<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0">

<channel>
	<title>Mahapuran - About Sanatan Dharma</title>
	<atom:link href="https://www.mahapuran.com/feed/?orderby=modified" rel="self" type="application/rss+xml"/>
	<link>https://www.mahapuran.com</link>
	<description>About Sanatan Dharma</description>
	<lastBuildDate>Tue, 26 May 2026 17:18:44 +0000</lastBuildDate>
	<language>hi-IN</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.0</generator>

<image>
	<url>https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2026/05/cropped-cropped-mahapuran-orange.png?fit=32%2C32&amp;ssl=1</url>
	<title>Mahapuran</title>
	<link>https://www.mahapuran.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
<site xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">185308993</site>	<itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>About Sanatan Dharma</itunes:subtitle><item>
		<title>श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्र का फल/माहात्म्य क्या है?</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/shree-vishnu-sahastranaam-hindi-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/shree-vishnu-sahastranaam-hindi-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Jan 2025 08:31:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[माहात्म्य]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीमद पद्मपुराण]]></category>
		<category><![CDATA[सहस्त्रनाम-स्तोत्र]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=491</guid>

					<description><![CDATA[Shree Vishnu Sahastranaama benefits (Mahatmya) &#8211; ऋषियों ने कहा &#8211; सूत जी ! आपका हृदय अत्यन्त करुणायुक्त है; अतएव श्री महादेव जी और देवर्षि नारद…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>Shree Vishnu Sahastranaama benefits (Mahatmya)</strong> &#8211; ऋषियों ने कहा &#8211; सूत जी ! आपका हृदय अत्यन्त करुणायुक्त है; अतएव श्री महादेव जी और देवर्षि नारद का जो अद्भुत संवाद हुआ था, उसे आपने हम लोगों से कहा है। हम लोग श्रद्धापूर्वक सुन रहे हैं। अब आप कृपा पूर्वक यह बताइये कि महात्मा नारद ने ब्रह्माजी से भगवान् सहस्त्र नामों की महिमा का किस प्रकार श्रवण किया था।</p>
<p>सूतजी बोले &#8211; द्विजश्रेष्ठ मुनियो ! इस विषय में मैं पुराना इतिहास सुनाता हूँ। आप सब लोग ध्यान देकर सुनें। इसके श्रवण से भगवान्‌ श्रीकृष्ण में भक्ति बढ़ती है। एक समय की बात है, चित्त को पूर्ण एकाग्र रखने वाले नारद जी अपने पिता ब्रह्माजी का दर्शन करने के लिये मेरु पर्वत के शिखर पर गये । वहाँ आसन पर बैठे हुए जगत्पति ब्रह्माजी को प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने इस प्रकार कहा&#8211;&#8216;विश्वेश्वर ! भगवान के नाम की जितनी शाक्ति है, उसे बताइये।</p>
<p>प्रभो! ये जो सम्पूर्ण विश्व के स्वामी साक्षात्‌ श्रीनारायण हरि हैं, इन अविनाशी परमात्मा के नाम की कैस्री महिमा है ? विशेष प्रकार से नाम कीर्तन पूर्वकभगवान् की भक्ति जिस प्रकार करनी चाहिए वह सुनो। जिनके लिए शास्त्रों में कोई प्रायश्चित नहीं बताया गया है, उन सभी पापों की शुध्दि के लिये एक मात्र विजयशील भगवान्‌ विष्णु का प्रयत्रपूर्वक स्मरण ही सर्वोत्तम साधन देखा गया है, वह समस्त पापों का नाश करने वाला है । अतः श्रीहरि के नाम का कीर्तन और जप करना चाहिये । जो ऐसा करता है, वह सब पांपॉ से मुक्त हे; श्रीविष्णु के परमपद कों प्राप्त होता है।</p>
<p>जो मनुष्य &#8216;हरि&#8217; इस दो अक्षरो वाले नामका सदा उच्चारण करते हैं, वे उसके उच्चारण मात्र से मुक्त हो जाते हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तपस्या के रूप में किये जाने वाले जो सम्पूर्ण प्रायश्चित हैं, उन सबकी अपेक्षा श्रीकृष्ण का निरन्तर स्मरण श्रेष्ठ है।</p>
<p>जो मनुष्य प्रातः साय, रात्रि तथा मध्यान आदि के समय &#8216;नारायण&#8217; नाम का स्मरण करता हैं, उसके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं । उत्तम ब्रत का पालन करने वाले नारद ! मेरा कथन सत्य है, सत्य है, सत्य है । भगवान के नामों का उच्चारण करने मात्र से मनुष्य बड़े-बड़े पापों से मुक्त हो जाता है।</p>
<p>राम-राम-राम-राम&#8217; इस प्रकार बारम्बार जप करने वाला मनुष्य यदि चाण्डाल हो तो भी वह पवित्राआत्मा हो जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। उसमे नाम कीर्तन मात्र से कुरुक्षेत्र, काशी, गया, और द्वारका आदि सम्पूर्ण तीर्थो का सेवन कर लिया।</p>
<p>जो कृष्ण! कृष्ण ! कृष्ण ! इस प्रकार जप और कीर्तन करता है, यह इस संसार का परित्याग करने पर भगवान्‌ विष्णु के समीप आनंद भोगता है। ब्रहमन! जो कलियुग में प्रसश्नतापूर्वक &#8216;नृसिंह” नाम का जप और कीर्तन करता है, यह भगवद भक्त मनुष्य महान्‌ पाप से छुटकारा पा जाता है।</p>
<p>सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ तथा द्वापर में पूजन करके मनुष्य जो कुछ पाता है, वही कलियुग में केवल भगवान्‌ केशब का कीर्तन करने से पा लेता है। जो लोग इस बात को जानकर जागतात्मा केशव के भजन में लीन होते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णु के परमपद को प्राप्त कर लेते हैं।</p>
<ol>
<li>मत्स्य</li>
<li>कूर्म</li>
<li>वराह</li>
<li>नृसिंह</li>
<li>वामन</li>
<li>परशुराम</li>
<li>श्रीराम</li>
<li>श्रीकृष्ण</li>
<li>बुद्ध</li>
<li>तथा कल्कि</li>
</ol>
<p>ये दस अबतार इस पृथ्वी पर बताये गये हैं। इनके नामधारण मात्र से सदा ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध होता है। जो मनुष्य प्रातःकाल जिस किसी तरह भी श्रीविष्णु नाम का कीर्तन, जप तथा ध्यान करता है, वह निसंदेह मुक्त होता है, वह निश्चय ही नर से नारायण बन जाता है।</p>
<p><strong>सूत जी कहते है</strong> &#8211; यह सुनकर नारद जी कों बड़ा आश्चर्य हुआ। बे अपने पिता ब्रह्माजी से बोले &#8211; तात ! तीर्थसेबन के लिये पृथ्वी पर भ्रमण करने की क्&#x200d;या आवश्यकता है; जिनके नाम का ऐसा माहात्य है कि इसे सुनने मात्र से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, इन भगवान्‌ का ही स्मरण करना चाहिये। जिस मुख में &#8216;राम- राम&#8217; का जप होता रहता है, यही महान्‌ तीर्थ है, यही प्रधान क्षेत्र है तथा यही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। सुव्रत ! भगवान्‌ के कीर्तन करने- योग्य कौन-कौन से नाम हैं? उन सबको विशेष रूप से बताइये।</p>
<p><strong>ब्रह्माजी ने कहा</strong> &#8211; बेटा ! ये भगवान्‌ विष्णु सर्वश्रव्याफ्क सनातन परमात्मा हैं। इनका न आदि है न अन्त। ये लक्ष्मी से युक्त, सम्पूर्ण भूतो कि आत्मा तथा समस्त प्राणियों उत्पन्न करने वाले हैं। जिनसे मेरा प्रादुर्भाव हुआ है, वे भगवान्‌ विष्णु सदा मेरी रक्षा करें ।</p>
<p>बही काल के भी काल और वही मेरे पूर्वज हैं। उनका कभी विनाश नहीं होता। उनके नेत्र कमल के समान शोभा पाते हैं। वे परम बुद्धिमान, अविकारी एवं पुरुष (अन्तर्यामी) हैं। सदा शोषनाग की शैय्या पर शयन करने वाले भगवान्‌ विष्णु सहस्रों मस्तक वाले हैं।</p>
<p>ये महाप्रभु हैं। सम्पूर्ण भूत उन्हीं के स्वरूप हैं। भगवान्‌ जनार्दन साक्षात्‌ विश्वरूप हैं। कैटभ नामक असुर का वध करने के कारण वे कैटभारि कहलाते हैं। वे ही व्यापक होने के कारण विष्णु, धारण-पोषण करने के कारण धाता और जगदीश्वर हैं।</p>
<p>नारद ! मैं उनका नाम और गोत्र नहीं जानता।</p>
<p>तात ! मैं केवल बेदों का वक्ता हूँ, बेदातीत परमात्मा का ज्ञाता नहीं, अतः देव ! तुम वहाँ जाओ. जहाँ भगवान बिश्वनाथ रहते हैं।</p>
<p>मुनिश्रेष्ठ ! वे तुमसे सम्पूर्ण तत्व का वर्णन करेंगे। कैलाश के स्वामी श्री महादेव जी ही अन्तर्यामी पुरुष है। वे देवताओ के स्वामी और सम्पूर्ण भक्तो के आराध्यदेव है। पाँच मुखों से सुशोभित भगवान्‌ उमानाथ सब दुःखॉ का विनाश करने वाले हैं। सम्पूर्ण विश्व के ईश्वर श्रीविश्वनाथ जी सदा भक्तों पर दया करने वाले हैं ।</p>
<p>नारद ! वहीं जाओ, वे तुम्हें सब कुछ बता देंगे।</p>
<p><strong>सूतजी कहते हैं</strong> &#8211; पिता की बात सुनकर देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर, जहाँ कल्याणप्रद भगवान्‌ विश्वेश्वर नित्य निवास करते हैं, गये। देवताओं द्वारा पूजित देवाधिदेव जगदगुरु भगवान्‌ शंकर कैलास के शिखर पर विराजमान थे। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ, प्रत्येक मुख में तीन नेत्र तथा हाथों में त्रिशुल, कपाल, खटवांग, तीक्ष्ण शूल, खड़ग और पिनाक नाम का धनुष शोभा पा रहे थे। बैल पर सवारी करने वाले बरदाता भगवान्‌ भीम अपने अंगो में भस्म रमाये सर्पो की शोभा से युक्त चन्द्रमा का मुकुट पहने करोड़ों सूर्यो के समान देदीप्यमान हो रहे थें।</p>
<p>नारदजी ने देवेश्वर शिव को साष्टाड़ दण्डबत्‌ किया। उन्हें देखकर महादेवजी के नेत्र कमल खिल उठे। उस समय वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ शिव ने बह्मचारियों में श्रेष्ठ नारदजी से पूछा &#8211; &#8216;देवर्षिप्रवर ! बताओ, कहाँसे आ रहे हो ?</p>
<p><strong>नारदजी ने कहा</strong> &#8211; भगवन्‌ ! एक समय मैं ब्रह्माजी के पास गया था । वहाँ उनके मुख से मैंने भगवान्‌ विष्णु के पाप नाशक माहात्म्य का श्रवण किया।</p>
<p>सुरश्रेष्ठ! बह्याजी ने मेरे सामने भगवान की महिमा का भली-भाँति वर्णन किया। भगवान के नाम की जितनी शक्ति है, वह भी मैंने उनके मुख से सुनी है। तत्पश्चात्‌ पहले यिष्णु के नामों के विषय में प्रश्न किया। तब उन्होंने कहा &#8211; &#8220;नारद ! मैं इस बात कों नहीं जानेता; इसका ज्ञान<br />
महारुद्र को है । वे ही सब कुछ बतायेंगे ।</p>
<p>यह सुनकर मैं आपके पास आया हूँ । इस घोर कलियुग में मनुष्यों की आयु थोड़ी होगी। वे सदा अधर्म में तत्पर रहेंगे। भगवान के नामों में उनकी निष्ठा नहीं होगी । कलियुग के ब्राह्मण पाखंडी, धर्मसे विरक्त, संध्या न करने वाले, व्रतहीन, दुष्ट और मलिन होंगे; जैसे ब्राह्मण होंगे, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद तथा अन्य जाति के लोग भी होंगे । प्राय: मनुष्य भगवान के भक्त नहीं होंगे। द्विजों से बाहर गिने जाने वाले शूद्र कलियुग में धर्म-अधर्म तथा हिताहित का ज्ञान भी नहीं रखते; ऐसा जानकर मैं आपके निकट आया हूँ। आप कृपा करके विष्णु के सहस्त्र नामों का वर्णन कीजिये, जो पुरुषों कि लिये सौभाग्यजनक, परम उत्तम तथा सर्वदा भक्तिभाव कों वढ़ाने वाला है; इसी प्रकार जो ब्राह्मणों को ब्रह्मज्ञान, क्षत्रियों कों विजय, वैश्यों को धन तथा शूद्रों को सदा सुख देने वाले हैं।</p>
<p>सुब्रत ! जो सहस्रनाम परम गोपनीय है, उसका वर्णन कीजिये । वह परम पवित्र एवं सदा सर्वतीर्थमय है; अतः मैं उसका श्रवण करना चाहता हूँ । प्रभो ! विश्वेध्वर ! कृपया उस सहस्रनाम का उपदेश कीजिये ।</p>
<p>नारदजी के वचन सुनकर भगवान्‌ शंकर के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे । भगवान्‌ विष्णु के नाम काबारम्बार स्मरण करके उनके शरीर में रोमांच हो आया ।</p>
<p><strong>वे बोले</strong> &#8211; ब्रह्मण! भगवान्‌ विष्णु के सहस्रनाम परम गोपनीय हैं। इन्हें सुनकर मनुष्य कभी दुर्गति में नहीं पड़ता ।</p>
<p>यों कहकर भगवान्‌ शंकर ने नारदजी कों विष्णुसहस्त्रनाम का उपदेश दिया, जिसे पूर्वकाल में ने भगवती पार्वतीजी को सुना चुके थे । इस प्रकार नारदजी ने कैलास पर्वत पर भगवान्‌ महेश्वरसे श्रीविष्णुसहस्रनाम का ज्ञान प्राप्त किया ।</p>
<p>फिर दैवयोग से एक बार वे कैलास से उतरकर नैमिषारण्य नामक तीर्थ में आये। वहाँ के ऋषियों ने ऋषिश्रेष्ठ महात्मा नारद को आया देख विशेष रूप से उनका स्वागत-सल्कार किया । उन्होंने विष्णुभक्त विप्रवर नारदजी के ऊपर फूल बरसाये, पाद्य और आर्थ्य निवेदन किया, उनकी आरती उतारी और फल-मूल निवेदन करके पृथ्वी पर साष्टांग प्रणाम किया ।</p>
<p><strong>तत्पश्चात वे बोले</strong> &#8211; महामुने ! हम लोग इस वंश में जन्म लेकर आज कृतार्थ हो गये; क्योंकि आज हमें परम पवित्र और पापों का नाश करने वाला आपका दर्शन प्राप्त हुआ।</p>
<p>देवर्षि ! आपके प्रसाद से हमने पुराणों का श्रवण किया है। ब्रह्मन्‌ ! अब आप यह बताइये कि किस प्रकार से समस्त पापों का क्षय हो सकता है । दान, तपस्या, तीर्थ, यज्ञ, योग, ध्यान, इन्द्रिय-निगृह और शात्र-समुदाय के बिना ही कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है ?</p>
<p><strong>नारदजी बोले</strong> &#8211; मुनिवरों ! एक समय भगवती पार्वती ने कैलाश शिखर पर बैठे हुए अपने प्रियतम देवाधिदेव जगद्‌गुरु महादेवजी से इस प्रकार प्रश्न किया |</p>
<p><strong>पार्वती बोलीं</strong> &#8211; भगवन्‌ ! आप सर्वश और सर्वपूजित श्रेष्ठ देवता हैं। जन्म और मृत्यु से रहित, स्वयम्भू एवं सर्वशक्तिमान्‌ हैं। स्वामिन्‌ ! आप सदा किसका ध्यान करते हैं ? किस मन्त्र का जप करते हैं ?</p>
<p>देवेश्वर ! इसे जानने की मन में बड़ी उत्कंठा है।</p>
<p>सुव्रत ! यदि मैं आपकी प्रियतमा और कृपापात्र हूँ तो मुझसे यथार्थ बात कहिये।</p>
<p><strong>महादेवजी बोले</strong> &#8211; देवि ! पहले सत्ययुग में विशुद्ध चित्तवाले सब पुरुष सम्पूर्ण ईश्वरॉ के भी ईश्वर एकमात्र भगवान्‌ विष्णु का तत्व जानकर उन्हीं के नामों का जप किया करते थे और उसी के प्रभाव से इस लोक तथा &#8216;परलोक में भी परम ऐश्वर्य कों प्राप्त करते थे।</p>
<p>प्रिये ! तुलादान, अश्वमेघ आदि यज्ञ, काशी, प्रयाग आदि तीर्थो में किये हुए स्न्नान आदि शुभकर्म, गया में किये हुए पितरों कि श्राद्ध-तर्पण आदि, वेदों के स्वाध्याय आदि, जप, उग्र तप, नियम, यम, जीवॉ पर दया, गुरु शुश्रूषा, सत्यभाषण, वर्ण और आश्रम के धर्मा का पालन, ज्ञान तथा ध्यान आदि साधनों का कोटि जन्मोतक भलीभाँति अनुष्ठान करने पर भी मनुष्य परम कल्याणमय सर्वेश्वर भगवान्‌ विष्णु को नहीं पाते । परन्तु जो दूसरे का भरोसा न करके सर्वभाव से पुराण पुरुषोत्तम श्रीनारायण की शरण ग्रहण करते हैं, वे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग &#8216;एकमात्र श्रीभगवान्‌ विष्णु के नामों का कीर्तन करते हैं, वे सुखपूर्वक जिस. गति कों प्राप्त करते हैं, उसे समस्त धार्मिक भी नहीं पा सकते । अतः सदा भगवान्‌ विष्णु का स्मरण करना चाहिये, इन्हें कभी भी भूलना नहीं चाहिये । क्योंकि सभी विधि और निषेध इन्हीं के किक्वर हैं &#8211; इन्हीं की आशा का पालन करते हैं।</p>
<p>प्रिंये! अब मैं तुमसे भगवान्‌ विष्णु के मुख्य-मुख्य हजार नामों का वर्णन करूँगा, जो तीनों लोको को मुक्ति प्रदान करने वाले हैं ।</p>
<p><strong>नोट</strong> &#8211; इस प्रकार श्रीमदपद्मपुराण में श्री महादेव ने स्वयं अपने मुख से श्री विष्णुसहस्रनाम का वर्णन किया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>(श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ के लिए कोई पीडीऍफ़ या वेबसाइट का इस्तेमाल नहीं करे, सिर्फ पुस्तक से ही करे।)</strong></span></p>
<p><strong>श्रीविष्णुसहस्त्रनाम फल</strong> &#8211; इस प्रकार ये सबके हृदय में बास करने वाले भगवान्‌ विष्णु के सहस्त्र नाम हैं। इन सब नामों कों मेरा बारम्बार नमस्कार है।</p>
<p>यह विष्णुसहस्ननामस्तोत्र समस्त अपराधों को शांत करने वाला, परम उत्तम तथा भगवान में भक्ति को बढ़ाने-वाला है। इसका कभी नाश नहीं होता। ब्रह्मलोक आदि का तो यह सर्वस्व ही है। विष्णुलोक तक पहुँचने के लिये यह अद्वितीय सीढ़ी है। इसके सेवन से सब दुःखों का नाश हो जाता है। यह सब सुखों को देने वाला तथा शीघ्र ही परम मोक्ष प्रदान करने बाला है। काम, क्रोध आदि जितने भी अन्तःकरण के मल हैं, उन सबका इससे शोधन होता है। यह परम शान्तिदायक एवं महापातकी मनुष्यों को भी पवित्र बनाने वाला है। समस्त प्राणियों को यह शीघ्र ही सब प्रकार के अभीष्ट फल दान करता है। समस्त विश्वों की शान्ति और सम्पूर्ण अनिष्टों का विनाश करने वाला है।</p>
<p>इसके सेवन से भयंकर दुःख शान्त हो जाते हैं। दुःख दरिद्रता का नाश हो जाता है, तथा तीनों प्रकार के ऋण दूर हो जाते हैं। यह परम गोपनीय तथा धन-धान्य और यश की वृद्धि करने वाला है। सब प्रकार के ऐश्वर्यो, समस्त सिद्धियों और सम्पूर्ण धर्मो को देने वाला है। इससे कोटि-कोटि तीर्थ, यज्ञ, तप, दान और ब्रतों का फल प्राप्त होता है। यह संसार की जडता दूर करने वाला और सब प्रकार की विद्याओं में प्रवृत्ति कराने वाला है। जो राज्य से भ्रष्ट हो गये हैं, उन्हें यह राज्य दिलाता और रोगियों के सब रोगो कों हर लेता है। इतना ही नहीं, यह स्तोत्र वन्ध्या स्त्रियों कों पुत्र और रोग से क्षीण हुए पुरुषों को तत्काल जीवन देने वाला है।</p>
<p>यह परम पवित्र, मंगलमय तथा आयु बढ़ाने वाला है। एक बार भी इसका श्रवण, पठन अथवा जप करने से अंगों सहित सामपूर्ण वेद, कोटि-कोटि मन्त्र, पुराण, शास्त्र तथा स्मृतियों का श्रवण और पाठ हो जाता है ।</p>
<p>प्रिये ! जो इसके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षर का भी नित्य जप या पाठ करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथ तत्काल सिद्ध हो जाते हैं। सब कार्यों की सिद्धि से शीघ्र विश्वास पैदा कराने वाला इसके समान दूसरा कोई साधन नहीं है।</p>
<p>कल्याणी ! तुम्हें इस स्तोत्र को सदा गुप्त रखना चाहिये और अपने अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिये केवल इसी का पाठ करना चाहिये। जिसका हृदय संशय से दूषित हो, जो भगवान्‌ विष्णु का भक्त न हो, जिसमें श्रद्धा और भक्ति का अभाव हो तथा जो भगवान्‌ विष्णु को साधारण देवता समझता हो, ऐसे पुरुष कों इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो अपना पुत्र, शिष्य अथवा सुद्दद हो, उसे उसका हित करने की इच्छा से इस श्रीविष्णुसहस्ननाम का उपदेश देना चाहिये। अल्पबुद्धि पुरुष इसे नहीं ग्रहण करेंगे।</p>
<p>देवर्षि नारद मेरे प्रसाद से कलियुग में तत्काल फल देने बाले इस स्तोत्र को ग्रहण करके कल्पप्राम (कलापग्राम ) में ले जायेंगे, जिससे भाग्यहीन लोगों का दुःख दूर हो जायगा | भगवान्‌ विष्णु से बढ़कर कोई धाम नहीं है, श्रीविष्णु से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है, श्रीविष्णु से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और श्रीविष्णु से भिन्न कोई मन्त्र नहीं है। भगवान्‌ श्रीविष्णु से भिन्न कोई सत्य नहीं है, श्रीविष्णु से बढ़कर जप नहीं है, श्रीविष्णु से उत्तम ध्यान नहीं है तथा श्रीविष्णु से श्रेष्ठ कोई गति नहीं है। जिस पुरुष की भगवान्‌ जनार्दन के चरणों में भक्ति है, उसे अनेक मन्त्रों के जप, बहुत विस्तार वाले शास्त्रों के स्वाध्याय तथा सहस्त्रों बाजपेय यज्ञों के अनुष्ठान करने की क्या आवश्यकता है ? मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, भगवान्‌ विष्णु सर्वतीर्थमय हैं, भगवान्‌ विष्णु सर्वशास्त्रमय हैं तथा भगवान्‌ विष्णु सर्वयज्ञमय हैं। यह सब मैंने सम्पूर्ण विश्व का सर्वस्वभूत सार-तत्त्व बतलाया है।</p>
<p><strong>पार्वती बोलीं &#8211; </strong>जगत्पते ! आज मैं धन्य हो गयी। आपने मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया। मैं कृतार्थ हो गयी, क्योंकि आपके मुख से यह परम दुर्लभ एवं गोपनीय स्तोत्र मुझे सुनने को मिला है। देवेश ! मुझे तो संसार की अवस्था देखकर आश्चर्य होता है।</p>
<p>हाय ! कितने महान्‌ कष्ट की बात है कि सम्पूर्ण सुखों के दाता श्रीहरि के विद्यमान रहते हुए भी मूर्ख मनुष्य संसार में कष्ट उठा रहे हैं। भला, लक्ष्मी के प्रियतम भगवान्‌ मथुसूदन से बढ़कर दूसरा कौन देवता है। आप-जैसे योगीश्वर भी जिनके तत्त्व का निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, उन श्रीपुरुषोत्तम से बड़ा दूसरा कौन-सा पद है।</p>
<p>उनको जाने बिना ही अपने को ज्ञानी मानने वाले मूढ़ मनुष्य दूसरे किस देवता की आराधना करते हैं।</p>
<p>अहो ! सर्वेश्वर भगवान्‌ विष्णु सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओं से भी उत्तम हैं।</p>
<p>स्वामिन! जो आपके भी आदिगुरु हैं, उन्हें मूढ़ मनुष्य सामान्य दृष्टि से देखते हैं; किन्तु प्रभो ! सर्वेश्वर ! यदि मैं अर्थ-कामादि में आसक्त होने या केबल आप में ही मन लगाये रहने के कारण अथवा प्रमादवश ही समूचे सहस्ननामस्तोत्र का पाठ न कर सकूँ, तो उस अवस्था में जिस किसी भी एक नाम से मुझे सम्पूर्ण सहस्ननाम का फल प्राप्त हो जाय, उसे बताने की कृपा कीजिये।</p>
<p><strong>महादेवजी बोले</strong> &#8211; सुमुखे ! मैं तो <strong>राम ! राम ! राम !</strong> इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्रीरामनाम में ही निरन्तर रमण किया करता हूँ। रामनाम सम्पूर्ण सहस्त्र नाम के समान हैं ।</p>
<p>पार्वती ! यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र भी प्रतिदिन विशेष रूप से इस श्रीविष्णुसहस्ननाम का पाठ करें तो वे धन-धान्य से युक्त होकर भगवान्‌ विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं।</p>
<p>देवि! जो लोग पूर्वोक्त अंगन्यास से युक्त श्रीविष्णुसहस्ननाम का पाठ करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरूष अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं । सुमुखि ! बार-बार बहुत कहनेसे क्&#x200d;या लाभ; थोड़े में इतना ही जान ले कि भगवान्‌ विष्णु का सहस्ननाम परम मोक्ष प्रदान करने बाला है। इसके पाठ में उताबली नहीं करनी चाहिये। यदि उत्तावली की जाती है, तो आयु और धन का नाश होता है। इस पृथ्वी पर जम्बूद्वीप के अंदर जितने भी तीर्थ हैं, वे सदा बहीं निवास करते हैं, जहाँ श्रीविष्णुसहस्ननाम का पाठ होता है। जहाँ श्रीविष्णुसहस्ननाम की स्थिति होती है, वहीं गंगा, यमुना, कृष्णबेणी, गोदावरी, सरस्वती और समस्त तीर्थ निवास करते हैं। यह परम पवित्र स्तोत्र भक्तों कों सदा प्रिय है। भक्तिभाव से भावित चित्त के द्वारा सदा ही इस स्तोत्र का चिन्तन करना चाहिये ।</p>
<p>जो मनीषी पुरुष परम उत्तम श्रीविष्णुसहस्ननामस्तोत्र का पाठ करते हैं, ये सब पापों से मुक्त होकर श्रीहरि के समीप जाते हैं। जो लोग सूयोदय के समय इसका पाठ और जप करते हैं, उनके बल, आयु और लक्ष्मी की प्रतिदिन वृद्धि होती है। एक-एक नाम का उच्चारण करके श्रीहरि को तुलसीदल अर्पण करने से जो पूजा सम्पन्न होती है, उसे कोटि यज्ञॉ की अपेक्षा भी अधिक फल देने वाली समझना चाहिये | पार्वती ! जो द्विज रास्ता चलते हुए भी श्रीविष्णुसहस्ननाम का पाठ करते हैं, उन्हें मार्गजनित दोष नहीं प्राप्त होते। जो लोग भगवान्‌ केशव के इस माहात्य का श्रवण करते हैं, वे मनुष्यो में श्रेष्ठ, पवित्र एवं पुण्यस्वरूप हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<hr />
<p><strong>स्रोत</strong> &#8211; श्रीमदपद्मपुराण, उत्तरखंड, नाम कीर्तन की महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनाम स्रोत्र का वर्णन<br />
<strong>दंडवत आभार</strong> &#8211; श्रीगीताप्रेस द्वारा उपलब्ध संक्षिप्त श्रीमदपद्मपुराण, पेज संख्या 611 से लेकर 694 तक</p>
<p>&nbsp;</p>
<hr />
<p><strong>FAQs &#8211;</strong></p>
<h4>सबसे अच्छा सहस्रनाम कौन सा है?</h4>
<p>सभी सहस्रनाम अच्छे है, किसी में किंचित मात्र भेद नहीं करना चाहिए। फिर यह तो श्री महादेव के श्रीमुख से प्रकट हुआ है।</p>
<h4>मूल विष्णु सहस्रनाम कौन सा है?</h4>
<p>अगर पद्मपुराण में श्रीमहादेव स्वयं अपने मुख से माता पार्वती को बता रहे है तो उसमे किसी भी प्रकार का भेद नहीं करना चाहिए।</p>
<h4>विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ने से क्या होता है?</h4>
<p>श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का महत्त्व स्वयं शिव जी ने नारद भगवान् को बताया है, आप ऊपर पढ़ सकते है।</p>
<h4>क्या महिलाएं विष्णु सहस्रनाम का जाप कर सकती हैं?</h4>
<p>बिल्कुल, कोई भी कर सकता है, अगर एकादशी व्रत के दौरान ऐसा किया जाए तो फिर कहना ही क्या।</p>
<h4>विष्णु सहस्रनाम का पाठ कब करना चाहिए?</h4>
<p>किसी भी व्रत के दौरान जैसे कि कृष्णजन्माष्टमी, एकादशी, सत्यनराणाय व्रत, रामनवमी इतियादी के दिन कर सकते है।</p>
<h4>कौन सा सहस्रनाम सबसे शक्तिशाली है?</h4>
<p>सभी सहस्रनाम शक्तिशाली होते है, बस आपको अपने इष्ट पर आपका भरोसा होना चाहिए।</p>
<h4>मैं मदद के लिए भगवान विष्णु को कैसे बुलाऊं?</h4>
<p>आप गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ ह्रदय से कर लीजिये। उन्हें अपने पिता की भांति पुकारिये जैसे एक बच्चा कुए में गिर जाता है और सहायता के लिए अपने पिता और माता को पुकारता है। अगर आप धर्म, सत्य के लिए पुकार रहे है तो वे अवश्य किसी न किसी रूप में सहायता भेज देंगे, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।</p>
<h4>विष्णु सहस्रनाम किसने लिखा था?</h4>
<p>विष्णु सहस्रनाम या स्तोत्र ऋषि व्यास द्वारा मानव कल्याण के लिए लिखा गया है, जिसका वर्णन स्वयं देवाधि देव महादेव ने किया है।</p>
<h4>क्या हम विष्णु सहस्रनाम रोज पढ़ सकते हैं?</h4>
<p>अगर ऐसा कर सकते है तो आप स्वयं विष्णु भगवान और श्री शिव जी के प्रिय बन जाएंगे, ऐसा मेरा भाव या विचार है। आपको उनके माहात्म्य के अनुसार पूर्ण फल प्राप्त होगा।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/shree-vishnu-sahastranaam-hindi-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/shri-vishnu-sahastranam-ka-fal.jpg?fit=800%2C533&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/shri-vishnu-sahastranam-ka-fal.jpg?fit=800%2C533&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">530</post-id>	</item>
		<item>
		<title>जब श्री हनुमान जी की पूंछ टूट गयी ?</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/hanuman-tail-broke-fainted/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/hanuman-tail-broke-fainted/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 May 2026 02:43:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आनंद रामायण]]></category>
		<category><![CDATA[Shri-Hanuman-Ji]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=156</guid>

					<description><![CDATA[हनुमान जी की पूँछ &#8211; समुद्र ने श्री राम को सेतु बनाने का आग्रह किया और राम को नमस्कार करके समुद्र अदृश्य हो गए। और…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हनुमान जी की पूँछ</strong> &#8211; समुद्र ने श्री राम को सेतु बनाने का आग्रह किया और राम को नमस्कार करके समुद्र अदृश्य हो गए। और फिर रघुनन्दन राम ने नल कों सेतु बांधने की आज्ञा दी। सेतु बाँधते समय पहले गणेशजी की स्थापना की गयी, उसके पश्चात नवग्रहों की पूजा के लिए नल के हाथ से नौ पाषाणों की समुद्र में स्थापना करवाई गयी।</p>
<p>इसके बाद श्री राम ने कहा &#8211; कि यहाँ मैं अपने नाम से सागर के संगम पर उत्तम शिवलिंग की स्थापना करूँगा, ऐसा निश्चय करके राम ने मारुतिनंदन से कहा। &#8211; हे हनुमान तुम काशी जाकर शिव जी से एक उत्तम शिवलिंग मुहूर्त्तमात्र में मांग ले आओ। नहीं तो मेरा यह शुभ मुहूर्त निकल जायेगा।</p>
<p>राम की आज्ञा सुनकर हनुमान ने &#8216;तथास्तु! कहा और क्षणभर में उड़कर आकाश मार्ग से ( शिवकी ) वाराणसी ( काशी ) नगरी में आ गये। वहाँ आकर उन्होंने मुझको (शिव जी को) नमस्कार करके राम के कार्य के लिये निवेदन किया।</p>
<p>हे देवि ! उस निवेदन कों सुनकर मैंने रामके लिए हनुमान कों दो उत्तम लिंग दिये और कहा कि हे कपि ! मैने भी दक्षिण दिशा में जाने का वहुत दिनों से निश्चय<br />
कर रखा है</p>
<p>यह निश्चय अगस्त्य मुनि के साथ हुआ था। पर बाद में सोचा कि जब विशेष-रूप से राम की आज्ञा होगी, तभी जाऊँगा ।</p>
<p>मेरे मुख से यह सुनकर मारुति ने मुझसे फिर प्रश्न किया-</p>
<p>आपने पहले कब और कहाँ पर कुम्भजन्म ( अगस्त्य ) के साथ यह निश्चय किया था? यह सब हाल कृपा करके कहें !</p>
<p>मारुति की बात सुनकर मैने कहा&#8211;हे मारुते ! मैं तुमको पृव॑वृत्तान्त बताता हूँ &#8211;</p>
<p>एक समय श्रीमान्‌ नारद मुनि नर्मदा नदी के पवित्र जल में स्नान करके समस्त देहधारी प्राणियों को सव कुछ देने वाले ओंमकारेश्वर शिव की पूजा करके जा रहे थे। रास्ते में संसार भर के ताप को दूर करने वाला विंध्यपर्वत सामने दिखाई दिया। नारद को देखकर वह पर्वत सामने आया तथा उन्हें अपने घर पर ले जाकर सादर विधिवत पूजन किया। नारदजी का श्रम दूर हो जाने पर विंध्याचल पर्वत विनम्र होकर कहने लगा कि आपके चरण रज से मेरा पाप नष्ट हो गया।</p>
<p>है महामुनि ! आपके दैहिक तेज के संसर्ग से अनेक मनोव्यथा पैदा करने वाला मेरे हृदय का अन्धकार दूर हो गया। आज मेरे लिए बड़ा शुभ दिन है। आज से मै पर्वतो में माननीय पर्वत माना जाऊँगा। यह सुनकर मुनि ने कुछ लम्बी साँस ली ।</p>
<p>यह देखा तो घबराकर पर्वत ने कहा &#8211; हें सब अर्थो को जानने वाले ब्राह्मण ! इस उच्छवास का क्&#x200d;या कारण है? आपके हृदय का खेद मैं क्षण भर में समाप्त कर दूँगा,</p>
<p>पूर्व पुरुषो ने मेद आदि सब पर्वर्तों को मिलाकर पृथ्वी को धारण करने में समर्थ बतलाया है, पर मैं अकेला ही उसको धारण कर सकता हूँ। अभी गौरी का पिता होने से, तथा पशुपति शिव का सम्बन्धी होने के कारण केवल हिमालय ही सज्जनों के मान का पात्र है, मेरी समझ में तो सोने से भरा हुआ तथा रत्नमय शिखरों वाला तथा देवताओं का निवास स्थान होने पर भी मेरू विशेष माननीय नहीं है , क्या पृथ्वी कों धारण करने-वाले अन्य सैकड़ो पर्वत इस संसार में नहीं हैं? क्या वे सभी पर्वत सज्जनों के मान्य हैं ? नहीं, यदि हैं भी तो केवल अपने-अपने स्थानों पर। जैसे कि &#8211;</p>
<p>उदयाचल मन्द है। वह राक्षसों को आश्रय देनेकी कृपा करने में ही समर्थ है।</p>
<p>निषधगिरि औषधिमात्र घारण करता है,</p>
<p>अस्ताचल निश्तेज हो गया हैं,</p>
<p>नीलगिरि नीले पत्थरो का समूह मात्र है,</p>
<p>मन्दराचल मन्ददृष्टि है,</p>
<p>मल्य पर्वत सर्पों का घर है,</p>
<p>रैवत पर्वत निर्धन है,</p>
<p>हेमकूट तथा त्रिकूट आदि केवल कूट उत्तरपद वाले ही हैं,</p>
<p>किष्किंधा, क्रोंच और सहद्य पव॑त भी पृथ्वी के बोझ धारण करने में समर्थ नहीं हैं।</p>
<p>विन्ध्याचल की इस वात को सुनकर नारद के मन में विचार किया कि गर्वीला प्राणी महत्त्व के योग्य नहीं होता। क्या इस संसार में श्रीशैल आदि पर्वत निर्मल,कान्ति-संपन्न तथा यशस्वी नहीं हैं ? जिनके शिखर को देखने मात्र से शुद्ध अन्तःकरण वाले महान्‌ पुरुषों कों मुक्ति मिल जाती है ।</p>
<p>अतएव आज इसके बल की परीक्षा करनी चाहिए । ऐसा विचार करके नारद मुनि ने कहा&#8211; तुमने पर्वतों के बल का ठीक वर्णन किया है, पर पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुपर्वत तुम्हारा अपमान करता है। वह तुमसे भी अपने को बढ़कर मानता है। बस, यही कारण है कि मैने लम्बा श्वास लिया था और यह बात तुमसे कह दी, हम जैसे महात्माओं कों इस बात की क्या चिंता है। तुम्हारा कल्याण हो! इतना कहकर वे व्योम मार्ग से चले गये।</p>
<p>नारद मुनि के चले जाने पर अतिशय चिन्ताकुल होकर कर विंध्यपर्वत ने अपने आपकी बड़ी निंदा की और सोचने लगा कि मेरु की इतनी बड़ी महिमा क्यों है ?</p>
<p>ग्रहो तथा नक्षत्रों सहित सूर्यनारायण प्रतिदिन उसकी परिक्रमा करते हैं। सम्भवतः इसी से उसको अपने महत्त्व अभिमान है, ऐसा निश्चय करके विन्ध्याचल ने उसकी समृद्धि देखने की इच्छा से अपना शरीर बहुत ऊपर को बढ़ाया और सूर्य के रास्ते को रोककर आकाशरूपी आँगन में खड़ा हो गया</p>
<p>प्रातःकाल जब सूर्य ने दक्षिण दिशा की ओर जाने कों प्रस्थान किया। तव रास्ता रुका देखकर उनका ताप वहीं रुक गया | जब बहुत दिन बीत गये, तव सूर्य के प्रचण्ड ताप से पूर्व तथा उत्तर दिशा के लोग जलने लगे। इधर दक्षिण दिशा के लोगों की आँखें निद्रा से मुँदी रहों। वे जब भी देखते तो आकाश में ग्रह और नक्षत्र ही विद्यमान दिखायी देत थे, लोगो की दशा देख तीनो लोक काँप उठे इसके पश्चात्‌ ब्रह्माजी के कहने से देवताओं ने जाकर विन्ध्य पर्वत के गुरु अगस्त्य मुनि से प्रार्थना की। तब मुनि घबराकर यहाँ काशी में आये</p>
<p>मैंने (शिवजीने) अगस्त्य मुनि से कहा कि तुम दक्षिण दिशा की ओर जाओ । वहाँ जाकर विंध्याचल को अपने बांग्जाल में बाँघकर निश्चिन्त भाव से मेरा भजन करना, कालांतर में मैं भी तुम्हारा खेद दूर करने के लिए सेतुबन्ध पर राम को पूजा प्राप्त करने के लिए शीघ्र ही दक्षिण प्रदेश में आऊँगा</p>
<p>मेरे इस कथन कों सुनकर अगस्त्य मुनि प्रसन्नतापूर्वक उसी समय काशी छोड़कर अपनी स्त्री लोपामुद्रा के साथ विन्ध्यपर्वत की ओर चल पड़े, सपत्नी मुनि कों देखकर विंध्याचल काँपने लगा और मानो पृथ्वी में घुस जाना चाहता हो, इस प्रकार अतिशय छोटा रूप घारण करके बोला कि मैं आपका दास हूँ। मुझे कुछ आज्ञा देने की कृपा करें। विन्ध्य की बात सुनकर अगस्त्य मुनि बोले &#8211; विन्ध्य ! तुम बुद्धिमान्‌ हो और मुझे भली भांति जानते हो, अतः जब तक मैं उधर से लौटकर पुनः यहाँ न आ जायु तब तक यहाँ वामन रूप में नीचा सिर किये खड़े रहो ।</p>
<p>इतना कहकर अगस्त्य दक्षिण की ओर चले गये । तब कम्पित होकर विन्ध्य ने कहा कि आज के दिन मेरा पुनर्जत्म हुआ है। बारह वर्ष बाद जब उसने सिर उठाकर दक्षिण की ओर देखा तो मुनि नहीं दिखायी दिये।</p>
<p>तब फिर उसने वैसे ही नीचा सिर कर लिया, आज, कल या परसो तक मुनि कों यहाँ अवश्य आ जाना चाहिये । इस प्रकार सोचता हुआ विन्ध्य बड़ी चिन्ता करने लगा।</p>
<p>पर न वे मुनि आज तक आये ओर न पर्वत खड़ा हुआ । काल की गति को जानने वाले सूर्य के सारथी अरुण ने उसी समय अपने घोड़ों को हाँक दिया। तब सूर्य के संचार से सब लोग पूर्ववत पुनः स्वस्थ हुए । वे अगस्त मुनि दण्डकवन में जाकर मेरे वचन का स्मरण करते हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं।</p>
<p>इस कारण हे कपि हनुमान ! मैं वहां अवश्य जाऊँगा । है देवि | इतना कहकर मैने मारुति को काशी से विदा किया। तब मारुति शीघ्र आकाशमार्ग से राम के पास चले । उस समय मेरे दो लिंग प्राप्त करके उनके मन में अभिमान हुआ।</p>
<p>राम ने इस गर्व कों जान लिया और सुग्रीव आदि से कहा कि प्रतिष्ठा का मुहूर्त बीता जा रहा है। इसलिए मैं बालू का लिंग बनाकर सेतु के इस छोर पर स्थापित किये देता हूँ । उसके बाद सब मुनियों और वानरों कों बुलाकर राम ने विधिवत्‌ बालू के लिंग को स्थापित कर दिया। उसके बाद भगवान् राम ने कोस्तुभ मणि का स्मरण किया।</p>
<p>स्मरण करते ही करोड़ों सूर्य के समान प्रभाशाली मणि आकाश मार्ग से आ गया। तब रघुनन्दन रा्म ने उस मणि कों कंठ में बांध लिया।</p>
<p>उस मणि से प्राप्त धन, वस्त्र, आभरण, अश्व, घेनु, दिय्य पकवान तथा पायस आदि से राम ने मुनियों का पूजन-सत्कार किया। श्रीराम से पूजा प्राप्त करके प्रसन्न वे मुनि अपने-अपने आश्रमों कों जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें मारुति ने देख लिया, तब हनुमान ने उनसे पूछा कि आपकी पूजा किसने की है ? उन्होंने उत्तर दिया कि राम ने शिवलिंग की आराधना तथा स्थापना करके हम लोगों को पूजा की है। हनुमान ने उनकी बात सुनी तो कुद्ध होकर विचारने लगे कि राम ने आज मुझसे व्यर्थ इतना परिश्रम कराके ठगा है।</p>
<p>यह विचारते हुए वे कोप से राम के पास गये और जोर से उन्होंने अपने दोनों पाँवों कों जमीन पर पटका | इससे उनके दोनों पाँव पृथ्वी में धँस गये । हनुमान ने राम से कहा कि क्&#x200d;या आपको मेरा स्मरण नहीं था ?</p>
<p>जिस हनुमान ने लंका मे सीता की खोज की थी और लौटकर आपको उनकी खबर दी थी। उसी हनुमान कों आज आपने काशी भेजकर ऐसा उपहास किया ? यदि आपके मन में यही था तो फिर मुझे इस तरह क्यों सताया ? यदि मुझे आपका अभिप्राय ज्ञात हो जाता तो मैं कभी काशी जाकर दो-दो शिवलिग न लाता।</p>
<p>इनमे से एक आपके लिए और दूसरा उत्तम शिवलिंग अपने लिये ले आया हूँ । अब मैं इस आप वाले शिवलिंग का क्या करूँ?</p>
<p>इस प्रकार कुछ क्रोध तथा गर्व युक्त हनुमान का वाक्य सुनकर राम ने कहा कि हे कपि ! तुम्हारा कहना सत्य है। अब तुम यदि इस मेरे स्थापित लिंग को हटा दो तो मै तुम्हारे कांशी से लाये हुए विश्वेश्वरलिंग को यहाँ स्थापित कर दूँ।</p>
<p>“बहुत अच्छा&#8217; कहकर हनुमान ने उस बालू के लिंग के ऊपरी भाग में पूंछ लपेडकर बारम्बार खूब जोर से हिलाया, जिससे सहसा हनुमान जी की पूँछ टूट गयी । वे जमीन पर गिर पड़े ओर मूर्छित हो गये । परन्तु बालू का लिंग तनिक भी नहीं हिला ।</p>
<p>यह देखकर सब वानर हँसने लगे,अतः बुद्धिमान श्री हनुमान जी सब समझ गए, और गर्व त्यागकर भक्ति से श्रीराम को नमस्कार करके प्रार्थना करने लगे &#8211;</p>
<p>है राम! मेरा जो अपराध हुआ हो, उसे क्षमा करें। क्योंकि आप कृपानिधि हैं। तदनन्तर राम ने कहा- हे मारुति ! तुम मेरे स्थापित लिंग से उत्तर की ओर इसे विश्वनाथ नाम के अपने लिए लाये लिंग वहां कों स्थापित करो ।</p>
<p>“तथास्तु” कहकर मारुति ने सादर ते सादर शिवलिंग की स्थापना कर दी</p>
<p>तब राम ने उस मारुतिलिंग को बरदान देते हुए कहा &#8211; हे मारुते ! तुम्हारे द्वारा स्थापित विश्वनाथलिंग की पूजा किये बिना जो सेतुबंधरामेश्वर की पूजा करेगा, उसकी पूजा व्यर्थ हो जायगी</p>
<p>इतना कहकर राम ने फिर हनुमान से कहा कि जो तुम मेरे लिए उत्तम लिंग लाये हो लेकिन यह बहुत कालतक यह उत्तम लिंग घरती पर अपूजित ही रहेगा लेकिन आगे चलकर बंहुत दिनों बाद उसकी भी मैं अवश्य स्थापना करूँगा । वह लिंग अभी भी वहाँ विश्वेश्वरलिंग के पास रखा हुआ है। न अभी उसकी प्रतिष्ठा हुई हैं और न कोई उसकी पूजा ही करता है ।</p>
<p>राम ने फिर हनुमान से कहा कि तुम्हारी पूँछ यहीं पर छिश्न हुई है । अतः तुम बहीं पर भूमि में छिन्न पुच्छ तथा गुप्तपाद होकर अपने गर्व का स्मरण करते हुए पड़े रहो । तब हनुमान ने अपने अंश से वहीं अपनी मूर्ति स्थापित कर दी</p>
<p>अभी भी वहाँ हनुमान की छिन्नपुच्छ और गुप्त पाँव की मूर्ति विद्यमान है। जहाँपर मारुति मूृछित होकर गिरे थे, वह उत्तम स्थान मारुति के नाम से पवित्र तथा पापों कों नष्ट करने वाला तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। वहाँ ही राम ने भी अपने नाम से एक उत्तम तीर्थ बनाया। राम ने वहाँ अपने अंश की एक मूर्ति भी स्थापित कर दी। सेतु-माघव नाम की वह मूर्ति अभी भी वहां प्रस्तुत है ॥ उसके पश्चात्‌ राम ने अपने हाथ से छूकर हनुमान की पूंछ को पूर्ववत सुन्दर तथा हढ़ सन्धियुक्त बनाकर हनुमान कों प्रसन्न कर दिया ।</p>
<p>पूंछ से लपेटे जाने के कारण रामेश्वर का मस्तक कुछ दब गया था॥ वह शिवमस्तक अभी भी बैसा ही चिपटा है। तब से हनुमान राम के समक्ष सर्वधा गर्व रहित हो गये।</p>
<p>बोलो <strong>जय सीतारामभ्यम नमः, जय श्री हनुमते नमः</strong></p>
<p>स्रोत &#8211;<a href="https://www.mahapuran.com/category/ramayan/shrimadanandramayan/">श्रीमदआनंदरामायण</a>/ <a href="https://amzn.to/3JnX3pu" target="_blank" rel="noopener">श्रीआनंदरामायण</a>, सर्ग &#8211; 10, पेज 108 (श्री गीताप्रेस)</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/hanuman-tail-broke-fainted/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2026/05/hanuman-story-poochh-toot-gyi.jpg?fit=800%2C600&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2026/05/hanuman-story-poochh-toot-gyi.jpg?fit=800%2C600&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">156</post-id>	</item>
		<item>
		<title>पुरुषोत्तम मास शुक्ल पक्ष की कमला एकादशी का माहात्म्य</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/kamala-ekadashi-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/kamala-ekadashi-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 09:55:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[माहात्म्य]]></category>
		<category><![CDATA[व्रत]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीमद पद्मपुराण]]></category>
		<category><![CDATA[एकादशी]]></category>
		<category><![CDATA[पुरुषोत्तम मास]]></category>
		<category><![CDATA[शुक्ल पक्ष]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=503</guid>

					<description><![CDATA[The Story of Kamala Ekadashi, which falls during Adhik Maas—also known as the Purushottam Month. युधिष्ठिर ने पूछा &#8211; भगवन्‌ ! अब मैं श्रीविष्णु के…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>The Story of Kamala Ekadashi, which falls during Adhik Maas—also known as the Purushottam Month.</strong></p>
<p><strong>युधिष्ठिर ने पूछा</strong> &#8211; भगवन्‌ ! अब मैं श्रीविष्णु के व्रतों में उत्तम व्रत का, जो सब पापों को हर लेने वाला तथा व्रती मनुष्यों को मनोवांछित फल देने वाला हो, श्रवण करना चाहता हूँ।</p>
<p>जनार्दन! पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) की एकादशी की कथा कहिए, उसका क्या फल है ? और उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है?</p>
<p>प्रभो ! किस दान का क्या पुण्य है? मनुष्यों को क्या करना चाहिए? उस समय कैसे स्नान किया जाता है ? किस मन्त्र का जप होता है ? कैसी पूजन-विधि बताई गई है ?</p>
<p>पुरुषोत्तम ! पुरुषोत्तम मास में किस अन्न का भोजन उत्तम है ?</p>
<p><strong>भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले</strong> &#8211; राजेद्र ! <strong>अधिक मास आने पर जो एकादशी होती है, वह कमला एकादशी नाम से प्रसिद्ध है।</strong> यह तिथियों में उत्तम तिथि है। उसके व्रत के प्रभाव से लक्ष्मी अनुकूल होती हैं। उस दिन ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर भगवान्‌ पुरुषोत्तम का स्मरण करे और विधिपूर्वक स्नान करके व्रती पुरुष व्रत का नियम ग्रहण करे । घर पर जप करने का एक गुना, नदी के तट पर दूना, गौशाला में सहस्त्रगुना, अग्निहोत्र गृह में एक हजार एक सौ गुना, शिव के क्षेत्रॉ में, तीथॉ में, देवताओं के निकट तथा तुलसी के समीप लाख गुना और भगवान्‌ विष्णु के निकट अनन्त गुना फल होता है।</p>
<p>अवन्तीपुरी में शिवशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, उनके पाँच पुत्र थे । इनमें जो सबसे छोटा था, वह पापाचारी हो गया; इसलिए पिता तथा स्वजनों ने उसे त्याग दिया। अपने बुरे कर्म के कारण निर्वासित होकर वह बहुत दूर वन में चला गया । दैवयोग से एक दिन वह तीर्थराज प्रयाग में जा पहुँचा। भूख से दुर्बल शरीर और दीन मुख लिये उसने त्रिवेणी में स्नान किया । फिर क्षुधा से पीड़ित होकर वह यहाँ मुनियों के आश्रम खोजने लगा। इतने में उसे वहाँ हरिमित्र मुनि का उत्तम आश्रम दिखायी दिया। पुरुषोत्तम मास में वहाँ बहुत-से मनुष्य एकत्रित हुए थे। आश्रम पर पापनाशक कथा कहने वाले ब्राह्मणों के मुख से उसने श्रद्धापूर्वक कमला एकादशी की महिमा सुनी, जो परम पुण्यमयी तथा भोग और मोक्ष प्रदान तुलसी के समीप लाख गुना और भगवान्‌ विष्णु के निकट अनन्त गुना फल होता है।</p>
<p>अवन्तीपुरी में शिवशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, उनके पाँच पुत्र थे । इनमें जो सबसे छोटा था, वह पापाचारी हो गया; इसलिए पिता तथा स्वजनों ने उसे त्याग दिया। अपने बुरे कर्म के कारण निर्वासित होकर वह बहुत दूर वन में चला गया । दैवयोग से एक दिन वह तीर्थराज प्रयाग में जा पहुँचा। भूख से दुर्बल शरीर और दीन मुख लिये उसने त्रिवेणी में स्नान किया । फिर क्षुधा से पीड़ित होकर वह यहाँ मुनियों के आश्रम खोजने लगा।</p>
<p>इतने में उसे वहाँ हरिमित्र मुनि का उत्तम आश्रम दिखायी दिया। पुरुषोत्तम मास में वहाँ बहुत-से मनुष्य एकत्रित हुए थे। आश्रम पर पापनाशक कथा कहने वाले ब्राह्मणों के मुख से उसने श्रद्धापूर्वक कमला एकादशी की महिमा सुनी, जो परम पुण्यमयी तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है। जय शर्मा ने विधिपूर्वक कमला एकादशी की कथा सुनकर उन सबके साथ मुनि के आश्रम पर ही व्रत किया ।</p>
<p>जब आधी रात हुई तो भगवती लक्ष्मी उसके पास आकर बोलीं— &#8216;बृह्मन्‌! इस समय कमला एकादशी के व्रत के प्रभाव से मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ और देबाधिदेव श्रीहरि की आज्ञा पाकर बैकुण्ठधाम से आयी हूँ। मैं तुम्हें वर दूँगी।</p>
<p><strong>ब्राह्मण बोला</strong> &#8211; माता लक्ष्मी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो वह व्रत बताइए, जिसकी कथा-वार्ता में साधु-ब्राह्मण सदा संलग्न रहते हैं।<br />
लक्ष्मी ने कहा -ब्राह्मण ! एकादशी-व्रत का माहात्म्य श्रोताओं के सुनने योग्य सर्वोत्तम विषय है। यह पवित्र वस्तुओ में सबसे उत्तम है। इससे दुःस्वप्र का नाश तथा पुण्य की प्राप्ति होती है, अतः इसका यत्नपूर्वक श्रवण करना चाहिये । उत्तम पुरुष श्रद्धा से युक्त हो एक या आधे श्लोक का पाठ करने से भी करोड़ों महापातकों से तत्काल मुक्त हो जाता है। जैसे मासों में पुरुषोत्तम मास, पक्षियों में गरुड़ तथा नदियों में गंगा श्रेष्ठ हैं; उसी प्रकार तिथियों में द्वादशी तिथि उत्तम है । समस्त देवता आज भी [एकादशी व्रत के ही लोभ से] भारतवर्ष में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं।</p>
<p>देवगण सदा ही रोग-शोक से रहित भगवान्‌ नारायण का पूजन करते हैं। जो लोग मेरे प्रभु भगवान्‌ नारायण के नाम का सदा भक्तिपूर्वक जप करते हैं, उनकी ब्रह्मा आदि देवता सर्वदा पूजा करते हैं। जो लोग श्रीहरि के नाम-जप में संलग हैं, उनकी लीला-कथाओं के कीर्तन में तत्पर हैं तथा निरन्तर श्रीहरि की पूजा में ही प्रवृत्त रहते हैं; वे मनुष्य कलियुग में कृतार्थ हैं।</p>
<p>यदि दिन में एकादशी और द्वादशी हो तथा रात्रि बीतते-बीतते त्रयोदशी आ जाय तो उस त्रयोदशी के पारण में सौ यज्ञों का फल प्राप्त होता है। व्रत करने वाला पुरुष चक्र सुदर्शनधारी देवाधिदेव श्री विष्णु के समक्ष निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करके भक्ति भाव से संतुष्ट चित्त होकर उपवास करें। वह मन्त्र इस प्रकार है &#8211;</p>
<p><strong><em>एकादश्या निराहार:. स्थित्वाहमपरेSहनि ॥</em></strong><br />
<strong><em>भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत ॥</em></strong></p>
<p>कमलनयन ! भगवान्‌ अच्युत ! मैं एकादशी को निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप मुझे शरण दें।</p>
<p>तत्पश्चात्‌ व्रत करने वाला मनुष्य मन और इन्द्रियों को वश में करके गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण-पाठ आदि के द्वारा रात्रि में भगवान के समक्ष जागरण करें। फिर द्वादशी के दिन उठकर स्नान के पश्चात्‌ जितेन्द्रिय भाव से विधिपूर्वक श्री विष्णु की पूजा करे।</p>
<p>एकादशी को पंचामृत से जनार्दन को नहलाकर द्वादशी को केवल दूध में स्नान कराने से श्रीहरि का सायुज्य प्राप्त होता है। पूजा करके भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करे &#8211;</p>
<p><em><strong>अज्ञानतिमिरान्थस्या व्रतेनानेन. केशव ।</strong></em><br />
<em><strong>प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदों भव ॥</strong></em><br />
(६४। ३९)<br />
केशव ! मैं अज्ञानरूपी रतौंधी से अंधा हो गया हूँ। आप इस व्रत से प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करे।</p>
<p>तत्पश्चात्‌ व्रत करने वाला मनुष्य मन और इन्द्रियों को वश में करके गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण-पाठ आदि के द्वारा रात्रि में भगवान के समक्ष जागरण करें। फिर द्वादशी के दिन उठकर स्नान के पश्चात्‌ जितेन्द्रिय भाव से विधिपूर्वक श्री विष्णु की पूजा करे।</p>
<p>इस प्रकार देवताओं के स्वामी देवाधिदेव् भगवान्‌ गदाधर से निवेदन करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों कों भोजन कराये तथा उन्हें दक्षिणा दे। उसके बाद भगवान्‌ नारायण के शरणागत होकर बलि वैश्व देव की विधि से पञ्च महायज्ञों का अनुष्ठान करके स्वयं मौन हो अपने बन्धु- बान्धवों के साथ भोजन करे |</p>
<p>इस प्रकार जो शुद्ध भाव से पुण्यमय एकादशी का व्रत करता है, वह पुनरावृत्ति से रहित वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>भगवान्‌ श्री कृष्ण कहते हैं</strong> &#8211; राजन्‌ ! ऐसा कहकर लक्ष्मी देवी उस ब्राह्मण को वरदान दे अंतर्ध्यान हो गयीं। फिर वह ब्राह्मण भी धनी होकर पिता के घर पर आ गया। इस प्रकार जो कमला एकादशी का उत्तम व्रत करता है तथा एकादशी के दिन इसका माहात्म्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।</p>
<p>आगे &#8212; <a href="https://www.mahapuran.com/kamda-ekadashi-2/">पुरुषोत्तम मास कृष्णपक्ष की कामदा एकादशी का महात्म्य</a></p>
<hr />
<p>स्रोत &#8211; संक्षिप्त श्रीमद् पद्म पुराण &#8211; श्री गीताप्रेस द्वारा<br />
&#8211; उत्तरखंड<br />
&#8211; पुरुषोत्तम मास की कमला और कामदा एकादशी का माहात्म्य<br />
&#8211; पेज संख्या &#8211; ६७७</p>
<hr />
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>FAQs &#8211;</strong></p>
<h5>कमला एकादशी क्या है?</h5>
<p>अधिकमास में शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, वह कमला एकादशी कहलाती है।</p>
<h5>कमला एकादशी का दूसरा नाम क्या है?</h5>
<p>दूसरा नाम पद्मिनी एकादशी है।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/kamala-ekadashi-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/kamla-ekadashi-vrat-katha.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/kamla-ekadashi-vrat-katha.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">536</post-id>	</item>
		<item>
		<title>पुरुषोत्तम मास कृष्णपक्ष की कामदा एकादशी का महात्म्य</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/kamda-ekadashi-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/kamda-ekadashi-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 09:01:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[माहात्म्य]]></category>
		<category><![CDATA[व्रत]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीमद पद्मपुराण]]></category>
		<category><![CDATA[एकादशी]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्ण पक्ष]]></category>
		<category><![CDATA[पुरुषोत्तम मास]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=505</guid>

					<description><![CDATA[युधिष्ठिर बोले &#8211; जनार्दन ! पाप का नाश और पुण्य का दान करने वाली एकादशी के माहात्म्य का पुनः वर्णन कीजिये, जिसे इस लोक में…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>युधिष्ठिर बोले</strong> &#8211; जनार्दन ! पाप का नाश और पुण्य का दान करने वाली एकादशी के माहात्म्य का पुनः वर्णन कीजिये, जिसे इस लोक में करके मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा</strong> &#8211; राजन्‌ ! शुक्लपक्ष या कृष्णपक्ष में जब भी एकादशी प्राप्त हो, उसका परित्याग न करे, क्योंकि वह मोक्षरूप सुख को बढ़ाने वाली है। कलियुग में तो एकादशी ही भव-बन्धन से मुक्त करने वाली, सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओं को देने वाली त़था पापों का नाश करने वाली है। एकादशी रविवार को, किसी मंगलमय पर्व के समय अथवा संक्रान्ति के ही दिन क्यों न हो, सदा ही उसका व्रत करना चाहिये | भगवान्‌ विष्णु के प्रिय भक्तो को एकादशी का त्याग कभी नहीं करना चाहिये । जो शास्त्रोक्त विधि से इस लोक में एकादशी का व्रत करते हैं, ये जीवन्मुक्त देखे जाते हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।</p>
<p><strong>युधिष्ठिर ने पूछा</strong> &#8211; श्रीकृष्ण ! वे जीवन्मुक्त कैसे हैं ? तथा विष्णुरूप कैसे होते हैं ? मुझे इस विषय को जानने के लिए बड़ी उत्सुकता हो रही है।</p>
<p><strong>भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले</strong> &#8211; राजन्‌! जो कलियुग में भक्तिपूर्वक शास्त्रीय विधि के अनुसार निर्जल रहकर एकादशी का उत्तम व्रत करते हैं, वे विष्णुरूप तथा जीवन्मुक्त क्&#x200d;यों नहीं हो सकते हैं? एकादशी व्रत के समान सब पापों कों हरने वाला तथा मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला पवित्र व्रत दूसरा कोई नहीं है। दशमी को एक बार भोजन, एकादशी को निर्जल व्रत तथा द्वादशी को पारण करके मनुष्य श्रीविष्णु के समान हो जाते हैं।</p>
<p><strong>पुरुषोत्तम मास के द्वितीय पक्ष की एकादशी का नाम कामदा है।</strong> जो श्रद्धापूर्वक कामदा के शुभ व्रत का अनुष्ठान करता है, वह इस लोक और परलोक भी मनोवाज्छित वस्तु को पाता है। यह कामदा पवित्र, पावन, महापातक नाशिनी तथा व्रत करने वालों को भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली है।</p>
<p>नृपश्रेष्ठ ! कामदा एकादशी कों विधि-पूर्वक पुष्प, धूप, नैवेद्य तथा फल आदि के द्वारा भगवान्‌ पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिये। व्रत करने वाला वैष्णव पुरुष दशमी तिथि कों काँस के बर्तन, उड़द, मसूर, चना, कोदो, साग, मधु, पराया अन्न, दो बार भोजन तथा मैथुन। इन दशो का परित्याग करें।</p>
<p>इसी प्रकार चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध और असत्य-भाषण&#8211;इन ग्यारह दोषों कों त्याग दे तथा द्वादशी के दिन काँस का बर्तन, उड़द, मसूर, तेल, असत्य-भाषण, व्यायाम, परदेश गमन, दो बार भोजन, मैथुन, बैल की पीठ पर सवारी, पराया अन्न तथा साग। इन बारह वस्तुओं का त्याग करे।</p>
<p>राजन! जिन्होंने इस विधि से पुरुषोत्तम कामदा एकादशी का व्रत किया और रात्रि में जागरण करके श्री पुरुषोत्तम की पूजा की है, वे सब पापों से मुक्त हो परम गति को प्राप्त होते हैं। इसके पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<hr />
<p>स्रोत &#8211; श्री गीताप्रेस द्वारा <strong>संक्षिप्त पद्मपुराण</strong><br />
-उत्तरखंड<br />
-पुरुषोत्तम मास की कमला और कामदा एकादशी का माहात्म्य &#8211; पेज संख्या ६७९</p>
<hr />
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/kamda-ekadashi-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/mal-mas-me-kamda-ekadashi-katha.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/mal-mas-me-kamda-ekadashi-katha.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">537</post-id>	</item>
		<item>
		<title>कार्तिक मास द्वादशी तिथि का महात्म्य</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/dwadashi-tithi-in-kartik/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/dwadashi-tithi-in-kartik/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 May 2026 14:25:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[माहात्म्य]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीमद पद्मपुराण]]></category>
		<category><![CDATA[कार्तिक]]></category>
		<category><![CDATA[द्वादशी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/?p=2020</guid>

					<description><![CDATA[The Significance of the Dwadashi Tithi in the Month of Kartik ब्रह्माजी कहते हैं — जो पुरुष कार्तिक मास में प्रतिदिन पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h2>The Significance of the Dwadashi Tithi in the Month of Kartik</h2>
<p>ब्रह्माजी कहते हैं — जो पुरुष कार्तिक मास में प्रतिदिन पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा अथवा पञ्चरात्र आगम में बतायी हुई विधि के अनुसार भगवान् विष्णु का पूजन करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। जो कार्तिकमें ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्र से श्रीहरि के आराधन करता है, वह नरक के दुःखों से मुक्त हो, रोग-शोक से रहित वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होता है। कार्तिक मास में जो मनुष्य विष्णु सहस्रनाम तथा गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करता है, उसे फिर संसार में जन्म नहीं होता।<br />
सुनो। जो कार्तिक मास में रात्रि के पिछले भाग में भगवान की स्तुतिका गान करता है, वह प्रियो सहित श्वेतद्वीप में निवास करता है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि के शंखासुर दैत्य मारा गया है। अतः उसी दिन से आरम्भ करके भगवान् चार मास तक क्षीरसागर में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इस कारण वैष्णवों को एकादशी के निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करके भगवान को जगाना चाहिये—</p>
<p><em><strong>उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज।</strong></em><br />
<em><strong>उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमंगलम् कुरु॥</strong></em></p>
<p>हे गोविन्द! उठिये, उठिये, हे गरुडध्वज! उठिये, हे कमलाकान्त! त्रिलोक का मंगल कीजिये।</p>
<p>ऐसा कहकर प्रातःकाल शंख आदि नगाड़े आदि बजवाये वीणा, वेणु और मृदंग आदि मधुर ध्वनि के साथ नृत्य-गीत और कीर्तन आदि करे। देवेश्वर श्रीविष्णु को उठाकर उनकी पूजा करे और सायंकाल में तुलसी की वैवाहिक विधि के सम्पन्न करे। एकादशी सदा ही पवित्र है, विशेषतः कार्तिक की एकादशी परम पुण्यमयी मानी गयी है।</p>
<p>उत्तम बुद्धिवाला मनुष्य वृद्ध माता-पिता का विधि पूर्वक पूजन करके अपनी स्त्रियों के साथ भगवान विष्णु के प्रसाद को भक्षण करे। जो इस प्रकार विधिसे द्वादशी व्रत काअनुष्ठान करता है, वह मनुष्य उत्तम सुखों का उपभोग करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है।</p>
<p>मुनिश्रेष्ठ! जो मनुष्य द्वादशी तिथि के इस परम उत्तम पुण्यमय महात्म्य का पाठ अथवा श्रवण करता है, वह उत्तम गति को प्राप्त होता है।</p>
<hr />
<p>स्रोत<br />
एकादशी को भगवान को जगाने की विधि, कार्तिक व्रत का उद्यापन, और अंतिम तीन तिथियों के महिमा के साथ ग्रन्थ का उपसंहार।<br />
वैष्णव खंड &#8211; कार्तिक मास का माहात्म्य<br />
गीता प्रेस, संक्षिप्त पद्म पुराण &#8211; पेज संख्या ४४१,</p>
<hr />
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/dwadashi-tithi-in-kartik/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2026/05/tulsi-vivah-kartik-dwadsi-ka-mahatmya.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2026/05/tulsi-vivah-kartik-dwadsi-ka-mahatmya.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">2020</post-id>	</item>
		<item>
		<title>श्रावण के शुक्लपक्ष पक्ष में पुत्रदा एकादशी का माहात्म्य</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/shravan-putrada-ekadashi-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/shravan-putrada-ekadashi-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 May 2026 04:39:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[श्रीमद पद्मपुराण]]></category>
		<category><![CDATA[एकादशी]]></category>
		<category><![CDATA[शुक्लपक्ष]]></category>
		<category><![CDATA[श्रावण]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=440</guid>

					<description><![CDATA[युधिष्ठिर ने पूछा &#8211; मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये। (सावन पुत्रदा…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>युधिष्ठिर ने पूछा</strong> &#8211; मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये। (सावन पुत्रदा एकादशी व्रत कथा)</p>
<p><strong>भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले</strong> &#8211; राजन्‌ ! प्राचीन काल की बात है, द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था, माहिष्मतीपुर में राजा महीजित्‌ अपने राज्य का पालन करते थे, किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था; इसलिये वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था। अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा&#8211;&#8216;प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ। मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है | ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है। प्रजा का पुत्रवत पालन किया, धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया तथा दुष्टों को, वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्&#x200d;यों न रहे हों, दण्ड दिया है। शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया और किसीको द्वेषका पात्र नहीं समझा |</p>
<p>फिर क्&#x200d;या कारण है, जो मेंरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। आप लोग इसका विचार करें ।&#8217;</p>
<p>राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितो के साथ ब्राह्मणो ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया | राजा का कल्याण चाहने वाले वे सभी लोग इधर-उधर घूमकर ऋषि-सेवित आश्रृमो की तलाश करने लगे।</p>
<p>इतने ही में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमश का दर्शन हुआ | लोमश जी धर्म के तत्तवज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रो के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं। उनका शरीर लोम से भरा हुआ है। वे ब्रह्मा जी के समान तेजस्वी हैं। एक-एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक-एक लोम विदीर्ण होता, टूटकर गिरता है। इसलिए उनका नाम लोमश हुआ है।</p>
<p>वे महामुनि तीनो काल की बातें जानते है। यह सब देखकर लोगो को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्हें निकट आया देख लोमश जी ने उनसे पूछा &#8211; &#8220;तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो?&#8221;</p>
<p>अपने आगमन का कारण बताओ। तुम लोगों के लिये जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करूँगा। अ्रजाओं ने कहा&#8211;! इस समय महीजित्‌ नाम वाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहों है। हम लोग उन्हीं की प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है। उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दुःख से दुखित हो, हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये हैं।</p>
<p>द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है। महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।</p>
<p>मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा कों पुत्र की प्राप्त हो।</p>
<p>उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी तक ध्यानमग्न हो गये। तत्पश्चात्‌ राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तात्त जानकर उन्होंने कहा&#8211;&#8216;प्रजाबृन्द ! सुनो &#8211; राजा महीजित्‌ पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसने वाला धनहीन वैश्य था । वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था। एक दिन जेठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा। पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया। इतने ही में यहाँ बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची। वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी; अतः बावली में जाकर जल पीने लगी । वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हॉँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीया। उसी पाप-कर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं। किसी जन्म के पुण्य से इन्हें अकण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है।</p>
<p><strong>अ्जाओं ने कहा</strong> &#8211; मुने ! पुराण में सुना जाता है कि प्रायश्चित्तरूप पुण्य से पाप नष्ट होता है; अतः पुण्य का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय ।</p>
<p><strong>लोमश जी बोले</strong> &#8211; प्रजाजनों ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो <a href="https://www.mahapuran.com/tag/ekadashi/">एकादशी</a> होती है, वह &#8216;पुत्रदा&#8217; के नाम से विख्यात है। वह मनोवाज्छित फल प्रदान करने वाली है। तुम लोग उसी का व्रत करो।</p>
<p>यह सुनकर प्रजाओ ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी के व्रत का अनुष्ठान किया। उन्होंने. विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा कों दे दिया। तत्पश्चात्‌ रानी ने गर्भ घारण किया और प्रसव का समय आने पर बलबान्‌ पुत्र को जन्म दिया।</p>
<p>इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है।</p>
<p>इस प्रकार युधिष्ठिर श्रावण के शुक्लपक्ष पक्ष की पुत्रदा एकादशी का माहात्म्य भगवान् श्री कृष्ण से जाना। अब उन्होंने <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.mahapuran.com/aja-ekadashi/">भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अजा एकादशी</a></span> के बारे में श्री कृष्ण भगवान् से पूछा।</p>
<p>&nbsp;</p>
<hr />
<p><strong>FAQs &#8211;</strong></p>
<h4>श्रावण मास में पुत्रदा एकादशी क्या है?</h4>
<p>यह श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर पुत्रदा एकादशी आती है।</p>
<h4>श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी कब है?</h4>
<p>इस साल Shravana Putrada Ekadashi व्रत 16 अगस्त 2024 को रखा जाएगा</p>
<h4>पुत्रदा एकादशी करने से क्या होता है?</h4>
<p>पुत्रदा एकादशी का महत्व &#8211; पुत्रदा एकादशी करने से संतान से सम्बंधित मनोकामना पूरी होती है।</p>
<h4>पुत्रदा एकादशी की पूजा कैसे करें? पुत्रदा एकादशी के बारे में बताइए?</h4>
<p>श्रावण पुत्रदा एकादशी पर क्या करना चाहिए इसके लिए बहुत ही सूक्ष्म या बहुत ही सरल विधि नीचे बताई है। &#8211;</p>
<p>श्रावण पुत्रदा एकादशी पर सबसे पहले अपने गुरु का पूजन करना चाहिए, अगर गुरु नहीं है तो भगवान् दत्तात्रेय को अपना गुरु मानते हुए उनका पूजन करे, फिर गणेश जी का पूजन करे और उसके बाद भगवान् विष्णु और श्री लक्ष्मी जी की पूजा करे। उसके बाद आपको श्री विष्णु पुराण, श्रीमद भागवत महापुराण, या अन्य पुराणों का पढ़े या सुने।</p>
<h4>पूजन की सरल विधि &#8211;</h4>
<ol>
<li>कलश या ताँवे के लोटे में जल ले, गंगा जल मिलाकर, माँ गंगा का ध्यान करे।</li>
<li>आचमनी से शरीर को पवित्र करे, पूजन क्षेत्र को भी पवित्र करे।</li>
<li>सबसे पहले आवाहन करे, 108 की एक या उससे अधिक माला जप करके।</li>
<li>भगवान् और उनके पार्षदों के आने पर उनके चरण धोये।</li>
<li>उन्हें बैठने के लिए आसान दे।</li>
<li>मस्तक पर चन्दन तिलक अर्पित करे।</li>
<li>सुन्दर सुन्दर पुष्प और फल अर्पित करे।</li>
<li>चन्दन सुगंध वाली धुप जलाये।</li>
<li>भगवान् और उनके पार्षदों के लिए दीपक जलाये।<br />
(आप चाहे तो 7, 11 या अधिक का दीपदान करे। )</li>
<li>अब उन्हें अग्यारी के साथ भोग अर्पित करे।</li>
<li>भगवान् के साथ साथ अन्य देवताओं को भी छोटा या बड़ा हवन करके देवताओं को भी भोग लगाए।</li>
<li>आप उन्हें भजन, शास्त्र सुना सकते है।</li>
<li>जल देकर उन्हें ख़ुशी ख़ुशी विदा करे, और उनसे आशीर्वाद में मांगे कि वो हमेशा आपके विवेक को जाग्रत रखे ताकि आप उनकी सेवा करते रहे।</li>
</ol>
<h4>पुत्रदा एकादशी कौन कर सकता है?</h4>
<p>कोई भी व्यक्ति या स्त्री जो मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो वो कर सकता है।</p>
<h4>पुत्रदा एकादशी करने से क्या फल मिलता है?</h4>
<p>इस व्रत से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।</p>
<h4>पुत्रदा एकादशी का शुभ मुहूर्त क्या है?</h4>
<p>यह व्रत पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है, प्रातःकाल पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है।</p>
<h4>पुत्रदा एकादशी के पीछे की कहानी क्या है?</h4>
<p>कथा में राजा सुकेतु और रानी मालिनी को नारद जी के उपदेश से इस व्रत द्वारा संतान प्राप्ति हुई थी।</p>
<h4>पुत्रदा एकादशी के दिन क्या खाना चाहिए?</h4>
<p>यह आपके संकल्प पर निर्भर करता है, कि अन्नाहार, फलाहार, वाणी या जल किसका त्याग करके संकल्प को पूरा करना है। त्याग ही तपस्या का आधार है।</p>
<h4>पुत्रदा एकादशी का दूसरा नाम क्या है?</h4>
<p>इसे पौष पुत्रदा एकादशी भी कहा जाता है।</p>
<h4>पुत्रदा का अर्थ क्या होता है?</h4>
<p>‘पुत्रदा’ का अर्थ है संतान देने वाली, अर्थात संतान सुख प्रदान करने वाली।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/shravan-putrada-ekadashi-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/putrada-ekadashi-ka-mahatmya.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/putrada-ekadashi-ka-mahatmya.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">440</post-id>	</item>
		<item>
		<title>रुद्राक्ष पहनने के क्या नियम हैं?</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/rules-wearing-rudraksha-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/rules-wearing-rudraksha-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 May 2026 11:41:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[FAQs]]></category>
		<category><![CDATA[श्री शिव महापुराण]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=442</guid>

					<description><![CDATA[सूत जी कहते हैं- महाप्रज्ञ! महामते! शिव रूप शौनक! अब मैं संक्षेप से रुद्राक्ष का महात्म्य बता रहा हूं सुनो। रुद्राक्ष शिव को बहुत ही…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सूत जी कहते हैं- महाप्रज्ञ! महामते! शिव रूप शौनक! अब मैं संक्षेप से रुद्राक्ष का महात्म्य बता रहा हूं सुनो। रुद्राक्ष शिव को बहुत ही प्रिय है। इसे परम पावन समझना चाहिए। रुद्राक्ष के दर्शन से, स्पर्श से तथा उस पर जप करने से यह समस्त पापों का अपहरण करने वाला माना गया है।</p>
<p>मुने! पूर्व काल में परमात्मा शिव ने समस्त लोगों का उपहार करने के लिए देवी पार्वती के सामने रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन किया था।</p>
<p>भगवान शिव बोले -महेश्वरी! मैं तुम्हारे प्रेमवश भक्तों के हित की कामना से रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करता हूं, सुनो।</p>
<p>पूर्व काल की बात है, मैं मन को संयम में रखकर हजारों दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या में लगा रहा। एक दिन से सहसा मेरा मन क्षुब्ध हो उठा। परमेश्वरी! मैं संपूर्ण लोकों का उपकार करने वाला स्वतंत्र परमेश्वर हूं। अतः उस समय मैंने लीला वश ही अपने दोनों नेत्र खोलें, खोलते ही मेरे मनोहर नेत्रपुटों से कुछ जल की बूंदें गिरी। आँसू की उन बूंदो से रुद्राक्ष पैदा हो गया। भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए अश्रु बिंदु स्थावर भाव को प्राप्त हो गए। वे रुद्राक्ष मेंने विष्णु भक्त को तथा चारों वर्णों के लोगों को बांट दिए। भूतल पर अपने प्रिय रुद्राक्ष को मैंने गोड प्रदेश में उत्पन्न किया। मथुरा, अयोध्या, लंका, मलियागिरी, काशी तथा अन्य देशों में भी उनके अंकुर उगाए।<br />
वे उत्तम रुद्राक्ष असह्य पाप समूहों का भेदन करने वाले तथा श्रुतियों के भी प्रेरक हैं।</p>
<p>मेरी आज्ञा से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जाति के भेद से भूतल पर प्रकट हुए। रुद्राक्ष की जाति के शुभाक्ष भी है। उन ब्राह्मणादि जाति वाले रुद्राक्ष के वर्ण स्वेत, रक्त पीत तथा कृष्ण जानने चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि विवरण के अनुसार अपनी जाति का ही रुद्राक्ष धारण करें। भोग और मोक्ष की इच्छा रखने वाले चारों वर्णों के लोगों और विशेषतः शिव भक्तों को शिव पार्वती की प्रसन्नता के लिए रुद्राक्ष के फलों का अवश्य धारण करना चाहिए। आंवले के फल के बराबर रुद्राक्ष श्रेष्ठ बताया गया है। जो बेर के फल के बराबर हो उसे मध्यम श्रेणी का कहा गया है और जो चने के बराबर हो उसकी गणना निम्न कोटि में की गई है।</p>
<p>अब इसकी उत्तमता को परखने की यह दूसरी उत्तम प्रक्रिया बताई जाती है। इसे बताने का उद्देश्य है भक्तों की हित कामना। पार्वती तुम भली-भांति प्रेम पूर्वक इस विषय को सुनो।</p>
<p>महेश्वरी! जो रुद्राक्ष बेर के फल के बराबर होता है वो इतना छोटा होने पर भी लोक में उत्तम फल देने वाला तथा सुख सौभाग्य की वृद्धि करने वाला होता है। जो रुद्राक्ष आंवले के फल के बराबर होता है वह समस्त अनिष्टों का विनाश करने वाला होता है तथा जो गुंजा फल के समान बहुत छोटा होता है वह संपूर्ण मनोरथ और फलों की सिद्धि करने वाला है। रुद्राक्ष जैसे-जैसे छोटा होता है वैसे ही वैसे अधिक फल देने वाला होता है। एक एक बड़े रुद्राक्ष से एक एक छोटे रुद्राक्ष को विद्वानों ने 10 गुना अधिक फल देने वाला बताया है। पापों का नाश करने के लिए रुद्राक्ष धारण आवश्यक बताया गया है। वह निश्चय ही संपूर्ण मनोरथों का साधक है। अतः उसे अवश्य धारण करना चाहिए।</p>
<p>परमेश्वरी! लोक में मंगलमय रुद्राक्ष जैसा फल देने वाला देखा जाता है वैसे ही फलदायी दूसरी कोई माला नहीं दिखाई देती।</p>
<p>देवी! समान आकार प्रकार वाले, चिकने, मजबूत, स्थूल, कंटक युक्त (उभरे हुए छोटे-छोटे दानों वाले) और सुंदर रुद्राक्ष अभिलषित पदार्थों के दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देने वाले हैं। जिसे कीडो ने दूषित कर दिया हो जो टूटा फूटा हो जिसमें उभरे हुए दाने न हो जो वर्ण युक्त हो तथा जो पूरा-पूरा गोल न हो, इन पांच प्रकार के रुद्राक्ष को त्याग देना चाहिए। जिस रुद्राक्ष में अपने आप ही छेद हो गया हो वही यहां उत्तम माना गया है। जिसमें मनुष्य के प्रयत्न से छेद किया गया हो वह मध्यम श्रेणी का होता है। रुद्राक्ष धारण बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाला है।</p>
<h2>इसके बाद किस अंग में कितने रुद्राक्ष धारण करने चाहिए?</h2>
<ul>
<li>इस जगत में ग्यारह सो रुद्राक्ष धारण करके मनुष्य जिस फल को पता है उसका वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता।</li>
<li>शक्तिमान पुरुष साढे़ पांच सौ रुद्राक्ष का सुंदर मुकुट बना ले और उसे सिर पर धारण करें।</li>
<li>तीन सौ साठ रुद्राक्ष को लंबे सूत्र में पिरो कर एक हार बना ले। वैसे-वैसे तीन हार बनाकर भक्ति पुराण पुरुष उनका यह यज्ञोपवीत तैयार करें और उसे यथास्थान धारण किये रहे।</li>
</ul>
<p>यह बताकर सूत जी बोले- महर्षियों ! &#8211;</p>
<ul>
<li>सिर पर ईशान मंत्र से</li>
<li>कान में तत्पुरुष मंत्र से</li>
<li>तथा गले और ह्रदय में अघोर मंत्र से रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।</li>
<li>विद्वान पुरुष दोनों हाथों में अघोर बीज-मंत्र से रुद्राक्ष धारण करें।</li>
<li>उदर पर वामदेव मंत्र से 15 रुद्राक्ष द्वारा गूँथी हुई माला धारण करें</li>
<li>अथवा अंगों सहित प्रणव का 5 बार जप करके रुद्राक्ष की तीन, पांच या 7 मालाएं धारण करें</li>
<li>अथवा मूल मंत्र (नमः शिवाय) से ही समस्त रुद्राक्ष को धारण करें।</li>
<li>रुद्राक्ष धारी पुरुष अपने खान-पान में मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा आदि को त्याग दें।</li>
</ul>
<p>गिरिराज नंदिनी उमें ! &#8211;</p>
<ul>
<li>श्वेत रुद्राक्ष केवल ब्राह्मणों को ही धारण करना चाहिए।</li>
<li>गहरे लाल रंग का रुद्राक्ष क्षत्रियों के लिए हितकर बताया गया है।</li>
<li>वैश्यों के लिए प्रतिदिन बारंबार पीले रुद्राक्ष को धारण करना आवश्यक है</li>
<li>और शूद्र को काले रंग का रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।</li>
</ul>
<p>यह वेदोक्त मार्ग है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और सन्यासी सबको नियम पूर्वक रुद्राक्ष धारण करना उचित है। इसे धारण करने का सौभाग्य बड़े पुण्य से प्राप्त होता है।</p>
<p>उमे! पहले आंवले के बराबर और फिर उससे भी छोटे रुद्राक्ष धारण करें।</p>
<p>जो रोगी हो, जिनमें दाने ना हों, जिन्हें कीडों ने खा लिया हो, जिनमें पिरोने योग्य छेद न हो ऐसे रुद्राक्ष मंगलाकांक्षी पुरुषों को नहीं धारण करने चाहिए। रुद्राक्ष मेरा मंगलमय लिंग विग्रह है। वह अंततोगत्वा चने के बराबर लघुतर होता है। सूक्ष्म रुद्राक्ष को ही सदा प्रशस्त माना गया है।</p>
<p>सभी आश्रमों, समस्त वर्णों, स्त्रियों और शूद्र को भी भगवान शिव की आज्ञा के अनुसार सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।</p>
<p>यतियों के लिए प्रणव के उच्चारण पूर्वक रुद्राक्ष धारण का विधान है। जिसके ललाट में त्रिपुंड लगा हो और सभी अंग रुद्राक्ष से विभूषित हो तथा जो मृत्युंजय मंत्र का जप कर रहा है उसका दर्शन करने से साक्षात रुद्र के दर्शन का फल प्राप्त होता है।</p>
<h2>रुद्राक्ष के प्रकार &#8211;</h2>
<p>पार्वती! रुद्राक्ष अनेक प्रकार के बताए गए हैं। उनके भेदों का वर्णन करता हूं। वे भेद भोग और मोक्ष रूप फल देने वाले हैं। तुम उत्तम भक्ति भाव से उनका परिचय सुनो। &#8211;</p>
<ol>
<li>एक मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात शिव का स्वरूप है। वह भोग और मोक्ष रूपी फल प्रदान करता है। जहां रुद्राक्ष की पूजा होती है वहां से लक्ष्मी दूर नहीं जाती। उस स्थान के सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं तथा वहां रहने वाले लोगों की संपूर्ण कामनाएं पूर्ण होती हैं।</li>
<li>दो मुख वाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है। वह संपूर्ण कामनाओं और फलों को देने वाला है।</li>
<li>तीन मुख वाला रुद्राक्ष सदा साक्षात साधन का फल देने वाला है, उसके प्रभाव से सारी विद्याएं प्रतिष्ठित होती है।</li>
<li>चार मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात ब्रह्मा का रूप है। वह दर्शन और स्पर्श से शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थ को देने वाला है।</li>
<li>पांच मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात कालाग्नि रूद्र रूप है। वह सब कुछ करने में समर्थ है। सबको मुक्ति देने वाला तथा संपूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करने वाला है। पंचमुखी रुद्राक्ष समस्त पापों को दूर कर देता है।</li>
<li>छः मुख वाला रुद्राक्ष कार्तिकेय का स्वरूप है। यदि दाहिनी बांह में उसे धारण किया जाए तो धारण करने वाला मनुष्य ब्रह्म हत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं है।</li>
<li>महेश्वरी! सात मुख वाला रुद्राक्ष अनंग स्वरूप और अनंग नाम से ही प्रसिद्ध है। उसको धारण करने से दरिद्र भी ऐश्वरयशाली हो जाता है।</li>
<li>आठ मुख वाला रुद्राक्ष अष्ट मूर्ति भैरव रूप है, उसको धारण करने से मनुष्य पूर्ण आयु होता है और मृत्यु के पश्चात शूल धारी शंकर हो जाता है।</li>
<li>नौ मुखी रुद्राक्ष को भैरव तथा कपिल मुनि का प्रतीक माना गया है अथवा नौ रूप धारण करने वाली महेश्वरी दुर्गा उस की अधिष्ठात्री देवी मानी गई है। जो मनुष्य भक्ति परायण हो अपने बाएं हाथ में नवमुखी रुद्राक्ष को धारण करता है वह निश्चय ही मेरे समान सर्वेश्वर हो जाता है इसमें संशय नहीं है।</li>
<li>महेश्वरी! दस मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात भगवान विष्णु का रूप है।</li>
<li>ग्यारह मुख वाला जो रुद्राक्ष है वह रुद्र रूप है। उसको धारण करने से मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है।</li>
<li>बारह मुखी रुद्राक्ष को केस प्रदेश में धारण करें, उसके धारण करने से मानव मस्तक पर बारह आदित्य विराजमान हो जाते हैं।</li>
<li>तेरह मुख वाला रुद्राक्ष विष्णु का स्वरूप है। उसको धारण करके मनुष्य संपूर्ण अभीष्ट को पाता तथा सौभाग्य और मंगल लाभ करता है।</li>
<li>चौदह मुखी रुद्राक्ष परम शिव रुप है उसे भक्ति पूर्वक मस्तक पर धारण करें इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है।</li>
</ol>
<p>गिरिराजकुमारी! इस प्रकार मुखों के भेद से रुद्राक्ष के चौदह भेद बताए गए हैं।</p>
<p>अब तुम क्रम से उन रूद्राक्षों के धारण करने के मंत्रों को प्रसन्नता पूर्वक सुनो। &#8211;</p>
<p>1 ॐ ह्रीं नमः<br />
2 ॐ नमः<br />
3 ॐ क्लीं नमः<br />
4 ॐ ह्रीं नमः<br />
5 ॐ ह्रीं नमः<br />
6 ॐ ह्रीं हुं नमः<br />
7 ॐ हुं नमः<br />
8 ॐ हुं नमः<br />
9 ॐ ह्रीं हुं नमः<br />
10 ॐ ह्रीं नमः<br />
11 ॐ ह्रीं हुं नमः<br />
12 ॐ क्राँ क्षाँ राँ नमः<br />
13 ॐ ह्रीं नमः<br />
14 ॐ नमः</p>
<p>इन 14 मंत्रों के द्वारा क्रम से एक से लेकर 14 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का विधान है।</p>
<p>साधु को चाहिए कि वह निद्रा और आलस्य का त्याग करके श्रद्धा भक्ति से संपन्न हो संपूर्ण मनोरथों की सिद्धि के लिए मंत्रों द्वारा रुद्राक्ष को धारण करें। रुद्राक्ष की माला धारण करने वाले पुरुष को देखकर भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा अन्य द्रोहकारी राक्षस आदि है, वे सब के सब दूर भाग जाते हैं जो कृत्रिम अभिचार आदि में प्रयुक्त होते है। वह सब रुद्राक्षधारी को देखकर सशंकित होकर दूर खिसक जाते हैं।</p>
<p>पार्वती रुद्राक्ष मालाधारी पुरुष को देखकर मैं शिव, भगवान विष्णु, देवी दुर्गा, गणेश, सूर्य आदि देवता प्रसन्न हो जाते हैं।</p>
<p>महेश्वरी! इस प्रकार रुद्राक्ष की महिमा धर्म की वृद्धि के लिए भक्ति पूर्वक मंत्रों द्वारा विधिवत धारण करना चाहिए।</p>
<p>मुनीश्वर! भगवान शिव ने देवी पार्वती के सामने जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने कहा। मैंने तुम्हारे समक्ष इस विद्येश्वर संहिता का वर्णन किया है। यह संहिता संपूर्ण सिद्धियों को देने वाली तथा भगवान शिव की आज्ञा से नित्य मोक्ष प्रदान करने वाली है।</p>
<p style="text-align: center;"><span style="color: #ff0000;">।।अध्याय 25, विद्येश्वर संहिता सम्पूर्ण।।</span></p>
<hr />
<p><strong>स्रोत</strong> &#8211; सक्षिप्त श्री शिव महापुराण &#8211; अध्याय 25, विद्येश्वर संहिता ( रुद्राक्ष धारण की महिमा तथा उसके विविध भेदों का वर्णन), पेज संख्या &#8211; 69 से 71 तक</p>
<p><strong>दंडवत आभार</strong> &#8211; श्रीगीताप्रेस गोरखपुर, सक्षिप्त श्री शिव महापुराण</p>
<p>&nbsp;</p>
<hr />
<p><strong>FAQs &#8211;</strong></p>
<h4>रुद्राक्ष पहनने के बाद के नियम क्या है? रुद्राक्ष पहनकर क्या क्या नहीं करना चाहिए?</h4>
<p>Rudraksha Niyam &#8211; रुद्राक्ष धारी पुरुष अपने खान-पान में मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा आदि को त्याग दें।</p>
<h4>लड़कियों को रुद्राक्ष पहनना चाहिए कि नहीं?</h4>
<p>सभी आश्रमों, समस्त वर्णों, स्त्रियों और शूद्र को भी भगवान शिव की आज्ञा के अनुसार सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/rules-wearing-rudraksha-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/rudraksh-kaise-pahne.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/rudraksh-kaise-pahne.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">442</post-id>	</item>
		<item>
		<title>अपरा एकादशी का माहात्म्य – श्रीमद्पद्मपुराण</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/apra-ekadashi-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/apra-ekadashi-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 May 2026 09:30:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[माहात्म्य]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीमद पद्मपुराण]]></category>
		<category><![CDATA[एकादशी]]></category>
		<category><![CDATA[कृष्णपक्ष]]></category>
		<category><![CDATA[ज्येष्ठ]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=479</guid>

					<description><![CDATA[युधिष्ठिर ने कहा &#8211; भगवन ! मैंने मोहिनी एकादशी उत्तम व्रत का माहात्म्य सुना। फिर &#8211; युधिष्ठिर ने पूछा &#8211; जनार्दन ! ज्येष्ठ के कृष्णपक्ष…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>युधिष्ठिर ने कहा &#8211;</strong> भगवन ! मैंने <strong><a href="https://www.mahapuran.com/mohini-ekadasi/">मोहिनी एकादशी</a></strong> उत्तम व्रत का माहात्म्य सुना। फिर<strong> &#8211; </strong></p>
<p><strong>युधिष्ठिर ने पूछा</strong> &#8211; जनार्दन ! ज्येष्ठ के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है ? मैं उसका महात्म्य सुनना चाहता हूँ। उसे बताने की कृपा कीजिये।</p>
<p><strong>भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले</strong> &#8211; राजन्‌ ! तुमने सम्पूर्ण लोको के हित के लिये बहुत उत्तम बात पूछी है ।</p>
<p>राजेन्द्र ! इस एकादशी का नाम अपरा है। (Apara Ekadashi / Apaar Punya Ekadashi) यह बहुत पुण्य प्रदान करने वाली और बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाली है। ब्रह्महत्या से दवा हुआ, गोत्र की हत्या करने बाला, गर्भस्थ बालक को मारने वाला, परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी अपरा एका दशी के सेवन से निश्चय ही पापरहित हो जाता है।</p>
<p>जो झूठी गवाही देता, माप-तोल में धोखा देता, बिना जाने हो नक्षत्रों की गणना करता और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैध का काम करता है &#8211; ये सब नरक में निवास करने वाले प्राणी हैं। परन्तु अपरा के सेवन से ये भी पापरहित हो जाते हैं।</p>
<p>यदि क्षत्रिय धर्म का परित्याग करके युद्ध से भागता है, तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होने के कारण घोर नरक में पड़ता है। जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरु की निन्&#x200d;दा करता है, वह भी महापातको से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है।</p>
<p>किन्तु अपरा के सेवन से ऐसे मनुष्य भी सदगति को प्राप्त होते हैं।</p>
<p>माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हों, उस समय प्रयाग में स्नान करने वाले मनुष्यों कों जो पुण्य होता है, काशी में शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गया में पिण्डदान करके पितरों कों तृप्ति प्रदान करने वाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता है, बृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करने बाला मानव जिस फल कों प्राप्त करता है, वदारिकाश्रम की यात्रा के समय भगवान्‌ केदार के दर्शन से तथा बदरी तीर्थ के सेवन से जो पुण्य-फल उपलब्ध होता है। तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणा सहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण-दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है; अपरा के सेवन से भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है।</p>
<p>अपरा एका-दशी को उपवास करके भगवान्‌ वामन की पूजा करने से मनुष्य सब पापो से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। इसको पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।</p>
<p><strong>युधिष्ठिर ने कहा</strong> &#8211; जनार्दन ! अपरा एकादशी का सारा महत्त्व मैंने सुन लिया, अब ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी हो (<a href="https://www.mahapuran.com/nirjala-ekadashi/" target="_blank" rel="noopener"><strong>निर्जला एकादशी</strong></a><strong>/ Nirjala Ekadashi / Pandava Ekadashi / Bhima Ekadashi</strong>) उसका वर्णन कीजिए।</p>
<hr />
<p><strong>FAQs &#8211;</strong></p>
<h4>अपरा एकादशी का क्या अर्थ है?</h4>
<p>अपरा एकादशी का अर्थ होता है अपार पुण्य।</p>
<h4>अपरा एकादशी में क्या नहीं खाना चाहिए?</h4>
<p>जननाशौंच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए, एकादशी के दिन अन्न नहीं खाना चाहिए।</p>
<h4>अपरा एकादशी पर क्या खाना चाहिए?</h4>
<p>अपरा एकादशी व्रत में आधे पेट केवल फलाहार ही करना चाहिए।</p>
<h4>अपरा एकादशी का व्रत कैसे करते हैं?</h4>
<p>सबसे पहले गुरुपूजन, गुरु नहीं है श्री दत्तात्रेय गुरु की पूजा करे, गणेश पूजन करे। फिर निराहार या अन्न त्याग का संकल्प ले और वामन रूप में श्री विष्णु भगवान् का पूजन करे।</p>
<h4>अपरा एकादशी का मतलब क्या होता है?</h4>
<p>अपरा का अर्थ होता है अपार पुण्य। श्रीपद्मपुराण के अनुसार इस दिन भगवान श्रीहरि की पूजा उनके वामन रूप में करने का विधान है। अपरा एकादशी को जलक्रीड़ा एकादशी, अचला एकादशी और भद्रकाली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<h4>मई में एकादशी कब है?</h4>
<p>वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) बुधवार, 13 मई 2026 को मनाई जाएगी। व्रत के लिए उदया तिथि 13 मई को ही मान्य है।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/apra-ekadashi-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/may-me-ekadashi-kab-hai-apra-ekadashi-vrat-katha.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/may-me-ekadashi-kab-hai-apra-ekadashi-vrat-katha.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">479</post-id>	</item>
		<item>
		<title>महादेव ने श्रीराम को स्वयं बताया 12 ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति का रहस्य</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/jyotirling-ki-utpatti-kaise-hui-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/jyotirling-ki-utpatti-kaise-hui-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 09 May 2026 11:57:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आनंद रामायण]]></category>
		<category><![CDATA[रामायण]]></category>
		<category><![CDATA[ज्योतिर्लिंग]]></category>
		<category><![CDATA[महादेव]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=436</guid>

					<description><![CDATA[विशेष जानकारी &#8211; भगवान शिव, श्रीराम के बारे में पौराणिक कथा सुनाते हुए उस समय का वृतांत बताते है, जब श्रीराम ने अपने हाथो से…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>विशेष जानकारी</strong> &#8211; भगवान शिव, श्रीराम के बारे में पौराणिक कथा सुनाते हुए उस समय का वृतांत बताते है, जब श्रीराम ने अपने हाथो से श्री रामेश्वर लिंग की स्थापना की थी, वहां शिवजी ने स्वयं प्रकट होकर श्रीराम से बातचीत की थी, वे उस घटना को मां पार्वती को सुना रहे है।</p></blockquote>
<p><strong>महादेव ने स्वयं की 12 ज्योतिर्लिंग का उत्पत्ति</strong> &#8211; हे देवि ! उस समय बालू के लिंग में से प्रकट होकर मेने राम से जो कुछ कहां था, वह सब तुमको सुनाता हूँ। ध्यान देकर सुनो।</p>
<p>मैंने कहा &#8211; हे राघवेंद्र! हे रघुश्रेष्ठ! तुम्हें में एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ।</p>
<p>एक समय कौतुकवश मैं पुराने कपड़े पहिन तथा ब्राह्मण का रूप धरकर आनन्द से भिक्षा के लिए पृथ्वी पर विचर रहा था। इस प्रकार ऋषियों के आश्रम में घूमता हुआ मुझे देखकर सैकड़ो ऋषि पत्नियाँ मेरे रूप पर मोहित हो गयीं। पतियों के रोकने पर भी वे नहीं रुकी और मेरे पीछे घूमने लगी। तब वे सब मुनिवर मुझे न पहिचानकर बहुत चकराए और क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझे बड़ा भयानक शाप दे दिया।</p>
<p>उन्होने कहा &#8211; अरे! अधम ब्राह्मण ! लगता है, तूने रति करने के लिए हमारी स्त्रियों को मोहित कर लिया है। इससे तेरे रति का साधन अर्थात्‌ लिंग हमारे कहने से कटकर जमीन पर गिर पड़े।</p>
<p>हे राम !उनके शाप से द्विजवेशधारी मेरा लिंग कटकर तुरन्त जमीन पर गिर पड़ा। बाद में, मैं अंतर्ध्यान हो गया। मुझे न देखकर वे द्विज स्त्रियाँ भी अपने-अपने घर चली गयी।</p>
<p>तदनन्तर वह लिंग इस प्रकार बढ़ा कि आकाश तक व्याप्त हो गया। यह देखकर ब्रह्मा बहुत चकित हुए और उसका अन्त देखने के लिए उद्यत हो गये । करोड़ो वर्षों तक पता लगाने पर भी ब्रह्मा को जब मेरे लिंग का अन्त नहीं मिला, तथा मेरे पास आकर डरते हुए उन्होंने कहा &#8211; हे शम्भू! इससे तो अकाल में ही प्रलय होना चाहता है।</p>
<p>मैने ब्रह्मा को पूव॑ वृत्तांत सुनाकर सादर उनके हाथ में उस लिंग को काटने के लिए अपना त्रिशूल दे दिया। तब ब्रह्मा ने कहा &#8211; मै भला आपके अंग को कैसे काट सकता हूँ। आप इस काटे।</p>
<p>हे राघव ! तब मेने उस लिंग के बारह टुकड़े कर डाले। फिर त्रिशूल से ही उठाकर उनको पृथ्वी पर इधर उधर फेक दिया। वे ही बारहों टुकड़े यहाँ पर बारह ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुए।</p>
<ol>
<li><strong>ओंकारनाथ (Omkareshwar Jyotirlinga)</strong></li>
<li><strong>सोमनाथ (Somnath Jyotirlinga)</strong></li>
<li><strong>त्र्यम्बकेश्वर (Trimbakeshwar Jyotirlinga)</strong></li>
<li><strong>मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna Jyotirlinga)</strong></li>
<li><strong>नागेश्वर (Nageshwar Jyotirlinga)</strong></li>
<li><strong>वैद्यनाथ (Baidyanath Jyotirlinga)</strong></li>
<li><strong>काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath Jyotirlinga)</strong></li>
<li><strong>केदारनाथ (Kedarnath Jyotirlinga )</strong></li>
<li><strong>केदारेश्वर (Kedareshwar Jyotirlinga)</strong> &#8211; (<em>Kedareshwar Cave, महाराष्ट्र में है, हिंदी अर्थ में  यहाँ आनंदरामायण में शिव जी ने स्वयं उसे ज्योतिर्लिंग बताया है। लेकिन संस्कृत में इसे भीमेशु अर्थात भीम के ईश ही कहा गया है। </em> )</li>
</ol>
<figure id="attachment_1567" aria-describedby="caption-attachment-1567" style="width: 550px" class="wp-caption aligncenter"><img data-recalc-dims="1" fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-1567 size-full" title="भीमेशु अर्थात भीम के ईश" src="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2024/03/bheemeshu-bheemashankar-jyotirlinga.jpg?resize=550%2C173&#038;ssl=1" alt="भीमेशु अर्थात भीम के ईश" width="550" height="173" /><figcaption id="caption-attachment-1567" class="wp-caption-text">भीमेशु अर्थात भीम के ईश</figcaption></figure>
<p><strong>10. महाकाल (Mahakaleshwar Jyotirlinga )</strong></p>
<p><strong>11. घृष्णेश्वर (Ghrishneshwar Jyotirlinga )</strong></p>
<p>ये ग्यारह शुभ ज्योतिर्लिंग है।</p>
<p><strong>12. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (Rameshwaram Jyotirlinga) &#8211;</strong></p>
<p>बारहवाँ लिंग, गंधमादन पर्वत के ईशान कोण वाले शिखर पर बहुत काल तक स्थित रहकर भी किसी मनुष्य की दृष्टि में नहीं आया। तब मुनियों ने लिंग के द्वारा शिव कों पहिचानकर पुनः वर दिया &#8211; हे! गिरिजाप्रिय ! तुम्हारे फिर लिंग हो जाये।</p>
<p>तदनन्तर एक समय वह मेरु का गंधमादन नामक उत्तरी शिखर प्रलय वायु से उड़कर यहाँ आा गिरा। हे राघव ! उस गंधमादन शिखर को तुम यहाँ दक्षिणी समुद्र के संगम पर जल में देख सकते हो। बारहवां गंधमादन लिंग तुम्हारे प्रतिष्ठित लिंग की ईशान दिशा में पास ही विद्यमान है। इतने समय तक इसको किसी ने नहीं देखा था। पर आज वानर सहित तुमने इस मोक्षप्रद लिग कों स्पष्ट देख लिया है। तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंग की महिमा से ही पृथ्वी पर इसकी प्रसिद्दि हुई है। इस कारण हे रघूत्तम ! इस लिंग की जो ज्योति है, वह ज्योति तुम्हारे द्वारा स्थापित बालुकामय लिंग में मेरे कहने से आज ही चली आएगी।</p>
<p>हे रघूत्तम ! आज से बारहवाँ ज्योतिर्लिंग तुम्हारा स्थपित रामेश्वर ही दुनियां के सब मनुष्यो में प्रसिद्ध होगा। मेरे वचन से पूजा आदि सब उपचार सदा तुम्हारे रामेश्वर लिंग का ही होगा। मैं भी अगस्त्य मुनि के तथा तुम्हारे कहने से काशी छोड़कर यहाँ आ गया हूँ और अब तुम्हारे इस लिंग में ही निवास करूँगा। जो मनुष्य सेतुवंध रामेश्वर कों प्रणाम करेगा, वह मेरी कृपा से ब्रह्महत्या आदि भयानक पापों से भी मुक्त हो जायगा।</p>
<p>हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे यह वर दें कि सब लोग मुझे स्नान कराने के लिए सदा काशी की मणिकरणिका का जल लाकर चढ़ाया करें।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>हे पार्वती ! मेरे इस वचन को सुनकर श्रीराम हर्षित होकर बोले कि जो मनुष्य सेतुवंध में स्नान करके रामेश्वर शिव का दर्शन करेंगे, फिर हढ़ संकल्प से सेतुकी बालुका को काँवर में रखकर प्रेम तथा यत्न से काशी में ले जाकर गंगा के प्रवाह में डालेंगे और उस काँवर को वहीं छोड़कर दूसरी काँवर के द्वारा गंगाजल लाकर उससे रामेश्वर का अभिषेक करेंगे। वहाँ उस काँवर कों भी समुद्र में फेंककर नि:संदेह ब्रह्मपद को प्राप्त होंगे। जब तक दृढ़ संकल्प न होगा, तब तक रामेश्वरम आना न होगा।</p>
<p>कदाचित्‌ कोई आ गया तो यही जानना चाहिए कि उसके पूर्वजन्म का संकल्प था। मेरे कहने से आप इस बात में तनिक भी संदेह न करें।</p>
<p>इस प्रकार राम जब अनेक वर दे रहे थे, तभी वहां कुम्भजन्म ऋषि (अगस्त ऋषि) मुनि आ पहुंचे। उन्होंने वहाँ आकर शिव तथा राम को प्रणाम किया।</p>
<p>तब राम ने भी मुनि को प्रणाम किया। अगस्त्य मुनि ने राम से कहा &#8211; हे राघव! आपके अनुगृह से मुझे आज बहुत दिन के बाद विश्वनाथ (शिव जी) का दर्शन प्राप्त हुआ है।</p>
<p>इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इसलिए में भी यहाँ एक लिंग स्थापित करता हूँ। इतना कहकर अगस्त्य मुनि ने भी अपने नाम से एक उत्तम लिंग स्थापित किया । मुनि ने आनन्द के साथ रामेश्वर के अग्निकोण में उसकी स्थापना की। इस प्रकार मुनि ने अगरतीश्वर नामक लिंग की पूजा करके विश्वनाथ, रामेश्वर एवं श्रीराम की स्तुति तथा प्रणाम करने के अनन्तर पुरातन गंघमादन लिंग का दर्शन किया और प्रसन्न होकर अपने आश्रम को चले गये।</p>
<p>है देवि ! सेतुवंध रामेश्वर के देवालय में ही आग्नेय कोण में अगस्तीश्वर तथा ईशान कोण में गन्धमादनेश्वर का लिंग अभी भी विद्यमान है। उन्हें कोई इन नामों से जानता है और कोई नहीं भी जानता। लेकिन रामेश्वर का लिंग स्वर्ग, पाताल तथा मृत्यु इन तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गया।</p>
<p><strong>Also Read</strong> &#8211; <a href="https://www.mahapuran.com/dwadash-jyotirling-mahatmya/">श्री शिव महापुराण में वर्णित द्वादस ज्योतिर्लिंगों के माहात्म्य का वर्णन</a></p>
<hr />
<p><strong>सोर्स</strong> &#8211; श्रीमदआनन्दरामायण, सारकाण्डम, सर्ग &#8211; 10, पेज नंबर 108 से 110 तक।<br />
<strong>दंडवत आभार</strong> &#8211; श्रीगीताप्रेस गोरखपुर</p>
<hr />
<p><strong>नोट &#8211; कृपया ध्यान दे &#8211;</strong></p>
<ul>
<li>महादेव जी ने यहाँ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के बारे में बताया है शिवलिंग की नहीं।</li>
<li>ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति अन्य शास्त्रों में अगर भिन्न प्रतीत होती है तो वह इस कथा का या तो दूसरा अंश होगा या कल्पभेद होगा। अपने विवेक का इस्तेमाल करे।</li>
</ul>
<hr />
<p><strong>FAQs (भावानुसार) &#8211;</strong></p>
<h5>ज्योतिर्लिंग क्या है?</h5>
<p>साक्षात् महादेव की शक्ति ही ज्योतिर्लिंग के रूप में विध्यमान है।</p>
<h5>ज्योतिर्लिंग का इतिहास क्या है?</h5>
<p>श्रीमद आनन्दरामायण के अनुसार ज्योतिर्लिंग का इतिहास ऊपर दिया गया है, लेकिन कल्पभेद के कारण भिन्न भिन्न पुराणों अलग अलग महिमा है।</p>
<h5>12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना किसने की?</h5>
<p>श्रीमद आनन्दरामायण के अनुसार स्वयं महादेव ने 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना की है।</p>
<h5>ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति कैसे हुई?</h5>
<p>श्रीमदआनन्दरामायण के अनुसार महादेव अपने त्रिशूल से 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना की है।</p>
<h5>12 ज्योतिर्लिंग कैसे उत्पन्न हुआ?</h5>
<p>आनन्दरामायण के अनुसार महादेव अपने त्रिशूल से 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना की है।</p>
<h5>12 ज्योतिर्लिंग के पीछे की कहानी क्या है?</h5>
<p>आनन्दरामायण के अनुसार ज्योतिर्लिंग के पीछे की कहानी ऊपर स्वयं महादेव ने पार्वती को बताई है। कल्पभेद के कारण भिन्न-भिन्न पुराणों की अलग-अलग महिमा है।</p>
<h5>12 ज्योतिर्लिंग का नाम कैसे पड़ा?</h5>
<p>स्वयं महादेव ने इन 12 ज्योतिर्लिंगों का नामकरण किया।</p>
<h5>सबसे बड़ा ज्योतिर्लिंग कौन सा है?</h5>
<p>मनुष्य की मुक्ति का सीधा मार्ग 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन है। जिसमें रामेश्वरम की बालू को लेकर मणिकर्णिका गंगा घाट में प्रवाहित करना होता है। फिर काशी विश्वनाथ के दर्शन करके अन्य 10 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करे। आपको फिर वापस काशी विश्वनाथ आकर उनके दर्शन करके, उनसे अनुमति और जल लेना है और उसे श्री रामेश्वरम पर चढ़ाना है।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/jyotirling-ki-utpatti-kaise-hui-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/12-jyotir-linga-list-india.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/12-jyotir-linga-list-india.jpg?fit=800%2C450&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">436</post-id>	</item>
		<item>
		<title>12 ज्योतिर्लिंग कौन-कौन से हैं? – श्री शिव महापुराण</title>
		<link>https://www.mahapuran.com/dwadash-jyotirling-mahatmya-2/</link>
					<comments>https://www.mahapuran.com/dwadash-jyotirling-mahatmya-2/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[mahapuran@2026]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 09 May 2026 16:45:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[माहात्म्य]]></category>
		<category><![CDATA[श्री शिव महापुराण]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.mahapuran.com/2024/?p=434</guid>

					<description><![CDATA[जो निर्विकार होते हुए भी अपनी माया से विराट्‌ विश्व का आकार धारण कर लेते हैं, स्वर्ग तथा अपवर्ग जिनके कृपा कटाक्ष के वैभव बताये…]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जो निर्विकार होते हुए भी अपनी माया से विराट्‌ विश्व का आकार धारण कर लेते हैं, स्वर्ग तथा अपवर्ग जिनके कृपा कटाक्ष के वैभव बताये जाते हैं, तथा योगीजन जिन्हें सदा अपने हृदय के भीतर आत्म ज्ञानानन्द-स्वरूप में देखते हैं, उन तेजोमय भगवान्‌ शंकर को, जिनका आधा शरीर शैलराज कुमारी पार्वती से सुशोभित है, निरन्तर मेरा नमस्कार है॥</p>
<p>जिसकी कृपापूर्ण चितवन बड़ी ही सुन्दर है, जिसका मुखारविन्द मन्द मुसकान की छटा से अत्यन्त मनोहर दिखायी देता है, जो चन्द्रमा की कला से परम उज्वल है, जो तीनों भीषण तापों को शान्त कर देने में समर्थ है, जिसका स्वरूप सच्चिदानंदमय एवं परमानन्दरूप से प्रकाशित होता है तथा जो गिरिराजनन्दिनी पार्वती के भुजपाश से आवेष्टित है, वह (शिव नामक) अनिर्वचनीय तेज:पुंज सबका मंगल करे॥</p>
<p><strong>स्तुति स्रोत</strong> &#8211; श्री शिव महापुराण &#8211; चतुर्थी कोटि रूद्रसंहिता &#8211; अथ प्रथमोध्याय, द्वादस ज्योतिर्लिंगों एवं उनके उपलिंगो के माहात्म्य का वर्णन</p>
<hr />
<h2>अब श्री शिव महापुराण में वर्णित द्वादश ज्योतिर्लिंगों के माहात्म्य का वर्णन &#8211;</h2>
<p>सभी ऋषिगणों के द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग के माहात्म्य के बारे में पूछने पर श्री सूतजी बोले &#8211;</p>
<ol>
<li>सौराष्ट्र में सोमनाथ,                                                  (श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन,                                           (श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>उज्जयिनी में महाकाल,                                            (श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>ॐकार क्षेत्र में परमेश्वर,                                           (श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>हिमालय पर केदार,                                                 (श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>डाकिनी में भीमशंकर,                                             (श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>वाराणसीमें विश्वेश्वर,                                                 (श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>गौतमी नदी के तट पर त्यम्बकेश्वर,                           (श्री त्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>चिताभूमि में वैद्यनाथ,                                               (श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>दारुकवन में नागेश,                                                 (श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग )</li>
<li>सेतुबन्ध में रामेश्वर                                                    (श्री रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग)</li>
<li>तथा शिवालय में घुश्मेश्वर [नामक ज्योतिर्लिंग] हैं।      (श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग)</li>
</ol>
<p><img data-recalc-dims="1" decoding="async" class="alignnone wp-image-1777" title="श्री शिव महापुराण में वर्णित द्वादश ज्योतिर्लिंगों के माहात्म्य का वर्णन" src="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2024/08/12-dwadash-jyotirling-ka-mahatmya-mahatv.jpg?resize=700%2C300&#038;ssl=1" alt="श्री शिव महापुराण में वर्णित द्वादश ज्योतिर्लिंगों के माहात्म्य का वर्णन" width="700" height="300" /></p>
<p>जो [प्रतिदिन ] प्रातःकाल उठकर इन बारह नामों का पाठ करता है, उसके सभी प्रकार के पाप छूट जाते हैं और उसको सम्पूर्ण सिद्धियों का फल प्राप्त हो जाता है।</p>
<p>हे मुनीश्वरो! उत्तम पुरुष जिस-जिस मनोरथ की अपेक्षा करके इनका पाठ करेंगे, वे उस-उस मनोकामना को इस लोक में तथा परलोक में प्राप्त करेंगे, और जो शुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुष निष्काम भाव से इनका पाठ करेंगे, वे [पुनः] माता के गर्भ में निवास नहीं करेंगे।</p>
<p>इस लोक में इन लिंगों का पूजन करने से [ ब्राह्मण आदि] सभी <strong>वर्णों *** </strong>का दुःख नष्ट हो जाता है और परलोक में निश्चित रूप से उनकी मुक्ति भी हो जाती है। इन लिंगों पर चढ़ाया गया प्रसाद सर्वथा ग्रहण करने योग्य होता है; उसे [ श्रद्धासे)] विशेष यत्न से ग्रहण करना चाहिये। ऐसा करने वाले के समस्त पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं।</p>
<p>हे द्विजो! इन ज्योतिर्लिग का विशेष फल कहने में ब्रह्म आदि भी समर्थ नहीं हैं, फिर दूसरों की बात ही क्या? जिसने किसी एक लिंग का भी छः मास तक यदि निरन्तर पूजन कर लिया, उसे पुनर्जन्म का दुःख नहीं उठाना पड़ता है।</p>
<p>नीच कुल में उत्पन्न हुआ पुरुष भी यदि किसी ज्योतिर्लिंग का दर्शन करता है, तो उसका जन्म पुनः निर्मल एवं उत्तम कुल में होता है। वह उत्तम कुल में जन्म प्राप्त कर धन से सम्पन्न एवं वेद का पारगामी विद्वान्‌ होता है। उसके बाद [वेदोचित] शुभ कर्म करके वह स्थिर रहने वाली मुक्ति प्राप्त करता है।</p>
<p>हे मुनीश्वरो! <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.pradeeptomar.com/2023/02/do-shudra-malechhi-ghulam-and-neech.html" target="_blank" rel="noopener">म्लेच्छ</a></span><strong>***</strong>, अन्त्यज अथवा नपुंसक कोई भी हो-वह [ज्योतिर्लिंग के दर्शन के प्रभाव से] द्विजकुल में जन्म लेकर मुक्त हो जाता है, इसलिये ज्योतिर्लिंग का दर्शन [अवश्य] करना चाहिये।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>आगे</strong> &#8211; इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के उपलिंगो का वर्णन</p>
<hr />
<p><strong>ये भी पढ़े</strong> &#8211; <a href="https://www.mahapuran.com/jyotirling-ki-utpatti-kaise-hui/">जब श्रीमहादेव ने स्वयं श्री राम को बताया द्वादश ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति का रहस्य (श्रीआध्यात्मरामायण के अनुसार)</a></p>
<hr />
<p><strong>स्रोत</strong> &#8211; श्रीशिवमहापुराण &#8211; चतुर्थी कोटि रूद्रसंहिता &#8211; अथ प्रथमोध्याय, द्वादस ज्योतिर्लिंगों एवं उनके उपलिंगो के माहात्म्य का वर्णन<br />
<strong>दंडवत आभार</strong> &#8211; श्रीगीताप्रेस गोरखपुर, पेज संख्या 201-202</p>
<hr />
<p><strong>मेरे मनोभाव &#8211;</strong></p>
<ul>
<li><strong>सभी वर्णों ***</strong> &#8211; श्री शिव महापुराण में सभी वर्णो को ज्योतिर्लिंग की पूजा को बताया गया है, अर्थात शूद्र वर्ण को <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.pradeeptomar.com/2023/02/do-shudra-malechhi-ghulam-and-neech.html">मलेच्छियों और नीच लोगो</a> ने</span> भ्रमित करने का कार्य किया है ताकि शूद्र अपनी पीढ़ी को मुक्ति न दिला सके, और वे उनकी ऊर्जा (आत्मा) को ग्रास बना सके, या बंधक बना सके।</li>
<li><strong>म्लेच्छ***</strong> &#8211; जबकि म्लेच्छ, अन्त्यज अथवा नपुंसक कोई भी हो-वह [ज्योतिर्लिंग के दर्शन के प्रभाव से] द्विजकुल में जन्म लेकर मुक्त हो जाता है।</li>
</ul>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.mahapuran.com/dwadash-jyotirling-mahatmya-2/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
		<media:content medium="image" url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/12-jyotirlinga-list.jpg?fit=800%2C533&amp;ssl=1"/>
<media:thumbnail url="https://i0.wp.com/www.mahapuran.com/wp-content/uploads/2025/01/12-jyotirlinga-list.jpg?fit=800%2C533&amp;ssl=1"/>
<post-id xmlns="com-wordpress:feed-additions:1">434</post-id>	</item>
	</channel>
</rss>