचार मस्तिष्कके विभिन्न भागोंमें अपनी गतिविधि फैला पाते हैं। • जब विचारोंको ध्यान नहीं मिलता, तब आवश्यक मार्ग बन नहीं पाते। और मार्ग न होनेपर विचारोंकी गतिविधि धीरे-धीरे कम होने लगती है। • कमजोर पड़ते विचार, नए विचारोंको जन्म देनेकी क्षमता खोने लगते हैं। इस प्रकार ध्यान, धीरे-धीरे विचारोंकी संख्या कम करता है और अंततः मनको शांत कर देता है। शांत मनका अर्थ है कम तनाव। शांत मन आपको तनावके हानिकारक प्रभावोंसे बचाता है। ध्यानका अभ्यास किसी एक कार्यपर केंद्रित रहनेकी मस्तिष्ककी क्षमताको मजबूत बनाता है। बेहतर एकाग्रताका अर्थ है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें अधिक अच्छा प्रदर्शन करें। इस प्रकार ध्यान एक साथ दो कार्य करता है: यह तनावको कम करता है।यह मानसिक एकाग्रताको सुधारता है। ध्यान क्या करता है और तनावको कम करनेमें कैसे सहायता करता है — यह उसका संक्षिप्त विवरण था। लेकिन आजके समयमें हमसभी लगातार सोशल मीडियाके विकर्षणोंके संपर्कमें हैं। हममेंसे अनेक लोग लगातार यूट्यूब-शॉर्ट्स, व्हॉट्सऐपसंदेश, इंस्टाग्राम रील्स और इसी प्रकारकी चीजें देखनेके आदी हो चुके हैं। सोशल मीडियाका सीमित उपयोग आवश्यक रूपसे बुरा नहीं है। वह उपयोगी भी हो सकता है। लेकिन क्या होता है जब आप "क्लिकबेट" के गुलाम बन जाते हैं? सोशल मीडियापर अधिकांश सामग्री ज्ञान देनेसे अधिक, ध्यान आकर्षित करनेकेलिए बनाई जाती है। ऐसे सामग्री निर्माताओंकी रुचि उपयोगी जानकारी साझा करनेसे अधिक आपका ध्यान पकड़नेमें होती है। परिणामस्वरूप आपका मन लगातार तेजीसे बदलती हुई और अधिकांशतः अनावश्यक जानकारीसे भर जाता है। और उसीके अनुसार आपका ध्यान भी लगातार बदलता रहता है। मानव मस्तिष्क इस प्रकारकी निरंतर तीव्र गतिविधिको संभालनेकेलिए बना नहीं है। उसका परिणाम यह होता है: • मस्तिष्क जानकारीको गहराईसे समझनेके बजाय सतही रूपसे ग्रहण करने लगता है। वह वास्तवमें समझनेके बजाय केवल पैटर्न खोजने लगता है। • लगातार बदलती जानकारीके साथ तालमेल बैठानेकेलिए मस्तिष्क बहुत कम समयमें ध्यान बदलना सीख लेता है। • इससे किसी एक विषयपर लंबे समयतक ध्यान बनाएरखनेकी हमारी क्षमता कमजोर होने लगती है। • तंत्रिकीय गतिविधिकी अधिकता अंततः मनको तनावकी ओर धकेल देती है। वास्तवमें आप ध्यानके बिल्कुल विपरीत कार्य कर रहे होते हैं। किसी एक लक्ष्यपर तीव्रतासे ध्यान केंद्रित करनेके बजाय, आप लगातार विचारों और उत्तेजनाओंके तेज प्रवाहका पीछा कर रहे होते हैं। अत्यधिक मीडिया-उपयोग धीरे-धीरे मस्तिष्ककी एकाग्रताकी क्षमताको कमजोर कर देता है। और अंततः यह आपकी सामान्य दैनिक गतिविधियोंमें भी बाधा उत्पन्न कर सकता है। इन दोनों परिस्थितियोंकी सावधानीसे तुलना कीजिए। ध्यान करनेसे पहले आप अपनी एकाग्रताकी क्षमताको तीक्ष्ण बनाकर मनको तैयार करते हैं। फिर उसी एकाग्र मनको एक ही लक्ष्यपर लगाते हैं। आप ध्यानको लगातार अधिक स्पष्ट और अधिक शक्तिशाली बनाते जाते हैं। परिणामस्वरूप, मन शांत होने लगता है और तनावके कारण धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। लेकिन जब आप मनको लगातार बदलती हुई और अव्यवस्थित जानकारीपर केंद्रित करनेकेलिए मजबूर करते हैं, तब इसका ठीक उल्टा होता है। • अधिक मानसिक गतिविधि, • अधिक ध्यान परिवर्तन, • अधिक तनाव, • और संभवतः गहरी एकाग्रताको पुनः प्राप्त करनेकी क्षमताका स्थायी क्षय। इसीको मैं "अन-ध्यान" कहता हूँ। इसलिए अन-ध्यान मत कीजिए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप अपने ही मस्तिष्कको गंभीर हानि पहुँचा सकते हैं। सोशल मीडियाका उपयोग सीमित मात्रा में और स्पष्ट उद्देश्यके साथ कीजिए। क्लिकबेटका शिकार मत बनिए।&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें। &amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #Meditation, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] वो प्रश्न जो हर उत्तर से परे रहा: सृष्टि के मिथक से आत्म-साक्षात्कार तक।</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/05/hindi.html</link><category>#advaita</category><category>#God</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Meditation</category><category>#mystery</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><category>#Upanishad</category><category>#veda</category><pubDate>Sat, 9 May 2026 08:00:29 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-8231720037883776072</guid><description>&lt;!--Global site tag (gtag.js) - Google Analytics--&gt;
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&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio autoplay="" id="Hello" src="https://tinyurl.com/hi-Hello1234"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio id="Audio" src="https://www.dropbox.com/scl/fi/l3ysebirv1c447xrgzyfv/03.mp3?rlkey=jdt1q5vzfoskoasfx8138glix&amp;amp;st=tocbi4ui&amp;amp;raw=1"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;क़ुरान के 49वें अध्याय के 13वें श्लोक में अल्लाह कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "हे मानवजाति! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है, और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा है ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो — न कि एक दूसरे से घृणा करने के लिए।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह की कहानी बाइबल में भी मिलती है। वहाँ ईश्वर आदम और हव्वा को रचता है, और कहा जाता है कि पूरी मानवजाति इसी मूल युगल से आई है। हिंदू धर्म में भी जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की कथा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग हैं। सृष्टिकर्ता मूल स्रोत है और यह सृष्टि उसी से उत्पन्न हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन कथाओं में एक रोचक बात यह है कि ये मनुष्य को ही ईश्वर का सीधा वंशज दिखाती हैं। बाकी सभी जीव मानो जैसे मनुष्य की सेवा के लिए ही हों!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर यह सरल दृष्टिकोण, जो सृष्टि को एक मानवीय क्रिया मानता है, भारत के प्राचीन सांख्य दर्शन को संतुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने विकास का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके अनुसार, इस जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। बल्कि, यह जगत एक निरंतर विकास प्रक्रिया का परिणाम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि शुरुआत में 'प्रधान' नामक एक आदिम स्थिति थी। वास्तव में यह 'प्रधान' कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्त्व, रजस और तमस इन तीन गुणों की संतुलित अवस्था है। यह 'प्रधान' स्वयं पुनरुत्पत्ति और पुनर्संयोजन के माध्यम से विकसित होकर सम्पूर्ण भौतिक जगत बन गया। सांख्य ने इसे 'प्रकृति' कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन फिर एक मूल प्रश्न उठा। इतनी विविध और आनंद देने वाली प्रकृति का क्या लाभ, जब उसे अनुभव करने वाला कोई न हो? इसलिए उन्होंने 'पुरुष' नामक चेतन तत्त्व की कल्पना की, जो प्रकृति के साथ स्थित है और उसे अनुभव कर सकता है। पुरुष चेतन है, इसलिए वह इस जगत का अनुभव कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार सांख्य दर्शन में सृष्टिकर्ता की कल्पना को त्याग कर 'भोग्य' (वस्तु) और 'भोगी' (अनुभवकर्ता) के विचार लाए गए। भौतिक जगत अनुभव का विषय है, और शरीरधारी चेतन — पुरुष — उसे अनुभव करने वाले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी एक गहरा प्रश्न बाकी रह गया। यह 'प्रधान' कहाँ से आया? स्वयं अनुभव करने की क्षमता न होने पर भी, इसे इतने विविध जगत रूप में विकसित होने की प्रेरणा किसने दी? इसी तरह पुरुषों की उत्पत्ति भी एक रहस्य ही रही। यदि कोई सृष्टिकर्ता नहीं है, तो वे अस्तित्व में कैसे आए? इस प्रकार प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के वेदांत दर्शन ने इस सांख्य विचार को अस्वीकार किया। उन्होंने कहा कि एक जड़ और अचेतन 'प्रधान' अपने आप इतने विविध जगत में विकसित नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी गहन प्रक्रिया के लिए बुद्धि, एक विकसित होता संकल्प और एक उद्देश्य आवश्यक है। लेकिन जड़ 'प्रधान' में इनमें से कोई भी नहीं है। और पुरुषों की उत्पत्ति का प्रश्न भी वैसा का वैसा ही रह गया — उन्हें किसने रचा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैदिक ऋषियों ने इन प्रश्नों पर गहराई से विचार किया और चर्चा की। उन्हें विभिन्न उत्तर मिले, पर कोई भी पूर्ण संतोष नहीं दे सका। लेकिन उन्हें पता था कि एक ऐसा मार्ग है जो सभी प्रश्नों का उत्तर दे सकता है — वह मार्ग है 'ध्यान'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए वे ध्यान में लीन हुए। अपेक्षा के अनुसार उन्हें उत्तर मिल गया। लेकिन यह उत्तर तभी मिला जब उन्होंने मन की सीमाओं को पार किया। आखिर ध्यान क्या है — मन की सीमाओं को पार करना ही तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वे ध्यान से बाहर आए, तो अपने अनुभव की सत्यता को व्यक्त करने के लिए उनके पास शब्द नहीं थे। उन्होंने कहा:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "वह किसी भी इंद्रिय से न तो देखा जा सकता है, न सुना, न अनुभव किया जा सकता है। मन से भी उसे नहीं समझा जा सकता। वह हमारी जानी हुई चीज़ों से भिन्न है और अनजानी चीज़ों से भी परे है। हम उसे पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं और न ही जानते हैं कि उसे दूसरों को कैसे समझाएँ।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस जगत में हर अनुभव को दूसरों तक पहुँचाना होता है — यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह कैसे किया जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छांदोग्य उपनिषद में पिता उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह समझाते हुए कहता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "जो इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है, जो हर एक को चेतना देता है — वही आत्मा है। वही परम सत्य है।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका अर्थ है कि यह जड़ जगत और सभी चेतन जीव एक ही आत्मा के भिन्न रूप हैं। दूसरे शब्दों में, हममें से हर एक वही आत्मा स्वरूप है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहीं से उपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य उत्पन्न होता है — "तत्त्वमसि — तुम वही हो।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अंतिम घोषणा से पहले, उद्दालक ने विस्तार से समझाने का प्रयास किया कि जगत कैसे अस्तित्व में आया — दीर्घ प्रयोगों और तर्कों के माध्यम से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए इस जगत को किसी ने नहीं रचा। यह किसी ईश्वर द्वारा नहीं बनाया गया। सरल सत्य यह है कि सृष्टिकर्ता और सृष्टि में कोई भेद नहीं है। वही एक तत्त्व सब कुछ बनकर इस जगत में प्रकट हुआ है। लेकिन एक सूक्ष्म बात ध्यान देने योग्य है — इस प्रकट होने के बाद भी मूल तत्त्व जैसा का तैसा ही बना रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बात को उपनिषद का एक मंत्र प्रतिध्वनित करता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;- "वह पूर्ण है। यह जगत भी पूर्ण है। क्योंकि यह जगत उसी पूर्णता से उत्पन्न हुआ है। इस पूर्ण से यह पूर्ण जगत उत्पन्न होने के बाद भी वह मूल पूर्ण ही बना रहता है।"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार अब प्रश्न जगत की उत्पत्ति का नहीं रह जाता — बल्कि यह है कि हम वास्तव में कौन हैं!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;--------------------------------------------------------------------

&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: white; color: black;"&gt;&lt;b&gt;If this&amp;nbsp; resonated with you, I invite you to join my weekly readership. I publish a new deep-dive every Saturday, moving beyond the surface to look at the questions that truly matter. No paywalls, no "bait"—just a direct share from my mind to yours. &lt;a href="https://follow.it/let-s-think-by-dr-king-swami-satyapriya?leanpub "&gt;Click to subscribe.&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.&lt;/div&gt;</description><enclosure length="0" type="mpeg" url="https://www.dropbox.com/scl/fi/l3ysebirv1c447xrgzyfv/03.mp3?rlkey=jdt1q5vzfoskoasfx8138glix&amp;st=tocbi4ui&amp;raw=1"/><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhxtXpTztP6KoSgR1qfUYUn1piE7439qWiEurrMvaknISQh7S-LcMS8eK_fDd42lFiwcbyzwBjXeYm5i5hrRg1Gdu_fgLCQ_R0z9G_euJyL3HQKcDmeMmJUOoTBIAjm4CwL_-fxRugwjsmusz98WlV4UadIsv3LbFUqVOU3SRODH3lywaCLr4WGGRv4E58/s72-w640-h640-c/unsolved%20question2.png" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><author>drking2000-service@yahoo.com (Dr. King)</author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Quick links]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;शायद इस धरती पर अपने आप से यह पूछने वाला कि वह यहाँ कैसे आया है, केवल मनुष्य ही है। बाकी सभी जीव तो इस बात में ही व्यस्त हैं कि इस जगत में कैसे जियाजाए! अधिकांश धर्मों में ऐसी सृष्टि कथाएँ मिलती हैं जो बताती हैं कि किसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर ने इस जगत को रचा है। इन कथाओं के कई रूप हैं। मनुष्य सृष्टिकर्ता को अपने जैसा ही कल्पित करता है — अधिकार, करुणा, उदारता और पितृत्व के भाव के साथ। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); क़ुरान के 49वें अध्याय के 13वें श्लोक में अल्लाह कहता है: - "हे मानवजाति! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है, और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा है ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो — न कि एक दूसरे से घृणा करने के लिए।" - इसी तरह की कहानी बाइबल में भी मिलती है। वहाँ ईश्वर आदम और हव्वा को रचता है, और कहा जाता है कि पूरी मानवजाति इसी मूल युगल से आई है। हिंदू धर्म में भी जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की कथा है। इन सभी कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग हैं। सृष्टिकर्ता मूल स्रोत है और यह सृष्टि उसी से उत्पन्न हुई है। लेकिन इन कथाओं में एक रोचक बात यह है कि ये मनुष्य को ही ईश्वर का सीधा वंशज दिखाती हैं। बाकी सभी जीव मानो जैसे मनुष्य की सेवा के लिए ही हों! पर यह सरल दृष्टिकोण, जो सृष्टि को एक मानवीय क्रिया मानता है, भारत के प्राचीन सांख्य दर्शन को संतुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने विकास का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, इस जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। बल्कि, यह जगत एक निरंतर विकास प्रक्रिया का परिणाम है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में 'प्रधान' नामक एक आदिम स्थिति थी। वास्तव में यह 'प्रधान' कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्त्व, रजस और तमस इन तीन गुणों की संतुलित अवस्था है। यह 'प्रधान' स्वयं पुनरुत्पत्ति और पुनर्संयोजन के माध्यम से विकसित होकर सम्पूर्ण भौतिक जगत बन गया। सांख्य ने इसे 'प्रकृति' कहा। लेकिन फिर एक मूल प्रश्न उठा। इतनी विविध और आनंद देने वाली प्रकृति का क्या लाभ, जब उसे अनुभव करने वाला कोई न हो? इसलिए उन्होंने 'पुरुष' नामक चेतन तत्त्व की कल्पना की, जो प्रकृति के साथ स्थित है और उसे अनुभव कर सकता है। पुरुष चेतन है, इसलिए वह इस जगत का अनुभव कर सकता है। इस प्रकार सांख्य दर्शन में सृष्टिकर्ता की कल्पना को त्याग कर 'भोग्य' (वस्तु) और 'भोगी' (अनुभवकर्ता) के विचार लाए गए। भौतिक जगत अनुभव का विषय है, और शरीरधारी चेतन — पुरुष — उसे अनुभव करने वाले हैं। फिर भी एक गहरा प्रश्न बाकी रह गया। यह 'प्रधान' कहाँ से आया? स्वयं अनुभव करने की क्षमता न होने पर भी, इसे इतने विविध जगत रूप में विकसित होने की प्रेरणा किसने दी? इसी तरह पुरुषों की उत्पत्ति भी एक रहस्य ही रही। यदि कोई सृष्टिकर्ता नहीं है, तो वे अस्तित्व में कैसे आए? इस प्रकार प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया। भारत के वेदांत दर्शन ने इस सांख्य विचार को अस्वीकार किया। उन्होंने कहा कि एक जड़ और अचेतन 'प्रधान' अपने आप इतने विविध जगत में विकसित नहीं हो सकता। इतनी गहन प्रक्रिया के लिए बुद्धि, एक विकसित होता संकल्प और एक उद्देश्य आवश्यक है। लेकिन जड़ 'प्रधान' में इनमें से कोई भी नहीं है। और पुरुषों की उत्पत्ति का प्रश्न भी वैसा का वैसा ही रह गया — उन्हें किसने रचा? वैदिक ऋषियों ने इन प्रश्नों पर गहराई से विचार किया और चर्चा की। उन्हें विभिन्न उत्तर मिले, पर कोई भी पूर्ण संतोष नहीं दे सका। लेकिन उन्हें पता था कि एक ऐसा मार्ग है जो सभी प्रश्नों का उत्तर दे सकता है — वह मार्ग है 'ध्यान'। इसलिए वे ध्यान में लीन हुए। अपेक्षा के अनुसार उन्हें उत्तर मिल गया। लेकिन यह उत्तर तभी मिला जब उन्होंने मन की सीमाओं को पार किया। आखिर ध्यान क्या है — मन की सीमाओं को पार करना ही तो है। जब वे ध्यान से बाहर आए, तो अपने अनुभव की सत्यता को व्यक्त करने के लिए उनके पास शब्द नहीं थे। उन्होंने कहा: - "वह किसी भी इंद्रिय से न तो देखा जा सकता है, न सुना, न अनुभव किया जा सकता है। मन से भी उसे नहीं समझा जा सकता। वह हमारी जानी हुई चीज़ों से भिन्न है और अनजानी चीज़ों से भी परे है। हम उसे पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं और न ही जानते हैं कि उसे दूसरों को कैसे समझाएँ।" - लेकिन इस जगत में हर अनुभव को दूसरों तक पहुँचाना होता है — यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह कैसे किया जाए? छांदोग्य उपनिषद में पिता उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह समझाते हुए कहता है: - "जो इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है, जो हर एक को चेतना देता है — वही आत्मा है। वही परम सत्य है।" - इसका अर्थ है कि यह जड़ जगत और सभी चेतन जीव एक ही आत्मा के भिन्न रूप हैं। दूसरे शब्दों में, हममें से हर एक वही आत्मा स्वरूप है। यहीं से उपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य उत्पन्न होता है — "तत्त्वमसि — तुम वही हो।" इस अंतिम घोषणा से पहले, उद्दालक ने विस्तार से समझाने का प्रयास किया कि जगत कैसे अस्तित्व में आया — दीर्घ प्रयोगों और तर्कों के माध्यम से। इसलिए इस जगत को किसी ने नहीं रचा। यह किसी ईश्वर द्वारा नहीं बनाया गया। सरल सत्य यह है कि सृष्टिकर्ता और सृष्टि में कोई भेद नहीं है। वही एक तत्त्व सब कुछ बनकर इस जगत में प्रकट हुआ है। लेकिन एक सूक्ष्म बात ध्यान देने योग्य है — इस प्रकट होने के बाद भी मूल तत्त्व जैसा का तैसा ही बना रहता है। इसी बात को उपनिषद का एक मंत्र प्रतिध्वनित करता है: - "वह पूर्ण है। यह जगत भी पूर्ण है। क्योंकि यह जगत उसी पूर्णता से उत्पन्न हुआ है। इस पूर्ण से यह पूर्ण जगत उत्पन्न होने के बाद भी वह मूल पूर्ण ही बना रहता है।" - इस प्रकार अब प्रश्न जगत की उत्पत्ति का नहीं रह जाता — बल्कि यह है कि हम वास्तव में कौन हैं!&amp;nbsp;&amp;nbsp;-------------------------------------------------------------------- If this&amp;nbsp; resonated with you, I invite you to join my weekly readership. I publish a new deep-dive every Saturday, moving beyond the surface to look at the questions that truly matter. No paywalls, no "bait"—just a direct share from my mind to yours. Click to subscribe. &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;[Quick links]&amp;nbsp; [Borrow books]&amp;nbsp; [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;शायद इस धरती पर अपने आप से यह पूछने वाला कि वह यहाँ कैसे आया है, केवल मनुष्य ही है। बाकी सभी जीव तो इस बात में ही व्यस्त हैं कि इस जगत में कैसे जियाजाए! अधिकांश धर्मों में ऐसी सृष्टि कथाएँ मिलती हैं जो बताती हैं कि किसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर ने इस जगत को रचा है। इन कथाओं के कई रूप हैं। मनुष्य सृष्टिकर्ता को अपने जैसा ही कल्पित करता है — अधिकार, करुणा, उदारता और पितृत्व के भाव के साथ। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); क़ुरान के 49वें अध्याय के 13वें श्लोक में अल्लाह कहता है: - "हे मानवजाति! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है, और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा है ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो — न कि एक दूसरे से घृणा करने के लिए।" - इसी तरह की कहानी बाइबल में भी मिलती है। वहाँ ईश्वर आदम और हव्वा को रचता है, और कहा जाता है कि पूरी मानवजाति इसी मूल युगल से आई है। हिंदू धर्म में भी जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की कथा है। इन सभी कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग हैं। सृष्टिकर्ता मूल स्रोत है और यह सृष्टि उसी से उत्पन्न हुई है। लेकिन इन कथाओं में एक रोचक बात यह है कि ये मनुष्य को ही ईश्वर का सीधा वंशज दिखाती हैं। बाकी सभी जीव मानो जैसे मनुष्य की सेवा के लिए ही हों! पर यह सरल दृष्टिकोण, जो सृष्टि को एक मानवीय क्रिया मानता है, भारत के प्राचीन सांख्य दर्शन को संतुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने विकास का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, इस जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। बल्कि, यह जगत एक निरंतर विकास प्रक्रिया का परिणाम है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में 'प्रधान' नामक एक आदिम स्थिति थी। वास्तव में यह 'प्रधान' कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्त्व, रजस और तमस इन तीन गुणों की संतुलित अवस्था है। यह 'प्रधान' स्वयं पुनरुत्पत्ति और पुनर्संयोजन के माध्यम से विकसित होकर सम्पूर्ण भौतिक जगत बन गया। सांख्य ने इसे 'प्रकृति' कहा। लेकिन फिर एक मूल प्रश्न उठा। इतनी विविध और आनंद देने वाली प्रकृति का क्या लाभ, जब उसे अनुभव करने वाला कोई न हो? 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© Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;बस एक पीढ़ी पहले, कहानी सुनानेकी एक परंपरा थी। हर बच्चा अपनी दादीकी गोदमें बड़ा होताथा, और वह अद्भुत कहानियोंसे बच्चेको मंत्रमुग्ध कर देती थी। इन कहानियोंका बच्चेपर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ताथा। इन कहानियोंमें आमतौरपर एक नैतिक मूल्य या सीख होती थी, जिसे रोचक ढंगसे प्रस्तुत कियाजाता था। वे शक्कर चढ़ी हुई गोलियोंकी तरह थीं। भलेही भीतरकी दवा स्वादिष्ट न हो, लेकिन शक्करकी परत उसे आनंददायक बना देती थी। बिना जानेही बच्चा कड़वी दवा निगल लेताथा, और उसकी ऊपरी मिठासका आनंद लेताथा। var hello = document.getElementById("Hello"); 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&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;table align="center" cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjfebOlVylHNLyjEkeBC2UEF5DneCKz9osLyCC0HYjgRjLERRNVpNKIIoh1qW7jxP8j-FT9OCfNWMBU-6HFgnB5jwGuQC-UJ58DhPPJ9iSICMpUsAOhj_ytgHI9913t3T5_bY_kbLEa41HEkJmkBfnzM3Ktx2ZJI2RrvcTObS3KqkQXg0uog3RiIwcFcCw/s1254/kids2.png" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="1254" data-original-width="1254" height="640" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjfebOlVylHNLyjEkeBC2UEF5DneCKz9osLyCC0HYjgRjLERRNVpNKIIoh1qW7jxP8j-FT9OCfNWMBU-6HFgnB5jwGuQC-UJ58DhPPJ9iSICMpUsAOhj_ytgHI9913t3T5_bY_kbLEa41HEkJmkBfnzM3Ktx2ZJI2RrvcTObS3KqkQXg0uog3RiIwcFcCw/w640-h640/kids2.png" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;एकाग्रता। शांति। स्पष्टता।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;b&gt;"&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;b&gt;ध्यान&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt; का उपयोग आक्रामक व्यवहार को कम करने के लिए कियाजासकता है" इस विषय पर दिए गए मेरे व्याख्यान पर प्रतिक्रिया देते हुए, एक स्कूल की शिक्षिका ने मुझसे दो प्रश्न पूछे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला, वह जानना चाहती थीं कि बच्चों को ध्यान अभ्यास से किस उम्र में परिचित कराया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा, उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनके उस तरीके का समर्थन करता हूँ जिसमें वह शोरगुल वाली कक्षा को शांत करने के लिए बच्चों से "ओम" जप करवाती हैं। उनके अनुभव के अनुसार, ऐसा करने से बच्चे कम से कम कुछ समय के लिए शांत हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये दोनों प्रश्न बहुत रोचक हैं और थोड़ा विस्तार से उत्तर की अपेक्षा करते हैं। यही हम इस भाग में देखेंगे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;!-----------------------------&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio autoplay="" id="Hello" src="https://tinyurl.com/hi-Hello1234"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio id="Audio" src="https://www.dropbox.com/scl/fi/86wwmn9y6b9s8wak2z54s/03.mp3?rlkey=9d6n5p3lvnt45g9alk3qktij4&amp;amp;st=s87j5zom&amp;amp;raw=1"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;audio id="ThankYou" src="https://tinyurl.com/hi-Thanks1234"&gt; &lt;/audio&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;सबसे पहले — बच्चे को किस उम्र में ध्यान सिखाना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आजकल के कई माता-पिता की तरह बच्चे को इंटरनेट और मोबाइल के शोर के संपर्क में ज़्यादा नहीं रखा गया हो, तो बच्चे का मस्तिष्क किसी भी ध्यान अभ्यास को ग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होता है। वह छोटा मस्तिष्क मुलायम मिट्टी की तरह होता है — बहुत आसानी से आकार लेसकता है। बाहरी विचलन, जो उसे भटकाते हैं, हमारे मुकाबले बहुत कम होते हैं। इसलिए यही ध्यान शुरू करने का सही समय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, दूसरे प्रश्न में दिखने वाली तरह ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। अगर सही ध्यान अभ्यास पहले से विकसित किया गया होता, तो ऐसी स्थितियाँ शायद ही उत्पन्न होतीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर, ध्यान सिखाने की सही उम्र क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके नाम से लगता है कि आप भारतीय हैं। अगर ऐसा है, तो इस विषय में गहरा अध्ययन करने वाले अपने पूर्वजों पर आपको गर्व होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन भारत में, जब बच्चे स्कूल में प्रवेश करते थे, तब उन्हें गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता था। यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। यह एक छोटा मंत्र है जिसे एक निश्चित विधि से, दिन में दो बार, एक निश्चित अवधि तक जपना होता है। इसका उद्देश्य मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को बढ़ाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना ज़रूरी नहीं कि इससे बच्चों को पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। आगे चलकर जीवन में भी एक तेज़ दिमाग बहुत काम आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, इस मंत्र को जीवन भर जपने की सलाह दी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन दिनों अन्य मंत्रों का जप करने की अनुमति नहीं होती, उन दिनों भी इसका जप नहीं छोड़ना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी मंत्र का नियमित जप अपने आप में एक प्रकार का ध्यान बनजाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भले ही ग्रहण क्षमता को तेज करना हो, लेकिन यह मन को शांत करता है और सोच में स्पष्टता लाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हजारों सालों से यह परंपरा चली आ रही है, फिर भी कई गलत धारणाओं के कारण यह प्राचीन ध्यान पद्धति धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है। स्पष्टता के लिए कुछ प्रश्नों को देखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 1: इस अभ्यास को किस उम्र में शुरू करना चाहिए?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरागत रूप से, बच्चों को स्कूल में दाखिला देने की उम्र को गर्भाष्टम कहा जाता है — यानी माँ के गर्भ में बिताए समय सहित आठ वर्ष। लगभग देखें तो यह जन्म के बाद करीब सात साल होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अगर आप बच्चे को एक महान विद्वान बनाना चाहते हैं, तो पाँच साल की उम्र में ही स्कूल में दाखिला कराया जा सकता है। उसी उम्र से ध्यान अभ्यास भी शुरूकिया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 2: क्या यह ध्यान केवल कुछ जातियों तक सीमित है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के समय में यह ब्राह्मणों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन परंपरागत रूप से केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि अन्य वर्णों के लोगों के लिए भी शिक्षा अनिवार्य थी। स्वाभाविक रूप से, सभी इस ध्यान अभ्यास के योग्य थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 3: क्या यह अभ्यास केवल किसी एक लिंग के लिए है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के समय में यह केवल लड़कों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। यह बाद की एक विकृति है। प्राचीन भारत में लड़के और लड़कियाँ दोनों ही स्कूल जाने के पात्र थे। इसलिए दोनों से इस ध्यान अभ्यास की अपेक्षा की जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के कारण यह परंपरा बदल गई। मूल शास्त्र लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित नहीं करते। कुछ स्थानों पर यह कहा गया है कि लड़कियों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी मुख्य भूमिका परिवार का संचालन है। यह कोई कठोर नियम नहीं है — यह केवल भूमिकाओं का विभाजन है। आज की परिस्थिति में इसे कठोरता से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 4: क्या गायत्री मंत्र का जप महिलाओं की प्रजनन प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे बड़ा मज़ाक कुछ नहीं हो सकता! अगर कोई ऐसा कहता है, तो उससे प्रमाण माँगिए — चाहे वह शास्त्रीय हो, तर्कसंगत हो या प्रायोगिक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे कोई प्रमाण नहीं देपाएँगे, क्योंकि यह एक निराधार गलत धारणा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 5: क्या गैर-हिंदू लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं? क्या इससे उनके धर्म का उल्लंघन होगा?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी इस मंत्र का अर्थ समझता है, उसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह किसी भी धर्म के ईश्वर की अवधारणा पर लागू हो सकता है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो केवल एक ही धर्म तक सीमित हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने इन विषयों पर अपने "&lt;a href="https://books2read.com/Mantra" target="_blank"&gt;A Mantra to enhance your mental capabilities&lt;/a&gt;" पुस्तक में और विस्तार से चर्चा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, सभी बच्चों को यह मंत्र जप करना सिखाया जा सकता है। लेकिन प्रभावी होने के लिए, इसे नियमित रूप से, बिना चूके, एक निश्चित अवधि तक करना आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मंत्र कैसे काम करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मंत्र की ध्वनि संरचना जप करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में ध्यान प्रणाली को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। लेकिन यह केवल आवश्यक स्तर की एकाग्रता देती है — अत्यधिक नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह संतुलित एकाग्रता वही है जो अलग-अलग विषय पढ़ने वाले बच्चे को चाहिए होती है। आगे जीवन में भी विभिन्न कार्यों को संभालने में यह मदद करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अत्यधिक एकाग्रता व्यक्ति को एक ही विषय में पूरी तरह डुबो सकती है, जिससे एक साथ कई काम करना कठिन हो जाता है। ज़रूरी है संतुलित एकाग्रता — पूर्ण तल्लीनता नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या "ओम" जप करने से भी एकाग्रता नहीं बढ़ती? तो फिर गायत्री मंत्र के बजाय "ओम" क्यों न जपें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओम" का लंबे समय तक जप करने से अत्यधिक एकाग्रता हो सकती है। कुछ गुरुओं द्वारा प्रचारित "ओम" आधारित ध्यान विधियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक एकाग्रता कुछ दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरागत रूप से, "ओम" ध्यान केवल उन्हीं लोगों के लिए था जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था और पूरी तरह आध्यात्मिक साधना में लगे थे — यानी सन्यासी। उनका एकमात्र लक्ष्य संसार के बंधनों से मुक्ति पाना होता है। ऐसे लोगों के लिए पूर्ण एकाग्रता बहुत सहायक होती है, क्योंकि यह उन्हें जल्दी ही पूरी तरह शांत मन की अवस्था में ले जाती है — जिसे पतंजलि "निरुद्ध चित्त" कहते हैं। यही अंततः उन्हें उनके परम लक्ष्य तक पहुँचाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक सामान्य जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए यही "निरुद्ध चित्त" अवस्था सहायक होने के बजाय बाधा बन सकती है, क्योंकि यह दैनिक कार्यों में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देती। फिर से कहूँ — एकाग्रता चाहिए, लेकिन पूर्ण तल्लीनता नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, बच्चों को "ओम" ध्यान सिखाना सही विकल्प नहीं है। और एक बार फिर — ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में उपयोग न करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आपकी कक्षा में बच्चे शोर कर रहे हैं, तो उनका ध्यान किसी रचनात्मक गतिविधि की ओर मोड़ें। इससे वे शांत भी होंगे और उनकी क्षमता भी विकसित होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चों को ध्यान सिखाइए — लेकिन "ओम" पर आधारित नहीं। "ओम" को एक विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align="center" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;
&lt;div align="justify" class="western" lang="en-US" style="line-height: 120%;"&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: 120%; margin-bottom: 7pt;"&gt;
&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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अगर आजकल के कई माता-पिता की तरह बच्चे को इंटरनेट और मोबाइल के शोर के संपर्क में ज़्यादा नहीं रखा गया हो, तो बच्चे का मस्तिष्क किसी भी ध्यान अभ्यास को ग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होता है। वह छोटा मस्तिष्क मुलायम मिट्टी की तरह होता है — बहुत आसानी से आकार लेसकता है। बाहरी विचलन, जो उसे भटकाते हैं, हमारे मुकाबले बहुत कम होते हैं। इसलिए यही ध्यान शुरू करने का सही समय है। लेकिन, दूसरे प्रश्न में दिखने वाली तरह ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। अगर सही ध्यान अभ्यास पहले से विकसित किया गया होता, तो ऐसी स्थितियाँ शायद ही उत्पन्न होतीं। तो फिर, ध्यान सिखाने की सही उम्र क्या है? आपके नाम से लगता है कि आप भारतीय हैं। अगर ऐसा है, तो इस विषय में गहरा अध्ययन करने वाले अपने पूर्वजों पर आपको गर्व होना चाहिए। प्राचीन भारत में, जब बच्चे स्कूल में प्रवेश करते थे, तब उन्हें गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता था। यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। यह एक छोटा मंत्र है जिसे एक निश्चित विधि से, दिन में दो बार, एक निश्चित अवधि तक जपना होता है। इसका उद्देश्य मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को बढ़ाना है। यह कहना ज़रूरी नहीं कि इससे बच्चों को पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। आगे चलकर जीवन में भी एक तेज़ दिमाग बहुत काम आता है। इसलिए, इस मंत्र को जीवन भर जपने की सलाह दी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन दिनों अन्य मंत्रों का जप करने की अनुमति नहीं होती, उन दिनों भी इसका जप नहीं छोड़ना चाहिए। किसी भी मंत्र का नियमित जप अपने आप में एक प्रकार का ध्यान बनजाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भले ही ग्रहण क्षमता को तेज करना हो, लेकिन यह मन को शांत करता है और सोच में स्पष्टता लाता है। हजारों सालों से यह परंपरा चली आ रही है, फिर भी कई गलत धारणाओं के कारण यह प्राचीन ध्यान पद्धति धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है। स्पष्टता के लिए कुछ प्रश्नों को देखते हैं। प्रश्न 1: इस अभ्यास को किस उम्र में शुरू करना चाहिए? परंपरागत रूप से, बच्चों को स्कूल में दाखिला देने की उम्र को गर्भाष्टम कहा जाता है — यानी माँ के गर्भ में बिताए समय सहित आठ वर्ष। लगभग देखें तो यह जन्म के बाद करीब सात साल होता है। लेकिन अगर आप बच्चे को एक महान विद्वान बनाना चाहते हैं, तो पाँच साल की उम्र में ही स्कूल में दाखिला कराया जा सकता है। उसी उम्र से ध्यान अभ्यास भी शुरूकिया जा सकता है। प्रश्न 2: क्या यह ध्यान केवल कुछ जातियों तक सीमित है? आज के समय में यह ब्राह्मणों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन परंपरागत रूप से केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि अन्य वर्णों के लोगों के लिए भी शिक्षा अनिवार्य थी। स्वाभाविक रूप से, सभी इस ध्यान अभ्यास के योग्य थे। प्रश्न 3: क्या यह अभ्यास केवल किसी एक लिंग के लिए है? आज के समय में यह केवल लड़कों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। यह बाद की एक विकृति है। प्राचीन भारत में लड़के और लड़कियाँ दोनों ही स्कूल जाने के पात्र थे। इसलिए दोनों से इस ध्यान अभ्यास की अपेक्षा की जाती थी। समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के कारण यह परंपरा बदल गई। मूल शास्त्र लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित नहीं करते। कुछ स्थानों पर यह कहा गया है कि लड़कियों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी मुख्य भूमिका परिवार का संचालन है। यह कोई कठोर नियम नहीं है — यह केवल भूमिकाओं का विभाजन है। आज की परिस्थिति में इसे कठोरता से पालन करने की आवश्यकता नहीं है। प्रश्न 4: क्या गायत्री मंत्र का जप महिलाओं की प्रजनन प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है? इससे बड़ा मज़ाक कुछ नहीं हो सकता! अगर कोई ऐसा कहता है, तो उससे प्रमाण माँगिए — चाहे वह शास्त्रीय हो, तर्कसंगत हो या प्रायोगिक। वे कोई प्रमाण नहीं देपाएँगे, क्योंकि यह एक निराधार गलत धारणा है। प्रश्न 5: क्या गैर-हिंदू लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं? क्या इससे उनके धर्म का उल्लंघन होगा? जो भी इस मंत्र का अर्थ समझता है, उसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह किसी भी धर्म के ईश्वर की अवधारणा पर लागू हो सकता है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो केवल एक ही धर्म तक सीमित हो। मैंने इन विषयों पर अपने "A Mantra to enhance your mental capabilities" पुस्तक में और विस्तार से चर्चा की है। इसलिए, सभी बच्चों को यह मंत्र जप करना सिखाया जा सकता है। लेकिन प्रभावी होने के लिए, इसे नियमित रूप से, बिना चूके, एक निश्चित अवधि तक करना आवश्यक है। यह मंत्र कैसे काम करता है? इस मंत्र की ध्वनि संरचना जप करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में ध्यान प्रणाली को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। लेकिन यह केवल आवश्यक स्तर की एकाग्रता देती है — अत्यधिक नहीं। यह संतुलित एकाग्रता वही है जो अलग-अलग विषय पढ़ने वाले बच्चे को चाहिए होती है। आगे जीवन में भी विभिन्न कार्यों को संभालने में यह मदद करती है। लेकिन अत्यधिक एकाग्रता व्यक्ति को एक ही विषय में पूरी तरह डुबो सकती है, जिससे एक साथ कई काम करना कठिन हो जाता है। ज़रूरी है संतुलित एकाग्रता — पूर्ण तल्लीनता नहीं। क्या "ओम" जप करने से भी एकाग्रता नहीं बढ़ती? तो फिर गायत्री मंत्र के बजाय "ओम" क्यों न जपें? "ओम" का लंबे समय तक जप करने से अत्यधिक एकाग्रता हो सकती है। कुछ गुरुओं द्वारा प्रचारित "ओम" आधारित ध्यान विधियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक एकाग्रता कुछ दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती है। परंपरागत रूप से, "ओम" ध्यान केवल उन्हीं लोगों के लिए था जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था और पूरी तरह आध्यात्मिक साधना में लगे थे — यानी सन्यासी। उनका एकमात्र लक्ष्य संसार के बंधनों से मुक्ति पाना होता है। ऐसे लोगों के लिए पूर्ण एकाग्रता बहुत सहायक होती है, क्योंकि यह उन्हें जल्दी ही पूरी तरह शांत मन की अवस्था में ले जाती है — जिसे पतंजलि "निरुद्ध चित्त" कहते हैं। यही अंततः उन्हें उनके परम लक्ष्य तक पहुँचाती है। लेकिन एक सामान्य जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए यही "निरुद्ध चित्त" अवस्था सहायक होने के बजाय बाधा बन सकती है, क्योंकि यह दैनिक कार्यों में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देती। फिर से कहूँ — एकाग्रता चाहिए, लेकिन पूर्ण तल्लीनता नहीं। इसलिए, बच्चों को "ओम" ध्यान सिखाना सही विकल्प नहीं है। और एक बार फिर — ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में उपयोग न करें। अगर आपकी कक्षा में बच्चे शोर कर रहे हैं, तो उनका ध्यान किसी रचनात्मक गतिविधि की ओर मोड़ें। इससे वे शांत भी होंगे और उनकी क्षमता भी विकसित होगी। बच्चों को ध्यान सिखाइए — लेकिन "ओम" पर आधारित नहीं। "ओम" को एक विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;एकाग्रता। शांति। स्पष्टता।&amp;nbsp;&amp;nbsp;"ध्यान का उपयोग आक्रामक व्यवहार को कम करने के लिए कियाजासकता है" इस विषय पर दिए गए मेरे व्याख्यान पर प्रतिक्रिया देते हुए, एक स्कूल की शिक्षिका ने मुझसे दो प्रश्न पूछे। पहला, वह जानना चाहती थीं कि बच्चों को ध्यान अभ्यास से किस उम्र में परिचित कराया जा सकता है। दूसरा, उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनके उस तरीके का समर्थन करता हूँ जिसमें वह शोरगुल वाली कक्षा को शांत करने के लिए बच्चों से "ओम" जप करवाती हैं। उनके अनुभव के अनुसार, ऐसा करने से बच्चे कम से कम कुछ समय के लिए शांत हो जाते हैं। ये दोनों प्रश्न बहुत रोचक हैं और थोड़ा विस्तार से उत्तर की अपेक्षा करते हैं। यही हम इस भाग में देखेंगे। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); सबसे पहले — बच्चे को किस उम्र में ध्यान सिखाना चाहिए? अगर आजकल के कई माता-पिता की तरह बच्चे को इंटरनेट और मोबाइल के शोर के संपर्क में ज़्यादा नहीं रखा गया हो, तो बच्चे का मस्तिष्क किसी भी ध्यान अभ्यास को ग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होता है। वह छोटा मस्तिष्क मुलायम मिट्टी की तरह होता है — बहुत आसानी से आकार लेसकता है। बाहरी विचलन, जो उसे भटकाते हैं, हमारे मुकाबले बहुत कम होते हैं। इसलिए यही ध्यान शुरू करने का सही समय है। लेकिन, दूसरे प्रश्न में दिखने वाली तरह ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। अगर सही ध्यान अभ्यास पहले से विकसित किया गया होता, तो ऐसी स्थितियाँ शायद ही उत्पन्न होतीं। तो फिर, ध्यान सिखाने की सही उम्र क्या है? आपके नाम से लगता है कि आप भारतीय हैं। अगर ऐसा है, तो इस विषय में गहरा अध्ययन करने वाले अपने पूर्वजों पर आपको गर्व होना चाहिए। प्राचीन भारत में, जब बच्चे स्कूल में प्रवेश करते थे, तब उन्हें गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता था। यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। यह एक छोटा मंत्र है जिसे एक निश्चित विधि से, दिन में दो बार, एक निश्चित अवधि तक जपना होता है। इसका उद्देश्य मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को बढ़ाना है। यह कहना ज़रूरी नहीं कि इससे बच्चों को पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। आगे चलकर जीवन में भी एक तेज़ दिमाग बहुत काम आता है। इसलिए, इस मंत्र को जीवन भर जपने की सलाह दी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन दिनों अन्य मंत्रों का जप करने की अनुमति नहीं होती, उन दिनों भी इसका जप नहीं छोड़ना चाहिए। किसी भी मंत्र का नियमित जप अपने आप में एक प्रकार का ध्यान बनजाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भले ही ग्रहण क्षमता को तेज करना हो, लेकिन यह मन को शांत करता है और सोच में स्पष्टता लाता है। हजारों सालों से यह परंपरा चली आ रही है, फिर भी कई गलत धारणाओं के कारण यह प्राचीन ध्यान पद्धति धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है। स्पष्टता के लिए कुछ प्रश्नों को देखते हैं। प्रश्न 1: इस अभ्यास को किस उम्र में शुरू करना चाहिए? परंपरागत रूप से, बच्चों को स्कूल में दाखिला देने की उम्र को गर्भाष्टम कहा जाता है — यानी माँ के गर्भ में बिताए समय सहित आठ वर्ष। लगभग देखें तो यह जन्म के बाद करीब सात साल होता है। लेकिन अगर आप बच्चे को एक महान विद्वान बनाना चाहते हैं, तो पाँच साल की उम्र में ही स्कूल में दाखिला कराया जा सकता है। उसी उम्र से ध्यान अभ्यास भी शुरूकिया जा सकता है। प्रश्न 2: क्या यह ध्यान केवल कुछ जातियों तक सीमित है? आज के समय में यह ब्राह्मणों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन परंपरागत रूप से केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि अन्य वर्णों के लोगों के लिए भी शिक्षा अनिवार्य थी। स्वाभाविक रूप से, सभी इस ध्यान अभ्यास के योग्य थे। प्रश्न 3: क्या यह अभ्यास केवल किसी एक लिंग के लिए है? आज के समय में यह केवल लड़कों तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। यह बाद की एक विकृति है। प्राचीन भारत में लड़के और लड़कियाँ दोनों ही स्कूल जाने के पात्र थे। इसलिए दोनों से इस ध्यान अभ्यास की अपेक्षा की जाती थी। समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के कारण यह परंपरा बदल गई। मूल शास्त्र लड़कियों की शिक्षा को प्रतिबंधित नहीं करते। कुछ स्थानों पर यह कहा गया है कि लड़कियों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी मुख्य भूमिका परिवार का संचालन है। यह कोई कठोर नियम नहीं है — यह केवल भूमिकाओं का विभाजन है। आज की परिस्थिति में इसे कठोरता से पालन करने की आवश्यकता नहीं है। प्रश्न 4: क्या गायत्री मंत्र का जप महिलाओं की प्रजनन प्रणाली को नुकसान पहुँचाता है? इससे बड़ा मज़ाक कुछ नहीं हो सकता! अगर कोई ऐसा कहता है, तो उससे प्रमाण माँगिए — चाहे वह शास्त्रीय हो, तर्कसंगत हो या प्रायोगिक। वे कोई प्रमाण नहीं देपाएँगे, क्योंकि यह एक निराधार गलत धारणा है। प्रश्न 5: क्या गैर-हिंदू लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं? क्या इससे उनके धर्म का उल्लंघन होगा? जो भी इस मंत्र का अर्थ समझता है, उसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह किसी भी धर्म के ईश्वर की अवधारणा पर लागू हो सकता है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो केवल एक ही धर्म तक सीमित हो। मैंने इन विषयों पर अपने "A Mantra to enhance your mental capabilities" पुस्तक में और विस्तार से चर्चा की है। इसलिए, सभी बच्चों को यह मंत्र जप करना सिखाया जा सकता है। लेकिन प्रभावी होने के लिए, इसे नियमित रूप से, बिना चूके, एक निश्चित अवधि तक करना आवश्यक है। यह मंत्र कैसे काम करता है? इस मंत्र की ध्वनि संरचना जप करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में ध्यान प्रणाली को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। लेकिन यह केवल आवश्यक स्तर की एकाग्रता देती है — अत्यधिक नहीं। यह संतुलित एकाग्रता वही है जो अलग-अलग विषय पढ़ने वाले बच्चे को चाहिए होती है। आगे जीवन में भी विभिन्न कार्यों को संभालने में यह मदद करती है। लेकिन अत्यधिक एकाग्रता व्यक्ति को एक ही विषय में पूरी तरह डुबो सकती है, जिससे एक साथ कई काम करना कठिन हो जाता है। ज़रूरी है संतुलित एकाग्रता — पूर्ण तल्लीनता नहीं। क्या "ओम" जप करने से भी एकाग्रता नहीं बढ़ती? तो फिर गायत्री मंत्र के बजाय "ओम" क्यों न जपें? "ओम" का लंबे समय तक जप करने से अत्यधिक एकाग्रता हो सकती है। कुछ गुरुओं द्वारा प्रचारित "ओम" आधारित ध्यान विधियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक एकाग्रता कुछ दुष्प्रभाव भी पैदा कर सकती है। परंपरागत रूप से, "ओम" ध्यान केवल उन्हीं लोगों के लिए था जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था और पूरी तरह आध्यात्मिक साधना में लगे थे — यानी सन्यासी। उनका एकमात्र लक्ष्य संसार के बंधनों से मुक्ति पाना होता है। ऐसे लोगों के लिए पूर्ण एकाग्रता बहुत सहायक होती है, क्योंकि यह उन्हें जल्दी ही पूरी तरह शांत मन की अवस्था में ले जाती है — जिसे पतंजलि "निरुद्ध चित्त" कहते हैं। यही अंततः उन्हें उनके परम लक्ष्य तक पहुँचाती है। लेकिन एक सामान्य जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए यही "निरुद्ध चित्त" अवस्था सहायक होने के बजाय बाधा बन सकती है, क्योंकि यह दैनिक कार्यों में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देती। फिर से कहूँ — एकाग्रता चाहिए, लेकिन पूर्ण तल्लीनता नहीं। इसलिए, बच्चों को "ओम" ध्यान सिखाना सही विकल्प नहीं है। और एक बार फिर — ध्यान को अस्थायी समस्या के समाधान के रूप में उपयोग न करें। अगर आपकी कक्षा में बच्चे शोर कर रहे हैं, तो उनका ध्यान किसी रचनात्मक गतिविधि की ओर मोड़ें। इससे वे शांत भी होंगे और उनकी क्षमता भी विकसित होगी। बच्चों को ध्यान सिखाइए — लेकिन "ओम" पर आधारित नहीं। "ओम" को एक विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखें। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #Meditation, #podcast, #ThoughtForTheDay, #Yoga</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] ध्यान संभवतः एक अधिक शांतिपूर्ण दुनिया की ओर लेजासकता है</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/04/hindi_098830070.html</link><category>#Hindi</category><category>#Meditation</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 18 Apr 2026 07:52:40 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-1203787381333272367</guid><description>

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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;Poonjaji अपने कम बोलने केलिए जाने जातेथे, मानो वे कुछ सिखाने से लगभग इंकार ही करते हों। तो फिर इतनी गहरी अनुभूति कैसे हुई,—बिना किसी शारीरिक या मौखिक माध्यम के?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही बात Sam को परेशान कररही थी। उनके तर्कसंगत मन के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या मन बिना किसी सीधे माध्यम के संवाद करसकता है? और क्या ऐसा संवाद इतना गहरा, इतना परिवर्तित करने वाला, और फिर भी इतना स्पष्ट हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Sam केलिए यह एक ऐसा रहस्य बना रहा जिसे वे अपने पूरे न्यूरोसाइंस ज्ञान के बावजूद कभी सुलझा नहीं पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हाँ, ऐसा लगता है कि कुछ अवस्थाओं में मन में ऐसी क्षमताएँ होती हैं। यह बिना शब्दों के भी संवाद करसकता है—सिर्फ मनुष्यों के साथ ही नहीं, बल्कि जानवरों और अन्य जीवों के साथ भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कुत्तों को, और यहाँ तक कि ज़हरीले साँपों को भी, एक विशेष मानसिक अवस्था में पास जाने पर पूरी तरह शांत होते देखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह सच है, तो क्या केवल मानसिक शक्ति से किसी आक्रामक व्यक्ति को पूरी तरह बदलना संभव है? ऐसा होसके तो सभी संघर्ष और युद्ध समाप्त हो जाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1970 और 80 के दशक में, प्रसिद्ध भारतीय गुरु Mahesh Yogi-ने ऐसा ही दावा किया था। उन्होंने कहा कि वे ध्यान करने वालों के एक समूह को युद्धक्षेत्र में भेजकर, भीषण युद्धों को रोक सकते हैं। वे लोग चुपचाप ध्यान करेंगे—और विरोधी अपनी आक्रामकता छोड़देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश यह सच होता। इससे बहुत सी जानें और पीड़ा बच सकती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या कोई मन,—चाहे वह किसी भी अवस्था में हो—दूसरे मन को इस तरह प्रभावित करसकता है कि वह अपनी आक्रामक प्रवृत्तियाँ छोड़दे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास को देखें तो, नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है।&lt;br /&gt;&lt;br 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Sam केलिए यह एक ऐसा रहस्य बना रहा जिसे वे अपने पूरे न्यूरोसाइंस ज्ञान के बावजूद कभी सुलझा नहीं पाए। लेकिन हाँ, ऐसा लगता है कि कुछ अवस्थाओं में मन में ऐसी क्षमताएँ होती हैं। यह बिना शब्दों के भी संवाद करसकता है—सिर्फ मनुष्यों के साथ ही नहीं, बल्कि जानवरों और अन्य जीवों के साथ भी। मैंने कुत्तों को, और यहाँ तक कि ज़हरीले साँपों को भी, एक विशेष मानसिक अवस्था में पास जाने पर पूरी तरह शांत होते देखा है। अगर यह सच है, तो क्या केवल मानसिक शक्ति से किसी आक्रामक व्यक्ति को पूरी तरह बदलना संभव है? ऐसा होसके तो सभी संघर्ष और युद्ध समाप्त हो जाएँ। 1970 और 80 के दशक में, प्रसिद्ध भारतीय गुरु Mahesh Yogi-ने ऐसा ही दावा किया था। उन्होंने कहा कि वे ध्यान करने वालों के एक समूह को युद्धक्षेत्र में भेजकर, भीषण युद्धों को रोक सकते हैं। वे लोग चुपचाप ध्यान करेंगे—और विरोधी अपनी आक्रामकता छोड़देगा। काश यह सच होता। इससे बहुत सी जानें और पीड़ा बच सकती थी। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या कोई मन,—चाहे वह किसी भी अवस्था में हो—दूसरे मन को इस तरह प्रभावित करसकता है कि वह अपनी आक्रामक प्रवृत्तियाँ छोड़दे? Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया। व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है? इतिहास को देखें तो, नहीं। Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके। इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके। जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए। इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है। यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है। इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है। ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है। इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में। हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा। लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए? आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है। • कोई तेज़ श्वास लेनेकी सलाह देता है। • कोई श्वास को शांतहोकर देखने की बात करता है। • कोई नाक की नोक या भौंहों के बीच देखने को कहता है। • कोई रीढ़ में ऊपर-नीचे चलने वाली 'ऊर्जा' पर ध्यान लगानेको कहता है। • कोई, एक अक्षर के ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करनेको कहता है। • कोई मंत्र जपनेको कहता है। जितने गुरु, उतनी विधियाँ। कौन-सी सबसे अच्छी है? यह पूछना, जैसा है कि, खाने का सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है? एक जापानी या चीनी व्यक्ति, चॉपस्टिक्स का उपयोग करता है। एक यूरोपीय, चाकू और कांटे का उपयोग करता है। एक भारतीय, अपने हाथोंसे खाना पसंद करता है। • कोई भी तरीका श्रेष्ठ नहीं है, और कोई भी निम्न नहीं है। • जब तक उद्देश्य भूख मिटाना है, कोई भी तरीका ठीक है। • जो आपकेलिए सुविधाजनक हो, वही आपकेलिए सही है। • बस, कोई आपसे उल्टाखड़ेहोकर खाने को न कहे, तो सब ठीक है। इसी तरह, जब तक ध्यान, आपको एक शांत मन की ओर ले जाता है, वह ठीक है। जोभी आपको किसी भ्रमात्मक रास्ते पर लेजाए, उससे बचना चाहिए। क्या इन में से कोई विधि, आपको उस सार्वभौमिक मन की अवस्था तक लेजाती है, जिसके बारे में मैंने कुछ पिछले एपिसोड में बात की थी? या ऐसे मन तक, जो दूसरोंको प्रभावित कर सके? यह एक अलग विषय है। शायद, मैं इस पर किसीऔर समय बात करूँगा। लेकिन कोई भी ध्यान अभ्यास, निश्चित रूप से संघर्ष की संभावना को कम करेगा,—और यही हमारी मुख्य चर्चा का विषय है। तो आइए, याद रखें— • विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास, • धर्मों की सही समझ, • अनियंत्रित इच्छाओं पर संयम, • और नियमित ध्यान अभ्यास। ये त्वरित समाधान नहीं हैं। ये रातों-रात संघर्ष खत्म नहीं करेंगे। लेकिन ये एक अलग तरह का मन बना सकते हैं,— ऐसा मन, जो रुकता है, सोचता है, और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया नहीं करता। और, अगर ऐसे मन अधिक सामान्य हो जाएँ, तो वे जो दुनिया बनाएँगे, वह भी अलग होगी। कम से कम, हम यह संभावना अपने बच्चोंको देसकते हैं.— उनके भविष्य केलिए, और उस दुनिया केलिए, जिसे वे विरासत में पाएँगे। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;अपने एक संवाद में, Sam Harris बताते हैं कि जब उनकी मुलाकात भारतीय गुरु Poonjaji से हुई, तो उन्हें एक बहुत ही रोचक अनुभव हुआ। वे कहते हैं कि यह अनुभव उन कई ध्यान शिविरों से भी कहीं गहरा था, जिनमें उन्होंने महीनों तक भाग लिया था। वैसे, Sam Harris एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट हैं जो बाद में ध्यान शिक्षक बन गए। उन्होंने भारत में कई वर्षों तक ध्यान का अध्ययन किया। वे एक अत्यंत तर्कशील व्यक्ति हैं, और उनकी मुख्य रुचि यह समझने में थी कि ध्यान कैसे MDMA जैसी नशीलीदवाओं से मिलनेवाले अनुभवों जैसा प्रभाव पैदा करसकता है। Poonjaji की शिक्षाओं ने Sam को ज्यादा प्रभावित नहीं किया। लेकिन एक और बात ने उन्हें उलझन में डाल दिया। केवल Poonjaji की उपस्थिति, वह भी थोड़े समय केलिए, उन्हें इतनी गहरी अनुभूतितक कैसे ले गई? 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Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया। व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है? इतिहास को देखें तो, नहीं। Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके। इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके। जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए। इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है। यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है। इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है। ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है। इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में। हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा। लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए? आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है। • कोई तेज़ श्वास लेनेकी सलाह देता है। • कोई श्वास को शांतहोकर देखने की बात करता है। • कोई नाक की नोक या भौंहों के बीच देखने को कहता है। • कोई रीढ़ में ऊपर-नीचे चलने वाली 'ऊर्जा' पर ध्यान लगानेको कहता है। • कोई, एक अक्षर के ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करनेको कहता है। • कोई मंत्र जपनेको कहता है। जितने गुरु, उतनी विधियाँ। कौन-सी सबसे अच्छी है? यह पूछना, जैसा है कि, खाने का सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है? एक जापानी या चीनी व्यक्ति, चॉपस्टिक्स का उपयोग करता है। एक यूरोपीय, चाकू और कांटे का उपयोग करता है। एक भारतीय, अपने हाथोंसे खाना पसंद करता है। • कोई भी तरीका श्रेष्ठ नहीं है, और कोई भी निम्न नहीं है। • जब तक उद्देश्य भूख मिटाना है, कोई भी तरीका ठीक है। • जो आपकेलिए सुविधाजनक हो, वही आपकेलिए सही है। • बस, कोई आपसे उल्टाखड़ेहोकर खाने को न कहे, तो सब ठीक है। इसी तरह, जब तक ध्यान, आपको एक शांत मन की ओर ले जाता है, वह ठीक है। जोभी आपको किसी भ्रमात्मक रास्ते पर लेजाए, उससे बचना चाहिए। क्या इन में से कोई विधि, आपको उस सार्वभौमिक मन की अवस्था तक लेजाती है, जिसके बारे में मैंने कुछ पिछले एपिसोड में बात की थी? या ऐसे मन तक, जो दूसरोंको प्रभावित कर सके? यह एक अलग विषय है। शायद, मैं इस पर किसीऔर समय बात करूँगा। लेकिन कोई भी ध्यान अभ्यास, निश्चित रूप से संघर्ष की संभावना को कम करेगा,—और यही हमारी मुख्य चर्चा का विषय है। तो आइए, याद रखें— • विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास, • धर्मों की सही समझ, • अनियंत्रित इच्छाओं पर संयम, • और नियमित ध्यान अभ्यास। ये त्वरित समाधान नहीं हैं। ये रातों-रात संघर्ष खत्म नहीं करेंगे। लेकिन ये एक अलग तरह का मन बना सकते हैं,— ऐसा मन, जो रुकता है, सोचता है, और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया नहीं करता। और, अगर ऐसे मन अधिक सामान्य हो जाएँ, तो वे जो दुनिया बनाएँगे, वह भी अलग होगी। कम से कम, हम यह संभावना अपने बच्चोंको देसकते हैं.— उनके भविष्य केलिए, और उस दुनिया केलिए, जिसे वे विरासत में पाएँगे। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#Hindi, #Meditation, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi] कभी बाघ पर सवारी मत करो!</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/04/hindi_0853525893.html</link><category>#audiobook</category><category>#Gita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Krishna</category><category>#podcast</category><category>#ThoughtForTheDay</category><pubDate>Sat, 11 Apr 2026 07:34:17 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-6254070527972233720</guid><description>

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&lt;a href="http://doctor-king-online.blogspot.com/2018/02/quick-links-to-drkings-books-on.html" target="_blank"&gt;[Quick links] &lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiiewkkOHv4xWeY2hx1FxR-Gt-lBo93yPjLVYofyPEJ_SUN_51CluRWOMi13bsh2RbOYfoWUrCBGHVRtoMVyUGzRJ3C3NFuHJNjgHNT3e2W0gtlXy22UXIrSiiosqRwC426Meaewj-Bwqj8zZ6b2KOF4Ezc2xIZHG5PtJy-Zwk639RvMKq2iwG3jPpvPIc/s1024/riding%20a%20tiger2.png" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" data-original-height="1024" data-original-width="1024" height="640" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiiewkkOHv4xWeY2hx1FxR-Gt-lBo93yPjLVYofyPEJ_SUN_51CluRWOMi13bsh2RbOYfoWUrCBGHVRtoMVyUGzRJ3C3NFuHJNjgHNT3e2W0gtlXy22UXIrSiiosqRwC426Meaewj-Bwqj8zZ6b2KOF4Ezc2xIZHG5PtJy-Zwk639RvMKq2iwG3jPpvPIc/w640-h640/riding%20a%20tiger2.png" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;आपने&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; शायद लोगों को घोड़े पर सवारी करते देखा होगा। शायद आपने यह भी सुना होगा कि लोग अरब के रेगिस्तानों में ऊँट पर सवारी करते हैं। लेकिन बाघ पर सवारी? बिलकुल नहीं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, अजीब बात है कि हममें से बहुत से लोग यही करते रहते हैं। हालांकि हमें इसका एहसास बहुत कम होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;!-----------------------------&gt;  
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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मैं उस भयंकर जीव की बात नहीं कर रहा हूँ जो जंगल पर राज करता है। मैं एक बिल्कुल अलग तरह के जीव की बात कर रहा हूँ। मैं "बाघ" शब्द का उपयोग रूपक के रूप में कर रहा हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;ऐसे कई तरह के बाघ हैं, जिन पर लोग अक्सर सवारी करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी करते हैं। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि वही महाशक्ति हैं, और सभी को उनके सामने झुकना चाहिए। वे तय करते हैं कि दूसरों के लिए क्या सही है और क्या गलत। वे यह भी तय करते हैं कि दूसरों को कैसे व्यवहार करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ और लोग शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं। वे सब कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं। वे हमेशा एक कोड़ा लिए रहते हैं ताकि गलती करने वालों को दंड दे सकें। वे नैतिक पुलिस की भूमिका निभाते हैं। वे बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियारों का ढेर इकट्ठा करते हैं। लेकिन जब कोई और ऐसा करता है तो वे हंगामा खड़ा कर देते हैं। वे दूसरों को धमकाते हैं कि जो उनकी बात नहीं मानेगा, उसे वे नष्ट कर देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास ने दिखाया है कि ऐसे लोग, जो श्रेष्ठता और शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं, हमेशा डर, संदेह और विश्वासघात से भरी ज़िंदगी जीते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग धन के बाघ पर सवारी करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे लगातार धन इकट्ठा करते रहते हैं, मानो यह कभी खत्म न होने वाला जुनून हो। जितना अधिक धन वे इकट्ठा करते हैं, उतनी ही उनकी लालसा बढ़ती जाती है। इससे उन्हें बाघ से उतरने का कोई समय नहीं मिलता।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बाघ आखिर बाघ ही होते हैं। आप किसी तरह उन पर सवारी तो कर सकते हैं, लेकिन उनसे उतरना संभव नहीं होता। जैसे ही आप उतरते हैं, या उतरने की कोशिश करते हैं, वे आप पर झपट पड़ते हैं, और आप खत्म हो जाते हैं। अगर किसी तरह बच भी गए, तो दूसरे बाघ किसी कमजोर का इंतजार कर रहे होते हैं।&lt;br /&gt;इसलिए, बाघ पर सवारी करना कभी भी सुरक्षित विकल्प नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से, हमारे पास ऐसे गुरू हैं जो अपने शिष्यों को धन के बाघ, नाम और प्रसिद्धि के बाघ पर सवारी करने के लिए उकसाते हैं। वे कहते हैं कि धन इकट्ठा करने में कुछ भी गलत नहीं है। उनके अनुसार सादगी एक पुरानी और बेकार हो चुकी सद्गुण है — वही जो यीशु या बुद्ध जैसे लोगों ने सिखाई थी।&lt;br /&gt;लोग ऐसे गुरुओं के पास उमड़ पड़ते हैं। इससे उन्हें अपनी ही बाघ सवारी को सही ठहराने का मौका मिल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उन गुरुओं का क्या हुआ जिन्होंने ऐसी सवारी की? उन्हें उनके अपने करीबी लोगों ने ही धोखा दिया। उन्होंने डर और संदेह से भरी ज़िंदगी जी, और अंत में अपने ही भरोसेमंद अनुयायियों द्वारा समाप्त कर दिए गए।&lt;br /&gt;अगर आप बाघ को काबू में नहीं रख पाएँ, तो वह यही करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की स्थिति को देखिए। जो लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को नैतिक उपदेश दे रहे हैं। और जो लोग पूर्ण शक्ति के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लोग विनाश के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों से हथियार छोड़ने और उनकी बात मानने को कह रहे हैं।&lt;br /&gt;व्यक्तिगत स्तर पर भी, हममें से बहुत से लोग धन और विलासिता के प्रति असीम लालसा के बाघ पर सवारी करने की गलती करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;आखिर कोई ऐसा क्यों करता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही प्रश्न भारतीय योद्धा अर्जुन ने भगवद्गीता में कृष्ण से पूछा था।&lt;br /&gt;उन्होंने पूछा:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"लोग गलत काम क्यों करते हैं, मानो उन्हें इसके लिए मजबूर किया जा रहा हो?"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण का सरल उत्तर था:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"अत्यधिक इच्छा और घृणा ही मनुष्य को ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यही उसके सबसे बड़े शत्रु हैं"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-left: 40px;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण इन दोनों की तुलना उस धुएँ से करते हैं जो आग को ढक लेता है। आग अपने आप में उज्ज्वल और प्रकाशमान होती है। लेकिन जब वह धुएँ से ढक जाती है, तो उसकी चमक खो जाती है।&lt;br /&gt;इसी तरह, जब कोई व्यक्ति इन दोनों के प्रभाव में आ जाता है, तो उसकी स्वाभाविक सरल और शांत प्रकृति विकृत हो जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;वे कहते हैं कि ये दोनों उस धूल की तरह हैं जो एक साफ दर्पण पर जम जाती है। एक साफ दर्पण सामने की चीज़ों को वैसा ही दिखाता है जैसा वे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब वही दर्पण धूल से ढक जाता है, तो वह सामने वाले व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखाने में असमर्थ हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंजलि इन्हें राग और द्वेष कहते हैं। वे कहते हैं कि ये दोनों मनुष्य के मन में पहले से ही मौजूद होते हैं। लोग अक्सर इनके प्रभाव में आकर गलत कार्य करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्ध भी इन दोनों शत्रुओं के प्रति चेतावनी देते हैं और इन्हें नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं। एक अनियंत्रित बाघ हमेशा खतरनाक होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यीशु ने भी यही कहा। उन्होंने हमेशा सादा जीवन और करुणा तथा समझ का उपदेश दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही हमारे आसपास दिखाई देने वाले 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&lt;span style="background-color: #d0e0e3;"&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt; © Dr. King, Swami  Satyapriya 2026&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="background-attachment: scroll; background-clip: border-box; background-image: none; background-origin: padding-box; background-position: 0% 0%; background-repeat: repeat; background-size: auto; font-size: 12pt; line-height: 120%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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बिलकुल नहीं! लेकिन, अजीब बात है कि हममें से बहुत से लोग यही करते रहते हैं। हालांकि हमें इसका एहसास बहुत कम होता है। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); मैं उस भयंकर जीव की बात नहीं कर रहा हूँ जो जंगल पर राज करता है। मैं एक बिल्कुल अलग तरह के जीव की बात कर रहा हूँ। मैं "बाघ" शब्द का उपयोग रूपक के रूप में कर रहा हूँ। ऐसे कई तरह के बाघ हैं, जिन पर लोग अक्सर सवारी करते हैं। कुछ लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी करते हैं। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि वही महाशक्ति हैं, और सभी को उनके सामने झुकना चाहिए। वे तय करते हैं कि दूसरों के लिए क्या सही है और क्या गलत। वे यह भी तय करते हैं कि दूसरों को कैसे व्यवहार करना चाहिए। कुछ और लोग शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं। वे सब कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं। वे हमेशा एक कोड़ा लिए रहते हैं ताकि गलती करने वालों को दंड दे सकें। वे नैतिक पुलिस की भूमिका निभाते हैं। वे बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियारों का ढेर इकट्ठा करते हैं। लेकिन जब कोई और ऐसा करता है तो वे हंगामा खड़ा कर देते हैं। वे दूसरों को धमकाते हैं कि जो उनकी बात नहीं मानेगा, उसे वे नष्ट कर देंगे। इतिहास ने दिखाया है कि ऐसे लोग, जो श्रेष्ठता और शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं, हमेशा डर, संदेह और विश्वासघात से भरी ज़िंदगी जीते हैं। कुछ लोग धन के बाघ पर सवारी करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे लगातार धन इकट्ठा करते रहते हैं, मानो यह कभी खत्म न होने वाला जुनून हो। जितना अधिक धन वे इकट्ठा करते हैं, उतनी ही उनकी लालसा बढ़ती जाती है। इससे उन्हें बाघ से उतरने का कोई समय नहीं मिलता। लेकिन बाघ आखिर बाघ ही होते हैं। आप किसी तरह उन पर सवारी तो कर सकते हैं, लेकिन उनसे उतरना संभव नहीं होता। जैसे ही आप उतरते हैं, या उतरने की कोशिश करते हैं, वे आप पर झपट पड़ते हैं, और आप खत्म हो जाते हैं। अगर किसी तरह बच भी गए, तो दूसरे बाघ किसी कमजोर का इंतजार कर रहे होते हैं। इसलिए, बाघ पर सवारी करना कभी भी सुरक्षित विकल्प नहीं है। दुर्भाग्य से, हमारे पास ऐसे गुरू हैं जो अपने शिष्यों को धन के बाघ, नाम और प्रसिद्धि के बाघ पर सवारी करने के लिए उकसाते हैं। वे कहते हैं कि धन इकट्ठा करने में कुछ भी गलत नहीं है। उनके अनुसार सादगी एक पुरानी और बेकार हो चुकी सद्गुण है — वही जो यीशु या बुद्ध जैसे लोगों ने सिखाई थी। लोग ऐसे गुरुओं के पास उमड़ पड़ते हैं। इससे उन्हें अपनी ही बाघ सवारी को सही ठहराने का मौका मिल जाता है। लेकिन उन गुरुओं का क्या हुआ जिन्होंने ऐसी सवारी की? उन्हें उनके अपने करीबी लोगों ने ही धोखा दिया। उन्होंने डर और संदेह से भरी ज़िंदगी जी, और अंत में अपने ही भरोसेमंद अनुयायियों द्वारा समाप्त कर दिए गए। अगर आप बाघ को काबू में नहीं रख पाएँ, तो वह यही करेगा। आज की स्थिति को देखिए। जो लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को नैतिक उपदेश दे रहे हैं। और जो लोग पूर्ण शक्ति के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लोग विनाश के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों से हथियार छोड़ने और उनकी बात मानने को कह रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी, हममें से बहुत से लोग धन और विलासिता के प्रति असीम लालसा के बाघ पर सवारी करने की गलती करते हैं। आखिर कोई ऐसा क्यों करता है? यही प्रश्न भारतीय योद्धा अर्जुन ने भगवद्गीता में कृष्ण से पूछा था। उन्होंने पूछा: "लोग गलत काम क्यों करते हैं, मानो उन्हें इसके लिए मजबूर किया जा रहा हो?" कृष्ण का सरल उत्तर था: "अत्यधिक इच्छा और घृणा ही मनुष्य को ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यही उसके सबसे बड़े शत्रु हैं" कृष्ण इन दोनों की तुलना उस धुएँ से करते हैं जो आग को ढक लेता है। आग अपने आप में उज्ज्वल और प्रकाशमान होती है। लेकिन जब वह धुएँ से ढक जाती है, तो उसकी चमक खो जाती है। इसी तरह, जब कोई व्यक्ति इन दोनों के प्रभाव में आ जाता है, तो उसकी स्वाभाविक सरल और शांत प्रकृति विकृत हो जाती है। वे कहते हैं कि ये दोनों उस धूल की तरह हैं जो एक साफ दर्पण पर जम जाती है। एक साफ दर्पण सामने की चीज़ों को वैसा ही दिखाता है जैसा वे हैं। लेकिन जब वही दर्पण धूल से ढक जाता है, तो वह सामने वाले व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखाने में असमर्थ हो जाता है। पतंजलि इन्हें राग और द्वेष कहते हैं। वे कहते हैं कि ये दोनों मनुष्य के मन में पहले से ही मौजूद होते हैं। लोग अक्सर इनके प्रभाव में आकर गलत कार्य करते हैं। बुद्ध भी इन दोनों शत्रुओं के प्रति चेतावनी देते हैं और इन्हें नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं। एक अनियंत्रित बाघ हमेशा खतरनाक होता है। यीशु ने भी यही कहा। उन्होंने हमेशा सादा जीवन और करुणा तथा समझ का उपदेश दिया। यही हमारे आसपास दिखाई देने वाले युद्धों और संघर्षों के मूल कारणों में से एक है। लेकिन इसका समाधान क्या है? जैसा कि कृष्ण कहते हैं: "इन प्रवृत्तियों को दृढ़ इच्छाशक्ति से नियंत्रित करना चाहिए" यह कहना आसान है, करना कठिन। हममें से कई लोग गहरे जमे हुए मानसिक ढाँचे के साथ बड़े हुए हैं। जैसा कि कहा जाता है —- "पुराना कुत्ता नए करतब नहीं सीख सकता।" बड़ों के लिए अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को बदलना बहुत कठिन होता है। वे गलतियाँ करते हैं, कभी अनजाने में और कभी जानबूझकर। तो समाधान क्या है? हमारी एकमात्र आशा है कि हम अपने बच्चों को इस तरह से पालें कि वे इन जालों में न फँसें। क्या हम कम से कम ऐसा कर रहे हैं? यही सही समय है उनके मन को आकार देने का। यही समय है अच्छे बीज बोने का, ताकि वे अद्भुत इंसान बन सकें। अब, युद्धों और संघर्षों के समाधान पर वापस आते हैं, तो जब नुकसान हो चुका हो, तब आग बुझाने से कोई लाभ नहीं होता। इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता, और वर्तमान को भी बहुत अधिक नहीं बदला जा सकता। हम केवल बेहतर भविष्य की आशा कर सकते हैं। इसके लिए हमें कम से कम दो काम करने होंगे। • धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न आपसी घृणा और गलतफहमी को समाप्त करना। यह अपने धर्म और दूसरों के धर्म की सही समझ के माध्यम से किया जा सकता है। इस पर मैंने एक पिछले एपिसोड में चर्चा की थी। दूसरा, • अनियंत्रित लालच और घृणा के गुलाम बनने से बचना; ऐसे लुभावने बाघ की सवारी से दूर रहकर। हमें इन बातों को अपने बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा में शामिल करना होगा। हमें उन्हें जिम्मेदार इंसान बनाना होगा, न कि केवल पैसा कमाने वाली मशीनें। लेकिन, क्या हम ऐसा कर रहे हैं? &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:subtitle><itunes:author>Dr. King</itunes:author><itunes:summary>window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-8HXGBD0CVC'); [Quick links] [Pause] &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आपने शायद लोगों को घोड़े पर सवारी करते देखा होगा। शायद आपने यह भी सुना होगा कि लोग अरब के रेगिस्तानों में ऊँट पर सवारी करते हैं। लेकिन बाघ पर सवारी? बिलकुल नहीं! लेकिन, अजीब बात है कि हममें से बहुत से लोग यही करते रहते हैं। हालांकि हमें इसका एहसास बहुत कम होता है। var hello = document.getElementById("Hello"); hello.addEventListener("ended", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); audio.play(); }); var audio = document.getElementById("Audio"); audio.addEventListener("ended", function(){ var thankyou = document.getElementById('ThankYou'); thankyou.play(); }); document.getElementById("playAudio").addEventListener("click", function(){ var audio = document.getElementById('Audio'); if(this.className != "is-paused"){ this.className = "is-paused"; this.innerHTML = "Play"; audio.pause(); }else{ this.className = "is-playing"; this.innerHTML = "Pause"; audio.play(); } }); मैं उस भयंकर जीव की बात नहीं कर रहा हूँ जो जंगल पर राज करता है। मैं एक बिल्कुल अलग तरह के जीव की बात कर रहा हूँ। मैं "बाघ" शब्द का उपयोग रूपक के रूप में कर रहा हूँ। ऐसे कई तरह के बाघ हैं, जिन पर लोग अक्सर सवारी करते हैं। कुछ लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी करते हैं। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि वही महाशक्ति हैं, और सभी को उनके सामने झुकना चाहिए। वे तय करते हैं कि दूसरों के लिए क्या सही है और क्या गलत। वे यह भी तय करते हैं कि दूसरों को कैसे व्यवहार करना चाहिए। कुछ और लोग शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं। वे सब कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं। वे हमेशा एक कोड़ा लिए रहते हैं ताकि गलती करने वालों को दंड दे सकें। वे नैतिक पुलिस की भूमिका निभाते हैं। वे बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियारों का ढेर इकट्ठा करते हैं। लेकिन जब कोई और ऐसा करता है तो वे हंगामा खड़ा कर देते हैं। वे दूसरों को धमकाते हैं कि जो उनकी बात नहीं मानेगा, उसे वे नष्ट कर देंगे। इतिहास ने दिखाया है कि ऐसे लोग, जो श्रेष्ठता और शक्ति के बाघ पर सवारी करते हैं, हमेशा डर, संदेह और विश्वासघात से भरी ज़िंदगी जीते हैं। कुछ लोग धन के बाघ पर सवारी करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे लगातार धन इकट्ठा करते रहते हैं, मानो यह कभी खत्म न होने वाला जुनून हो। जितना अधिक धन वे इकट्ठा करते हैं, उतनी ही उनकी लालसा बढ़ती जाती है। इससे उन्हें बाघ से उतरने का कोई समय नहीं मिलता। लेकिन बाघ आखिर बाघ ही होते हैं। आप किसी तरह उन पर सवारी तो कर सकते हैं, लेकिन उनसे उतरना संभव नहीं होता। जैसे ही आप उतरते हैं, या उतरने की कोशिश करते हैं, वे आप पर झपट पड़ते हैं, और आप खत्म हो जाते हैं। अगर किसी तरह बच भी गए, तो दूसरे बाघ किसी कमजोर का इंतजार कर रहे होते हैं। इसलिए, बाघ पर सवारी करना कभी भी सुरक्षित विकल्प नहीं है। दुर्भाग्य से, हमारे पास ऐसे गुरू हैं जो अपने शिष्यों को धन के बाघ, नाम और प्रसिद्धि के बाघ पर सवारी करने के लिए उकसाते हैं। वे कहते हैं कि धन इकट्ठा करने में कुछ भी गलत नहीं है। उनके अनुसार सादगी एक पुरानी और बेकार हो चुकी सद्गुण है — वही जो यीशु या बुद्ध जैसे लोगों ने सिखाई थी। लोग ऐसे गुरुओं के पास उमड़ पड़ते हैं। इससे उन्हें अपनी ही बाघ सवारी को सही ठहराने का मौका मिल जाता है। लेकिन उन गुरुओं का क्या हुआ जिन्होंने ऐसी सवारी की? उन्हें उनके अपने करीबी लोगों ने ही धोखा दिया। उन्होंने डर और संदेह से भरी ज़िंदगी जी, और अंत में अपने ही भरोसेमंद अनुयायियों द्वारा समाप्त कर दिए गए। अगर आप बाघ को काबू में नहीं रख पाएँ, तो वह यही करेगा। आज की स्थिति को देखिए। जो लोग श्रेष्ठता के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को नैतिक उपदेश दे रहे हैं। और जो लोग पूर्ण शक्ति के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों को शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लोग विनाश के बाघ पर सवारी कर रहे हैं, वे दूसरों से हथियार छोड़ने और उनकी बात मानने को कह रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी, हममें से बहुत से लोग धन और विलासिता के प्रति असीम लालसा के बाघ पर सवारी करने की गलती करते हैं। आखिर कोई ऐसा क्यों करता है? यही प्रश्न भारतीय योद्धा अर्जुन ने भगवद्गीता में कृष्ण से पूछा था। उन्होंने पूछा: "लोग गलत काम क्यों करते हैं, मानो उन्हें इसके लिए मजबूर किया जा रहा हो?" कृष्ण का सरल उत्तर था: "अत्यधिक इच्छा और घृणा ही मनुष्य को ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यही उसके सबसे बड़े शत्रु हैं" कृष्ण इन दोनों की तुलना उस धुएँ से करते हैं जो आग को ढक लेता है। आग अपने आप में उज्ज्वल और प्रकाशमान होती है। लेकिन जब वह धुएँ से ढक जाती है, तो उसकी चमक खो जाती है। इसी तरह, जब कोई व्यक्ति इन दोनों के प्रभाव में आ जाता है, तो उसकी स्वाभाविक सरल और शांत प्रकृति विकृत हो जाती है। वे कहते हैं कि ये दोनों उस धूल की तरह हैं जो एक साफ दर्पण पर जम जाती है। एक साफ दर्पण सामने की चीज़ों को वैसा ही दिखाता है जैसा वे हैं। लेकिन जब वही दर्पण धूल से ढक जाता है, तो वह सामने वाले व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखाने में असमर्थ हो जाता है। पतंजलि इन्हें राग और द्वेष कहते हैं। वे कहते हैं कि ये दोनों मनुष्य के मन में पहले से ही मौजूद होते हैं। लोग अक्सर इनके प्रभाव में आकर गलत कार्य करते हैं। बुद्ध भी इन दोनों शत्रुओं के प्रति चेतावनी देते हैं और इन्हें नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं। एक अनियंत्रित बाघ हमेशा खतरनाक होता है। यीशु ने भी यही कहा। उन्होंने हमेशा सादा जीवन और करुणा तथा समझ का उपदेश दिया। यही हमारे आसपास दिखाई देने वाले युद्धों और संघर्षों के मूल कारणों में से एक है। लेकिन इसका समाधान क्या है? जैसा कि कृष्ण कहते हैं: "इन प्रवृत्तियों को दृढ़ इच्छाशक्ति से नियंत्रित करना चाहिए" यह कहना आसान है, करना कठिन। हममें से कई लोग गहरे जमे हुए मानसिक ढाँचे के साथ बड़े हुए हैं। जैसा कि कहा जाता है —- "पुराना कुत्ता नए करतब नहीं सीख सकता।" बड़ों के लिए अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को बदलना बहुत कठिन होता है। वे गलतियाँ करते हैं, कभी अनजाने में और कभी जानबूझकर। तो समाधान क्या है? हमारी एकमात्र आशा है कि हम अपने बच्चों को इस तरह से पालें कि वे इन जालों में न फँसें। क्या हम कम से कम ऐसा कर रहे हैं? यही सही समय है उनके मन को आकार देने का। यही समय है अच्छे बीज बोने का, ताकि वे अद्भुत इंसान बन सकें। अब, युद्धों और संघर्षों के समाधान पर वापस आते हैं, तो जब नुकसान हो चुका हो, तब आग बुझाने से कोई लाभ नहीं होता। इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता, और वर्तमान को भी बहुत अधिक नहीं बदला जा सकता। हम केवल बेहतर भविष्य की आशा कर सकते हैं। इसके लिए हमें कम से कम दो काम करने होंगे। • धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न आपसी घृणा और गलतफहमी को समाप्त करना। यह अपने धर्म और दूसरों के धर्म की सही समझ के माध्यम से किया जा सकता है। इस पर मैंने एक पिछले एपिसोड में चर्चा की थी। दूसरा, • अनियंत्रित लालच और घृणा के गुलाम बनने से बचना; ऐसे लुभावने बाघ की सवारी से दूर रहकर। हमें इन बातों को अपने बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा में शामिल करना होगा। हमें उन्हें जिम्मेदार इंसान बनाना होगा, न कि केवल पैसा कमाने वाली मशीनें। लेकिन, क्या हम ऐसा कर रहे हैं? &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#audiobook, #Gita, #Hindi, #IndianPhilosophy, #Krishna, #podcast, #ThoughtForTheDay</itunes:keywords></item><item><title>[Hindi]  परमानंद के चार मार्ग</title><link>https://doctor-king-online.blogspot.com/2026/04/hindi.html</link><category>#audiobook</category><category>#booktalk</category><category>#Gita</category><category>#Hindi</category><category>#IndianPhilosophy</category><category>#Krishna</category><category>#Mahabharata</category><category>#podcast</category><pubDate>Sat, 4 Apr 2026 08:12:55 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7624344137997148721.post-5438461946282453156</guid><description>

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&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: inherit;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;हम सब खुश रहना चाहते हैं। लेकिन खुशी का अर्थ व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार बदलता रहता है। एक ही व्यक्ति के लिए भी, अलग-अलग समयों पर खुशी का अनुभव अलग-अलग होसकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जीवन के विभिन्न चरणों में हम अलग-अलग बातों से आनंद प्राप्त करते हैं। जीवन के आरंभ में हमारी खुशी, अधिकांशतः शारीरिक होती है। छोटा बच्चा माँ का दूध पीने से, माँ की गोद में सोने से, और खिलौनों से खेलने से आनंद पाता है। परंतु जैसे-जैसे वह शारीरिक और बौद्धिक रूप से बढ़ता जाता है, वह आनंद धीरे-धीरे बौद्धिक गतिविधियों से मिलने वाली खुशी की ओर मुड़ने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या शारीरिक और बौद्धिक खुशी से भी ऊपर कुछ और है? ऐसा प्रतीत होता है कि, है। उचित शब्द न मिलने के कारण मैं उसे 'आध्यात्मिक आनंद' कहता हूँ। यह आनंद न तो शारीरिक साधनों से मिलता है और न ही बौद्धिक रुचियों से। यह किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं करता। यह केवल मानसिक सुख भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे 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ग्रंथ में आज के समय के लिए उपयोगी अनेक विचार दिखाई देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य कैसे व्यवहार करता है? वह तनाव में क्यों आता है? और उस तनाव से कैसे बाहर निकला जा सकता है? – इन सभी विषयों को यह ग्रंथ स्पष्ट रूप से दिखाता है। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि यह यह भी बताता है कि अंतिम आनंद या परमानंद को कैसे प्राप्त किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवद्गीता में 'योग' शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया गया है। इस पुस्तक के अठारह अध्यायों में से प्रत्येक का शीर्षक किसी न किसी योग के नाम पर होने पर भी, सामान्य रूप से योग शब्द का अर्थ एक मार्ग के रूप में लिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवद्गीता का आरंभ, महावीर अर्जुन के मन के द्वंद्व से होता है – यह संदेह कि युद्ध करना चाहिए या नहीं।&lt;br /&gt;अर्जुन के मित्र, तत्त्वज्ञानी और मार्गदर्शक कृष्ण, विभिन्न मार्गों और विकल्पों को समझाकर उसे इस मानसिक उलझन से बाहर निकलने में सहायता करते हैं। वे सभी मार्ग वस्तुतः तनाव से मुक्ति के ही उपाय हैं। इस अर्थ में यह ग्रंथ, काफी हद तक मनोविश्लेषण से संबंधित ग्रंथ ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इस पुस्तक की व्याख्या मुख्यतः इसी दृष्टिकोण से करने जा रहा हूँ। भगवद्गीता की नाटकीय पृष्ठभूमि और धार्मिक पक्ष मेरे लिए द्वितीय स्थान पर हैं। इसके मनोविश्लेषणात्मक पक्षों तथा अंतिम आनंद को प्राप्त करने के लिए बताए गए विभिन्न मार्गों पर मैं अधिक चर्चा करना चाहता हूँ। वह अंतिम आनंद वास्तव में क्या है, इसे हम विभिन्न मार्गों को समझते हुए जानेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्ग भले ही अलग-अलग हों, अंत में हम देखेंगे कि अंतिम आनंद एक ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममें से कोई भी पूरी तरह एकजैसा नहीं होता – न शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से। इसलिए हम एक ही समस्या को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। उसी प्रकार, अंतिम आनंद को प्राप्त करने का मार्ग भी व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होता है, भले ही वह आनंद एक ही क्यों न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंतन का मार्ग, अथवा, ज्ञानयोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंतन का मार्ग, जिसे ज्ञानयोग भी कहा जाता है, विचारों के विश्लेषण पर आधारित है। मूल रूप से यह गहन चिंतन की ही प्रक्रिया है। आप प्रश्न पूछते हुए आगे 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के अनुसार, इस परम ज्ञान के समान और कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान सबसे अधिक पवित्र माना गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और भी रोचक बात यह है कि भगवद्गीता कहती है कि योगमार्ग का अनुसरण करने वाला व्यक्ति जिस भी परम अवस्था को प्राप्त करता है, वह यही है। अर्थात निरंतर ध्यान में लीन रहने वाला योगी भी अंततः इसी परम सत्य को प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी किताब सुनने के लिए, आप इसे या तो &lt;a href="https://tinyurl.com/mylibrary1234" target="_blank"&gt;डॉ. किंग की लाइब्रेरी&lt;/a&gt; से उधार ले सकते हैं, या फिर Google, Kobo और अन्य जैसे किसी भी ऑनलाइन स्टोर से खरीद सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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तो • क्या वह आनंद सभी के लिए एक ही होता है? • या व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार बदलता है? • यदि वह एक ही है, तो क्या हर कोई उसे प्राप्त कर सकता है? • उस अंतिम आनंद को अनुभव करने का मार्ग क्या है? • उसके लिए आवश्यक पूर्वशर्तें कौन-सी हैं? • उस आनंद को पाने के लिए हम किस प्रकार योग्य बनते हैं? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर हम इस पुस्तक में चर्चा करने जा रहे हैं। इन चर्चाओं का आधार, मैं भारतीय प्राचीन ग्रंथों में सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ, भगवद्गीता को बना रहा हूँ। इस तत्त्वग्रंथ पर संसार की लगभग सभी भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में ही नहीं, भगवद्गीता को अनेक लोग, मनोविज्ञान के ग्रंथ के रूप में भी देखते हैं। धार्मिक पृष्ठभूमि को अलग कर देने पर भी, इस अद्भुत ग्रंथ में आज के समय के लिए उपयोगी अनेक विचार दिखाई देते हैं। विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य कैसे व्यवहार करता है? वह तनाव में क्यों आता है? और उस तनाव से कैसे बाहर निकला जा सकता है? – इन सभी विषयों को यह ग्रंथ स्पष्ट रूप से दिखाता है। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि यह यह भी बताता है कि अंतिम आनंद या 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हों, अंत में हम देखेंगे कि अंतिम आनंद एक ही है। हममें से कोई भी पूरी तरह एकजैसा नहीं होता – न शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से। इसलिए हम एक ही समस्या को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। उसी प्रकार, अंतिम आनंद को प्राप्त करने का मार्ग भी व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होता है, भले ही वह आनंद एक ही क्यों न हो। चिंतन का मार्ग, अथवा, ज्ञानयोग चिंतन का मार्ग, जिसे ज्ञानयोग भी कहा जाता है, विचारों के विश्लेषण पर आधारित है। मूल रूप से यह गहन चिंतन की ही प्रक्रिया है। आप प्रश्न पूछते हुए आगे बढ़ते जाते हैं, और अंत में जिस विषय पर आप विचार कर रहे होते हैं, उसके परम सत्य को समझ लेते हैं। यदि आप किसी भौतिक वस्तु या सांसारिक विषय के बारे में चिंतन कर रहे हों, तो यह निरंतर विचार-प्रक्रिया अंततः आपको अपनी रुचि के विषय को, औरअधिक गहराई से समझने में सहायता करती है। एक वैज्ञानिक के आगे बढ़ने की विधि भी यही होती है। वह किसी समस्या को लेता है, उसके सभी पहलुओं पर विचार करता है, बहुत गहराई से चिंतन करता है, और अंत में उसे पूरी तरह समझ लेता है। किसी भी विषय पर चिंतन आरंभ करने से पहले, उसके बारे में किसी ऐसे 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समझते हुए जानेंगे। मार्ग भले ही अलग-अलग हों, अंत में हम देखेंगे कि अंतिम आनंद एक ही है। हममें से कोई भी पूरी तरह एकजैसा नहीं होता – न शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से। इसलिए हम एक ही समस्या को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। उसी प्रकार, अंतिम आनंद को प्राप्त करने का मार्ग भी व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होता है, भले ही वह आनंद एक ही क्यों न हो। चिंतन का मार्ग, अथवा, ज्ञानयोग चिंतन का मार्ग, जिसे ज्ञानयोग भी कहा जाता है, विचारों के विश्लेषण पर आधारित है। मूल रूप से यह गहन चिंतन की ही प्रक्रिया है। आप प्रश्न पूछते हुए आगे बढ़ते जाते हैं, और अंत में जिस विषय पर आप विचार कर रहे होते हैं, उसके परम सत्य को समझ लेते हैं। यदि आप किसी भौतिक वस्तु या सांसारिक विषय के बारे में चिंतन कर रहे हों, तो यह निरंतर विचार-प्रक्रिया अंततः आपको अपनी रुचि के विषय को, औरअधिक गहराई से समझने में सहायता करती है। एक वैज्ञानिक के आगे बढ़ने की विधि भी यही होती है। वह किसी समस्या को लेता है, उसके सभी पहलुओं पर विचार करता है, बहुत गहराई से चिंतन करता है, और अंत में उसे पूरी तरह समझ लेता है। किसी भी विषय पर चिंतन आरंभ करने से पहले, उसके बारे में किसी ऐसे व्यक्ति से सुनना चाहिए जो आपसे अधिक जानकार हो। अथवा उस विषय पर किसी विशेषज्ञ द्वारा लिखा गया ग्रंथ पढ़ा जा सकता है। यह आपको एक प्रारंभिक आधार प्रदान करता है। पर्याप्त प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करने के बाद, आपने जो सुना या पढ़ा है उस पर विचार करते रहना चाहिए। सुनी या पढ़ी हुई बातों को आत्मसात करने की प्रक्रिया ही यही है। यह चिंतन विषय को औरअधिक गहराई से समझने में सहायता करता है। इसके बाद अंतिम चरण आता है – उस विषय पर और भी गहराई से विचार करना, अर्थात उसी विषय पर ध्यान लगाना। ऐसी एकाग्र चिंतन–प्रक्रिया से उस विषय के बारे में नए-नए बोध उत्पन्न होते हैं। वह आपके सामने ऐसे नए पहलू खोल देती है जिनके बारे में आपने पहले न तो पढ़ा होता है और न ही सोचा होता है। परंपरागत शब्दों में इसे श्रवण, मनन और निदिध्यासन कहा जाता है। श्रवण का अर्थ है – विषय को जानने वाले व्यक्ति से सुनना, या उस विषय से संबंधित ग्रंथ पढ़ना। मनन का अर्थ है – सुनी या पढ़ी हुई बातों पर बार-बार विचार करना और उन्हें गहराई से समझना। और अंतिम चरण, निदिध्यासन का अर्थ है – उस विषय पर एकाग्र मन से ध्यान करना। इस प्रक्रिया के दौरान आप, पढ़े-और-सोचे हुए विषयों में बिल्कुल नए पहलुओं की भी खोज कर सकते हैं। किसी भी गंभीर विचार या तत्त्व को आत्मसात करने के लिए ये तीनों चरण आवश्यक होते हैं। यही बुद्धि के माध्यम से किसी विषय को "जानने" की सामान्य विधि है। इसी विधि को अत्यंत दार्शनिक या आध्यात्मिक विषयों पर भी लागू किया जा सकता है। श्रवण, मनन और निदिध्यासन – इन चरणों का क्रमबद्ध पालन करते हुए आप परम सत्य की खोज करते हैं: पहले सुनना, फिर सोचना और अंत में ध्यान करना। परंपरा में इसी को चिंतन का मार्ग या ज्ञानयोग कहा जाता है। प्रत्येक मार्ग का एक लक्ष्य और एक अंतिम परिणाम होता है। यदि आपके प्रश्न अस्तित्व के परम सत्य से संबंधित हों, तो यह मार्ग आपको उसी परम सत्य की ओर ले जाता है। भगवद्गीता और सभी उपनिषदों के अनुसार, इस परम सत्य को जान लेने पर मनुष्य को शाश्वत सुख, अर्थात परमानंद की प्राप्ति होती है। इस प्रक्रिया का पहला चरण है किसी ज्ञानी व्यक्ति के पास जाना। उसे अपना गुरु स्वीकार करना चाहिए, उसके प्रति विनम्र और आज्ञाकारी रहना चाहिए। उसकी सेवा करके उसका विश्वास प्राप्त करना चाहिए। उसके बाद, जिन विषयों को आप नहीं समझते, उनके बारे में उससे प्रश्न पूछने चाहिए। जब आप ऐसा करते हैं, तब वह गुरु आपको वह ज्ञान प्रदान करता है जिसकी आप खोज कर रहे होते हैं। गुरु, जोकुछ कहते हैं, उसे ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, उस पर मनन करना चाहिए और उसी विषय पर गहराई से ध्यान करना चाहिए। यदि आप विषय में पूर्ण दक्षता रखने वाले सही गुरु के पास गए हों, तो समय के साथ उनसे आपको यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। प्राचीन काल में, जब शिक्षा पूरी तरह गुरु और शिष्य के बीच प्रत्यक्ष रूप से होती थी, तब यही परंपरागत पद्धति थी। परंतु आज के समय में परम ज्ञान में स्थित, सच्चे गुरु को खोजना सरल नहीं है। ऐसी परिस्थिति में भगवद्गीता या उपनिषदों जैसे ग्रंथों का अध्ययन करना आवश्यक होजाता है, क्योंकि ये मुख्यतः परम तत्त्व के विचारों पर केंद्रित होते हैं। लेकिन केवल पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है। आपने जो पढ़ा है उस पर गहराई से मनन करना चाहिए, और अंततः उसी चिंतन में पूर्ण रूप से तल्लीन हो जाना चाहिए। वह प्रक्रिया उस विषय पर किए जाने वाले ध्यान के समान होनी चाहिए। ऐसी साधना का अंतिम परिणाम ही परम अनुभव, अर्थात परम साक्षात्कार होता है। ऐसा परम ज्ञान प्राप्त करने से क्या लाभ होता है? भगवद्गीता के अनुसार, इस परम ज्ञान के समान और कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान सबसे अधिक पवित्र माना गया है। और भी रोचक बात यह है कि भगवद्गीता कहती है कि योगमार्ग का अनुसरण करने वाला व्यक्ति जिस भी परम अवस्था को प्राप्त करता है, वह यही है। अर्थात निरंतर ध्यान में लीन रहने वाला योगी भी अंततः इसी परम सत्य को प्राप्त करता है। पूरी किताब सुनने के लिए, आप इसे या तो डॉ. किंग की लाइब्रेरी से उधार ले सकते हैं, या फिर Google, Kobo और अन्य जैसे किसी भी ऑनलाइन स्टोर से खरीद सकते हैं। &amp;nbsp; © Dr. King, Swami Satyapriya 2026 p { margin-bottom: 0.1in; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: justify; }p.western { font-family: "Arial", serif; font-size: 14pt; }p.cjk { font-size: 14pt; }p.ctl { font-size: 14pt; } You can borrow audio books directly from the author at https://tinyurl.com/mylibrary1234 at highly affordable prices.</itunes:summary><itunes:keywords>#audiobook, #booktalk, #Gita, #Hindi, 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